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शुक्रवार, 23 मार्च 2018

उन युवाओं से क्यों नहीं आज के युवा : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, २३ मार्च भारतीय इतिहास की क्रांतिकारी तारीख कही जा सकती है. आज के दिन उस अंग्रेजी सरकार ने, जिसने समूचे देश में आतंक मचा रखा था, तीन युवाओं के प्रति भारतीय समाज का समर्पण देखकर सजा के लिए निर्धारित तिथि से एक दिन पूर्व ही सजा दे दी थी. देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले असंख्य वीर क्रांतिकारियों में उन तीन युवाओं ने, जिनकी उम्र २३-२४ वर्ष रही थी, आज ही आज़ादी के हवनकुंड में अपने प्राणों की आहुति दी थी. ये तीन युवा किसी परिचय के मोहताज नहीं होंगे; भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के क्रांतिकारी कदमों की देशवासियों को जानकारी होगी, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. आज जानकारी के अभाव में इन तीनों युवाओं या कहें कि विशेष रूप से भगत सिंह को बम, बन्दूक, रिवाल्वर का पर्याय बना दिया गया है. उनके विचारों को विशेष-विचारधारा की चादर ओढ़ाकर उन्हें कभी कामरेड, कभी मार्क्सवादी, कभी समाजवादी बनाया जाने लगता है. उनके आलेख विशेष का सन्दर्भ लेते हुए उन्हें ईश्वरीय-सत्ता विरोधी, नास्तिक बताये जाने की कवायद चलती रहती है. ऐसे लोगों के लिए आज का दिन सर्वाधिक उपयुक्त होता है, जबकि वे इन तीनों क्रांतिकारियों को याद करते हुए अपनी विचारधारा से इतर लोगों को कोसने का काम करने लग जाते हैं.


कई बार मन में विचार आता है कि आखिर ऐसा क्या चला होगा उस समय के युवाओं के मन में जो वे अपने प्राणों की परवाह न करते हुए तत्कालीन सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे? क्या इनके मन में कभी भी एक पल को अपनी मौत का, अंग्रेजी शासन के अत्याचारों का खौफ नहीं जागा होगा? ऐसा विचार इसलिए भी आता है कि आखिर २३-२४ वर्ष की उम्र होती ही कितनी है. आज इतने वर्ष का युवा अपने कैरियर के बारे में सोच रहा होता है. उसे न तो अपने परिवार की समस्याओं को दूर करने की फ़िक्र होती है और न ही उसे समाज की समस्याओं की तरफ ध्यान देने की फुर्सत होती है. क्या उस समय उन युवाओं के मन में अपने कैरियर, अपने परिवार, अपने भविष्य के प्रति कोई मोह नहीं जागा होगा? ऐसी कौन सी शक्ति इनके अन्दर उत्पन्न हो गई होगी जिससे ये शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने की हिम्मत जुटा सके थे? ऐसी कौन सी शिक्षा इनको मिली थी जो महज दो दशक के जीवन में वैचारिकी का उत्कृष्ट उदाहरण सम्पूर्ण देश के लिए ये लोग छोड़ गए? युवा तो आज भी हैं. शिक्षा-व्यवस्था आज तत्कालीन समाज से बेहतर है. अव्यवस्थाएँ तो आज भी बनी हुई हैं. प्रशासनिक निरंकुशता, सरकारी अव्यवस्था तो आज भी दिखाई देती है. फिर आज का युवा इनके खिलाफ विद्रोह का बिगुल क्यों नहीं फूंक पाती है? आज का युवा अपने कैरियर का मोह त्याग कर क्यों नहीं सरकार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा करता है?

जब-जब भी इन सवालों के जवाब भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के इंकलाब के सापेक्ष खोजने का काम किया जाता है तो लगता है कि इनकी वैचारिकी के प्रचार के स्थान पर इनके उस बम को ज्यादा प्रचारित किया गया है जिसे फेंकने के समय उछाले गए पर्चों का पहला ही वाक्य था कि बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है. उनकी क्रांति को सीधे-सीधे बन्दूक से, हत्या से, धमाके से जोड़ दिया गया है. उनके इंकलाब जिंदाबाद को विशुद्ध रूप से अराजकता का द्योतक बताया जाने लगा है. ऐसे में जबकि हमारे ही देश में हमारे देश के इन क्रांतिकारी युवाओं के बारे में संकुचित मानसिकता के साथ जानकारी दी जा रही हो तो कैसे अपेक्षा की जाये कि आज का युवा किसी अव्यवस्था के खिलाफ, किसी अराजकता के विरुद्ध उठ खड़ा होगा. देखा जाये तो आज भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद, नक्सलवाद, सामाजिक अपराध, राजनैतिक अपराध, लूटमार, हत्याएँ, हिंसा, जातिगत विभेग, लिंगभेद आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जो भले ही विदेशी शासन न हों पर विदेशी शासन जैसी दिखती हैं. इसके बाद भी आज का समाज, विशेष रूप से युवा इनके प्रति अनभिज्ञ बना हुआ अपने आपमें ही खोया हुआ है. उसके लिए उसके आसपास की दुनिया ही उसका अपना देश है. उसके लिए अपना कैरियर ही उसकी आज़ादी है.

ऐसी विद्रूप स्थितियों में हम शहीदी दिवस मनाने की औपचारिकता का निर्वहन कर लेते हैं. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की प्रतिमाओं, चित्रों पर माल्यार्पण कर लेते हैं. उनके बारे में चलन में बनी सामान्य सी जानकारी को चंद लोगों के बीच गोष्ठी रूप में बार-बार प्रसारित करते रहते हैं. भगवा और लाल रंग का विभेद कर देश के लिए प्राण न्योछावर कर देने वाले युवाओं का भी बंटवारा कर लेते हैं. इन सबके बीच कभी किसी ने विचार करने का प्रयास किया है कि उस दिन असेम्बली में बम फेंकने की घटना के समय भगत सिंह के साथ राजगुरु, सुखदेव तो थे नहीं फिर इन दोनों वीरों को भगत सिंह के साथ फाँसी क्यों? उस दिन भगत सिंह के साथ एक अन्य युवक जो साथ था, उन बटुकेश्वर दत्त को आज कौन याद कर रहा है? उस वीर नौजवान के साथ क्या हुआ? आज भले ही शहीद भगत सिंह अपने अन्य साथियों के सापेक्ष बहुत बड़े कद के दिखाई देते हों पर हम सभी का कर्तव्य है कि देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देने वालों के चित्र यदि एकसाथ रखे हों तो हम सबको पहचान सकें. इनके विचारों को किसी विचारधारा विशेष के खाँचे में बाँधकर प्रसारित न करें. आने वाली पीढ़ी को समझाएं कि आज वे जिस आज़ाद हवा-पानी में अपना जीवन गुजार रहे हैं वह ऐसे युवाओं के कारण संभव है. आज की पीढ़ी को बताना होगा कि भगत सिंह सहित अन्य युवा क्रांतिकारी हिंसा का, बन्दूक का, बम का पर्याय नहीं हैं. ऐसे वीर युवकों के विचारों की सान पर आज की पीढ़ी को तैयार करना होगा ताकि वह भी आज के समस्यारुपी शासकों के खिलाफ बिगुल फूंक सके.

यदि हम सब मिलकर खुद जाग सकें, आज की पीढ़ी को जगा सकें, आने वाली पीढ़ी को इन वीरों के बारे में समझा सकें, इन सबकी पहचान करवा सकें तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु सहित अनेकानेक ज्ञात-अज्ञात वीरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

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गुरुवार, 28 सितंबर 2017

दो विभूतियों का जन्मदिन मनाता देश - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
देश भर में रोज ही हजारों लोग जन्म लेते हैं, आज भी लेते हैं, पहले भी जन्मते रहे हैं. उनमें से बहुत से लोग तो इतिहास के पन्नों में गुमनाम होकर चले गए. उन्हीं में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सदियों के लिए अपना नाम अमर करवा जाते हैं. आज, २८ सितम्बर को भी बहुत से लोगों का जन्मदिवस होता है. उन्हीं में से कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों तक देशवासियों के दिल-दिमाग में अपनी उपस्थिति बनाये रहेंगे.

ऐसे लोगों में एक नाम ऐसा है जो अब हमारे बीच नहीं है मगर समूचे युवाओं के लिए आज भी प्रेरणास्त्रोत है. ये नाम है अमर शहीद सरदार भगत सिंह का. जो बहुत कम उम्र में देश की आज़ादी के लिए अपने आपको बलिदान कर गए. सरदार भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के ज़िला लायलपुर में बंगा गाँव में हुआ था. देशभक्त परिवार में जन्म होने के कारण उन पर भी इसका अनुकूल प्रभाव पड़ा.
दूसरा नाम है भारत रत्न से सम्मानित मशहूर पार्श्वगायिका लता मंगेशकर. उन्होंने विगत कई वर्षों से संगीत की दुनिया को अपनी सुमधुर आवाज़ से रसमय बनाया हुआ है. स्‍वर कोकिला के नाम से प्रसिद्द लता मंगेशकर ने बीस भाषाओं में तीस हजार से अधिक गाने गाये हैं. लता मंगेशकर का जन्म इंदौर मध्यप्रदेश में 28 सितम्बर 1929 को हुआ था. उन पर भी अपने परिवार का प्रभाव पड़ा था. उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल रंगमंचीय गायक थे. उन्होंने लता मंगेशकर को तब से संगीत सिखाना शुरू किया जब वे पाँच साल की थी.



यह संयोग ही है कि जिस समय युवा भगत सिंह देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को तत्पर थे, हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूमने को चल पड़े थे तब आज की स्वर कोकिला महज दो वर्ष की थीं. देश की दोनों प्रतिभाओं पर अपने-अपने परिवार का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा. उन दोनों ने अपने-अपने को अपने मनपसंद जिस क्षेत्र में अर्पित किया उसमें अपने को पूरी तत्परता से झोंक सा दिया था. यही कारण है कि दोनों लोग जो सन्देश समाज को देना चाहते थे, स्पष्ट रूप से दे गए.

सरदार भगत सिंह का असेम्बली में बम फेंकने के बाद स्वयं को गिरफ्तार करवाने का मंतव्य भी यही था कि वे अदालती कार्यवाही में देश के सामने तथ्यात्मकता पेश कर सकें. इसमें वे पूरी तरह सफल हुए और अंग्रेजी सरकार के कुत्सित निर्णयों को जनता के सामने अदालत के माध्यम से प्रस्तुत कर सके. इसी तरह लता मंगेशकर के नाजुक कन्धों पर परिवार की जिम्मेवारी आ गई. उन्होंने अपने सुखों, अपने जीवन को अपने छोटे भाई-बहिनों के लिए समर्पित कर दिया.


सरदार भगत सिंह की क्रांति ने आज भी युवाओं को प्रभावित कर रखा है. उसी तरह लता मंगेशकर की मधुरतम गायकी ने सभी उम्र के लोगों को अपना प्रशंसक बनाया हुआ है.

आज जन्मदिन के अवसर पर सरदार भगत सिंह को सादर श्रद्धांजलि और लता मंगेशकर को शुभकामनायें कि वे स्वस्थ रहें और भारतीय संगीत को कुछ न कुछ नया सुर प्रदान करती रहें.


लीजिये, आज की बुलेटिन आपके लिए...

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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

निर्दोष साबित हों भगत सिंह और उनके साथी

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा.
कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे,
जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा.
कुछ ऐसा सोचते हुए हमारे वीर बाँकुरे देश को आज़ादी दिलाने के लिए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया करते थे. समय गुजरने के साथ-साथ वीरों की शहादत को भुलाया सा जाने लगा. उनको निश्चित तिथियों, जयंतियों, राष्ट्रीय पर्वों पर औपचारिकतावश याद करने की परिपाटी सी विकसित कर ली गई. कालांतर में राजनीति के चलते, शहीदों को जाति, धर्म, क्षेत्र में बाँटने के साथ-साथ उनको आतंकवादी, अराजकता फ़ैलाने वाला, हिंसक प्रवृत्ति का साबित करने का प्रयास किया जाने लगा. पाठ्यक्रमों से उनकी शहादत के किस्से गायब हैं; उनकी वास्तविकता कहीं दफ़न है; उनके जीवन से सम्बद्ध सामग्री को, विचारों को कैद कर दिया गया है.

कहा जाता है कि अंधकार कितना भी घना क्यों न हो रौशनी की एक छोटी सी पुंज भी उसका खात्मा कर देती है. रात कितनी भी काली क्यों न हो सूर्य की पहली किरण उसको मिटाकर भोर का उजास कर देती है. कुछ ऐसे ही उजाले के आने और अँधेरे के दूर होने का सुखद आभास हो रहा है. पाकिस्तान में लाहौर हाईकोर्ट में एक बड़ी बेंच बनाये जाने का आदेश दिया है, जिसके माध्यम से शहीद भगत सिंह की फाँसी के 85 वर्ष बाद उनको बाइज्जत बरी करवाने की कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है. पाकिस्तान के ‘भगत सिंह मेमोरियल फ़ाउंडेशन’ नामक संगठन द्वारा दायर याचिका पर इस केस को सुनवाई हेतु दोबारा खोला जा रहा है. स्मरण रहे कि भगत सिंह के साथ-साथ सुखदेव और राजगुरु को सांडर्स हत्याकांड में सजा की निर्धारित तिथि 24 मार्च से एक दिन पहले 23 मार्च 1931 को गुपचुप तरीके से रात में फाँसी दे दी गई थी.

फाउंडेशन के चेयरमैन इम्तियाज़ राशिद कुरैशी के अनुसार ये तीनों शहीद निर्दोष थे और उनको किसी साजिश के तहत फाँसी दी गई थी. इसी कारण से फ़ाउंडेशन द्वारा सन 2014 में लाहौर कोर्ट में याचिका दायर कर सांडर्स हत्याकाण्ड में दर्ज FIR की कॉपी माँगी गई. कोर्ट के आदेश पर सम्बंधित अनारकली थाने के रिकॉर्ड की छानबीन करने पर लाहौर पुलिस को सांडर्स हत्याकांड की FIR मिली. 17 दिसंबर 1928 को शाम 4 बजकर 30 मिनट पर लिखी FIR में दो अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा कायम किया गया था. आश्चर्य की बात यह है कि उर्दू में लिखी इस FIR में शहीद भगत सिंह का नाम ही नहीं था. इसके साथ ही एक और खुलासा हुआ कि भगत सिंह के मामले की सुनवाई के दौरान 450 गवाहों को सुने बिना भगत सिंहसुखदेव और राजगुरु को मौत की सज़ा सुना दी गई थी. इतना ही नहीं केस की सुनवाई में भगत सिंह के वकीलों को अपनी बात रखने का मौका भी नहीं दिया गया था. याचिकाकर्ता ने यहाँ तक दावा किया है कि भगत सिंह को पहले उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी बाद में आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए उन्हें फाँसी दे दी गई.

अब जबकि एक संगठन की पहल पर लाहौर हाईकोर्ट ने उस केस को दोबारा सुनवाई हेतु खोला है, तो आशा की किरण बँधती दिखाई देती है. अंतिम परिणाम क्या होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है पर हम सब आशान्वित हैं कि शहीदों के साथ होती आई साजिशों का खुलासा एक-एक करके अवश्य ही होगा. इस आस-ज्योति को प्रज्ज्वलित रखते हुए आनंद लें आज की बुलेटिन का, शेष अगले सप्ताह.

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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !




कुछ बहरों को सुनाने के लिए एक धमाका आपने तब किया था ,
एसे ही कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है,
हो सके तो आ जाओ !! 
 
 
शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी को उनके १०५ वे जन्मदिवस पर पूरे ब्लॉग जगत की ओर से शत शत नमन | 
 
इंकलाब ज़िंदाबाद !! 
 
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शहीदे आजम रहा पुकार

ई. प्रदीप कुमार साहनी at मेरा काव्य-पिटारा
*("शहीदे आजम"* सरदार भगत सिंह के जन्म दिवस पर श्रद्धांजलि स्वरूप पेश है एक रचना ) जागो देश के वीर वासियों, सुनो रहा कोई ललकार; जागो माँ भारत के सपूतों, शहीदे आजम रहा पुकार | सुप्त पड़े क्यों उठो, बढ़ो, चलो लिए जलती मशाल; कहाँ खो गई जोश, उमंगें, कहाँ गया लहू का उबाल ? फिर दिखलाओ वही जुनून, आज वक़्त की है दरकार; जागो माँ भारत के सपूतों, शहीदे आजम रहा पुकार | पराधीनता नहीं पसंद थी, आज़ादी को जान दी हमने; भारत माँ के लिए लड़े हम, आन, बान और शान दी हमने | आज देश फिर घिरा कष्ट में, भरो दम, कर दो हुंकार; जागो माँ भारत के सपूतों, शहीदे आजम रहा पुकार | कई कुरीति,... more » 
 

उम्रदराज़ लोगों में लिव-इन रिलेशनशिप

जीवन के सांझ का अकेलापन, सबसे अधिक दुखदायी है. इसलिए भी कि जिंदगी की सुबह और दोपहर तो जीने की जद्दोजहद में ही बीत जाती है. सांझ ही ऐसा पडाव है,जहाँ पहुँचने तक अधिकांश जिम्मेदारियाँ पूरी हो गयी होती हैं. जीवन के भाग-दौड़ से भी निजात मिल जाती है और वो समय आता है,जब जिंदगी का लुत्फ़ ले सकें. सिर्फ अपने लिए जी सकें. अपने छूटे हुए शौक पूरे कर सकें. अब तक पति-पत्नी पैसे कमाने ,बच्चों को संभालने....सर पर छत का जुगाड़ और चूल्हे की गर्मी बचाए रखने की आपाधापी में एक दूसरे का ख्याल नहीं रख पाते थे .एक साथ समय नहीं बिता पाते थे.और आजकल उन्नत चिकित्सा सुविधाएं ,अपने खान -पान..स्वास्थ्य के more » 
 

जनसंघर्ष ,विद्रोह और विविधता के कवि -जनकवि नागार्जुन

जयकृष्ण राय तुषार at सुनहरी कलम से...
जनकवि -नागार्जुन समय -[30-06-2011से 05-11-1998] परिचय - नागार्जुन हिंदी कविता में एक विलक्षण कवि हैं |वह जिस खाँचे में फिट बैठते उसका निर्माण या सृजन स्वंय उन्होंने ही किया है |जिस तरह छायावाद के कवियों में प्रसाद ,निराला ,पन्त और महादेवी को महत्वपूर्ण माना जाता है उसी तरह प्रयोगवादी कवियों में शमशेर ,त्रिलोचन ,केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन को माना जाता है |नागार्जुन किसान ,मजदूरों ,छात्रों के आंदोलनों के साथ -साथ बहुत बड़े राजनीतिक कवि भी माने जाते हैं |जनकवि नागार्जुन रूप और विविधताओं के कवि हैं | जनसंघर्षों के कवि हैं |इनकी कवितायें बिना किसी लाग -लपेट के सीधे व्यवस्था की पीठ पर ... more »

श्रद्धांजलि

*कार्टूनिस्ट डॉ. सतीश श्रृंगेरी का निधन* लोकप्रिय कन्नड़ कार्टूनिस्ट और आयुर्वेद चिकित्सक सतीश श्रृंगेरी का आज सुबह (२७ सितम्बर, २०१२ को) फ़ेंफ़ड़ों से जुड़ी संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया। उनकी आयु केवल ४४ वर्ष थी। कला-कार्टूनकला में उनकी बचपन से ही रुचि रही। अभिनव रामानन्द हाई स्कूल (किग्गा), जो श्रंगेरी के निकट एक दूरस्थ गांव है, में पढ़ाई के दौरान उन्होंने ड्रॉइंग का खूब अभ्यास किया और बहुत से कार्टून-कैरीकेचर बनाए। उन्होंने कार्टून कला सिखाने के लिए भी प्रयास किया। वह श्री जगद्गुरु चंद्रशेखर भारती मे
 

निदा फ़ाजली के दोहे

NAVIN C. CHATURVEDI at ठाले बैठे
सीधा साधा डाकिया जादू करे महान इक ही थैली में भरे आँसू अरु मुस्कान ॥ घर को खोजे रात दिन घर से निकले पाँव वो रस्ता ही खो गया जिस रस्ते था गाँव॥ मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार दिल ने दिल से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार॥ बच्चा बोला देखके मस्जिद आलिशान अल्ला' तेरे एक को इत्ता बड़ा मकान॥ 
 

ख्वाब तुम पलो पलो

तन्हा कदम उठते नहीं साथ तुम चलो चलो नींद आ रही मुझे ख्वाब तुम पलो पलो आशिक मेरा हसीन है चाँद तुम जलो जलो वो इस कदर करीब है बर्फ़ तुम गलो गलो देखते हैं सब हमें प्रेम तुम छलो छलो जुदा कभी न होंगे हम वक्त तुम टलो टलो दूरियां सिमट गयीं हसरतों फूलो फलो नेह दीप जलता रहे उम्मीद तुम मिलो मिलो 
 

एक अच्छे उद्देश्य के आंदोलन का बुरा अंत

गगन शर्मा, कुछ अलग सा at कुछ अलग सा
करीब दो साल पहले अन्ना हजारे के दिशा-निर्देश में शुरू हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का जो हश्र हुआ है,वह दुखदाई तो है ही साथ ही करोड़ों देश वासियों की उम्मीदों पर भी पानी फेरने वाला साबित हुआ। आम-लोगों को एक आस बंधी थी कि उनकी मेहनत की कमाई का वह हिस्सा जो टैक्स के रूप में सरकार लेती है और जिसका अच्छा-खासा प्रतिशत बेईमानों की जेब में चला जाता है, उसका जनता की भलाई में उपयोग हो सकेगा। उनको अपना हक पाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पडेगा। भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और भ्रष्टाचारियों की नकेल कसी जा सके। रोज-रोज की घोटाले की खबरों और उसमें लिप्त सफेद पोशों के काले चेहरों को देख आम आदमी पूरी त... more » 
 

नौजवान भारत सभा का गठन

Digamber Ashu at विकल्प - 4 hours ago
भगत सिंह ने 1926 से ही वास्तविक प्रजातंत्र यानी समाजवादी प्रजातंत्र की ओर अपने कदम बढ़ा दिये थे. इसी लक्ष्य के लिए उन्होंने अपने साथी भगवती चरण वोहरा के सहयोग से 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना करने का बीड़ा उठाया और यह जानते हुए कि क्रांति का काम देश की आम जनता को संगठित किये बिना सम्भव न होगा, उन्होंने पंजाब में जगह-जगह 'नौजवान भारत सभा' की इकाइयां गठित करने का काम शुरू कर दिया. 'नौजवान भारत सभा' नाम से ऐसा जान पड़ता है कि मानो यह छात्रों-नौजवानों की माँगों के दायरे में काम करने वाला ही संगठन होगा, लेकिन असल में उनका यह संगठन भारत की आज़ादी एवं मजदूरों-किसानों की शोषण-दमन से पूर्ण म... more » 
 

काश,बर्फी के कानों की जांच हुई होती !

Kumar Radharaman at स्वास्थ्य
आज* टाइम्स ऑफ इंडिया* में मुंबई से छपी एक रिपोर्ट कहती है कि इस बारे में अभी निश्चित रूप से भले कुछ न कहा गया हो कि मोबाइल फोन का बहरेपन से संबंध है अथवा नहीं,मगर डाक्टरों का कहना है कि जो शिकायतें पहले साठ साल से ज्यादा के लोगों में मिलती थीं,अब बीस-पच्चीस साल के युवाओं में भी मिल रही हैं। कान में पैदा हो रही समस्याएं ट्यूमर तक का कारण बन रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि मोबाइल से दूर रहने वालों की तुलना में,इसके प्रयोक्ता में ऐसा ट्यूमर होने की संभावना 50 फीसदी ज्यादा होती है। बहरेपन की मूल वजह है वांछनीय स्तर से अधिक तेज़ आवाज़ को अधिक देर तक सुनने की आदत। यदि हम 80  more » 
 

हो रहा भारत निर्माण ( व्यंग्य कविता )

मुकेश पाण्डेय चन्दन at मुकेश पाण्डेय "चन्दन"
१२ सितम्बर को साहित्य अकादमी , मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् भोपाल तथा हिंदी विभाग , डॉ हरी सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय , सागर द्वारा आयोजित ' पद्माकर समारोह ' काव्यपाठ हुआ . जिसमे कई बड़े कवि-कवियत्रियो के साथ मैंने भी अपनी कवितायेँ पढ़ी . उनमे से एक कविता आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ . हो रहा भारत निर्माण ! *ऐ जी , ओ जी , लो जी , सुनो जी * *हम करते रहे जी -जी , वो कर गए 2 जी * *महंगाई का चढ़ा पारा , बिगड़ी वतन की हेल्थ * *सब मिल के खा गए , खेला ऐसा कामनवेल्थ * *दुनिया करे छि-छि , हो कितना भी अपमान * *अबे चुप रहो ! हो रहा भारत निर्माण ..... * *पेट्रोल इतना महंगा , पकड़ो अ... more » 
 

शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी की १०५ वी जयंती पर विशेष

शिवम् मिश्रा at बुरा भला
*कुछ बहरों को सुनाने के लिए एक धमाका आपने तब किया था ,* *एसे ही कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है,* *हो सके तो आ जाओ !! * * * * * *शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी को उनके १०५ वे जन्मदिवस पर सभी मैनपुरीवासीयों की ओर से शत शत नमन | * * * *इंकलाब ज़िंदाबाद !! *  
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सादर आपका 
 


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