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गुरुवार, 27 सितंबर 2018

धारा 377 के बाद धारा 497 की धार में बहता समाज : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
विगत दो-तीन दिन से सर्वोच्च न्यायालय ऐतिहासिक निर्णय देने में लगा है. इसी श्रेणी में आज उसके द्वारा व्याभिचार कानून से सम्बंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 पर फैसला सुनाया गया. न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने एकमत से फैसला सुनाया कि व्याभिचार अपराध नहीं है. विगत माह देश की शीर्ष अदालत में इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि व्याभिचार कानून महिलाओं का पक्षधर लगता है लेकिन असल में यह महिला विरोधी है. हाल-फिलहाल व्यभिचार से संबंधित आईपीसी की धारा 497 के बारे में इतना समझिये कि यह धारा किसी विवाहित महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से सम्बंधित है. इसमें दो पक्ष हैं. एक- यदि महिला से कोई गैर-पुरुष बिना सहमति सम्बन्ध बनाता है तो शिकायत पश्चात् सम्बन्ध बनाये जाने पुरुष के खिलाफ रेप का केस दर्ज किया जायेगा. दो- यदि विवाहित महिला अपनी सहमति से किसी गैर-मर्द से सम्बन्ध बनाती है तो उस ऐसी स्थिति में उस पुरुष पर तब कार्यवाही हो सकती है जबकि महिला का पति शिकायत कर दे. यहाँ इसका कोई अर्थ नहीं कि महिला की सहमति से सम्बन्ध बने थे. इसमें भी दोषी वह पुरुष रहता है जिसने सम्बन्ध बनाये. वह व्याभिचार के अपराध का दोषी होगा और उसे इसके लिए पाँच वर्ष की कारावास की सजा या आर्थिक दंड अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है. इस मामले में पत्नी को अपराध में हिस्सेदार नहीं माना जाएगा. हालाँकि यह अपराध महिला के पति की सहमति द्वारा समझौता करने योग्य है. इस धारा को लेकर आधुनिकतावादी, नारीवादी इसलिए खिलाफ थे क्योंकि उनका मानना था कि सहमति से सम्बन्ध बनाये जाने के बाद भी महिला के पति द्वारा शिकायत करना दर्शाता है कि वह महिला उस पुरुष की संपत्ति है. 


यहाँ भले ही इस धारा को समाप्त करने सम्बन्धी फैसला आया है मगर इसके परिणामों को भारतीय समाज के परिदृश्य में देखने की आवश्यकता है. विगत कई वर्षों से लिव-इन-रिलेशन के चलन में आने के बाद से विवाह संस्था कमजोर होती दिखाई दे रही है. इसके बाद समलैंगिक संबंधों के हितों की रक्षा की खातिर धारा 377 की समाप्ति ने विवाह संस्था के साथ-साथ परिवार की नींव को हिलाया है. ऐसे संक्रमणकाल में अदालत के इस फैसले से स्त्री, पुरुष दोनों ही दो अलग-अलग बिन्दुओं पर प्रभावित दिख रहे हैं. अब स्त्री (पत्नी) किसी पुरुष (पति) की संपत्ति के तौर पर नहीं दिख रही है. इसके साथ ही पुरुषों को इस रूप में राहत मिली है कि व्याभिचार कानून के नाम पर अब सिर्फ उन्हें ही अपराधी नहीं माना जा सकता है. इसके बाद भी कहीं न कहीं ये फैसला समाज में व्याभिचार को ही बढ़ावा देगा.

समाज में आज भी बहुतेरे नारीवादी मंचों से महिलाओं के शोषण की बात उठती है, उनके पक्ष में आवाज़ उठाई जाती है. एकाधिक खबरें ऐसी भी आईं हैं जहाँ पति को अपनी ही पत्नी से देह-व्यापार करवाए जाने का अपराधी माना गया. ऐसे में इस फैसले से शोषित पत्नी की दशा और ख़राब होने का खतरा नहीं है? आधुनिकता की दौड़ में अंधे होकर दौड़ रहे समाज में इस फैसले का भी स्वागत हुआ है. इसके परिणाम आने में अभी समय लगेगा. तब तक सब खुद को आधुनिक, समान समझ कर गर्व कर ही सकते हैं.

बहरहाल, अब धारा 377 के बाद इस पर भी सामाजिक बहस की गुंजाइश बची नहीं है. इसलिए इस फैसले का स्वागत किया जाये और आज की बुलेटिन की तरफ चला जाये.

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गुरुवार, 5 मई 2016

विलुप्त होते दौर में - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज की बुलेटिन के साथ हम फिर उपस्थित हैं. कई-कई शब्द किस तरह से अपना मूल अर्थ खोते हुए व्यापकता प्राप्त कर लेते हैं. ऐसे शब्दों को उससे सम्बंधित वस्तु, घटनाक्रम में प्रयुक्त किया जाने लगता है. डालडा, टुल्लू, ऑटो, तेल आदि ऐसे ही शब्द हैं जिनका अपना विशेष सन्दर्भ है किन्तु आज ये व्यापकता के साथ प्रयुक्त किये जा रहे हैं. वनस्पति घी के एक ब्रांड के रूप में सामने आये डालडा को आज ब्रांड नहीं वरन उत्पाद के रूप में देखा जाने लगा है. ऐसा ही अन्य दूसरे शब्दों के साथ हो रहा है. शब्दों की इसी व्यापकता के सन्दर्भ में आज एक शब्द ‘निर्भया’ चर्चा में है. दिल्ली में दिल दहलाने वाली घटना के बाद निर्भया शब्द चलन में आया और आज इसे अन्य दूसरी घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ पाते हैं. देखा जाये तो ये भी एक तरह की भावहीनता है, भावना का विलुप्तिकरण है. 



शब्दों का विलुप्त होना उनके चलन में न रहने के कारण, उनसे गँवईपन का बोध होने के चलते उनको किनारे किये जाने के कारण से होता है. किसी ज़माने में ग्रामीण अंचलों में धड़ल्ले से बोले जाने वाला ‘फटफटिया’ शब्द मोटरसाईकिल से होता हुआ बाइक पर आकर रुक गया. इसी तरह से रोजमर्रा के प्रयोग में आने वाली तश्तरी अब प्लेट में बदल चुकी है, प्याले भी बहुतायत में कप में बदल गए हैं. अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में भी यही हालत बनी हुई है. अनेकानेक शब्द अंग्रेजी के इस्तेमाल के चलते विलुप्त होने की स्थिति में आ गए हैं.

भाषाई स्तर पर ये स्थिति चिंताजनक है, होनी भी चाहिए किन्तु कई बार लगता है कि जब इन्सान ने अपने रिश्तों, संबंधों, परिवार तक को विलुप्त होने की स्थिति में पहुँचा दिया है तो फिर शब्दों की बिसात ही क्या है. तकनीकी के बढ़ते जा रहे प्रभाव के चलते एक अबोल स्थिति इंसानों के मध्य पनपती जा रही है. पत्र से टेलीफोन पर आने और फिर मोबाइल क्रांति के चलते उनका अतीत में बदल जाने को सबने देखा. इधर सूचना तकनीकी क्रांति ने तो उस मोबाइल से होती बातचीत को भी लगभग समाप्त कर दिया है. संदेशों का आदान-प्रदान करके अब कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाने लगी है. सामने वाले ने तो विभिन्न मंचों का प्रयोग करके आप तक सन्देश भेज दिया. अब यदि आपको फुर्सत है तो उसको पढ़ लें अन्यथा की स्थिति में एक अबोल स्थिति तो बनी ही है.

ऐसी अबोल स्थिति में जबकि संवाद विलुप्त हैं, बातचीत में ही शब्द विलुप्त हैं तो फिर भाषाई विलुप्तता से घबराहट किसलिए. हमारे, आपके, सबके बीच से लगातार विलुप्त होती जाती कई-कई चीजों के बीच यदि हम सभी लोग इंसानियत को, मानवता को, भाईचारे को जिन्दा बनाये रखें तो यही बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. इक्कीसवीं सदी में उपलब्धि की इसी प्रत्याशा के बीच आइये आनंद लें आज की बुलेटिन का.

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(चित्र गूगल छवियों से साभार)

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

विस्फोटक स्थिति के बीच हलकी-फुल्की ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
भारतीय नववर्ष की शुभकामनाओं सहित आज की बुलेटिन लिए हम फिर उपस्थित हैं. कितना औपचारिक सा होता जा रहा है, शुभकामनाओं का आदान-प्रदान. कुछ भी तो बदलता नहीं दिखता अपने आसपास. सब कुछ और भी बिगड़ता सा महसूस होता है. कोई आतंकी मारा जाता है तो वो बेटी-बेटा बताया जाने लगता है; कोई आतंकी फांसी चढ़ाया जाता है तो वो शहीद बताया जाने लगता है और कोई अधिकारी मारा जाता है तो ख़ामोशी अख्तियार कर ली जाती है. देश की बर्बादी के नारे लगने वालों की गिरफ़्तारी को कानूनी राय ले जाती है किन्तु तिरंगा फहराने पर देश में ही लाठीचार्ज सहना पड़ता है. ऐसी विस्फोटक, विध्वंसक स्थिति में अनेकानेक बार मन-मष्तिष्क संज्ञा-शून्य हो जाता है. संभव है आप सभी का भी होता होगा. इसलिए आज की बुलेटिन को कुछ हलके-फुल्के रूप में प्रस्तुत करने का मन हो आया है.

इस स्व-लिखित लघुकथा के साथ आज की बुलेटिन का आनंद लीजिये. विश्वास है कि आज के तनाव भरे दौर में आप कुछ हल्का महसूस करेंगे.

मोबाइल में मैसेज के नोटिफिकेशन की घंटी ने आवाज़ दी, उसने लपक कर मोबाइल की स्क्रीन पर खेलना शुरू कर दिया. स्क्रीन पर उभर कर आई तस्वीर देख उसकी आँखें और बड़ी हो गईं. स्क्रीन नग्न स्त्री देह के साथ चमक रही थी, जिसके अंग-प्रत्यंग एक-एक कर बदलती फोटो के साथ सामने आते जा रहे थे. अपने आसपास एक जासूसी, जाँचनुमा निगाह डालने के बाद वो फिर स्क्रीन पर महिला की नग्न देह से खिलवाड़ करने में लग गया. चार-पाँच मिनट खुद खेलने के बाद अब उसके द्वारा उन तस्वीरों को शेयर करने का उपक्रम शुरू कर दिया गया.
तस्वीरें तो शेयर हो ही रही थी और हर शेयर में मृत नारी की नग्न देह की चंद तस्वीरें लोगों की मानसिकता को शेयर कर रही थीं. ये मानसिकता कुछ और बलात्कारियों को जन्म दे रही थी.

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गुरुवार, 21 जनवरी 2016

क्या लिखा जाये, क्या नहीं - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
क्या लिखा जाये, क्या नहीं; किस बात पर चिंतन किया जाये और किस बात पर चिंता; किस मुद्दे का सामाजीकरण किया जाये और किसका राजनीतिकरण समझ से परे है. इस असमंजस के बीच स्व-लिखित बुन्देली कविता के साथ आज की बुलेटिन. 

आनंद लेने का प्रयास कीजिये और समाज में नित नए तरीके से पैदा होते/किये जाते विवादों के समाधान खोजने का भी प्रयास करियेगा.

शेष अगली बुलेटिन में....
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अब है कछु करबे की बिरिया,
आँखन से दूर निकर गई निंदिया।

उनके लानै नईंयाँ आफत,
मौज मजे को जीबन काटत,
पीकै घी तीनऊ बिरिया।
अब है कछु करबे की बिरिया॥

अपनई मन की उनको करनै,
सच्ची बात पै कान न धरनै,
फुँफकारत जैसें नाग होए करिया।
अब है कछु करबे की बिरिया॥

हाथी घोड़ा पाले बैठे,
बिना काम कै ठाले बैठे,
इतै पालबो मुश्किल छिरिया।
अब है कछु करबे की बिरिया॥

कर लेयौ लाला अपयें मन कौ,
इक दिना तो मिलहै हमऊ कौ,
तारे गिनहौ तब भरी दुफरिया,
अब है कछु करबे की बिरिया॥

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गुरुवार, 14 जनवरी 2016

देश-गति के उत्तरायण में होने का इंतजार - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,

मकर-संक्रांति पर्व की शुभकामनाओं सहित आज की बुलेटिन आपके समक्ष है. आज के दिन से ही सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, इसी से इस पर्व को मकर-संक्रांति के नाम से जाना जाता है. इसके साथ ही इसी दिन से सूर्य की उत्तरायण गति भी आरम्भ हो जाती है. शास्त्रों के अनुसार सूर्य के दक्षिणायन रहने को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक और उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है. संक्रांति का भावार्थ अवस्था-परिवर्तन से या फिर किसी स्थिति से गुजरने के रूप में भी लिया जाता है. इधर देखा जाये तो हमारा देश भी संक्रांति-काल से गुजर रहा है. परम्पराओं, संस्कारों की बात करें तो आधुनिक पीढ़ी अपने बने-बनाये नियम कानूनों, परम्पराओं को स्थापित करने की पक्षधर दिख रही है वहीं बुजुर्गवार पुरातन पीढ़ी के संस्कारों, भावों को क्रियान्वित करने पर जोर दे रहे हैं. पारिवारिकता की, सामाजिकता की अत्यंत प्राचीन विवाह संस्था भी संक्रांति-काल से गुजरती हुई संकट के दौर में है. लिव-इन-रिलेशन, समलैंगिकता, विवाहेतर सम्बन्ध, विवाह-पूर्व यौन सम्बन्ध आदि के चलते पति-पत्नी का आपसी विश्वास, प्रेम कहीं दरक सा रहा है. परिवार में, दोस्तों में, सहयोगियों में, समाज में अन्य लोगों में विश्वास, प्रेम, स्नेह, भाईचारा, सद्भाव, सहयोग आदि-आदि संक्रमित दौर में है, संकटग्रस्त है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य रिश्तों की गरिमा बरक़रार नहीं है, उम्र का ख्याल रखे बिना अनेकानेक कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है, इंसानियत का रूप विकृत होकर हैवानियत में परिवर्तित होता जा रहा है.
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परिवार की शांति, सुरक्षा, विश्वास खंडित हो रहा है तो देश की अखंडता, एकता, सद्भाव, भाईचारा आदि पर भी संक्रमण का दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है. बाहरी ताकतों के खतरे के साथ-साथ देश वर्तमान में अंदरूनी फिरकापरस्त ताकतों से भी जूझ रहा है. सीमा पर आतंकी हमले का जितना भय दिखता है उससे कहीं अधिक भय देश के अंदरूनी हिस्सों में आतंकी घटनाओं के होने का बना हुआ है. दिन-प्रतिदिन इस तरह के डर का बढ़ना, अराजक घटनाओं में वृद्धि होते जाना, किसी भी घटना पर अकारण धर्म-मजहब का मुखौटा लगा देना, सहिष्णुता-असहिष्णुता के नाम पर वैमनष्यता फैलाना, सब तरह से सुरक्षित लोगों का भी तुष्टिकरण के चलते जनता को बरगलाने-डराने वाले बयान देना आदि-आदि दर्शाता है कि सबकुछ सामान्य सा तो नहीं है. संक्रांति का ये दौर अत्यधिक भयावह है और इससे जल्द छुटकारा मिलता दूर-दूर तक दिखता नहीं है.
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भगवान भास्कर तो अपनी गति परिवर्तित कर दक्षिणायन से उत्तरायण में आ गए हैं अर्थात देवताओं के दिन, सकारात्मकता तो आरम्भ हो गई है. मन प्रश्न कर रहा है कि हमारा देश गति परिवर्तित करते हुए कब दक्षिणायन से उत्तरायण में आएगा? देश के, देशवासियों के दिन कब नकारात्मकता से सकारात्मकता में आयेंगे? आज की बुलेटिन का आनंद उठाते हुए ऐसे अनेकानेक प्रश्नों के उत्तर तलाशने का प्रयास कीजियेगा.

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अपना-पराया न करें / आलेख / दीपक आचार्य









गुरुवार, 17 सितंबर 2015

धार्मिक कट्टरता की तरफ बढ़ता समाज : ब्लॉग बुलेटिन



नमस्कार साथियो,
आप सभी को गणेश चतुर्थी पर्व की शुभकामनायें. वर्तमान में हमारे समाज का ताना-बाना कुछ इस तरह का हो गया है कि धार्मिक अनुष्ठानों-पर्वों-आयोजनों आदि पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी विवाद की विषयवस्तु बन जाता है. ऐसा किसी एक धर्म विशेष के प्रति न होकर कमोबेश सभी धर्मों के साथ हो रहा है. किसी भी धार्मिक दिवस के, पर्व के आने की आहट मात्र ही उन फिरकापरस्त तत्त्वों को सक्रिय कर देती है जो समाज में विघटन का, अलगाव का, हिंसा का, भय का, उन्माद का वातावरण बनाने की फिराक में लगे रहते हैं. इसमें सबसे बड़ी विडम्बना देखिये कि समाज का वो वर्ग जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहता है, सोशल मीडिया का जमकर उपयोग करता है, खुद को किसी धार्मिक खाँचे से मुक्त बताता है, जो अपने आपको राजनैतिक रूप से भी निरपेक्षता का सबसे बड़ा संवाहक सिद्ध करता है वो भी कहीं न कहीं इन तत्त्वों की चपेट में आ जाता है. इसके बाद शुरू होता है अफवाहों का इधर से उधर प्रसारण, विभेदकारी विचारों का आदान-प्रदान और उसके बाद जन्म लेता उन्माद अलगाववादी ताकतों को सड़कों पर उतार भय, हिंसा के वातावरण का निर्माण करता है; समाज से स्नेह, प्रेम, सौहार्द्र, समन्वय की हत्या करता है. 

बहुत पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं है, हाल ही में कुछ प्रदेशों में सरकारों द्वारा धार्मिक आयोजन के अवसर पर मीट के प्रतिबन्ध जैसा कदम उठाया. इसके बाद क्या हुआ इसको कहने की, बताने की आवश्यकता नहीं है. जहाँ एक तरफ हम विश्व बंधुत्व की बात करते हैं; तकनीकी के चलते सम्पूर्ण विश्व को एक ग्राम के रूप में परिभाषित करते हैं; वसुधैव कुटुम्बकम पर गर्व करते हैं वहीं अपने पड़ोसी के धार्मिक आयोजन का मखौल उड़ाते हैं; अपने सहयोगी के धार्मिक विचारों की अवहेलना करते हैं; अपने परिचित के धार्मिक क्रियाकलापों में व्यवधान पैदा करते हैं. आखिर ये कैसी बंधुत्व की भावना है? आखिर ये कौन सा अपनापन है? आखिर ये किस तरह की धार्मिक सहिष्णुता है? आखिर ये किस तरह की धर्मनिरपेक्षता है? 

वास्तविकता ये है कि तकनीकी रूप से, वैज्ञानिक रूप से सक्षम होते जाने के कारण हम सबने अपने अन्दर एक तरह के अहं को जन्म दे दिया है. ‘सबसे उत्कृष्ट हम, हमारा धर्म, हमारे विचार, हमारे क्रियाकलाप’ आदि ने इंसान इंसान के बीच की दूरी को अदृश्य रूप से बढ़ा दिया है. सामने होते हुए भी हम सामने वाले व्यक्ति से बहुत-बहुत दूर होते जा रहे हैं; धार्मिक रूप से सहिष्णु बनने के बाद भी हम धार्मिक रूप से अत्यंत कट्टर होते जा रहे हैं. एक दूसरे का सम्मान करने के साथ-साथ उसका घनघोर अपमान करते जा रहे हैं. देखा जाये तो कहीं न कहीं हम तकनीकी समाज विकसित करते रहने के साथ-साथ मानवीयता भरा, इंसानियत भरा समाज मिटाते जा रहे हैं. 

आइये इस समाज के मिटने को रोकने का काम करें; समाज को विखंडित करने वालों को समाप्त करने का काम करें; दिलों के बीच बढ़ती दूरियों को मिटाकर स्नेह, प्रेम पैदा करने का काम करे. कामना करें कि आदिदेव श्री गणेश जी इसके लिए शक्ति प्रदान करें. 

तब तक आनंद उठायें आज की बुलेटिन का.... नमस्कार..!!

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गुरुवार, 13 मार्च 2014

दोगला समाज

आदरणीय ब्लॉगर दोस्तों सादर प्रणाम 

प्रस्तुत है आज की बुलेटिन.....

शादी हुई ... दोनों बहुत खुश थे!

स्टेज पर फोटो सेशन शुरू हुआ!

दूल्हे ने अपने दोस्तों का परिचय साथ खड़ी अपनी साली से करवाया " ये है मेरी साली , आधी घरवाली "

दोस्त ठहाका मारकर हंस दिए !

दुल्हन मुस्कुराई और अपने देवर का परिचय अपनी सहेलियो से करवाया " ये हैं मेरे देवर ..आधे पति परमेश्वर "

ये क्या हुआ ....? अविश्वसनीय ...अकल्पनीय!

भाई समान देवर के कान सुन्न हो गए! 

पति बेहोश होते होते बचा!

दूल्हे , दूल्हे के दोस्तों , रिश्तेदारों सहित सबके चेहरे से मुस्कान गायब हो गयी!

लक्ष्मन रेखा नाम का एक गमला अचानक स्टेज से नीचे टपक कर फूट गया!

स्त्री की मर्यादा नाम की हेलोजन लाईट भक्क से फ्यूज़ हो गयी!

थोड़ी देर बाद एक एम्बुलेंस तेज़ी से सड़कों पर भागती जा रही थी!

जिसमे दो स्ट्रेचर थे! एक स्ट्रेचर पर भारतीय संस्कृति कोमा में पड़ी थी ...

शायद उसे अटैक पड़ गया था! 

दुसरे स्ट्रेचर पर पुरुषवाद घायल अवस्था में पड़ा था ...

उसे किसी ने सर पर गहरी चोट मारी थी!

आसमान में अचानक एक तेज़ आवाज़ गूंजी .... भारत की सारी स्त्रियाँ एक साथ ठहाका मारकर हंस पड़ी थीं !

यह चुटकुला या व्यंग आज मुझे एक मित्र ने भेजा | पढ़कर दिमाग में फितूर उठ गया और अब जाकर यहाँ इस लेख के रूप में शांत हुआ है | यह व्यंग ख़ास पुरुष वर्ग के लिए है जो खुद तो अश्लील व्यंग करना पसंद करते हैँ पर जहाँ महिलाओं कि बात आती है वहां संस्कृति कि दुहाई देते फिरते हैं | अपनी नज़रों में तो गिद्ध के समान लार लिए घुमते हैं और ऊँगली दूसरों पर उठाते हैं | सवाल यह उठता है की यह बात कहाँ तक सार्थक है | क्या नारी को अपनी बात कहने का हक़ इस दोगले समाज में है भी या नहीं है ? 

इस पुरुष प्रधान समाज में नारी को जिस हकारत की नज़र से देखा जाता है और एक भोग की वस्तु, प्रयोग की वस्तु, अपने मौज मज़े की वस्तु, एक बंधवा मज़दूर के रूप में देखा जाता है क्या वह सही है ? मेरी सोच से तो इससे ज्यादा निंदनीय बात कोई और हो ही नहीं सकती | 

आज की नारी स्वाबलंबी है | अपने पैरों पर स्वयं खड़ी है | सबका ख़याल रखने में सक्षम है | वो अपनी व्यावसायिक ज़िन्दगी और निजी ज़िन्दगी में भली भांति समन्वय बनाकर चलने वालो में से हैं फिर क्यों पुरुष इस बात को नहीं समझ और स्वीकार कर पाता की नारी सर्वोच्च है सर्वोत्तम है | 

नारी को लेकर हर जगह मर्द हर प्रकार के अश्लील मज़ाक करता है यदि वही स्त्री करे तो उसे आपत्ति है | क्यों भला? उसे भी पूर्ण अधिकार है हर तरह का मजाक करने का | यदि पुरुष यह समझते हैं कि इस प्रकार के मज़ाक से उनकी गरिमा में चार चाँद लग जाते हैं तो उसी प्रकार नारी की गरिमा भी क्यों नहीं बढती ? ऐसे मज़ाक करने पर उनकी गरिमा पर ऊँगली क्यों उठाई जाती है | 

मर्दों को यह समझना होगा कि यदि नारी एक जन्म देने वाली माँ है, दुखों को बांटने वाली दोस्त है, जीवन भर साथ देने वाली पत्नी है, हंसी-मज़ाक, छेड़छाड़ करके दिल लगाने वाली बहन है, एक पिता का गुरूर बेटी है वही स्त्री समय आने पर ज़रुरत के अनुसार स्त्री शक्ति का प्रतीक देवी दुर्गा और काली भी है | 

मुझे तो बड़े दुःख और खेद के साथ ऐसे दोगले समाज की भत्सना करने का दिल करता है जिसका एक हिस्सा मैं स्वयं भी हूँ | आज जो नारी का सम्मान नहीं कर सकते और उन्हें बराबरी का दर्जा देने में असमर्थ हैं वो आगे भविष्य में क्या करेंगे ? ऐसी लिजलिजी सोच, संकीर्ण मानसिकता, अनैतिक रवैया और बदबूदार विचार वाले लोगों के घटिया मस्तिष्क पर थू करके अपने थूक को भी व्यर्थ करने का दिल भी नहीं करता जो किसी लायक ही नहीं हैं | 

हर रोज़, सुबह शाम, आये दिन कहीं ना कहीं नारी का उत्पीड़न हो रहा है, अश्लील व्यवहार हो रहा है, फिल्म जगत में नारी को एक कठपुतली बनाकर पेश किया जा रहा है, सड़क चलते छेड़खानी हो रही है, मोहल्ले के नुक्कड़ पर फितरे कसे जा रहे हैं, बलात्कार की घटनाएँ हो रही हैं, दहेज़ के कारण हत्याएं हो रही हैं, छोटी छोटी बालिकाओं का शोषण हो रहा है | घरों में, दफ्तरों में, अस्पतालों में, विद्यालाओं में, संगठनो में, राजनीति में, फिल्म जगत में, विज्ञापन जगत में और जहाँ ना देखो वहां भी हर पल नारी के प्रति दुर्भावना रखने वाले पाखंडी देखने को मिल ही जाते हैं | इस दोगलेपन की भी हद है | यहाँ तक अगर गौर फरमाएं तो देसी प्रचलित गलियां भी माँ और बहन पर ही आधारित हैं | अरे यार गरियाने का इतना शौक़ है तो बाप भाई पर बना कर दो नारी पर ही क्यों ? 

आख़िर कब तक ? ऐसा कब तक चलता रहेगा ? कब हमारा समाज और पुरुष सोच इस पाखंड का त्याग करेगी ? कब सच का सामना करने की हिम्मत समाज में आएगी ? कब पुरुष की आँखें खुलेंगी ? कब तक ऐसे ही नकारात्मकता का नंगा नाच समाज में होता रहेगा ? अपनी अशिष्टता और असभ्यता की चूड़ियाँ यह पुरुष प्रधान समाज कब तोड़ेगा और अपनी कायरता के सिन्दूर को कब अपनी मांग से मिटाएगा ? कब अपनी कुरीतियों के साथ पुरुष सती होगा ? कब अपनी यौन इच्छाओं, भद्दी भाषावली, कुसंगति और अश्लीलता और फूहड़ मजाकिया लहजे की चिता जलाकर उनकी विधवा कहलायेगा ? कब तक आखिर कब तक ? इन सवालों का जवाब आज नहीं ढून्ढ पाए तो कल तक शायद बहुत देर हो जाएगी | सोच बदलो समाज बदलो चरित्र बदलो व्यक्तित्त्व बदलो | इस सच पर ज़रा गौर फरमाएं और सोचें ....... !

आज की कड़ियाँ 













अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

लेखागार