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गुरुवार, 8 मार्च 2018

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2018




महिला दिवस के विशेष दिन पर शायद आप इस बात से सहमत हों / 


बहुत कुछ आया स्त्रियों के हिस्से
शिक्षा
नौकरी
पहचान
सबकुछ करने की स्वतंत्रता
कुछ भी बोलने की स्वतंत्रता
ब्रह्ममुहूर्त से रात तक
महानगरों के चप्पे चप्पे छान मारने की स्वतंत्रता
एक पूरा दिन 
दीपक की भांति 
उनके आगे रख दिया गया 
....
विमर्श होते गए
प्रश्न धुएं की तरह निगलता रहा
क्या सच में वह स्वतंत्र हो गई ?!
या आलोचना की अग्नि में रख दी गई ?

सोचो समाज के लोगों 
कानून बनानेवालों
रोनेवाली स्त्रियों ...
आज भी स्थिति 
सहज होते हुए 
दूभर है ! 
गम्भीरता से देखना 
इन दूभर जड़ों में स्त्रियाँ ही बैठी हैं
जो अपनी ही जड़ों को काटती हैं
साग की तरह !!
वह सिर्फ स्वयं को अद्भुत मानती हैं 
किसी अन्य स्त्री की विशेषता
उसके दर्द से
आंखें मूंद
अनाप शनाप बोलती हैं 
विधवा,परित्यक्ता,बांझ को
हिकारत से देखती हैं
खुद को सधवा 
पति की प्रिया 
अच्छी माँ होने का दम्भ रखती हैं 
भले ही सत्य कुछ और हो
... 
अपवाद हटा दें
तो स्त्रियों का दृष्टिकोण 
बड़ा तुच्छ सा होता है
और   वही दृष्टिकोण 
  रात दिन
वे पुरुषों को देती हैं
मान लेने पर विवश करती हैं 
!!!!
प्रश्न है,
क्यूँ नहीं लेती वह काली का रूप
एक स्त्री के दर्द के खिलाफ
क्यूँ नहीं करती वह अनशन ?
मशाल लेकर क्यूँ नहीं निकलती ?
क्यूँ नहीं आगे बढ़कर उसके सर पर हाथ रखती ?
परोक्ष रूप से सहायता क्यूँ नहीं करती ?
जिस  बदहवास ज़िन्दगी को जीकर
वह एक रूप लेती है
उससे आनेवाली कन्या पीढ़ी के लिए
सुरक्षित रास्ते क्यूँ नहीं निर्मित करती
!!!
सारांश इस दिवस का सिर्फ इतना होना चाहिए
कि सही को सही कहना है
गलत को इंगित करना है
वह अपने ही अंदर क्यूँ न हो !
सौ कदमों से पहले
एक दृढ़ कदम की ज़रूरत है
अन्यथा
शिकायतों, उलाहनों से क्या होगा !
सामनेवाले को ना सही
खुद को तो सुधारा जा सकता है !!!
है न ???






8th March पर विशेष
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अवशेष
-----------
उस संजीदा सी
साँवली लड़की में
बड़े बनने , आगे बढ़ने
के गुण थे कई ।
कॉलेज कैंटीन में जब
दोस्तों का झुंड मस्ती करता
फ़िकरे कसता , ठहाके लगाता
तब वह सिर्फ मंद-मंद मुस्काती थी
सबों के बीच में रह कर भी अक्सर
जाने कहाँ खो जाती थी ।
पहनने- ओढ़ने का भी
अलग सा सलीक़ा था उसका
भीड़ में जाने से कतराती थी
या भीड़ से अलग दिखने की
सलाहियत थी उसमें
एक ख़ास तरह का नमक था उसमें ।
अजब पहेली सी लड़की
कहीं सब कुछ अभिनय ही न हो!
या फिर बड़े बनने के स्वप्न के
टूट जाने का भय !
रोज़ नयी-नयी लंबी कारों से
कॉलेज के बाहर उतरना
उसे सखियों के बीच बड़ा बनाता था
आते ही उसके, कई जोड़ी उत्सुक
आँखें , बड़ी हसरत से देखा करतीं उसे ।
पढ़ा करतीं उसके हाव- भाव
पर
आँखों पर चढ़ा रंगीन चश्मा
उसके व्यक्तित्व पर गोपनीयता
की बर्क़ लगाता , ज़रा और तिलिस्मी बनाता ।
एक दिन
वारिश में भीगे चेहरे ने
धो डाले नक़ाब , दोस्तों से छुप
न सका उसकी आँखों का मर्म
भावहीन आँखों के छलकते पैमाने ने
उगल दिये सारे राज़ ।
ख़ामोश लबों ने बाँट ही लिया
पूरा दर्द ! रोज़ नई लंबी गाड़ी से
उतरने वाली खूबसूरत लड़की का दर्द !
लंबी गाड़ी का अनकहा पीर ,,,,,
माँ आज ही अस्पताल में जीवन से
जूझती अलविदा कह गई थी ,,,
लंबी गाड़ियों से आनेजाने का सिलसिला
थम चुका था,
उसे अब लंबी गाड़ियों से घिन
आने लगी थी ,,,,,
अब उसकी
आँखों में थे
सिर्फ
जले सपनों की राख़
और
धुआँते मन के
दरक़ते ख़्वाब ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


माँ ने गलत सिखाया है
******************
अगर मेरी कविता पढ़ते वक़्त
नज़र आये मेरा दुःख
उसे बहने देना दिल में
ये दर्द मेरी जैसी असभ्य औरतों का दुःख होगा।
जो आज तक न समझ पाई पुरुष स्त्री का भेद!
तुम सिखा सकती थी इस भेद को कुछ यूँ, जैसे
फसल अपने भीतर छुपाये रहती है अनाज
अपनी देह को तपाते हुए पैदा करती है गेँहू-धान
ऐसी ही होती है औरत जो दर्द में होकर भी पैदा करती हैं पुरुष!
पर तुम बोली धीरे बोलो भइया तो लड़का है
तुम ठहरी लड़की
समाज की जुबान फुसफुसी है लेकिन कान तेज हैं
शांत रहो
पहली दफ़ा जब पेट दर्द और शरीर में महसूस किया था चट्टानों के भार को
तुम मुझे समझा सकती थी की औरत भी ब्रह्मा है पर
तुम मुझे अचार में फैली फफूँद और पूजाघर की सरहदों के बारें में समझाती रही।
और समाज फुसफुसाता रहा
एक और अछूत के बढ़ जाने पर
मुझे तुम रात और दिन का भेद समझा सकती थी
जब उम्र मुझमें घोड़े की तरह सवार थी
तुमने लगा दीं मेरे खेलने पर पाबंदी
मुझे मुझसे लड़ने के लिए छोड़ दिया अकेला
मैं देखती रही बिखरते हुए कई लड़कियों को सड़कों पर रात में
जो मासूम सुबह तक बेशर्म अख़बार की सुर्खियां बन गई
माँ तुम्हारा समाज चोर है जो फुसफुसा के भाग जाता है
मैं सिपाही की तरह उसे खोज रही हूँ
और तुम आज तक उसकी भयानक तस्वीर दिखा के
मुझे डरा रही हो।
मैं महसूस कर रही हूँ तुममें दर्द नही पैदा हुआ
मुझ जैसी असभ्य औरत को समझने का


अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आप सभीको हार्दिक शुभकामनाएं ! 

परिक्रमा

कितना दर्द,
कितनी प्रताड़ना,
कितना अपमान
उसे और सहना होगा !
कब तक अपने आत्माभिमान को
अपने स्वत्व से अलग कर
दरवाज़े के पीछे लगी खूँटी पर
टाँग कर रखना होगा !
कब तक अपनी खुद्दारी को
हार कर अपने लिये
और नये बंधनों,
और कठिन पाबंदियों,
और तल्ख़ सख्तियों के
दस्तावेजों पर उसे
हस्ताक्षर करने होंगे !
कब तक वह 
परिवार के हर सदस्य की 
ज़रूरतों, सुविधाओं 
और आराम के लिए 
घर की धुरी पर अहर्निश 
कोल्हू के बैल की तरह 
परिक्रमा लगाती रहेगी ! 
अब उसे पैरों में पड़ी
इन जंजीरों को उतार कर
फेंकना ही होगा !
अपनी गर्दन पर रखे 
कोल्हू के इस हल को 
उतार कर 
नीचे रखना ही होगा ! 
उसे भी अधिकार है 
खुली हवा में साँस लेने का ! 
इस बार जो कदम इस
दहलीज को लाँघ कर
बाहर निकलेंगे
वे वापिस नहीं लौटेंगे
यह तय है !
धूप की रोशनी में
पार्क की बेंच पर लिया गया
यह निर्णय शाम होते-होते
शिथिल होने लगता है 
घर से बाहर निकल कर
कहाँ जाये ?
मन में असीम दुश्चिंतायें
सर उठाने लगती हैं !
कौन अचानक से सिर पड़े
इस अनचाहे मेहमान का
अपने घर में स्वागत करेगा ?
कौन मँहगाई के इस दौर में
उसे अपनी दुनिया में
खुशी-खुशी शामिल करेगा ?
किस घर का कुंडा खटखटाये ?
कौन अपने बच्चों के मुँह से
निवाले निकाल कर
उसके मुँह में डालेगा ?
इस उम्र में उसे कौन नौकरी देगा ?
कौन सा काम वह सीख पायेगी ?
रात का अन्धेरा गहराते ही
सब कुछ कितना भयावह
और निष्ठुर सा हो उठता है !
किसी बस, ऑटो या टैक्सी में
बैठने की हिम्मत नहीं होती !
कहीं उसे भी ‘दामिनी’ जैसा ही
कुछ ना झेलना पड़ जाये !
धीमे-धीमे उठते
हर पल मन-मन भारी होते कदम
उसी परिधि पर चलते हुए
फिर उसी दहलीज पर
जा खड़े होते हैं
जहाँ कभी ना लौटने का
संकल्प ले वे बाहर निकले थे !
अचानक यही दहलीज
लक्ष्मण रेखा बन उसकी
सुरक्षा की गारंटी बन जाती है !
घर की दीवारें किसी जेल की
काल कोठरी की तरह नहीं वरन
सुदृढ़ किले सी मजबूत होकर
उसके मन में असीम आश्वस्ति
और आत्मविश्वास का संचार
कर जाती हैं !
प्रताड़ना और अपमान का हर शब्द
कुनैन सा कड़वा मगर
हितकारी लगने लगता है !
अनायास ही ये परिधियाँ उसे
बड़ी पावन लगने लगती हैं !
अपनी गृहस्थी के खूँटे से बँधी  
इन्हीं परिधियों पर अनवरत
चलते रहने में ही उसे
अपने जीवन की सम्पूर्ण यात्रा
का सार दिखाई देने लगता है,
जिनकी दिशा और दशा 
लाख चाह कर भी
वह कभी बदल नहीं पाई !


तलाकशुदा औरतें
*****************
मैंने नहीं रखा कभी सोमवार का व्रत
रूठे शिव को मनाने के लिए....
के उनके जैसा ही कोई रूठा मिले
जिसे मनाते मनाते जीवन उपवास हो जाए
कसम से मैंने कभी नहीं बताया माँ को
मुझे पसंद है दिलकश आवाज और
खिचड़ी बालों वाले
या पहाड़ों की धूप में तचे रंग में कोई एक ख़ास
कभी नहीं बांधे मैंने उस पुराने वट में
मन्नत के धागे
नहीं जलाई तुलसी के सामने धूप-बत्ती
बचपन से सुनती रही उसकी बेचारगी की कहानी
मैंने कभी नहीं माँगा प्यार, पके आम की तरह वह मुझे अपनेआप मिला
शादी एक विकल्प की तरह थी मैंने स्वीकार किया
क्योंकि मुझे आम कुछ खास पसंद नहीं थे
विकल्प भविष्य में मेरी आत्मा में होने वाला एक घाव है
मुझे पसंद था मेरा बचपना
जिसकी पीली फ्रॉक पर सुर्ख लाल तितलियां उड़ती थी
अब तितलियां यादों के पुराने फ्रेम में क़ैदियों की तरह छटपटाती हैं
विकल्प शादी की अल्बम में खिंचे मंडप में मन्त्र की तरह गूंजता रहता है
जाने वो कौन पहली औरत थी जिसने विकल्प स्वीकारने की नींव धरी
अब पूरी बस्ती तैयार है घायल औरतों की
उस पहली रहस्यमी औरत की खोज में रखने लगी हूँ इन दिनों मैं भी शिव का व्रत!
वो पहली औरत दफन है उसी जमीं के भीतर एक सभ्यता बनकर
जिसमे फ़ैल चुकी है उपवास करती कराहती हुई स्त्रियां
उत्खनन में उसका जीवाश्म नहीं मिलेगा
मिलेंगे सोने के सिक्के
जो पैदा करेंगे झपट्टा मारने वाले विकल्प
मैं कराहती औरतों के बीच लौटूंगी, अपना व्रत खंडित करने
मुझे भी बनना है अब पहली औरत.... जो अपने विकल्प को त्याग देगी
भले फ़ैल जाए सनसनी समाज के बियाबान जंगल में
मेरी माँ मुझे लुभाती रहे खिचड़ी बालों वाले की रूपकथा सुनाकर।
मेरे इस नए जन्म के बाद ही फैलेगी नई बस्तियां समाज में
सुनाई जाएँगी नई औरतों की सभ्यता की कहानी
अब मैं भी आम पसन्द करने लगी हूँ।
Soniya Bahukhandi
#औरतें
Happy international womens day


नाज करो कि तुम नारी हो
नाज करो कि सब पर भारी हो
नाज करो कि तुमसे संसार है
नाज करो कि धुरी के साथ हाशिया भी हो
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

तुम बया हो जो खूबसूरत नीड़ बुनती है
गर आंधियों में बिखर भी गए 
तो सम्बल और धैर्य चुनती हो
दुआ तुम्हारी प्रभु भी स्वीकारते
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

तलवों के नीचे की जमीन
शुष्क रूखी कठोर हो
या फिर मखमली शीतल दूब हो
नमी के साथ उर्वर रखती अहसास
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

पहाड़ जैसी अडिग हो 
गलत को गलत कहने के लिए
नदी जैसी निर्मल हो
निश्छलता से बहने के लिए
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

एक कर में नवजीवन रखती
दूजा कर सेवा को समर्पित
तीजे कर में ई गैजेट्स संभालती
चौथा कर  कलम को अर्पित
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

मधुर स्वरों की मालकिन तुम
हर क्षेत्र तुम्हीं से सज्जित है
आखिर क्यों फिर आधी दुनिया
तुम्हारे जन्म से लज्जित है
इतनी अपूर्णता भी किसे मिलती है

नाज करो कि नारी हो


#शहीद_अमृता_देवी

आज कल महिलायें आजादी के नाम पर जो क्रांति ला रही है उसके कहने क्या.. महावारी की बातें या खून से भरे स्नेट्री पेड की खुल्लम खुल्ला बातें हो या सेक्स को लेकर बातें और जो आज एक और सोशल मिडिया पर घूमती तस्वीर देखी , ब्लाऊज़ उतार कर स्तनपान कराती महिला पॉज़ दे रही है , जिसमे उसके चेहरे पर मातृत्व की झलक अंश मात्र भी न दिखाई दी...

क्या बस आपकी लड़ाई इन्ही फ़ालतू बातों की है? 
क्या बताना है आपको समाज को? जो आप बता रही है हर पुरुष चाहे पिता हो भाई हो दोस्त हो पति हो युवक हो सब जानते हैं.. क्या नया है इसमें? घूमिये बिना ब्रा बिना पेड कौन रोकता है आपकी मर्ज़ी है कुछ कीजिये.. कोई आपको जबरदस्ती नही पकड़ाने आ रहा कि पहनो..

खैर छोड़िये .. आप पढ़ी लिखी औरतों की लड़ाई शायद यहीँ तक सिमित है...

एक महिला ऐसी भी थी जिसने 300 वर्ष पूर्व इतिहास रचा था...
स्नेट्री पेड ब्रा इन से इतर... उन्हें भी ये सब होता था जो हमे होता है... पर उनकी लड़ाई ये नही थी...

#1730 ईस्वी में जब जोधपुर के राजा ने जब नए महल के लिए खेजड़ी की लकड़ी काटने के लिए सैनिकों को आदेश दिया तो सैनिक खेजड़ली गाँव के जंगलों में लकड़ी काटने गए.. 
जब खेजड़ी के वृक्ष को बिश्नोईयों की एक महिला अमृता ने देखा तो वो चिल्ला के सैनिकों की और भागी कि वो ये वृक्ष नही कटने देगी.. प्रकृति के लिए प्रेम जीव जन्तुओं के लिए प्रेम विश्नोई समाज में संस्कारों में ही पिलाया जाता है और जाता था..
अमृता उस पेड़ से लिपट गयी और कहा कि इसे वो जीते जी पेड़ तो क्या पेड़ के पत्ते भी नही काटने देगी... पर महाराज का आदेश था सैनिक भी नही रुक सकते थे.. और अमृता को वृक्ष के साथ ही काट दिया गया... उसकी तीन बेटियों भी पेड़ों को बचाने दौड़ी .. उनके भी सर दीवान के आदेश पर काट दिये गए.. चीख पुकार सुनकर गाँव वाले आये और वो भी अड़ गए की पेड़ों को नही काटने दिया जाएगा...
363 लोगों की बलि चढ़ा दी गयी सारे वृक्ष खून से नहा गए.. ये बात जब महाराज अभय तक पहुंची तो वो ग्लानि से भर गए... की उनसे ये क्या पाप हो गया..तब गुरु जम्भेश्वर जी ने विश्नोई धर्म की स्थापना की और मेवाड़ महाराज ने ताम्र पर लिख कर दिया की जहां भी विश्नोई होंगे उधर न कोई वृक्ष काटा जाएगा न ही किसी जीव का शिकार होगा ...

पर्यावरण सरंक्षण की लड़ाई आज भी विश्नोई समाज लड़ रहा है 300 सालों से और पर्यावरण का सरंक्षण भी कर रहा है... ये समाज शुद्ध शाकाहारी है जीव हत्या माँस मदिरा तक नही छूता... और तो और जीवों को पालने के लिए नन्हे पशुओं को तक को अपना स्तनपान कराती हैं यहाँ की महिलाएं... ये समाज सुनने में आया है खुद को मृत्यु के बाद दफनाता है हिन्दू होते हुए भी...
..कारण बस यही की वृक्षों को नही काटा जाए पार्थिव शरीर को जलाने के लिए लकड़ीयों की जरूरत होती है और इन्ही लकड़ीयों को वृक्षों को बचाने के लिए 363 लोगों ने अपना बलिदान दिया था....
आज भी उस गाँव में उस तिथि को बड़ा मेला भरता है महिलायें सजधज के आती हैं किलो किलो सोने में, पर न कोई लुट पाट न कोई चोरी होती है... इतनी एकता और मेल मिलाप है और कहते हैं उस बलिदानी जमीन पर पैर रखते ही मन की दुर्भावनाएं दूर हो जाती हैं...

ये थी शहीद माँ अमृता देवी जिन्होंने प्रकृति और पर्यावरण के लिए अपना बलिदान दिया.. 
धन्य है वो.. और धन्य है वो जगह जहां ऐसी वीर वीरांगना जन्म लेतीं हैं .. यें थी सशक्त महिला जिनका बलिदान आज भी देश याद करता है..
और इसे कहते हैं असल में महिला सशक्तिकरण... और ऐसे दबे छुपे कितने ही उदाहरण मिल जाएंगे .. तब की सदी और अबकी सदी में कितना अंतर है महिलाये चाँद पर मंगल पर अंतरिक्ष में पहुंच गयी... पर यहाँ वेळ एज्यूकेटिड महिलाएं माहवारी से सनी पैंट और पेड पर ही अटकी हैं..

हम और आप लोग क्या कर रहे हैं? 
ये कौन सी लड़ाई है ये कौन सी आज़ादी है मुझे तो समझ नही आई.. स्तनपान हमने भी कराया पब्लिकप्लेस में भी कराया है ट्रेन बस ऑटो में भी कराया है और सलवार कमीज में तो कमीज पूरी ही ऊपर करनी पड़ती है कौन सी नई बात है ये और आजतक तो नही लगा कोई घूर के गन्दी नजरों से देख रहा है बल्की आदर भाव लिए मुँह और फेर लेते हैं... हम तो स्नेट्री पेड भी पति से देवर से मंगवा लेते है कौन सी नई बात है ये...
ये क्रांति ये आज़ादी नही ...
आज़ाद तो आप हो ही... हो ही तभी इतना खुल्लम खुल्ला लिख लेते हो इन मुद्दों पर बोल लेते हो दिखा देते हो...
कौन रोकता है भला कौन रोक रहा है भला...

ये तो हव्वा है जो आप लोगों ने बना रखा है.. क्या आप लोग मेल गायनिक के पास नही जाती? कोई रोकता है आपको? पति बाप भाई माँ सास ननद.. नही ना? फिर.. कौन कहता है आप आज़ाद नही हो...

लड़ना है तो कुछ और करो .. और भी कई मुद्दे है क्रांति लाने के..
देश को जितने वीरों की जरूरत है ना, उतनी ही वीरांगनाओं की भी है..

बाकी तो जो है सो है ही...


आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है , ये दिन उनके योगदान के लिए सम्मानित करने का दिन है |माँ , बहन बेटी , पत्नी के रूप में हर महिला सम्मान की हक़ दार है | उन सभी का सम्मान करते हुए आज मैं उन तमाम महिलाओं को याद कर रही हूँ जिन्हें मैं निजी तौर पर जानती हूँ , जिनकी लड़ाई कहने को तो बहुत छोटी है पर पूरे समाज को परिवर्तित करने के लिए ये चिंगारी ही काफी है | हालांकि ऐसी महिलाओं की लिस्ट भी बहुत लम्बी है पर मैं हर वर्ग से कुछ उदाहरण ले रही हूँ |
जैसा की स्वाभाविक है शुरुआत मेरी माँ से जिन्होंने सिखाया संघर्ष का अर्थ जड़े काट कर आसमान छूना नहीं है , फिर सासू माँ जिन्होंने मुझसे कहा , आगे बढो , कोई कुछ भी कहे हमेशा याद रखना " कर नहीं तो डर नहीं "
रधिया ... जो दूसरों के घरों में काम करती है , जिसने अपने पति को दूसरे के घरों में काम कर कर के ई रिक्शा खरीद कर दिया , तब भी पति की शराब पीने , उसे मारने और दूसरी औरतों के पीछे भागने की लत में कोई कमी नहीं आई | बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए रधिया ने पति का घर छोड़ दिया , वह दिन भर काम करके अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा रही है | वो गर्व से कहती है मेहनत कर के पेट भरते हैं , मार खा के नहीं , अपना सम्मान रख कर के ही मैं अपनी बच्ची को सम्मान से जीना सिखा सकती हूँ |
कविता बेहद निम्न वर्गीय परिवार से आती है , उसकी पढाई छूट गयी, घरों में काम करती है , पर उसका सपना आगे बढ़ने का है , एक घर के पैसे बचा कर सिलाई सीख रही है | उसकी आँखों में चमक आ जाती है जब वो बताती है कि आगे वो घरों में काम नहीं करेगी अपनी छोटी सी सिलाई की दूकान खोलेगी ... वो कहते हैं ना बिजनिस वीमेन
७० वर्षीय मालती देवी जिन्होंने अपनी बहु का साथ देते हुए तब अपने बेटे से सभी रिश्ते तोड़ लिए जब उन्हें पता चला कि उनका अपना बेटा नशे की लत के कारण अपनी पत्नी को बेचने की कोशिश कर रहा था |
२८ वर्षीय गीतिका ने शादी के समय प्रस्ताव रख दिया कि वो उसी से शादी करेगी जो उसे उसकी अकेली विधवा माँ की जिम्मेदारी उठाने से नहीं रोकेगा |
मेरी बचपन की सहेली उमा जिसे टाइप -1 डायबिटीज थी , गलत दवाओं के कारण उसका पेंक्रीयाज ३ /४ सूख गया था | १२ th में उसका पंक्रीयाज का ऑपरेशन हुआ जो उस समय यू .पी में पह्ला था | उमा को एक महीना हॉस्पिटल में रहना पड़ा | उसके एक हाथ में ड्रिप लगी थी और दूसरे में किताब ... आज उमा जिले की प्रसिद्द डॉक्टर है , बहुत सारे फ्री कैम्प लगाती है |
बिट्टो जिज्जी जो डिलीवरी के चार घंटे बाद बी. एड का एग्जाम देने गयी | आज सरकारी स्कूल में अध्यापिका हैं |
कन्नौज की बहू ममता दीदी जिन्हें घर का आंगन देखने की इजाज़त नहीं थी , आज अपने दम पर पेट्रोल पंप चला रही हैं |
मेरे भतीजे के साथ पढने वाली लड़की जो आज ऐसी जगह काम कर रही है जहाँ जाने का कोई सीधा रास्ता नहीं है , उसे अकेले आधा घंटे हेलीकाप्टर में बैठ कर प्लांट पर ड्राप किया जाता है |
एक सलाम अपनी उन तमाम लेखिका बहनों के नाम जिन्होंने उम्र की एक पारी बीत जाने के बाद कलम के माध्यम से संघर्ष कर समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का बीड़ा उठाया है |
ये सारी महिलाएं जमीनी संघर्ष कर रही है, अथक परिश्रम कर रही हैं , महिला को उसके अधिकार दिला रही हैं ... ये छोटी -छोटी बूँदें मिलकर एक विशाल समुद्र बन रही हैं जो महिलाओं के लिए समान शिक्षा , सामान अधिकार और समान रूप से इंसान साझे जाने की की वकालत करता है | ख़ुशी की बात है की हमारे इस मिशन को समस्या की गंभीरता को समझने वाले पुरुषों का भी साथ मिल रहा है | वहीँ मैं उन तमाम महिलाओं से गुज़ारिश करती हूँ कि इस्तेमाल किये हुए सेनेटरी नैपकिन की या स्तनपान कराती महिला की फोटो चिपका कर , परिवार में सिर्फ मेरी ही चले , महिला घर के काम क्यों करे के नारे लगा कर महिलाओं के इस जमीनी संघर्ष को कमजोर न करें | नहीं तो ये आन्दोलन भटक जाएगा | स्त्री को सामान अधिकार और सम्मान एक लम्बी लड़ाई है जिसके लिए जरूरी मुद्दों पर फोकस रहना जरूरी है | आइये हम सब आगे बढ़ने के लिए एक दूसरे का हाथ थामे और स्त्री ही स्त्री की शत्रु है को स्त्री ही स्त्री की शक्ति के नारे में बदल दें |
आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

8 टिप्पणियाँ:

Anita ने कहा…

महिला दिवस पर दिल को झकझोर कर रख देने वाली रचनाओं को पढ़वाने के लिए बहुत बहुत आभार रश्मिप्रभा जी..हर महिला में एक आग छिपी है जिसे उसे जलाये रखना है, राख बनने से रोकना है. उसकी हर चाह इसी आग से जन्मती है और जीवन का हर कठोर प्रहार सहने की ताकत भी इसी से मिलती है. महिला दिवस पर सभी पाठकों व रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनायें !

Soniya Gaur ने कहा…

मेरी रचना को स्थान देने का बहुत बहुत आभार दीदी। सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई

atoot bandhan ने कहा…

बहुत अच्छा बुलेटिन तैयार हुआ है सभी रचनाएँ दिल को छू लेने वाली सार्थक रचनाएँ हैं ...मेरी रचना को शामिल करने के लिए शुक्रिया

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

आज जरूरत है, महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की....और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो पड़ेगा ही.......!

sadhana vaid ने कहा…

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभी साथी ब्लोगर्स को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ! आज के बुलेटिन में एक से बढ़ कर एक सार्थक, सशक्त एवं गहन गंभीर रचनाएं ! मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार रश्मि प्रभा जी !

vandana gupta ने कहा…

बहुत ही शानदार रचनाओं से सुसज्जित बुलेटिन

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी समसामयिक विचार प्रस्तुति

Meena Sharma ने कहा…

प्रभावपूर्ण प्रस्तुति

एक टिप्पणी भेजें

बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

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