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शनिवार, 17 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से सुधा सिंह

सुधा सिंह 


मैंने पढ़ा और सीधे यहाँ तक ले आई  ... Meri Jubani (मेरी जुबानी ) - blogger



व्यस्त हूँ मैं

व्यस्त हूँ मैं..
क्योंकि मेरे पास कोई काम नहीं है,
इसलिए व्यस्त हूँ मैं...

काम की खोज में हूँ!
रोजगार की तलाश में हूँ!
रोज दर - दर की खाक छानता हूँ! 
डिग्रीयां लिए - लिए
दफ्तर- दर- दफ्तर भटकता हूँ!
इसलिए व्यस्त हूँ मैं...

मेहनतकश इन्सान हूँ!
पर सिफारिश नहीं है!
दो वक़्त की रोटी की खातिर
कितनी जूतिया घिसी है ,
उनकी गिनती का भी समय नहीं,
इसलिए कि व्यस्त हूँ मैं ...

घरवालों को किया हुआ वादा
भी पूरा नहीं कर पाता हूँ !
देर शाम जब घर की
दहलीज पर पहुंचता हूँ तो
उनके मुख पर एक प्रश्नचिह्न पाता हूँ !
एक मूकप्रतीक बन
स्तब्धता से खड़ा रह जाता हूँ !
और सिर झुकाकर अपनी
लाचारी का परिचय देता हूँ !
मेरे पास किसी को देने के लिए
कुछ भी नहीं है, जवाब भी नहीं है!
इसलिए कि व्यस्त हूँ मैं ..

प्रतिदिन व्याकुलता से किसी
खुशखबरी की प्रतीक्षा करते- करते
उनकी आंखें भी मायूस सी हो जाती हैं !
फिर भी रोज एक नई उम्मीद लिए
मेरे साथ नई भोर
का इंतजार करती हैं !
उन्हीं आशाओं को पूरा करने के लिए
व्यस्त हूँ मैं ..

होली, दिवाली, पर्व, त्योहार
ये क्या होते हैं, इन्हें कैसे मनाते हैं!
मैं नहीं जानता
क्योंकि इनके लिए भी अर्थ लगता है!
उसी अर्थ की खोज में हूँ !
इसलिए व्यस्त हूँ मैं.

सोचा कोई कारोबार या
व्यापार कर लूँ !
पर इस अर्थ ने ही तो
सब अनर्थ कर डाला है !
हर काम में दाम लगता है !
उस दाम की खोज में हूँ !
इसलिए व्यस्त हूँ मैं ..

दिन भर की इस तथाकथित
व्यस्तता के बाद,
जब नींद मुझे अपने पहलू में ले लेती है ,
तो सितारों से उनकी नाराजगी का सबब भी नहीं पूछ पाता! 
इसलिए व्यस्त हूँ मैं..

मेरे जीवन बेमानी नहीं,
उसका कुछ अर्थ है! 
वही अर्थ देने में लगा हूँ!
इसलिए व्यस्त हूँ मैं..

बेरोजगार हूँ तो क्या हुआ? 
सपने बहुत देखे हैं मैंने! 
उन सपनों को साकार करना ही
मेरा मक़सद है!
इसलिए व्यस्त हूँ मैं..


उस घडी का इंतजार मुझे अब भी है।

चाहत तो ऊँची उड़ान भरने की थी।
पर पंखों में जान ही कहाँ थी!
उस कुकुर ने मेरे कोमल डैने
जो तोड़ दिए थे।
मेरी चाहतों पर ,
उसके पैने दांत गड़े थे।
ज्यों ही मैंने अपने घोंसले से
पहली उड़ान ली।
उसकी गन्दी नज़रे मुझपर थम गई।
वह मुझपर झपटने की ताक में
न जाने कब से बैठा था।
न जाने कब से ,
अपने शिकार की तलाश में था।
उसकी नजरों ने,
न जाने कब मुझे कमजोर कर दिया।
डर के मारे मैं संभल भी न पाई ।
पूरी कोशिश की ,
पर जमीन पर धड़ाम से आ गिरी।
फिर मेरा अधमरा शरीर था
और उसकी आँखों में जीत की चमक।
वह कुकुर अपनी इसी जीत का जश्न
रोज  मनाता है।
और अपनी गर्दन को उचका -उचकाकर
समाज में निर्भयता से घूमता है।
मानो उसने कोई विश्वयुद्ध जीत लिया हो।
उसके कुकुर साथी भी ,
इस कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।
और कमजोरों पर ,
अपनी जोर आजमाइश करते हैं।
न जाने ऐसे कुकुरों के गले में ,
पट्टा कब पहनाया जायेगा !
तन के  घाव भले ही भर गए हैं,
आत्मा पर पड़े घाव कब भरेंगे !
क्या वो दिन कभी आएगा कि,
मैं दोबारा बेख़ौफ़ होकर
अपनी उड़ान भर पाऊँगी !
अपने आसमान को
बेफिक्र होकर छू पाऊँगी!
उस दिन-उस घडी का इंतजार
मुझे अब भी है।


शुक्रवार, 16 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा और मस्तो




नाम वाम में क्या रखा है 

चेहरा बहुत कुछ कहता है 
पढ़ते हुए आप मस्त होंगे 
तो कह लीजिये मस्तो  ... 


मस्तो कहते हैं,
"I ‘m Art & Life practitioner!

:::
Urdu Poet hun,Kahaniyan sunata hun..bachhon ko..badon ko..aap storyteller kah sakten hain..Film me Screenplay,Dialogs aur Lyrics likhta hun.Theater me as a Writer, Designer aur Actor kaam karta raha hun , Spiritual Practices se bhi juda hun…aur ye sab jo thoda bahut janta hun unhe padhata bhi hun."


तुम- बारिश !!


तुम टेरेस पर
कुर्सी डाले
पाव रखे
कुर्सी पर..
बारिश देखा करती थी..
:
मैं अंदर
सोफे पे बैठे..
तुमको देखा करता हूँ..
:
और जब
बारिश की बूँदें..
स्लीपर पर पड़ती हैं..
तुम
कुर्सी को पीछे
खींच लिया करती हो !!
:
हाय !
ये बारिश की बूँदें..
तुमको
छूना चाहती हैं..
तुमको
पाना चाहतीं हैं…
आख़िर
किस से..भाग रहे हो ??



कारण

बहुत देर तक सोचता ये रहा मैं
मैं हूँ कौन
मेरी ज़रुरत ही क्या  है
सफऱ
आह ! लंबा सफऱ ये..
बता यार कैसे कटेगा…
मैं ये सोचता…
अनवरत सोचता
तभी आ कर मस्तो ने
मुझको बताया
जो तू जानता है
वो सच
आखरी सच
परम सच
बयानी ही उसकी
तेरी साधना है
उसी के लिए जिस्म तुझको मिला है
मैं तब से लगा हूँ मेरी साधना में


डायरी : 18 जनवरी टेम्पेस्ट के बहाने से


किसी भी नाटक को देखने से पहले क्या अपेक्षाएँ हैं ..ये बहुत साफ़ होनी चाहिए..अमूमन कई बार नाटकों मे बहुत कुछ बुरा होता है लेकिन ऐसा भी नही है की नाटकों मे सब कुछ बुरा हो…
खैर ! समग्र मे भी बुरा करने वाले लोग हमारे और दूसरे शहरों में हैं 😉

शेक्सपियर के नाटक मे क्या कुछ प्रोग्रेसिव है.? अगर नही है तो क्योकार वो लिटरेचर का बड़ा हिस्सा हुआ ये सोचने की ज़रूरत है अगर तमाम लेखकों की माने तो जो प्रोग्रेसिव नही वो बड़ा साहित्य नही…
सो अगर ये बड़ा साहित्य है तो इसे प्रोग्रेसिव होना चाहिए अब हमको इसमे प्रोग्रेसिव होने के एलिमेंट तलाशने होंगे..?नही ??
खैर आप खोजेंगे तो जैसे भगवान मिल जाते हैं इसमें कुछ न कुछ एलिमेंट्स भी मिल जाएँगे…
शेक्सपियर के नाटकों के प्रोग्रेसिव होने के बाधक के रूप में जो मूल समस्या हैं वो जादू-टोना ,भविष्यवकताओं और अंध विश्वास को दर्शाना है.
जो मेरी नज़र में भी है…निश्चित रूप से समाज के वर्ग को उस तरफ़ धकेलती है.
अच्छा सोचा है कभी जादू-टोना ,भविष्यवकताओं और अंधविशवास से होता क्या है ?
हाँ कुछ लोग पैसा गंवाते हैं कुछ लोग पैसा/शक्ति कमातें हैं,पर इन दोषों के साथ ये कुछ देर जीने की या जीते रहने की उम्मीद नही जागतें हैं…?
ये ही ईश्वर के सन्दर्भ मे भी है की,इसके ज़रिए एक औसत दिमाग़ का आदमी कुछ और वक़्त हिम्मत से काट लेता है…वरना तो वो मर गया होता…
हाँ कई बार इसके चक्कर मे पड़ के वो मर अथवा मार भी देता है..पर १ लाख जादू-टोना ,भविष्यवकताओं और अंधविश्वाश मे ऐतबार करने वालों मे से 1 हज़ार के साथ हुआ तो ये फ़क़त 1 % ही है. खैर सही आंकडें क्या है मुझे अथवा आपको भी नही मालूम…पर अगर दिमाग़ नही खुला तो अच्छे या बुरे की समझ ला पाना मुश्किल है पाप और पुण्य समझा पाना आसान है…ये ये करोगे तो दोज़ख़्…ये ये करोगे तो जन्नत…
मैं दलील नहीं दे रहा,बस उनकी नज़र से एक दफा देखना चाहता हूँ
शेक्सपियर के नाटक जीने के कारण और प्रकृति द्वारा जीने के संकेतों को देखने को कहतें हैं..मानवीय संवेदना भावनओं को दर्शातें हैं पर बहुत मोटे तौर पे क्योकि तब से ले के अब तक संवेदनाएँ भावनाएं वो वही हैं पर कॉंप्लेक्सिटी बढ़ गयी है…अलग अलग स्तर पर…वो तमाम बातें एक सतही तौर पे तो असर डालती हैं.
पर सबसे ज़्यादह ड्रमॅटिक एलिमेंट जो मुझे लगता है वो जादू टोना भूत चुड़ैल भविष्यवाणियों वाला लगता है.
क्योकि घटना क्रम,पत्रों और संवादों द्वारा तो थोड़ा सा घटता है पर पूरे ड्रामे का एक बड़ा हिस्सा दर्शकों के भीतर घट रहा होता है उस आदमी के भीतर जो जादू .. और भविष्यवाणियों पे ऐतबार करता है या करना चाहता है क्योकि जीने के बहाने खोजना चाहता है.
आप इसे सही ग़लत कह सकतें हैं पर पूर्णतया क्या सही ? क्या ग़लत ?
सब अपने अपने पैमाने है..जैसे मेरे पैमाने से ये पूरी तरह ग़लत है…साहित्य में जो है ही नही उसके होने की बात कैसे की जा सकती है..और की जा रही है तो उसे साहित्य की श्रेणी में न गिना जाए..कम अज़ कम मेरी नज़र में…
पर मेरी नज़र आखरी नही है…लोग अपने चश्में से देखेंगे और समझेंगे और वो कह सकतें हैं की हमारी ग्रोथ भी हो रही और हमने जाना भी.
नाटक के साथ शुरू से ले के आज तक दूसरों की विचारधारा ,सोच हावी रही है सो उनको पोषित करने के लिए लिखे गये…
जैसे शेक्सपियर के नाटक भी..विशेष वर्ग और सोच को पोषित कर रहे थे…या भारत के आदि नाटक भी जो भारत मुनि के निर्देशन मे हुए वो भी..समुद्रमंथन पूरा पूरा एक विशेष वर्ग को पोषित करता हुआ है…पात्र सुर और असुर हों…और कुछ साझा देवता और जति ..
मुझे तो ये अजीबो ग़रीब कथा लगती है..
ऐसा लगता है दो जातियों ने जिनमे गोरे और काले लोग थे.(आप जानते ही होंगे ऋघ्वेद के भी कुछ ऋषि काले भी थे) समुद्रमंथन के उपमा है कोई मुश्किल काम को अंजाम देने के लिए…
नाग जातियों की मदत से (ख़ास उनके राजा शेषनाग)…पूरे भारत मे लूटमार किया..जो बेशकीमती चीज़ें मिली उसे दोनो लोग बाँटते चले गये.गोरे लोगों ने इसमे ज़्यादह शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त किया और इसमे हलाहल भी असुरों के देवता (सुरों द्वारा भी पूजनीय) के हिस्से आया…खैर !
इस नाटक को भारत मुनि ने ईमानदारी से नही लिख पाए वरना दोनों वर्ग के लोग इसको देख खुश होते…रसस्वादन करते…मेरा बहुत दृढ़ विश्वास है की भारत मुनि का ज्ञान जो नाट्यशास्त्र में है उनका नही दूसरों से लिया हुआ था..अगर उन्होने ये आत्मसात कर लिया होता समुदमंथन जैसा नाटक नही लिखते या लिखते भी तो यूँ लिखते की सुर व असुर दोनों उसका स्वाद ले सकें और आनंद को प्राप्त होते.खैर भारत मुनि और ..शेक्शपियर की बात फिर कभी…
खैर ! अभी मैं बात करूँगा भारतेंदु नाट्य अकादमी मे हुए नाटक तूफ़ान (टेम्पेस्ट) जिसकी परिकल्पना और निर्देशन पार्थो बंधोपाध्याय ने किया था
बी एन ए के स्टूडेंट्स की ये प्रस्तुति थी. निर्देशक ने बहुत कम समय में स्टूडेंट्स के बॉडी पे बहुत काम किया…अभिनय में आने वाले अधिकतर नये लोग अपने शरीर और आवाज़ पे बिल्कुल काम नही करते, पर खुशी है की उनकी बॉडी पे बहुत अच्छे से काम हुआ…शुरुआत मे नाटक 20 मिनट स्लो था ड्रॉप हो रहा था पर उसके बाद बहुत अच्छे से पेस पकड़ा…आर्टिस्ट मे अच्छी एनर्जी थी…संवाद न के बराबर हो तो बतौर अभिनेता और ज़्यादह काम करना होता है उस गैप को भरने के लिए जो सबने बखूबी किया.
कुछ दृश्य बंध बेहद खूबसूरत बन पड़े थे … और कहीं कहीं अद्भुत…पूरी टीम एक दिख रही थी..ये भी अच्छा है..मैने नये छात्रों की पहली प्रस्तुति देखी जो निश्चित रूप से प्रशंसनीय है.
हाँ नृत्य पूरी तरह सिंक्रोनाइज़ नही थे पर काफ़ी हद तक थे…म्यूज़िक कुछ जगह अच्छा…कुछ जगह औसत कुछ जगह बुरा मालूम दे रहा था.और वो चाइनीस मूव और म्यूज़िक दिखने सुन ने मे अच्छा था पर कुछ लोगों का मूड ब्रेक भी कर रहा था.
लव सॉंग और डॅन्स मूव्मेंट भी बहुत सहजता और खूबसूरत तरीके से लोगों ने अदा किया..मुझे कुछ भी फूहड़ या अजीब नही लगा…कुछ मूवमेंट
बेहद खूबसूरत बन पड़े थे…
लाइट भी अच्छी रही इस कारण कई दृश्य अपना असर छोड़ने मे कामयाब रहे.
एक इन्स्टिट्यूट के स्टूडेंट्स के लिए,अभिनय को समझने की तैयारी के अंतर्गत ये बेहद कामयाब और अच्छा नाटक रहा..साफ़ नज़र आ रहा था निर्देशक और स्टूडेंट्स ने बेहद मेहनत की थी…जो रंग लाई…लगभग एक माह की तैयारी में इसे तैयार करना और मूल नाटक के साथ
प्रयोग करते हुए परिकल्पना और निर्देशन के लिए पार्थो बंधोपाध्याय को ख़ास बधाई !
नाटक निश्चित तौर पे लम्बे वक़्त तक याद रखा जाएगा !
बधाई हो ! और भविष्य की शुभकामनाएं !

मंगलवार, 13 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा आशा जी की कलम तक




जीते जी भी रूह निकलती है 
रूह से मिलने के लिए  ... 
अब उसे कविता कहो 
कहानी कहो 
या सरसराती,सिहरती कोई कल्पना  ... 


आदत वृद्धावस्था की


एक किस्सा पुराना 
बारबार उसे दोहराना 
है वृद्धावस्था का
अन्दाज पुराना 
कोई सुने या न सुने 
मजा आता है
उसे जबरन सुनाने में 
अब तो आदत सी
हो गई है 
एक ही बात
दस दस बार
दोहराने की 
हर बात पर अपनी 
मनमानी करने की 
जिद्द ठान लेने की 
सही है की 
मोहर लगा देने की 
कोई हँसे या न हँसे 
खुद ठहाके लगाने की |




पिंजरे में बंद एक पक्षी


कभी स्वतंत्र विचरण करता था ,
चाहे जहां उड़ता फिरता था ,
जीने की चाह लिए एक पक्षी ,
जब पिंजरे में कैद हुआ था ,
बहुत पंख फड़फड़ाए थे ,
खुले व्योम में उड़ने के लिए ,
मन चाहा जीवन जीने के लिए ,
अपनों से मिलने के लिए ,
अस्तित्व अक्षुण्य रखने के लिए ,
पर सारे सपने बिखर गए ,
हो कर इस पिंजरे में बंद ,
मन ने यह बंधन भी,
स्वीकार कर लिया ,
फिर जब भी पिंजरे का द्वार खुला ,
बाहर जाने का मन न किया ,
शायद भय घर कर गया था ,
बाहर रहती असुरक्षा का ,
पर कुछ समय बाद ,
एक रस जीवन जी कर ,
मन में हलचल होने लगी ,
जब दृष्टि पड़ी उसकी,
अम्बर में विचरते पक्षियों पर ,
स्वतंत्र होने की लालसा ,
बल वती पुनः होने लगी ,
भय का कोहरा छटने लगा ,
ऊर्जा का आभास होने लगा ,
हों चाहे जितनी सुविधाएं ,
और बना हो सोने का ,
पर है तो आखिर पिंजरा ही ,
स्वतंत्रता की कीमत पर ,
क्या लाभ यहाँ रहने का ,
अब समय बर्बाद न कर के ,
बंधक जीवन से मुक्ति पा ,
नीलाम्बर में उड़ना चाहे ,
नए नए आयाम चुने ,
उनमे अपना स्थान बनाए ,
जैसे ही पिंजरे का द्वार खुला ,
बिना समय बर्बाद किये ,
उसने तेज उड़ान भरी ,
पास के वृक्ष की डाली पर ,
बैठ स्वतंत्रता की खुशी में ,
एक मीठी सी तान भरी |

रविवार, 11 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग फेसबुक ब्लॉग अन्तर सोहिल



उड़ते उड़ते पहुँचती है मेरी रूह 

जाने कहाँ कहाँ 
पढ़ती है 
समेटती है 
और आपके पास आ जाती है


अन्तर सोहिल

विचार बहुत आते हैं, लेकिन जब लिखने बैठता हूँ तो शब्द खो जाते हैं। उचित शब्दों की कमी और वाक्य-विन्यास के बिना सभी भाव बिना अभिव्यक्ति के रह जाते हैं, जैसे उमड-घुमड कर बादल बिना बरसे चुपचाप लौट जाते हैं। अच्छे लगते हैं वो जो मेरी कमियां, खामियां, गलतियां मुझे बताते हैं।



मौत की खबर लोगों को क्षणभर के लिये दार्शनिक बना देती है


जब से जापान में सुनामी और भूकम्प आया है, हर आदमी की जुबान पर इसी के चर्चे हैं। और अब जापान के परमाणु संयंत्रों के बारे में चिंता कर रहा है। रेल का दैनिक यात्री होने के कारण प्रतिदिन 2-4 नये लोगों को सुनना-बोलना हो जाता है। हर यात्री व्यापारी हो या मजदूर, सरकारी अफसर हो या किसी दुकान का कर्मचारी राजनीति, मौसम को छोडकर इसी बात से अपनी बात शुरु कर रहा है। और बात चलते-चलते आखिर में दर्शन-शास्त्र पर पहुँच जाती है। हर आदमी दार्शनिक हो जाता है। जैसे शमशान में चिता जलते देखकर या कब्रिस्तान में दफनाते वक्त आत्मा-परमात्मा की बातें करता है। यही एक बात कि - "खामख्वाह लोग इतनी भाग-दौड करते हैं, किस लिये लोग सारी उम्र जोड-तोड करते हैं, जिन्दगी का कुछ भरोसा नहीं है, सबकुछ ऊपरवाले के हाथ में है….…आदि-आदि। 
लेकिन क्या सचमुच ये बातें उनके हृदय से निकली होती हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। एक आदमी भी ऐसा नहीं है, जो इतनी दार्शनिक बातें करके रिश्वत लेना, टैक्स चोरी या लडाई-झगडा छोडकर शांति और ईमानदारी से जीवन-यापन करना शुरु कर दे।  



मैनें तुम्हारा ठेका नही ले रखा है


गाजर का हलवा, समोसे, गुलाब जामुन और पकौडों का लुत्फ उठा रही 5-6 औरतों में उसकी बूढी आंखों ने छोटी बहू को पहचान लिया।
बहू मेरे लिये खिचडी बन गई है क्या?
ओहो, तुम्हें तो भूख कुछ ज्यादा ही लगती है। अभी तो तुम्हें चाय और ब्रेड दी थी।
बेटा, चाय मैनें चार बजे पी थी, अब तो साढे आठ बज रहे हैं, थोडी सी खिचडी खा लूं तो नींद आ जायेगी।
तुम्हें दिखाई नही दे रहा है, मेरे मेहमान आये हुये हैं। आज मेरी शादी की सालगिरह है, कम से कम एक दिन तो चैन से बैठने दो।
बेटा, ये नाश्ता पानी तो चलता रहेगा। मैं तो इसलिये पूछ रही थी कि अगर खिचडी बन गई है तो अपने-आप ले कर खा लूंगी और तुम्हें भी बीच में उठना नही पडेगा।
पता नही क्यों तुम मेरे पीछे पडी रहती हो, और भी तो बेटे-बहुएं हैं। कभी-कभार उनसे भी कह दिया करो, मैनें कोई तुम्हारा ठेका नही ले रखा है।
बुढिया इतना सुनते ही चुपचाप अपनी कोठरी में जा कर लेट गई।
कानों में छोटी बहू के स्वर पिघले शीशे की तरह गिरते जा रहे हैं। "बुढिया पता नही कितना खाती है, दिन पर दिन जीभ चटोरी होती जा रही है। सारा दिन इसकी फरमाईशें पूरी करते रहो, काम की ना काज की सेर भर अनाज की"  
गीली आंखों से छत को देख रही है। जितना मुझसे बनता है, उतना तो घर की साफ-सफाई, बर्तनों और कपडे तह करने के काम कर ही देती हूं। एक-एक कर तीनों बडी बहुओं ने उसे "मैनें कोई तुम्हारा ठेका नही ले रखा है" कहकर हाल-चाल भी पूछना छोड दिया है। महिने के एक दिन इस कोठरी में बच्चों और बहुओं का आना और बातें करना उसको खुशियों से भर देता है। उस दिन जब वह अपनी पेंशन के 700 रुपये ले कर आती है और सब बच्चों को मिठाईयां और बहुओं को 100-100 रुपये देती है।   
बेटा काम पर से लौटा नही है। दोनों बच्चे ऊपर वाले कमरे में पढ रहे हैं। बिना बच्चों और पति के शादी की सालगिरह केवल सहेलियों के साथ मनाई जा सकती है क्या?

शनिवार, 10 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा और अंशुमाला



रूहानी यात्रा में रूह ने रूह से पूछा,

तू कौन है ?
क्या उद्देश्य है तेरा ?
उसने कहा - 
मेरे ब्लॉग का नाम है 

mangopeople - blogger

मैंगो पीपल यानी हम और आप वो आम आदमी जिसे अपनी हर परेशानी के लिए दूसरो को दोष देने की बुरी आदत है . वो देश में व्याप्त हर समस्या के लिए भ्रष्ट नेताओं लापरवाह प्रसाशन और असंवेदनशील नौकरशाही को जिम्मेदार मानता है जबकि वो खुद गले तक भ्रष्टाचार और बेईमानी की दलदल में डूबा हुआ है. मेरा ब्लाग ऐसे ही आम आदमी को समर्पित है और एक कोशिश है उसे उसकी गिरेबान दिखाने की.  ... "

यानि सत्य की तहें खोलने की !!! अंशुमाला कहूँ या आइना ?
चलिए आपसब तय कीजिये,

इसे कहते है बेटी के लिए अच्छा रिश्ता - - - - - - - - - - mangopeople


पंडित जी ने जैसे ही अपनी तशरीफ़  सोफे में घुसाई अशोक जी की पत्नि शुरू हो गई " पंडित जी कोई अच्छा रिश्ता बताइये इस बार जो हमारे हैसियत और रुतबे के बराबर का हो हमारी तरह ही इज्जतदार सम्मानित हो समाज में | "
" ये पहला लड़का है आबकारी विभाग में बड़ा आफिसर है पिछले साल ही आयकर विभाग का छापा पड़ा था पुरे पचास लाख रुपये कैश बीस लाख के गहने और दो मकान बाहर आये थे " पंडित जी ने फोटो आगे बढ़ाते हुए कहा |
 ये सुनते ही अशोक जी के चहरे पर गुस्सा साफ दिख गया " क्या पंडित जी आप भी कैसे कैसे रिश्ते उठा लाते है कुछ हमारी इज्जत का भी ख्याल रखा कीजिये अब क्या हमारे ऐसे दिन आ गए है की हम अपनी बेटी का विवाह ऐसे घरो में करे दुनिया को क्या मुँह दिखायेंगे, लोगो को क्या जवाब देंगे, हम अपनी बेटी को ऐसे घर में नहीं भेज सकते है | हम उससे प्यार करते है उसके दुश्मन थोड़े ही है " अशोक जी एक साँस में सब बोल गये |
 " तो फिर जजमान ये दूसरा रिश्ता देखिये ये आप को जरुर पसंद आयेगा | बिल्कुल आप के हैसियत के बराबर का है , लड़का कस्टम में बड़ा आफिसर है पिछले साल रेड में इसके पास से दो करोड़ नगद अस्सी लाख के गहने पांच करोड़ की जमीन और चार बंगले मिले थे "
 ये सुनते ही अशोक जी की चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई " वाह पंडित जी इसे कहते है बेटी के लिए अच्छा रिश्ता आप फटा फट मेरी बेटी की बात यहाँ चलाइये और ये लीजिये मेरी लिस्ट की जब हमारे यहाँ रेड पड़ी थी तो क्या क्या मिला था आयकर विभाग को, लडके वालो को दे दीजियेगा वो भी समझ जायेंगे की हम भी हैसियत में उनसे कम नहीं उनके बराबर है "


कही अनजाने में आप अपने शब्दों से बलात्कार पीड़ित का दर्द तो नहीं बढ़ा रहे है - - - - - - mangopeople
                                   

                            समय के साथ हम सभी ने समाज की कई गलत पुरानी मान्यताओं और सोच को पीछे छोड़ा है और एक नई सोच को बनाया है  उसे अपनाया है | ये देख कर अब अच्छा लगता है की समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो किसी बलात्कार पीड़ित नारी को दोषी की नजर से नहीं देखते है और उसके प्रति सहानुभूति रखते है , मानते है की इस अपराध में उसका कोई दोष नहीं है और उसे फिर से खड़े हो कर अपना नया जीवन शुरू करना चाहिए | मीडिया से ले कर हम में से कई लोगों ने उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए और अपराधियों को सजा दिलाने के लिए आवाज़ उठाई और काफी कुछ लिखा है | पर क्या उनके पक्ष में लिखते और बोलते समय हमने कभी इस बात पर ध्यान दिया है की हम अनजाने में वो शब्द लिखते और बोलते जा रहे है जो पीड़ित के मन में और दुख पैदा कर सकता है उसे फिर से खड़ा होने से रोक सकता है और उसके लिए सजा जैसा हो जायेगा | 
                          जी हा कई बार जब हम इस विषय पर लिखते है तो कुछ ऐसे शब्द और वाक्य भी लिख देते है जिससे कुछ और  ध्वनिया  और अर्थ भी निकलते है | जैसे बलात्कार पीड़ित के लिए हम " उसकी इज़्ज़त लुट गई", " उसकी इज़्ज़त तार तार कर दी " या "उसे कही मुँह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा " जैसे वाक्य लिख देते है | क्या वास्तव में ऐसा ही है कि जिस नारी के साथ बलात्कार हो वो हमारे आप के इज़्ज़त के काबिल ना रहे क्या हम उसे उसके साथ हुए इस अपराध के बाद कोई सम्मान नहीं देंगे क्या वास्तव में वो समाज के सामने नहीं आ सकती, लोगों से नज़रे नहीं मीला सकती है लोगो को अपना मुँह नहीं दिखा सकती | मैं यहाँ ये मान कर चल रही हुं कि हम में से कोई भी ऐसा नहीं सोचता होगा फिर हम इन शब्दों का प्रयोग क्यों करते रहते है और पीड़ित को और दुखी कर देते है उसमे ग्लानी भर देते है | 
               एक बार पीड़ित के तरफ से सोचिये की उस पर उसके लिए लिखे इस शब्दों का क्या असर होगा या ये कहे की उसने तो ये सारे शब्द पहले ही सुन रखे होंगे और उसके साथ हुए इस अपराध के बाद जब वो इस शब्दों को खुद से जोड़ेगी तो उस पर कितना बुरा असर होगा | यही कारण है की कई लड़कियाँ अपने साथ इस तरह के अपराध होने के बाद इस ग्लानी में कि अब उनकी इज़्ज़त लुट गई है उनका कोई सम्मान नहीं करेगा वो कही मुँह दिखाने के काबिल नहीं रही वो परिस्थिति से लड़ने के बजाये आत्महत्या कर लेती है |  
                 ये ठीक है की ये शब्द हमने नहीं बनाये है ये काफी समय पहले से बनाये गए है | रेप के लिए ये शब्दों तब बनाये गए जब समाज की सोच वैसी थी जब समाज इसके लिए कही ना कही स्त्री को ही ज्यादा दोषी मानता था और इस अपराध के बाद उसे अपवित्र घोषित कर दिया जाता था उसे समाज में अलग थलग करके उसे भी सजा दी जाति थी | लेकिन अब हमारी सोच बदल गई है हम मानते है ( कुछ अब भी नहीं मानते ) की इसमे पीड़ित का कोई दोष नहीं है दोष तो अपराध करने वाले का है और सजा उसे मिलनी चाहिए ना की पीड़ित को | जब हमने ये सोच त्याग दिया है तो हमें इन शब्दों को भी त्याग देना चाहिए जो कही ना कही पीड़ित को ही सजा देने वाले लगते है | कुछ शब्दों को हमने पहले ही त्याग दिया है जैसे उन्हें अपवित्र कहना पर अब हमें इस शब्दों को भी त्याग देने चाहिए | ताकि किसी पीड़ित को ये ना लगे की उसने कोई अपराध किया ही य समाज उसे सज दे रह है या वो सम्मान के काबिल नहीं रही | जब ये ग्लानी अपराधबोध नहीं होगा तो उसे अपने दर्द से बाहर आने में और एक नया जीवन शुरू करने में आसानी होगी | 
आशा है मेरी बात सभी पाठक सकारात्मक रूप से लेंगे यदि मेरी सोच में कही कोई गलती हो तो मेरा ध्यान अवश्य दिलाइयेगा मैं उसमे अवश्य सुधार करुँगी और यदि इस मामले में आप की भी कोई राय है तो मुझे अवगत कराये |

शुक्रवार, 9 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा और नीरज गोस्वामी



सच कहूँ तो कुछ ब्लॉग्स पर मुझे भी गए एक ज़माना सा गुज़रा 
पर सच यह भी है कभी उनका पता नहीं भूली 

नीरज गोस्वामी जी मेरे ब्लॉग लेखन के शुरूआती दौर के सहयात्री हैं, जिनको मैंने खूब पढ़ा, आज उसी पते पर हूँ, आइये मेरे साथ आप सब भी एक बार मिलिए :)


अपने ब्लॉग पर तब इन्होंने लिखा था,
"अपनी जिन्दगी से संतुष्ट,संवेदनशील किंतु हर स्थिति में हास्य देखने की प्रवृत्ति.जीवन के अधिकांश वर्ष जयपुर में गुजारने के बाद फिलहाल भूषण स्टील मुंबई में कार्यरत,कल का पता नहीं।लेखन स्वान्त सुखाय के लिए."


भलाई किये जा इबादत समझ कर


सितम जब ज़माने ने जी भर के ढाये
भरी सांस गहरी बहुत खिलखिलाये

कसीदे पढ़े जब तलक खुश रहे वो
खरी बात की तो बहुत तिलमिलाये

न समझे किसी को मुकाबिल जो अपने
वही देख शीशा बड़े सकपकाये

भलाई किये जा इबादत समझ कर
भले पीठ कोई नहीं थपथपाये

खिली चाँदनी या बरसती घटा में
तुझे सोच कर ये बदन थरथराये

बनेगा सफल देश का वो ही नेता
सुनें गालियाँ पर सदा मुसकुराये

बहाने बहाने बहाने बहाने
न आना था फिर भी हजारों बनाये

गया साल 'नीरज' तो था हादसों का
न जाने नया साल क्या गुल खिलाये



आप भी तो अब पुराने हो गये



दूर होंठों से तराने हो गये 
हम भी आखिर को सयाने हो गये 

यूं ही रस्ते में नज़र उनसे मिली 
और हम यूं ही दिवाने हो गये 

दिल हमारा हो गया उनका पता 
हम भले ही बेठिकाने हो गये 

खा गई हमको भी दीमक उम्र की 
आप भी तो अब पुराने हो गये 

फिर से भड़की आग मज़हब की कहीं 
फिर हवाले आशियाने हो गये 

खिलखिला के हंस पड़े वो बेसबब 
बेसबब मौसम सुहाने हो गये 

आइये मिलकर चरागां फिर करें 
आंधियां गुजरे, ज़माने हो गये 

लौटकर वो आ गये हैं शहर में 
आशिकों के दिन सुहाने हो गये 

देखकर "नीरज" को वो मुस्का दिये 
बात इतनी थी, फसाने हो गये

रविवार, 4 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा अंकिता चौहान



जहाँ परियों का मेला हो 
जहाँ एहसासों की नदियाँ बहती हों 
जहाँ शब्दों के स्रोत हों 
वहाँ मैं अपनी चाहत न पूरा करूँ 
यह कैसे संभव है ?!

चाह है तो राह है, अंकिता चौहान हैं :)




https://www.youtube.com/watch?v=CwXHJsGBwLo

शनिवार, 3 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा अनुलता राज नायर की कहानियों के मध्य



श्रोताओं के बगैर इनकी कहानियों का कोई मूल्य नहीं, श्रोता न हों, पाठक ना हों तो एहसास अंचार ही तो बनेंगे  न और  क्या ?   ............. 

इनका ब्लॉग है, जहाँ इन्होने अपनी खातिर एक रास्ता बना लिया है !



आपके सामने है मेरे दिल का एक पन्ना ....
धीरे धीरे सारी किताब पढ़  लेंगे...तब जान भी जायेंगे मुझे....कभी  चाहेगे...कभी नकारेंगे... यही तो जिंदगी है...!!!


अपनी जिंदगी के साथ बड़ी बद्सलूकियाँ की मैंने...कभी कहा नहीं माना उसका.तंग करती रही उसको सदा......नयी नयी चुनौतियां देती रही .
उसके प्रति क्रूरता शायद मेरा स्वभाव बन गया था...और नियमों को तोडना मेरी आदत.
ऐसी विचित्र हरकतें करती मैं खुद कौन सा सुखी थी..आखिर जिंदगी मेरी थी..जब उसे चैन नहीं तो मुझे कहाँ चैन मिलता???
मगर बहुत हुआ अब!!जिंदगी को तंग किया सो किया...अब मौत को ज़रा ना सताऊंगी.जिस रोज देगी दस्तक,उसी पल बिना गिला-शिकवा किये  चल दूँगी उसके साथ.
जिंदगी को आखरी शिकस्त देने का ऐसा सुनहरा मौका मैं  चूकुंगी भला!!!!

-अनु


और हमने वहाँ का सीधा रास्ता चुना है कुछ यूँ  ... 
रुकिए तो सही,
सुनिए तो सही 



शुक्रवार, 2 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा का एक पड़ाव नीलेश मिश्रा


नीलेश मिश्रा हों या कोई भी ब्लॉगर या रचनाकार, उनका परिचय मैं भला क्या दूँगी 
मेरी रूह तो बस प्रशंसक है 
और अथक पाठक !




इस रूहानी यात्रा में एक ही बात ज़ेहन में आती है -
"तालियाँ हम बटोर न सके समझदारों की भीड़ में 
शायद इसीलिए खामोशियाँ सुनने की आदत सी हो गई  ..."(रश्मि प्रभा)

आइये, आज हम नीलेश जी की कलम से परिचय बढ़ाते हैं -


एक कहानी और मैं ज़िद पे अड़े
========================

एक कहानी और मैं
 ज़िद पे अड़े
 दोनों में से कोई ना
 आगे बढ़े
वो है कहती क्या समझता
 ख़ुद को तू?
 मैं नहीं तो क्या है तू
 ऐ नकचढ़े?
वो ये चाहे अपनी किस्मत
ख़ुद लिखे
मैंने बोला देखे तुझ
जैसे बड़े
है क़लम मेरी, मैं जो
चाहे लिखूं!
मेरी मर्ज़ी, जिस तरफ ये
चल पड़े!
झगड़ा ना सुलटेगा लगता
सारी रात
देखते हैं होगा क्या जब
दिन चढ़े
हैं हज़ार-एक लफ्ज़ लिख के
हम खड़े
एक कहानी और मैं
ज़िद पे अड़े



हमारे मन के कमरे में
==============


हमारे मन के कमरे में,
यूँ इक मंज़र अनोखा हो
हवा की तेज़ लहरें हों, 
कहीं पानी का झोंका हो 
और इक लम्हे की कश्ती पे, 
कुछ इस तरहा तू बैठी हो 
वही मेरी हकीकत हो, 
वही नज़रों का धोखा हो 
हमारे मन के कमरे में, 
यूँ इक मंज़र अनोखा हो …


इसके साथ ये है उनका यू ट्यूब पर उनके शोज का एक अनोखा अंदाज - इस लिंक के सहारे आप उनसे मिलते जायेंगे 
......

मंगलवार, 30 मई 2017

मेरी रूहानी यात्रा पवन कुमार के ब्लॉग पर


निकले एहसासों के सफर में 
तो जाना 
कलम जब मूर्तिकार बने 
कैनवस पर कोई चित्र उकेरे 
तो उस कलम की बात ही कुछ और हो जाती है 
यायावर की शक्ल लिए 
कई मील के पत्थर बटोर लाता है  ... 

मेरा फोटो
"जो भी जीता हूँ वही लिखता हूँ . हर एक लम्हा जीने की ख्वाहिश ........ उसे भोगने की चाहत है. जिंदगी को नए मायने देने की किसी कोशिश-मशक्कत में हूं . इसी कवायद के बीच में आप सबसे मुखातिब होता रहता हूं अपने एहसासों को लेकर - अपने भोगे हुए सच के साथ"


आमद कुबूल करें......


इधर काफी दिनों तक गायब रहा. सच कहूँ तो वक्त नही मिला कुछ लिख पाने का ...मन लगातार करता रहा कि कुछ लिखूं. व्यस्तता ने जैसे व्यक्तिगत जिंदगी के सारे लम्हे छीन लिए बहरहाल अब ब्लॉग पर आमद कर चुका हूँ...
इधर बीते पन्द्रह दिनों में जो दो महत्त्वपूर्ण बातें रहीं ,वे थीं निजामी बंधुओं के कव्वाली प्रोग्राम और अमिताभ दास गुप्ता का नाटक " नयन भरी तलैया" देखने का अवसर मिला.
पहले निजामी बंधुओं पर चर्चा. निजामी बंधुओं की कव्वाली देखने में बड़ा मज़ा आया .भारत की गंगा जमुनी संस्कृति के उस्ताद शायर आमिर खुसरो,बाबा बुल्ले शाह से लेकर समकालीन शायरों जैसे राहत इन्दौरी और बशीर बद्र के शेरों को चुनकर उन्हें कव्वाली में पिरोकर इस खूबसूरती के साथ सुनाया कि हम लगातार वाह वाह करते रहे. मेरे प्रिय शायर आमिर खुसरो साहेब की आल टाइम लीजेंड "मोसे नैना लड़ाए के" तो सुनकर मज़ा आ गया. " मेरे मौला जिसपे तेरा करम हो गया, वो सत्यम शिवम् सुन्दरम हो गया" से आगाज़ करने वाले निजामी भाइयों ने महफ़िल लूट ली.ये गायक निजामी भाइयों के नाम से जाने जाते हैं. ये गायक बंधु सिकंदर घराने से ताल्लुक रखते हैं. यह घराना बीते 700 सालों से कव्वाली गायकी में लगा हुआ है.यह घराना हज़रात निजामुद्दीन और खुसरो साहेब के दरबारी गायकी से सम्बन्ध रखता है सूफी कव्वाली को "कौर तराने " से शुरुआत करते हैं . यह तकनीकी बात मुझे इसी कार्यक्रम में जाकर मिली . हमारे दोस्तों कि मांग पर उन्होंने महान गायक नुसरत फतह अली खान की गई कव्वाली "अल्लाह हूँ, अल्लाह हूँ" तथा ऐ आर रहमान की कम्पोज़ "मौला मेरे मौला" भी सुनाई. अब जबकि लगातार पुराणी संस्कृति से कलाकार दूर हिते जा रहे हैं ऐसे में विगत ७०० सालों की शानदार परम्परा को निभा रहे निजामी बंधुओं की गायकी और उनके हौसले को देखकर अपनी गंगा जमुनी संस्कृति पर हमें गर्व होना स्वाभाविक है.
अमिताभ दास गुप्ता का नाटक " नयन भरी तलैया" देखने का अवसर मिला. यह नाटक सत्ता और आम आदमी के बीच कि दूरी और उनकी प्राथमिकताओं को दर्शाता था. कहानी कुछ इस तरह थी कि एक राज्य में सूखा पड़ा हुआ है तालाब-नदी -पोखर सभी सूख चुके हैं. राजा- रानी इस सबसे बेखबर हैं. अपनी शानो-शौकत की जिंदगी बसर कर रहे हैं. उधर एक गाँव में सुखनी नाम की एक एक लड़की गाँव में एक कुआँ खोदने वाले एक आदमी से प्यार करती है. इसी बीच राजा के दरबार में एक साधू आता है और बताता है कि सूखा से तभी निपटा जा सकता है कि जबकि राज परिवार का कोई सदस्य कुएं में कूद कर अपनी जान दे दे...तब जोर से पानी बरसेगा.....राज परिवार में कोई भी अपनी जान देने को तय्यार नही होता है....रानी तब अपनी कुटिल बुद्धि से राजा को एक उपाय सुझाती है कि क्यों न अपने सबसे छोटे तीसरे पुत्र कि शादी किसी गाँव की लड़की से कर दें और उसको कुएं में कुदा दें इससे राज परिवार भी बच जायेगा और सूखे कि समस्या से भी निपटा जा सकेगा. राजा को यह विचार पसंद आ जाता है और लड़की खोजी जाती है अंतत लड़की सुखनी ही मिलती है.........उससे राजकुमार की शादी की जाती है,और उसे कुएं में धकेला जाता है.....एक दर्द भरा एंड इस नाटक का होता है जो यह सोचने पर विवश करता है कि सत्ता अपने स्वार्थ के लिए किस कदर अंधी हो जाती है... नाटक के सभी पात्र काफी गुंथे हुए थे. लगभग डेढ़ घंटे का यह नाटक शिखर और धरातल के बीच की खाई को स्पष्ट समझा गया.

और फिर गायब हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए 

रविवार, 28 मई 2017

मेरी रूहानी यात्रा में सुशील कुमार जोशी




नदी किनारे कांटे में मछली फंस ही जाये, ज़रूरी नहीं  .. फिर भी जीवन यापन के लिए मछुआरा अपने कार्य से मुँह नहीं मोड़ता 
वह नियम से नदी के किनारे जाता है, 
मछली फंसेगी, इस उम्मीद में काँटा डालता है 
उसकी यही हार नहीं मानने की प्रक्रिया 
उसे एक दिन सफलता देती है  ... 

........ 
ठीक इस मछुआरे की तरह भावनाओं का यात्री अपनी कलम से लिखता जाता है समाज, देश, जीवन, दर्द  ... दूसरे के लिखे को उतनी ही तन्मयता से पढता भी है, अपने विचारों से उसे अवगत भी कराता है, बिना किसी उम्मीद के ! वह शुक्रगुजार है हर हाल में , ऐसी विशेषता के साथ हैं सुशील कुमार जोशी, जिनका ब्लॉग है 

उलूक टाइम्स



दो सप्ताह से व्यस्त 
नजर आ रहे थे 
प्रोफेसर साहब 
मूल्याँकन केन्द्र पर 
बहुत दूर से आया हूँ 
सबको बता रहे थे 
कर्मचारी उनके बहुत ही 
कायल होते जा रहे थे 
कापियों के बंडल के बंडल 
मिनटों में निपटा रहे थे 
जाने के दिन जब 
अपना पारिश्रमिक बिल 
बनाने जा ही रहे थे 
पचास हजार की 
जाँच चुके हैं अब तक 
सोच सोच कर खुश 
हुऎ जा रहे थे 
पर कुछ कुछ परेशान 
सा भी नजर आ रहे थे 
पूछने पर बता रहे थे 
कि देख ही नहीं पा रहे थे 
एक देखने वाले चश्में की 
जरूरत है बता रहे थे 
मूल्याँकन केन्द्र के प्रभारी 
अपना सिर खुजला रहे थे 
प्रोफेसर साहब को अपनी राय 
फालतू में दिये जा रहे थे 
अपना चश्मा वो गेस्ट हाउस 
जाकर क्यों नहीं ले आ रहे थे 
भोली सी सूरत बना के 
प्रोफेसर साहब बता रहे थे 
अपना चश्मा वो तो पहले ही
अपने घर पर ही भूल कर 
यहाँ पर आ रहे थे 
मूल्याँकन केन्द्र प्रभारी 
अपने चपरासी से 
एक गिलास पानी ले आ 
कह कर रोने जैसा मुँह 
पता नहीं क्यों बना रहे थे !


वैसे कुत्ते 
के पास 
मूँछ है 
पर 
ध्यान में 
ज्यादा रहती 
उसकी 
टेढ़ी पूँछ है 

उसको 
टेढ़ा रखना 
अगर 
उसको 
भाता है 
हर कोई 
क्यों उसको 
फिर 
सीधा करना 
चाहता है 

उसकी 
पूँछ तक 
रहे बात 
तब भी 
समझ 
में आती है 
पर 
जब कभी 
किसी को 
अपने सामने 
वाले की 
कोई बात 
पागल 
बनाती है 
ना जाने 
तुरंत उसे 
कुत्ते की 
टेढ़ी पूँछ ही 
क्यों याद 
आ जाती है 

हर किसी 
की 
कम से कम 
एक पूँछ 
तो होती है 

किसी की 
जागी होती है 
किसी की 
सोई होती है 

पीछे होती है 
इसलिये 
खुद को दिख 
नहीं पाती है 
पर फितरत 
देखिये जनाब 
सामने वाले 
की पूँछ पर 
तुरंत नजर 
चली जाती है 

अपनी पूँछ 
उस समय 
आदमी भूल 
जाता है 
अगले की 
पूँछ पर 
कुछ भी 
कहने से बाज 
लेकिन नहीं 
आता है 

अच्छा किया 
हमने अपनी 
श्रीमती की 
सलाह पर 
तुरंत 
कार्यवाही 
कर डाली 

अपनी पूँछ 
कटवा कर 
बैंक लाकर 
में रख डाली 

अब कटी 
पूँछ पर कोई 
कुछ नहीं 
कह पाता है 

पूँछ हम 
हिला लेते हैं 
किसी के 
सामने 
जरूरत 
पड़ने पर 
कभी तो 
किसी को 
नजर भी 
नहीं आता है 

इसलिये 
अगले की 
पूँछ पर 
अगर कोई 
कुछ कहना 
चाहता है 
तो पहले 
अपनी पूँछ 
क्यों नहीं 
कटवाता है ।

बुधवार, 24 मई 2017

मेरी रूहानी यात्रा और ललितमोहन त्रिवेदी



ललितमोहन त्रिवेदी

लेखन के बीज तो कच्ची उम्र में ही पड़ गए थे! द्वंद इतना कि पढ़ा विज्ञान ( M.Sc. Physics ) और मन रमा साहित्य में ! रामलीला के काव्यमय संवादों से शुरू हुई यात्रा कालेज तक आते आते मंच की ओर मुड गई !मंच से गहरा लगाव रहा सो गीतनाट्य लिखे, कम्पोज किए और सफलतापूर्वक मंचित भी किए !छंदबद्ध लेखन से जुडाव रहा सो गीत ,ग़ज़ल कविता सभी विधाओं में लिखा साथ ही आलेख और ललित निवंध भी लिखे ! आज लगभग सभी रचनाएं प्रकाशित एवं प्रसारित हैं , परन्तु अपने घोर आलसी और टालमटोल स्वभावके कारण लेखन की मात्रा अल्प ही रही और रही गुणवत्ता ? सो सुधी पाठक जानें क्योंकि मेरा ऐसा परम विश्वाश है कि पाठक ही लेखक का अन्तिम सत्य होता है !और अंततः ...... मेरा सबकुछ है .कुछ ना होने में ! तुम मुझे पड़ा रहने दो कोने में !!

संभव है क्या कि रहने दें एक कोने में ? ... शायद रहने देते यदि आप कुछ लिखते रहते, पर 

अनुरक्ति को देखकर ऐसा नहीं कर सकते !

आपको ही याद दिला रहे आपकी ग़ज़ल  =

ढोते ढोते उजले चेहरे .....( ग़ज़ल )
ग़ज़ल ..........( भूली बिसरी .....)


ढोते ढोते उजले चेहरे, हमने काटी बहुत उमर !
अब तो एक गुनाह करेंगे ,पछता लेंगे जीवन भर !!

वो रेशम से पश्मों वाला, था तो सचमुच जादूगर !
मोर पंख से काट ले गया , वो मेरे लोहे के पर !!

उसको अगर देखना हो तो , आंखों से कुछ दूर रखो !
कुछ भी नहीं दिखाई देगा , आंखों में पड़ गया अगर !!

प्यास तुम्हारी तो पोखर के , पानी से ही बुझ जाती !
किसने कहा तुम्हें चलने को ,ये पनघट की कठिन डगर !!

ज्ञान कमाया जो रट रट कर , पुण्य कमाए जो डरकर !
उसकी एक हँसी के आगे ,वे सबके सब न्यौछावर !!

सिर्फ़ बहाने खोज रहा है , पर्वत से टकराने के !
बादल भरा हुआ बैठा है , हो जाने को झर झर झर !!

और भटकने दो मरुथल में , और चटखने दो तालू !
गहरी तृप्ति तभी तो होगी , गहरी होगी प्यास अगर !!

मंगलवार, 23 मई 2017

मेरी रूहानी यात्रा और दिव्या शुक्ला



कथादेश , जनसत्ता , चौथी दुनिया ,निकट 
और कई पत्र पत्रिकाओं में कवितायेँ 
और कहानियां प्रकाशित हुई


यहाँ रहती है कल्पनाओं और यथार्थ के ताने बाने से बुनी कुछ हंसती , सिसकती कहानियां



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गिद्ध
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नवम्बर का आखिरी हफ्ता चल रहा था और हवा में हल्की सी खुनकी तैरने लगी थी।
अभी ठंड आई तो नहीं थी पर मौसम बहुत खूबसूरत था। खूबसूरत फूलों का मौसम।
मेरा लान भी फूलों से भरा था ।
जान बसती है मेरी इन पौधों में । इनसे बातें करना, इन्हें देखना, हौले से छूना मुझे नई उर्जा से भर देता है । उन दिनों स्वीट पी की बेलें अपने शबाब पर थीं । उस दिन बैगनी सफेद फूल अपनी मादक खुशबू से दिलोदिमाग पर रोमांस की खुमारी भर रहे थे। पी लेना चाहती थी इनकी महक। मैं अपने अंदर सब समो लेना चाहती थी। मैने एक गहरी सांस भर कर आँख मूंद ली थी कि अचानक
मोबाइल बजा। संगीता की काल थी। सेल आन करते ही शुरू हो गई “सुन शाम सात बजे आ जा बस.......। कुछ लोग है ,…….तुझे अच्छा लगेगा ,…..ना नहीं सूनुगी । अरे हाँ , डीके भी आ रहा है। कुछ दिन पहले मिला था क्लब में। मुझसे पूछ रहा था तेरे बारे में। ......अच्छा शाम को मिलते है। ...... तेरी ही वज़ह से सात बजे का टाइम रखा है। दस-ग्यारह तक खतम हो जाएगा सब। कुछ लोग मिलेंगे,,,,तुझे अच्छा लगेगा।‘’
‘’ओके। .....मै आउंगी।‘’ ,फोन कट गया।
मैं सोचने लगी, रिश्तेदारों की अपेक्षा दोस्त कितने करीब होते है कि मन के उस कोने को झाँक लेते है, जहाँ कभी कभी करीबी नाते भी नहीं पहुँच पाते। जिंदगी की तरफ खींच लाते है अच्छे दोस्त। जैसे संगीता मुझे मुझसे भी ज्यादा जानती है। सब कुछ तो शेयर किया है इससे । मेरी शादी पर खूब धमाल मचाया था इसने और फिर उसी शिद्दत से बिखरते दाम्पत्य से घायल और टूटते हुए मेरे वजूद को भी बटोरने की कोशिश की। सच है, जिंदगी में एक दोस्त जरुरी होता है।
पापा ने मेरी शादी के लिए अजीत को चुना। ........अजीत कुमार भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी। छोटे कसबे का पढ़ाकू लड़का। बहुत अंतर था दोनों परिवारों में। मम्मी ने दबे स्वर में कहा भी पर आईएएस दामाद के सिवा कुछ नहीं दिखा पापा को। दो साल हवा में पर लगा कर गुजर गये। एक अच्छी बीवी बनने की भरसक कोशिशें करती रही थी मैं। समय बीतते-बीतते अजीत बहुत बदल गया। मै तो वैसी ही थी। उसका ख्याल रखती। प्यार भी करती थी, पर उसके इस बदले हुए व्यवहार को न समझ पा रही थी। मेरी दोस्तों के सर्कल में भी खुसफुसाहट होने लगी थी। कोई बात छुपती कहाँ है! अजीत की रंगीन मिजाजी के किस्से आम होने लगे ,पर मुझे ही खबर देर से हुई। फ़ाइल डिसकस करने के बहाने कोई न कोई औरत उसके साथ रहती। सेमिनार में और होटलों में भी। पावर और पैसों ने दूसरे सारे ऐब भी भर दिए। बहुत रोई पर सोचा कोई कमी रह गई मेरे प्यार में जो इस भटकन की वज़ह है। भरोसा था कि संभाल लुंगी। पर …….
संगीता का कन्धा मेरे लिए बहुत बड़ा सहारा था उनदिनों। उस पर सर रख कर रो आती थी मै, पर एक दिन वह हुआ जिसकी कल्पना भी मैने नहीं की थी। सोच कर आज भी घृणा से सर्वांग सुलग जाता है।
काम वाली बाई पार्वती की दस साल की बेटी पिंकी, जिसे मै बहुत प्यार करती थी, अचानक कई दिनों से नहीं दिखी मुझे । पार्वती से पूछा तो वह बोली ‘’पता नहीं भाभी पहले तो लपक के तैयार हो जात रही आपके पास आने को .....पर अब बहुत कहने पर भी कौनो कीमत पर नहीं आती। जबरदस्ती करी तो रोवय लागत है।‘’
‘’अच्छा तुम अभी घर जाओ और उसे दोपहर में ले आना। ‘’
बहुत समझा बुझा कर पार्वती पिंकी को मेरे पास लाई। डरी-सहमी पिंकी को देख कर मुझे समझ में नहीं आया इसे क्या हुआ! बहुत प्यार से उसे मैने अपने पास बुलाया। उसे बिस्किट दिया। बातें करती रही। धीरे धीरे वो सामान्य हुई। मैने पार्वती से कहा, ‘’तुम बाकी घर के काम निपटा कर इसे साथ ले जाना। मेरे पास रहने दो तब तक, पर पिंकी ने माँ का आंचल पकड लिया कि हम जायेंगे ....नहीं रुकना हमें। बड़ी मुश्किल से तैयार हुई रुकने को। बड़ा आश्चर्य लगा उसके इस व्यवहार से। उसे लेकर टी वी रूम में आई पास बिठा कर कहा, ‘’पिंकी, क्या आंटी से गुस्सा हो ?......क्यों नहीं आती तुम अब ? तुमको मै पढ़ाती थी उसका भी नुक्सान हो रहा है न।‘’
वह एकदम चुप हो गई। आँखों में एक अजीब सा डर ......सहमापन था। बहुत पूछने पर,…. बड़ी मुश्किल से उसने जो बताया, उससे एक पल को स्तब्धहो गई मैं। आसमान गिर पड़ा मुझ पर। अटक-अटक कर बच्ची बोली, ‘आंटी अंकल से न बताइयेगा वरना बहुत मारेंगे हमको भी और आपको भी। वो बहुत गंदे अंकल है।‘’
‘’क्या? हुआ क्या? मुझे बताओ तो बेटा....’’
और एक नन्ही बच्ची के मुंह से जो सुना वो एक पुरुष की वीभत्स मानसिकता या बीमार सोच थी। पशुता पर उतर आए पुरुष को वह नन्ही बच्ची अपनी बेटी नहीं औरत लगी। बदलाव की चाह या यौन कुंठा से ग्रसित मनुष्य। उसे पति कहना रिश्ते का अपमान होगा। यही से शुरू हुई दाम्पत्य में दरकन। आफिस से आते ही सीधा सवाल दाग दिया। जवाब में बेशर्म हंसी और जवाब था, ‘’पागल हो गई हो इन कूड़ा-कचरा लोगों की बात पर विश्वास करती हो।‘’
‘’तुम नराधम हो अजीत। क्या तुम्हे मुझसे प्यार नहीं? आखिर क्या कमी है मुझमे जो ऐसी नीच हरकते करते हो? आज से मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं।‘’
एक बिस्तर पर दो अजनबी सोते रहे। कमरा अलग करना मतलब अर्दली के जरिये बात बाहर जाना, सो कमरा एक ही रहा। और फिर एक रात मेरी गर्दन के नीचे हाथ सरका मै जाग रही थी। झटक दिया घृणा से उसे। क्रोध और अपमान से बिलबिला उठा उसके अंदर का पुरुष। चीख़ा वह, ‘’ये मेरा हक़ है। इसे कैसे रोक सकती हो तुम...... हासिल कर ही लूँगा.......’’
बलात्कार! उफ़! वह भी पति द्वारा। बलत्कृत नारी।....... उसका दर्द और अपमान और दर्द की पराकाष्ठा, वह ही जानती है। उस रात पहली और आखिरी बार चीख कर अजीत को कहा, ‘’अब मुझे छूना भी मत मुझे। तुमसे घिन आती है। ...... बिना प्रेम के यह वेश्यावृति नहीं कर सकती। तुम्हारे शरीर से औरतों की दुर्गन्ध आती है मुझे ...’’
.....और रात भर रोती रही। मेरा तन ही नहीं मन भी घायल था। सुबह होते ही संगीता को फोन किया। मेरी आवाज़ काँप रही थी। संगीता ने कहा ‘’अपने को संभाल..... मै दस मिनट में पहुँच रही हूँ।‘’
वह आकर मुझे ले गई। उसके घर आकर बहुत रोई। शाम को पापा और माँ मुझे लेने आ गये। उन्हें अजीत ने ही फोन कर के मेरे घर छोड़ जाने की बात बता दी थी। उन दोनों ने सोचा मियां बीबी का झगड़ा है। सुलझ जाएगा। पर अब मै किसी कीमत पर नहीं रहना चाहती थी उसके साथ। अजीत का यह घिनौना रूप कैसे माँ बाप को बताऊँ! बड़ी उहापोह थी। मम्मी चाहती थी एक मौका और देना चाहिए हालाँकि, दामाद के कारनामे जानती थी। शोहरत तो पहुँच ही जाती है। पर ओहदा और पैसा ऐब पर पर्दा भी डाल देता है। ....,,मैने फैसला कर लिया। फिर चंद महीनो की फार्मेल्टी के बाद आपसी सहमती से बड़ी आसानी से तलाक हो गया। पापा ने मुझे यह घर शादी में गिफ्ट किया था, जिसे मै संवारती रहती। बहुत कहने पर भी मै नहीं गई उनके साथ रहने। वक्त गुजरता गया। कई बरस गुजर गये । वक्त अपने हिसाब से तल्खियाँ कम कर देता है। मै भी नार्मल होने लगी। आँखे मूंद कर अपने अतीत के गलियारे में फिर आज घूम आई थी मै। एक टीस सी उठी फिर झटक दिया। जो बीत गया सो गया। अब जब कभी एक साथी की चाह भी उठती, एक नाउम्मीदी फैल जाती। मैंने अपना एक पैमाना बनाया था। उसमें कोई फिट बैठे तब न! सोच कर मै मुस्करा दी। आज भी जाना है। शाम की चाय का वक्त हो गया। सोच ही रही थी काशी ने पूछा --
‘’दीदी चाय यही लाऊं या अंदर लगा दूँ?’’
‘’यही ले आओ.’’ काशी से कह कर मैने फिर आँखे मूंद ली।
काशी चाय अच्छी बनाता है। अभी नया ही आया है। करीब दो माह ही हुए लेकिन उसने मेरी चाय का ख़ास टेस्ट पकड लिया है। हालाँकि, यह बहुत कठिन नहीं, पर जरा मुश्किल तो है।....यही ...मेरी चाय। मुझे वो मुलाजिम बिलकुल नहीं पसंद जो मेरा काम ध्यान से न करे। मेरे घर पर काम करने वाले नौकर घर के सदस्य ही होते हैं।
धीमे धीमे सिप करके चाय पीने का अपना ही मज़ा है और मै ये लुफ़्त लेने के पूरे मूड में थी। मेरी फ्रेंड्स अक्सर मुझे उकसाती, ‘’कभी स्काच भी इसी तरह पी कर के देख। ...... जिंदगी का असली मज़ा तब समझ में आएगा। .....तू कहाँ अभी उसी घुंघट वाली सोच में उलझी पड़ी है।‘’
सबके बहुत कहने पर भी मैने क्लब की मेम्बरशिप नहीं ली। पर हां, कभी कभी संगीता की गेस्ट बन कर जरुर गई हूँ। दोपहर को क्लब के लान में चेयर लगवा कर बेसन की रोटी और पूरी बियर की बोटल भी खतम की है, पर मेरी आदत नहीं बनी। सिर्फ एक बार आजमाई। बहुत कडवी थी। जिंदगी की तरह ही कडवी कसैली। नहीं पसंद आई मुझे। पर पी इसलिए क्योंकि मुझे खुद को आजमाना था। फूलों, गीतों, किताबों और अपने ख्याली इश्क के नशे में मदहोश रहने वालों पर बियर कितना चढ़ती है! चाय का आखिरी सिप ले कर और कप रख कर अंदर जाने को मुड़ी ही थी की गेट खटका। कोई अंदर आ रहा था। मैने पलट कर नहीं देखा। पलट कर देखना मुझे कभी पसंद नहीं। अभी किसी से मिलने का न वक्त था न मन। सलीम भाई से गाडी लगाने को बोल कर अंदर तैयार होने चल दी। एक अजीब सी उलझन में घिरी थी। कहीं जाना मुझे अच्छा नहीं लगता। पार्टी और हंगामे ,…..शायाद मै इन सबके लिए नहीं बनी थी..... या यूँ कहें मेरा मूड कब क्या करेगा मुझे भी नहीं पता। आज डिनर था संगीता के घर। मै मना नहीं कर सकती थी । वहां खुराना भी जरुर आएगा। उसे झेलना मेरे लिए टॉर्चर था। कर्नल खुराना उनका का पारिवारिक मित्र था। अभी तक कुंवारा था। अक्सर जब भी हम संयोग से एक जगह मिलते...... संयोग नहीं यह सब संगीता की कारस्तानी होती कि वह हमेशा ही ऐसा कुछ करती की मुझे उस से टकराना ही पड़ता और वह लगातार मुझे ताकता रहता। न जाने क्या था उसकी आँखों में, पर मुझे बहुत चिढ होती। एक्सरे की तरह मेरे बदन के आर पार होती उसकी तीर सी निगाहें। गलती उसकी भी नहीं थी। यह सब तो मेरी अपनी ही फ्रेंड का किया धरा है। उसने कर्नल से भी मेरा प्रपोजल दिया। वह दोनों मियां बीबी चाहते है की मै खुराना से शादी कर लूँ। हालाँकि, पंजाबी खुराना खूबसूरत मर्द है। उसमे वो सारी खूबियाँ है, जो एक पुरुष में होनी चाहिए। पढ़ा लिखा। वेळ बिहेव्ड। कुत्तों से तो बेहद प्यार करता था वह। करीब चार अलग अलग नस्लों के कुत्ते भी पाल रखे थे। उसके बंगले का लान बहुत खुबसूरत था - लश ग्रीन। मेरी सबसे अहम पसंद भी उसके बंगले पर मौजूद थी ......चुनिदा किताबों की लाइब्रेरी। सब तरह की किताबें मौजूद थी। एंटिक लैम्प और काली आबनूसी लकड़ी की मेज़ कुर्सी कोने में रखी उसके नफीस टेस्ट को दर्शा रही थी। एक दिन संगीता ही मुझे उसके घर भी ले गई थी। शायद उसने ही कहा होगा। काफी ना-नुकुर के बाद मै गई। वे दोनों बरामदे में बैठ कर बात कर रहे थे। मै कम्पाउंड में घूम घूम कर पेड़ पौधे देख रही थी। सोच रही थी सब कुछ तो है इस आदमी में फिर मुझे क्यों नहीं समझ में आता! पर आज मूड लाईट था। मौसम का असर मुझ पर भी था। ख्याले इश्क भी, पर आशिक नदारद था। न जाने कौन होगा जो मेरे लिए बना होगा! बडबडा रही थी और तैयार भी हो रही थी। साड़ी बाँध कर अपने आप को शीशे में देखा। कुछ ज्यादा ही हसीन लग रही थी रायल ब्लू फ्रेंच शिफान में। विदाउट स्लीव डीप नेक ब्लाउज ,गले में बड़े बड़े बीड्स की स्वरोस्की की सिंगल लाइन नेक पीस ......कानो में कंधे से जरा ऊँचे तारों की तरह झिलमिलाते इयररिंग्स। आज खुद पर ही प्यार आ गया। अब भला बेचारे खुराना या किसी और का क्या दोष! किसी का भी दिल फिसल जाए। इसी साल अपना चौतीसवा जन्मदिन मनाया था, पर चौबीस से ज्यादा की नहीं दिखती थी। चौबीस इंच की भी नहीं, मात्र बाईस की कमर थी। इसे कहते हैं खुद्पसंदी। सोच कर मुस्कराई और ओठों को गोल कर के सीटी मार दी मैने और अपना फेवरिट परफ्यूम स्प्रे करने लगी। वाईट डाईमंड की सुगंध से मुझे जानने वाले मेरे आने की आहट पा जाते। आजकल तो कर्नल दूर से ही सूंघ लेता था। पुयर चैप! नहीं जानता था कि मै उससे शादी तो कभी नहीं करुँगी। वो मेरे लायक़ नहीं है, पर आज उसके बारे में बार बार क्यों सोच रही हूँ? सर झटक दिया मैंने, जैसे सारे ख्याल झटक कर बाहर फेंक दिए। घड़ी देखी। “ओह! सात बज गये!”
बस क्लच उठा कर बाहर निकल ही रही थी कि काशी ने आकर कहा ‘’दीदी गाडी लग गई है। रात को क्या बनाऊ? या आप बाहर खायेंगी?”
“मुझे नहीं खाना। तुम लोग अपने लिए जो चाहो बना लो। ......संगीता मेमसाब के यहाँ चलिए सलीम भाई।“ कह कर मै गाडी में बैठ गई।
बहुत दिनों बाद किसी डिनर में जा रही थी। दोस्तों की झाड़ खाने के बाद अपने ही बनाये खोल से बाहर आने की एक कोशिश थी आज।
“आप अभी आ रही है?”
किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा। चौंक कर पलटी तो देखा सदाबहार कैसेनोवा डीके मुस्करा रहे थे। इतनी बेबाकी से हाथ रखना मेरे माथे पर सिकुडन डाल गया। फिर एक मुस्कान चिपका ली। जरा देर हो गई, पर अभी सात ही तो बजे है। पार्टी में बहुत करीबी लोग ही थे। लगता था मेरी प्रिय दोस्त और मेरे फेवरेट कपल ने यह पार्टी भी किसी को मेरे करीब लाने के लिए ही प्लान की है। संगीता मेरे गले लग गई। बोली, “बहुत खूबसूरत लग रही है तू .....पर किस काम की? तू तो भाव ही नहीं देती। अरे पागल! जिंदगी अकेले नहीं कटती। क्यों नहीं समझती कि कितने लोग दिल हथेली पर लिए तेरे पीछे फिरते है और तू है की नोटिस ही नहीं करती। अच्छा, सच बता .....ईमानदारी से कहना, क्या तुझे किसी की जरूरत नहीं महसूस होती?”
“कैसी जरूरत? मेरा काम करने को है तो मुलाजिम?” जान कर भी अनजान बन गई मैं।
....पर आज तो संगीता ठाने बैठी थी और भरी महफ़िल में पूछ ही लिया उसने “तुझे फिजिकल नीड्स नहीं ?”
अचकचा गई एकदम से। फिर बोल पड़ी, “अगर हो भी तो क्या जूठन खा लूँ? या दुसरे की थाली खींच लूँ?”
सन्नाटा सा छा गया एक पल को। फिर बात पलट दी उसने “”अरे मै तो टीज़ कर रही थी तुझे।“
ड्रिंक सर्व हो रही थी। सब जानते थे कि मै पीती नहीं पर ड्रिंक्स पहचानती हूँ। नानवेज भी नहीं खाती। कर्नल मेरे लिए ग्लास लाये मेरे मना करने पर कहा, “ये अल्कोहल नहीं है लाइम सोडा विथ आइस है।“
मैने ग्लास थाम लिया और सिप करने लगी। कुछ ज्यादा ही अच्छा टेस्ट था। ड्रिंक खतम होते ही एक और आ गई और मैने इस बार खुद ले लिया। मुझे नहीं पता था कर्नल ने उसमे वोडका मिक्स कर दी है जिसका सुरूर मेरी आँखों में झलकने लगा है। मुयुजिक शुरू हो गया। धीमा मादक संगीत। कई जोड़े पाँव थिरकने लगे। एक हाथ मेरे सामने बढ़ा। “कैन वी डांस?”
ना में सर हिला दिया मैने और बोली, “मुझे नहीं डांस करना,”
“ओके! कोई बात नहीं। हम बातें करते हैं।“
हमदोनों कार्नर में पड़े सोफे पर बैठ गए। कर्नल खुराना मेरा हाथ देखने लगे। हाथ दिखाना अपनी रेखाएं पढवाना मेरा हमेशा से प्रिय शगल रहा है। वो बोलते रहे और मै खिलखिलाती रही। तभी अपना हाथ मेरी जाँघ पर रख दिया। मैने धीमे से हटा दिया और अपना हाथ खीच लिया, पर कर्नल तो आज न जाने किस मूड में था। मेरी कमर में हाथ डाल कर खीच लिया और बोला, “कितनी खूबसूरत हो तुम ....शादी नहीं करनी तो न सही .......एक डेट ही मेरे साथ कर लो।“
एक झटके से उसे धक्का दे कर दूर किया। उसने कहा, “मै बहुत प्यार करता हूँ तुमसे।“
“प्यार और तुम .......नहीं कर्नल खुराना ......तुम प्यार नहीं जानते। तुम्हारी आँखों में जब भी प्यार तलाशा मैने। वो कहीं नहीं नजर आया। बस एक आदिम भूख दिखी। कर्नल, .... जब भी किसी पुरुष की नज़रें मेरे चेहरे से फिसल कर गर्दन के नीचे टिकती है उसी पल उसकी नियत उजागर हो जाती है। वासना का मोहताज़ नहीं होता प्रेम और मै प्रेम तलाश रही हूँ। ....आज ही मैने तुम्हारे बारे में सोचना शुरू ही किया था की आज ही तुम बेनकाब हो गये।“
बिना होस्ट को बताये पार्टी छोड़ आई। घर पहुंची ही थी तो देखा अशोक मेरा इंतजार कर रहा है। अशोक मुंहलगा था। अभी बाईस चौबीस साल का ही होगा। उसकी नौकरी भी मैंने ही लगवाई थी। दीदी दीदी कह कर जब-तब सर खाता रहता। मेरे पर्सनल काम वो ही करता था, पर आज उसकी बकबक सुनने का बिलकुल मूड नहीं था मेरा। मैने उससे कहा “कल आना।“
“अरे नाही दीदी कल तक तो गजब हो जाएगा।“
“क्या हुआ कि गजब हो जाएगा? अच्छा बोलो…..?”
“दीदी, स्टेशन जाने वाली सडक पर .....पुल के पहले पुलिस की पिकेट लगी है।“
“वो तो वहां साल भर से लगी है। तो मै क्या करूँ?”
“बात तो सूनो आप पहले। ..... उन लोगों ने एक लड़की को बैठा रखा है। ....आप चलें और उसे अपने साथ ले आयें।
“तुम पागल हो क्या? हम कैसे जा सकते? अब टाइम भी तो देखो नौ बज रहे है और उस लड़की को कैसे ला सकते है अपने साथ? अगर उसने कह दिया वो मुझे नहीं जानती तो ? कमीने पुलिस वाले कुछ भी बक देंगे।“
“दीदी, अगर आप ने उसे नहीं छुड्वाया तो आज उस लड़की का क्या हाल होगा आप नहीं जानती।“
“क्या बकवास कर रहे हो ....साफ़ बताओ।“
अशोक ने जो बताया उससे मेरी रूह काँप गई। अशोक बता रहा था, “वो लड़की तेरह चौदह साल की ही होगी किसी अच्छे घर की और शहर के नामी स्कूल में आठवी क्लास में पढ़ती है।.... नम्बर कम होंगे या टीचर ने डांटा होगा तो बैग लटका कर चली जा रही थी क्न्फ्युज सी। उन पुलिस वालों ने उसे बिठा लिया टेंट की ओट में। मैने अपनी आँखों से देखा उससे पूछने के बहाने एक पुलिस वाला उसके गाल सहलाता है तो दूसरा बगल बैठा हुआ उसकी जांघो पर हाथ फेरता है। वो लोग देर रात का इंतजार कर रहे हैं। कोई कमरा ढूंढ रहे है। मुझसे भी कहा अपने कमरे की चाभी दे दो,…. सुबह दे देंगे। हम यह कह कर चले आये चाभी दोस्त के पास है।“
“तुमसे चाभी क्यों मांगी? तुमको कैसे जानते है वो?”
“उनमे से एक मेरे गाँव का रहने वाला है। उसी ने सब को बताया कि अकेले रहते है हम। नदी के इस पार पुल शुरू होते ही पुलिस पिकेट और उस पार ढलान वाली कालोनी में मेरा कमरा है। अक्सर सडक सूनी रहती है। चाभी के लिए बड़ी घुड़की दी पर जान छुड़ा कर भाग आये हम।....दीदी उस बच्ची को बचा लो नहीं तो उसकी लाश कल नदी में तैरते मिलेगी।“ उसकी आँख में आंसू भर आये।
सारा दृश्य मेरी आँखों से गुजर गया। चिड़िया को घेरे हुए पांच छह गिद्ध। जांघों पर हाथ फेरता सिपाही। पिंकी को निगलता अजीत और कर्नल खुराना ......सारी सूरतें गडमड होने लगी। घृणा का एक सैलाब उमड आया और हलक में अटक गया। .....चारों ओर गिद्ध ही गिद्ध। जिंदा मुर्दा मांस को नोचते गीदड़ नजर आ रहे थे। सूखे हलक में एक घूंट पानी उडेला और सोचने लगी क्या करू ! अरे! मै तो भूल ही गई। ईशान भी तो यही पोस्टेड हैं। उनका ही मुहकमा है यह। वो ही तो आजकल S.S.P है। मोबाइल उठा कर फोन लगाया । स्विच आफ मिला। बार बार ट्राई करती रही। न जाने कितनी बार मिलाया पर स्विच आप ही था। लैंड लाइन पर ट्राई किया तो उनके पर्सनल नम्बर पर कोई रिस्पांस नहीं। तभी मुझे ख्याल आया और फोन अटेंडेंट को फोन किया तो पता चला साहब सो रहे है। उसने कहा “बुखार है। कोई भी फोन लेने से मना किया है।“
“जगा दो और मेरा नाम बता दो जल्दी बात कराओ अर्जेंट है।“
“नहीं मैम, नौकरी चली जायेगी।“
“तुम बात तो कराओ। नौकरी नहीं जायेगी। हम कह रहे है।“
ईशान को जैसे पता चला मेरा फोन है, तुरंत फोन पर आये। हेलो बोलते ही उधर से आवाज़ आई, “अरे आपने याद तो किया। आपका फोन आया, जहे नसीब। ...... हुकुम करें।“
“मजाक छोड़िये ईशान ......और बात सुनिए। अगर जरुरी न होता तो कल फोन करते।“ पूरी बात और जगह बताई।
वो बोले “उस एरिया के थाने पर भेजवा दूँ ?”
“नहीं....!” चीख पड़ी, “सुनिए, आप उसे वहां नहीं भेजेंगे। आप उसे गीदड़ों के बीच से निकाल कर भेड़ियों की माँद में फेंक देंगे। आप से बेहतर कौन जानता है थाने की हकीकत। ईशान उस लड़की को आप अपने बंगले पर बुलाइए और पता पूछ कर उसके घर भेज दीजिये। ...... और हाँ उसके बाद मुझे फोन करिए कितनी भी रात हो मै इंतजार कर रही हूँ।“
“करता हूँ मै....”
फोन रख कर मै सोचने लगी कर्नल हो या सिपाही या दरोगा ……,चौदह साल की हो या चौतीस साल की......। सब इनके लिए बस गर्म गोश्त है। यह आदिम भूख है। ये गिद्ध है। बस मौका मिलना चाहिए । आधे घंटे भी नहीं हुए थे ईशान का फोन आ गया, “अरे यार तुम्हे थैंक्स। तुम न बताती तो कल तक हडकम्प मच जाता। वह कमिश्नर की बेटी है। बच्ची को घर भेज दिया। खुद माँ बाप ले गए। बहुत परेशान थे। चलो ये अच्छा हुआ आज तुमने एक नेक काम किया।“
“ईशान तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो..... शुक्रिया।“
“हूँ!” –लगा उधर एक मुस्कान तिर गई है। जानती हूँ बरसों से एक नरम कोना है ईशान के दिल में अपनी इस दोस्त के लिए जिसे उसने कभी ज़ाहिर नहीं किया और शायाद कभी करेगा भी नहीं। अगली सुबह के अख़बार में एक खबर छपी थी – “पुलिस का गुड वर्क.... पुलिस पेट्रोलिंग टीम ने उच्च अधिकारी की नाबालिक लड़की को नदी में कूदने से बचाया .......डिपार्टमेंट की तरफ से पुरस्कार की घोषणा।“
“ये कैसा गुड वर्क है ईशान ?” मैंने फोन पर ही पूछा था।
“तुम तो जानती हो मुझे .....उन सालों को तो आज ही सस्पेंड कर दिया मैने। अब सच तो नहीं कह सकता न यार। लड़की के पिता का भी दबाव था। फिर नौकरी का सवाल। अपने ही महकमे की बदनामी कैसे करता ......गुड वर्क ही तो था।
मै उस रात सो नहीं पाई थी। अब एक चाय पी कर सो लूँ यह सोच ही रही थी कि सेल बज उठा। संगीता थी। पूछ रही थी, “क्या हुआ? तुम बिना मिले क्यूँ चली गई? कोई बात हुई क्या?”
“नहीं। कुछ ख़ास नहीं। तू तो जानती ही है कि अब मुझ पर ज्यादा देर तक असर नहीं होता। झटक देती हूँ मै इन हादसों को। ये मर्द जात भी बड़ी कुत्ती चीज़ है। हर अकेली औरत इन्हें चाकलेट लगती है, जो इनका हाथ लगते ही पिघल जायेगी। खुराना भी उसी प्रजाति का प्राणी है। ,,,,, उसका चैप्टर बंद कर दे ,,,मै जिंदगी की जिस सडक पर अकेले चल रही हूँ, उस सडक का न आदि है न ही अंत। अगर सुकून भरी चहलकदमी है, तो कभी भागदौड़ भी। कोई सहयात्री नहीं। जरूरत है भी या नहीं ......पता नहीं! सोचती हूँ क्यूँ न इसे वक्त पर छोड़ ही दिया जाय..........!”

रविवार, 21 मई 2017

मेरी रूहानी यात्रा और अनुराग यायावर


गोधूलि की बेला 
घर जाने के लिए तत्पर पूरा जीवन 
रसोई से उठता धुआँ 
और यायावर मन का परिचय  - जीवन के हर छोर को छूता हुआ कहता है,


मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|

मैं मिला था,
कब किससे?
क्यूँ मिला था?
वो तो थे,
पथ के मेरे,
विराम अपने|
शेष समर की धुल,
चाटनी मुझे अब|
फांकना है गर्द का,
गुबार सारा|
शूल से सने मेरे,
आहार दे दो|
रख लो तुम,
व्योम का श्रृंगार सारा|
मैं अकिंचन!
है भ्रमण संधान मेरा|
मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|

मैं चला हूँ,
अन्तः में संकल्प लेकर|
कहाँ तक?
शुन्य का विस्तार होगा|
इसकी परिभाषा,
जीते जी नहीं मिली तो|
ढूंढ़ लूंगा मैं,
मृत्यु के उस पार होगा|
सारी तड़प, सारी तपिश,
मुझे सौंप दो तुम|
यूँ ही जलना-बुझना,
है अभिमान मेरा|
मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|

मेरी अस्थि, मेरा रोम,
तुम्हें समर्पित|
कर लो सृजन,
कुछ कर सको,
मेरे अंतिम क्षण का|
फिर तो मैं,
निर्बाध होकर चल पडूंगा|
निर्वात की काया में,
अपना सर्वस्व देने|
मैं ठहरता हूँ नहीं,
पाषण बनकर|
विधि यही,
है यही विधान मेरा|
मैं यायावर!
पथ का गमन,
विश्राम मेरा|

ऐसी परिभाषा मिलती कहाँ?
जो मनुज तन को परिधि दे!
अगर मांगना है तो मांगो,
हे!… ईश्वर!
सम्पूर्ण विश्व को समृद्धि दे!

“मन जितना विचरा घट-घट में, समझो उतने तीरथ कर धाये!
क्या मंदिर? मस्जिद, क्या गिरजा? यह सब तुमने व्यर्थ बनाये!”

जीवन का सारतत्व,
यायावर-सा स्थाई|
निमित-मात्र में सांसों की,
कोसों-कोसों तक गहराई|
यक्ष प्रश्न अस्तित्व पटल पर,
अब आंखें मेरी पथराई|
मैं यायावर ढूंढ़ रहा,
है कहाँ पृथ्वी की परछाई?

वात्सल्य की परिभाषा के,
प्रारंभ से अनंत की तलाश में,
भटकता एक “यायावर!”
समय लाँघ उम्र खिसकती गई,
बचपन वहीं खडा है अभी तक,
जहाँ से तुमने शून्य को अपनाया|
संबंधों की धक्का-मुक्की में,
भ्रम के कुहासे को चीरता,
जीवन का संदर्भ,
ढूंढता है माँ को!


जाने कितने बांधों को तोड़ता, तटों से जूझता, अपना वजूद बनाता है यायावर  ... यायावर यानि अनुराग रंजन सिंह 

yaayaawar


यायावर अनवरत चलता है, तलाश करता है अनगिनत अर्थ - शायद तभी बता पाता है अपनी कलम से 

मृत्यु! आत्मा का अज्ञातवास!


दंभ निमित में मृगतृष्णा के,
गहन-सघन स्वांस अभ्यास|
पुनः व्यंजित वृत्त-पथ पर,
आत्मा का पुनरुक्ति प्रवास|
कल्प-कामना के अनंत में,
लिपिबद्ध अपूर्ण उच्छास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|
अवतरण का,
सत्य, मिथक क्या?
यह भ्रम, मन का,
पूर्वाग्रह है|
ज्ञात यही,
अवसर-प्रतिउत्तर|
जिस काया में,
बसता मन है|
पूर्वजन्म की स्मृति शेष,
ज्यौं पुनः न करती देह-अवशेष|
किंचित यह भी ज्ञात नहीं,
तब क्या था?
क्यूँ जीवन पाने का धर्म है?
पूर्व जन्म का दंड मिला,
या
यह अगले जन्म का दंड-कर्म है|
सत्य का संधान न पाकर,
निर्वात उकेरता एकांतवास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है, जीवनवास|

लिप्त कर्म में,
दीप्त कर्म में,
संचित धर्म,
निर्लिप्त आयाम|
कैसा दर्पण श्लेष दृष्टि का?
भूत-भविष्य का कैसा विन्यास?
क्यूँ भ्रम को स्थापित करते?
खंडित कर दो सारे न्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|

जो निश्चय था,
तुम्हारे मन का|
पूर्ण से पहले,
वह अविचल है|
जो लिया यहीं से,
देकर जाओ|
यही कर्म है,
यहीं पर फल है|
त्याग-प्राप्ति संकल्प तुम्हारा,
है, तर्कविहीन तुष्टि का सन्यास|
है, मृत्यु!
आत्मा का अज्ञातवास,
क्षणिक मात्र है जीवनवास|

लेखागार