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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

आइये बनें हम भी सैनिक परिवार का हिस्सा : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
पुलवामा में आतंकी हमले के बाद से पूरे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति संवेदनात्मक माहौल बना हुआ है. किसी हादसे के बाद इन वीर शहीदों के परिजनों के प्रति चंद दिनों तक तो लोगों की संवेदना बनी रहती है परन्तु कुछ दिनों, महीनों बाद उस शहीद के परिजन अकेले से पड़ जाते हैं. चंद दिनों के बाद वे जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से जूझने लगते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि बहुतायत सैनिकों के परिवार मध्यम अथवा निम्न मध्यम आय वर्ग से आते हैं. किसी-किसी परिवार में वही सैनिक एकमात्र कमाऊ पूत होता है. कहीं-कहीं वही एक सैनिक समूचे परिवार का आधार होता है. किसी-किसी घर में वही एक सैनिक अपने छोटे भाई-बहिन के भविष्य का ख्याल रखने वाला होता है. किसी-किसी परिवार में कोई शहीद सैनिक नव-विवाहित होते हैं, कहीं-कहीं वे नवजात शिशु के पिता बने होते हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि शहीद हुए उस जवान के घर पर चंद दिनों के बाद वास्तविक कठिनाइयाँ सिर उठाना शुरू कर देती हैं. वर्ष भर के पर्व-त्यौहार, आस-पड़ोस के आयोजन आदि के समय भी उन परिवारों को अपने खोये हुए सदस्य की याद बहुत गहराई से आती होगी. 


यही वह बिंदु होता है जहाँ जवानों के परिजनों को वास्तविक रूप से हमारे साथ की आवश्यकता होती है. हम नागरिक जो किसी जवान की शहादत के समय संवेदित होकर एकजुट होना शुरू कर देते हैं उनको सतत एकजुट और संवेदित बने रहने की आवश्यकता है. इसके लिए हम अपने-अपने जिले में, अपने-अपने क्षेत्र के सैनिकों की जानकारी कर सकते हैं और उनके परिजनों से समय-समय पर मिल सकते हैं. उनके साथ पर्व-त्यौहार को मना सकते हैं. उनकी किसी भी तरह की समस्या का समाधान बन सकते हैं. शहीद सैनिकों के बच्चों की शिक्षा से सम्बंधित, उनके माता-पिता के स्वास्थ्य, चिकित्सा से सम्बंधित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. उनके अन्य परिजनों की परेशानियों का समाधान भी कर सकते हैं. हमारे एक कदम इस तरह से उठाने पर उन परिजनों को भी गर्व की अनुभूति होगी और वे अपने आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं करेंगे. ये आवश्यक नहीं कि हर मदद आर्थिक रूप से हो, यह भी जरूरी नहीं कि हर शहादत के बाद ही संवेदित हुआ जाये, हम सभी ऐसा कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं और अपने वीर सैनिकों के परिजनों का हिस्सा बन सकते हैं.

ऐसा हम सभी उन सैनिक परिवारों के साथ भी कर सकते हैं, जो अपने घर-परिवार से दूर अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. हमारी आज़ादी, हमारी सुरक्षा के लिए कहीं किसी मोर्चे पर तैनात डटे हुए होते हैं. आइये मिलकर एक प्रयास करें अपने सैनिकों के लिए, उनके परिजनों के लिए.  

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गुरुवार, 31 जनवरी 2019

प्रथम परमवीर चक्र से सम्मानित वीर को नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 31 जनवरी पहले परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्मदिन है. वे भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कमांडर थे. सन 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये थे. इसके लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया था. उनका जन्म 31 जनवरी 1923 को जम्मू में हुआ था. इनके पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भी सेना में डॉक्टर थे. इसके साथ-साथ उनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे तथा 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हुए थे. अपने पिता और मामा के प्रभाववश वे भी सेना में भरती हुए. 


मेजर सोमनाथ ने अपना सैनिक जीवन 22 फरवरी 1942 से शुरू किया. तब उन्हें चौथी कुमायूं रेजिमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर प्रवेश मिला. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया जहाँ इन्होंने अपने पराक्रम के तेवर दिखाए. इसके चलते वे एक विशिष्ट सैनिक के रूप में पहचाने जाने लगे. सन 1947 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगाम मोर्चे पर जाने का हुकुम मिला. 3 नवम्बर को मेजर सोमनाथ बदगाम जा पहुँचे और उत्तरी दिशा में उन्होंने अपनी टुकड़ी तैनात कर दी. तभी दुश्मन की सेना ने उनकी टुकड़ी को तीन तरफ से घेरकर हमला किया. भारी गोलाबारी में उनके सैनिक हताहत होने लगे. अपनी दक्षता का परिचय देते हुए मेजर सोमनाथ ने अपने सैनिकों के साथ गोलियां बरसाते हुए दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा. 

इस दौरान बहुत से भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे. सैनिकों की कमी को मेजर महसूस कर रहे थे. ऐसे समय में एक मोर्टार का निशाना ठीक वहीं पर लगा जहाँ वे खुद मौजूद थे. दुश्मन सेना की तरफ से किये गए इस विस्फोट में मेजर सोमनाथ शहीद हो गये. उन्होंने प्राण त्यागने से ठीक पहले अपने वीर सैनिकों को प्रोत्साहित करते हुए कहा था कि, दुश्मन हमसे केवल पचास गज की दूरी पर है. हमारी गिनती बहुत कम रह गई है. हम भयंकर गोली बारी का सामना कर रहे हैं फिर भी मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक डटा रहूँगा.

उनकी वीरता और भारतीय सैनिकों के जोश के चलते श्रीनगर विमानक्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को बेदख़ल करते हुए मेजर 3 नवम्बर 1947 को वीरगति को प्राप्त हुए. इसके लिए उन्हें पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि परमवीर चक्र का डिजाइन मेजर शर्मा के भाई की पत्नी सावित्री बाई खानोलकर ने तैयार किया था.

आज उनकी जन्मतिथि पर बुलेटिन परिवार की तरफ से उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं.

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गुरुवार, 4 मई 2017

देश के दुश्मन - बाहर भी, भीतर भी : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
देश की सीमा पर पाकिस्तानी सेना का उत्पात उसकी आदत के अनुसार चल रहा है. देश की सीमा के भीतर जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजों की हरकतें जारी हैं तो नक्सलियों की हिंसात्मक गतिविधियाँ भी चल रही हैं. इन सबके बीच आमजन की तरफ से सबको मटियामेट कर देने के लिए आवाजें उठ रही हैं. पाकिस्तान को उसकी बर्बरता का यथोचित जवाब न देने के केंद्र सरकार को सोशल मीडिया पर अपशब्दों सहित आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है. पता नहीं इस आक्रोश का कितना हिस्सा सरकार तक पहुँच रहा है किन्तु सत्यता यह है कि आम जनमानस में आक्रोश बहुत ज्यादा है. सरकार को तमाम मंचों से सलाह दी जा रही है कि वह अमेरिका, फ़्रांस, जर्मनी, इजराइल जैसी नीति अपनाकर अपने दुश्मनों का सफाया करे. 


सही बात है, दुश्मनों के सफाए के लिए कठोर नीति का बनाया जाना आवश्यक है किन्तु क्या एक पल को सोचा गया है कि क्या इन देशों में कभी ऐसा होता देखा गया है कि
यहाँ के किसी नेता ने दूसरे देश के टीवी पर सार्वजनिक रूप से अपने राष्ट्राध्यक्ष को हटाने सम्बन्धी मदद मांगी हो?
इन देशों के भीतर इसी देश से आज़ादी पाने के नारे लगे हों?
इनके साहित्यकारों ने अकारण सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए पुरस्कार वापसी जैसा कोई कदम उठाया?
यहाँ जब भी विरोधी देशों पर, आतंकवाद पर कार्यवाही की गई तो विपक्षी दलों ने सरकार से उसके सबूत मांगे हों?
यहाँ किसी नेता ने, किसी बुद्धिजीवी ने किसी आतंकी को अपना भाई कहा हो? भटका नौजवान कहा हो?
यहाँ के किसी भी राज्य के नागरिक अपनी ही सेना पर पत्थर बरसाते हों?
देश के भीतर उसी देश का राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाता हो?
अपनी ही बेटी को आतंकियों द्वारा अपहृत करवाकर उनके लिए अपने ही घर से खाना भिजवाया जाता हो?

शायद हम में से किसी ने भी इन देशों में ऐसा माहौल नहीं देखा होगा. हमारा देश ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ देश के भीतर उपद्रव करने वालों को भटका नौजवान कहकर गले लगाया जाता है. वीर सैनिकों को धोखे से मारने वालों को मासूम वनवासी कहकर एक और हमले के लिए प्रोत्साहित कर दिया जाता है. सेना की कार्यवाही का सबूत माँगा जाने लगता है. एक व्यक्ति की मौत पर देश भर में असहिष्णुता बढ़ने लगती है. लोगों की पत्नियों को डर लगने लगता है. देश छोड़ने की बातें होने लगती हैं. बुद्धिजीवी अपने-पाने घरौंदों से बाहर आकर पुरस्कार वापसी में लग जाते हैं.

सोचिये ऐसे माहौल में सरकार, सेना, सैनिक किससे लड़ें? देश के बाहर के दुश्मनों से या फिर देश के भीतर छिपे दुश्मनों से? ऐसे माहौल में जब देश के टुकड़े करने वाले नारों पर, आज़ादी तक संघर्ष करने के नारों तक, आतंकवादी के पक्ष में लगते नारों के समर्थन में संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति आ जाये, देश की पुरानी पार्टी का दम भरने वालों के पदाधिकारी आ जाएँ तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है. ऐसे भयावह माहौल में अब जबकि सैनिक आये दिन शहीद हो रहे हैं, घुसपैठ बराबर हो रही है, घाटी में हिंसा जारी है, सेना पर पत्थरबाजी लगातार चल रही है किसी को असहिष्णुता नहीं दिख रही है, किसी की बीवी को डर नहीं लग रहा है, कोई देश छोड़ने की बात नहीं कर रहा है. फिर सोचिये एक पल को कि अचानक ये सब रुक गया और क्या शुरू हो गया? नक्सली हमला, पाकिस्तानी सेना का कायरानापन, घाटी की पत्थरबाज़ी, सेना के साथ दुर्व्यवहार. आखिर इन सबका एकसाथ चलने के पीछे का कारण क्या है? इन सबके मूल में क्या है? कहीं वे तो नहीं जिनके लिए आतंकी के लिए देर रात अदालत चलाई जा सकती है? कहीं वे तो नहीं जिनके लिए आतंकी भटके हुए भाई हैं? कहीं वे तो नहीं जिनके लिए देश के टुकड़े होने वाले नारों का समर्थन किया जाता है?

सोचिये, सोचिये और आइये आज की बुलेटिन की तरफ.

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

दो सितारों की चमक से निखरी ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज, 9 सितम्बर को दो सितारों, शहीद विक्रम बत्रा का तथा साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्मदिन है. दोनों ने ही अल्पायु में अपने-अपने हथियारों से अप्रत्याशित कारनामे किये. एक ने बन्दूक उठाकर देश के दुश्मन को खदेड़ा तो दूसरे ने कलम के सहारे हिन्दी विरोधियों को परस्त किया. आइये विनम्र श्रद्धांजलि सहित जाने अपने इन सितारों के बारे में.
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कैप्टन विक्रम बत्रा 
विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को पालमपुर में हुआ था. जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के यहाँ जुड़वां बच्चों के रूप में जन्म हुआ. माता कमलकांता की श्रीरामचरितमानस में गहरी श्रद्धा होने के कारण विक्रम को लव और विशाल को कुश के नाम से पुकारा गया. अध्ययन हेतु विक्रम चंडीगढ़ गए और विज्ञान विषय में स्नातक की पढ़ाई की. इस दौरान वह एनसीसी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुने गए और गणतंत्र दिवस की परेड में भी भाग लिया. स्नातक करने के बाद उनका चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया. शिक्षा समाप्त होने पर उन्हें 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली. 1999 को कारगिल युद्ध में श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा उनकी टुकड़ी को दिया गया. बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों सहित इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया. जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष यह दिल मांगे मोर कहा तो पूरे भारत में उनका नाम छा गया. इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें कारगिल का शेर की भी संज्ञा दी गई. मिशन लगभग पूरा हो चुका था. लड़ाई के दौरान घायल लेफ्टीनेंट नवीन को बचाने के प्रयास में विक्रम बत्रा की छाती में गोली लगी और वे जय माता दी कहते हुये वीरगति को प्राप्त हुये. अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.
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भारतेंदु हरिश्चंद्र 
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी में हुआ. उनके पिता गोपालचंद्र अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविता करते थे. बचपन में ही भारतेंदु माता-पिता के सुख से वंचित हो गए थे. बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द थे. भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते रहते. उन्होंने उन्हीं से अंग्रेजी सीखी तथा स्वाध्याय से संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सीख लीं. हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेंदु से ही माना जाता है. भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया. हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया. भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे. इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे. हिन्दी में नाटक उनके पहले भी लिखे जाते थे किंतु नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिन्दी नाटक को सुदृढ़ बनाया. उन्होंने हरिश्चंद्र पत्रिका, कविवचन सुधा और बाल विबोधिनी पत्रिकाओं का संपादन भी किया. भारतेन्दु जी का देहावसान मात्र 34 वर्ष की अल्पायु में ही 7 जनवरी 1885 को हुआ. अल्पायु में उन्होंने विशाल साहित्य की रचना की तथा मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया है.
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शहीद विक्रम बत्रा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से हार्दिक श्रद्धांजलि सहित आज की बुलेटिन.

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मंगलवार, 6 सितंबर 2016

मृत्युंजय योद्धा को नमन और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज की बुलेटिन के द्वारा एक योद्धा को श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं. मेजर धन सिंह थापा, जिन्हें वीरता का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था. आज, 6 सितम्बर 2005 को उनका देहावसान हुआ था.

मेजर धन सिंह थापा का जन्म 10 अप्रैल 1928 को शिमला में हुआ था. वे 28 अक्तूबर 1949 को वह एक कमीशंड अधिकारी के रूप में फौज में आए. 26 जनवरी, 1964 को गणतन्त्र दिवस पर मेजर धनसिंह थापा को सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. 1962 के भारत-चीन युद्ध में जिन चार भारतीय बहादुरों को परमवीर चक्र प्रदान किया गया, उनमें से केवल एक वीर उस युद्ध को झेलकर जीवित रहा उस वीर का नाम धन सिंह थापा था. मेजर थापा ने युद्धबन्दी के रूप में जो यातना झेली, उसकी स्मृति भर ही थरथरा देने वाली है.

मेजर धन सिंह थापा

1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब भारत की सेना युद्ध के लिए तैयार नहीं थी. इस विषम परिस्थिति में मेजर धन सिंह थापा को सिरी जाप पर चौकी बनाने का हुकुम दिया गया. उनकी टुकड़ी ने देखा कि सिरी जाप के आसपास चीनी सैनिकों का जमावड़ा है. उनके पास भारी मात्रा में हथियार हैं. ऐसा ही कुछ नज़ारा ढोला के सामने, पूर्वी छोर पर भी देखा गया. यह दुतरफा हमले की सम्भावना का संकेत था. चीन की फौज ने सुबह साढ़े चार बजे हमला कर दिया. मेजर थापा के सिपाही अपनी मशीनगन और राइफल्स से दुश्मन की सेना पर टूट पड़े, जिससे बहुत से चीनी सैनिक हताहत हुए और कई घायल हो गए. चीनी सैनिकों की ओर से मोर्टार दागे जाने से मेजर धनसिंह थापा की टुकड़ी का नुकसान हुआ. इस दौरान उनकी संचार व्यवस्था भी नाकाम हो गई थी इसलिए भारतीय सेना अपनी बटालियन से संवाद स्थापित करने में भी असमर्थ थी.

चीनी फौज ने उस चौकी और बंकर पर कब्जा कर मेजर धनसिंह थापा को बन्दी बना लिया. मेजर थापा लम्बे समय तक चीन के पास युद्धबन्दी के रूप में यातना झेलते रहे. चीनी प्रशासक उनसे भारतीय सेना के भेद उगलवाने की भरपूर कोशिश करते रहे किन्तु वे न तो यातना से डरने वाले व्यक्ति थे, न प्रलोभन से. युद्ध समाप्त होने के बाद जब चीन ने भारत को युद्धबन्दियों की सूची दी, तो उसमें मेजर थापा का भी नाम था. इस समाचार से पूरे देश में प्रसन्नता फैल गयी. देश वापस आकर मेजर थापा ने 1980 तक सेना में सेवारत रहे और लेफ्टिनेण्ट कर्नल के पद से अवकाश लिया.

इस वीर योद्धा को नमन करते हुए आज की बुलेटिन आपसे समक्ष प्रस्तुत है.

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मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सैनिकों के सम्मान में विजय दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ अर्थात या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा. गीता के इस श्लोक से प्रेरित होकर देश के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को खदेड़ कर सीमापार कर दिया था. आज से 17 वर्ष पहले भारतीय सेना ने कारगिल पहाड़ियों पर कब्ज़ा जमाए पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था. इस विजय की याद में और शहीद जांबाजों को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 26 जुलाई को कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है. भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30000 अधिकारियों और जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया. इस युद्ध में भारतीय आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 527 जांबाज़ शहीद हुए और 1363 घायल हुए.


एक तरह हम विजय दिवस मना रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे सैनिक एक आतंकी की मौत पर अलगाववादियों के पत्थरों का शिकार हो रहे हैं. आखिर ऐसा विरोधाभास क्यों? यहाँ इस तथ्य का स्मरण करना होगा कि विगत कुछ वर्षों से भारतीय सेना के कार्यों-दायित्वों में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है. अब नागरिक प्रशासन में भी उनकी भूमिका अहम् होती जा रही है. देश में किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा आने पर सेना को याद किया जाता है. दंगों की स्थिति, वर्ग-संघर्ष, धरना प्रदर्शन, बच्चों के बोरवेल में गिरने की घटनाएँ या फिर निर्वाचन, सभी में स्थानीय प्रशासन के स्थान पर सेना की भूमिका को सराहनीय, विश्वसनीय माना जाने लगा है. आज ये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि अपनी जान पर खेलकर देश के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले सैनिकों के लिए हम किस तरह का माहौल बना रहे हैं? सैनिकों को यदि पर्याप्त सम्मान न मिले, अधिकार होने के बाद भी अधिकारों का उपयोग करने की आज़ादी न मिले, सशक्त होने के बाद भी भीड़ से पत्थरों की मार सहनी पड़े, कर्तव्य की राह में मानवाधिकार आकर धमकाए तो ये खतरे का सूचक है. ये बिन्दु कहीं न कहीं सैनिकों के, सेना के मनोबल को कम करते हैं, उनमें अलगाव की भावना को जन्म देते हैं.

सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ-साथ आम नागरिकों का प्रयास हो कि सेना का मनोबल कम न होने पाए. सत्ता प्रतिष्ठानों को सेना सम्बन्धी मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए. समय-समय पर सेना के सामने आती असहज स्थितियों पर उनके साथ खड़े होने का एहसास कराना चाहिए. इससे सेना का मनोबल बढ़ेगा. इसी तरह आम नागरिकों को भी अपने स्तर पर सेना का, सैनिकों का सम्मान करने की भावना को विकसित करना चाहिए. हमारे जवानों द्वारा किये गए वलिदानों को, उनकी जांबाजी को न केवल याद किया जाये वरन उसे समाज में प्रचारित-प्रसारित किया जाये. निस्वार्थ भाव से देश के लिए कार्य कर रहे सैनिकों के लिए हम सभी को जागना होगा. कारगिल विजय दिवस के सहारे ही हमें उन सभी सैनिकों का स्मरण करना होगा जो हमारी रक्षा के लिए अपनी जान को जोखिम में डालते हैं. देश की एकता, अखंडता, स्वतंत्रता के लिए और नागरिकों के सुखमय जीवनयापन करने, सुरक्षित रहने के लिए ऐसा करना अनिवार्य भी है.

अपने जांबाज़ सैनिकों को याद करते हुए विजय दिवस को समर्पित आज की बुलेटिन. 
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सोमवार, 23 नवंबर 2015

आइये संकल्पित हों अपने जाँबाज़ सैनिकों के लिए - ११५०वीं बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज की बुलेटिन ११५०वें पड़ाव पर आ चुकी है और इस विशेष अवसर को हमने समर्पित किया है अपने देश के उन जाँबाज़ सैनिकों को जो हमारी स्वतंत्रता के लिए, हमारी सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं; समर्पित किया है उन बहादुर सैनिकों को जिन्होंने दुश्मनों को नेस्तनाबूत करने में कोई कसर नहीं रखी; समर्पित किया है उन अमर शहीदों को जिन्होंने अपने जीवन को कुर्बान कर दिया किन्तु देश की, देशवासियों की स्वतंत्रता, सुरक्षा पर तनिक भी आँच नहीं आने दी. देश के सभी शहीद सैनिकों को, अपने कर्तव्य में निस्वार्थ भाव से निमग्न रहने वाले समस्त सैनिकों को नमन.
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अपने जीवन को कुर्बान कर देने वाले, पल-प्रति-पल मौत के साये में बैठे रहने वाले, अपने घर-परिवार से दूर नितांत निर्जन में कर्तव्य निर्वहन करने वाले जाँबाज़ सैनिकों के लिए बस चंद शब्द, चंद वाक्य, चंद फूल, दो-चार मालाएँ, दो-चार दीप और फिर उनकी शहादत को विस्मृत कर देना, उन सैनिकों को विस्मृत कर देना. बस! इतना सा ही तो दायित्व निभाते हैं हम. ये अपने आपमें कितना आश्चर्यजनक है साथ ही विद्रूपता से भरा हुआ कि जिन सैनिकों के चलते हम स्वतंत्रता का आनंद उठा रहे हैं उन्हीं सैनिकों को हमारा समाज न तो जीते-जी यथोचित सम्मान देता है और न ही उनकी शहादत के बाद. समूचे परिदृश्य को राजनैतिक चश्मे से देखने की आदत के चलते, वातावरण में तुष्टिकरण का रंग भरने की कुप्रवृत्ति के चलते, प्रत्येक कार्य के पीछे स्वार्थ होने की मानसिकता के चलते समाज में सैनिकों के प्रति भी सम्मान का भाव धीरे-धीरे तिरोहित होता जा रहा है. न केवल सरकारें वरन आम नागरिक भी सैनिकों को देश पर जान न्यौछावर करने वाले के रूप में नहीं वरन सेना में नौकरी करने वाले व्यक्ति के रूप में देखने लगे हैं; उनके कार्य को देश-प्रेम से नहीं बल्कि जीवन-यापन से जोड़ने लगे हैं; उनकी शहादत को शहादत नहीं वरन नौकरी करने का अंजाम बताने लगे हैं. ऐसा इसलिए सच दिखता है क्योंकि अब सैनिकों के काफिले शहर से  ख़ामोशी से गुजर जाते हैं. उनके निकलने पर न कोई बालक, न कोई युवा, न कोई बुजुर्ग जयहिन्द की मुद्रा में दिखता है, न ही भारत माता की जय का घोष सुनाई देता है. समाज की ऐसी बेरुखी के चलते ही सरकारें भी सैनिकों के प्रति अपने कर्तव्य-दायित्व से विमुख होती दिखने लगी हैं. यदि ऐसा न होता तो किसी शहीद सैनिक के नाम पर कोई नेता अपशब्द बोलने की हिम्मत न करता; किसी सैनिक की शहादत को तुष्टिकरण से न जोड़ा जाता; किसी सैन्य कार्यवाही को फर्जी न बताया जाता.
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संभव है कि एक सैनिक के लिए अपनी जीविका के लिए सेना में जाना मजबूरी रहती हो किन्तु किसी सैनिक की शहादत के बाद भी उसकी संतानों के द्वारा उस पर गर्व करना, सैनिक बनकर देश की रक्षा करने का संकल्प लेना, उस अमर शहीद के परिजनों द्वारा तिरंगे पर बलिदान होते रहने की कसम उठाना तो मजबूरी नहीं हो सकती? बहरहाल, देर तो अभी भी नहीं हुई है. हम सभी को एकसाथ जागना होगा, निरंतर जागे रहना होगा. न सही प्रतिदिन तो माह में किसी एक दिन समस्त सैनिकों को पूरे सम्मान के साथ याद तो कर ही सकते हैं. न सही उनके लिए कोई भव्य आयोजन मगर अपने बच्चों को अपने सैनिकों की वीरता के बारे में तो बता ही सकते हैं. न सही किसी राजनीति का समर्थन किन्तु सैनिकों के अपमान में बोले जाने वाले वचनों का पुरजोर विरोध तो कर ही सकते हैं.
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समाज किसी भी दशा में जाए, राजनीति अपनी करवट किसी भी तरफ ले, तुष्टिकरण की नीति क्या हो, ये अलग बात है मगर सच ये है कि ये सैनिक हैं, इसलिए हम हैं; सच ये है कि सैनिकों की ऊँगली ट्रिगर पर होती है, तभी हम खुली हवा में साँस ले रहे हैं; सच ये है कि वो हजारों फीट ऊपर ठण्ड में अपनी हड्डियाँ गलाता है, तभी हम बुद्धिजीवी होने का दंभ पाल पाते हैं; सच ये है कि वो सैनिक अपनी जान को दाँव पर लगाये बैठा होता है, तभी हम पूरी तरह जीवन का आनन्द उठा पाते हैं; सच ये है कि एक सैनिक अपने परिवार से दूर तन्मयता से अपना कर्तव्य निभाता है, तभी हम अपने परिवार के साथ खुशियाँ बाँट पाते हैं. देखा जाये तो अंतिम सच यही है; कठोर सच यही है; आँसू लाने वाला सच यही है; तिरंगे पर मर मिटने वाला सच यही है; परिवार में एक शहादत के बाद भी उनकी संतानों सैनिक बनाने वाला सच यही है. कम से कम हम नागरिक तो इस सच को विस्मृत न होने दें; कम से कम हम नागरिक तो सैनिकों के सम्मान को कम न होने दें; कम से कम हम नागरिक तो उनकी शहादत पर राजनीति न होने दें; कम से कम हम नागरिक तो उन सैनिकों को गुमनामी में न खोने दें.
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आइये संकल्पित हों, अपने देश के लिए, अपने तिरंगे के लिए और उससे भी आगे आकर अपने जाँबाज़ सैनिकों के लिए. जय हिन्द, जय हिन्द की सेना..!! अंत में पुनः एक नई सुबह की कामना के साथ, वीर सैनिकों को नमन करते हुए आज की बुलेटिन, ११५०वीं बुलेटिन आपके सामने है.

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लेखागार