Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

पुण्यतिथि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पुण्यतिथि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 21 अगस्त 2019

24वीं पुण्यतिथि - सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा नमस्कार।
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (जन्म- 19 अक्तूबर, 1910 - मृत्यु- 21 अगस्त, 1995) खगोल भौतिक शास्त्री थे और सन् 1983 में भौतिक शास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता भी थे। उनकी शिक्षा चेन्नई के प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई। वह नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी. वी. रमन के भतीजे थे। बाद में डा. चंद्रशेखर अमेरिका चले गए। जहाँ उन्होंने खगोल भौतिक शास्त्र तथा सौरमंडल से संबंधित विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं।

20वीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक वैज्ञानिक सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर अपने जीवन काल में ही एक किंवदंती बन गए थे। 'कामेश्वर सी. वाली' चन्द्रशेखर के जीवन के बारे में लिखते हैं कि 'विज्ञान की खोज में असाधारण समर्पण और विज्ञान के नियमों को अमली रूप देने और जीवन में निकटतम संभावित सीमा तक उसके मानों को आत्मसात करने में वह सब से अलग दिखाई देते हैं।' उसके बहुसर्जक योगदानों का विस्तार खगोल - भौतिक, भौतिक - विज्ञान और व्याहारिक गणित तक था। उनका जीवन उन्नति का सर्वोत्तम उदाहरण है जिसे कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है बशर्ते कि उसमें संकल्प, शक्ति, योग्यता और धैर्य हो। उसकी यात्रा आसान नहीं थी। उन्हें सब प्रकार की कठिनाईयों से जूझना पड़ा। वह एक ऐसा व्यक्तित्व था जिसमें भारत, जहां उनका जन्म हुआ, इंग्लैंड और यू.एस.ए. की तीन अत्यधिक भिन्न संस्कृतियों की जटिलताओं द्वारा आकार मिला।

वह मानवों की साझी परम्परा में विश्वास रखते थे। उन्होंने कहा था, 'तथ्य यह है कि मानव मन एक ही तरीके से काम करता है। इससे हम पुन: आश्वस्त होते है कि जिन चीज़ों से हमें आनन्द मिलता है, वे विश्व के हर भाग में लोगों को आनन्द प्रदान करती है। हम सबका साझा हित है और इस तथ्य से इस बात को बल मिलता है कि हमारी एक साझी परम्परा है।' वह एक महान् वैज्ञानिक, एक कुशल अध्यापक और दुर्जेय विद्वान थे।


आज हम सब महान वेज्ञानिक सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर जी की 24वीं पुण्यतिथि पर उनका स्मरण करते हुये उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~











आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।  

मंगलवार, 18 जून 2019

वीरांगना रानी झाँसी को नमन : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज, 18 जून को रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि है. उनका जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था. उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु पुकारा जाता था. झाँसी के राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हुआ. सन 1851 में उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन चार माह पश्चात उसका निधन हो गया. राजा गंगाधर राव को इस घटना से गहरा धक्का पहुंचा. वे लगातार अस्वस्थ रहने लगे और 21 नवंबर 1853 को उनका स्वर्गवास हो गया. इससे पहले उन्होंने अपने चचेरे भाई के पुत्र को गोद लेने सम्बन्धी प्रस्ताव अंग्रेजों के पास भेजा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था. 


राजा के निधन पश्चात् 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत करके झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी. एक वार्ता के क्रम में रानी के घोष मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी के साथ ही विद्रोह का बिगुल बज उठा. अंग्रेजों की राज्य लिप्सा की नीति से उत्तरी भारत के नवाब और राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में विद्रोह की आग भभक उठी. नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तांत्या तोपे आदि रानी के इस कार्य में सहयोग देने आगे आये.

23 मार्च 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ. रानी ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया. वे अपनी पीठ पर दामोदर राव को बाँध घोड़े पर सवार हो अंग्रेजों से युद्ध करती रहीं. युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई झाँसी से कालपी होते हुए ग्वालियर जा पहुँचीं. ग्वालियर पर आक्रमण कर वहां के किले पर अधिकार कर लिया गया. अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता हुआ ग्वालियर पहुँच गया. यहाँ हुए युद्ध में रानी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं. 18 जून 1858 को ग्वालियर का युद्ध उनके लिए अंतिम अंतिम युद्ध सिद्ध हुआ. वे घायल हो गईं और अंततः वीरगति प्राप्त की.


रानी लक्ष्मी बाई के जीवन से दो बातें सीखने योग्य हैं. एक तो उन्होंने उस कालखंड में जबकि पर्दा-प्रथा प्रभावी था किन्तु स्त्री-शिक्षा प्रभावी रूप में नहीं थी, रानी ने महिलाओं की सेना बनाई, उनको प्रशिक्षित किया. दूसरे, बिना किसी स्त्री-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण सम्बन्धी आन्दोलनों के उन्होंने बुन्देलखण्ड और आसपास के अनेक पुरुष राजाओं को अपने झंडे तले लाकर स्त्री-शक्ति का परिचय दिया था.

वीरांगना को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.

++++++++++











रविवार, 31 मार्च 2019

47वीं पुण्यतिथि - मीना कुमारी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933 - 31 मार्च, 1972) भारत की एक मशहूर अभिनेत्री थीं। इन्हें खासकर दुखांत फ़िल्म में उनकी यादगार भूमिकाओं के लिये याद किया जाता है।1952 में प्रदर्शित हुई फिल्म बैजू बावरा से वे काफी वे काफी मशहूर हुईं।

मीना कुमारी का असली नाम माहजबीं बानो था और ये बंबई में पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक मँजे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था। माहजबीं ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था। उनका नाम मीना कुमारीविजय भट्ट की खासी लोकप्रिय फिल्म बैजू बावरा पड़ा। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे। मीना कुमारी के आने के साथभारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं।

1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं।परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाले की होकर सीमित हो गयी। लेकिन ऐसा होने के बावज़ूद उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा।

मीना कुमारी की शादी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ हुई जिन्होंने मीना कुमारी की कुछ मशहूर फिल्मों का निर्देशन किया था। लेकिन स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है। शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी।

आज स्वर्गीय मीना कुमारी जी के 47वीं पुण्यतिथि पर हम सब उनकी शख्सियत और अभिनय को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

बुधवार, 6 मार्च 2019

24वीं पुण्यतिथि - मोटूरि सत्यनारायण और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
मोटूरि सत्यनारायण
मोटूरि सत्‍यनारायण (अंग्रेज़ी: Moturi Satyanarayana, जन्म: 2 फ़रवरी, 1902; मृत्यु:6 मार्च, 1995) दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार आन्दोलन के संगठक, हिन्दी के प्रचार-प्रसार-विकास के युग-पुरुष, गाँधी-दर्शन एवं जीवन मूल्यों के प्रतीक, हिन्दी को राजभाषा घोषित कराने और उसके स्वरूप का निर्धारण कराने वाले महत्त्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे। मोटूरि सत्यनारायण केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के संस्थापक थे।

मोटूरि सत्यनारायण का जन्म 2 फ़रवरी, 1902 को आंध्र प्रदेश में कृष्णा ज़िले के दोण्डपाडू नामक गांव में हुआ था। उनका मत था कि भाषा सार्वजनिक समाज की वस्तु है। अतः इसका विकास भी सामाजिक विकास के साथ-साथ ही चलना चाहिए और केंद्रीय हिदी संस्थान को भाषायी प्रयोजनात्मकता को अपने कार्य का केंद्रीय बिन्दु बनाकर आगे बढना चाहिए। आप प्रयोजनमूलक हिन्दी आन्दोलन के जन्मदाता थे।

केंद्रीय हिंदी संस्थान के जन्‍म का श्रेय मोटूरि सत्‍यनारायण जी को है। इस संस्‍था के निर्माण के पूर्व महात्मा गाँधी की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से स्‍थापित दक्षिण भारत हिन्‍दी प्रचार सभा के माध्‍यम से दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के क्षेत्र में अनुपम योगदान दिया। मोटूरि सत्‍यनारायण ने हिन्‍दीतर राज्‍यों के सेवारत हिन्‍दी शिक्षकों को हिन्‍दी भाषा के सहज वातावरण में रखकर उन्‍हें हिन्‍दी भाषा, हिन्दी साहित्य एवं हिन्‍दी शिक्षण का विशेष प्रशिक्षण प्रदान करने की आवश्‍यकता का अनुभव किया। इसी उद्‌देश्‍य से परिषद्‌ ने सन्‌ 1952 में आगरा में हिन्‍दी विद्यालय की स्‍थापना की। सन्‌ 1958 में इसका नाम ‘‘अखिल भारतीय हिन्‍दी विद्यालय, आगरा' रखा गया। मोटूरि जी को चिन्‍ता थी कि हिन्‍दी कहीं केवल साहित्‍य की भाषा बनकर न रह जाए। उसे जीवन के विविध प्रकार्यों की अभिव्‍यक्‍ति में समर्थ होना चाहिए। उन्होंने कहा -

"भारत एक बहुभाषी देश है। हमारे देश की प्रत्‍येक भाषा दूसरी भाषा जितनी ही महत्‍वपूर्ण है, अतएव उन्‍हें राष्‍ट्रीय भाषाओं की मान्‍यता दी गई। भारतीय राष्‍ट्रीयता को चाहिए कि वह अपने आपको इस बहुभाषीयता के लिए तैयार करे। भाषा-आधार का नवीनीकरण करती रहे। हिन्‍दी को देश के लिए किए जाने वाले विशिष्‍ट प्रकार्यों की अभिव्‍यक्‍ति का सशक्‍त माध्‍यम बनना है।"


आपके द्वारा संस्थापित अन्य संस्थाएँ हैं-अखिल भारतीय हिन्दी परिषद, आगरा, भारतीय संस्कृति संगम, दिल्ली, तेलुगु भाषा समिति, मद्रास और हैदराबाद, हिन्दी विकास समिति, मद्रास एवं दिल्ली और हिंदुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा आदि।

मोटूरि सत्यनारायण केंद्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल आगरा के अध्यक्ष रहे हैं। आप विभिन्न शैक्षिक, तकनीकी, सांस्कृतिक भाषा समिति, साहित्यिक एवं शैक्षिक संस्थाओं के सक्रिय सदस्य रहे हैं और इनकी उन्नति में आपका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। संस्थान के अखिल भारतीय हिन्दी सेवा सम्मान योजना के अंतर्गत सन् 1989 में हिन्दी प्रचार-प्रसार एवं हिन्दी प्रशिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए आपको गंगाशरण सिंह पुरस्कार से सम्मानित करके संस्थान स्वयं गौरवान्वित हुआ। इस योजना के अंतर्गत सन् 2002 से भारतीय मूल के विद्वान् को विदेशों में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के उल्लेखनीय कार्य के लिए आपके नाम से पुरस्कृत किया गया है।

हिन्दी और हिन्दी के माध्यम से अनेकों विद्वानों को उँचाई तक पहुँचाने का श्रेय मोटूरि सत्यनारायण को जाता है। मोटूरि सत्यनारायण और हिन्दी सेवा एक दूसरे के पर्याय थे, हैं और रहेंगे। मोटूरि सत्यनारायण का 6 मार्च, 1995 को निधन हो गया।


आज मोटूरि सत्यनारायण जी की 24वीं पुण्यतिथि पर हम सब हिंदी के प्रति के किये गए उनके अभूतपूर्व योगदान को याद करते हुए उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~

सोशल मीडिया का खतरनाक इस्तेमाल

कश्मीर में भिखारी क्यों नहीं होते?

pesto.tech जो 15 लाख से 60 लाख तक सैलेरी दिलवाने में मदद कर रहे हैं।

ध्वज

आईये, बंद दरवाजों का शहर से एक मुलाकात कीजिये

हिज्जों के बदलाव से ग्रहों को साधने की कवायद







आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शनिवार, 2 मार्च 2019

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, सन 1879 ई. को हैदराबाद में भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. अघोरनाथ चट्टोपाध्याय के यहाँ हुआ था। इनकी माता का नाम वरदासुन्दरी था। सरोजिनी जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की थी। 12 वर्ष की अवस्था में ही सरोजिनी ने मद्रास यूनिवर्सिटी से मैट्रिक उत्तीर्ण किया था। सन 1895 ई. में वह विदेश गई और लंदन के किंग्स कॉलेज व कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में सरोजिनी जी ने 3 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की। श्रीमती सरोजिनी नायडू 1913 में पहली बार राजनीतिक मंच पर आई। 1918 ई. में सरोजिनी नायडू की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। 1925 के कांग्रेस के 48वें अधिवेशन में कानपुर में वह प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष चुनी गई।1926 म वह दूसरी बार पुन : अध्यक्ष निर्वाचित हुई। गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में स्वतन्त्रता आन्दोलन की गतिविधियों को सक्रिय रूप में चलाया। 8 अगस्त, 1942 को वह गिरफ्तार कर ली गई तथा आगा खाँ महल में कारावास में अन्य प्रमुख नेताओं के साथ नज़रबन्द हुई। 1948 में वह उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला राज्यपाल बनी। राज्यपाल के रूप में उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का अभूतपूर्व परिचय दिया। 2 मार्च, 1949 ई. को श्रीमती सरोजिनी नायडू जी का देहावसान हो गया। उन्हें भारत कोकिला की उपाधि से विभूषित किया गया।

आज सरोजिनी नायडू जी के 70वीं पुण्यतिथि पर पूरा हिंदी ब्लॉगजगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है।   


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

75वीं पुण्यतिथि - दादा साहेब फाल्के और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
दादा साहब फाल्के
दादा साहेब फाल्के (अंग्रेज़ी: Dada Saheb Phalke, जन्म: 30 अप्रैल, 1870; मृत्यु: 16 फ़रवरी, 1944) प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक एवं पटकथा लेखक थे जो भारतीय सिनेमा के पितामह की तरह माने जाते हैं। दादा साहब फाल्के की सौंवीं जयंती के अवसर पर दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की स्थापना वर्ष 1969 में की गई थी। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार है, जो आजीवन योगदान के लिए भारत की केंद्र सरकार की ओर से दिया जाता है।




आज दादा साहेब फाल्के जी की 75वीं पुण्यतिथि पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।। 

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

51वीं पुण्यतिथि - पंडित दीनदयाल उपाध्याय और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
Deen-Dayal-Upadhyay.jpg
दीनदयाल उपाध्याय (अंग्रेज़ी: Deendayal Upadhyaya, जन्म: 25 सितंबर, 1916, मथुरा, उत्तर प्रदेश; मृत्यु: 11 फ़रवरी 1968) भारतीय जनसंघ के नेता थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता तथा एक ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवनपर्यंन्त अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी व सत्यनिष्ठा को महत्त्व दिया। वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मज़हब और संप्रदाय के आधार पर भारतीय संस्कृति का विभाजन करने वालों को देश के विभाजन का ज़िम्मेदार मानते थे। वह हिन्दू राष्ट्रवादी तो थे ही, इसके साथ ही साथ भारतीय राजनीति के पुरोधा भी थे। दीनदयाल की मान्यता थी कि हिन्दू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति हैं। दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक एकात्म मानववाद (इंटीगरल ह्यूमेनिज्म) है जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद, दोनों की समालोचना की गई है। एकात्म मानववाद में मानव जाति की मूलभूत आवश्यकताओं और सृजित क़ानूनों के अनुरुप राजनीतिक कार्रवाई हेतु एक वैकल्पिक सन्दर्भ दिया गया है।


आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की 51वीं पुण्यतिथि पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। 

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

13वीं पुण्यतिथि - अभिनेत्री नादिरा और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
नादिरा
नादिरा अथवा फ़रहत एज़ेकेल नादिरा (अंग्रेज़ी: Nadira अथवा Farhat Ezekiel Nadira) (जन्म: 5 दिसंबर, 1932, इज़राइल; मृत्यु: 9 फ़रवरी, 2006) हिन्दी फ़िल्मों की ख्यातिप्राप्त और सुन्दर अभिनेत्रियों में से एक थीं। फ़िल्मी परदे पर नादिरा आत्मविश्वास से भरपूर नजर आती थीं। वे अपने किरदार में पूरी तरह से समा जाती थीं। साठ से भी अधिक फ़िल्मों में अपने बेजोड़ अभिनय की छाप छोडऩे वालीं नादिरा दिलीप कुमार, राजकपूर, मीना कुमारी, राजकुमार और अमिताभ बच्चन आदि अनेक कलाकारों की फ़िल्मों में सिर्फ सहायक ही नहीं, बल्कि विशिष्ट भी बन जाती थीं। अभिनेत्री नादिरा अपने समय से कहीं आगे थीं। लाजवाब ख़ूबसूरती और शाहाना अंदाज की शख़्सियत रखने के बावजूद उन्होंने उस दौर में खलनायिका बनना पसंद किया था, जबकि अन्य नायिकाएँ इस तरह की भूमिकाएँ करने से घबराती थीं।

जन्म तथा परवरिश 

नादिरा का जन्म 5 दिसम्बर, 1932 को इज़राइल में एक बगदादी यहूदी परिवार में हुआ था। उनकी परवरिश एक लड़के के समान हुई थी। वह अपनी गली में वहाँ के लड़कों के साथ फुटबॉल खेला करती थीं। गिल्ली डंडा खेलना भी उन्हें बहुत पसन्द था। उनके स्वभाव में लड़कों सी शरारत और हुड़दंगपन पूरी उम्र बना रहा। वह महिला मित्रों से ज़्यादा खुशी, पुरुष जमावड़े में गपशप करके हासिल करती थी।

फिल्मी शुरुआत

हिन्दी दर्शकों में प्रसिद्धि पा चुकीं नादिरा ने अपने पाँच दशक लंबे फ़िल्मी सफर में अनेकों फ़िल्मों में काम किया, जिनमें उन्होंने नायिका, खलनायिका की भूमिका करने के साथ चरित्र भूमिकाएँ भी निभाईं। उनके अभिनय कैरियर की शुरुआत महबूब ख़ान की सन 1952 में निर्मित फ़िल्म 'आन' से हुई, जिसमें उन्होंने एक बिगडैल राजकुमारी की भूमिका निभाई थी। उन्होंने उस समय की सहमी हुई नायिकाओं के विपरीत एक बोल्ड दृश्य भी दिया। इस फ़िल्म में दिलीप कुमार उनके नायक थे।

इस फ़िल्म में नादिरा द्वारा निभाए गए राजकुमारी राजश्री के रोल के लिए उनसे पहले नर्गिस को चुना गया था, लेकिन किस्मत कुछ और ही लिख रही थी। महबूब ख़ान इस फ़िल्म को जल्द से जल्द पूरा करना चाहते थे। उन्होंने नर्गिस को तारीख़ देने के लिए कहा, किंतु नर्गिस ने अपनी दुविधा जता दी कि उन्होंने राजकपूर की फ़िल्म 'आवारा' साइन कर ली है। महबूब ख़ान जानते थे कि नर्गिस कभी भी राजकपूर की बात नहीं टाल सकतीं। महबूब ख़ान नर्गिस को अपनी फ़िल्म में न लेने की तकलीफ छिपा गए, लेकिन उनकी पत्नी सरदार अख्तर ने तय किया कि वह नर्गिस का कोई विकल्प खड़ा करेंगी। बहुत सोचने के बाद उनकी नजर 'फरहत' (नादिरा) पर टिक गई। उनके नाम पर महबूब भी सहमत हो गए। अपनी फ़िल्म 'आन' में रोल देकर उनकी अलग तरह की सुंदरता को दुनिया के सामने लाने का मन बनाया। उनसे बात की और तय हुआ कि वही 'आन' में दिलीप कुमार के अपोजिट हिरोइन होंगी। फरहत को तब इस फ़िल्म में मशहूर हीरो दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिल रहा था, वे सुहाने ख्वाब देखने लगीं। फरहत को नया नाम दिया गया 'नादिरा', जो 'आन' के रिलीज होते ही रातोंरात स्टार श्रेणी में आ गया।

प्रसिद्ध कलाकारों के साथ कार्य

यह अभिनेत्री नादिरा की कामयाबी ही मानी जाएगी कि उन्हें हर बड़े हीरो के साथ काम करने का अवसर मिला। उस समय की तिकड़ी भी उनकी उपेक्षा नहीं कर सकी। नादिरा दिलीप कुमार के साथ 'आन में' आई और देव आनंद के साथ 'पॉकेटमार' में। राजकपूर ने उन्हें फ़िल्म 'श्री 420' में 'माया' का अलग अंदाज वाली भूमिका दी। अशोक कुमार के साथ 'नगमा', शम्मी कपूर के साथ 'सिपहसालर', प्रदीप कुमार के साथ 'पुलिस' और भारत भूषण के साथ 'ग्यारह हजार लड़कियाँ' आई।

गायकी


सन 1954 में गायक-अभिनेता तलत महमूद के साथ दो फ़िल्मों 'डाक बाबू' और 'वारिस' में भी काम किया। ये फ़िल्में कामयाब रहीं। विशेष बात यह थी कि इन फ़िल्मों में नादिरा ने तलत महमूद के साथ कई गीत भी गाए और अपनी आवाज़ से लोगों को दीवाना बनाया। इस तरह नादिरा ने तीस सालों तक फ़िल्मों में लगातार काम किया। पूरे कैरियर में नादिरा ने कुछ और अभिनेताओं के साथ भी काम किया, उनमें मोतीलाल, आगा, अनवर हुसैन, जयराज, बलराज साहनी, उत्पल दत्त, दलजीत, धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती और ऋषि कपूर आदि उल्लेखनीय हैं।

इसके बाद उन्होंने 'श्री 420' (1956), 'दिल अपना और प्रीत पराई' (1960), 'पाकीज़ा' (1971), 'अमर अकबर एंथनी' (1977) आदि फ़िल्मों में काम किया, जिनमें उन्होंने अधिकतर ऐसी महिला की भूमिका निभाई, जो नायक को अपनी अदाओं से जाल में फंसाने की कोशिश करती है।

चरित्र अभिनय


यद्यपि अभिनेत्री नादिरा ने ज़्यादातर फ़िल्मों में खलनायिका की ही भूमिकाएँ निभाई थीं, लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद को चरित्र अभिनेत्री के रूप में भी ढाल लिया था। बावजूद इसके उनका कद फ़िल्म की किसी मुख्य हिरोइन से कम नहीं होता था। उन्होंने इस्माइल मर्चेट की एक अंग्रेज़ी फ़िल्म 'काटन मैरी' (1999) में भी काम किया था।

विवाह


नादिरा ने दो विवाह किये थे, लेकिन दोनों ही बार वह वैवाहिक सुख से वंचित रहीं। उनका प्रथम विवाह उर्दू शायर, गीतकार और फ़िल्म निर्माता नक्शब से हुआ था। इस दाम्पत्य की बड़ी ही दु:खद परिणति हुई। तब नादिरा ने दूसरा विवाह एक विवाहित व्यक्ति से किया। किंतु ये रिश्ता भी मात्र एक सप्ताह ही चल पाया।

अंतिम फिल्म


शाहरुख ख़ान और ऐश्वर्या राय अभिनीत फ़िल्म 'जोश' नादिरा की अंतिम फ़िल्म थी। फ़िल्म 'जूली' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहनायिका का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' भी मिला था। इस फ़िल्म में उन्होंने नायिका 'जूली' की माँ मार्गरेट का किरदार निभाया था।

निधन 

नादिरा के अधिकांश रिश्तेदारों के इज़रायल चले के जाने के कारण वे जीवन के अंतिम दिनों में अकेली रह गई थीं। अंतिम तीन वर्षो में तो उन्होंने खुद को घर में कैद-सा कर लिया। वे बहुत ज़्यादा शराब पीने लगी थी। शरीर की कमज़ोरी के कारण उन्हें कई तरह की बीमारियों ने घेर लिया। उन्हें मुम्बई के ताड़देव में अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ 9 फ़रवरी, 2006 74 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।


आज प्रसिद्ध अभिनेत्री नादिरा जी की 13वीं पुण्यतिथि पर हम सब उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 21 जनवरी 2019

74वीं पुण्यतिथि - महान क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता संग्रामी रासबिहारी बोस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स सादर नमस्कार।
महान क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता संग्रामी रासबिहारी बोस
रासबिहारी बोस (अंग्रेज़ी: Rash Bihari Bose, जन्म: 25 मई, 1886; मृत्यु: 21 जनवरी, 1945) प्रख्यात वकील और शिक्षाविद थे। रास बिहारी बोस प्रख्यात क्रांतिकारी तो थे ही, सर्वप्रथम आज़ाद हिन्द फ़ौज के निर्माता भी थे। देश के जिन क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता-प्राप्ति तथा स्वतंत्र सरकार का संघटन करने के लिए प्रयत्न किया, उनमें श्री रासबिहारी बोस का नाम प्रमुख है। रास बिहारी बोस कांग्रेस के उदारवादी दल से सम्बद्ध थे। रास बिहारी बोस ने उग्रवादियों को घातक, जनोत्तेजक तथा अनुत्तरदायी आंदोलनकारी कहा। रासबिहारी बोस उन लोगों में से थे जो देश से बाहर जाकर विदेशी राष्ट्रों की सहायता से अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण तैयार कर भारत की मुक्ति का रास्ता निकालने की सोचते रहते थे। 1937 में उन्होंने 'भारतीय स्वातंय संघ' की स्थापना की और सभी भारतीयों का आह्वान किया तथा भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।


आज भारत के महान क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता संग्राम नेता रासबिहारी बोस जी की 74वीं पुण्यतिथि पर हम सब उनको शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~


आपदा में देवदूत सरीखे जवान





आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए नमस्कार। सादर ... अभिनन्दन।। 

बुधवार, 28 नवंबर 2018

भालजी पेंढारकर और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
भालजी पेंढारकर
भालजी पेंढारकर (अंग्रेज़ी: Bhalji Pendharkar, जन्म: 1898 – मृत्यु: 28 नवम्बर, 1994) प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक थे। इन्हें सन् 1991 में सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इनका पूरा नाम 'भालचंद्र गोपाल पेंढारकर' था।

भालचंद्र गोपाल पेंढारकर ने मराठी फ़िल्मों को जिस तरह संवारा वह अद्भुत है। भारत का पहला देसी कैमरा बनाने वाले बाबूराव ने 1925 में बनाई गई भारत की पहली प्रयोगवादी फ़िल्म ‘सावकारी पाश’ को 1936 में आवाज दी। ‘सिंहगढ़’ की शूटिंग के लिए उन्होंने पहली बार रिफलेक्टर का इस्तेमाल किया। पेंढारकर पुणे के सिनेमाघर में गेटकीपर थे। 1927 में ‘वंदे मातरम आश्रम’ बनाने की वजह से गिरफ्तार हुए पेंढारकर ने 88 साल की उम्र में अपनी आखिरी फ़िल्म ‘शाबाश सुनवाई’ बनाई।


आज भालजी पेंढारकर जी की 24वीं पुण्यतिथि पर हिंदी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~
















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

दुर्गा खोटे और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
दुर्गा खोटे
दुर्गा खोटे (अंग्रेज़ी: Durga Khote, जन्म: 14 जनवरी, 1905; मृत्यु: 22 सितंबर, 1991) अपने ज़माने में हिन्दी व मराठी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। उन्होंने अनेक हिट फ़िल्मों में शानदार अभिनय किया। आरम्भिक फ़िल्मों में नायिका की भूमिकाएँ करने के बाद जब वे चरित्र अभिनेत्री की भूमिकाओं में दर्शकों के सामने आईं, तब उनके बेमिसाल अभिनय को आज तक लोग याद करते हैं। दुर्गा खोटे ने क़रीब 200 फ़िल्मों के साथ ही सैंकड़ों नाटकों में भी अभिनय किया और फ़िल्मों को लेकर सामजिक वर्जनाओं को दूर करने में अहम भूमिका निभाई।


आज अभिनेत्री दुर्गा खोटे जी की 27वीं पुण्यतिथि पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

अमर शहीद जतीन्द्रनाथ दास की पुण्यतिथि पर नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 13 सितम्बर अमर शहीद जतीन्द्रनाथ दास की पुण्यतिथि है. उनका जन्म 27 अक्टूबर, 1904 को कोलकाता में एक बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था. जब उनकी उम्र नौ वर्ष की थी तभी उनकी माता का निधन हो गया. सन 1920 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और वे महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गए. इस आन्दोलन में वे गिरफ़्तार किये गए और उन्हें छह माह की सज़ा सुनाई गई. इसके बाद जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस लिया तो निराश जतीन्द्रनाथ आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में भर्ती हो गए. यहाँ उनकी मुलाकात प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई और वे क्रान्तिकारी संस्था हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये. 


सन 1925 में जतीन्द्रनाथ को दक्षिणेश्वर बम कांड और काकोरी कांड के आरोप में गिरफ़्तार कर नज़रबन्द कर दिया गया. जेल में दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने 21 दिन तक भूख हड़ताल की तो उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखकर सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया. जेल से बाहर आकर उन्होंने अपने अध्ययन और राजनीति को जारी रखा. बाद में कांग्रेस सेवादल में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक बनने के दौरान उनकी भेंट सरदार भगत सिंह से हुई. 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके वे इन्हीं के द्वारा बनाये गए थे. 14 जून 1929 को जतीन्द्र गिरफ़्तार कर लिये गए और उन पर लाहौर षड़यंत्र केस में मुकदमा चला. जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से अनशन शुरू कर दिया. जतीन्द्रनाथ भी इसमें शामिल हो गए. जेल अधिकारियों द्वारा इनका अनशन तुड़वाने के लिए जबरदस्ती इनकी नाक में नली डालकर पेट में दूध डालना शुरू किया. इसी जबरदस्ती में नली उनके फेफड़ों में चली गई. उनकी घुटती सांस की परवाह किए बिना एक डॉक्टर ने दूध उनके फेफड़ों में भर दिया. इससे उन्हें निमोनिया हो गया.

इस अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया. कोलकाता में उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग उपस्थित हुए. बुलेटिन परिवार की ओर से उनको हार्दिक नमन.

++++++++++













सोमवार, 27 अगस्त 2018

ऋषिकेश मुखर्जी और मुकेश - ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
ऋषिकेश मुखर्जी

मुकेश
आज हिंदी फिल्म जगत के दो महान कलाकारों की पुण्यतिथि है एक हैं महान फिल्म निर्माता- निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी और दूसरे हैं महान गायक मुकेश। हिंदी फिल्म जगत में इन दोनों ही महान शख्सियतों ने अपना अतुलनीय और सराहनीय योगदान दिया। ऋषिकेश मुखर्जी और मुकेश ने एक साथ केवल दो फिल्मों में काम किया है और वो फिल्म है अनाड़ी (1959) और आनंद(1971)। इन दोनों ही फिल्म के गाने उस दौर में काफी प्रसिद्ध हुए थे। अनाड़ी (1959) फिल्म का गीत "सब कुछ सीखा हमने" और आनंद(1971) फिल्म के दो गीत "मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, सपने सुरीले सपने" तथा "कहीं दूर जब दिन ढल जाएँ"। अनाड़ी (1959) फिल्म के गीत "सब कुछ सीखा हमने" के लिए मुकेश जी को 1959 के सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था। जबकि ऋषिकेश मुखर्जी जी को फिल्म आनंद(1971) के लिए सर्वश्रेष्ट कहानी और बेस्ट एडिटिंग का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला था। इन दोनों ने ही हिंदी फिल्म जगत को असीम ऊँचाइयों तक पहुँचाया।


आज इनकी पुण्यतिथि पर पूरा हिंदी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम इन्हें नमन करती है और हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करती है।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

लेखागार