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गुरुवार, 23 मई 2019

पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए राजनीति का नया दौर शुरू - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज समूचा देश लोकसभा चुनाव परिणामों को जानने की चाह में किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़ा हुआ है. अभी तक जिस तरह से रुझान आये हैं, उनसे स्थिति एकदम साफ़ हो चुकी है. भाजपा की, NDA की धमाकेदार वापसी दिख रही है. विपक्ष और महागठबंधन जैसी स्थितियों को मतदाताओं ने नकारा है. यदि इन रुझानों, जो जल्द ही अंतिम परिणाम के रूप में भी पहचाने जायेंगे, को पूर्वाग्रहरहित होकर देखा जाये तो इस बार मतदाताओं ने निवर्तमान केंद्र सरकार के कार्यों पर भरोसा जताते हुए उसे एक अवसर और दिया है. इसके साथ ही उसने विगत लम्बे समय से चले आ रहे विपक्ष के तमाम आरोपों को एकतरह से खारिज भी किया है. 

इस परिणाम के बाद दोनों पक्षों के लिए राजनीति का नया ट्रेंड शुरू होने वाला है. अभी तक भाजपा को साम्प्रदायिक, हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में ही प्रचारित किया जाता रहा है किन्तु इन चुनावों परिणामों के बाद इससे बहुत हद तक मुक्ति मिलेगी. ऐसे में केंद्र की भाजपा को अपनी वर्तमान ईमानदारी वाली, कार्य करने वाली सरकार की छवि को और निखारना होगा. महज मोदी के नाम पर टिके रहने की प्रवृत्ति से उसके सभी जनप्रतिनिधियों को बाहर आना होगा. 


इसी तरह विपक्ष को भी विचार करना होगा कि हर बार महज ईवीएम के नाम पर, राफेल, नोटबंदी अथवा किसी अन्य मुद्दे के नाम पर शोर मचाकर सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है. महज जाति के नाम पर लामबंदी करके मतदाताओं को लुभाया नहीं जा सकता है. मुफ्तखोरी के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित नहीं किया जा सकता है. अब आम मतदाता भी तकनीकी रूप से अपडेट है. उसके हाथ में भी तकनीक होने से उसको भी पल-पल की जानकारी मिल रही है. उसे भी सही, गलत का आभास हो रहा है. ऐसे में विपक्ष को आने वाले समय के लिए सशक्त बनने के लिए, केंद्र सरकार के कार्यों की पारदर्शिता को बनाये रखने के लिए उसे जनता के बीच जाकर काम करना होगा. सरकार की छवि को झूठे आरोपों के द्वारा धूमिल करने की कोशिशों के बजाय खुद अपनी छवि को सशक्त, मजबूत, स्वच्छ करना होगा.

फ़िलहाल, अंतिम परिणामों का सभी को इंतजार है. सभी को शुभकामनायें कि आने वाले समय के देश और सशक्त हो, मजबूत हो, सुरक्षित हो.

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बुधवार, 22 मई 2019

EVM पर निशाना किस लिए - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

EVM कभी हैक नहीं हो सकता, ये बात सबसे ज़्यादा बेहतर ख़ुद राजनीतिक पार्टियाँ और ... ये नेता भी जानते हैंEVM से चुनाव की प्रक्रिया एकदम फ़ुल प्रूफ़ है, इसमें हैकिंग या इन्हें बदले जाने की सम्भावना पूरी तरह से नगण्य है। सबसे पहले चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है मतदान दल को चुनाव सामग्री के अलॉट्मेंट से, चुनाव सामग्री यानि EVM उसकी कंट्रोल यूनिट और अन्य रेजिस्टर एवं चेक लिस्ट... हर EVM की एक यूनीक आईडी होती है, जो EVM में इलेक्ट्रानिक्ली और मतदान दल को मैन्यूअली बताई जाती है।
मतदान वाले दिन सुबह मतदान शुरू होने के 75 मिनिट पहले एक मॉक पोल कंडक्ट कराना ज़रूरी होता है,
और उस मॉक पोल में राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि की उपस्थिति भी ज़रूरी होती है, ख़ुद राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों के सामने मॉक पोल में हर उम्मीदवार को बराबर बराबर संख्या में वोट दिए जाते हैं, जिनकी गिनती उन्हें उनके सामने मशीन से करके दिखाई जाती है। फिर मशीन का डेटा क्लीयर करके उसे 0 पर सेट किया जाता है, जिसके बाद मशीन को सील कर दिया जाता है, जिस स्ट्रिप से मशीन को सील किया जाता है ... उसके ऊपर राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता या प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर अनिवार्य रूप से लिए जाते हैं, जिन्हें वो काउंटिंग के समय वो मैच करा सकते हैं।
इस बीच अगर मशीन को खोला जाए तो वो स्ट्रिप फट जाएगी, उस स्ट्रिप को इस तरह से चिपकाया जाता है कि उसे खोलना सम्भव ही नहीं है। चिपकाने के बाद उस पर लाख से चपरा लगाकर पेक किया जाता है।
अब तो VVPAT भी आ गया है, आप ख़ुद चेक कर सकते हैं कि आपने किसको वोट दिया, और आपका वोट उसी को गया या नहीं ...चुनाव आयोग ने रैंडम्ली हर विधानसभा से 5 बूथों की VVPAT की गिनती का प्रावधान रखा है, धाँधली तो ख़ैर हो ही नहीं सकती लेकिन क्रॉस चेकिंग एकदम प्रॉपर हो जाएगी इससे।
चुनाव सम्पन्न होने के बाद EVM को स्ट्रोंग रूम में रखा जाता है जिसके बाहर पुलिस के अलावा सशस्त्र बलों की निगरानी होती है, वहाँ पूरे समय CCTV कैमरा रिकॉर्डिंग होती है और ख़ुद राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को भी उस पर निगरानी रखने की पर्मिशन होती है।
एहतियातन प्रशासन ने अधिकांश जवानों पर स्ट्रॉंग रूम को सिर्फ़ गेट या दरवाज़े से बंद नहीं किया, बल्कि एक पूरी काँक्रीट की दीवार खड़ी करवा दी है जिसे उसी दिन सुबह तोड़ कर खोला जाएगा।अब ऐसे में ये जो भी लोग EVM की हैकिंग या उसे बदले जाने का हल्ला मचा रहे हैं उन्हें उनकी हार निश्चित दिख रही है, इन पर अफ़वाह फैलाने और देश में जान बूझकर अराजकता फैलाने के आरोप में क़ानूनी कार्यवाही होनी चाहिए।
याद रखिए, ये पूरी चुनावी प्रक्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें देश भर में कम से कम पचास लाख या उससे भी ज़्यादा सरकारी कर्मचारी दिन रात लगातार कई दिनों तक एकदम ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाते हैं,
कितने लोग कितने दिन तक खाना नहीं खाते, सिर्फ़ चाय समोसे पर बिना नहाए धोए अनवरत काम करते हैं तब जाकर ये चुनाव सम्पन्न होते हैं, और ये नेता अपनी हार की बेज्जती से बचने के लिए सबको बेईमान बता देते हैं।
EVM से होने वाले चुनाव इस देश 135 करोड़ लोगों और इस देश के लोकतंत्र की सफलता हैं, हमें इस प्रक्रिया पर गर्व होना चाहिए|
 
सादर आपका
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EVM पर समग्र

लिख रहे कैसी कहानी मुल्क में

सांसारिक चमत्कार की खोज के लिए

रहस्यमयी गलीचे

करोड़ों-करोड़ों मत गिनने में वक़्त तो लगता है

गलीचा

भारत में लोकतंत्र का भविष्य

उसने मुझे अच्छा कहा!

'आधुनिक भारतीय समाज' के जनक - राजा राममोहन राय की २४७ वीं जयंती

तमसो मा ज्योतिर्गमय

दास्ताँ एक नष्ट सभ्यता की

 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!!

मंगलवार, 21 मई 2019

निगेटिव में डंडा घुसा कर उसे पॉजिटिव बनायें : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
चुनाव के दौर से देश निकल कर परिणामों की आस के दौर में चला गया है. बहुत से लोगों को अभी से दौरा पड़ने लगे हैं. अभी तक कुछ लोग ईवीएम का हैक किया जाना चिल्लाते दिखते थे,, वे अब उसके बदले जाने की बात करने लगे हैं. ऊहापोह के इस दौर में नकारात्मकता लगभग सभी पर हावी है. इस नकारात्मकता से वही निकल सकता है, जो डंडे का प्रयोग करना जानता हो. हँसिये नहीं, सही कह रहे हैं. न मानें तो हम बताए देते हैं कि कैसे डंडे का उपयोग करते हुए नकारात्मकता को दूर किया जा सकता है. अपने आपस छाई निगेटिव स्थिति को कैसे पॉजिटिव किया जा सकता है. गौर से पढ़िएगा.

जीवन में जब भी निगेटिव (-) महसूस हो तो
उसमें एक डंडा (।) घुसा कर उसे पॉज़िटिव (+) बना दो.
डंडा घुसाना ज़रूरी होता है, पॉज़िटिव होने के लिए. यहाँ तय आपको करना है कि आपकी नकारात्मकता को दूर करने में आपका कौन सा डंडा काम आएगा. घूमने, फोटोग्राफी करने, गीत-संगीत में डूब जाने, अपने अन्य शौक पूरा करने आदि के अपने पसंदीदा डंडे के साथ-साथ आपसी विश्वास, सद्भाव, मित्रता आदि का उपयोग करके आप निगेटिव को पॉजिटिव बना सकते हैं.

ध्यान रखियेगा, ये चुनाव देश का भविष्य तय करते हैं, नेताओं की स्थिति का निर्धारण करते हैं, सरकार चलाने वालों का निर्वाचन करते हैं न कि हम सबके आपसी रिश्तों, संबंधों, व्यवहार, बर्ताव का निर्धारण करते हैं, न ही निर्वाचन करते हैं. हमें अपने व्यवहार से, अपने कार्य से ही सकारात्मकता को बनाये रखना है.


आइये, इसी सकारात्मकता के साथ अपने मन का डंडा उठाते हुए आज की बुलेटिन का आनंद लेते हैं.

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सोमवार, 20 मई 2019

119वां जन्मदिवस - सुमित्रानंदन पंत जी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
Sumitranandan-Pant.jpg
सुमित्रानंदन पंत (अंग्रेज़ी: Sumitranandan Pant, जन्म: 20 मई 1900; मृत्यु: 28 दिसंबर, 1977) हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक हैं। सुमित्रानंदन पंत नये युग के प्रवर्तक के रूप में आधुनिक हिन्दी साहित्य में उदित हुए। सुमित्रानंदन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी सुमित्रानंदन पंत के बारे में साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं कि 'पंत अंग्रेज़ी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।' जन्म के महज छह घंटे के भीतर उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। पंत ने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्‍स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएँ लिख डालीं। हिंदी साहित्य के विलियम वर्ड्सवर्थ कहे जाने वाले इस कवि ने महानायक अमिताभ बच्चन को ‘अमिताभ’ नाम दिया था। पद्मभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था। हरिवंश राय ‘बच्चन’ और श्री अरविंदो के साथ उनकी ज़िंदगी के अच्छे दिन गुजरे। आधी सदी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकाल में आधुनिक हिंदी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है।


आज सुमित्रानंदन पंत जी के 119वें जन्मदिवस पर हम सभी उनको शत शत नमन करते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 19 मई 2019

चयन हमारा




मिली तो थी हमें स्वतंत्रता,
लेकिन हमें
किसी न किसी तरह 
पिंजड़े में रहना भाया !
उसकी तीलियों पर चोंच मारते हुए
हम खुद को पराक्रमी मानने लगे,
और वहम पाल लिया
कि हमारे अंदर स्वतंत्रता की चाह है
... !
लेकिन,
पिजड़े से बाहर निकलकर
कोई उड़ने की चाह नहीं होती,
हम कोई नया पिंजड़ा तलाशने लगते हैं,
आकाशीय विस्तार 
हमें भूलभुलैया सा प्रतीत होता है,
और हम रोने लगते हैं 
क़िस्मत का रोना
कभी नहीं समझना चाहते
कि जाने-अनजाने 
पिंजड़े का चयन हमारा ही है
अन्यथा,
धरती और आकाश 
हमेशा हमारे सहयात्री होते हैं ...

 
तू कभी ख़ुद के बराबर इधर नहीं आता
मैं भी आता हूं मगर टूटकर नहीं आता
तवील रात, बड़े दिन, पहाड़ सी शामें
अलावा चैन के कुछ मुख़्तसर नहीं आता
तू सोचता है कभी भूल जाएगा मुझको
मैं जानता हूं तुझे यह हुनर नहीं आता
घर से रूठे हुए हमलोग वहां तक आए
जहां से लौट के कोई भी घर नहीं आता
अपने कमरे में ये मासूमियत कहां होती
रोज़ खिड़की पे परिन्दा अगर नहीं आता
यहां से आप जहां जाएं, जिधर हम जाएं
किसी भी राह में कोई शजर नहीं आता

दौड़ती,भागती,
हाथ से छूटती उम्र के व्यस्ततम पलों में,
अचानक आता है तुम्हारा ज़िक्र...!
और मैं हो जाती हूँ 20 साल की युवती।
मन में उठती है इच्छा,
"काश ! तुम फिर से आ जाते ज़िन्दगी में,
अपनी सारी दीवानगी के साथ "
और इस तपते कमरे के चारों ओर
लग जाती है यकबयक खस की टाट।
और उससे हो कर आने लगते हैं,
सुगन्धित ठंढे छीटे।
तमाम सफेद षडयन्त्रों के बीच,
तुम्हारी याद का काला साया...
आह !
कितनी स्वच्छ है ये मलिनता।

शनिवार, 18 मई 2019

मजबूत इरादों वाली अरुणा शानबाग जी को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

अरुणा शानबाग ... हम मे से बहुतों ने 2015 में पहली बार इस नाम और इस नाम से जुड़ी शख़्सियत के बारे मे जाना था | पर अफ़सोस कि इस जान पहचान के पीछे कोई भी सुखद कारण नहीं था | 

2015 की खबरों की सुर्खियों मे जगह बनाने वाली अरुणा शानबाग का 18 मई 2015 को निधन हो गया था ... अपने निधन से पहले  42 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद अरुणा को अंतत: मौत नसीब हुई| अरुणा का निधन 18 मई 2015 को सुबह लगभग 10 बजे केईएम अस्पताल में हुआ,  वह 67 वर्ष की थीं| वह 42 वर्षों तक इसी अस्पताल में जिंदगी से जूझ रहीं थीं| निधन से कुछ दिनों पूर्व उन्हें निमोनिया हो गया था और फेफड़े में भी संक्रमण था और वह जीवनरक्षक प्रणाली पर थीं |


अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल मुंबई में काम करने वाली एक नर्स थीं ... जिनके साथ 27 नवंबर 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय ने यौन अपराध किया था| उस वार्ड ब्वॉय ने यौन शोषण के दौरान अरुणा के गले में एक जंजीर बांध दी थी ... उसी जंजीर के दबाव से अरुणा उस घटना के बाद कोमा में चली गयीं और फिर कभी सामान्य नहीं हो सकीं| उस घटना के बाद पिछले 42 वर्षों से अरुणा शानबाग कोमा में थीं ... अरुणा की स्थिति को देखते हुए उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की गयी थी, लेकिन कोर्ट ने इच्छामृत्यु की मांग को ठुकरा दिया था| अरुणा की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले दरिंदे का नाम सोहनलाल था, जिसे कोर्ट ने सजा तो दी, लेकिन वह अरुणा के साथ किये गये अपराध के मुकाबले काफी कम थी| 
 
 
मजबूत इरादों वाली अरुणा शानबाग जी को ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत का सलाम |

सादर आपका
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छाया

सल्फास एक्सपोजर

वैचारिक मतभेद और चरित्र हनन

लघुकथा : अंगदान

ग़र चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे - अदम गोंडवी

सफ़र की धूल

अभिव्यक्ति का अधिकार

गले का पट्टा (हास्य गीत)

परीक्षा में कम अंक पाने वाले बच्चों के नाम एक खत

40.....गधा ही बस अपना सा लगता है और बहुत याद आता है

फिल्म निर्माण संस्था #बॉम्बे #टाकीज़ में गीतकार #नरेंद्र #शर्मा,

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 17 मई 2019

विश्व दूरसंचार दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
विश्व दूरसंचार दिवस का लोगो
विश्व दूरसंचार दिवस (अंग्रेज़ी: World Telecom Day) प्रत्येक वर्ष '17 मई' को मनाया जाता है। आधुनिक युग में फोन, मोबाइल और इंटरनेट लोगों की प्रथम आवश्यकता बन गये हैं। इसके बिना जीवन की कल्पना करना बहुत ही मुश्किल हो चुका है। आज यह इंसान के व्यक्तिगत जीवन से लेकर व्यावसायिक जीवन में पूरी तक प्रवेश कर चुका है। पहले जहाँ किसी से संपर्क साधने के लिए लोगों को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, वहीं आज मोबाइल और इंटरनेट ने इसे बहुत ही आसान बना दिया है। व्यक्ति कुछ ही सेकेंड में बेहद असानी से दोस्तों, परिवार और सगे संबधियों से संपर्क साध सकता है। यह दूरसंचार की क्रांति है, जिसकी बदौलत भारत जैसे कुछ विकासशील देशों की गिनती भी विश्व के कुछ ऐसे देशों में होती है, जिनकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से रफ्तार पकड़ रही है।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  .... अभिनन्दन।।

गुरुवार, 16 मई 2019

मुफ़्त का धनिया - काबिल इंसान - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज का ज्ञान:

आप चाहे कितने ही काबिल बन जाओ लेकिन अगर सब्जी वाले से धनिया मुफ्त नहीं ला सकते तो घर वालों की नज़र में आपसे ज्यादा नाकाबिल इंसान कोई नहीं है।

सादर आपका
~~~~~~~~~~~~~~~~~

पञ्चचामर छन्द

मुकम्मल अधूरेपन की एक अतृप्त सच्ची झूठी गाथा।

हे सुंदरी! तुम कौन हो?

फर्क नहीं पड़ता।

भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद...

पैशन और पढ़ाई

बच्चे भी काम पर जाते है

मेरा कोना भीग रहा है

ध्रुव त्यागी की हत्या पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई?

ख़ता है अपनी या....

ये कानपुर है मेरी जान...

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अब एक ख़ास लिंक, 
यहाँ आप रश्मि प्रभा जी की कविताओं और कहानियों को पढ़ सकते हैं ... सुन भी सकते हैं...

स्टोरी मिरर पर रश्मि प्रभा

~~~~~~~~~~~~~~~~~

अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

बुधवार, 15 मई 2019

112वीं जयंती - सुखदेव जी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
सुखदेव
सुखदेव (अंग्रेज़ी:Sukhdev, जन्म- 15 मई, 1907, पंजाब; शहादत- 23 मार्च, 1931, सेंट्रल जेल, लाहौर) को भारत के उन प्रसिद्ध क्रांतिकारियों और शहीदों में गिना जाता है, जिन्होंने अल्पायु में ही देश के लिए शहादत दी। सुखदेव का पूरा नाम 'सुखदेव थापर' था। देश के और दो अन्य क्रांतिकारियों- भगत सिंह और राजगुरु के साथ उनका नाम जोड़ा जाता है। ये तीनों ही देशभक्त क्रांतिकारी आपस में अच्छे मित्र और देश की आजादी के लिए अपना सर्वत्र न्यौछावर कर देने वालों में से थे। 23 मार्च, 1931 को भारत के इन तीनों वीर नौजवानों को एक साथ फ़ाँसी दी गई।

8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार के बहरे कानों में आवाज़ पहुँचाने के लिए दिल्ली में केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंककर धमाका किया। स्वाभाविक रूप से चारों ओर गिरफ्तारी का दौर शुरू हुआ। लाहौर में एक बम बनाने की फैक्ट्री पकड़ी गई, जिसके फलस्वरूप 15 अप्रैल, 1929 को सुखदेव, किशोरी लाल तथा अन्य क्रांतिकारी भी पकड़े गए। सुखदेव चेहरे-मोहरे से जितने सरल लगते थे, उतने ही विचारों से दृढ़ व अनुशासित थे। उनका गांधी जी की अहिंसक नीति पर जरा भी भरोसा नहीं था। उन्होंने अपने ताऊजी को कई पत्र जेल से लिखे। इसके साथ ही महात्मा गांधी को जेल से लिखा उनका पत्र ऐतिहासिक दस्तावेज है, जो न केवल देश की तत्कालीन स्थिति का विवेचन करता है, बल्कि कांग्रेस की मानसिकता को भी दर्शाता है। उस समय गांधी जी अहिंसा की दुहाई देकर क्रांतिकारी गतिविधियों की निंदा करते थे। इस पर कटाक्ष करते हुए सुखदेव ने लिखा, "मात्र भावुकता के आधार पर की गई अपीलों का क्रांतिकारी संघर्षों में कोई अधिक महत्व नहीं होता और न ही हो सकता है।"

सुखदेव ने तत्कालीन परिस्थितियों पर गांधी जी एक पत्र में लिखा, 'आपने अपने समझौते के बाद अपना आन्दोलन (सविनय अवज्ञा आन्दोलन) वापस ले लिया है और फलस्वरूप आपके सभी बंदियों को रिहा कर दिया गया है, पर क्रांतिकारी बंदियों का क्या हुआ? 1915 से जेलों में बंद गदर पार्टी के दर्जनों क्रांतिकारी अब तक वहीं सड़ रहे हैं। बावजूद इस बात के कि वे अपनी सजा पूरी कर चुके हैं। मार्शल लॉ के तहत बन्दी बनाए गए अनेक लोग अब तक जीवित दफनाए गए से पड़े हैं। बब्बर अकालियों का भी यही हाल है। देवगढ़, काकोरी, महुआ बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र केस के बंदी भी अन्य बंदियों के साथ जेलों में बंद है।..... एक दर्जन से अधिक बन्दी सचमुच फाँसी के फंदों के इन्तजार में हैं। इन सबके बारे में क्या हुआ?" सुखदेव ने यह भी लिखा, भावुकता के आधार पर ऐसी अपीलें करना, जिनसे उनमें पस्त-हिम्मती फैले, नितांत अविवेकपूर्ण और क्रांति विरोधी काम है। यह तो क्रांतिकारियों को कुचलने में सीधे सरकार की सहायता करना होगा।' सुखदेव ने यह पत्र अपने कारावास के काल में लिखा। गांधी जी ने इस पत्र को उनके बलिदान के एक मास बाद 23 अप्रैल, 1931 को 'यंग इंडिया' में छापा।

ब्रिटिश सरकार ने सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु पर मुकदमे का नाटक रचा। 23 मार्च, 1931 को उन्हें 'लाहौर सेंट्रल जेल' में फाँसी दे दी गई। देशव्यापी रोष के भय से जेल के नियमों को तोड़कर शाम को साढ़े सात बजे इन तीनों क्रांतिकारियों को फाँसी पर लटकाया गया। भगत सिंह और सुखदेव दोनों एक ही सन में पैदा हुए और एक साथ ही शहीद हो गए।


आज महान देशभक्त सुखदेव जी की 112वीं जयंती पर समस्त देशवासी उनके सर्वोच्च बलिदान का स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 14 मई 2019

भई, ईमेल चेक लियो - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


भारत में सिर्फ़ ई मेल या मैसेज करने से काम नहीं चलता!
फोन कर के बताना भी पड़ता है कि ई मेल, मैसेज किया है चेक कर लेना!
 
सादर आपका

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581. पहला आतंकी!

यूपी बोर्ड की शिक्षा कुव्‍यवस्‍था, बानगी बने 165 स्‍कूल

राजनीतिक परिदृश्य में घटती वाद विवाद और तार्किक संवाद क्षमता

आई ऍम सॉरी मैने तुम्हारा दिल तोड़ा कहाँ से आया ये सॉरी :)

जोकर

पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है ...

साम्प्रदायिकता बिल में और राष्ट्रवाद परचम में

लघुकथा : जिंदगी की चाय

एक लड़की प्यारी ...

मौलाना हसरत मोहानी साहब की ६८ वीं पुण्यतिथि

"रूट-कैनाल”

मूर्खिस्तान--मूर्खों का स्वर्ग

खरबूजे के फेंके हुए हिस्से से बनाइए पौष्टिक शरबत

मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #8

पगडंडी

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!! 

सोमवार, 13 मई 2019

भरतनाट्यम की प्रसिद्ध नृत्यांगना टी. बालासरस्वती जी की 101वीं जयंती और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को मेरा नमस्कार। 
टी. बालासरस्वती
तंजोर बालासरस्वती (अंग्रेज़ी: Tanjore Balasaraswati, जन्म: 13 मई, 1918; मृत्यु: 9 फरवरी, 1984) भरतनाट्यम की सुप्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। उन्हें 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार', 'पद्मभूषण' और 'मानद विद्या वाचस्पति' आदि अलंकारणों से सम्मानित किया गया था। टी. बालासरस्वती तमिलनाडु राज्य से सम्बन्धित थीं।

टी. बालासरस्वती का जन्म 13 मई, 1918 को तमिलनाडु के चेन्नई (भूतपूर्व मद्रास) शहर में हुआ था।

एक नर्तकी के रूप में टी. बालासरस्वती ने अपने कैरियर की शुरुआत 1925 में की थी। वह दक्षिण भारत के बाहर भरतनाट्यम नृत्य प्रस्तुत करने वाली पहली कलाकार थीं। उन्होंने पहली बार सन 1934 में कोलकाता में अपनी नृत्य कला को प्रस्तुत किया था।

टी. बालासरस्वती को सन 1955 में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार', सन 1973 में 'मद्रास संगीत अकादमी' से 'कलानिधि पुरस्कार' और 1977 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया था।

'भरतनाट्यम' की प्रसिद्ध नृत्यांगना टी. बालासरस्वती का निधन 9 फ़रवरी, 1984 को हुआ।


'भरतनाट्यम' की प्रसिद्ध नृत्यांगना टी. बालासरस्वती जी की 101वीं जयंती पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 12 मई 2019

माँ की वसीयत बच्चों के नाम


बहुत सोचा 
एक वसीयत लिख दूँ अपने बच्चों के नाम ...
घर के हर कोने देखे
छोटी छोटी सारी पोटलियाँ खोल डालीं 
आलमीरे में शोभायमान लॉकर भी खोला
....... अपनी अमीरी पर मुस्कुराई !
छोटे छोटे कागज़ के कई टुकड़े मिले
गले लगकर कहते हुए - सॉरी माँ,लास्ट गलती है
अब नहीं दुहराएंगे ... हँस दो माँ '
अपनी खिलखिलाहट सुनाई दी ...
ओह ! यानी बहुत सारी हंसी भी है मेरी संपत्ति में !
आलमीरे में अपना काव्य-संग्रह
जीवन का सजिल्द रूप ...
आँख मटकाती बार्बी डौल
छोटी कार - जिसे देखकर ये बच्चे
चाभी भरे खिलौने हो जाते थे
चलनेवाला रोबोट
संभाल कर रखी डायरी
जिसमें कुछ भी लिखकर
ये बच्चे आराम की नींद सो जाते थे ...
मैंने ही बताया था
डायरी से बढकर कोई मित्र नहीं
..... हाँ वह किसी के हाथ न आये
और इसके लिए मैं हूँ न तिजोरी '
पहली क्लास से नौवीं क्लास तक के रिपोर्ट कार्ड
(दसवीं,बारहवीं के तो उनकी फ़ाइल में बंध गए)
पहला कपड़ा,पहला स्वेटर
बैट,बॉल ... डांट - फटकार
एक ही बात -
"जो कहती हूँ ... तुमलोगों के भले के लिए
मेरा क्या है !
अरे मेरी ख़ुशी तो ....'"
मुझे घेरकर
सर नीचे करके वे ऐसा चेहरा बनाते
कि मुझे हँसी आने लगती
उनके चेहरे पर भी मुस्कान की एक लम्बी रेखा बनती ...
मैं हंसती हुई कहती -
सुनो,मेरी हंसी पर मत जाओ
मैं नाराज़ हूँ ... बहुत नाराज़ '
ठठाकर वे हँसते और सारी बात खत्म !
ये सारे एहसास भी मैंने संजो रखे हैं
....
बेवजह कितना कुछ बोली हूँ
आजिज होकर कान पकड़े हैं
फिर बेचैनी में रात भर सर सहलाया है ..
मारने को कभी हाथ उठाया
तो मुझे ही चोट लगी
उंगलियाँ सूज गयीं
.... उसे भी मन के बक्से में रखा है ....
....
वक़्त गुजरता गया -
वे कड़ी धूप में निकल गए समय से
आँचल में मैंने कुछ छाँह रख लिए हैं बाँध के
ताकि मौका पाते उभर आये स्वेद कणों को पोछ सकूँ ...
...
आज भी गए रात जागती हुई
मैं उनसे कुछ कुछ कहती रहती हूँ
उनके जवाब की प्रतीक्षा नहीं
क्योंकि मुझे सब पता है !
घंटों बातचीत करके भी
कुछ अनकहा रह ही जाता है
.....मैंने उन अनकही बातों को भी सहेज दिया है
............
आप सब आश्चर्य में होंगे
- आर्थिक वसीयत तो है ही नहीं !!!
ह्म्म्मम्म - वो मेरे पास नहीं है ...
बस एहसास हैं मासूम मासूम से
जो पैसे से बढ़कर हैं -
थकने पर इनकी ज़रूरत पड़ती है
बच्चों को मैं जानती हूँ न
शाम होते मैं उन्हें याद आती हूँ
तकिये पर सर रखते सर सहलाती मेरी उंगलियाँ
.... उनके हर प्रश्नों का जवाब हूँ मैं
तो सारे जवाब मैंने वसीयत में लिख दिए हैं
- बराबर बराबर ........

रश्मि प्रभा 



हर दिन - माँ का दिन | Isha Sadhguru

 

 

*** वो बर्बाद करती है ***
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वो व्यस्त यूँ होती नहीं,
अपने कर्तव्यों में दिन भर
पर कुछ यों घुली हुई रहती है।
इस कथित व्यस्तता में
हर रोज़ नई सब्ज़ी का
बेजोड़ स्वाद जोड़ना स्वीकार करती है।
कि जिसे सबसे ज़्यादा बेगार मानकर
सैद्धांतिक रूप से
किसी विशेष काम के लिए तय नहीं किया जाता,
परात को पसारकर
हर निरुद्देश्य साँझ में
साग चुनने जैसा बेकार
कोई सबसे पसंदीदा काम चुन लिया है उसने।
बहनों की अथक ट्यूशन में
जिस सामाजिक सुरक्षा के लिए
ढेरों दुश्चिंता से लगातार लाचार रहती है
कई- कई घंटे ख़बरी चैनलों से चिपकी हुई भी
वो अपनी घिसी- पिटी दिनचर्या का मूक निर्वाह करती है,
वो अपने नैसर्गिक भोलेपन में
तब भूल जाती है,
कि बिके हुए सारे चैनेल्स पर
संरक्षा से कहीं बढ़कर
भय परोसना सिखाया जाता रहा है।
नहीं समझ पाती वो
इन नादानियों से कैसे पार पाया जाए,
सो परोसने के लिए फिर
दाल में पड़नेवाली नयी छौंक में ध्यान लगाती है।
सब सहेजकर सलीका जताने में
घंटों तक 'हीटर' जलाते हुए
फिर वो
कहीं कोई गुरेज़ भी नहीं करती।
यूँ हर रात
आदम युगीन बल्ब की पीली रोशनी में
जिस तरह वो ओसारे पे निश्चेष्ट बैठकर
हर रोज़ बच्चों के सकुशल लौट आने को
टिमटिमाती हुई बाट जोहती है
सभी परिपक्व हो चले सदस्यों के मस्तिष्क में
कोई अलग बिजली कौंधती है,
और घर में
हर तरह से अनाप- शनाप खर्चे पे
कोई वाकयुद्ध छिड़ता है।
हज़ारों की बिजली बिल से
अक्सर पापा जहाँ बावले- उतावले हो जाते हैं,
वो बेलौस मुस्कराती है,
इस तरह माँ,
घर में सबसे ज़्यादा बिजली बर्बाद करती है।***
माँ के लिए, जिसने जन्म दिया और जीवन की राह पर मुस्कुराकर, दुलार देकर, अटूट विश्वास भरे मौन संकेतों से गृहस्थ जीवन में आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया ...

और, नमन उस माँ को, जिसने मुझे मेरे गुण-दोषों के साथ हृदय से लगाया, जीवन का मर्म समझाया, आगे बढ़ाया, अटूट विश्वास के साथ ...

आज भी दोनों के यशस्काय में आलिङ्गनबद्ध उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुये ...

मातृदिवस पर हृदयस्तल से भावाञ्जलि! 🙏🏻



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