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गुरुवार, 7 सितंबर 2017

नीरजा - हीरोइन ऑफ हाईजैक और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
आज साहसी महिला, नीरजा भनोट का जन्मदिन है जिसे अशोक चक्र से सम्मानित किया गया. इनका जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ था. आपके पिता हरीश भनोट मुंबई में पत्रकारिता क्षेत्र में थे. नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ में हुई, इसके बाद की शिक्षा मुम्बई में हुई. वर्ष 1985 में उनका विवाह संपन्न हुआ किन्तु रिश्ते में स्नेह-प्रेम न होने के चलते वे विवाह के दो महीने बाद ही मुंबई आ गयीं. इसके बाद उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में नौकरी के लिये आवेदन किया और ट्रेनिंग पश्चात् एयर होस्टेज के रूप में काम करने लगीं. 


5 सितम्बर को पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को लिए पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर अपने पायलट के इंतजार में खड़ा था. तभी 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि विमान में पायलट को जल्दी भेजा जाये. पाकिस्तानी सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि वह किसी अमरीकी नागरिक को मारने की धमकी से पाकिस्तान पर दबाव बना सकें. नीरजा ने विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी पासपोर्ट आतंकियों को सौंप दिये. फिर आतंकियों ने एक ब्रिटिश को मारने की धमकी दी किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से सूझबूझ से बात करके ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया. धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये. अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा, तब यात्रियों को बचाना आसान होगा. ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना और साथ में विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा.

नीरजा ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. विमान का ईंधन समाप्त होते ही चारों ओर अंधेरा छा गया. नीरजा ने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये. सभी यात्री भी आपातकालीन द्वार पहचान चुके थे. योजना के अनुसार सारे यात्री उन द्वारों से नीचे कूदने लगे. यह देख आतंकियों ने अंधेरे में ही फायरिंग शुरू कर दी. नीरजा के सावधानी भरे कदम से कोई यात्री मारा नहीं गया. हां, कुछ घायल अवश्य हो गये थे. इस बीच पाकिस्तानी सेना के कमांडो विमान में आ गए थे. उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया. सबसे अंत में नीरजा निकलने को हुई तभी उन्हें बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी. वे उन बच्चों को खोज कर आपातकालीन द्वार की ओर बढीं तभी बचे हुए चौथे आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी. नीरजा बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल कर उस आतंकी से भिड़ गईं. यद्यपि उस चौथे आतंकी को पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया तथापि वे नीरजा को न बचा सके. 5 सितम्बर 1986 को मात्र 23 वर्ष की उम्र में नीरजा अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए शहीद हो गई.


नीरजा देश की पहली महिला हैं जिन्हें भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया. पाकिस्तान सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया. भारत सरकार ने सन 2004 में नीरजा के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूर है. वर्ष 2005 में अमेरिका ने उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया. उनकी स्मृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया, जिसका उद्घाटन अमिताभ बच्चन ने किया. नीरजा के साहसिक कार्य और उनके बलिदान को याद रखने के लिये राम माधवानी के निर्देशन में नीरजा फ़िल्म का निर्माण किया गया. इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर ने निभाया. इस फिल्म को 19 फ़रवरी 2016 को रिलीज किया गया.

आज इस साहसी महिला के जन्मदिन पर ब्लॉग बुलेटिन परिवार अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है.

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बुधवार, 7 सितंबर 2016

नीरजा भनोट और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
नीरजा भनोट ( जन्म: 7 सितंबर, 1963 - 5 सितंबर 1986) मुंबई में पैन ऐम एअरलाइन्स की विमान परिचारिका थीं। 5 सितंबर 1986 के पैन ऐम उड़ान 73 के अपहृत विमान में यात्रियों की सहायता एवं सुरक्षा करते हुए वे आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गईं थीं। नीरजा वास्तव में स्वतंत्र भारत की महानतम वीरांगना है। आतंकियों से लगभग 400 यात्रियों को जान बचाते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया था। नीरजा भनोट अशोक चक्र पाने वाली पहली महिला थीं।

7 सितम्बर 1964 को चंडीगढ़ के हरीश भनोट के यहाँ जब एक बच्ची का जन्म हुआ था तो किसी ने भी नहीं सोचा था कि भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान इस बच्ची को मिलेगा। बचपन से ही इस बच्ची को वायुयान में बैठने और आकाश में उड़ने की प्रबल इच्छा थी। नीरजा ने अपनी इच्छा एयर लाइन्स पैन एम ज्वाइन करके पूरी की। 16 जनवरी 1986 को नीरजा को आकाश छूने वाली इच्छा को वास्तव में पंख लग गये थे। नीरजा पैन एम एयरलाईन में बतौर एयर होस्टेज का काम करने लगी। 5 सितम्बर 1986 की वो घड़ी आ गयी थी जहाँ नीरजा के जीवन की असली परीक्षा की बारी थी। पैन एम 73 विमान कराची, पाकिस्तान के एयरपोर्ट पर अपने पायलेट का इंतजार कर रहा था। विमान में लगभग 400 यात्री बैठे हुये थे। अचानक 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया। उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि वो जल्द में जल्द विमान में पायलट को भेजे। किन्तु पाकिस्तानी सरकार ने मना कर दिया। तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को बुलाया कि वो सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करे ताकि वो किसी अमेरिकन नागरिक को मारकर पाकिस्तान पर दबाव बना सके। नीरजा ने सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित किये और विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी आतंकियों को सौंप दिये। उसके बाद आतंकियों ने एक ब्रिटिश को विमान के गेट पर लाकर पाकिस्तानी सरकार को धमकी दी कि यदि पायलट नहीं भेजे तो वह उसको मार देगे। किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से बात करके उस ब्रिटिश नागरिक को भी बचा लिया। धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये। पाकिस्तान सरकार और आतंकियों के बीच बात का कोई नतीजा नहीं निकला। अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा। जल्दी उसने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना बांटने के लिए कहा और साथ ही विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा। नीरजा को पता लग चुका था कि आतंकवादी सभी यात्रियों को मारने की सोच चुके हैं।

उसने सर्वप्रथम खाने के पैकेट आतंकियों को ही दिये क्योंकि उसका सोचना था कि भूख से पेट भरने के बाद शायद वो शांत दिमाग से बात करे। इसी बीच सभी यात्रियों ने आपातकालीन द्वारों की पहचान कर ली। नीरजा ने जैसा सोचा था वही हुआ। विमान का ईंधन समाप्त हो गया और चारो ओर अंधेरा छा गया। नीरजा तो इसी समय का इंतजार कर रही थी। तुरन्त उसने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये। योजना के अनुरूप ही यात्री तुरन्त उन द्वारों के नीचे कूदने लगे। वहीं आतंकियों ने भी अंधेरे में फायरिंग शुरू कर दी। किन्तु नीरजा ने अपने साहस से लगभग सभी यात्रियों को बचा लिया था। कुछ घायल अवश्य हो गये थे किन्तु ठीक थे अब विमान से भागने की बारी नीरजा की थी किन्तु तभी उसे बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी। दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना के कमांडो भी विमान में आ चुके थे। उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया। इधर नीरजा उन तीन बच्चों को खोज चुकी थी और उन्हें लेकर विमान के आपातकालीन द्वार की ओर बढ़ने लगी। कि अचानक बचा हुआ चौथा आतंकवादी उसके सामने आ खड़ा हुआ। नीरजा ने बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल दिया और स्वयं उस आतंकी से भिड़ गई। आतंकी ने कई गोलियां उसके सीने में उतार डाली। नीरजा ने अपना बलिदान दे दिया। उस चौथे आतंकी को भी पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया किन्तु वो नीरजा को न बचा सके।
नीरजा के बलिदान के बाद भारत सरकार ने नीरजा को सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र प्रदान किया तो वहीं पाकिस्तान की सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया। नीरजा वास्तव में स्वतंत्र भारत की महानतम विरांगना है। सन् 2004 में नीरजा भनोट के सम्मान में डाक टिकट भी जारी हो चुका है।

( चित्र और जानकारी के स्त्रोत - http://bharatdiscovery.org/india/नीरजा_भनोट )


आज भारत माता की इस वीरांगना बेटी की 53वीं जयंती पर पूरा भारतवर्ष उन्हें याद करते हुए श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर।। 


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर  ..... 














आज की बुलेटिन में इतना ही, कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

'नीरजा' - एक वास्तविक नायिका की काल्पनिक लघु कथा

“यार एक बात पूछूँ?”
”हम्म्म!!”
”क्या समझूँ इसका मतलब? हाँ या ना?”
”पूछ ले! वैसे मैं जानता हूँ तू क्या पूछना चाहता है, लेकिन तेरी ज़ुबान से सुननना चाहता हूँ!”
”तू मेरा बहुत अच्छा दोस्त है. हमने साथ में कितनी फ़्लाइट उड़ाई है. तुझे ट्रेनिंग के दौरान भी कितने ईनाम मिले. लेकिन देखता हूँ कि जब भी तू इस देश की फ़्लाइट पर होता है, या इधर से गुज़रता है तो बहुत सीरियस हो जाता है.”
”नहीं तो... ऐसा कुछ भी नहीं!”
”बहुत करीब से देखा है तुझे, महसूस कर सकता हूँ!”
”इधर आकर मुझे किसी की याद आ जाती है.”
“याद आ जाती है से क्या मतलब? तेरी वो तो है ना तेरे घर पर?”
”मैं जिसकी बात कर रहा हूँ, वो अमेरिकन नहीं है... वो इण्डियन है!”
“पहेलियाँ मत बुझाओ! साफ़ साफ़ बताओ किस्सा क्या है!”
”लगभग तीस साल पहले, इसी हवाई अड्डे पर एक हवाई जहाज आतंकवादियों द्वारा हाइजैक कर लिया गया था.”
”फिर क्या हुआ?”
”उस हवाई जहाज में एक लड़की थी, जिसने चालक दल को आगाह किया और वे कॉकपिट के ऊपर से निकल गये ताकि जहाज को उड़ाकर आतंकवादियों की मनचाही जगह तक नहीं ले जाया जा सके.”
”ये तो ठीक हुआ, लेकिन पैसेंजर्स का क्या हुआ?”
”केबिन क्र्यू की वो सदस्य आतंकवादियों के सामने थी. आतंकवादियों ने उसे सभी पैसेंजर्स के पासपोर्ट ले लेने का हुक़्म दिया.”
”क्यों?”
”वे जानना चाहते थे कि उनमें कितने अमेरिकी यात्री हैं. कुल 41 अमेरिकी थे. उस क्र्यू सदस्य ने सभी के पासपोर्ट लेकर छिपा दिये.”
”.................”
”लगभग सत्रह घण्टे तक अपनी माँग को लेकर बहस करने के बाद उन आतंकवादियों ने अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया.”
”और वो लड़की जिसने अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट छिपा दिये थे?”
”उसने इमरजेंसी दरवाज़ा खोल दिया और यात्रियों को निकालने में मदद करने लगी.”
”जब दरवाज़ा खुला तो वो ख़ुद भी तो निकल सकती थी?”
“नहीं दोस्त! वो सबसे पहले निकल सकती थी, लेकिन अजीब जुनूनी शख्स थी वो. ऐसी भयंकर घटना में 41 में से सिर्फ़ दो अमेरिकी की मौत हुई.”
”फ़्लाइट में बच्चे भी तो रहे होंगे? उनका क्या हुआ?”
”बच्चों को भी उसी ने निकाला.”
”अरे वाह! लेकिन तुम्हें यह सब कैसे पता? वो भी इतनी बारीकी से?”
“उन बचाए गये बच्चों में एक मैं भी था... सात साल का बच्चा.”

”अरे वाह!! तो क्या तुमने कभी उस लड़की से मिलने या कॉण्टैक्ट करने की कोशिश की?”

”वही तो कर रहा हूँ. जब भी इधर आता हूँ, इन रुई के फाहों से उड़ते हुये बादलों में उसे ढूँढने की कोशिश करता हूँ.”

”इश्क़ तो नहीं हो गया उससे!”

”इश्क़ ही तो है. मुझसे 18 साल बड़ी लड़की से इश्क़. माँ है वो मेरी.”

”तू तो सीरियस हो गया यार!”

”बात ही सीरियस है. उसने मुझे दूसरी ज़िन्दगी बख्शी!”

”तो एक बार मिल ले उससे. इण्डियंस तो वैसे भी बड़े प्यारे लोग होते हैं!”

”नहीं मिल सकता, तभी तो बादलों में उसे ढूँढता हूँ. हमें बचाते हुये वो आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गयी. सिर्फ़ 23 साल की उम्र में.”

”हे भगवान!”

”नीरजा नाम था उसका. नीरजा भनोत. मेरे एक इण्डियन दोस्त ने बताया कि उसके नाम का मतलब होता है पानी से पैदा हुई. आज भी इन पानी भरे बादलों को देखता हूँ तो पूछने की तबियत होती है कि मुझे पानी से जन्मी नीरजा से मिला दो जिसने मुझे जन्म तो नहीं दिया, पर ज़िन्दगी दी!”

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यह एक काल्पनिक रचना है और इसका उद्देश्य नीरजा भनोत, अशोक चक्र की शहादत को याद करना और भारतवर्ष की इस बहादुर बेटी को श्रद्धांजलि अर्पित करना है. अभी हाल ही में सितम्बर 1986 की उस घटना पर एक फ़िल्म बनी है, जो मैंने नहीं देखी है. ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से दिये गये इस विषय पर लिखने का यह मेरा स्वतंत्र प्रयास है! आशा है आपको पसन्द आया होगा.

                                - सलिल वर्मा 

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पति पीड़ित लड़की की दास्‍तां भी है 'नीरजा'

फिल्म एक नजर में : नीरजा

कभी नहीं--- कभी नहीं---कभी नहीं

ब्राम्हणवाद

भारंगम में फिल्म वालों के नाटक

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रांची से बंगाल नाता है पुराना

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लघुव्यंग्य – गारंटी

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लेखागार