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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

शुरू हो रहा है ब्लॉगरों के मिलने का सिलसिला




अरे अरे आप चौंकिए मत , मुझे पता है कि , वर्ष के उत्तरार्ध में आयोजित किए जाने वाले ब्लॉग बैठक के लिए हम सब उत्सुक हैं , तो ये तो उससे पहले की बात कर रहा हूँ |

दिल्ली में प्रत्येक वर्ष लगने वाला दिल्ली पुस्तक मेला आज से शुरू हो गया है और अब हमारे तमाम ब्लॉगर ,ब्लॉगर से नामी गिरामी लेखक और जाने क्या क्या हो गए हैं | मगर इन पुस्तक मेले के दिनों में सबकी अचानक और नियोजित भी,  मुलाक़ात , बात , किताबें , सब कुछ कुल मिलकर यादगार बन जाते हैं |

मैं खुद कम से कम तीन दिन वहां पाया जाता हूँ | तो तैयार हो जाइये आपको अगले एक हफ्ते ताक ऐसी मुलाकातों की रपट पढ़ने देखने को मिलेगी , चलिए वो तो जब मिलेगी तब मिलेगी , फिलहाल आपको ये उम्दा पोस्टें पढ़नी हैं |

बबीता सिंह बता रही हैं एक सटीक और प्रभावी निबंध कैसे लिखें 

प्रतिभा कटियार की दुनिया में उनका साथ दें

प्यार की सौंगंध क्या चीज़ है।.....ये बता रही हैं डा शरद सिंह

जीवन अनमोल है , सचमुच ही है , और यही कह रही हैं आज अपने ब्लॉग में शशि पुरवार जी

अनुराधा चौहान ने अपने मन की पीड़ा यहां उड़ेल दी है , आप भी बांचिए और बाँटिये

गोदियाल जी अपनी सशक्त लेखनी से सोशल नेटवर्किंग में बढ़ते एंटी सोशल नेट्वर्किंग से उसके खतरे में पड़ने की चेतावनी दे रहे हैं |

बारिश में ओस की बूँद सहेज कर लाई हैं रेवा जी , देखिये आप भी

आज अमर शहीद राजगुरू की ११० वीं जयंती पर उनको नमन कर रहे हैं भाई शिवम् मिश्रा अपने ब्लॉग बुरा भला पर |

चलिए आज के लिए इतना यही , फिर मिलता हूँ जल्दी ही |

पढ़ते रहिये , लिखते रहिये
फेबुक के साथ यहां भी दिखते रहिये |

आप सबको स्नेह और शुभकामनायें , शुभरात्रि 

शनिवार, 18 अगस्त 2018

ब्लॉग लिखें - ब्लॉग पढ़ें (चिट्ठा चर्चा )

गुप्तकाशी में बारिश 



अब ये बात भी बहुत बार हम आप ही दोहरा चुके हैं की ब्लॉगिंग  की रफ़्तार को धीमा करने या ऐसा महसूस होने में जितना बड़ा रोल फेसबुक और अन्य जैसी सोशल नेट्वर्किंग साइट्स ने किया उतनी ही बड़ी भूमिका खुद हम ब्लॉगर्स की भी रही | अपनी हाथों से सींची बगिया को सबने बड़ी ही उदासीनता से उपेक्षित छोड़ दिया | आखिर ब्लॉग भी कब तक एकतरफा साथ देता उसने भी ऐसा ही किया और जब आज मौजूद दोनों  संकलकों को देखता पाता हूँ तो इतने बड़े हिंदी अंतरजाल पर रोज़ाना की कुल पचास पोस्टें भी नहीं लिखी जाती और उससे भी बड़ी बात की वो पचास भी शायद ही पढ़ी जाती हों |

लेकिन ऐसा नहीं की तालाबंदी वाले हालात हैं | नियमित लेखन पठन भी ब्लॉग लिखने पढ़ने वाले कर ही रहे हैं | ऐसा ही जुनून ज़ज़्बा इस ब्लॉग की शुरूआत करने वाले शिवम भाई , बहुत बार सिर्फ अकेले अपने श्रम और दम पर बुलेटिन को प्रसारित/प्रकाशित करते रहे हैं | यही हाल कमोबेश हमारा भी था , लेकिन अब हम भी मोर्चे पर आ गए हैं | और ब्लॉग की रफ़्तार को जरूर ही गति देने के बहुत सारे नए नए प्रयोग की योजनाओं के साथ आ रहा हूँ | तैयार हो जाइये ब्लॉग लिखने पढ़ने के लिए , और खूब सारा लिखने पढ़ने के लिए

देखते हैं कुछ चुनिंदा ब्लॉग पोस्ट

आज पढ़िए सबसे पहले पढ़ते हैं भाई रोहिताश को जो इन दिनों सुकूं की तलाश में पोस्ट लिख रहे हैं , वे लिखते हैं

इस पिजरे में कितना सकूँ है
बाहर तो मुरझाए फूल बिक रहे है
कोई ले रहा गंध बनावटी
भागमभाग है व्यर्थ ही
एक जाल है;मायाजाल है
घर से बंधन तक
बंधन से घर तक
स्वतंत्रता का अहसास मात्र लिए
कभी कह ना हुआ गुलाम हैं
गुलामी की यही पहचान है।
मर रहे रोज कुछ कहने में जी रहे
सब फंसे हैं
सब चक्र में पड़े हैं




ब्लॉग शिरोमणि अपने लंठ महाराज यानी गिरिजेश राव एक आलसी के चिट्ठे को जगा कर देखें कह रहे हैं , यह दृष्टि है  | प्रकृति से लगातार छेड़छाड़ का नतीज़ा हम सब भुगत रहे हैं मगर अफ़सोस की फिर भी सुधार और उपाय तो दूर हमने अभी वो गलतियां  करना ही नहीं छोड़ा है | हरेश कुमार इसलिए कह रहे हैं , अपने आसपास की प्रकृति को बचाएं ये हम सबकी जिम्मेदारी है | सच है , और  ये अभी से करना जरूरी है | 


हम सबके प्रिय और देश के सर्वप्रिय राजनेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जाना अभी बहुत समय तक सालते रहेगा | यूं तो पिछले दो दिनों से लगातार सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर उनके ऊपर लिखा जा रहा है | ब्लॉग पोस्टों में
शब्द तूलिका पर मुझे इतनी ऊँचाई मत देना , और अनुराधा चौहान अपने ब्लॉग पर कहती हैं वे सदा अटल थे  

"
जिंदगी की धूप छांव में
हरदम वो अटल खड़े थे
मौत से ठान युद्ध
वो अटल जिए थे
न हार कभी मानी थी
न हार कभी मानेंगे
जिंदगी में हरदम
उनके अटल इरादे थे
काल के कपाल पर
गीत नए लिखते थे
साथ सभी के सुख-दुख में
कदम मिलाकर चलते थे"


जबकि अटल जी द्वारा कहे गए अनमोल वचनों को एक साथ संग्रहित करके खूबसूरत पोस्ट तैयार की है युवा ब्लॉगर हर्षवर्धन ने अपनी इस पोस्ट में 

  1. मेरे पास न दादा की दौलत है न बाप की, मेरे पास सिर्फ मां का आशीर्वाद है। 
  2. कड़ी मेहनत कभी भी आप पर थकान नहीं लाती, वो आपके लिए संतोष ही लाती है। 
  3. सत्य सबसे शक्तिशाली हथियार है, हर कोई जानता है सरकारी जगहों पर हथियार लेकर नहीं जा सकते।
  4. हम दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं, इसीलिए पड़ोसियों से अच्छे संबंध होने चाहिए। 
  5. जब मैं बोलना चाहता हूं तो लोग सुनते नहीं, जब लोग चाहते हैं, मैं बोलूं तो मेरे पास कुछ नहीं होता। 
  6. अगर किसी देश में हलचल नजर आए तो समझिये वहां का राजा ईमानदार है। 
  7. मैं हमेशा की तरह वादे लेकर नहीं आया बल्कि अपने इरादे लेकर आया हूं।

आइए इस बुलेटिन के आखिर में आपको लिए चलता हूँ हर्षवर्धन जोग जी के ब्लॉग की इस खूबसूरत पोस्ट बारिश  , की ओर | खूबसूरत चित्रों से सजी  इस पोस्ट में आज आप पढ़िए गुप्तकाशी के बारे में | रात गहराती जा रही है इसलिए अब विराम लेता हूँ |

एक , नहीं नहीं दो दो सूचनाएं हैं ,

ब्लॉग पोस्टों को अखबारों तक पहुंचाने वाले स्तम्भ "ब्लॉग बातें |" इसी सप्ताह से शुरू करने जा रहा हूँ |

अगले कुछ समय में दिल्ली में , राष्ट्रीय ब्लॉगर मिलन का आयोजन करने जा रहा हूँ , इस बार मीडिया के मित्रों की सहभागिता के साथ

चलते चलते एक और बात , कल रविवार है , कल आपको ले चलूँगा ब्लॉग पोस्टों के ऐसे सफर पर की यकीनन जब यहाँ से आप निकलेंगे तो सबसे पहले अपने ब्लॉग पर जाकर पोस्ट करे बिना नहीं निकल सकेंगे |

शुभ रात्रि , खूब पढ़ें , खूब लिखें

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

लकीर बड़ी करनी होगी ......






पिछले दिनों या कहा जाए कि जब से ये नई सरकार सत्ता में आई है तब से शायद विरोधी विचारधारा वालों की बौखलाहट इतनी  ज्यादा  बढ़  गयी है   कि उन्हें  सकारात्मक  बातें  भी विरोध करने लायक लगती हैं | यदि आज देश का प्रधानमंत्री आम जन से सीधे संवाद करता है , उनसे सुझाव माँगता है सलाह सुनता है और ये कहता है कि आप खुद , पर्यावरण को , समाज को और देश को स्वच्छ रखें इसलिए भी क्योंकि आप स्वच्छ रहेंगे तो स्वस्थ रहेंगे | पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति ही इस बात में भी कोइ उल्टी बात सोच सकता है |

मुझे अक्सर अपने शिक्षक द्वारा सुनाई गयी एक बात याद आती है | वे कहा करते थे कि किसी खींची हुई लकीर को छोटा करने के दो तरीके होते हैं , पहला कि उसे मिटा कर छोटा किया जाए और दूसरी ये कि ठीक उसके बगल में उससे बड़ी लकीर खींच दी जाए तो वो लकीर स्वयमेव ही छोटी हो जायेगी |बात बहुत गहरी है इसलिए मुझे अक्सर ही याद हो आती है |

आज देश , समाज बदल रहा है और पूरा विश्व इस बात का साक्षी हो रहा है न सिर्फ इतना ही बल्कि आज जो अचानक ही एक विशवास भरा माहौल बन गया है उसने पूरे विश्व के सामने भारत को एक अलग मुकाम पर पहुंचा दिया है | ऐसा इसलिए भी संभव हो पाया है क्योंकि आज देश की सरकार पूर्ण बहुमत वाली सरकार है जिसे कहीं भी ये भय नहीं कि ऐसा किया तो समर्थन वापस की बरसों से चली आ रही धमकी वाली रवायत से उसे रूबरू होना पडेगा | नई सरकार निर्णय ले रही है , योजनायें बना रही है और तेज़ी से उन पर अमल कर रही है | जब भी सब कुछ ठीक ठीक होने लगता है तो नकारात्मक ताकतें अक्सर उस सकारात्मक दिशा को भ्रमित या मोड़ने की कोशिस करती हैं | और ये कोशिस हो भी रही है किन्तु ऐसे समूह को ये अब समझ जाना चाहिए कि दशकों बाद जाकर देश में एक जैसा जनमानस तैयार हुआ है तो इसके पीछे बहुत सारी वजहें होंगी | इसलिए प्रयास ये किया जाना चाहिए कि लकीर को मिटाने से बेहतर है कि बड़ी लकीर खींचने में अपनी भागीदारी निभाई जाए |

चलिए आज देखते हैं कहाँ क्या क्या लिखा गया है , मैं सिर्फ एक पंक्ति में आपको पोस्ट सूत्र दूंगा .....पोस्ट पर पहुँच कर आप स्वयं पढ़ कर पोस्ट का आनंद लें .....

बाऊ और नेबुआ की झाँखी : फौरने पहुँच कर ई पोस्ट बांची

औरत तेरी कहानी :
एक ब्लौगर की ज़ुबानी

गाय से तो पूछ लो : क्या , पोस्ट पढनी है नहीं ??

प्रतीक्षा :
न करें , फौरन ही पोस्ट पढ़ें

गुमनामी बाबा की गुमनामी सहयोगी : लीला राय ध्यान रहे , इन्हें कोइ भूलने न पाय

संघ भाजपा समन्वय बैठक : सिर्फ समन्यवय नाराजी या दबाव :
हाय क्यों कुरेदते हो जालिम , हरा कर देते हो घाव

रायटर्स डायरी : गुमे हुए शब्दों का नौस्टेलजिया
पढ़ पढ़ के मन मयूरा भया , झूमे रे जिया

देश ठीके चल रहल हौ बापू :
सब बजा रहल हौ, अपन अपन भोंपू

उम्र :
न पूछी जाय न बताई जाय

जयन्ती पर शास्त्री जी और बापू को नमन :
देशः और समाज में रहे चैन और अमन

तलाश आम आदमी की :   इस पोस्ट पर आकर ख़त्म हो जाती है



और अंत में इस खाकसार की एक पोस्ट

अजब  गजब किस्से कचहरी के : कुछ भोर के कुछ दुपहरी के


आज के लिए इतना ही ...अब सप्ताह में एक दिन आपसे मुलाक़ात होती रहेगी

रविवार, 25 अगस्त 2013

चंद पोस्टों तक जाती एक गली ....


आज के हालातों पर पवन भाई का एक ताज़ा कार्टून देखिए पहले




चलिए अब आपको लिए चलते हैं आज की कुछ पोस्टों तक , अपने वन लाइनर के माध्यम से




ऐ ..क्या बोलती तू : ऐ .......क्या मैं बोलूं


दोहरी मानसिकता : राजनीति का चरित्र


शिक्षा : बडी महंगी हो गई बाबा रे


शुगर की बीमारी में शुगर की भूमिका : ठीक होने में इंसुलिन का रोल :)


आइए जानते हैं किस तरह करें पूरी दुनिया में मुफ़्त में कॉल : फ़ोन की भी जरूरत नहीं है क्या  :)


एक दोस्त के नाम खुला पत्र : अब जाकर दोस्त को मिला ये पत्र :)


जन्मदिन तुम्हारा मुबारक हो तुमको : फ़ौरन ही केक अब खिलाओ न सबको :)


रिपोर्टर , वेश्या और धोबी का कुत्ता : देखिए जी काटा है किसने किसका फ़िर पत्ता :)


हरित लाल : पोस्ट कमाल


राह से भटकी अकादमियां : और चाह में भटकी हस्तियां :)


बीस साल चले अढाई कोस : कुल पांच शब्द की पोस्ट , फ़िट है बॉस :)


समय बदल रहा है दोस्तों : बच के अब कहां जाओगी , पोस्टों :)



जहां परिवार में परस्पर प्यार है , वह केवल अपना हिंदुस्तान है : एक पडोसी चीन और दूसरा पाकिस्तान है


खुदा नहीं देंगे : हम तो लेंगे ही लेंगे :)


एक मर्लिन मुनरो ऐसी भी : चलेगी , जी होगी मुनरो जैसी भी :)



मार लो कितनों को मारोगे :  कभी जीतोगे तो कभी हारोगे :)


चलो यात्रा यात्रा खेलते हैं : फ़िर जम के पोस्ट ठेलते हैं :)


कुछ है जो दिखता नहीं है : हुज़ूर फ़िर वो बाज़ार में बिकता नहीं है :)


अथ तिलचट्टा लव स्टोरी : झिंगुरवा क जोरा जोरी :)


नाम , शब्द रूप  : बारिश, छाया धूप :)


छोटी छोटी चिप्पियां  : ज्यूं लहरों में किश्तियां :)


फ़ेसबुक स्टेटस : से डायरेक्ट ब्लॉग पोस्ट तक :)


छुटकन रील्स : हाउमच फ़ील्स


क्यूंकि दुनिया में अच्छे लोग भी हैं : हैं झूठे तो सच्चे लोग भी हैं :)


और चलते चलते काजल भाई का पेसल कार्टून ...विद ढेर सारा स्माइली :) :) :) :)





अच्छा जी , शुभ रात्रि । मिलेंगे फ़िर कुछ मज़ेदार , बेहतरीन पोस्टों के साथ । अपना ख्याल रखिए और खूब लिखिए , खूब पढिए और हां टीपीए भी :)





रविवार, 11 अगस्त 2013

बुलेटिन बोले तो बुलेट ट्रेन ......वन लाइनर सुपर फ़ास्ट



कहते हैं कि कम शब्दों में जितना अधिक कहा जाए उसका मज़ा और उसका असर कुछ और ही होता है । मैं शुरू से ही प्रयोगों में यकीन रखता आया हूं और न सिर्फ़ जीवन बल्कि लेखन में भी अलग अलग विधाओं , वैसे मुझे असल में किसी भी विधा की कोई समझ नहीं है , में नई नई खुराफ़ात करने में बहुत आनंद आता है । यही वज़ह है कि कभी फ़ेसबुक स्टेटस को सहेज़ने के लिए फ़ेसबुक नाम से ही ब्लॉग बना लिया तो कभी ब्लॉगरों की टिप्पणियों को सहेज़ने के लिए टिप्पी का टिप्पा नामक ब्लॉग । इन दिनों वन लाइनर यानि व्यंग्य बाणों पर हाथ साधा जा रहा है । मैंने पाया कि आज जबकि लोग व्यस्तता के कारण बहुत कम समय में बहुत कुछ पढ लिख लेना चाहते हैं ये छोटे छोटे चुटीले वाक्य न सिर्फ़ लोगों को गुदगुदाते भी हैं बल्कि अपना भरपूर असर भी डालते हैं ।
पिछले दिनों हमने भी अपने स्टेटस पर खूब उझीले ऐसे देखिए ,
"पाकिस्तान ने भारतीय चौकियों पर दागी 7000 गोलियां , सब की सब "कडी चेतावनी" से टकरा के चूर चूर हो गईं

पाकिस्तान सरकार सुबह से टीवी पर आंख गडाए बैठी है कि आज बिहार के किस भकलोल मंतरी ने उनके लिए क्या कहा

मेरा "बयान" आधिकारिक नहीं था : शहरयार खान । अजी हमें तो वो बयान से ज्यादा "बनियान" लग रहा था जिसे आपने गलती से पहन लिया था शाम को उतार फ़ेंका

आतंकियों की धमकी का करारा जवाब दिया जाएगा , जवाब को बेसन में लपेट के रिफ़ाइंड में तल कर "करारा" किए जाने के निर्देश दिए गए
ब्लॉग पोस्टों की चर्चा हो या उनके लिंक्स को सहेज़ने की बात वन लाइनर यहां भी कमाल लगते हैं । अब बुलेटिन में भी आप इस वन लाइनर के साथ पोस्ट लिंक्स को देखिए


इट्स हैप्पन ओनली इन गुजरात : एंड नींद उड जाए सबकी दिन रात :)

समाज क्या कहेगा : कहने के अलावा और क्या करेगा :)

व्हाट्स अप फ़ेसबुक और समाज : तीनों ही उछल उबल रहे हैं आज :)

मनौती : पूरी हुई क्या :)

राष्ट्रपति के आदेश का पालन हो : और प्रधानमंत्री के मौन की आदत हो :)

इस नागपंचमी जरा बच के रहना : डस लें को खच्च से कहना :)

पुंछ के शहीदों को नमन : इनकी शहादत से ही है , देश में अमन

सोचते रहते हैं हम : बस सोचते ही रह जाते हैं :)

होना चाहिए : और होते रहना चाहिए :)

विवाद की जडें : हमेशा फ़साद का पेड खडा कर देती हैं :)

नागपंचमी और मेरा गुमना: मिलने की कथा ध्यान से सुनना :)

सेल्सियस की कब्र से : फ़रेनहाइट निकल के आया क्या :)

मेरे शहर में मेरा इंतज़ार : और खुद मुझे ही पता नहीं है यार :)

परेशान कर दिया है इस वकील के सवालों ने : जवाब देकर उन्हें बेचैन कर डालिए

 अमर शहीद खुदीराम बोस की १०५वीं पुण्य तिथि : देश के शहीद को नमन

कागज़ की कश्ती बारिश का पानी : अपनी कश्ती खुद है चलानी :)

अब गीत नहीं गाती है गौरैया : हमें तो दिखती भी नहीं है भैया :)

आज के बुलेटिन में इतना ही , जल्दी ही मिलूंगा अगले बुलेटिन में एक नए अंदाज़ के साथ ।

आपका खबरीलाल
अजय कुमार झा

बुधवार, 26 जून 2013

दुर्घटनाएं जिंदगियां बर्बाद करती हैं और आपदाएं नस्ल ..........



उत्तराखंड आपदा , अभी पूरे देश के ज़ेहन में सिर्फ़ यही कौंध रहा है , उस भयावह आपदा जो कयामत बनके आई थी , बीते गुजरे एक सप्ताह से भी अधिक का समय बीत चला है , आज भी खबर यही है कि हज़ारों लोग अब भी मौत के मुंह में हैं । जिंदगियों के जाने का आंकडा , वो आंकडा जो सरकार बता रही है बढता जा रहा है और और इससे कई गुना ज्यादा वो संख्या होगी जो दिन बीतने के साथ ही उत्तराखंड की जमींदोज़ हो चुकी धरती और पहाड के बीच अब गुमनाम होने जैसी होती जा रही है । वो जो पिछले नौ दिनों से अपनों की तलाश में भटक रहे हैं , उनके बारे में जानने के लिए बेताब हैं , परेशान हैं , मायूस हैं जाने उनकी ये बेताबी , ये परेशानी और ये मायूसी कितनी लंबी होने वाली है कईयों की तो शायद उम्र भर के लिए ।

इस आपदा ने इंसानियत के रक्षक हमारे वीर जांबाज़ सैनिकों को अपना फ़र्ज़ निभाने का मौका दिया तो वहीं कुछ आदमखोर इंसानों के झुंड ने लाशों तक से व्याभिचार करके ये साबित कर दिया कि , इंसान अब जीवन स्तर की मानसिकता में पशुओं से कहीं अधिक घृणित और नीच हो गया है । ऐसे में एक कही हुई बात मुझे याद आ रही थी कि ,दुर्घटनाएं तो जिंदगियां बर्बाद करती हैं मगर आपदाएं नस्लों को तबाह कर देती हैं , युगों के लिए ।


हिंदी अंतर्जाल के विभिन्न प्लेटाफ़ार्मों पर , सभी अपनी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं , लेकिन इसी बीच मैं फ़ेसबुक पर अचानक नज़र पडती है , सुनीता भास्कर , पेशे से पत्रकार ,
जिनका ब्लॉग ही है , पत्रकार की डायरी और जितना मैं पढता जाता हूं दिल दिमाग सन्न होते जाते हैं ,

अपनी ताज़ा रिपोर्ट में वे लिखती हैं ,
" कईयों के परिजन खुद जान हथेली में रखकर ग्रुप में गुप्तकाशी या गौरीकुंड तक हो आए हैं, लेकिन उन्हें अपने कहीं नजर नहीं आए। कई परिजन चार चार हिस्सों में बंटे हैं। संगठनों द्वारा रात गुजारने के लिए दिए आशियाने से मुंह अंधेरे ही यह लोग उठ जाते हैं और चारों दिशाओं में फैल जाते हैं। एक सहस्त्रधारा हैलीपैड पर तो दूजा जौलीग्रांट एयरपोर्ट के गेट के बाहर अड्डा डालता है। तीसरा ऋषिकेश तो चौथा हरिद्वार में अपनों के इंतजार में खड़ा हो जाता है। उन्हें नहीं मालूम कि बचाव व राहत कार्य के बाद कौन किस रास्ते कब व कहां लाया जाएगा। कुछ लोग सभी अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं तो कोई दिन भर कैफे में सरकारी वेबसाइट खंगालते रहते हैं। आलम यह है कि मुंह अंधेरे की सुबह से शाम की कालिमा छंटने तक कोई भी मंत्री, अधिकारी उनके कांधे पर हाथ रख दिलासा देने वाला नहीं है। इसके उलट यह अधिकारी फोन स्वीच आफ कर वातानुकुलित कमरो में रहकर  उनके जले पर नमक ही छिडक़ने का काम कर रहे हैं।"


इस त्रासदी के आठ दिनों बाद कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के आपदाग्रस्त क्षेत्र के दौरे पर कटाक्ष करते हुए गोदियाल जी अपने ब्लॉग अंधड पर लिखते हैं ,

"निकले तो थे गुपचुप दर्द बांटने 
बाढ़ पीड़ितों का,  
दर्मियाँ सफर तो भेद उनका 
किसी पे उजागर न हुआ, 
 मगर खुला भी तो कब, 
जब मंजिल पे वो पूछ बैठे;  
"आखिर इस जगह हुआ क्या था ?"


और इसके बाद शिवम मिश्रा जी ने एक पोस्ट लिंक प्रेषित की , जिसमें नित्यानंद जी ने बडे ही मार्मिक रूप से , पहाड की मां ’ को चित्रित किया है देखिए ,


पहाड़ की माँ ---------------


सीता 
पांच बच्चों की माँ है 
पार चुकी है पैंतालीस वर्ष 
जीवन के 
दार्जिलिंग स्टेशन पर 
करती है कुली का काम 
अपने बच्चों के भविष्य के लिए |


सिर पर उठाती है
भद्र लोगों का भारी -भारी सामान
इस भारी कमरतोड़ महंगाई में
वह मांगती है
अपनी मेहनत की कमाई
बाबुलोग करते उससे मोलभाव
कईबार हड़तालों में
मार लेती है पेट की भूख |


ब्लॉगर प्लेटफ़ार्म के अतिरिक्त , जागरण जंक्शन और नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स जैसे अन्य प्लेटफ़ार्मों पर भी यही विषय सबसे ज्यादा मथा जा रहा है , देखिए वहां यतीन्द्रनाथ , टिहरी बांद और हिमालय को मुद्दा बनाते हुए कहते हैं

"
1972 में योजना आयोग द्वारा टिहरी बाँध परियोजना को मंजूरी के साथ ही टिहरी और आस-पास के इलाके में बाँध का व्यापक विरोध शुरू हो गया था। जब विरोध के स्वर तत्कालीन केंद्र सरकार तक पहुंचा तब संसद की ओर से इन विरोधों की जांच करने के लिए 1977 में पिटीशन कमेटी निर्धारित की गई।1980 में इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी ने बाँध से जुड़े पर्यावरण के मुद्दों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाई। इस समिति ने बाँध के विकल्प के रूप में बहती हुई नदी पर छोटे-छोटे बाँध बनाने की सिफ़ारिश की। पर्यावरण मंत्रालय ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के बाद अक्टूबर,1986 में बाँध परियोजना को एकदम छोड़ देने का फैसला किया। नवंबर, 1986 में तत्कालीन सोवियत संघ सरकार ने टिहरी बाँध निर्माण में आर्थिक मदद करने की घोषणा की। इसके बाद फिर से बाँध निर्माण कार्य की सरगर्मी बढ़ने लगी। फिर बाँध से जुड़े मुद्दों पर मंत्रालय की ओर से समिति का गठन हुआ। फरवरी, 1990 में इस समिति ने बाँध स्थल का दौरा करने के बाद रिपोर्ट दी कि “टिहरी बाँध परियोजना पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि से बिलकुल अनुचित हैं।”

 वहीं ब्लॉगर श्री जे एल सिंह , अपने ब्लॉग में बरसात से बर्बादी , को शब्दों में कुछ यूं पिरोते हैं ,
"

सूरज ताप जलधि पर परहीं, जल बन भाप गगन पर चढही.
भाप गगन में बादल बन के, भार बढ़ावहि बूंदन बन के.
पवन उड़ावहीं मेघन भारी, गिरि से मिले जु नर से नारी.
बादल गरजा दामिनि दमके, बंद नयन भे झपकी पलके!
रिमझिम बूँदें वर्षा लाई, जल धारा गिरि मध्य सुहाई
अति बृष्टि बलवती जल धारा, प्रबल देवनदि आफत सारा "

नवभारत टाइम्स ब्लॉगस पर राजेश कालरा कहते हैं कि अब कभी सामने नहीं आ पाएगी सच्चाई

"बर्बादी के जितने भी अंदाजे लगाए जा रहे हैं, उनमें एक बात विशिष्ट है। मरने वालों की तादाद। शुरुआत 200 लोगों की मौत से हुई थी। फिर उत्तराखंड के सीएम ने कहा कि एक हजार लोग मरे हैं। फिर राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री ने कहा कि मरने वालों की तादाद 5000 तक पहुंच सकती है। अब अंदाजे लगाने का तो ऐसा है कि जिसका जो जी करे उतनी संख्या बता दे। समस्या यह है कि सभी अंधेरे में तीर चला रहे हैं क्योंकि सचाई यह है कि हमें कभी पता नहीं चलेगा कि असल में कितने लोग मारे गए।"

तो डाक्टर सामबे , आपदा प्रबंधन पर सवाल उठाते हुए कहते हैं , " 

kedarnath1.jpgईश्वर-अल्लाह पर हम आगे विचार करेंगे। पहले एक साधारण-सी बात कहते हैं और वह यह कि जो खतरों से खुद को बचाता है, खुदा उसी को बचाता है। अंग्रेजी कहावत है- 'God helps those who help themselves'। हम नदी, झील, पहाड़ और समुद्र के समीप जाएं, तो राम भरोसे न जाएं। अपनी समझदारी साथ लेकर जाएं। वहां की भौगोलिक स्थिति और संभावित खतरों के बारे में सजग होकर जाएं। यह पता करके जाएं कि अगर वहां आफत आई, तो वहां बचाव की क्या व्यवस्था है? वहां का आपदा प्रबंधन का रेकार्ड क्या है? हादसों के रेकार्ड आनेवाले खतरों से निपटने में मददगार होते हैं। कुदरत के कहर से बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं?"

वहीं ब्लॉगर तृप्ति अपने ब्लॉग कच्ची लोई में कहती हैं कि बारी हमारी भी बहुत जल्दी आनी है , अपनी पोस्ट को समाप्त करते हुए वो कुछ पंक्तियां लिखती हैं , 

"

तरक्की कर रहे हैं हम तरक्की करते जाएंगे
बहुत कुछ खो चुके हैं हम बहुत कुछ खोते जाएंगे
हैं जिंदा हम बड़ी बेशर्म सांसों के सहारे पर
मरेगा सामने वाला मगर हम जीते जाएंगे
कहानी सामने वाले की अपनी भी कभी होगी
वही तब आसमां होगा वही तब ये जमीं होगी
जो समझो बात इतनी सी तो फिर हर बात छोटी है
नहीं तो चाह में जीने की हम बस मरते जाएंगे..."

इधर पिछले दिनों ब्लॉगिंग में भी भूस्खलन का दौर जारी है , यानि कि उठापटक जी , अविनाश वाचस्पति जी ने अपने ब्लॉग को ही अलविदा करने का मन बना लिया , या शायद कह ही दिया और घोषणा कर डाली कि अब वे सिर्फ़ फ़ेसबुक पर ही नुमाया होंगे , इसी उहापोह में डाक्टर अरविंद मिश्रा जी की पोस्ट आई और क्या लबाबल बहस से लबरेज हो गई पोस्ट देखिए , डा मिश्रा ने लिखा ,
"वे पिछडे हैं जो ब्लॉगिंग तक ही सिमटे हैं " , जिसमें उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि ,
" आज भी मैं यह बल देकर कहता हूँ कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद  माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख  सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं .यह पोस्ट भी वहां दिखेगी ही ...." 

जब पोस्ट इतनी धारदार, वारदार हो तो फ़िर प्रतिक्रिया तो आनी ही थी और क्या खूब आईं देखिए , 




  1. ब्लॉग अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है। इसकी प्रासंगिगता कभी खत्म नहीं होगी।

    फ़ेसबुक और ट्विटर तुरंता जुमलेबाजी के माध्यम हैं। फ़ेसबुक मेरे लिये नोटिसबोर्ड की तरह है जहां अपने ब्लॉग की नोटिस लगाते हैं, जुमलेबाजी करते हैं, फ़ूट लेते हैं। ब्लॉग हमारे लिये घर की तरह है जहां हमेशा लौटने का, रहने का मन करता है।

    लिखने वाले की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि लोग उसे पढ़ें और सराहें। प्रिंट मीडिया में छपना वाह-वाही समझी जाती हैं क्योंकि ब्लॉग के मुकाबले ज्यादा लोग पढ़ते हैं उसे। प्रिंट भले ही खबरों के लिये आउटडेटेड हो गया हो लेकिन बाकी लिखे पढ़े के लिये उसमें छपने का मजा ही कुछ और है। इसे स्वीकारने में कोई संकोच नहीं करना चाहिये।

    लेकिन प्रिंट मीडिया की अपनी सीमायें हैं। अगर आप बहुत बड़े सेलिब्रिटी नहीं हैं तो आपका लिखा सब कुछ वहां नहीं छप जायेगा। आपके अपने मन के भाव, उद्गार, संस्मरण , चिरकुटैयों, अपीलों , धिक्कार के लिये वहां कोई जगह नहीं होगी। उसके लिये आपको लौट के अपने यहां ही आना होगा और उसके लिये ब्लॉग से उपयुक्त कोई माध्यम नहीं है।

    ब्लॉगिंग ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का जो सहज माध्यम प्रदान किया है उसकी तुलना और किसी माध्यम से नहीं हो सकती। लोग अपने भाव, कवितायें, सोच, संस्मरण अपने ब्लॉग पर लिखते हैं। ट्विटर पर शब्द सीमा है, फ़ेसबुक पर सर्चिंग लिमिटेशन। ब्लॉग पर आप अपनी सालों पहले की किसी भी पोस्ट पर डेढ़ -दो मिनट में पहुंच सकते हैं, फ़ेसबुक अपना दस दिन पुराना स्टेटस खोजने में भी घंटा लग सकता है। ब्लॉग जैसी आजादी और सुविधा और कहां?

    इस बीच एक घालमेल और हुआ है कि, ब्लॉग जो कि अभिव्यक्ति का माध्यम है और जिसकी कोई सीमा नहीं है को, साहित्यप्रेमियों और पत्रकार बिरादरी ने हाईजैक जैसा करके इसको साहित्यमंच या फ़िर पत्रकारपुरम जैसा बनाने की कोशिश करके इसको सीमित करना शुरु कर दिया है। जबकि ऐसा है नहीं- ब्लॉग आज के समय में दुनिया का सबसे तेज दुतरफ़ा माध्यम है। लेखक/पाठक के बीच अभिव्यक्ति और प्रतिक्रिया का इससे तेज और कोई खुला माध्यम नहीं है।

    ब्लॉग और फ़ेसबुक से पैसे कमाने की बात जो करते हैं वे लहरें गिनकर भी पैसा कमा सकतें हैं। उसके लिये व्यक्ति को लेखन सक्षम नहीं कमाई सक्षम होना चाहिये। पैसे कमाने और नाम कमाने और इनाम जुगाड़ने के लिये भी लोग तरह-तरह की तिकड़में लगानी होती हैं। वे सब आम आदमी के बस की नहीं होती।

    मैं ब्लॉग लेखन से क्यों जुड़ा हूं उसका यही कारण है कि अपनी तमाम अभिव्यक्तियों के लिये ब्लॉग ही सबसे मुफ़ीद माध्यम है। और कोई माध्यम इतना सहज और सुगम नहीं है जितना कि ब्लॉग। इसीलिये अपन इससे जुड़े हैं और इंशाअल्लाह जुड़े रहेंगे। आप भी यह पोस्ट सिर्फ़ ब्लॉग पर ही लिख सकते थे। लिख तो फ़ेसबुक पर भी सकते थे लेकिन अगर वहां लिखते तो हम इत्ता लंबा कमेंट वहां नहीं लिखते। रात को पढ़कर लाइक करके फ़ूट लिये होते। आपकी तमाम बहस-विवाद वाली तमाम पोस्टें जो ब्लॉग पर हैं वे हम फ़ौरन खोजकर पढ़ सकते हैं। फ़ेसबुक और दूसरे तुरंता माध्यमों पर -इट इज हेल ऑफ़ द टॉस्क! :)

    समय के साथ लोगों की धारणायें भी बदलती हैं। डेढ़ साल पहले हमने एक पोस्ट लिखी थी - ब्लॉगिंग, फ़ेसबुक और ट्विटर . उस पर आपका कहना था- ब्लॉग जगत में निश्चय ही एक मरघटी का माहौल बन रहा है ..हमें कोई खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए ….

    इसी पोस्ट पर आपके घोषित शिष्य संतोष त्रिवेदी की टिप्पणी थी- फेसबुक की लत छूट चुकी है,ट्विटर पर यदा-कदा भ्रमण कर लेते हैं पर ब्लॉगिंग पर नशा तारी है ! जब तक खुमारी नहीं मिटती,लिखना और घोखना जारी रहेगा !

    आज की स्थिति में ब्लॉग के प्रति आपका लगाव बरकरार है। और आपने लिखा भी -अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे हुए हैं मरघट में किसी का इंतजार करेंगे कयामत तक। संतोष त्रिवेदी उदीयमान ब्लॉगर से ब्लॉगिंग में अस्त से हो चुके हैं। फ़ेसबुक की लत दुबारा लगा गयी है। प्रिंट मीडिया में घुसड़-पैठ शुरु है और काफ़ी जम भी गयी है। आगे और जमेगी, जमे शुभकामनायें।

    जो सूरमा ब्लॉग को पिछड़ा बताकर फ़ेसबुक और ट्विटर पर जाने की बात कह रहे हैं उनको यह याद रखना चाहिये कि उनकी पहचान अगर है, कुछ लोग उनको जानते हैं तो वह सब एक ब्लॉगर होने के चलते है। वर्ना फ़ेसबुक और ट्विटर में अनगिन लोगों के हजारों, लाखों फ़ालोवर होंगे। कौन जानता है उनको?

    और किसी का पता नहीं लेकिन अपन ब्लॉगिंग अपन के लिये घर जैसा लगता है। जितनी सहजता यहां हैं मुझे उतना और कहीं नहीं। इसीलिये अपन ब्लॉगिंग से जुड़े हैं और लगता है कि आगे भी जुड़े सहेंगे।
    प्रत्‍युत्तर दें
    उत्तर
    1. अनूप जी ,
      प्रिंट मीडिया की व्याप्ति /पहुंच अब बहुत सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक रह गई है ! सोशल मीडिया वैश्विक है!
      भारत की किसी भी पत्रिका /समाचार पत्र की कितने दूर तक पहुँच है ?
    2. प्रिंटमीडिया की भौगोलिक व्याप्ति सिमटी है लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया के कंधे पर चढ़कर तो अभी भी यह दुनिया जहान तक पहुंचती है। :)
 और अभी तो प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है ,

चलिए अब चलते चलते आपको कुछ एक लाइना पोस्ट लिंक थमाए देते हैं ,

१.पढ लें धनुष के बारे में : सिलेमा इसके बाद देख लीजीएगा

२.जो तेरा है वो मेरा है : फ़िर क्यों चिंताओं ने घेरा है

३.उत्तराखंड के संकट में लोकतंत्र लापता :  न लोक का ही न ही तंत्र का है पता

४.जिंदगी यूं ही कटती रही : धूप छांव सी सिमटती रही

५.विंडो ८ में लगाएं विंडो ७ जैसा स्टार्ट बटन : और स्टार्ट करते ही पोस्ट लिखें :)

६.संजय जी कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए : जी आप सीरीयल देखते जाइए

७.राहुल बाबा का जन्मदिन बडा या मदद : अकल बडी या भैंस :)

८.पीने में रम गया है मन : रम का नाम सुनके ही मन हुआ प्रसन्न :)

९.ये आपदा सीख भी देती है : मगर हम कतई नहीं लेते , आदत से मजबूर

१०.आज का प्रश्न : हल करिए जी

चलिए आज के लिए इतना ही फ़िर मिलते हैं , नई बुलेटिन में , नए ब्लॉग पोस्टों और नई प्रतिक्रियाओं को समेटे हुए , तब तक उत्तराखंड पीडितों के लिए दुआ करते रहें , पढते रहें , लिखते रहें ।

शुक्रिया .....................

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

शुभ दीपावली और ब्लॉग बुलेटिन का पहला हैप्पी बर्थडे

हिंदी ब्लॉगजगत में पिछले सात वर्षों में आए सुखद संयोगों में , आज एक और अनमोल दिन जुड गया । क्छ भी कहने से पहले मैं आपको ये बता दूं कि आज देश , हम आप और सब जहां दीपोत्सव मना रहे हैं वहीं ब्लॉग बुलेटिन का ये पन्ना अपनी पहली वर्षगांठ मना रहा है । पिछले वर्ष आज ही के दिन , अचानक ब्लॉग बुलेटिन के सच्चे और सबसे प्रतिबद्ध रिपोर्टर भाई शिवम मिश्रा जी ने संवाद करते हुए ये सुझाव दिया कि , चूंकि , ये वो समय था जब न सिर्फ़ एग्रीगेटर बल्कि ब्लॉग पोस्टों की चर्चा , उन पोस्टों को सहेज कर एक  पन्ने पर सहेजने का कार्य कुछ कुछ मंद सा लगने लगा था । मैं खुद “ झा जी कहिन “ पर अपनी चिर परिचित दो लाइना , लगभग छोड चुका था । ऐसे में भाई शिवम मिश्रा और देव कुमार झा ने इस विचार का सूत्रपात किया । नाम रखने की जिम्मेदारी मुझे मिली और मुझे नाम सूझा “ ब्लॉग बुलेटिन “ ॥


आज एक साल के बाद हम सारे ब्लॉग रिपोर्टस को इस बात की बहुत खुशी और प्रसन्नता है कि इतने समय में सभी पाठक मित्रों ने इस पन्ने को न सिर्फ़ बहुत पसंद किया बल्कि आज ये सबका चहेता बन गया है । यदि शुरू से लेकर आज तक के सफ़र के बारे में कुछ खास खास बातें कहनी हों तो सबसे पहली बात ये कि शिवम मिश्रा जी इस सुपरफ़ास्ट रेलगाडी के चालक है , रश्मि प्रभा दीदी इसकी पथ पथप्रदर्शक गाइड , हम सब यानि देव बाबा , मैं , सलिल भाई , मनोज जी ,  पेंट्री , मेंटेनेंस विभाग , आदि संभालने वाले , पाबला जी बुलेटिन के तकनीक विशेषज्ञ , और इनके अलावा कभी मेहमान रिपोर्टर के रूप में कभी अतिथि रिपोर्टर के रूप में सहयोग और प्रस्तुति करने वाले तमाम साथी ब्लॉगर्स का योगदान , साथ , स्नेह और विश्वास हमारे लिए किसी उपहार से कम नहीं रहा । भाई शिवम मिश्रा जी की प्रतिबद्धता और नए प्रयोग तथा रश्मि दीदी की पारखी नज़र से मास्टर स्ट्रोक वाली , ब्लॉग विश्लेषण सहित तमान अदभुत प्रयोगों ने बुलेटिन को एक विशिष्टता प्रदान की ।


ऐसा नहीं है कि सब कुछ अच्छा अच्छा ही रहा । बीच में कुछ साथी नाराज़ होकर तो कुछ किसी विशेष मकसद से , कभी टिप्पणी के द्वारा तो कभी कहीं कटाक्ष के द्वारा , इस पन्ने को अव्यवस्थित करने और हमारा ध्यान भटकाने का भी प्रयास किया किंतु इस बार हम तय कर चुके थे  ऐसी किसी भी कोशिश और किसी की भी कोशिश को पूरी तरह दरकिनार करते हुए , हम सिर्फ़ अपना काम करेंगे । हमने ऐसा ही किया , खैर ये खट्टे मीठे अनुभव तो यहां होना लाज़िमी है और इस अंतर्जालीय परिवार का अनिवार्य अंग भी । आप सबको दीपावली की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं ।


अब चलते चलते हम आपको ये आश्वासन देते हैं कि हमारी ये कोशिश और हमारा ये सफ़र यूं ही जारी रहेगा ,इसका भरसक प्रयास हम करते रहेंगे । चलिए अब आपको कुछ चुनिंदा पोस्टों की झलकियां दिखाते हैं , …………..




अब दीवाली . . . .
अब नहीं बनाती मां मिठाई दीवाली पर
हम सब भाई बहन खूब रगड़ रगड़ कर पूरा घर आंगन नहीं चमकाते
अब बड़े भाई दिन रात लग कर नहीं बनाते
बांस की खपचियों और पन्नीदार कागजों से रंग बिरंगा कंदील
और हम भाग भाग कर घर के हर कोने अंतरे में
पानी में अच्छी तरह से भिगो कर रखे गए दीप नहीं जलाते
पूरा घर नहीं सजाते अपने अपने तरीके से।

दिवाली तब दिवाली हो
-- करण समस्तीपुरी
सबा हर ओर से आए, दिवाली तब दिवाली हो।
दिया हर घर में जल जाए, दिवाली तब दिवाली हो॥
जले आहुतियाँ पहले सभी कलुषित विचारों की।
अँधेरा मन का मिट जाए, दिवाली तब दिवाली हो॥
विदेशी क़ैद में विष्णु-प्रिया बैठी सिसकती हैं।
वो अपने घर चली आए, दिवाली तब दिवाली हो॥




 


माँ और दीपावली
माँ के लिए
दिवाली आ जाता है
हफ्ता भर पहले ही
घर के कोने कोने तक
पहुच जाती है माँ
जहाँ होती है
चूहों  का  बसेरा
सीलन
अँधेरा
माँ दिवाली कर आती है
घर के अँधेरे कोनो में


किसकी दीपावली?
दीपावली बाजार का, बाजार के लिए और बाजार के द्वारा त्यौहार बनती जा रही है

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर में बाजार की पकड़ से बच पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा हो गया है. पर्व-त्यौहार भी इसके अपवाद नहीं हैं. हालाँकि किसी भी समाज में पर्व-त्यौहार उसकी संस्कृति, उत्सवधर्मिता और सामाजिकता की पहचान होते हैं, वे लोगों की सामूहिकता, आपसी मेलजोल और खुशी बांटने के मौके होते हैं.
लेकिन ठीक इन्हीं कारणों से वे बाजार को भी लुभाते हैं. बाजार को इसमें खुशियों की मार्केटिंग और खरीदने-बेचने का मौका दिखाई देता है. खासकर एक ऐसे दौर में जब वास्तविक खुशी दुर्लभ होती जा रही है, बाजार उपभोक्ता वस्तुओं को उत्सव और खुशियों का पर्याय बनाके बेचने के मौके की तरह इस्तेमाल करता है

शुभ दीपावली


जीवन की व्यस्तताओं, परेशानियों और दुखों के बावजूद पर्व अपना आगमन नहीं रोकते क्योंकि हर पर्व का उद्देश्य एक ही होता है सदा जन हित। हर घर में, हर इंसान में खुशियाँ भरने की कोशिश करते हैं पर्व। सुख-दुःख ,जीवन-म्रत्यु सभी निश्चित है, मालूम भी है सभी को फिर भी हम भूल जाते हैं और यदि हम दुखी होते हैं तो सारे संसार को उसी नज़र से देखते हैं ,पर्व ऐसे हर पलों को हर किसी के जीवन से निकालने में मदद करते हैं। त्यौहार कभी अमीरी-गरीबी का भेद नहीं करते बल्कि दोनों को उनकी सामर्थ्य अनुसार भरपूर जीने का सन्देश देते हैं। त्यौहार कोई भी क्यूँ न हो सदा सभी लोग मुंह मीठा ही करते हैं कभी भी तीखा नहीं, फिर चाहे वो पिस्ता लौंज से किया जाये या गुड की ढली से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मुंह में जो घुलती है वो ‘ मिठास ‘ ही होती है। सभी व्यस्त हैं अतः पर्व आते ही घरों की साफ़-सफाई भी शुरू हो जाती है।


हर आँगन में दीप
चकाचौंध गर ना हुआ, किसको है परवाह।
दीपक इक घर घर जले, यही सुमन की चाह।।
रात अमावस की भले, सुमन तिमिर हो दूर।
दीप जले इक देहरी, अन्धेरा मजबूर।।
हाथ पटाखे हैं लिए, सुमन खुशी यह देख।
कुछ बच्चे बस देखते, यही भाग्य का लेख।।


ज्योति पर्व की हार्दिक मंगल कामनाएँ

अहो भाव का स्वप्निल नवल विहान आपके आंगन में
मन वीणा पर गुम्फित मधुरिम  तान आपके अंगन मेंअनुरंजित कर मानस अपना नव संचार संवारने दें
नृत्य चले आनंद भाव का नूपुर टूट बिखरने दें
परम शान्ति सद्भाव प्रेम का गान आपके आँगन में
मन वीणा पर गुम्फित मधुरिम  तान आपके अंगन में
मदिर फुहार झरे चंदनियां मरु अंतस को धो जाए
नर्तन हो इश्वर मय हो कर अपना पन ही खो जाए
शाश्वत अविरल विपुल कान्ति मुस्कान आपके आंगन में
मन वीणा पर गुम्फित मधुरिम  तान आपके अंगन में


 

((((.....दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.....))))
इस दि‍ए की रौशनी सा रौशन आपकी जिंदगी का हर कोना हो


एक ख्याल और सभी ब्लोगर मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये !
सर्वप्रथम दीपावली की पूर्व संध्या  पर सभी ब्लोगर मित्रों और पाठक मित्रो को हार्दिक शुभकामनाये और आपके समस्त पारिवारिक जनो को भी मंगलमय कामनाएं इस पावन पर्व की !
आज सुबह जब यह समाचार कहीं  पर पढ़ रहा था कि सीएजी  को भी चुनाव आयोग की तर्ज पर तोड़ने की कोशिश हो रही है तो अचानक यह ख्याल मेरे मन में आया कि  क्यों न  इस देश में प्रधानमंत्री के चार पद होने चाहिए

दीवाली : हमारी परंपरा है

सोमवार, 12 नवम्बर 2012
लो आ गई दीपावली, माफ़ कीजिएगा ..... "दीवाली" . दीपावली तो दीपो का त्यौहार होता है, परंतु यह तो दीवालिया होने का त्यौहार है। रुपयो मे आग लगाने का और खर्चे करने का। हमे बचपन से हि बताया गया है कि दीवाली पर घर मे लक्ष्मी का प्रवेश होता है, तो लो भईया माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिये खूब रुपय बहाए, पानी बरबाद किया, दीवारो का मेकअप भी करवा दिया किन्तु जब से होश संभाला है माता लक्ष्मी आती हुई कम और जाती हुई ज्यादा दिखाई दि है। इस चक्कर मे हम तो हो गये दीवालिया और हो गई हमारी दीवाली।

परन्तु कुछ लोग अभी भी इसी भ्रमजाल मे फ़से हुए है। 10-10 के रुपयो की गड्डी अलमारी मे रखने के लिये ले आये है। हाँ जी रख लो रुपयो की गड्डी कृपा आ ही जायेगी। शायद बाबा ने रखना भूल गये थे इसलिये आज उनका यह हाल है। चटनी , समोसे , कचौडी खाने मे ऐसे व्यस्त हुए की बेचारे दसबंत निकालना हि भूल गये। खैर हम बाबा के बहुत बडे भक्त है, कोई उनके बारे मे कुछ कहे तो हम सुन लेगे लेकिन कुछ कहेंगे नही। बेचारे हमारे एक ही तो बाबा है जो लीग से हटकर कुछ अलग करना चाहते है, किन्तु हाय रे ये दुनिया जो अलग सोच वालो को कभी आगे बढने नही देती।
तुम ही कहो ........ ललित शर्मा
ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, 13 नवम्बर 2012
तुम ही कहो
कैसे मनाऊँ दीवाली?
महंगी हुई है शक्कर
महंगा हुआ आटा दाल
बाजारों में आग लगी
निर्धन का कौन हवाल
तुम ही कहो .........
रंग रोगन से
लिपे पुते घर
लक्ष्मी आए आँगन में
धन हो जिसका रोज निवाला
बरसे उस ठग के आँगन में
सत्य हमेशा ठगा रहेगा?
यह है एक सवाल
तुम ही कहो ........

 


दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं
प्रकाश-पर्व दीपावली, जग, जीवन तिमिरारि।
माँ लक्ष्मी तेरे सामने, मागें हाथ पसारि।।
धन धान्य परि पूर्ण करे, होय सत्कर्म की जीत।
बैर-भाव का नाश हो, उमड़े जन जन प्रीत।।

लो आई दीवाली रे ….

अजय कुमार झा |

लो आई दीवाली रे
आलू प्याज और टमाटर,
खरीद खरीद कर,
जेब हुई है खाली रे,
ऊपर से बच्चे चिल्लाएं ,
लो आयी दीवाली रे,
.
शेयर मार्केट भी हुई बेवफा,
कौन समझे ये फलसफा,
कोई पीटे माथा अपना,
कोई बजाये ताली रे,
लो आयी दीवाली रे,
.

 


ज्योति का प्रथम तीर्थ दीप ...

ज्योति का प्रथम तीर्थ दीप
कालिमा  आती नहीं समीप
आइए उजियारे की लालिमा लाते हैं
मिलकर दीपावली मनाते हैं ......
शुभ दीपावली



सर्वे भवन्‍तु सखिन:

समस्‍त कृपालुओं को मुझ अकिंचन की ओर से हार्दिक अभिनन्‍दन, बधाइयॉं और शुभ-कामनाऍं।
मेरे बडे बेटे प्रिय चि. वल्‍कल ने मेरे लिए  इस बधाई पत्र  का आकल्‍पन किया है।


शुभ दीपावली !!
आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !!



Diwali-2012 - दीपावली-2012




मनाएँ एक शुभ और सुरक्षित दीपावली

दीपावली के अवसर पर बच्चें पटाखों को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं। लेकिन पटाखे जलाते समय विशेष सावधानी की जरूरत होती हैं नही तो खुशियों और उजाले के इस त्यौहार को अंधेरे में बदलने में देर नही लगती, आइये हम इन सब बातों को ध्यान रखकर एक सुरक्षित दीपावली मनाएं-
- पटाखों को हमेशा खुली जगह पर ही जलाएं।
- पटाखे हाथ में लेकर न जलाएं। इससे दुर्घटना का खतरा रहता है।
- बहुत से पटाखे और बम धीरे-धीरे आग पकड़ते हैं। इन्हें एक बार आग लगाने के बाद इनके पास दोबारा न जाएं।
- बच्चे जब पटाखे जलाएं तो उनके आसपास ही रहें। हमेशा अपनी देखरेख में ही बच्चों को पटाखे जलाने दें। साथ ही बच्चों को बड़ी साइज के पटाखे और अन्य सामग्री न जलाने दें।
- इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे पटाखे जलाते समय शरारत न करें। मसलन जलती हुई फुलझड़ी को इधर-उधर घुमाना आदि।
- पटाखे और बम आदि को किसी डिब्बे में रखकर न जलाएं। इससे बड़ी दुर्घटना होने की संभावना रहती है।
- पटाखे जलाते समय कभी भी उनके ऊपर झुकें नहीं।
- पटाखों को हमेशा सुरक्षित स्थान पर रखें अर्थात ऐसी जगह पर रखें जहां छोटे बच्चों की पहुंच न हो।
- पटाखे जलाते समय कभी भी बहुत ढीले-ढाले कपड़े न पहनें। हमेशा चुस्त कपड़े ही पहनें।
- आतिशबाजी का मजा लेते समय सिंथेटिक कपड़े न पहनें, सूती कपड़े ही पहनें।
- बहुत तेज आवाज वाले पटाखे और बम का प्रयोग न करें। ये आपके सुनने की क्षमता कम कर सकते हैं।
बस इन चंद बातों का ख्याल रखें और मनाएँ एक शुभ और सुरक्षित दीपावली !

आप सभी को शुभ और सुरक्षित दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक मंगलकामनाएँ  और बधाइयाँ !
इसी के साथ हम एक बार आप सबको फ़िर से दीपावली के पर्व की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं देते हैं , और ब्लॉग बुलेटिन के पहले जन्मदिन पर आपसे ये वादा करते हैं कि आपके स्नेह के साथ हम इस यात्रा को ज़ारी रखेंगे । शुभकामनाएं ……………..

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

कुछ पोस्टें , कुछ कतरनें ……..आज के बुलेटिन में


आज के दिन को देश गांधी जयंती के रूप में मना रहा है और पिछले कई दशकों से मनाता चला आ रहा है , आगे भी मनाएगा ही , हालांकि आज ही के दिन स्व. लाल बहादुर शास्त्री सरीखे राजनेता का भी जन्मदिन पडता है । हम सब देश वासी दोनों को नमन करते हैं । किंतु आज का बुलेटिन मैं अपने हिंदी ब्लॉगजगत के उन साथियों को याद करने के नाम करता हूं जो पिछले दिनों चुपचाप हमें छोडकर चले गए । आज ही रचना जी ने मुझे सूचना दी कि उन्होंने हमारे बिछडे साथी ब्लॉगर्स ,जो अब हमारे बीच नहीं रहे के लिए एक विशेष ब्लॉग, विद गॉद ऑलमाइटी With God Almighty  बनाया है ताकि हम और भविष्य में हमारे आने वाले ब्लॉगर भी उन्हें याद रखें । हम जिन साथियों के साथ आपसी संवाद करते रहे , जिनके शब्द , टिप्पणियां आज भी ज़ेहन में ताज़ा हैं उन्हें संजो कर रखने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता था । रचना जी को बहुत बहुत साधुवाद उनके इस प्रयास के लिए , हम सबकी तरफ़ से और अपने इन तमाम बिछडे साथियों को श्रद्धांजलि , डॉ. अमर कुमार , डॉ रूपेश श्रीवास्तव, हिमांशु मोहन ,विकास परिहार व नन्हा ब्लॉगर आदित्य की यादें सहेजनीय हैं । अपने इन साथियों को हमारा नमन ।
ब्लॉगर चंद्र मौलेश्वर प्रसाद

ब्लॉगर चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


अब कुछ चुनिंदा पोस्टों के कतरों को सहेज़ कर आज के बुलेटिन का रुख करते हैं , आप भी देखिए …….
शास्त्री जी की जयंती पर विशेष

लाल बहादुर शास्त्री - जन्मतिथि: 2 अक्तूबर, 1904
निधन: 11 जनवरी, 1966

 


राजनीतिक बाजार का प्यादा युवा
पहली बार बिहार में युवा न किसी धारा और न ही किसी विचारधारा के रास्ते सत्ता के खिलाफ सड़क पर हैं। उसे महज वेतन चाहिये। ठेके पर काम करने वाले युवाओं का आक्रोश महज वेतन चाहता है। बेसिक और स्नातक प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित वर्ग के शिक्षकों की उम्र 22 से 35 बरस के करीब है और इनकी संख्या करीब तीन लाख है। वेतन 6 से 8 हजार तक है और वेतन न पाने के आक्रोश को राजनीतिक तौर लालू-पासवान भुनाने में लगे हैं।

तो क्या पहली बार राजनीति के पास अपना कोई राजनीतिक विकल्प या एजेंडा नहीं है। जबकि इससे पहले कई मौकों पर देश ने बिहार के युवाओं के जरीये सड़क के आंदोलन से देश की राजनीति को बदलते हुये देखा है। याद कीजिये तो दो बरस पहले राहुल गांधी बिहार के युवकों को युवा कांग्रेस से जोड़ने निकले थे। तब 18 से 35 साल के युवको के लिये बाकायदा ऑनलाइन फार्म से लेकर सामाजिक-आर्थिक समझ को राजनीतिक तौर पर लागू कराने की समझ वाले इंटरव्यू की व्यवस्था की गयी । बिहार में यूं भी करीब साढ़े-चार लाख युवक राजनीतिक दलों से सीधे जुड़े हुये हैं। और लाख छात्रों का आवेदन कांग्रेस के पास पहुंचा, यह बात हाशिये पर सिमटे कांग्रेस के नेताओं ने तब राहुल गांधी से कही। लेकिन जब चुनाव परिणाम में कांग्रेस कही नहीं टिकी तो युवा कांग्रेस से निकले कांग्रेसियों ने तर्क यही गढ़ा कि जो सत्ता में होता है या आ रहा होता है युवा उसी दिशा में चलते हैं। लेकिन कांग्रेस की कमान थामे बिहार के कांग्रेसी भी जेपी आंदोलन से ही निकले हुये हैं। लेकिन जेपी आंदोलन के बाद बिहार का नया सच यही है कि सबसे ज्यादा बेरोजगार युवाओ की फौज रोजगार दप्तर में दर्ज है। जेपी के दौर में बिहार के करीब पांच लाख छात्र आंदोलन से जुड़ गये थे। फिलहाल बिहार के रोजगार दफ्तर में करीब ग्यारह लाख छात्रों के नाम दर्ज हैं।


विश्व अहिंसा दिवस 2012
विश्वं समित्रिणं दह
(ऋग्वेद 1/36/2/14)
सर्वभक्षी रोगाग्नि में जलते हैं
"जिसकी लाठी उसकी भैंस" का मुहावरा जंगल राज में सही साबित होता है। किसी कानूनी व्यवस्था के अभाव में बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। लेकिन सभ्यता और संस्कृति की बात ही कुछ और है। समाज जितना अधिक सभ्य होता जाता है असहायों को अपनी रक्षा की निरंतर चिंता करने की आवश्यकता उतनी ही कम होती जाती है। सभ्यता के विस्तार के साथ ही समाज में अहिंसा भी व्यापक होती जाती है। आज यदि हम विश्व पर एक नज़र दौड़ायें तो स्पष्ट हो जायेगा कि अविकसित समाजों में आज भी हिंसा का बोलबाला है जबकि विकास और अहिंसा हाथ में हाथ डाले नज़र आते हैं।

क्यूबैक का एक परिवार गांधी जी के साथ
सभी जानते हैं कि भारतीय सभ्यता उन प्रारम्भिक सभ्यताओं में से एक है जिन्होंने अहिंसा को सर्वोपरि सद्गुणों में स्थान दिया। योग, साँख्य, जैन, बौद्ध, सिख आदि सभी भारतीय दर्शनों में अहिंसा का एक विशिष्ट स्थान है। हमारे इसी विचार को आज सम्पूर्ण संसार की स्वीकृति प्राप्त हो रही है। अहिंसा के वैश्विक अध्याय में एक नया पृष्ठ 15 जून 2007 को तब लिखा गया था जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (International Day of Non-Violence) की मान्यता दी थी।


चादर : सरोजकुमार
* Tuesday, October 02, 2012

चादर के हिसाब से
पाँव वह पसारे
जो अपने नाप की चादर
बुन नहीं सकता हो!
पर वह जो नया-नया उभरा है
जिसकी अस्थियाँ और मज्जा
अभी रास्ते में हैं
उसे मत सिखाओ
चादर का गणित!

तपते तलवे, कमबख़्त चाँद और एक कुफ़्र-सी याद...
बड़ी देर तक ठिठका रहा था वो आधा से कुछ ज्यादा चाँद अपनी ठुड्ढी उठाए दूर उस पार  पहाड़ी पर बने छोटे से बंकर की छत पर| अज़ब-गज़ब सी रात थी...सुबह से लेकर देर शाम तक लरज़ते बादलों की टोलियाँ अचानक से  लापता हो गईं रात के जवान होते ही| उस आधे से कुछ  ज्यादा वाले चाँद का ही हुक्म था ऐसा या फिर दिन भर लदे फदे बादल थक गए थे आसमान की तानाशाही से...जो भी था, सब मिल-जुल कर एक विचित्र सा प्रतिरोध पैदा कर रहे थे| ....प्रतिरोध? हाँ, प्रतिरोध ही तो कि दिन के उजाले में उस पार पहाड़ी पर बना यही बंकर सख़्त नजरों से घूरता रहता है इस ज़ानिब राइफल की नली सामने किए हुये और रात के अंधेरे में अब उसी के छत से कमबख़्त चाँद घूर रहा था|  न बस घूर रहा था...एक किसी गोल चेहरे की बेतरह याद भी दिला रहा था बदमाश..

एक गज़ल -गाँधी जयंती पर

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी
एक गज़ल 
कुदरत का करिश्मा हैं या वरदान हैं गाँधी
कुदरत का करिश्मा हैं या वरदान हैं गाँधी
इस दौर में इंसा नहीं भगवान हैं गाँधी
अफ़साना -ए -आज़ादी के किरदार कई हैं
अफ़साना -ए -आज़ादी का उनवान हैं गाँधी


 


भूसा
भूसा हूं
मैं
अन्न को
सहेज
रखता हूं
और अंत में
कर दिया जाता हूं
बाहर


गाँधी जी का टूटा चश्मा
जब चपरासी रामलाल जाले हटाता, धूल झाड़ता कबाड़घर के पिछले हिस्से में गाँधी जी की मूर्ति को खोजता हुआ पहुँचा तो उड़ती धूल के मारे गाँधी जी की मूर्ति को जोरो की छींक आ गई. अब छड़ी सँभाले कि चश्मा या इस बुढ़ापे में खुद को..चश्मा आँख से छटक कर टूट गया. गुस्से के मारे लगा कि रामलाल को तमाचा जड़ दें मगर फिर वो अपनी अहिंसा के पुजारी वाली डीग्री याद आ गई तो मुस्कराने लगे. सोचने लगे कि एक चश्मा और होता तो वो भी इसके आगे कर देता कि चल, इसे भी फोड़ ले. मेरा क्या जाता है? जितने ज्यादा चश्में होंगे, उतने ज्यादा लंदन से नीलाम होंगे. मुस्कराते हुए बोले- कहो रामलाल, कैसे आना हुआ? पूरे साल भर बाद दिख रहे हो?
Gandhiji


शहरी भैंसें



इलाहाबाद के एक व्यस्त चौराहे पर टहलते पशु।
मेरी ट्रेन कानपुर से छूटी है। पूर्वांचल की बोली में कहे तो कानपुर से खुली है। खिड़की के बाहर झांकता हूं तो एक चौड़ी गली में भैसों का झुण्ड बसेरा किये नजर आता है।
कानपुर ही नहीं पूर्वी उत्तरप्रदेश के सभी शहरों या यूं कहें कि भारत के सभी (?) शहरों में गायें-भैंसें निवसते हैं। शहर लोगों के निवास के लिये होते हैं, नगरपालिकायें लोगों पर कृपा कर वहां भैंसों और गायों को भी बसाती हैं। ऑपरेशन फ्लड में वे अपना जितना भी बन सकता है, योगदान करती है। वर्गीज़ कुरियन नहीं रहे; उनकी आत्मा को पता नहीं इससे आनन्द होता होगा या कष्ट?!


अंग्रेज़ आ गया है।
खोड़ा से मीनू रोज़ बिना नागा काम करने आती हैं। गंगा की समय प्रतिबद्धता लाजवाब है। मैं सत्याग्रह और अहिंसा पर स्क्रिप्ट लिखने में व्यस्त था। अचानक मीनू अंदर आई और खुशी से लबालब नयना से बोलने लगीं। अरे भाभी मेरी बेटी को बेटा हो गया है। पता है सास ने एक हज़ार एक रुपये नर्स को दे दिये। उसकी सास बहुत ख़ुश है। तो अब सब ठीक हो गया मीनू घर में, हां भाभी, पोता होते ही बेटी से सबका व्यवहार बदल गया है। तभी तो हज़ार रुपये दिये नर्स को। क्या बताऊं, एक दम अंग्रेज़ जैसा है। उनकी फैमिली में तो सब कट हैं। ये एकदम कट नहीं है। तब मुझे मुड़ना पड़ा और पूछना पड़ा कि कट क्या होता है। कट मतलब किसी की शक्ल अच्छी नहीं है। सब के सब सांवले भी हैं। लेकिन मेरे नाती की शक्ल भैया बहुत अच्छी है। सही कह रही हूं लगता है अंग्रेज़ ही आ गया है। तो अब ठीक है न। सास तंग तो नहीं करेगी बेटी को। नहीं अब नहीं करेगी।

तब होगा भगत सिंह का सच्‍चा सम्‍मान

पाकिस्तान ने बड़े समय बाद एक अच्छा काम किया है। शहीदे आजम भगत सिंह को हमारे देश में आदर्श की तरह पूजा जाता है और पाकिस्तान का आवाम भी उनको उतनी ही इज्जत देता है। वहां भी उनको अंग्रेजों के शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाला नायक माना जाता है। शहीद भगत सिंह की ज्यादातर यादें पाकिस्तान से जुड़ी हुई हैं। उनको फांसी भी लाहौर जेल में दी गई थी। जिस जगह पर उनको फांसी दी गई थी, वह उनके चाहने वालों के लिए काफी महत्वपूर्ण जगह है और उनकी इस जयंती पर उनके भारत के चाहने वालों को हालांकि वहां जाकर अपने नायक को श्रद्धासुमन अर्पित करने का सपना वीजा न मिलने के कारण पूरा नहीं हो पाया लेकिन इसके बाद पाकिस्तान के अफसरों ने उस लाहौर चौक का नामकरण भगत सिंह चौक करने की घोषणा कर एक अच्छा कदम उठाया है।



कार्टून दो अक्‍टूबर का ...


गाँधी जी की पृथ्वी लोक की यात्रा ....
गाँधी जी काफी दिनों से परेशान थे की स्वतंत्रता के बाद से उनहोंने अपने सपनों के भारत को नहीं देखा है तो उन्होंने विचार किया की जन्मदिन के दिन अपने स्वप्नों के भारत को वे जरुर देखने जायेंगें .
वे देवलोक से धरती लोक की और निकल पड़े . सबसे पहले वे एक सभा में पहुंचे जहाँ उनका जन्मदिन मनाया जा रहा था . वहां उन्होंने देखा की कई नेता कई रंगों की तरह तरह टोपी पहिने बैठे हैं . कोइ सफ़ेद रंग की कोई पीले रंग की तो कोई नीले रंग की टोपी पहिने बैठे हैं . गाँधी जी को बिलकुल अच्छा नहीं लगा की नेताओं ने उनकी गाँधीवादी टोपी को कई रंगों में रंग दिया है और रंगों के हिसाब से अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं और जी भर कर एक दूसरे को कोस रहे हैं .
हिंसां नहीं करेंगें . देश में रामराज्य लायेंगें और गांधीजी के सिद्धांतों पर उन्होंने चलने का संकल्प लिया .  एक सांसद ने यहाँ तक कह डाला की वे सांसद नहीं हैं जन प्रतिनिधि नहीं हैं निर्वाचित माफिया हैं .


आखिर यह हैपैटाइटिस है क्या ?
पिछले लेख आयुर्वेद में हैपैटाइटिस कहलाती है - का शेष........................
इस बात से यह सिद्ध हो जाता है कि यकृत हमारे शरीर का अति महत्व पूर्ण अंग है और जब यह इतनी मेहनत करता है तो यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम इसकी देखभाल ध्यान से करें।
अब सवाल उठता है कि इतनी सारी बात बताने पर भी यह तो मालूम ही नही पड़ा कि आखिर यह हैपैटाइटिस है क्या ? तो भइया हैपैटाइटिस यकृत का एक सामान्य रोग है जिसमें यकृत के कोशों में प्रदाह या जलन से यकृत की कोशिकाऐं लगातार क्षतिग्रस्त होती रहती है जिससे यकृत में कमजोरी आ जाती है फलस्वरुप यकृत की क्रियाविधि धीमी हो जाती है या फिर विकृत हो जाती है।और यही अवस्था अगर वहुत समय तक वनी रहे तो यकृत में कड़ा पन आ जाता है।इम्यून सिस्टम खराव हो जाता है ।

 


गांधी संग्राहलय में एक दिन ...

"आने वाली पीढ़ी को शायद ही यह यकीन होगा कि गांधी जैसा  भी कोई हाड़-मांस का पुतला इस धरती पर चला होगा" यह कथन विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने गांधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर कहे थे. इस वैज्ञानिक के द्वारा कहे गए ये शब्द आज सच लगते हैं.
हाल ही में मेरा और मेरी एक मित्र का राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय में जाना हुआ. संग्रहालय में प्रवेश से पहले शान्ति देख लगा की बड़ा अनुशासन है. प्रवेश द्वार पर पर एक सन्देश लिखा था - "सत्य ही ईश्वर है". अन्दर जाकर पता चला की इतनी बड़ी जगह पर दर्शकों के नाम पर सिर्फ हम दोनों ही हैं.


मीडिया जिम्मेदार कब होगी ?

मैं देख रहा हूं कि आज मीडिया पर लोगों का भरोसा कम होता जा रहा है। वैसे तो इसकी कई वजह गिनाई जा सकती हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अब वक्त आ गया है कि मीडिया भी अपने गिरेबां में झांके, वरना आने वाला कल मीडिया के लिए बहुत खराब खबर लेकर आने वाला है। मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि आज मीडिया में बेईमानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। जब भी किसी मामले का खुलासा होता है, तो मीडिया हाउस की भूमिका पर जरूर उंगली उठती है। मसलन नीरा राडिया का टेप आया तो वहां पत्रकार, अमर सिंह का टेप आया तो वहां भी पत्रकार शामिल थे। शर्मनाक बात तो ये है कि चोरी पकड़े जाने के बाद राजनेताओं से इस्तीफा मांगने वाली मीडिया अपने भीतर झांकने को तैयार ही नहीं है। हालत ये है पत्रकारों में बढ़ती बेईमानी की प्रवृत्ति तो मीडिया को कलंकित कर ही रही है, दूसरी ओर हम पूरे दिन अविश्वसनीय लोगों के साथ घिरे हैं, लिहाजा विश्वसनीयता का संकट भी हमारे साथ है।

अब मुझे आज्ञा दें , वैसे भी इन दिनों तबियत ज़रा नासाज़ चल रही है और अभी पीलिया से उबरने में थोडा समय और लगेगा । आप खूब लिखते रहें , खूब पढते रहें , हम फ़िर मिलेंगे कल आपसे बुलेटिन के नए रंग और रूप , नए तेवर नई शैली के साथ और मिलवाएंगे आपकी सारी खूबसूरत पोस्टों को आप सबसे ही । अपना ख्याल रखें और खुश रहें ।


आपका
अजय कुमार झा

चलते चलते एक पोस्ट अपनी भी ….


गांधी , गांधीवाद , गांधी ब्रांडवाद से गांधी परिवारवाद तक .....


2 अक्तूबर , को अब देश में गांधी जयंती के रूप में पहचान मिल चुकी है , हो भी क्यों न आखिर जिस देश को विश्व का सबसे बडे लोकतंत्र का रुतबा हासिल कराने के लिए , एक अकेले व्यक्ति ने अपने नायाब प्रयोगों और सोच से बिना किसी हिंसा , के विश्व के सबसे बडे जनसमूह को सैकडों वर्षों की गुलामी से आज़ादी दिला कर राष्ट्रपिता का दर्ज़ा ( ओह ! याद आया , अभी हाल ही में एक बच्ची द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के बाद सरकार ने खुलासा किया है कि मोहन दास करमचंद गांधी उर्फ़ बापू को कभी भी आधिकारिक रूप से "राष्ट्रपिता " का दर्ज़ा नहीं दिया गया है ) मिला , और न भी मिला तो भी देश के बापू का जन्मदिन होता है तो ऐसे में ये बिल्कुल ठीक जान पडता है । बेशक अब बहुत सारे कारणों और लोगों की उठती आवाज़ों के बाद इसी दिन जनमे और भारतीय राजनीति में एक और बेहद महत्वपूर्ण शख्स , पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री को भी अब गाहे बेगाहे सरकारी और गैरसरकारी तरीके से याद किया जाता ही है , लेकिन आम लोगों के लिए तो ये दिन यानि दो अक्तूबर , गांधी जयंती यानि वर्ष की तीन पक्की छुट्टियों ..26 जनवरी ,15 अगस्त और 2 अक्तूबर में से एक । दिल्ली जैसे महानगरों में तो चालान कटने के डर से बाज़ार दुकानों के बंद रखने का दिन और हां सबसे अहम तो छूट ही गया ..ड्राई डे ....यानि शराब की सरकारी दुकानों के भी बंदी का दिन , समझा जाए तो बेवडों के लिए एक दिन पहले ही अपने कोटे की बोतलें खरीद कर रख लेने का अल्टीमेटम ।

लेखागार