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सोमवार, 4 सितंबर 2017

सिसकियाँ - १८०० वीं ब्लॉग-बुलेटिन

बहुत साल पहिले एगो सिनेमा बना था “यादें”. सुनील दत्त साहब का सिनेमा अऊर ऊ सिनेमा का खासियत एही था कि उसमें उनके अलावा कोनो कलाकार नहीं था. गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में भी ई सिनेमा सबसे कम कलाकार वाला सिनेमा के लिये दर्ज है. दत्त साहब खुद एक बार बताए थे कि एक रोज ऊ सूटिंग के कार्जक्रम से जल्दी लौट आए घर. नरगिस जी बच्चा लोग को लेकर कहीं बाहर चली गई थीं. जब दत्त साहब घर में अकेले बइठे हुए थे, उनके दिमाग में घर के बच्चा लोग का आवाज गूंजने लगा अऊर परिबार के साथ बिताया हुआ समय सब इयाद आने लगा. ओही टाइम उनके दिमाग में फिलिम “यादें” का आईडिया आया.

एक रोज हमरे साथ भी ओही सब हुआ. हमरी सिरीमती जी अपनी कोनो सहेली के घर पूजा में गई हुई थीं अऊर घर पर हम अकेले. टीवी देखने का मने नहीं हो रहा था. सोचे कि चलो आँख बंद करके तनी झपकी ले लेते हैं. आँख बंद किये हमको दू मिनिट भी नहीं हुआ होगा कि हमको दोसरका रूम से किसी का कराहने का आवाज सुनाई दिया. पहिले त हम सोचे कि हमको सपना ओपना कुछ आ रहा होगा. बाकी जब आवाज तेज हो गया, त हम हड़बड़ा कर उठ गए. एन्ने-ओन्ने नजर दौड़ाए त कोई देखाई नहीं दिया.

कुछ डर अऊर कुछ उत्सुकता से हम दोसरका कमरा में गए त महसूस हुआ कि आवाज कोना मे रखा हुआ आलमारी से आ रहा है. भागकर जब आलमारी खोले त आवाज कम हुआ अऊर अइसा लगा कि जो कराह रहा था ऊ जोर जोर से साँस ले रहा है. हमको बुझाइए नहीं रहा था कि है कौन! हम हिम्मत करके बोले – कौन है? कोनो जवाब नहीं आया. हम आलमारी का पल्ला खोलकर अऊर जोर से बोले – कौन है?? सामने आओ!

आलमारी से कमजोर आवाज आया – जरा सामने से हट जाइए आप! थोड़ी रोशनी और हवा आने दीजिए.
हमको अजीब लग रहा था कि आवाज पहचाना हुआ भी नहीं है अऊर आलमारी के भीतर से आ रहा है. अब ई आलमारी में कऊन हो सकता है.
“क्यों... हमारी आवाज़ पहचानने की कोशिश कर रहे हैं न? एक समय था जब हमारी आवाजें आपकी आवाज़ हुआ करती थीं.”
“आपकी आवाजें – मेरी आवाज़?”
“यही नहीं, अपने सीने पर हमें कितनी बार आपने सुलाया है. अपनी बेटी के अलावा आपने इतना स्नेह और प्यार अगर किसी को दिया है तो सिर्फ हमें.”

अब त हम सचमुच अचम्भा में पड़ गए थे. कऊन हो सकता है हमरा एतना करीबी, जो हमको इयाद नहीं आ रहा है. मन में अफसोस भी हुआ कि अगर ई बात सचमुच सही है त हम अपराधी हैं. माफी माँग लेते हम, बाकी मालूम त चले कि माफी मांगना किससे है.
“प्लीज़!! आप कौन हैं? अगर सचमुच मुझसे ऐसा कोई अपराध हुआ है तो मुझे माफ कीजिये. लेकिन एक बार सामने तो आएँ!”
“आपके सामने ही तो हैं हम सब!”
“सामने?? कहाँ...?”
“एक बार आलमारी के अंदर झाँक कर देख लिया होता, तो आपको यह सवाल पूछना ही नहीं पडता!... नहीं पहचाना? हम हैं आपकी आलमारी में बंद पड़ी किताबें. आपको याद है कब से आपने ये आलमारी नहीं खोली? दम घुटता था हमारा. रोशनी और हवा को तरस गए हम.”

हमको काटो त खून नहीं. नौकरी का भागादौड़ी में किताब सब से मिलने का समये नहीं मिला. मन कचोटने लगा अऊर अंदर से गिल्टी फीलिंग आने लगा. न माफी मांगते बन रहा था, न अफसोस करते. अचानक एक बहुत पहचाना सा आवाज सुनाई दिया आलमारी के अंदर से. ई आवाज पहचाना हुआ था गुलज़ार साहब का.

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से 

बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है


जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधड़े-उधड़े हैं

कोई सफा पलटता है तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते.


इसके बाद हमरे पास न कहने को कुछ बचा था, न सोचने को. हम आलमारी के अंदर अपना चेहरा ले जाकर, सब किताब को अपना होंठ से चूमे अऊर माथा से लगाए... हाथ जोडकर अपराधी के जइसा माथा नवा दिए.

आप लोग भी एक बार अपने मन में सोचिये अऊर एक बार प्यार से हाथ फेरिये ऊ सब किताब पर जिनसे आपका मुलाक़ात नहीं हुआ है. अच्छा लिखने के लिये अच्छा पढना बहुत जरूरी होता है.

ई ओही सब अच्छा पढाई का नतीजा है कि अपना तमाम ब्यास्तता के बावजूद भी हम आप लोग के लिये १८०० वाँ बुलेटिन लिखने का उत्साह जुटा पाए हैं. हमरा अनियमितता के लिये हमको माफ कीजिये, मगर ब्लॉग बुलेटिन के साथ प्यार बनाए रखिये.

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