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शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014 (7)




अहंकार से सबकुछ नष्ट हो जाता है अंततः 
- मैं भी मानती हूँ 
पर अहंकारियों की शक्ति जल्लाद जैसी होती है 
विनम्रता के कटे सर लेकर अहंकार अट्टहास करता है 
दबी ज़ुबान से विनम्रता की गाथा कही जाती है 
पर उसके पार्श्व से बोलने को कोई नहीं होता  … 


साँकल

शिखा गुप्ता http://shikhagupta83.blogspot.in/

कई नाग फुँफकारते हैं
अँधेरे चौराहों पर
अटकने लगती है साँसों में
ठिठकी सी सहमी हवायें
खौफनाक हो उठते हैं
दरख्तों के साये भी
अपने ही कदमों की आहट
डराती है अजनबी बन
सूनी राह की बेचैनी
बढ़ जाती है हद से ज़्यादा
तब ...
टाँक लेते हैं दरवाज़े
खुद ही कुंडियों में साँकल
कि इनमें क़रार है पुराना
रखनी है इन्हें महफूज़
ज़िंदगी की मासूमियत

संभल  रहना मगर ए ज़िंदगी !
होने लगती है लहूलुहान
कच्ची मासूमियत भी कभी
कुंडी में अटकी साँकल जब
हो जाती है दरवाज़ों से बड़ी



अकाल के बाद

प्रीति सुराना http://priti-deshlahra.blogspot.in/


सुनो!!
अकसर 
अकाल के बाद
सूखी जमीन को देखकर लगता है 
जमीन बंजर हो गई है,.
जबकि 
संभावनांए इंगित करती है
कहीं गहराई में कंही पल रहा है
कोई लावा,..
पर
जरा सी बारिश के आते ही
जमीन नम तो होती है 
लेकिन बढ़ जाती है उमस,..
क्यूंकि 
जमीन को ऊपर से आती बूंदे
शीतल करने की कोशिश करती हैं,..
पर अन्दर सुलगते लावे का ताप उसे वाष्पित करता है,..
हां !!
आज मैंने
खुद महसूस किया,
जमीन बारिश और लावे की 
इस जटिल परिस्थिति को,..
क्यूंकि
अरसे बाद मेरे मन की जमीन पर
आंसुओं की चंद बूंदे बरसी,
और तभी से बढ़ गई मन की बेचैनी,..
शायद
मन की गहराई में दबे पड़े कई संताप,..
जो मौसम की तरह बदली परिस्थितियों में
निकल पड़े आसुओं के कारण उभर आए,..
तभी तो 
रोकर मन शांत होने की बजाय 
जाग उठे दबे हुए सारे दर्द,..
जो छुपा रखे थे सबसे,..मैंने जाने कबसे,..
पर सुनो,..,..!!
अच्छा ही हुआ 
आज चंद बूंदे बरस गई,..
सुना है,..
दबे हुए लावे अकसर ज्वालमुखी बन जाते हैं,..
लेकिन 
मैंने ये भी सुना है
ज्वलामुखी विपदाओं के साथ साथ 
जमीन में छुपे हुई कीमती संपदाओं को भी बाहर लाता है,..
सच कहूं
आज मैं बहुत असमंजस में हूं,..
मेरे लिए ये आंसू अच्छे हैं 
या मन की घुटन,..???
जो भी हो
आज फिर यही समझा है मैंने
हर चीज सिर्फ अच्छी या सिर्फ बुरी नही होती,..
बल्कि सिक्के के दो पहलुओं की तरह होती है,.. है ना !!!!!! ,... 


आवाज़ मौन की

...कैलाश शर्मा http://sharmakailashc.blogspot.in/
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जीवन के अकेलेपन में     
और भी गहन हो जाती
संवेदनशीलता,
होता कभी अहसास
घर के सूनेपन में
किसी के साथ होने का,
शायद होता हो अस्तित्व
सूनेपन का भी.
     ***
शायद हुई आहट           
दस्तक सुनी दरवाज़े पर
पर नहीं था कोई,
गुज़र गयी हवा
रुक कर कुछ पल दर पर,
सुनसान पलों में हो जाते
कान भी कितने तेज़
सुनने लगते आवाज़
हर गुज़रते मौन की.
      ***
आंधियां और तूफ़ान       
आये कई बार आँगन में
पर नहीं ले जा पाये
उड़ाकर अपने साथ,
आज भी बिखरे हैं
आँगन में पीले पात
बीते पल की यादों के
तुम्हारे साथ.

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014 (6)




अच्छी बातें सीखने में बड़ी परेशानी होती है 
सीधे खड़े रहो,
मुँह मत टेढ़ा करो,
स्थिर बैठो  … 
ऐसी जाने कितनी सीख !
सिखानेवाला उस वक़्त बहुत बुरा लगता है 
पर एक वक़्त आता है 
जब इस सीख से 
एक तराशा हुआ चेहरा निकलता है 


मेट्रो चिंतन..

शिखा वार्ष्णेय http://shikhakriti.blogspot.in/
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मेट्रो के डिब्बे में मिलती है
तरह तरह की जिन्दगी ।
किनारे की सीट पर बैठी आन्ना
और उसके घुटनों से सटा खड़ा वान्या    
आन्ना के पास वाली सीट के
खाली होने का इंतज़ार करता
बेताब रखने को अपने कंधो पर
उसका सिर
और बनाने को घेरा बाहों का।
सबसे बीच वाली सीट पर
वसीली वसीलोविच,
जान छुडाने को भागते
कमीज के दो बटनों के बीच       
घड़े सी तोंद पे दुबकते सन से बाल   
रात की वोदका का खुमार.
खर्राटों के साथ लुढका देते है सिर
पास बैठे मरगिल्ले चार्ली के कंधे पे         
तो उचक पड़ता है चार्ली                  
कान में बजते रॉक में व्यवधान से।
और वो, दरवाजे पर किसी तरह
टिक कर खड़ी नव्या                                  
कानों में लगे कनखजूरे के तार से जुड़ा
स्मार्ट फ़ोन हाथ में दबाये
कैंडी क्रश की कैंडी मीनार बनाने में मस्त
नीचे उतरती एनी के कोट से हिलक गया
उसके कनखजूरे का तार
खिचकर आ गई डोरी के साथ
तब आया होश जब कैंडी हो गई क्रश।
सबके साथ भीड़ में फंसे सब
गुम अपने आप में       
व्यस्त अपने ख्याल में 
कुछ अखबार की खबर में उलझे
दुनिया से बेखबर।
और उनके सबके बीच "मैं "
बेकार, बिन ख्याल, बिन किताब
घूरती हर एक को
उन्हें पढने की ताक़ में. 



शीशे पर निशान उभरे हैं या मेरे हृदय पर

उपासना सियाग http://usiag.blogspot.in/

हर रोज़
एक नन्हीं  सी चिड़िया
मेरी खिड़की के शीशे से
अपनी चोंच टकराती है ,
खट-खट की
खटखटाहट से चौंक जाती हूँ मैं ,

मानो कमरे के भीतर
आने का रास्ता ढूंढ  रही हो ,
उसकी रोज़ -रोज़ की
खट -खट से सोच में पड़ जाती हूँ  मैं ,

 वह क्यों चाहती है
भीतर आना
अपने आज़ाद परों से परवाज़
क्यों नहीं भरती
क्या उसे आज़ादी पसंद नहीं !

कोई भी तो नहीं उसका यहाँ
बेगाने लोग , बेगाने चेहरे
क्या मालूम
कहीं कोई बहेलिया ही हो भीतर !
जाल में फ़ांस ले ,
पर कतर दे !

वह हर रोज़ आकर
शीशे को खटखटाती है या
मोह-माया के द्वार को खटखटाती है
उसे नहीं मालूम !

मालूम तो मुझे भी नहीं कि
चोंच की खट -खट से
शीशे पर  निशान उभरे हैं
या मेरे हृदय पर
मैं नहीं चाहती उसका भीतर आना
पर चिड़िया की खटखटाहट और
मेरे हृदय की छटपटाहट अभी भी जारी है !



तोते के बारे में तोता कुछ बताता है जो तोते को ही समझ में आता है


सुशील कुमार जोशी  
My Photo

तोते कई तरह 
के पाये जाते है 
कई रंगों में 
कई प्रकार के 
कुछ छोटे कुछ 
बहुत ही बड़े 
तोतों का कहा हुआ 
तोते ही समझ पाते हैं 
हरे तोते पीले तोते 
की बात समझते हैं 
या पीले पीले की 
बातों पर अपना 
ध्यान लगाते हैं 
तोतों को समझने 
वाले ही इस सब पर 
अपनी राय बनाते हैं 
किसी किसी को 
शौक होता है 
तोते पालने का 
और किसी को 
खाली पालने का 
शौक दिखाने का 
कोई मेहनत कर के 
तोतों को बोलना 
सिखा ले जाता है 
उसकी अपनी सोच 
के साथ तोता भी 
अपनी सोच को 
मिला ले जाता है 
किसी घर से 
सुबह सवेरे 
राम राम 
सुनाई दे जाता है 
किसी घर का तोता 
चोर चोर चिल्लाता है 
कोई सालों साल 
उल्टा सीधा करने 
के बाद भी अपने 
तोते के मुँह से 
कोई आवाज नहीं 
निकलवा पाता है 
‘उलूक’ को क्या 
करना इस सबसे 
वो जब उल्लुओं 
के बारे में ही कुछ 
नहीं कह पाता है 
तो हरों के हरे और 
पीलों के पीले 
तोतों के बारे में 
कुछ पूछने पर 
अपनी पूँछ को 
अपनी चोंच पर 
चिपका कर चुप 
रहने का संकेत 
जरूर दे जाता है 
पर तोते तो 
तोते होते हैं 
और तोतों को 
तोतों का कुछ भी 
कर लेना बहुत 
अच्छी तरह से 
समझ में 
आ जाता है ।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014 (5)



यादों के हस्ताक्षर पर ही पूरी ज़िन्दगी टिकी होती है 
आज की पोटली में बीते कल का अनुभव होता है 
पुनर्निर्माण की प्रक्रिया यूँ ही चलती है 


कितने पास, कितने दूर !

गिरिजा कुलश्रेष्ठ http://yehmerajahaan.blogspot.in/
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"आप कहाँ से हैं ?"
परिचय के बिना पास बैठा व्यक्ति भी कितना दूर होता है ,पार्क में बैठी उस अधेड़ उम्र की महिला ने उस दिन यही महसूस किया जब पास ही बेंच पर बैठी युवती ने उसकी ओर एक बार भी नही देखा जबकि कस्बाई परिवेश से आई वह महिला युवती से परिचय के लिये काफी उत्सुक थी। एक तो उसके लिये यह शहर नया ही था । फिर साथ बैठे दो व्यक्ति एक दूसरे से बात न करें ,खासतौर पर जबकि वे महिलाएं हों , यह स्वीकार कर लेने वाली बात नही है ।
 लेकिन युवती का ध्यान सिर्फ अपने मोबाइल फोन पर था और आधुनिक शिष्टाचार की दृष्टि से  उस अपरिचित महिला का इस तरह बात करना अनावश्यक ही नही अशिष्ट भी कहा जासकता था । जींस-टाप पहने वह युवती जो 'वॉक' के बाद कुछ देर के लिये बेंच पर बैठ गई थी, काफी खूबसूरत थी। उतनी ही निरपेक्ष भी । लेकिन महिला का मन नही माना और पूछ ही लिया –
“आप यहीँ की हैं या फिर ...। वैसे कहाँ से हैं ?”
"यूपी से ।"--युवती ने संक्षिप्त उत्तर देते हुए कन्धों पर झूलते बालों को समेटकर जूड़ा बनाया और अगले ही पल उँगलियाँ मोबाइल पर सरकने लगीं । वह एक अनजान और पुराने विचारों की लगने वाली महिला से बात करने जरा भी उत्सुक नही थी । लेकिन उस सवाल का कारण जानने की इच्छावश पूछा----" क्यों ?"  
"नही ऐसे ही पूछा है ।--महिला एक पल के लिये झिझकी । यूपी भर कह देने से क्या पता चलता है । परिचय हो तो फिर इतना अधूरा सा क्यों हो?
"यूपी में कौनसी जगह...?"
"आगरा "---युवती ने बेमन ही झटके के साथ जबाब दिया जैसे वह उसका आखिरी संवाद हो। 
महिला को लगा जैसे यह सूचना कोई बहुत दूर से दे रहा हो लेकिन कुछ देर बाद जब युवती ने पलट कर पूछा--"और आप ?" तो महिला को वह आवाज पास आती हुई प्रतीत हुई । उत्साहित होकर बोली- 
"मैं शिवपुरी से यहाँ बेटी के पास आई हूँ।" और फिर विस्तार से बताने लगी--"बेटी इंजीनियर है । अभी तीन-चार महीने पहले ही नौकरी लगी है ।यही एक बेटी है । बडे शहर में पहली बार आई है । चिन्ता तो होती है न । आप भी सर्विस करती होंगी ?"
"नही मेरे हसबैंड । वे भी इंजीनियर हैं ।"
"हसबैंड ? यानी यह शादीशुदा है?"---महिला चकित हुई---"आजकल पहनावे और रंग-ढंग से पता ही नही चलता कि कोई महिला लड़की है या औरत । विवाहिता है या कुँवारी । न बिन्दी न चूड़ी । न बिछुआ । बहुत हुआ तो माथे के ऊपर बालों में लाल लकीर खींचली बस । सब समय का असर है ।"   
" कौनसी कम्पनी में हैं आपके मिस्टर ?"
"विप्रो में ।"
"अरे ,विप्रो में तो मेरी ममेरी बहिन का बेटा भी है।
"होगा..। यहाँ बाहर से ज्यादातर इंजीनियर ही आते हैं।"
"बहुत बड़ा शहर है ।"--महिला अपने आप से कहने लगी---"पता नही कहाँ रहता होगा । जीजी से पता ले आती तो उससे भी मिल लेती ।"
युवती ने बात को जैसे सुना ही नही । पर महिला ने बोलना जारी रखा।
"आप यहाँ कहाँ रहती हैं ?"
"आज़ाद नगर में ।"
"अरे मेरी बेटी भी तो आज़ाद नगर में ही है । आप यहीं रहतीं हैं तो आपने अल्पना अपार्टमेंट तो देखा होगा ।"
"हाँ  ?"--अब युवती कुछ जाग्रत हुई ।---"मैं भी वहीं रहती हूँ ?"
"अर्..रे वाह , फिर तो हम पडोसनें हुईं ।"--महिला एकदम चमत्कृत सी होगई--  
" पर आपको वहाँ कभी देखा नही ।"
"हाँ वो...एक तो दूसरी लिफ्ट से आना-जाना होता है फिर....।" युवती अब भी बातों में विशेष रुचि लेती नही लग रही थी ।
"फिर ! दरवाजे भी हमेशा बन्द रहते हैं। "--महिला ने हँसकर बात पूरी की। इसके बाद दोनों साथ-साथ आईं । युवती ने महिला को शिष्टाचारवश एक कप चाय पीने का निमन्त्रण दिया तो महिला बिना किसी औपचारिकता के सम्मोहित सी उसके पीछे चली गई । कालबेल दबाने के बाद दरवाजा खोलकर जो युवक सामने आया तो सचमुच एक चमत्कार सा हुआ । वह कुछ पहचानने की कोशिश करने के बाद चकित हुआ बोला--
"अरे ,मौसी आप यहाँ कैसे ?"
" ये लो ..बगल में छोरा ,नगर में ढिंढोरा ..।---उस महिला ने युवती की ओर आश्चर्य और खुशी के अतिरेक के साथ देखा और चहककर कहा---बेटी ,यही तो अभिषेक है। कुसमजीजी का बेटा ।"-- ।
अगले पल वह महिला के पैरों में झुक गया । युवती भी ।
"यहाँ रीतिका आगई है न । कुसमजीजी से तेरा पता और नम्बर लेना भूल गई बेटा । पर तू इतने पास होगा यह तो कमाल होगया । बडी आसानी से मुझे बहू भी मिल गई ।"


महिला खुशी से विह्वल होकर कहती रही---" लेकिन अगर पार्क में मैं बातचीत की कोशिश न करती तो इतने पास रहकर भी शायद तुम लोग दूर ही रहते । नही ?"

तेरे हाथों पे निसार जायें मेरे कातिल...

पूजा उपाध्याय http://laharein.blogspot.in/

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ख्वाब था।

सुबह धूप ठीक आँखों पर पड़ रही थी। मगर ख्वाब इतना खूबसूरत था कि हरगिज़ उठने का दिल नहीं किया। बहुत देर तक आंख बंद किये पड़ी रही। नीम नींद में आँखों में इन्द्रधनुष बनते रहे। आँखें मीचती और हल्के से खोलती। मौसम इतना सुहाना था कि तुम्हारी बांहों में मर जाने को जी चाहे। चाह ये भी थी कि बीमारी का बहाना बना के छुट्टी डाल दी जाये और गाड़ी लेकर कहीं लौंग ड्राइव पर निकल जायें।

बात बस इतनी सी थी कि तुम्हारा ख्वाब देखा था।

तुम और मैं किसी ट्रेन में मिल गये हैं अचानक से। जाने कौन सी ट्रेन है और हम एक डिब्बे में कैसे बैठे हैं जबकि हमें दो अलग अलग दिशाओं में जाना है। स्लीपर बौगी है। हम किसी पुल से गुजर रहे हैं। रेल का धड़धड़ाता शोर है। शाम का वक्त है। देर शाम का। गहरा नारंगी आसमान सिन्दूरी हुआ है। दूर एक मल्लाह विरह का गीत गा रहा है। उसे मालूम है, जिन्दगी के अगले किसी स्टेशन तुम और मैं दो अलग दिशाओं में जाने वाली तेज रफ्तार ट्रेनों में बैठ एक दूसरे से फिर कभी न मिलने वाले स्टेशन का टिकट कटा कर चले जायेंगे। तुम गुनगुना रहे हो। जैसे धूप जाड़े के दिनों में माथा सहलाती है वैसे। खुले हुये बाल हैं, थोड़े गीले, जैसे अभी अभी नहा के आयी हूं। हल्के आसमानी रंग का शॉल ओढ़ रखा है। खिड़की से सिर टिकाये बैठी हूं। ठंढ इतनी है कि गाल लाल हुये जाते हैं। हाथों मे दस्ताने हैं हमेशा की तरह।

कुछ मुसाफिरों ने दरख्वास्त की है कि मैं खिड़की बंद कर दूं। हवा पूरे कम्पार्टमेंट की गर्मी चुरा लिये जा रही है। उनके पास दान में मिले कुछ कंबल हैं बस। मैं खिड़की तो यूं कब का बंद कर देती, मगर तुम्हारी ओर नहीं देखने का कोइ सही बहाना चाहिये था। शीशे की खिड़की बंद होते ही आँखों के कमरे में तूफान आया है। तुमने एक खूबसूरत सा कंबल खोला है। धीरे धीरे कर के कुछ और लोग हमारी बौगी में आ गये हैं। मैंने दास्ताने उतार लिये हैं। मुझे ठीक याद नहीं, तुम्हारे कंबल को कब हौले से ओढ़ा था मैंने। हल्की झपकी आयी थी। आँख खुली तो तुम्हारा कंबल कांधे पर था। तुम भी कोई एक फुट की दूरी पर थे। तुम्हारी कलम मेरे पास गिर कर आ गयी थी शायद। तुमने कंबल में मेरा हाथ अपने हाथों में लिया था और कहा था 'तुम्हारे हाथ बहुत मुलायम हैं', तुमने मेरे हाथों को जो अपने हाथों में लिया था वो याद है मुझे...जैसे फर का कोइ खिलौना हो...नन्हा सा खरगोश जैसे, कितने कोमल थे तुम्हारे हाथ। तुमने कहा था कि तुम्हारी कलम उधर गिर गयी है, और मैं वो तुम्हें लौटा दूं। जाने किसने गिफ्ट किया था तुम्हें। हो सकता है न भी किया हो, बस लगा मुझे।

हाथ कोई फूल होता गुलाब का तो हम कौपी तले दबा के रख देते, हमेशा के लिये। मगर हाथ जीता जागता था। दिल की तरह। सुबह उठी तो दर्द मौर्फ कर गया था। दिन भर कैसी कैसी तो गज़लें सुनी सरहद पार की...मन लेकिन उसी नदी के पुल पर छूट गया था जिस पर तुमने मेरा हाथ पकड़ा था। सोचती हूं क्यूं। समझ नहीं आता। ख्वाब तो बहुत आते हैं, इक ख्वाब पर दूसरे रात की नींद कुर्बान कर देना मेरी फितरत नहीं, मगर सवाल सा अटक गया है कहीं। मालूम है  कि एकदम बेसिर पैर की बात है मगर दिल ही क्या जो समझ जाये। लगता है कि जैसे तुमने बड़ी शिद्दत से याद किया है। तुम हँस दो शायद, पर लगा ऐसा कि तुमने भी यही सपना देखा था कल रात। कि तुमने भी बस इतना ही ख्वाब देखा था। फिर किसी स्टेशन हम दोनों उतरे और तुम अपने घर वापस चल दिये, मैं अपने भटकाव की ओर।

दिन को ऐसी घबराहट हुयी, लगा कि सांस रुक जायेगी। जैसे तुमने अचानक मेरे शहर में कदम रखा हो। जाड़ों का ठिठुरता मौसम इतनी तेजी से गुजरा जैसे फिर कभी आयेगा ही नहीं। वसंत हड़बड़ में आया। मुझे अच्छी तरह याद है कि औफिस के रास्ते के सारे पेड़ों मे कलियां तक नहीं फूटी थीं। बाईक लेकर उड़ती हुयी जा रही थी कि अटक गयी। मौसम की बात रहने दो, बंगलोर मे अमलतास के पेड़ कभी नहीं थे। यहाँ की बोगनविलिया भी लजाये रंगो की होती थी। ये चटख रंग तो ऐसे आये हैं जैसे मन पर ईश्क रंग चढ़ता है। धूप छेड़ रही थी। तुम किसी हवाईजहाज में चढ़े थे क्या? कहां हो तुम...आखिर कभी तो याद कर लिया करो। तुम्हारे नाम क्या कोइ पौधा लगा रखा है...दिल कोई बाग तो नहीं है कि तुम्हारी जड़ें जमती जायें। उँगलियों से तुम्हारे आफ्टरशेव की खुशबू आती रही। दिन भर तुम्हें खत लिखती रही। जब सारी बातें खत्म हो गयीं तो तुम्हारे इस ख्वाब को कहीं ठिकाने लगाने की परेशानी शुरू हुयी। सीने में दर्द लिये जीने में दिक्कत होती है, चेहरा जर्द पड़ जाता है। हर ऐरा गैरा शख्स पूछने लगता है कि बात क्या है। किसको सुनायें रामकहानी। कवितायें लिखना भूल गयी हूं वरना इतनी तकलीफ नहीं थी। दो लाइन में इतना सारा दुख कात के रखा जा सकता था।

एक पूरा दिन बीत गया है...साल की कई कहानियों जैसा। धूप का गहरा साया छू कर गुज़रा है। आंखों में तुम्हारे हाथ बस गये हैं। दुआ करने को हाथ जुड़ते हैं तो बस तुम्हारा चेहरा उभरता है। ख्वाबों का पासवर्ड याद है तुम्हारी उँगलियों को भी। तुम्हारा कत्ल हो जाना है मेरे हाथों किसी रोज जानां। मत मिला करो यूं ख्बाबों में मुझसे। मेरे लिये जरा वो गाना प्ले कर दो प्लीज...आज जाने की जिद न करो...देर बहुत हुयी। कल का दिन बहुत हेक्टिक है। देखो, आज की रात छुट्टी लेते हैं...मेरे ख्वाबों मे मत आना प्लीज।

अगले इतवार का पक्का रहा। दुपहर। धूप में बाल सुखाते नींद आ जाती है। गोद में सर रख सुनाना मुझे गजलें। मिलना धूप के उस पुल पर जहां से किसी शहर की सरहद शुरू नहीं होती। मेरे लिये याद से लाना गहरे लाल रंग की बोगनविलिया और पीले अमलतास। जाते हुये रच जाना हथेलियों पर तुम्हारे नाम की मेंहदी। रंग आयेगा गहरा कथ्थई। उंगलियों की पोरों को चूमना...कहना, मेरे हाथ बेहद खूबसूरत हैं...फूलों की तरह नाजुक...मुलायम...मेरे लिये लाना खतों का पुलिंदा...कहानियों की कतरनें...हाशिये की कवितायें। चले जाना कमरे में फूलदान के बगल में रख कर ये सारा ही कुछ। देर दुपहर कहानियों से रिसेगी कार्बन मोनोक्साईड...मैं तुम्हारे प्यार में गहरी साँस लेते सो जाउंगी एक आखिरी मीठी नींद। तुम ख्वाबों में आना। तुम रहना। तुम कहना। तुम्हारे हाथ...


लकीरें

अंजु चौधरी अनु http://apnokasath.blogspot.in/

[Anju+Chaudhary.jpg]

इन आड़ी-तिरछी लकीरों से
खींचती है ज़िंदगी एक तस्वीर
एक सोच
एक द्वंद्ध
एक लड़ाई 
इस बेरहम जिंदगी से

एक सोच
उस खालीपन की कसक
कुछ तो करना है
जो अभी अधूरा है

एक जद्धोजहद
उस खालीपन की
जिसके इंतज़ार में
उम्र निकलती जा रही है

खाली से टेबल पर
खाली से वक़्त में
कागज़,पेंसिल से खेलने की कला
जो बेमतलब खींच देती है
किस्मत की लकीरों को
इन आड़ी-तिरछी रेखाओं की तरह ||


ये तन्हाई भी क्या चीज़ होती है, बेकार बना देती है इंसान को
क्या करेगा ये दिल यूं ही , पुराने पन्ने पलट-पलट कर ||

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014 (4)




आग को ना पीया तो क्या जीया 
अँधेरा तो रोज उतरता है 
सूरज को ना जीया तो क्या जीया  … 


'शीर्ष'क आने तक गया थक

[Saagar.JPG]सागर http://apnidaflisabkaraag.blogspot.in/

नए कमरे की बाथरूम की दीवार पर बहुत सारी बिंदियां सटी हैं। कंधे तक सीमेंट की पुताई की गई उन दीवारों पर बिंदियों की लड़ी अपने लाल होने के बायस ही उभरती प्रतीत होती हैं। बाथरूम की दीवारें नीम नींद में अधमुंदी आंखों से देखती है। जब नल खुलता है और पानी की धार गिरती है तब सीमेंट की पुताई वाली वे दीवारें सौंधी-सौंधी महकती है। दीवार की तन्द्रा टूटती है। वे सारी बिंदियां कमर की ऊंचाई पर चिपके हैं। जब नहाने बैठता हूं तो वे बिंदियां एकदम सामने पड़ती हैं। कई बार नहाना विलंबित कर उन बिंदियों से मूक संवाद करने लग जाता हूं। वे भी मेरी तरह वहां नहाने बैठती होगी। अपने बदन पर पानी डालने डालने तक उसे ये अपने माथे पर से ये बिंदी जल्दबाजी में हटाई होगी। कई बार तो एक दो मग अपने शरीर पर डालने के बाद चेहरे पर हाथ फेरने के क्रम में उसकी उंगलियों से टकराई होगी तब जाकर उसे इसे हटाने की सूझी होगी। ऐसा हर जगह होता है। गांव में चापाकल के पास बैठकर नहाती औरतें पेटीकोट अपने उभारों के ठीक ऊपर बांधने के बाद चुकुमुकु बैठकर चापाकल पर ही बिंदियां साट देती हैं। नदी में डुबकी लगाती औरतें पास के पत्थर पर इसे साट जैसे अपनी हाज़िरी लगा कर भूल जाती हैं।

वहां ये बिंदियां उन अनपढ़ औरतों के भूले कि किए गए हस्ताक्षर हैं। याद रखने की होड़ में उनमें वे छूट गई आदतें हैं जो उन्हें कुछ भला बनाती हैं। खुद की शिनाख्त को भूलवश कुछ यूं छोड़ते क्या उसने कभी यह सोचा होगा कि जिसे मैंने कभी देखा नहीं आज इतवार के इस दोपहर ढ़ले बाथरूम के एकांत में मैं उसके बारे में सोच रहा होऊंगा। यह तय नहीं है कि चार प्याला लगाने के बाद, गीले माथे बिंदियों की संख्या कितनी है, हो सकता है मैं जिस बिंदी को घूर रहा हूं वो एक ही हो लेकिन मुझे बहुत सारी नज़र आ रही हो। 

स्त्रियां अपने होने के निशान को कैसे कैसे छोड़ती हैं! तवे पर अंतिम रोटी सेंक लेने के बाद बंद आंच पर एक चुटकी आटा डाल देने में। रात के खाना होने के बाद भी रोटी वाले डिब्बे में आधी रोटी बचा कर रखने में। कपड़े में मेरी जिंदगी में भी कुठ ऐसी औरतें हैं जो छूटती नहीं। वे किन्हीं न किन्हीं आदतों, स्वभाव की वजह से मन में घर बनाए हुए है। उनकी याद नहाने के बाद भीजे कंधे पर रखी गीले ठंडे एहसास हैं। 

XXX

प्रिय बहार,

सोचकर अच्छा लगता है कि इस घटिया दौर में जब लेखकों और कवियों की साख दांव पर लगी हुई है, जब आमजन की नज़रों में वे एक संदेहास्पद पात्र बने हुए हैं, जब गिनती के कुछ चमकदार चेहरे अतिसाधारण लिख रहे हैं फिर भी तुम्हारा विश्वास उनमें लगातार बना हुआ है। दरअसल हमलोग पलायनवादी स्वभाव के हैं। रंगे हुए सियार। चीज़ों से हमारा लगाव बदलता रहता है। ज्यादातर चीज़ें हम बस मन लगाने के लिए करते हैं। हमारी मातृभाषा में इसे ‘डगरा पर का बैंगन’ बोलते हैं। हिन्दी में कहूं तो जिधर वज़न देखा उधर लुढ़क गए टाइप। तुम्हारी बनावट दूसरी है। जितनी सुंदर तुम हो उतना ही सुंदर सोच और पुख्ता यकीन भी। तुम एक हारे हुए ट्टटू पर दांव लगा रही हो, यह देखकर और भी आश्चर्य होता है। अक्षररूपी ब्रह्म में तुम्हारा विश्वास बना रहे।


श्राद्ध- एक लघुकथा

पम्मी pummy-harmony.blogspot.in

वह स्वच्छन्द स्त्री थी शायद इसीलिए मोहल्ले की उम्रदराज़ औरतें अपनी बहू बेटियों को उस से मिलने जुलने नहीं देती थी..हाल ही में उसकी पड़ोसन ने उससे पूछा, "क्या तुम अपने सास ससुर का श्राद्ध नहीं करोगी?"...उसने कहा मैं तो उनके नाम से गरीब बच्चों को किताबें, यूनिफार्म आदि दिला देती हूँ हर साल...बात बड़ी बुज़ुर्गों तक पहुँची..उन्होंने नाक भौं सिकोड़ी...बोली ," सराद तो सराद ही होवे है...पंडत कू ना जिमाओ तब तक सराद कैसे पूरो होवे ?...वे सब पंडित जी को अपने अपने घर श्राद्ध जीमने बुलाती...पंडित जी सब के घर खाना छूतेे भर और बाकी का खाना पैक करवा घर ले जाते...पंडिताइन पंडित जी की राह ही तक रही होती थी..फिर वह उस स्वच्छंद स्त्री के साथ सभी टिफिन लेकर उसके स्कूटर पर पीछे बैठ जाती...अनाथ आश्रम के बच्चे उन्हीं की राह तक रहे होते..खुशी से चिल्लाते ," अब तो पंद्रह दिन तक खूब खीर पूरी खाने को मिलेंगे...वाह मज़ा आ गया"..


कौन जाने यह विधाता कौन है ? 

- सतीश सक्सेना
मेरा फोटो


ऐसी दुनियां को बनाता कौन है ?

कौन जाने यह विधाता कौन है ?

इस बुढ़ापे में, नज़र क़ाफ़िर हुई,
वरना ऐसे  गुनगुनाता कौन है ?

इश्क़ की पहचान होनी चाहिए
बे वजह यूँ  मुस्कराता कौन है ?

आपको तो, काफिरों से इश्क है !
वर्ना इनको मुंह लगाता कौन है ?

चाँद की दरियादिली तो देखिये 
रात से भी प्यार करता कौन है ? 

जाके वृन्दावन में,क्यों ढूंढें उन्हें ?   
अब वहां मुरली बजाता कौन है ?

कौन दिन थे जब ठहाके गूंजते थे 
आज अपनों को बुलाता कौन है ?

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014 (3)




शब्दों की जमीन 
शब्दों की मिटटी
शब्दों का हल 
शब्दों के बीज 
शब्दों की नमी  … 
अभिव्यक्तियों के अलग अलग भावों से 
हमने अपनी बात कही  … 
शब्दों के काले मेघ विरोध में गरजे 
शब्दों के व्यंग्य वाण चुभे 
पर,
भावनाओं के शाश्वत शब्दों का रोपण होता रहा  … 
सच पूछो तो 
शब्दों की पांडुलिपियों से मेरा घर बना है 
यत्र तत्र मिटटी,बीज,हल,खाद रखे हुए हैं 
तभी तो हर सुबह मैं शब्दों की खेती करती हूँ 
कुछ काट-छाँट 
कुछ सिंचन 
थोड़ी कीटनाशक दवा 
…… 
शब्दों को जीने का 
एक ख़ास अनुभव होता है 


महज़ अपनी आजादी को जीते , करते हैं परिवारों की बाते !


वाणी गीत My Photohttp://teremeregeet.blogspot.in/

मेरे घर में नहीं है 
सिर्फ मेरी किताबों से भरी 
बड़ी आलमारियां !
मेरी आलमारी भरी है 
मेरी कुछ ही किताबोँ से  
कुछ में सजी है 
पति और बच्चों की क़िताबें  भीं !
कुछ आलमारियों मे 
गृहस्थी के जरुरी सामान  
राशन बर्तन भांडे कपड़े लत्ते  
कैंची सुई  धागा मशीन भी  !!

अतिथियों के  स्वागत सत्कार के साथ 
रखती हूँ दाना पानी 
चिड़िया, गाय  तो कभी कुत्ते के लिये भी !!
कभी किसी भूखे नंगे की गुहार सुन 
खाना- कपड़ा  देती हूँ  कुछ उपदेशों के साथ भी !
कभी पैसा- अनाज ले जाते हैं ढोल पिटते 
आशीषें बांटते लोग भी .... !!
अपने बच्चों की किलकारियां -झगडे भी 
द्वार पर अनाथ बच्चों की खिलखिलाहट 
रिरियाने की मजबूरी भी !

 पढ़ने से कुछ अधिक ही 
जीती हूँ रिश्तों को !
लड़ना , कुढ़ना , हँसना , प्रेम 
 नफरत  , उपेक्षा , चिढ़ना 
भी जिया है साथ ही .... !!
जो  जीती हूँ , 
जीते देखती हूँ 
वही लिखती भी हूँ !!
कभी इसके सिवा भी 
जो जीते देखना चाहती हूँ …… !!!
कभी कुछ लिखती हूँ जो जीती नहीं 
कभी कुछ जीती हूँ जो लिखती नहीं !!!
  
क्रांति की मोटी  पुस्तकों से सजी 
आलमारियों वाले घरों मे 
क्रांति के बड़े किस्से पढ़नें वाले 
गढ़ते है  झूठे किस्से ! 
एसी में बैठे ज़ाम  ढालते 
मुर्ग मुसल्लम , पकवानों  की दावत उड़ाते 
लिखते हैं शोषित , गरीब , भूखों की बाते! 
महज़  अपनी आजादी को जीते 
करते हैं परिवारों की बाते !  
अक्सर  लिखते हैं , जो जीते नहीं 
अक्सर जो जीते हैं  , लिखते नहीं !!



निर्धारित शब्द ...

दिगम्बर नासवा   http://swapnmere.blogspot.in/

अनगिनत शब्द जो आँखों से बोले जाते हैं, तैरते रहते हैं कायनात में ... अर्जुन की कमान से निकले तीर की तरह, तलाश रहती है इन लक्ष्य-प्रेरित शब्दों को निर्धारित चिड़िया की आँख की ... बदलते मौसम के बीच मेरे शब्द भी तो बेताब हैं तुझसे मिलने को ...

ठंडी हवा से गर्म लू के थपेडों तक
खुली रहती है मेरी खिड़की
कि बिखरे हुए सफ़ेद कोहरे के ताने बाने में
तो कभी उडती रेत के बदलते कैनवस पे
समुन्दर कि इठलाती लहरों में
तो कभी रात के गहरे आँचल में चमकते सितारों में
दिखाई दे वो चेहरा कभी
जिसके गुलाबी होठ के ठीक ऊपर
मुस्कुराता रहता है काला तिल

कोई समझे न समझे
जब मिलोगी इन शब्दों से तो समझ जाओगी

मैं अब भी खड़ा हूँ खुली खिडके के मुहाने
आँखों से बुनते अनगिनत शब्द ...


देवियाँ बोला नहीं करती --

--दिव्या शुक्ला http://divya-shukla.blogspot.in/
My Photo
--------------------------
जब भी स्त्री जीवन की
काली अँधेरी राहों से
बाहर आना चाहती है
नई राह खोजती है
रोशनी की नन्ही किरण के लिये
बस --हंगामा हो जाता है
देवी को महिमामंडित
सिंहासन से उतार फेंकते हैं
पवित्र ---अपवित्र ---दो शब्द
बेध कर रख देते ---
स्त्री के हर्दय को
यही दो शब्द थे ---जिसने
अहिल्या को पत्थर बनाया
क्यूं नहीं समझते ----
--हमारी मर्यादा हमारा सम्मान
हमारे अपने लिये है -------
--विवाह स्वर्ग में बना जन्मो का बंधन नहीं
मन का बंधन हैं ---प्रेम का बंधन हैं ---
नहीं स्वीकार है वस्तु बनाना -----
- -धुर्वस्वामिनी धन्य है
कायर पति द्वारा शकराज को उपहार में
दिये जाने का प्रतिकार --------
प्रतिकूल परस्तिथियों में सहनशक्ति की पराकाष्ठा
अंत मे एक चीत्कार -----एक प्रश्न -----
--आखिर ये निर्णय होना ही चाहिये -----
मै कौन हूं --क्या एक वस्तु ?? ----
--कायर पति का परित्याग --
--विवाहित जीवन की मर्यादा का कठोरतम पालन
स्वतंत्र होने के पश्चात चन्द्रगुप्त का वरण ---
क्या प्रसाद की धुर्वस्वामिनी आदर्श नारी नहीं
अगर है तो उसका उदाहरण क्यूं नहीं ?
काश कि हर धुर्वस्वामिनी को चंद्रगुप्त मिले -----
माना की मौन सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हो सकता है
पर वह स्वतंत्र सक्षम मौन ---
----लाचार असमर्थ दयनीय मौन नहीं ----
तुम्हें पता नहीं ऐसा मौन जब टूटता है
संबंध दरक जाते है ---नीवें हिल जाती है
इसीलिए तो कहा न ---हमें सुनो समझो
हमारा मन तो पढ़ो ----खुल कर जीने दो
हमारी इच्छा अनिच्छा का भी मतलब समझो
जिसे प्रेम करते है उसे जी भर याद तो कर सके
काल्पनिक जगत में विचरने में भी पाबंदी
कलम चली अगर हमारी ---तो कितनी भृकुटियां टेड़ी
आखिर क्यूं ---मत करो ऐसा --समझो सोचो --
अभी तो अस्तित्व को बचाने को जूझ रही है नारी
ये समय है कोख में समाप्त होता अस्तित्व बचाने का
आने वाला समय व्यक्तित्व का ---
अस्तित्व --व्यक्तित्व ---और हम --
आने वाला समय हमारा ही होगा

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014 (2)



चाहा था करवट बदलकर देख लूँ तुम्हें
पर  .... 
यूँ तो तुम मेरी हर करवटों में थे 
पर कोई चेहरा नहीं हुआ 
चहलकदमियाँ थीं जिस ख्याल की 
उसका ख्याल ही रहना ज़िन्दगी को रास आया 
……………  

अहलिया गोया चांद...!

अली सैयद  http://ummaten.blogspot.in/



सूर्य और चंद्रमा ने शादी तो की मगर सूर्य काफी बदसूरत और बेहद झगड़ालू स्वभाव का था ! एक बार, बहस के दौरान उसने चंद्रमा से कहा, तुम अच्छी नहीं हो, यहाँ तक कि तुम्हारे पास अपनी रौशनी भी नहीं है , अगर मैं तुम्हें अपनी रौशनी ना दूं तो, तुम किसी काम की नहीं हो, इस पर चंद्रमा ने उससे कहा कि तुम बेहद गर्म स्वभाव के हो, इसीलिये धरती पर स्त्रियां, मुझे तुमसे ज्यादा पसंद करतीं हैं, जब मैं रात को आलोक बिखेरती हूं तो वे अपने घरों से बाहर निकल कर नृत्य करने लगतीं हैं ! चंद्रमा का ये जबाब सुन कर सूर्य बहुत नाराज़ हुआ और उसने चंद्रमा के मुंह पर रेत फेंक दी, जिससे उसके मुंह पर गहरे काले दाग पड़ गये !ऐसे ही एक दिन झगड़े के वक़्त सूर्य, उसे दैहिक रूप से प्रताड़ित करने के लिये उसे पकड़ने के वास्ते , उसका पीछा करने लगा...सूर्य से डर कर भागते भागते चन्द्रमा थक चुकी थी और सूर्य लगभग उसे पकड़ने ही वाला था कि आसन्न संकट से सावधान होकर वो पुनः सूर्य की पहुंच से दूर हो गई, बस उसी दिन से लगातार ये सिलसिला चलता जा रहा है कि सूर्य हर बार उसे पकड़ते पकड़ते चूक जाता है / पीछे रह जाता है !

कहते हैं कि उनका पहला पुत्र, इंसानों जैसा दिखने वाला एक बड़ा तारा था, जिसे एक दिन गुस्से में आकर सूर्य ने छोटे छोटे टुकड़ों में काट कर आकाश में बिखेर दिया था और उन टुकड़ों से ही आकाश के असंख्य तारे बने ! उनका दूसरा पुत्र एक महाकाय केकड़ा था, जो कि आज भी जीवित है और ज्यादातर समय समुद्र की अतल गहराई में बने एक विशाल गर्त में रहता है , वो इतना शक्तिशाली है कि जब भी अपनी आँखे खोलता या बंद करता है तो बिजलियाँ कौंधने लगती हैं ! इस महाकाय केकड़े के गर्त में बैठने या गर्त को छोड़ते समय विशाल लहरें बनती और बिगड़ती हैं !  केकड़ा अपने पिता सूर्य की तरह से कलहप्रिय है और अक्सर अपनी मां को निगलने की कोशिश में लगा रहता है ! बहरहाल धरती के लोग चंद्रमा को पसंद करते हैं, इसीलिए जैसे ही केकड़ा चंद्रमा के करीब आता है , वे सब उसे बचाने के लिये अपने अपने घरों से बाहर निकल कर जोर जोर से घड़ियाल बजाने लगते हैं और तब तक शोर करते रहते हैं जब तक कि केकड़ा डर कर पीछे ना चला जाए...इस तरह से चंद्रमा का जीवन सुरक्षित बना रहता है !

दक्षिण पूर्व एशियाई मूल की इस लोक कथा में स्त्री और पुरुष के संबंधों, उनके स्वभाव तथा उनकी सामाजिक संस्थितियों का लेखा जोखा, सूर्य और चंद्रमा की प्रतीकात्मकता के माध्यम से, प्रस्तुत किया गया है ! इस आख्यान को गढ़ने वाला समाज, पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को, उनके मृदु स्वभाव, समाज में उनकी लोकप्रियता और सौंदर्य के मापदंडों के अधीन कहीं ज्यादा बेहतर आंकता है ! सामान्यतः ये कथा सूर्य के रूप में पुरुष को उग्र स्वभाव / ज्वलनशील तथा पत्नि से मारपीट करने वाले झगड़ालू व्यक्ति के रूप में चिन्हांकित करती है ! बहस के दौरान पत्नि को निज तुलना में हेय ठहराने का यत्न और फिर तर्केत्तर गतिविधि के रूप में पत्नि के सुंदर चेहरे को खुरदरी रेत से विरूपित करने वाले कार्य का ठीकरा अंततः पुरुष वर्ग के माथे ही फोड़ा जा सकता है ! यही नहीं वो झगड़े के एक दिन अपनी पत्नि को दैहिक प्रताड़ना देने के मंतव्य से घर से बाहर पलायन करने को  मजबूर कर देता है , पुरुषों की दैहिक श्रेष्ठता / अहंकार / शक्ति प्रदर्शन की इस घटना में , आगे की सांकेतिकता यह कि स्त्रियां आज भी आतंकित बनी हुई हैं ...और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये निरंतर भाग रही हैं !

परस्पर विपरीत स्वभाव के बावजूद उनका पति पत्नि होना तथा पति की सतत आक्रामकता के विरुद्ध पत्नि को समाज से कोई विशेष संरक्षण प्राप्त नहीं होना, शायद इस बात का संकेत करता है कि उनका विवाह , व्यवस्थित विवाह ही रहा होगा ? कहने का आशय यह है कि प्रेम विवाह में स्त्री एवं पुरुष एक दूसरे को पहचान पाने का अवसर कदाचित पा ही जाते हैं , जबकि व्यवस्थित विवाह में इसकी सम्भावना न्यूनतम हो सकती है ! कथा कहती है कि, सूर्य की तुलना में चंद्रमा के पास खुद की रौशनी भी नहीं है , इसका मतलब बेहद साफ़ है कि समाज से प्राप्त तमाम शक्तियां / ऊर्जा और अधिकार केवल पुरुषों के आधिपत्य में हैं और स्त्रियां इन अधिकारों से वंचित हैं ! नि:संदेह , कथा कालीन समाज स्त्रियों को रौशनी / सामर्थ्य  / शक्तियों तथा ऊर्जा के लिये पुरुषों पर निर्भर बनाये रखने वाला समाज रहा होगा , कम-ओ-बेश आज के समाज के जैसा ! जहां पति सूर्य अपनी शक्तियों का इस्तेमाल व्यक्तिगत रूप से चंद्रमा को कुचलने तथा दुःख पहुंचाने के लिये करता है , वहीं पत्नि चंद्रमा, उधार अथवा कृपा की तरह से प्राप्त धधकती सौर्य ज्वाला को शीतल कर समाज की ओर परावर्तित कर देती है , यानि कि स्त्रियां क्रोध / अहंकार / अग्नि तत्व को भी आनंद योग्य बना देती हैं !

इस आख्यान में सूर्य अपने पहले पुत्र के टुकड़े कर देता है , नि:संदेह वो एक हिंसक परसोना है ! पुत्र के टुकड़ों का आकाश में बिखर कर असंख्य तारों में बदल जाना, दक्षिण पूर्व एशियाई समाज की एक अन्य लोक कथा की ओर ध्यान आकर्षित कराता है जहां एक स्त्री चावल के दानों को आकाश में बिखेर देती है , जिससे तारों का जन्म होता है ! तारों के जन्म की इस सांकेतिकता का उद्देश्य मोटे तौर पर स्त्री और पुरुष के व्यवहार के अंतर को समझाना भी हो सकता है , ये अंतर मूलतः संबंधों में अनुराग अथवा निर्ममता जैसे तत्वों को लेकर बेहद साफ़ दिखाई देता है ! सूर्य और चंद्रमा दम्पत्ति की दूसरी संतान के रूप में केकड़ा, समुद्र में रहता है, वो पिता की तरह से हिंसक और स्त्री विरोधी है ! यहाँ गौरतलब बात ये है कि चंद्रमा की मृदुता के प्रत्युत्तर में समाज, उसे उसके ही पुत्र के हिंसक व्यवहार से तो बचाता है पर...पति की निर्ममता के समय इसी समाज का मौन मुखर हो उठता है ! नि:संदेह समाज के दोहरे मानदंडों को उजागर करती है ये कथा ! स्त्री और पुरुष के प्रकृति रूप में सूर्य और चंद्रमा तथा उनके पुत्र के रूप में तारों और केकड़े को देखें तो टिम टिम रौशनी और उत्ताल तरंगों के बतौर अपना योगदान तो वे दे ही रहे हैं !


आस्था के जंगल में……एक कशमकश उत्तर की चाहत में भटकती है!!!

वंदना गुप्ता 


http://ekprayas-vandana.blogspot.in/

आस्था के जंगल में उगा 
विश्वास का वटवृक्ष 
जब धराशायी होता है 
जाने कितने पंछी 
बेघर हो जाते हैं 
जाने कितने घोंसले टूट जाते हैं 
जाने कितनी मर्यादाएं भँग हो जाती हैं 
छितरा जाता है पत्ता पत्ता 
और बिखर जाता है जंगल के कोने कोने में 
कभी न जुड़ने के लिये 
फिर कभी न शाख पर लगने के लिये 

विश्वास के टूटते ही 
धूमिल हो जाती हैं 
सभी संभावनाएं भविष्य की 
और आस्था बन कर रह जाती है 
महज ढकोसला 
जहाँ चढ़ते थे देवता पर 
फूल दीप और नैवैद्य 
वहीँ अब खुद की अंतश्चेतना 
धिक्कारती है खुद को 
झूठ और सच के पलड़े 
लगते हैं महज 
आस्था का बलात्कार करने के उपकरण 

 धर्मभीरु मानव मन
नहीं जान पाता सत्य के 
कंटीले जंगलों का पता 
जहाँ लहूलुहान हुये बिना 
पहुंचना सम्भव नहीं 
और दूसरी तरफ़ 
झूठ करता है अपनी 
दूसरी परंपरा का आह्वान 
तो सहज सुलभ हो जाती है आस्था 
मानव मन का कोना 
'चमत्कार को नमस्कार '
करने में विश्वास करने वाला 
चढ़ जाता है आस्था की वेदी पर बलि 
मगर नहीं कर पाता भेद 
नहीं कर पाता पड़ताल 
कैसे दीवार के उस तरफ़ 
कंक्रीट बिछी है 
और उसकी आस्था ठगों के 
हाथों की कठपुतली बनी है 
वो तो बस महज एक वाक्य को 
मान लेता है ब्रह्मवाक्य 
क्योंकि ग्रंथों पुराणों मे वर्णित है 
इसलिए धर्मभीरुता का लाभ उठा 
हो जाता है शोषित कुछ ठगो की 
जो बार बार यही समझाते हैं 
यही बतलाते हैं 
गुरु से बढ़कर कोई नही 
दीक्षा गुरु सिर्फ़ एक ही है होता 

प्रश्न यहीं है खड़ा होता 
आखिर वो कहाँ जाये 
किससे  कहे अपने मन की व्यथा 
जब दीक्षा गुरु ही 
विश्वास के वृक्ष पर 
अपनी हवस की कुल्हाड़ी से वार करे 
अपनी कामनाओं की तलवार से प्रहार करे 
पैसा पद और लालच के लिये 
अपने अधिकारों का दुरूपयोग करे 
तब कहाँ और किससे कोई शिकायत करे 
कैसे उसे गुरु स्वीकार करे 
जिसने उसकी आस्था के वृक्ष को 
तहस नहस किया 
कैसे उसके लिये मन में पहले सा 
सम्मान रख प्रभु सुमिरन किया करे 

क्या सम्भव है उसे गुरु स्वीकारना 
क्या सम्भव है पुराणों की इस वाणी को मानना 
कि दीक्षा गुरु तो सिर्फ़ एक ही हुआ करता है 
जो कई कई गुरु किया करते हैं 
घोर नरक मे पड़ा करते हैं 
मगर कही नहीं वर्णित किया गया 
यदि गुरु ने जघन्य कर्म किया 
तो कैसे उसके द्वारा दिये मन्त्र में 
शक्ति हो सकती है 
जो खुद ही गलत राह का राही हो 
उसकी बात मे कहाँ दम हो सकता है 

जिसकी आस्था एक बार खंडित हो गयी हो 
कैसे उसकी नये सिरे से जुड़ सकती है 
कैसे किसी पर फिर विश्वास कर 
एक और आस्था के वटवृक्ष को 
उगाया जा सकता है 
गर कोशिश कर किसी पर 
विश्वास कर नये सिरे से कोई जुड़ता है 
तो पुराणों मे वर्णित प्रश्न उठ खड़ा होता है 
'एक ही दीक्षा गुरु होता है '
ऐसे में 
साधक तो भ्रमित होता है 
कहाँ जाये 
किससे मिले सही उत्तर 

प्रश्न दस्तक देता प्रहार कर रहा है 
क्या पुराण में जो पढ़ा सुना 
उसे माने या 
जो आँख से देख रहा है 
और जिसे उसकी अंतरात्मा 
नहीं स्वीकारती 
उस पर चले 
ये कैसा धर्म  के नाम पर 
होता पाखण्ड है 
जिसने मानवता को किया हतप्रभ है 

सुना है 
धर्म तो सत्य का मार्ग दिखलाता है 
फिर ये कैसा मार्ग है 
जहाँ आस्था और विश्वास से परे 
मानवता ही शोषित होती है 
और उस पर चलने वाले को 
धर्मविरुद्ध घोषित करती है 

सोच का विषय बन गया है 
चिंतन मनन फिर करना होगा 
धर्म की परिभाषाओं को फिर गुनना होगा 
वरना 
अनादिकाल से चली आ रही 
संस्कृति से हाथ धोना होगा 

झूठ सच 
धर्म आस्था विश्वास 
गुरु शिष्य संबंध 
महज आडम्बर न बन जाये 
वो वक्त आने से पहले 
विश्लेषण करना होगा 
और धर्म का पुनः अवलोकन करना होगा 
उसमे वर्णित संस्कारों को 
पुनः व्यख्यातित करना होगा 

तर्क और कसौटियों की गुणवत्ता पर 
खरे उतरे जाने के बाद 
फिर शायद एक बार फिर आस्था का वृक्ष अपनी जड़ें जमा सके 
और मेरे देश की संस्कृति और संस्कार बच सकें 

एक कशमकश उत्तर की चाहत में भटकती है ……


अभय

कौशलेन्द्र ) http://bastar-ki-abhivyakti.blogspot.in/

यह प्रश्न लाख टके का नहीं है
एक टके का भी नहीं है
अधेले का भी नहीं है ।
दरअसल 
जिस प्रश्न का उत्तर हर किसी को पता हो
उस प्रश्न का भला क्या मूल्य ?
फिर भी
यह एक प्रश्न है
जो उत्तरों को चिढ़ाते हुये
मूछों पर ताव देते हुये
सबको चुनौती देते हुये
अपनी पूरी निर्लज्जता के साथ
तन कर खड़ा है । 

यह प्रश्न
एक समस्या है
जिसका उत्तर
प्रजा से लेकर राजा तक
सबको पता है ।
प्रजा के पास
साहस का अभाव है
राजा के पास
समाधान की इच्छाशक्ति का अभाव है ।
समस्या विकराल होती जा रही है
राजा
प्रश्न को बनाये रखते हुये
समाधान का दिखावा करता है
और इस दिखावे के लिए
करोड़ों रुपये स्वीकृत करता है ।
यह एक निर्लज्ज खेल है
जो प्रजा के प्राणों के मूल्य पर
खेला जा रहा है ।
सुना है
यह संत
सुनता नहीं
देखता नहीं
बोलता नहीं
क्योंकि
उसने पाप को
अभय दे दिया है ।


संदर्भ :- इस कविता का संबन्ध एक पुजारी से भी हो सकता है जो सुबह-शाम पूजा करता है और शेष समय डाके डालने में व्यस्त रहता है । इस कविता का संबन्ध एक राजा से भी हो सकता है जो दिन में ग़ुनाहों के उन मुकदमों का फ़ैसला करता है जिन्हें वह ख़ुद सारी रात करता रहा है । इस कविता का संबन्ध उस वीतरागी से भी हो सकता है जो सन्यासी है और हर रात एक कन्या से बलात्कार करता है । इस कविता का संबन्ध हर उस धूर्त भेड़िये से भी हो सकता है जो संत बनकर हर क्षण किसी शिकार की तलाश में व्यस्त रहता है । इस कविता का संबन्ध लोकतंत्र की उन सभी दुष्ट व्यवस्थाओं से भी हो सकता है जो जनता की आँखों में धूल झोंकते हुये अपने पापी अस्तित्व को बनाये रखने में सफल होते रहते हैं ।

अर्थ :- अब बात बस इतनी सी है कि एक नरभक्षी शेर को इंसानों की सेहत का ज़िम्मा दे दिया गया है ।

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014 (1)




पूर्ण अवलोकन सम्भव नहीं 
हो ही नहीं सकता 
पूरी ज़िन्दगी शब्दों से भरी होती है 
कुछ पन्नों पर उतर आते हैं 
कुछ इंतज़ार में होते हैं 
कुछ खुद में विलीन  .... इस होने, नहीं होने से कुछ लेना एक प्रयास है, 
कुछ जी लेने का 
कुछ साँसें देने का  … 


लक्ष्मण पत्नी उर्मिला की विरह व्यथा --------
   
 शशि पाधा
http://shashipadha.blogspot.in/

हाय यह जग कितना अनजाना
हिय नारी का न पहचाना,
पढ़ न पाए मन की भाषा
मौन को स्वीकृति ही माना।

विदा की वेला आन खड़ी थी
कैसी निर्मम करुण घड़ी थी,
न रोका न अनुनय कोई
झुके नयन दो बूंद झरी थी ।

अन्तर्मन की विरह वेदना
पलकों से बस ढाँप रही थी,
देहरी पर निश्चेष्ट खड़ी सी
देह वल्लरी काँप रही थी  ।

हुए नयन से ओझल प्रियतम
पिघली अँखियाँ,सिहरा तन-मन
मौन थी उस पल की भाषा
अंग -  अंग में मौन क्रन्दन   ।

रोक लिया था रुदन कंठ में
अधरों पे आ रुकी थी सिसकी,
 दूर गये  प्रियतम के पथ पर
बार बार  आ दृष्टि ठिठकी  ।

गुमसुम कटते विरह के पल
नयनों में घिर आते घन दल,
बोझिल भीगी पलकें मूँदे
ढूँढ रही प्रिय मूरत चंचल ।

सावन के बादल से पूछे
क्या तूने मेरा प्रियतम देखा,
सूर्य किरण अंजुलि में भर-भर
चित्रित करती प्रियमुख रेखा ।

चौबारे कोई  काग जो आये
देख उसे मन को समझाती,
लौट आयेंगे प्रियतम मेरे
जैसे मधुऋतु लौट के आती ।

दर्पण में प्रिय मुख ही देखे
लाल सिंदूरी मांग भरे जब,
माथे की बिंदिया से पूछे
मोरे प्रियतम आवेंगे कब ।

सूर्य किरण नभ के आंगन में
जब-जब खेले सतरंग होली,
धीर बाँध तब बाँध सके न
नयनों से कोई नदिया रो ली ।

गहरे घाव हुए अंगुलि पर
पल-पल घड़ियाँ गिनते गिनते्,
मौन वेदना ताप मिटाने
अम्बर में आ मेघा घिरते।

पंखुड़ियों से लिख-लिख अक्षर
आंगन में प्रिय नाम सजाती,
बार-बार पाँखों को छूती
बीते कल को पास बुलाती ।

तरू से टूटी बेला जैसे
बिन सम्बल मुरझाई सी,
विरह अग्न से तपती काया
झुलसी और कुम्हलाई सी ।

बीते कल की सुरभित सुधियाँ
आँचल में वो बाँध के रखती,
विस्मृत न हो कोई प्रिय क्षण
मन ही मन में बातें करती  ।

पुनर्मिलन की साध के दीपक
तुलसी की देहरी पर जलते,
अभिनन्दन की मधुवेला की
बाट जोहते नयन न थकते ।

प्रिय मंगल के गीतों के सुर
श्वासों में रहते सजते ,
लाल हरे गुलाबी कंगन
भावी सुख की आस में बजते ।

दिवस, मास और बरस बिताए
बार-बार अंगुलि पर गिन गिन,
काटे न कटते ते फिर भी
विरह की अवधि के दिन ।

कुल सेवा ही धर्म था उसका
पूजा अर्चन कर्म था उसका,
धीर भाव अँखियों का अंजन
प्रिय सुधियाँ अवलम्बन उसका ।

जन्म-जन्म मैं पाऊँ तुमको
हाथ जोड़ प्रिय वन्दन करती,
पर न झेलूँ विरह वेदना
परम ईश से विनती करती ।

उस देवी की करूण वेदना
बदली बन नित झरी -झरी,
अँखियों की अविरल धारा से
 नदियां जग की भरी -भरी ।

     

हारती संवेदना

साधना वैद 
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क्या करोगे विश्व सारा जीत कर
हारती जब जा रही संवेदना ! 

शब्द सारे खोखले से हो गये ,
गीत मधुरिम मौन होकर सो गये ,
नैन सूखे ही रहे सुन कर व्यथा ,
शुष्क होती जा रही संवेदना ! 

ह्रदय का मरुथल सुलगता ही रहा ,
अहम् का जंगल पनपता ही रहा ,
दर्प के सागर में मृदुता खो गयी ,
तिक्त होती जा रही संवेदना ! 

आत्मगौरव की डगर पर चल पड़े ,
आत्मश्लाघा के शिखर पर जा चढ़े ,
आत्मचिन्तन से सदा बचते रहे ,
रिक्त होती जा रही संवेदना !

भाव कोमल कंठ में ही घुट गये ,
मधुर स्वर कड़वे स्वरों से लुट गये ,
है अचंभित सिहरती इंसानियत ,
क्षुब्ध होती जा रही संवेदना ! 

कौन सत् के रास्ते पर है चला ,
कौन समझे पीर दुखियों की भला ,
हैं सभी बस स्वार्थ सिद्धि में मगन ,
सुन्न होती जा रही संवेदना !


   सन्नाटे की आवाज़ 
     "''''"'''"""""''"''""""

सीमा श्रीवास्तव 
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रात को सोया हुआ आदमी ,
बार  बार जगता है ,
चौंक चौंक कर उठता है । 
रात के सन्नाटे में हैं 
ढेर सी आवाज़े ,
आवाज़े ,जिन्हे वो नहीं पहचानता 
दिन के शोरगुल में ……… 
 सो नहीं पाता वो सारी रात 
 उन अनजानी आवाज़ों को थाहने मेँ 
सुबह होती है और वो अलसाया सा 
पसर जाता है बिस्तर पर 
सुबह के शोरगुल मेँ छोटी छोटी
 अनजानी  आवाज़े खो जाती हैं …… 
तब  सो जाता है वह 
आराम से , दुनिया   से  बेखबर 
अपनी जानी पहचानी
 आवाजों की दुनिया मेँ । 

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

अवलोकन - 2014




वर्ष अपने शेष महीनों में है
दर्द की ख़ामोशी स्तब्ध है
सन्नाटा मुखर है
तो इस मुखरता में वर्ष का अवलोकन ही आरम्भ करती हूँ
....
समय की गति थमे
या हम रुकें
ये तो हमारे बुज़ुर्गों को भी पसंद नहीं
तो उनके सम्मान में
उनकी याद में
मैं शुरू करती हूँ वार्षिक अवलोकन
ताकि लय में हो ज़िन्दगी
लोगों का आना-जाना बना रहे

कल से हम यहीं मिलते रहेंगे, जब तक मिलना तय है :)

आइये आज बातचीत ही करें,
अतीत वर्तमान का घनिष्ठ रिश्तेदार कहिये या मित्र
साथ बना रहता है
पर यह साथ ही होता है भविष्य के लिए
साथ होकर रुकना उद्देश्य नहीं
चलना है
मात्र अपने लिए नहीं
अपनों के लिए
जो हमें किसी मंज़िल पर देखना चाहते हैं
………………………
जब तक हम किसी विषय पर संघर्ष करते हैं - मुश्किलें उतना ही सर उठाती हैं,
पर जब हम संघर्ष बंद कर देते हैं तो एक तनावमुक्त सृजन कर पाते हैं
कुछ भी जानने समझने के लिए आपको उसके साथ जीना होगा, उसका अवलोकन करना ही होगा, आपको उसके सभी पहलू, उसकी सारी अंर्तवस्तु, उसकी प्रकृति, उसकी संरचना, उसकी गतिविधियां जाननी होंगी

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