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शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

आज़ादी और सहनशीलता

प्रिये ब्लॉगर मित्रगण नमस्कार,



सर्वप्रथम सभी मित्रों को, कल आने वाले स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। आज की बुलेटिन में एक कहानी  लेकर आया हूँ उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आएगी और इस पर आप सभी की प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं। कहानी का शीर्षक है :

आज़ादी और सहनशीलता
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एक समय की बात है किसी राज्य में एक भिक्षु रहा करते थे। घर घर जाकर भिक्षा ग्रहण करते और उसी से अपनी गुज़र बसर करते। जितनी भी भिक्षा उन्हें मिल जाया करती उसी में संतोष कर अपना भरण पोषण कर लेते। एक दिन सुबह सुबह भिक्षा के लिए उन्होंने एक घर का दरवाज़ा खटखटाया तो पाया की घर की मालकिन किसी पर आग-बबूला हो रही थी और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लम-चिल्ली करने में लगी थी। उसका पारा इतना चढ़ा हुआ था की अनाप-शनाप बोले जा रही थी।

घर के द्वार पर खड़े होकर उन्होंने गुहार लगाई, "माई भिक्षु आया है, कुछ अन्न प्रदान कीजिये।"

औरत उस समय अपना चौका पोत रही थी और गुस्से में बड़बड़ा रही थी। उसे भिक्षु की आवाज़ सुनकर और ज्यादा गुस्सा आ गया की सुबह-सुबह कौन भिखारी आ गया दिमाग खाने। वह गुस्से से उठी और आव देखा ना ताव, झटके से दरवाज़ा खोला और उसके हाथ में जो चौका लगाने का पोतना था भिक्षु के चेहरे पर दे मारा।

भिक्षु भी बिलकुल शांत रहा, ज़रा भी नाराज़ ना हुआ, उसने उस गोबर से सने गंदे कपड़े को अपने कमंडल में रख लिया और पास ही नदी पर स्नान करने के लिए प्रस्थान कर गए। नदी पर उन्होंने उस कपड़े को ख़ूब अच्छे से धोया। जब कपड़ा साफ़ दिखाई पड़ने लगा तब उसे धुप में सुखाने के लिए पेड़ पर टांग दिया और स्नान करके अपनी कुटिया पर लौट आए।

संध्या में जब भगवान् का दिया जलाया और आरती का समय हुआ तब उसी पोतना की बत्तियां बनाई। आरती करते समय प्रभु से हाथ जोड़ प्रार्थना की, कि जिस प्रकार यह बत्ती जलकर प्रकाश देते हुए मेरी कुटिया को अन्धकार से आज़ाद कर रही है, उसी प्रकार बेचारी उस महिला का ह्रदय क्रोध के अँधेरे से मुक्त होकर सुमति और सहनशीलता के प्रकाश से रौशन हो जाए।

--- तुषार राज रस्तोगी ---

आज की कड़ियाँ

स्वतन्त्रता दिवस पर - अनीता

अब भड़कना चाहिए था पर शरारे मौन हैं - चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’

पहला प्यार - राज चौहान - प्रस्तुतकर्ता संजय भास्‍कर

एक ग़ज़ल - ऋता शेखर 'मधु'

मसान से उपजा हुआ दुख  - अनु सिंह चौधरी

उसे हम बोल क्या बोलें - मदन मोहन सक्सेना

लीक से हटकर  - वीरेन्द्र कुमार शर्मा

मेरी खामोश सी खामोशी - निवेदिता श्रीवास्तव

शापित फसल  - सागर

बंजारा - कैलाश शर्मा

शायद तुम लौट आओ - प्रीती सुराना

आज के लिए इतना ही अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी तब तक के लिए - सायोनारा

नमन और आभार
धन्यवाद्
तुषार राज रस्तोगी
जय बजरंगबली महाराज | हर हर महादेव शंभू  | जय श्री राम

शनिवार, 25 जुलाई 2015

लम्हे इंतज़ार के

प्रिये ब्लॉगर मित्रगण नमस्कार,
आज की बुलेटिन में प्रस्तुत है मेरी लिखी नई कहानी....

















लम्हे इंतज़ार के
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ऐ मेरे चंदा - शुभ-रात्री, आज रात मेरे लिए कोई प्रेम भरा गीत गाओ। काली सियाह रात का पर्दा गिर चुका है और तुम्हारी शीतल सफ़ेद चांदनी कोमल रुई की तरह चारों तरफ बरसने लगी है। क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ ? दिल की खिड़की खुली है और बाहर दरवाज़े बंद हो गए हैं। दुनिया मेरे इर्द-गिर्द मंडरा रही है और मैं हूँ जो रत्ती भर भी हिल नहीं रहा है। मैं अपनी सोच और विचारों के साथ स्थिर हूँ। मैं उस शिखर पर हूँ जहाँ से देखने पर सब कुछ बदल जाता है। मेरी हर सांस के साथ मेरे अरमानो पर पिघलती बर्फ़ के बहते हुए हिमस्खलन जैसा डर लगने लगता है। तुम कितनी दूर हो मुझसे। मैं तुम्हे वास्तविकता में महसूस तो नहीं कर सकता, पर सितारों की रौशनी को देख सकता हूँ। नींद मेरे से कोसों दूर उन बंद अलमारियों के पीछे जाकर छिप गई है। मैं तुम्हे इस चाँद की सूरत में देख रहा हूँ, इसकी बरसती शफ्फाक़ चांदनी में तुम्हे अपनी बाहों के आग़ोश में महसूस कर सकता हूँ, हीरों से चमकते सितारों की जगमगाहट में तुम्हारी मुस्कान की झलक पा रहा हूँ। मैं तो तुम्हारे इश्क़ की मूर्ती हूँ और मेरा दिल इसकी मिटटी को धीरे-धीरे तोड़कर मेरी हथेलियों में भर रहा है। मैं निडर हूँ, फिर भी एक अनजाना डर मुझे तराशता जा रहा है।

मैं अधर में हूँ और जागते हुए भी सोया महसूस कर रहा हूँ, मेरे पैर ठंडे फ़र्श को छू रहे हैं और मैं इस अनिद्रा वाली नींद में चलते हुए अपने घर का खाखा ख़ोज रहा हूँ। मैं ग्रेनाइट से बनी मेज़ छू रहा हूँ और चमड़े से बने सोफ़े पर अपनी उँगलियों में पसीजते पसीने के निशाँ बनाकर छोड़ता रहा रहा हूँ। मैं दरवाज़े तक पहुंच उसे सरका कर बाहर लॉन में ओस से गीली नर्म घास पर खड़ा अपनी आत्मा को तुमसे जोड़ने का प्रयास कर रहा हूँ। तुम यहाँ भी नहीं हो पर तुम यहाँ के कण-कण में व्याप्त हो। समस्त प्रांगण तुम्हारे प्रेम से दमक रहा है। मैं दिक्सूचक बन गया हूँ पर अपनी उत्तर दिशा नहीं ढूँढ पा रहा हूँ। मेरा तीर लगातार घूम रहा है और मुझे नींद के झोंके आने लगे हैं। मैं आसमां की तरफ देखता हूँ तो मेरी आँखें धुंधली हुई जाती हैं, मैं लालायित हूँ, मैं तरस रहा हूँ, मैं अपनी पसलियों को अपनी हथेलियों से थामे खड़ा हूँ और अपने दिल की धडकनों को सीने से बहार निकल पड़ने के लिए संघर्ष करते, दबाव बनाते महसूस कर रहा हूँ। मैं निडर हूँ, फिर भी मेरी हर सांस के साथ एक अनकहा डर सांस ले रहा है।

दुनिया मौन है। मैं पुराने बरगद पर, जिससे तुम्हे बेहद लगाव है, पर पड़े झूले पर औंधा लेट गया हूँ। तुम्हारे होने के एहसास को अपना तकिया बना तुम्हारे सीने पर सर रखकर मैं आराम से लेटा हूँ। पर यह एहसास मेरी मौजूदगी को नकार रहा है। मेरे सपने मेरी हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ कर रहे है। पर मैंने हार नहीं मानी है मैं कोशिश कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे अक्स को इन बाहों में भरता हूँ पर मुझे तुम्हारी अनुपस्थिति के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। मेरा ह्रदय में आज भी तुम्हारे साथ की स्मृतियाँ ताज़ा हैं। मैं तुम्हारी परछाई को इन बेजुबां चीज़ों में छूने की कोशशि कर रहा हूँ और अपने हाथों के स्पर्श से उन अलसाई स्मृतियों को मिटाता जा रहा हूँ। मैं आगे बढ़ एक दफ़ा फिर तुम्हे खोजने की कोशिश कर रहा हूँ। तुम मुझे चिढ़ाती हो और मेरी आँखें नम हो जाती हैं। तुम ख़ुशी से खिलखिलाकर, प्रफुल्लित हो उठती हो और मैं तुम्हारे प्रेम के गुरुत्वाकर्षण में बंधा चला जाता हूँ। मैं अपने हाथ ऊपर उठा खड़ा हूँ और ऐसा महसूस कर रहा हूँ जैसे इश्क़ की हवा में तैर रहा हूँ और अरमानो के आसमां में तुम्हारी मदहोशी के बादलों में गोते लगता आगे बढ़ रहा हूँ और जल्द ही तुम्हारे करीब, बहुत करीब पहुँच जाऊंगा। मैं इन बादलों से ऊपर, इन वादियों से परे, चाँद सितारों के बीच कहीं किसी ख़ूबसूरत गुलिस्तां में तुम्हारे साथ बैठ बातें करूँगा। यही सोच मैं ख़ुशी से झूम जाता हूँ। मैं अपने वादे से बेहद प्रफुल्लित हूँ। तुम गर्म सांसें छोड़ रही हो, गहरी सांसें भर निःश्वास हो रही हो और तुम्हारा आकर्षण फिर से मुझे तुमसे जोड़ रहा है। आशा, उम्मीद, विश्वास मेरी नसों में खून बनकर दौड़ रहा है और मेरी देह की मिटटी को सींच रहा है। मैं एक दफ़ा फिर से इंतज़ार में बैठा हूँ तकियों को अपने आस-पास जमा किये हुए। अकेला बिलकुल अकेला, ख़ामोशी को पढ़ता और तुम्हारे प्रतिबिम्ब से बातें करता।  में अकेला हूँ सचमुच अकेला।

ऐ मेरे चंद्रमा - शुभरात्रि।
आज रात मेरे लिए कोई अनोखा गीत गाओ।
सुबह के उजाले तक मुझे अकेला इंतज़ार के लम्हों में तड़पता मत छोड़ देना।

--- तुषार राज रस्तोगी ---

आज की कड़ियाँ

बदलाव तुझसे इश्क़ के बाद  - राखी शर्मा

करार - श्याम कोठारी 'उदय'

भोर हो गई - अनुपमा त्रिपाठी

आंवले का वृक्ष - अनीता सचदेवा

न कौशल न विकास :क्या करें इस डिग्री-डिप्लोमा का ? -  शशांक द्विवेदी

लहलहाते खेत बंजर हो गए - रश्मि शर्मा

फ़ेसबुक के धकाधक उपयोग करने के फायदे - रविशंकर श्रीवास्तव

कैसा न्याय - आशा सक्सेना

चाँद मेरे हिस्से का - वंदना गुप्ता

रहना सदा चलते कभी रुकना नहीं - रेखा जोशी

यह सच है -  पुरुषोत्तम पाण्डेय

आज के लिए इतना ही अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी तब तक के लिए - सायोनारा

नमन और आभार
धन्यवाद्
तुषार राज रस्तोगी
जय बजरंगबली महाराज | हर हर महादेव शंभू  | जय श्री राम

शनिवार, 20 जून 2015

प्यार, साथ और अपनापन

प्रिये ब्लॉगर मित्रगण नमस्कार,

पूजा ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक छोटा सा गार्डन बना लिया। पिछले दिनों मैं छत पर गया तो ये देख कर हैरान रह गया कि कई गमलों में फूल खिल गए हैं, नींबू के पौधे में दो नींबू भी लटके हुए हैं और दो चार हरी मिर्च भी लटकी हुई नज़र आई। मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस का जो पौधा गमले में लगाया था, उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रही थी। मैंने कहा, “तुम इस भारी गमले को क्यों घसीट रही हो?” पूजा ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं। मैं हंस पड़ा और कहा अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो। इसे खिसका कर किसी और पौधे के पास कर देने से क्या होगा?"

पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा, "ये पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है। इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा। पौधे अकेले में सूख जाते हैं, लेकिन उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं।"

यह बहुत अजीब सी बात थी। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती चली गईं। मां की मौत के बाद पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े, बहुत बूढ़े हो गए थे। हालांकि मां के जाने के बाद सोलह साल तक वो रहे, लेकिन सूखते हुए पौधे की तरह। मां के रहते हुए जिस पिताजी को मैंने कभी उदास नहीं देखा था, वो मां के जाने के बाद खामोश से हो गए थे। मुझे पूजा के विश्वास पर पूरा विश्वास हो रहा था। लग रहा था कि सचमुच पौधे अकेले में सूख जाते होंगे।

बचपन में मैं एक बार बाज़ार से एक छोटी सी रंगीन मछली खरीद कर लाया था और उसे शीशे के जार में पानी भर कर रख दिया था। मछली सारा दिन गुमसुम रही। मैंने उसके लिए खाना भी डाला, लेकिन वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमना सा घूमती रही। सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ गया, मछली ने कुछ नहीं खाया। दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी। आज मुझे घर में पाली वो छोटी सी मछली याद आ रही थी। बचपन में किसी ने मुझे ये नहीं बताया था, अगर मालूम होता तो कम से कम दो, तीन या ढ़ेर सारी मछलियां खरीद लाता और मेरी वो प्यारी मछली यूं तन्हा न मर जाती।

बचपन में मेरी माँ से सुना था कि लोग मकान बनवाते थे और रौशनी के लिए कमरे में दीपक रखने के लिए दीवार में इसलिए दो मोखे बनवाते थे क्योंकि माँ का कहना था कि बेचारा अकेला मोखा गुमसुम और उदास हो जाता है।

मुझे लगता है कि संसार में किसी को अकेलापन पसंद नहीं। आदमी हो या पौधा, हर किसी को किसी न किसी के साथ की ज़रुरत होती है। आप अपने आसपास झांकिए, अगर कहीं कोई अकेला दिखे तो उसे अपना साथ दीजिए, उसे मुरझाने से बचाइए। अगर आप अकेले हों, तो आप भी किसी का साथ लीजिए, आप खुद को भी मुरझाने से रोकिए। अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सज़ा है। गमले के पौधे को तो हाथ से खींच कर एक दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है, लेकिन आदमी को करीब लाने के लिए जरुरत होती है रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की। अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िंदगी का रस सूख रहा है, जीवन मुरझा रहा है तो उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए। खुश रहिए और मुस्कुराइए। ☺

आज की कड़ियाँ

योग दि‍वस के लि‍ए हताशासन - काजल कुमार

आज का दिन मेरी मुठ्ठी में है ,किसने देखा कल - अर्चना चावजी

ज़िंदगी की किताब - त्रिवेणी

तुझ से ही हूँ मैं - अनुपमा त्रिपाठी

पापा की हथेलियों में - सदा

खामोश नजर - डॉ. निशा महाराणा

गले - प्रियंका जैन

ये बारिश थमे ही नहीं - प्रीति सुराना

तुम्हारी याद - कालीपद "प्रसाद"

तुम और मैं - कमला घटाऔरा (सहज साहित्य)

तस्वीर - ईशा मिश्रा

आज के लिए इतना ही अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी तब तक के लिए - सायोनारा

नमन और आभार
धन्यवाद्
तुषार राज रस्तोगी
जय बजरंगबली महाराज | हर हर महादेव शंभू  | जय श्री राम

सोमवार, 10 जून 2013

दूरदर्शी

आदरणीय ब्लॉगर मित्रगण सादर प्रणाम,

एक आदमी सोना तोलने के लिए सुनार के पास तराजू मांगने आया। सुनार ने कहा, ‘‘मियाँ, अपना रास्ता लो। मेरे पास छलनी नहीं है।’’ उसने कहा, ‘‘मजाक न कर, भाई, मुझे तराजू चाहिए।’’

सुनार ने कहा, ‘‘मेरी दुकान में झाडू नहीं हैं।’’ उसने कहा, ‘‘मसखरी को छोड़, मै तराजू मांगने आया हूँ, वह दे दे और बहरा बन कर ऊटपटांग बातें न कर।’’

सुनार ने जवाब दिया, ‘‘हजरत, मैंने तुम्हारी बात सुन ली थी, मैं बहरा नहीं हूँ। तुम यह न समझो कि मैं गोलमाल कर रहा हूँ। तुम बूढ़े आदमी सुखकर काँटा हो रहे हो। सारा शरीर काँपता हैं। तुम्हारा सोना भी कुछ बुरादा है और कुछ चूरा है। इसलिए तौलते समय तुम्हारा हाथ काँपेगा और सोना गिर पड़ेगा तो तुम फिर आओगे कि भाई, जरा झाड़ू तो देना ताकि मैं सोना इकट्ठा कर लूं और जब बुहार कर मिट्टी और सोना इकट्ठा कर लोगे तो फिर कहोगे कि मुझे छलनी चाहिए, ताकि ख़ाक को छानकर सोना अलग कर सको। हमारी दुकान में छलनी कहां? मैंने पहले ही तुम्हारे काम के अन्तिम परिणाम को देखकर दूरदर्शिता से कहा था कि तुम कहीं दूसरी जगह से तराजू मांग लो।’’ 

जो मनुष्य केवल काम के प्रारम्भ को देखता है, वह अन्धा है। जो परिणाम को ध्यान में रखे, वह बुद्धिमान है। जो मनुष्य आगे होने वाली बात को पहले ही से सोच लेता है, उसे अन्त में लज्जित नहीं होना पड़ता। 

आज की कड़ियाँ 

क्या आप जानते हैं ...हिन्दी भाषा - सवाई सिंह राजपुरोहित

ये पहली बार सुना है - कीर्तिश भट्ट

मजबूर आदमी - गोपाल क्रिशन शुक्ल

प्रेम का पाखंड - जिया बनी शिकार - शिखा कौशिक

वह विचार करता है उन योजनाओं की बाबत जिन्हें उसने अधूरा छोड़ दिया था - अशोक पांडे

महाराष्ट्र का वह बुद्धिमान रोबोट हमारा मन मोह गया - बी.एस. पाब्ला

जूलीया गिलर्ड - कौशल मिश्रा

परबत की पीर बहे - ज्योति-कलश

सहजि सहजि गुन रमें - अनिरुद्ध उमट

युन्ही - राहुल मिश्रा

कौन 'हिटलर- मुसोलिनी' कौन 'पोप' - खुशदीप सहगल

आज के लिए बस यही तक  कल फिर मुलाक़ात होगी । आभार और धन्यवाद् ।

जय हो मंगलमय हो  | जय श्री राम  | हर हर महादेव शंभू  | जय बजरंगबली महाराज 

लेखागार