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ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019

बुधवार, 17 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (चौबीसवां दिन) कहानी




"भावों को वाणी मिलने से अक्षरों की संधि एवं मन मंथन उपरांत शब्द सृजन से निकसा सुधारस मेरी कविता है।" लिखने का शौक तो बचपन से था, ब्लॉग ने मेरी भावनाओं को आप तक पहुचाने की राह आसान कर दी. काफी भावुक और संवेदनशील हूँ. कभी अपने भीतर तो कभी अपने आस-पास जो घटित होते देखती हूँ, तो मन कुछ कहता है, बस उसे ही एक रचना का रूप दे देती हूँ. आपके आशीर्वाद और सराहना की आस रखती हूँ..."संध्या शर्मा के मन की कलम से उतरी ये पंक्तियाँ अपने ब्लॉग को विशेष बनाती हैं।  प्रतियोगिता मंच पर आज इनकी बारी -



चिड़ियों की चहचहाहट होते ही नींद से उठकर छुई खदान जाना और शाम ढले वापस आकर छुई-मिट्टी के एकसार ढ़ेले तैयार करके सुखाने के लिए रखना. यही दिनचर्या है उसकी. गर्मियों में काम दुगुना बढ़ जाता है, इन दिनों में और अधिक परिश्रम करके छुई इकठ्ठा करती है बरसात के लिए. चाहे कोई भी मौसम हो झुलसा देने वाली गर्मी हो, ठिठुरने वाली ठण्ड या फिर फिसलन भरी बरसात. काम तो करना है पेट की आग बुझाने के लिए. बारिश के दिनों में चिकनी सफ़ेद छुई खदान में जाना कोई आसान काम नहीं, जान हथेली पर रहती है. उसपर कुछ ज्यादा पैसे पाने की चाह उसे खदान में अधिक गहराई तक जाने को मजबूर कर देती. दो बरस पहले इस मजबूरी ने उसके सिन्दूर के लाल रंग को भी सफ़ेद छुई - मिट्टी बदल में दिया. अकेली रह गई है तब से एक मासूम बेटी के साथ.

बस्ती के चूल्हे भी अब बहुत कम ही रह गए हैं मिट्टी के. नहीं तो पहले हर घर में मिट्टी के चूल्हे, सुबह - शाम के भोजन बनने के बाद रात को राख- लकड़ी को साफ़ करके छुई - मिट्टी से पुतकर सौंधी -सौंधी खुशबू से महकते थे. ना रहे वह पहले वाले गोबर से लिपे सुन्दर आँगन जिसके बीचोंबीच तुलसी के चबूतरे में दीपक जगमगाते थे, इसलिए आजकल जंगल से लकड़ियाँ भी चुन लाती है वह.

कई दिनों से मिट्टी और लकड़ियाँ बेचकर अपना पेट भरने वाली माँ-बेटी आधा - पेट भोजन कर सो जाती हैं, क्योंकि आधी लकड़ियों से घर के चारों ओर बाड़ बना रही थी वह बेटी की सुरक्षा के लिए. भूख उनके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी, मासूम का मुरझाया चेहरा माँ की तरह अपना दुःख छुपा नहीं सका.

कई दिनों बाद दोनों के चेहरों पर पहले जैसी शांति नज़र आ रही है. बेटी की सुरक्षा के लिए चिंता करती भोली माँ जान गई है कि भूखे रहकर जो सुरक्षा घेरा वह बना रही है, उन भूखे भेड़ियों के लिए कोई मायने नहीं रखता, इसलिए उसने आज बेटी को दे दिया है अपना लकड़ी काटने वाला हंसिया, और साथ में वह गुर जिससे वह काट कर रख दे अपनी ओर गलत निगाहें उठाने वाले का सिर. निश्चिन्त होकर गई रामरती। सिर्फ आज ही उन्हें सोना होगा आधा पेट क्योंकि अधपेट रहकर खरीदेगी एक नया हंसिया. आज की भूख उन्हें देगी भूख से मुक्ति और भूखे भेड़ियों से सुरक्षा.

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (तेईसवां दिन) कविता




ऑरकुट के पन्ने से ब्लॉग की दुनिया में 2008 में मुकेश कुमार सिन्हा ने प्रवेश लिया था।  छोटी छोटी बातों में उलझा उसका मन शब्दों के अरण्य में भटक रहा था, और अंततः उसे रास्ते मिले।  वह अनकहे को लिखने लगा, और आज उसकी वह पहचान है, जिसके लिए वह न कभी घबराया, न कभी रुका।  मिलिए अपने परिचित मुकेश से प्रतियोगिता मंच पर उनकी कविता से -


मान लो 'आग'
टाटा नमक के
आयोडाइज्ड पैक्ड थैली की तरह
खुले आम बिकती बाजार में

मान लो 'दर्द'
वैक्सड माचिस के डिब्बी की तरह
पनवाड़ी के दूकान पर मिलती
अठन्नी में एक !

मान लो 'खुशियाँ' मिलती
समुद्री लहरों के साथ मुफ्त में
कंडीशन एप्लाय के साथ कि
हर उछलते ज्वार के साथ आती
तो लौट भी जाती भाटा के साथ

मान लो 'दोस्ती' होती
लम्बी, ऐंठन वाली जूट के रस्सी जैसी
मिलती मीटर में माप कर
जिसको करते तैयार
भावों और अहसासों के रेशे से
ताकि कह सकते कि
किसी के आंखों में झांककर
मेरी दोस्ती है न सौ मीटर लम्बी

छोड़ो, मानते रहो
क्यूंकि, फिर भी, हम
हम ठहरे साहूकार
आग की नमकीन थैली में
दर्द की तीली घिस कर
सीली जिंदगी जलाने की
कोशिश में खर्च कर देते है

पर, नहीं चाहते तब भी
कमर में दोस्ती की रस्सी बांध
समुद्री लहरों पर थिरकना
खुशिया समेटना, खिलखिलाना

खैर, दोस्त-दोस्ती भी तो
माँगने लगी है इनदिनों
फेस पाउडर की गुलाबी चमक
जो उतर ही जाती है
एक खिसियाहट भरी सच्चाई से

सीलन की दहन
बंधन की थिरकन
नामुमकिन है सहन

आखिर यही तो है इंसानी फितरत
है न!!!!!

सोमवार, 15 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (बाईसवां दिन) कविता/कहानी




हाइकु,कविता,कहानी,लघुकथा - हर विधा में ऋता शेखर ने अपनी एक जबरदस्त पहचान बनाई है, मौसम,उत्तरदायित्व,सपने,हकीकत उनकी लेखनी में एक उम्र जीते हैं, हौसला परछाईं बन चलता है।  इस गरिमामई ब्लॉगर से भी आपसब परिचित होंगे ही, आज इस प्रतियोगिता मंच पर वे उपस्थित हैं, पढ़िए उनकी एक कविता और एक कहानी -




वसुधा मिली थी भोर से जब, ओढ़ चुनरी लाल सी।
पनघट चली राधा लजीली,  हंसिनी  की  चाल  सी।।
इत वो ठिठोली कर रही थी,   गोपियों  के साथ में ।
नटखट कन्हैया उत छुपे थे,   कंकड़ी  ले  हाथ  में ।१।


भर नीर मटकी को उठाया, किन्तु भय था साथ में ।
चंचल चपल इत उत  निहारें, हों   न   कान्हा  घात  में।।
ये भी दबी सी लालसा थी, मीत के दर्शन  करूँ।
उनकी मधुर मुस्कान पर निज, प्रीत को अर्पण करूँ।२।


धर धीर, मंथर चाल से वो, मंद मुस्काती चली ।
पर क्या पता था राधिके को, ये न विपदा है टली ।।
तब ही अचानक, गागरी में, झन्न से कँकरी लगी ।
फूटी गगरिया,  नीर फैला, रह  गई  राधा ठगी ।३।


कान्हा नजर के सामने थे, राधिका थी चुप खड़ी।
अपमान से मुख लाल था अरु, आँख धरती पर गड़ी ।।
बोलूँ न कान्हा से कभी मैं, सोच कर के वह अड़ी ।
इस दृश्य को लख कर किसन की, जान साँसत में पड़ी।४।


चितचोर ने झटपट मनाया, अब न छेडूंगा तुझे ।
ओ राधिके, अब मान भी जा, माफ़ भी कर दे मुझे ।।
झट  से  मधुर  मुरली  बजाई,  वो  करिश्मा  हो  गया ।
मनमीत की मनुहार सुनकर,  क्रोध  सारा  खो   गया ।५।


मनुहार सुनकर सांवरे की, राधिका विचलित हुई ।
हँसकर लजाई इस अदा पर, प्रीत  भी बहुलित हुई ।।
ये  प्रेम  की  बातें  मधुरतम,  सिर्फ़  वो ही जानते।
जो प्रेम से बढ़ कर जगत में, और कुछ ना मानते।६।

और ये कहानी,



रात बीतने को आई किन्तु वकील साहब की आँखों में नींद नहीं थी| सारी सात वे अँधेरे में ही कमरे की छत की ओर आँखें गड़ाए ताकते रहे| कभी करवट बदलते, कभी उठकर बैठ जाते| लग रहा था बहुत ही उधेड़बुन में थे| जिन्दगी में अक्सर दोराहों का सामना हो जाता है जिनमें किसी एक रास्ते को चुनना बहुत कठिन लगता है| किन्तु निर्णय तो लेना ही पड़ता है उन्हें, जो सभ्य और संस्कारी होते हैं| जिनमें दूरदर्शिता नहीं होती उनके सामने कभी दोराहे नहीं आते...जीवन जैसे चल रहा है, बस ठीक है|
    वकील साहब का एक सुखी परिवार था| सुंदर पत्नी और शादी के लायक एक बेटा था जिसे वे बहुत प्यार करते थे| गाँव में अपनी खेती-बाड़ी थी, प्रैक्टिस भी खूब चलती थी| धनाढ्‌यों में गिनती होती थी उनकी| महल जैसा घर और घर में नए मॉडल की दो गाड़ियाँ थीं, एक उनके लिए और दूसरी उनके सुपुत्र के लिए| वकील साहब दिन भर किताबों में उलझे रहते| बेटे की देख-रेख का सारा भार उनकी पत्नी पर था| नवाबों की तरह वह पल रहा था| जब भी पैसे की जरूरत होती माँ इन्कार नहीं करती| बेटे से सख्ती नहीं कर पाती थीं| नतीजा यह रहा कि वह बिगड़ैल नवाब के रूप में जाना जाने लगा| किसी तरह से उसने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की थी| आकर्षक डीलडौल, घुँघराले बाल, गोरा चिट्टा था| बचपन से कभी अभाव नहीं जाना था इसलिए पैसे को पानी की तरह बहाता था| गुस्सा तो नाक पर ही रहता| जब वह किसी तरह की कोई नौकरी में नहीं जा सका तो वकील साहब ने बिजनेस में लगा दिया| यहाँ वह सफल हुआ, क्योंकि उस बिजनेस में दबंग की ही जरुरत थी|
   इतने धनी-मानी घर में अपनी बेटी को देने के लिए कई पिता उत्सुक थे| खूब रिश्ते आने लगे| अन्त में हर प्रकार से जिसे योग्य समझा गया वह निहारिका थी| लड़की की सारी खूबियों से सुशोभित...अर्थात लम्बी , गोरी, घर के कामकाज में निपुण, सुशील और आज्ञाकारिणी| सभी खुश थे| वकील साहब की पत्नी बड़े ही शौक से शादी की खरीदारियाँ कर रही थीं| निश्चित समय पर विवाह संपन्न हुआ| घर में खूब रौनक आ गई| इस घर में आकर निहारिका भी अपने भाग्य सराह रही थी|
  सुंदर पत्नी पाकर वकील साहब का बेटा भी प्रसन्न था| हमेशा दोस्तों के साथ घूमने के बजाय घर में ही रहता| किन्तु अपने बेटे के स्वभाव को लेकर वकील साहब सदा सशंकित रहते| बहू की हर जरूरत और सुख सुविधा पर नजर रखते| बहू भी सास-ससुर की सेवा में तल्लीन रहती| समय बीता...वकील साहब और उनकी पत्नी दादा-दादी बने| पोते को गोद में ले फूले न समाते थे| दिन बीतने लगे|
एक दिन वही हुआ जिसका डर था...सभी लोग डायनिंग टेबल पर बैठे खाना खा रहे थे| बेटे ने निहारिका को गरम पराठा लाने को कहा...तभी मुन्ना रोने लगा| निहारिका उसे संभालने चली गई| नवाबज़ादे ने इसे अपनी तौहीन समझा और खाने की प्लेट जमीन में पटक दिया| माता-पिता तो उसके गुस्से से वाकिफ़ थे ही, किन्तु निहारिका के लिए पति का यह रूप नया था| वह सहम गई और रोने लगी| वकील साहब ने भी खतरे की घंटी को समझा| किसी तरह से बहू को समझाया| निहारिका बच्चे के कारण उसपर अधिक ध्यान नहीं दे पाती थी| इस कारण वह रईसजादा अधिकतर समय घर के बाहर बिताने लगा और बुरी  संगति में पड़ने लगा|
  उसके बाद इस तरह की घटनाएँ अक्सर घटने लगीं| मैके के अच्छे संस्कार लेकर आई थी, इसलिए घर को अखाड़ा नहीं बनाना चाहती थी| वह हरसंभव चुप रहने का प्रयास करती| निहारिका की चुप्पी वकील साहब के बेटे की हिम्मत बढ़ाती गई| अब वह कभी- कभी निहारिका पर हाथ भी उठा देता| यह निहारिका को बहुत बुरा लगता फिर भी सास- ससुर का ख्याल करके चुप रह जाती क्योंकि उनसे उसे कोई शिकायत नहीं थी|
  गुस्सैल तो वह था ही, किन्तु हर हमेशे  मार-पीट का माहौल निहारिका को बरदाश्त नहीं होने लगा| अब तो वह किसी किसी रात घर भी नहीं आता था| वकील साहब की चिन्ता बढ़ती जाती थी| बेटे को समझाना चाहा, लेकिन उसका मन तो कहीं और उलझ गया था| वह निहारिका की ओर देखना भी पसन्द नहीं करता था| एक बार निहारिका का मन हुआ कि वह सब कुछ छोड़छाड़ कर वापस मैके चली जाए किन्तु संस्कार यह कदम उठाने की इजाजत नहीं दे रहे थे|
  एक दिन तो हद ही हो गई...वह नशे में धुत लड़खड़ाता हुआ आया और पत्नी को घर से निकल जाने का आदेश दिया| वह सकते में आ गई| उसने ससुर जी की ओर देखा| वकील साहब ने उसे समझाने की कोशिश की किन्तु वह कहाँ समझने वाला था| उसने उनके साथ भी बदतमीजी से बात की| निहारिका कुछ बोलना चाह रही थी तो नवाबज़ादे ने उसे जोर से धक्का मारा| अचानक हुए इस प्रहार को वह झेल नहीं पाई| गोद में मुन्ना भी था| दोनों ही औंधे मुँह गिर पड़े| उसने किसी तरह मुन्ने को तो बचा लिया किन्तु खुद उसका सर जमीन से टकरा गया| सर से खून निकलने लगा| मुन्ना बेतहाशा रोए जा रहा था|  माँ ने कुछ कहना चाहा तो उन्हें भी चुप कर दिया| परिस्थिति बेकाबू हो गई थी| वकील साहब बेटे की इस हरकत से बहू के सामने शर्मिन्दगी महसूस कर रहे थे| समय पर बेटे पर अंकुश न लगाने का परिणाम सामने था| उन्होंने डॉक्टर को बुलाया और बहू की मरहम पट्टी करवाई| डॉक्टर से उन्होंने झूठ बोल दिया कि वह सीढ़ियों से गिर गई है|
  अभी तक निहारिका ने अपने मैके में कुछ नहीं बताया था| किन्तु वह पढ़ी-लिखी लड़की थी| जहाँ तक हो सका उसने सहनशीलता दिखाई...किन्तु कब तक? यह सवाल उसके जेहन में बार-बार उठने लगे| मुन्ने के भविष्य का सवाल भी सामने था|
     उसने घर छोड़ने का फैसला ले लिया| अश्रुपूरित नजरों से उसने सास-ससुर से विदाई ली| वकील साहब के पास कहने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे|
   निहारिका पिता के घर के दरवाजे पर खड़ी थी| उसे विश्वास था कि पिता जी उसका साथ देंगे| काँपते हाँथों से उसने कॉलबेल बजाया| दरवाजा पिता ने ही खोला| बेटी के सर पर बँधी पट्टी देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया| अनुभवी आदमी थे, पल भर में ही सारा माजरा समझ गए| बेटी को गले से लगा लिया|पिता का स्नेहिल स्पर्श पाते ही वह फूट पड़ी| उसने रोते-रोते सबकुछ बताया| पिता ने निर्णय सुना दिया कि अब वह उस हैवान के पास वापस नहीं जाएगी|
     इधर सारी दुनिया के लिए लड़ने वाले वकील साहब को अचानक सामने दोराहा नजर आने लगा| एक तरफ बेटा था तथा दूसरी ओर बहू और पोता| इसी उधेड़बुन में उन्हें सारी रात नींद नहीं आई थी| बेटा को घर छोड़ने के लिए कहें , दिल यह मानने को तैयार नहीं था| बहू जिसने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया, उसे कैसे बेघर कर दें| उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था| बहुत सोच-विचार कर उन्होंने फैसला ले लिया| पत्नी मानने को राजी न थी| उसे भी समझाया|
  वकील साहब बहू के मैके पहुँचे| निहारिका और उसके पिता ने आवभगत में कोई कसर नहीं रखा| वकील साहब ने कहा-“ बहू, घर चलने के लिए तैयार हो जाओ|”
निहारिका ने पिता की ओर देखा|
पिता ने कहा-“ क्षमा कीजिए वकील साहब, मैं आपकी इज्जत करता हूँ किन्तु बेटी को न भेजूँगा| मुझे उसकी जान पर खतरा नजर आ रहा है| शार्ट टेम्पर्ड व्यक्ति कब क्या कर बैठे, इसका कोई ठिकाना नहीं| आप यहाँ आते-जाते रहें, पर निहारिका को न भेजूँगा|”
   “मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, ऐसा कुछ न होगा| मेरा घर बहू और पोते का है, अपने बेटे को मैंने घर से निकाल दिया है| निहारिका सम्मान के साथ वहाँ रहेगी|”
   निहारिका के पिता अवाक् रह गए| ऐसा भी होता है कि बहू के सम्मान के लिए इकलौते बेटे को घर से निकाल दें| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दाँतों तले ऊँगली दबाकर रह ग‌या| वकील साहब बहू और पोते को आदर के साथ घर ले आए| बहू अपने स्वभाव के अनुरूप घर को सँभालती हुई मान मर्यादा से रहने लगी| पोते को उन्होंने बहुत अच्छी शिक्षा दी| अब वह एक ऊँचे पद पर कार्यरत था| एक बार वकील साहब के बेटे ने घर आने की कोशिश की किन्तु पिता से दो टूक जवाब सुनकर वापस लौट गया|
धीरे-धीरे वकील साहब का शरीर वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा था| निहारिका और मुन्ना जी जान से उनकी सेवा करते| कभी किसी भी काम के लिए उन्हें दोबारा नहीं बोलना पड़ता| वकील साहब की पत्नी बेटे के लिए दुखी रहती थी पर बहू और पोते से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी| समय बीता, मौत आनी थी, आई| वकील साहब का निधन हो गया| निहारिका निःशब्द रोए जा रही थी| उसे यही लग रहा था कि यदि उन्होंने सहारा नहीं दिया होता तो पिता के घर में वह जी जाती किन्तु एक बेचारी की तरह जिन्दगी हो जाती| माता-पिता बेटी को घर में रखकर समाज की आलोचना का शिकार बनते सो अलग|
  अब दाह-संस्कार की बारी आई|वकील साहब का बेटा भी पिता के अन्तिम दर्शन के लिए मौजूद था| मुखाग्नि वही देना चाहता था| वकील साहब ने कह रखा था कि मरने के बाद उनकी वसीयत तुरत पढ़ी जाए और उस अनुसार ही काम किया जाए| वसीयत में यह लिखा था कि दाह-संस्कार का काम पोते के हाथो ही संपन्न हो| पत्नी के निधन के उपरांत सारी जायदाद निहारिका के नांम लिखी गई थी| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दंग रह गया| अपने बेटे को छोड़ दूसरे की बेटी को सहारा देकर वकील साहब ने समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था|


रविवार, 14 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (इक्कीसवां दिन) कविता/लघुकथा




कुछ लम्हे दिल के...अर्चना तिवारी का धड़कता ब्लॉग ! कभी मन अनमना लगे, शाम खाली खाली हो, दिल के इन लम्हों से रिश्ता जोड़ लीजियेगा, यकीनन सुकून मिलेगा। 

प्रतियोगिता के इस शानदार इक्कीसवें दिन को अर्थ दिया जाए, कुछ लम्हे दिल के साथ वक़्त गुजारा जाए।  -



एक आदमी अपने अंतर की सुनता है
एक आदमी भीड़ की सुनता है
भीड़ की सुनने में, उसके जैसा करने में भय नहीं रहता
भय नहीं रहता क्योंकि कोई जिम्मेदारी नहीं लेनी पड़ती
जो भीड़ करे, करो
जो भीड़ कहे, कहो
जो भीड़ सुने, सुनो

लेकिन जो आदमी अपने अंतर की सुनता है, गुनता है
उसे अपने कहने, करने की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है
वह सही साबित होता है तो कभी-कभी गलत भी
गलत उस मायने में कि वह भीड़ को नकार देता है
गलत उस मायने में कि 'सभी तो कर रहे हैं' के चलते नियम को नकार देता है

वह नहीं लेता लाभ
जो ले रहे होते हैं 'सभी'
वह हर कृत्य को तौलता है
वह असफल हो सकता है

लेकिन भीड़
भीड़ तो वह करती है, जो उससे करवाया जाता है, उकसाया जाता है
हाँ, वह सफल होती है
राह चलते किसी को पीटने में, तोड़ने में
या ढहाने में

तो हे! वीरों यह न कहो
यह न कहो कि भीड़ जो करती है, कहती है, चुनती है, वह सही होता है
क्योंकि पता है ना, कि भीड़ कौरव भी होती है?

हाँ, जनतंत्र है यह
जिसके मत का सम्मान होना चाहिए
न कि भीड़तंत्र के
न कि किसी ऐसे राजतंत्र के
जहाँ 'टका सेर' है सब कुछ
एक 'ज्ञानी' भी, एक 'अपराधी' भी

हे! भद्र जनों विचार करो
'जन' हो तुम जनतंत्र के
न कि किसी अंधेर नगरी के गोवर्धनदास...




खड़ी दोपहरिया है। बाग में एक टीलेनुमा स्थान पर बच्चे खेलने जुट रहे हैं। कुछ दूरी पर शीबू बूट पॉलिश की डिब्बी को गाड़ी बना लुढ़काते हुए इधर-उधर दौड़ रहा है। चिनिया अभी नहीं आई है। इसलिए शीबू बीच-बीच में पगडंडी की ओर भी देख लेता है। सहसा पत्तों की सरसराहट के साथ भद की आवाज़ आयी। यह दो आम थे जो शीबू के नज़दीक भूमि पर गिरे थे। पहले तो वह हकबका उठा फिर झपटकर दोनों आम हथेलियों के कब्जे में ले लिए।

सिंदूरी आभा लिए धूप से तमतमाए उन आमों पर शीबू को अभी भी विश्वास नहीं आ रहा था। उसने ऊपर ताका। फिर आमों का मुआइना करते हुए, “यह तो सेनुरहवा का पक्का है! पर...इसमें तो बौर ही नहीं आता?”
शीबू ने आम को नथुनों से लगाकर गहरी साँस खींची, “हम्म्म...खुसबूsss!..आजी कहती हैं कि इसके जितना रसीला पक्का दुनिया में नहीं है!” उसने दोनों को निकर की जेब के हवाले किया और वहाँ से सरपट चल पड़ा।

वह चलते-चलते कभी आमों को जेब से निकालकर तसल्ली करता, तो कभी नथुनों से लगा आँखें बंद कर खुशबू लेता। वह बस्ती में दाखिल हुआ तो अपने घर के सामने फुदकती हुई चिनिया मिल गई।

"ओ सीबू! कहाँ से आ रहा है?"
"बाग से, ये देख आज पक्का पाया!"
"अरे हाँ, कितना बड़ा है!"
"सेनुरहवा का जो है!"
"तू भाग्यसाली है सीबू।"
"कैसे?"
"मैंने सुना है कि जो सेनुरहवा का पक्का खाता है उसकी इच्छा पूरी होती है।"
"हट! खा विद्या कसम!"
"सच्ची, विद्या कसम!"
"तब तो इसे आजी को खिलाऊँगा जिससे उसकी आँखों की रोसनी आ जाए।"
"और दूसरा...कौन खाएगा?" चिनिया आम को हसरत से देखती है।
"दूसरा मैं खाऊँगा...और कौन!"
“अच्छा, एक बार मुझे खुसबू लेने देगा?”
“ले...खुसबू!" शीबू चिनिया की नाक से आम सटा देता है।
चिनिया गहरी साँस खींचती है। मुँह में आए पानी को सुड़कते हुए, "तेरी क्या इच्छा है सीबू?"
"मेरी इच्छा ..." शीबू आँखों में शरारत भरते हुए, "मेरी इच्छा है कि मैं जल्दी से इसे खाऊँ!“
“तो खा ले ना!”
“नाss, पहले दोनों पक्के आजी को दिखाऊँगा।“
"तब खाएगा?"
"हाँ....अच्छा चिनिया...अगर यह तुझे मिलता तो तू क्या इच्छा करती?"
"मैं?...मैं इच्छा करती कि मेरी सादी हो जाए बस!"
"हट, सादी तो सबकी होती है, अपनी इच्छा को बर्बाद ही करेगी तू तो?”
“पर बाबा तो मेरी सादी की ही चिंता करता है!“
“अच्छा ये बता...तू मुझसे सादी करेगी?”
“कर तो लूँ...लेकिन बाबा से पूछना पड़ेगा।“
“क्या पूछना पड़ेगा?”
“वह कहता है कि सादी बिरादरी वालों में करते हैं, तू बिरादरी में है या नहीं यह पूछना होगा ना?“
“अच्छा ठीक है...अभी मैं घर जाता हूँ।"

शीबू घर की ओर दौड़ लगा देता है।
फिर कुछ दूर जाकर रुक जाता है। कुछ सोचकर मुस्कुराता है फिर जेब से एक आम निकालकर चिनिया के घर की ओर भागता है।

शनिवार, 13 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (बीसवां दिन) कविता




सुषमा वर्मा - सपनों की एक सुराही है।  रोज सुबह सपनों की घूंट लेती है और आहुति' लिखती हैं।  प्रेम में सराबोर व्यक्ति इस दुनिया से अलग होता है और मुझे यह ख्वाबोंवाली  ब्लॉगर ऐसी ही लगती है, खुद देख लीजिये उसकी आहुति -



तुम्हारे लिए मुझे त्याग देना आसान था,
क्यों की तुम महान बनाना चाहते थे...
तुम खुद को संयम में,
बांध कर जीना चाहते थे,
क्यों कि तुम इक मिशाल बनाना चाहते थे...
मुझे नही पता कि,
तुम्हे तकलीफ हुई थी या नही...
पर तुम मुझे तकलीफ में छोड़ कर,
मुझे नजरअंदाज करके,
छोड़ कर चले गये...क्यों कि
इक आदर्श बनाना चाहते थे...
तुम्हे दिखाना था कि,
तुम किस तरह सब कुछ..
छोड़ सकते हो,
तुम्हे सभी को बताना था कि,
ये दुनिया....ये समाज तुम्हारे लिए,
कितना मायने रखता है....
मैने कोई शिकायत नही की तुमसे,
तुम्हारी हर नाराजगी पर चुप हो गयी..
तो तुमने खुद को योद्धा मान लिया...
मैंने प्यार में तुम्हे सर्वस्व अर्पित कर,
तुम्हारे सजदे में,
अपना सर झुका दिया...
तो तुमने खुद को महात्मा मान लिया....
तुम्हारी हर मुश्किल में,
मैं ढाल बन कर खड़ी रही,
तुम्हारी हर कमजोरी में,
तुम्हारा संबल बनी रही...
तो तुमने इसे मेरी जरुरत मान लिया....
तुम गलत थे...
हाँ मेरे लिए तुम महान,आदर्श,योद्धा,महात्मा,
सब कुछ थे..
कभी खुद को मेरी नजरो से देखते...
पर तुमने खुद को,
हमेशा दुनिया की नजरों से देखा...
इसलिए मेरी नजरो में,
तुम्हारे लिए जो सम्मान,जो प्यार था...
तुम देख ही नही पाये...
मैं जब भी कमजोर पड़ी,
तुम्हारे साथ के लिए गिड़गिड़ाई,
तो तुमने इसे...
अपनी जीत मान लिया......
मैं तो सिर्फ इक रिश्ते को,
निभाने की हर भरकस कोशिश कर रही थी,
पर अफ़सोस तुमने,
इसे भी मेरी जरुरत समझ लिया....
पर सच तो ये है...
तुम तो हार तभी गये थे,
जब तुम्हारी वजह से,
मेरी आँखों में आंसू थे....!!!



शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (उन्नीसवां दिन) कहानी




 खुश रह कर दूसरों को भी सदा खुश रखने का कुछ असंभव सा कार्य करते हुए खुशी पाने की भरसक कोशिश करता रहता हूं। आस-पास कोई गमगीन ना रहे यही कामना रहती है। श्री गगन शर्मा का यह परिचय उनकी कलम, उनकी सोच को गंभीर पहचान देती है।  
प्रतियोगिता के दरम्यान मुझे इस बात की ख़ुशी है कि सब अपने ब्लॉग को अर्थ दे रहे।  फिर क्यों रुके सब ? मेरा बस इतना कहना है कि चलते जाइये, जाने कब वह पुराना वृक्ष मिल जाए, जहाँ चिड़ियों का बसेरा है और एहसासों की मटकी से एक ग्लास एहसास गुटककर, तृप्त हो जाएँ। 
किसी भी घटना को देखने का अपना अपना नजरिया, अपनी अपनी मान्यता है, उसीका एक पहलू है - 


 जिस दिन अंगविच्छेद करवा शुर्पणखा लंका पहुंची थी,उसे देख क्या उसी समय विद्वान, पंडित, देश-प्रेमी तथा भविष्यवेता रावण को अपने राज्य, देश तथा सारे कुल का विनाश नजर आ गया था ! अपनी प्राण-प्रिय लंका का पराभव देखते हुए कैसे गुजारी होगी उसने वह रात, उद्विग्न और बेचैन हो कर !   

अभी भी सूर्योदय होने में कुछ विलंब था। पर क्षितिज की सुरमयी कालिमा धीरे-धीरे सागर में घुलने लगी थी।कदर्थित रावण पूरी रात अपने महल के उतंग कंगूरों से घिरी छत पर बेचैन घूमता रहा था। पेशानी पर बल पड़े हुए थे। मुकुट विहीन सर के बाल सागर की हवा की शह पा कर उच्श्रृंखलित हो बार-बार चेहरे पर बिखर-बिखर जा रहे थे। रात्रि जागरण से आँखें लाल हो रहीं थीं। पपोटे सूज गए थे। सदा गर्वोन्नत रहने वाले मस्तक को कंधे जैसे संभाल ही नहीं पा रहे थे। तना हुआ शरीर, भीचीं हुई  मुट्ठियाँ, बेतरतीब डग, जैसे विचलित मन की गवाही दे रहे हों। काल की क्रूर लेखनी कभी भी रावण के तन-बदन या मुखमंडल पर बढती उम्र का कोई चिन्ह अंकित नहीं कर पायी थी। वह सदा ही तेजस्वी-ओजस्वी, ऊर्जावान नजर आता था । पर आज की घटना ने जैसे उसे प्रौढ़ता के द्वार पर ला खड़ा कर दिया था। परेशान, चिंताग्रस्त रावण को अचानक आ पड़ी विपत्ति से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था। एक ओर जगत में प्रतिष्ठा थी, इज्जत थी, नाम था, धाक थी । दूसरी ओर इस जीवन के साथ-साथ पूरी राक्षस जाति का विनाश था। 

कल ही की तो बात थी ! रोती-कलपती, उच्छिन्ना शुर्पणखा ने भरे दरबार में प्रवेश किया था ! सारा चेहरा खून से सना हुआ था ! हालांकि नाक-कान पर खरुंड जमने लगा था, पर खून का रिसना बंद नहीं हुआ था। जमते हुए रक्त ने जुल्फों को जटाओं में बदलकर रख दिया था। रेशमी वस्त्र धूल-मिटटी व रक्त से लथ-पथ हो चिथड़ों में बदल कर रह गए थे। रूप-रंग-लावण्य सब तिरोहित हो चुका था ! बचा था तो सिर्फ वीभत्स, डरावना, लहूलुहान चेहरा ! राजकुमारी को ऐसी हालत में देख सभा में सन्नाटा छा गया था ! सारे सभासद इस अप्रत्याशित दृश्य को देख, सकते में आ, खड़े हो गए थे ! सिंहासन से तुरंत उठ विशाल बाहू रावण ने दौड़ कर अपनी प्यारी बहन को सशक्त बाजुओं का सहारा दे अपने कक्ष में पहुंचा तथा रानी मंदोदरी की सहायता से उसे प्राथमिक चिकित्सा देते हुए सुषेण वैद्य को अविलंब हाजिर होने का आदेश दिया था। घंटों की मेहनत और उचित सुश्रुषा के उपरान्त कुछ व्यवस्थित होने के बाद शुर्पणखा ने जो बताया वह चिंता करने के लिए पर्याप्त था। 

 शुर्पणखाअपने भाईयों की चहेती, प्राणप्रिय, इकलौती बहन थी। बचपन से ही सारे भाई उस पर जान छिडकते आए थे। उसकी राह मे पलक-पांवडे बिछाये रहते थे। इसी से समय के साथ-साथ वह उद्दंड व उच्श्रृंखल होती चली गयी थी। विभीषण तो फिर भी यदा-कदा उसे मर्यादा का पाठ पढ़ा देते थे, पर रावण और कुम्भकर्ण तो सदा उसे बालिका मान उसकी जायज-नाजायज इच्छाएं पूरी करने को तत्पर रहते थे। यही कारण था कि पति के घर की अपेक्षा उसका ज्यादा समय अपने पीहर में ही व्यतीत होता था। यहां परम प्रतापी भाईयों के स्नेह का संबल पा शुर्पणखा सारी लोक-लाज, मर्यादा को भूल बरसाती नदी की तरह सारे तटबंधों को तोड दूनिया भर मे तहस-नहस मचाती घूमती रहती थी। ऋषि-मुनियों को तंग करना, उनके काम में विघ्न डालना, उनके द्वारा आयोजित कर्म-कांडों को दूषित करना उसके प्रिय शगल थे और इसमे उसका भरपूर साथ देते थे खर और दूषण।

इसी तरह अपने मद में मदहोश वह मूढ़मती उस दिन अपने सामने राम और लक्ष्मण को पा उनसे प्रणय निवेदन कर बैठी और उसी का फल था यह अंगविच्छेद ! क्रोध से भरी शुर्पणखा ने रावण को हर तरह से उकसाया था अपने अपमान का बदला लेने के लिए ! यहां तक कि पिता समान बडे भाई पर व्यंगबाण छोडने से भी नहीं हिचकिचाई थी। यही कारण था रावण की बेचैनी का ! रतजगे का और शायद लंका के पराभव का। रावण धीर, गंभीर, बलशाली सम्राट के साथ-साथ विद्वान पंडित तथा भविष्यवेता भी था। उसे साफ नजर आ रहा था, अपने राज्य, देश तथा सारे कुल का विनाश।  इसीलिये वह उद्विग्न था। राम के अयोध्या छोड़ने से लेकर उनके लंका की तरफ़ बढ़ने के सारे समाचार उसको मिलते रहते थे पर उसने अपनी प्रजा तथा देश की भलाई के लिए कभी भी आगे बढ़ कर बैर ठानने की कोशिश नहीं की थी। युद्ध का अंजाम वह जानता था। पर अब तो
घटनाएँ अपने चरमोत्कर्ष पर थीं। अब यदि वह अपनी बहन के अपमान का बदला नहीं लेता है तो संसार क्या कहेगा !  दिग्विजयी रावण जिससे देवता भी कांपते हैं, जिसकी एक हुंकार से दसों दिशाएँ कम्पायमान हो जाती हैं वह कैसे चुप बैठा रह सकता है ! इतिहास क्या कहेगा ! कि देवताओं को भी त्रासित करने वाला लंकेश्वर अपनी ही बहन के अपमान पर, वह भी तुच्छ मानवों  द्वारा, चुप बैठा रहा ? क्या कहेगी राक्षस जाति ! जो अपने प्रति किसी की टेढी भृकुटि भी बर्दास्त नहीं कर सकती, वह कैसे इस अपमान को अपने गले के नीचे उतारेगी ? उस पर वह शुर्पणखा, जिसका भतीजा इन्द्र को पराजित करने वाला हो ! कुम्भकर्ण जैसा सैकड़ों हाथीयों के बराबर बलशाली भाई हो ! कैसे अपमानित हो शांत रह जायेगी ?

रावण का आत्ममंथन जारी था। वह जानता था कि देवता, मनुष्य, सुर, नाग, गंधर्व, विहंगों मे कोई भी ऐसा नहीं है जो मेरे समान बलशाली खर-दूषण से पार भी पा सके। उन्हें साक्षात प्रभू के सिवाय कोई नहीं मार सकता ! ये दोनों ऋषीकुमार साधारण मानव नहीं हो सकते। अब यदि देवताओं को भय मुक्त करने वाले नारायण ही मेरे सामने हैं तब तो हर हाल में, चाहे मेरी जीत हो या हार, मेरा कल्याण ही है। फिर इस तामस शरीर को छोडने का वक्त भी तो आ ही गया है। यदि साक्षात प्रभू ही मेरे द्वार आये हैं, तो उनके तीक्ष्ण बाणों के आघात से प्राण त्याग मैं भव सागर तर जाऊंगा। प्रभू के प्रण को पूरा करने के लिए मैं उनसे हठपूर्वक शत्रुता मोल लूंगा ! पर किस तरह ! जिससे राक्षस जाति की मर्यादा भी रह जाये और मेरा उद्धार भी हो जाए ?

तभी गगन की सारी कालिमा जैसे सागर में विलीन हो गयी ! तम का मायाजाल सिमट गया ! भोर हो चुकी थी ! कुछ ही पलों में आकाश में अपने पूरे तेज के साथ भगवान भास्कर के उदय होते ही आर्यावर्त के दक्षिण में स्थित सुवर्णमयी लंका अपने पूरे वैभव और सौंदर्य के साथ जगमगा उठी। जैसे दो सुवर्ण-पिंड एक साथ चमक उठे हों ! एक आकाश में तथा दूसरा धरा पर। परंतु भगवान भास्कर की चमक में जहां  एक ताजगी थी, जीवंतता थी, उमंग थी ! वहीं लंका अपनी बाहरी चमक के बावजूद मानो उदास थी, अपने स्वामी की परेशानी को लेकर। 

तभी रावण ने ठंडी सांस ली, जैसे किसी निष्कर्ष पर पहुंच कोई ठोस निर्णय ले लिया हो। उसने छत से चारों ओर दृष्टि घुमा अपनी प्रिय लंका को निहारा और आगे की रणनीति पर विचार करता हुआ मारीच से मिलने निकल पड़ा।

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (अठारहवाँ दिन) कहानी




जीते तो सब हैं, लेकिन कुछ लोग बखिया उधड़े,रिसते एहसासों के सहयात्री बन जाते हैं। इनकी  कलम अपने वजूद पर इतराती है, धूप,सूखा,आँधी - तूफ़ान, चुप चेहरों से सुलगते,छलकते,सुबकते,ठिठकते,मुस्कुराते शब्दों की एक रेखा खींचती हैं।  इन अर्थवान रेखाओं का मर्म हैं गिरिजा कुलश्रेष्ठ।
आज के प्रतियोगी मंच पर हैं 


रमपतिया की तलाश में एक कविता



रमपतिया !
तुम हँसती थी
दिल खोल कर
एक बड़ी बुलन्द हँसी ।
छोटी-छोटी बातों पर ही
जैसे कि ,तुम्हारा मरद
पहन लेता था उल्टी बनियान
या दरी को ओढ़ लेता था
बिछाने की बजाय
या कि तुम दे आतीं थीं दुकानदार को
गलती से एक की जगह दो का सिक्का
तुम खिलखिलातीं थीं बेबाकी से
दोहरी होजाती थी हँसते-हँसते
आँखें ,गाल, गले की नसें ,छाती...
पूरा शरीर ही हँसता था तुम्हारे साथ,
हँसतीं थी घर की प्लास्टर झड़ती दीवारें
कमरे का सीला हुआ फर्श
धुँए से काली हुई छत
और हँस उठती थी सन्नाटे में डूबी
गली भी नुक्कड तक...पूरा मोहल्ला...।
ठिठक कर ठहर जाती थी हवा
हो जाते थे शर्मसार
सारे अभाव और दुख ,चिन्ता कि
शाम को कैसे जलेगा चूल्हा
या कैसे चुकेगा रामधन बौहरे का कर्जा
बढते गर्भ की तरह चढते ब्याज के साथ ।

रमपतिया !
तुम रोती भी थीं
तो दिल खोल कर ही
हर दुख को गले लगा कर
चाहे वह मौत हो
पाले-पनासे 'गबरू' की
या जल कर राख होगई हो पकी फसल
या फिर जी दुखाया हो तुम्हारे मरद ने
तुम रोती थीं गला फाड़ कर
रुदन को आसमान तक पहुँचाने
तुम्हारे साथ रोतीं थीं दीवारें
आँगन ,छत , गली मोहल्ला और पूरा..गाँव
उफनती थी आँसुओं की बाढ़
रुके हुए दर्द बह जाते थे
तेज धार में  .
नाली में फंसी पालीथिन की तरह.

ओ रमपतिया !
तुम्हें जब भी लगता था
कुछ अखरने चुभने वाला
जैसे कि बतियाते पकड़ा गया तुम्हारा मरद
साँझ के झुरमुट में,
खेत की मेंड़ पर किसी नवोढ़ा से
फुसफुसाते हुए ।
या  कि वह बरसाने लगता लात-घूँसे
बर्बरता के साथ
जरा सी 'ना नुकर 'पर ही
या फिर छू लेता कोई
तुम्हारी बाँहें...बगलें,
चीज लेते-देते जानबूझ कर
तुम परिवार की नाक का ख्याल करके
नही सहती थी चुप-चुप
नही रोती थी टुसमुस
घूँघट में ही
और दुख को छुपाने
नही हँसती थी झूठमूठ हँसी
चीख-चीख कर जगा देती थी
सोया आसमान ।
भर देती थी चूल्हे में पानी
जेंव लो रोटी
मारलो ।
काट कर डाल दो
रमपतिया नही सहेगी
कोई भी मनमानी ।
और तब थर्रा उठतीं थीं दीवारें
आँगन ,छत ,गली मोहल्ला गाँव ..
औरत को जूते पर मारने वाले
बैठे-ठाले मर्द भी...
बचो भाई ! इस औरत से,
क्यों छेड़ते हो छत्ता ततैया का ?

रमपतिया !
ओ अनपढ़ देहाती स्त्री !!
काला अक्षर भैंस बराबर
पर मुझे लगता है कि उस हर स्त्री को
तुम्हारी ही जरूरत है जिसने
नही जाना -समझा
अपने आपको ,आज तक
तुम्हारी तरह ।
रमपतिया तुम कहाँ हो ?

बुधवार, 10 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (सत्रहवाँ दिन) कविता/कहानी




वंदना गुप्ता, नाम ही काफ़ी है यह बताने के लिए कि कलम जब आग उगलती है तो वंदना उसे रगों में भर लेती हैं या फिर उसकी रगों में प्रवाहित होती हैं।  इस बेबाक आग से आपसब परिचित होंगे ही, तो इनके आग्नेय शब्दों से मिलते हैं -



तुम्हारा प्रश्न
आज की आधुनिक
क्रांतिकारी स्त्री से
शिकार होने को  तैयार हो ना
क्योंकि
नये नये तरीके ईज़ाद करने की
कवायद शुरु कर दी है मैने
तुम्हें अपने चंगुल मे दबोचे रखने की
क्या शिकार होने को तैयार हो तुम ……स्त्री?

तो इस बार तुम्हे जवाब जरूर मिलेगा ……


हां , तैयार हूँ मै भी
हर प्रतिकार का जवाब देने को
तुम्हारी आंखों मे उभरे
कलुषित विचारों के जवाब देने को
क्योंकि सोच लिया है मैने भी
दूंगी अब तुम्हे
तुम्हारी ही भाषा मे जवाब
खोलूँगी वो सारे बंध
जिसमे बाँधी थी गांठें
चोली को कसने के लिये
क्योंकि जानती हूँ
तुम्हारा ठहराव कहां होगा
तुम्हारा ज़ायका कैसे बदलेगा
भित्तिचित्रों की गरिमा को सहेजना
सिर्फ़ मुझे ही सुशोभित करता है
मगर तुम्हारे लिये हर वो
अशोभनीय होता है जो गर
तुमने ना कहा हो
इसलिये सोच लिया है
इस बार दूँगी तुम्हे जवाब
तुम्हारी ही भाषा मे
मर्यादा की हर सीमा लांघकर
देखूंगी मै भी उसी बेशर्मी से
और कर दूंगी उजागर
तुम्हारे आँखो के परदों पर उभरी
उभारों की दास्ताँ को
क्योंकि येन केन प्रकारेण
तुम्हारा आखिरी मनोरथ तो यही है ना
चाहे कितना ही खुद को सिद्ध करने की कोशिश करो
मगर तुम पुरुष हो ना
नही बच सकते अपनी प्रवृत्ति से
उस दृष्टिदोष से जो सिर्फ़
अंगो को भेदना ही जानती है
इसलिये इस बार दूँगी मै भी
तुम्हे खुलकर जवाब
मगर सोच लेना
कहीं कहर तुम पर ही ना टूट पडे
क्योंकि बाँधों मे बँधे दरिया जब बाँध तोडते हैं
तो सैलाब मे ना गाँव बचते हैं ना शहर
क्या तैयार हो तुम नेस्तनाबूद होने के लिये
कहीं तुम्हारा पौरुषिक अहम आहत तो नही हो जायेगा
सोच लेना इस बार फिर प्रश्न करना
क्योंकि सीख लिया है मैने भी अब
नश्तरों पर नश्तर लगाना …………तुमसे ही ओ पुरुष !!!!!!!

दांवपेंच की जद्दोजहद मे उलझे तुम
सम्भल जाना इस बार
क्योंकि जरूरी नही होता
हर बार शिकार शिकारी ही करे
इस बार शिकारी के शिकार होने की प्रबल सम्भावना है
क्योंकि जानती हूं
आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य मे आहत होता तुम्हारा अहम
कितना दुरूह कर रहा है तुम्हारा जीवन
रचोगे तुम नये षडयत्रों के प्रतिमान
खोजोगे नये ब्रह्मांड
स्थापित करने को अपना वर्चस्व
खंडित करने को प्रतिमा का सौंदर्य
मगर इस बार मै
नही छुडाऊँगी खुद को तुम्हारे चंगुल से
क्योंकि जरूरी नही
जाल तुम ही डालो और कबूतरी फ़ंस ही जाये
क्योंकि
इस बार निशाने पर तुम हो
तुम्हारे सारे जंग लगे हथियार हैं
इसलिये रख छोडा है मैने अपना ब्रह्मास्त्र
और इंतज़ार है तुम्हारी धधकती ज्वाला का
मगर सम्भलकर
क्योंकि धधकती ज्वालायें आकाश को भस्मीभूत नही कर पातीं
और इस बार
तुम्हारा सारा आकाश हूँ मै …………हाँ मै , एक औरत
गर हो सके तो करना कोशिश इस बार मेरा दाह संस्कार करने की
क्योंकि मेरी बोयी फ़सलों को काटते
सदियाँ गुज़र जायेंगी
मगर तुम्हें ना धरती नज़र आयेगी
ये एक क्रांतिकारी आधुनिक औरत का तुमसे वादा है
शतरंज के खेल मे शह मात देना अब मैने भी सीख लिया है
और खेल का मज़ा तभी आता है
जब दोनो तरफ़ खिलाडी बराबर के हों
दांव पेंच की तिकडमे बराबर से हों
वैसे इस बार वज़ीर और राज़ा सब मै ही हूँ
कहो अब तैयार हो आखिरी बाज़ी को ……ओ पुरुष !!!!

=====================================================कहानी






 ये वक्त चींटी की तरह काटता है. कैसे समझाऊँ?  स्क्रॉल करते करते रूह बेज़ार हो जाती है , अपने अन्दर की अठन्नी अपना चवन्नी होना स्वीकार नहीं पाती. ये वक्त के केंचुए अक्सर मेरी पीठ पर रेंगते हुए झुरझुरी पैदा बेशक करते रहें लेकिन कभी हाथ बढ़ाकर तसल्ली के चबूतरे पर नहीं बिठाते. ऊब के जिस्म से आती बू से वाकिफ है मेरा कमरा, मेरा बिस्तर, मेरी सोच, और मेरी तन्हाई. कयास लगाने को जरूरी है घट में पानी का बचा होना . यहाँ अरसा हुआ खुद को ही ख़ारिज किए. कोई और करे उससे पहले जरूरी था राजतिलक खुद को खुद लगाना. दिन एक सुलगता आँवा और उसमे पकती है मेरी उम्र की परछाईं मद्धम मद्धम . बताओ अब कौन सा राग सुनाऊँ कि जिससे लौट सकूँ एक बार फिर परछाइयों के शहर में जिसकी गुलाबी रंगत में अक्सर बसंत पहरा देता था और सावन गीत गाता था ...


संभावनाओं की नाव पर चढ़ तो गए हो मगर भूल गए हो पतवार और नाविक को ...यहाँ कश्तियाँ राम भरोसे नहीं चला करतीं .....चप्पुओं से जुगलबंदी जरूरी है जैसे खुदा का होना ......विषय तार्किक हो या न हो , मेरी चुकता किश्तों से अब नहीं कटेगा एक नया पैसा ...कि काट रही हूँ आजकल वक्त के पायंचे . जो रफू करने की फ़िक्र ही न रहे .


शीशम और सागवान से अब नहीं बनायीं जाती वक्त की चौखटें कि जिनके पार जाने पर वापसी संभव हो .. वक्त के हाथों में लगी है मेहंदी. चुप एक कोने में सिसकती है और उम्र ... हाहाहा ...बातों की मोहताज है अरसे से, किसी अपने के स्नेहभरे हाथ की, किसी बिखरी प्यास की ...कि लगे मुकम्मल जी ली ज़िन्दगी.


"ओह! तुम और तुम्हारी ये फिलोसोफिकल बातें. पागल बना देंगी एक दिन."

"अब तक तो नहीं हुए तो अब क्या होंगे" चिढाते हुए रीना ने कहा.

"तुम बोर नहीं होतीं ऐसी बातें करके" चिढ़ते हुए साहिर ने जवाब दिया.

"अरे ज़िन्दगी की सच्चाई ही तो कही है. क्या यही नहीं है ज़िन्दगी का सच, हमारी ज़िन्दगी का"

"क्या सच है बताओ ज़रा? बेसिर पैर का भाषण भर है बस" उसी अंदाज़ में साहिर अपनी रौ में बोलता गया.
"हम्म, अब तो यही कहोगे. भूल गए न किस दौर से गुजरे हैं हम दोनों. आज उसी को कलमबद्ध कर रही थी और तुम हो कि सच को भाषण का नाम दे रहे हो" चलो जाओ, कुछ नहीं कहना अब मुझे. उठ गयी रीना लैपटॉप को बंद करके. जानती थी अब मूड जाने कब रंगत पकड़ेगा. धीरे धीरे पैर जमीन पर रखा और खड़ी हुई चलने को तो एक एक कदम मन भर का था. खुद को घसीटना ही तो था अब जीने का क़र्ज़ उतारने को.


“यहाँ सारे मौसम एक से ही रहते हैं. फर्क नहीं पड़ता बरखा ने डेरा लगाया है या बसंत ने... इनका आना और जाना बस साँसों के आने जाने समान ही तो है. किस डाल पर कौन सी चिड़िया फुदकी , कब उड़ी , अब क्या करना है जानकर. अरसा हुआ तोड़ चुके हैं नाता इस जहान की हर उठापटक से. कोई भी तो अपना सा नहीं जो दो घड़ी अपनी जिंदगी के देता तो लगता जीवित हैं हम. बस दूध वाला, किराने वाला, और कामवाली बाई ही बताते हैं जिंदा हैं हम वर्ना अपनों के लिए तो एक अरसा हुआ मरे हुए...क्या बेटा और क्या बेटी. अब तो हमारी लाशें ही बोलेंगी जो बोलना होगा. किसी दिन देखना ऐसे ही अनंत की यात्रा पर निकल जायेंगे हम दोनों-चुपचाप” रीना का बोलना जारी था और साहिर चुपचाप उसकी बडबडाहट सुन रहा था. जानता था गलत नहीं है एक भी शब्द रीना का.

“मैंने ये फेसबुक क्यों ज्वाइन किया? क्या इसलिए कि मुझे मज़ा आता है. नहीं अब इस उम्र में क्या मज़ा और क्या चाहना. बस कुछ देर खुद को भुलाने को और जीने को यहाँ चली आती हूँ ताकि वक्त हमें काटे उससे पहले हम उसे काट लें. कभी कभी काफी अच्छा भी पढने को मिल जाता है तो कभी कभी एक ही टॉपिक पूरे पटल पर छाया रहता है तो लगता है यहाँ भी हमारी सी ही दशा है...वो ही एक सी रुत.” धीरे धीरे खुद को स्टिक के सहारे चलाते हुए और सामान को सही रखते हुए रीना बडबडाये जा रही थी .

“हाँ, समझ रहा हूँ मैं, मैंने कौन सा तुम्हें मना किया है कुछ करने से. करो जो चाहे करो, खूब पढो, लिखो लेकिन एक बात पूछता हूँ क्या ये सब करने से कुछ बदलेगा? हमारे जीवन में कोई बदलाव आएगा? वो ही खामोश दिन और सन्नाटे से भरी रात.” बेबस सी आवाज़ में साहिर ने पूछा.

“क्यों तुम ऐसा सोचते हो? एक बार तुम भी ऐसा करके देखो, देखना तुम खुद को कितना बिजी कर लोगे. वर्ना देखो, सारा दिन या तो कुर्सी पर बैठे बैठे बिता देते हो या फिर अखबार पढ़कर या फिर बालकनी में बैठकर. क्या मैं समझती नहीं अपनों के दिए ग़मों से रोज खुद की झाड पोंछ करते हो और सोचते हो – आखिर क्या कमी रही हमारी जो उन्हें हमारी परवाह ही नहीं रही. बोलो क्या झूठ कह रही हूँ?” साहिर के चेहरे पर फैली अनगिनत पीड़ा की लकीरों को पढ़ते हुए रीना ने कहा.

“हम्म, छोडो रीना, बेकार है ये सब याद करना. बस तुम इतना याद रखना कल को मुझे कुछ हो जाए तो मैंने कहाँ ऍफ़ डी रखी हैं और कितने पैसे अकाउंट में जमा हैं . वही तुम्हारा अंतिम सहारा होंगे. अब इस दुनिया में जी नहीं लगता. सच पूछो तो सिर्फ तुम्हारे कारण ही जिंदा हूँ. तुम्हें कुछ हो गया होता तो मैं एक दिन भी जिंदा न रहता.” साहिर, जो छोड़ चुका था जीवन की हर उम्मीद. शायद रीना ही वो वजह थी जिसके लिए वो साँसों के क़र्ज़ चुकता कर रहा था.

“तुम फिर ऐसी बात करने लगे. अरे, मौत क्या अपने हाथ में होती है? उसे तो आना ही है और आकर ही रहेगी लेकिन जब तक न आये क्यों न हम दोनों एक-एक पल को ऐसे जीयें जैसे यही आखिरी पल हो. शायद इस तरह जीवन काटना आसान हो जाए. जाने कितनी बार तुम्हें कह चुकी हूँ लेकिन तुम हो कि अपनी निराशा से बाहर ही नहीं आते.” उलाहना देते हुए रीना ने कहा.

“तुम भी न बच्ची बन जाती हो कभी कभी. तुम्हारी पहले वाली आदत अब तक नहीं गयी. अंत में से आरंभ ढूँढने की” गहन दृष्टि से रीना को देखते हुए साहिर ने कहा.

“हाँ, साहिर, अब ज़िन्दगी जाने कब दगा दे जाए. कम से कम हमारे पास जीने के लिए एक दूसरे की कुछ ऐसी यादें तो हों जो हमने अब तक जी ही न हों. पके आम हैं कब गिर पड़ें कौन जाने. हमें तैयार रहना होगा हर पल इस होनी के लिए. लेकिन उससे पहले जरूरी है इस निराशा को खुद से दूर रखना और स्वीकारना जो स्थिति है. स्थिति से कोई भाग सकता है क्या? स्वीकारो और आगे बढ़ो” उपदेशात्मक स्वर में रीना ने कहा.

“तो उसके लिए क्या करना होगा मैडम? आपके तो गुठने साथ नहीं देते और मेरा दिल. तो बताओ कैसे तुम्हारे संग बॉल डांस करूँ? कैसे तुम्हारे संग किसी ऊंची पहाड़ी पर तुम्हारा हाथ पकड़ दौड़ता चला जाऊँ? इस ख्वाब को अब अगले जन्म के लिए रख लो रीना. इस जन्म को तो इसी हिसाब किताब में गुजारना होगा कि सुना था कि बेटे ही साथ छोड़ देते हैं लेकिन बेटी भी वैसा ही करती है, ये अब जाना.” एक बार फिर साहिर बात को घुमाकर उसी दिशा में ले गया जिससे बचाने की रीना कोशिश कर रही थी.

“तुम फिर डिप्रेशन वाली बात करने लगे. अब बच्चों के लिए हम बोझ के सिवा कुछ नहीं. उनके किस काम आ सकते हैं. हाँ, यदि हमारे हाथ पैर अच्छे से चलते होते तो अपने बच्चों की परवरिश के लिए आया बनाकर वो हमें बुला भी लेते और उनके कुछ पैसे बच जाते मगर अब हमें बुलाने से क्या फायदा? और कह देते चलो मम्मी पापा आ जाओ इस बहाने घूम जाओगे मगर अब उलटे हम पर ही पैसे खर्च करने पड़ेंगे फिर वो विदेश में रहते हैं कैसे हमारी देखभाल करेंगे अपनी नौकरी छोड़कर, सोचो जरा. छोड़ा करो, किसी से कोई उम्मीद ही क्यों करते हो?”

“ये उम्मीद नहीं, बस मन है कि मानता नहीं.” हताश स्वर में साहिर ने कहा.

“चलो थोड़ी देर पार्क में टहल कर आते हैं” रीना ने साहिर को उन यादों से दूर ले जाने हेतु कहा.

जोर से हँसते हुए साहिर ने कहा, “देवी जी, तुम और टहलने की बात कर रही हो? कहीं टहलने जाओ और सचमुच ही टहल न जाओ.”

“अच्छा, तो मेरा मजाक उड़ाया जा रहा है. अब इतनी भी मोम की गुडिया नहीं हूँ. और फिर तुम्हारी बाईपास सर्जरी हो चुकी है तो डॉक्टर ने भी कहा है न रोज टहलने को. अब कोई सुनवाई नहीं, चलो उठो” आर्डर देते हुए रीना ने कहा.

“अरे, बाहर बहुत तेज जाड़ा है. मानो मेरी बात, रहने दो, बाद में सारी रात तुम्हारी दर्द से चिल्लाते बीतेगी.” समझाने वाले अंदाज़ में साहिर ने कहा.

“तुम चलो न, मन में जाड़ा नहीं है न, मन चंगा तो कठौती में गंगा” कह रीना ने गुठ्नों पर पैड पहने और पैरों में जूते पहने, सर पर टोपी और बदन को गर्म कपड़ों से ढकने के बाद शाल भी ओढ़ ली. “लो हो गयी पैक, देखती हूँ अब ठण्ड कहाँ से घुसेगी.” कह रीना ने अपनी स्टिक उठाई और टुक-टुक करते हुए चल पड़ी तो साहिर ने भी अच्छे से खुद को कपड़ों में पैक किया और चल पड़ा उसके पीछे-पीछे.

पार्क घर से कोई ज्यादा दूर नहीं था. गली के नुक्कड़ पर ही पार्क था. ये कॉलोनी थी ही ऐसी जहाँ पार्क पास होने से सभी को सुविधा थी. दोनों एक दूसरे का हाथ थामे धीमे-धीमे चलते हुए पार्क में अन्दर गए और टहलने लगे. सुबह का वातावरण वो भी जाड़े में, इक्का दुक्का जोगिंग करने वाले युवा ही वहाँ आते या फिर कसरती लोग. दोनों एक चक्कर लगाते और बेंच पर बैठ जाते. सूरज मियाँ भी ठण्ड से ठिठुरे होते तो बाहर आने में आनाकानी करते. दस मिनट बैठते फिर एक चक्कर लगाते. इस तरह दोनों पार्क के चार चक्कर लगाते और घर लौट आते. यही उनका रोज का नियम था.

घर क्या दो कमरों का ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट था. हर फ्लोर पर दो फ्लैट एक दूसरे से सटे हुए. ऊपर जाने के लिए लिफ्ट थी. इस तरह चार मंजिला ईमारत थी. दिल्ली जैसे शहर में ऐसे रहना भी कहाँ आसान होता है. नीचे की नीचे ही सब सब्जी आदि खरीद लेते. किराने वाले को सामान लिखवा देते तो वो भिजवा देता. फिर किराने का सामान कोई ज्यादा नहीं होता. दो चार दालें , आटा, चावल, चीनी, चाय, तेल , साबुन आदि. अब कौन सा पहले की तरह भर कर सामान आता था इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी उन दोनों को इस तरह रहने में भी लेकिन दिन और रात समान हो चुके थे उनके लिए. नींद भी उम्र से होड़ करने पर तुली जाती थी मानो कहती हो जितना तू बढ़ेगी उतना मैं घटूंगी. दोनों को यहाँ रहते कोई ज्यादा वक्त भी नहीं गुजरा था . महज पाँच साल . पाँच सालों ने ही उनकी ज़िन्दगी बदल दी थी. बेटे और बेटी दोनों के ब्याह कर चुके थे. दोनों के दो-दो प्यारे-प्यारे बच्चे थे. जब इकट्ठे होते तो आँगन किलकारियों से गूँज उठता था. आकाश की जॉब मल्टीनेशनल कंपनी में होने के कारण उसे अमेरिका जाना पड़ा तो सुरभि को अपने पति की जॉब के कारण जर्मनी. एकाएक दोनों जैसे खाली हो गए थे. इसी वजह से जाने से पहले आकाश ने ग्राउंड फ्लोर के फ्लैट में उन्हें शिफ्ट कर दिया था ताकि ऊपर चढ़ने उतरने की दिक्कत न हो, न ही बाहर आने जाने में. शुरू में तो दो साल बाद आये भी लेकिन उसके बाद अब तो नाम भी नहीं लिया दोनों ने आने का. अब पता नहीं बात भी करते हैं या नहीं? मैं, उनके बराबर के फ्लैट वाली सुनीता, अक्सर दोनों की नोंक-झोंक सुनती और यही देखती कहीं उन्हें कोई जरूरत न हो. पता है, यहाँ उनका कोई नहीं इसलिए ख़ास ध्यान रखती हूँ. लेकिन ऐसी उम्मीद नहीं थी कि बच्चे ऐसा करेंगे.

उनकी रोज की बातें मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी थीं क्योंकि वो आगे के कमरे में ही बैठते और जाली वाला गेट ही बंद होता तो आवाजें मुझ तक आती रहतीं क्योंकि मैं किचन में होती. मेरी किचन बाहर की तरफ थी. जाने कब वो दोनों जैसे मेरी ज़िन्दगी का ही हिस्सा से बन गए जबकि महानगरों में रहने वाले अक्सर एक दूसरे से बात करना भी अपनी तौहीन समझते हैं. दुआ सलाम रोज ही हो जाती. अब तो मुझे उनकी बातों की आदत हो गयी थी यदि किसी दिन उनकी आवाज़ न सुनती तो पूछने जाती कहीं तबियत तो खराब नहीं. अक्सर सोचती ‘क्या इसी दिन के लिए इंसान औलाद पैदा करता है जो जब उन्हें जरूरत हो तभी अकेला हो जाए. मगर ये उनका दोष नहीं आजकल माहौल ही शायद ऐसा हो गया है. हर घर की यही कहानी है.शायद पहले हम अच्छे थे जब एकसाथ रहते थे और कभी किसी को किसी की कमी नहीं खलती थी. संयुक्त परिवार का महत्त्व शायद ऐसे ही वक्त पर महसूस होता है.’

उस दिन भी वो टहलने गए हुए थे और मैं कपडे धो रही थी. तभी शोर सुन बाहर आई तो देखा गली के कुछ लोग उन दोनों को ही उठाये चले आ रहे हैं, देख मैं दौड़ी-दौड़ी गयी तो पता चला, अचानक आंटी चलते-चलते गिरीं और वहीँ ख़त्म हो गयीं. वहाँ टहल रहे लड़कों ने उन्हें बेंच पर लिटाया और डॉक्टर को वहीँ लेकर आ गए और जैसे ही डॉक्टर ने बताया वो ख़त्म हो गयीं, अंकल उनका हाथ पकड़ कर वहीँ बैठ गए, न रोये, न कुछ बोले तो डॉक्टर को लगा कहीं गहरे सदमे में न चले गए हों, और जैसे ही उन्हें हिलाया तो वो भी एक तरफ लुढ़क गए. अब दो लाशें एक साथ लायी गयी थीं लेकिन मैं, मैं तो खुद एक सदमे की सी स्थिति में आ गयी थी. अब रोज किसकी नोंक झोंक सुनूंगी? ये कैसे संभव है एकसाथ दोनों का इस तरह दुनिया को छोड़कर जाना? हार्ट का ऑपरेशन तो अंकल का हुआ था, आंटी को तो सिर्फ बी पी की ही बीमारी थी तो क्या उसी वजह से ये हुआ? डॉक्टर ने बताया सर्दी के कारण अचानक हार्ट श्रिंक कर जाता है तो क्या ये उसी कारण हुआ? ओह, तो अंकल ये सदमा सहन कहाँ कर पाए होंगे वो तो खुद हार्ट पेशेंट थे. ऐसे भी कोई जाता है दुनिया से एकसाथ? सारे गली के लोग ताज्जुब तो कर ही रहे थे वहीँ क्योंकि वो सीनियर सिटीजन थे तो पुलिस को सबसे पहले इत्तिला दी गयी और उन्होंने उनके बेटे और बेटी को खबर की ताकि उनके आने के बाद उनका दाह संस्कार किया जा सके.

यहाँ आकर पता चला आज का इंसान कितना हृदयहीन हो चुका है और खून कितना पानी. जिन बच्चों के लिए उम्र भर खटता रहता है वो इतने संवेदनहीन कैसे हो जाते हैं कि बेटे और बेटी, दोनों ने अपनी-अपनी मजबूरियाँ बताई और कह दिया, “आप ही लोग उनका दाह संस्कार कर दीजिये, हम नहीं आ सकते. वैसे भी अब आने का क्या फायदा, जब वो रहे ही नहीं.”

मतलब इसमें भी फायदा नुक्सान देखना. इतना कोरा जवाब? ये किस दौर में जी रहे हैं हम? कोई संवेदना बची ही नहीं अपनों के लिए भी. क्या इतना मनी माइंडेड बना दिया है हमें आज के दौर ने? ऐसी बेदिली न कहीं सुनी थी न देखी. पहली दफह मौका मिला था. अडोस-पड़ोस जिसने सुना वो ही अचंभित था. अब जितने मुँह उतनी बातें हो रही थीं लेकिन जो हो रही थीं वो सच ही तो थीं. मेरा उनसे कोई रिश्ता न था लेकिन यूँ लगा जैसे एक बार फिर मैंने अपने माँ पिता को खो दिया हो. सिर्फ उनकी बातें, उनका अकेलापन और उनका दर्द ही अब मेरी यादों की धरोहर बन गया था. अब सोचती हूँ तो लगता है जैसे पता नहीं वो उन्हें फ़ोन भी करते थे या नहीं? कई बार आंटी की आवाज़ आती तो थी बात करने की लेकिन अब लगता है जैसे वो खुद को बहलाती थीं बंद फ़ोन उठाकर क्योंकि अक्सर अंकल कहते थे, “बस करो रीना, क्यों खुद को धोखा दे रही हो. आज के दौर की हवाएं हैं जिनमे न नमी होती है और न ही बसंत. अब उनसे उम्मीद मत करो और न खुद को दिलासा दो.” उफ़! और मैं समझी ही नहीं, आज जाकर समझ आया है ये सच.

और सोचते-सोचते याद आ गयी मुझे आंटी की कही बात – “बस दूध वाला, किराने वाला, और कामवाली बाई ही बताते हैं जिंदा हैं हम वर्ना अपनों के लिए तो एक अरसा हुआ मरे हुए...क्या बेटा और क्या बेटी. अब तो हमारी लाशें ही बोलेंगी जो बोलना होगा. किसी दिन देखना ऐसे ही अनंत की यात्रा पर निकल जायेंगे हम दोनों-चुपचाप”

सच है, लाशें ही बोल पड़ीं और खोल दी रिश्तों के खोखलेपन की सारी कलई...


मंगलवार, 9 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (सोलहवां दिन) कविता




ज़िन्दगी का सार सिर्फ इतना
कुछ खट्टी कुछ कडवी सी
यादों का जहन में डोलना
और फिर उन्ही यादों से
हर सांस की गिरह में उलझ कर
वजह सिर्फ जीने की ढूँढना !!"

जीने की वजह ढूंढती, बनाती रंजू भाटिया को कौन नहीं जानता।  मेरे ब्लॉग के आरम्भिक दिनों का आकर्षण रही हैं रंजू भाटिया।  जीने की खूबसूरत वजहों से सराबोर रंजू जी अपनी कलम के साथ आज हमारे साथ हैं, 


रुख ज़िन्दगी का

  
जिस तरफ़ देखो उस तरफ़ है
भागम भाग .....
हर कोई अपने में मस्त है
कैसी हो चली है यह ज़िन्दगी
एक अजब सी प्यास हर तरफ है
जब कुछ लम्हे लगे खाली
तब ज़िन्दगी
मेरी तरफ़ रुख करना

खाना पकाती माँ
क्यों झुंझला रही है
जलती बुझती चिंगारी सी
ख़ुद को तपा रही है
जब उसके लबों पर
खिले कोई मुस्कराहट
ज़िन्दगी तब तुम भी
गुलाबों सी खिलना

पिता घर को कैसे चलाए
डूबे हैं इसी सोच को ले कर
किस तरह सब को मिले सब कुछ बेहतर
इसी को सोच के घुलते जा रहे हैं
जब दिखे वह कुछ अपने पुराने रंग में
हँसते मुस्कराते जीवन से लड़ते
तब तुम भी खिलखिला के बात करना
ज़िन्दगी तब मेरी तरफ़ रुख करना

बेटी की ज़िन्दगी उलझी हुई है
चुप्पी और किसी दर्द में डूबी हुई है
याद करती है अपनी बचपन की सहेलियां
धागों सी उलझी है यह ज़िन्दगी की पहेलियाँ
उसकी चहक से गूंज उठे जब अंगना
तब तुम भी जिंदगी चहकना
तब मेरी तरफ तुम भी रुख करना

बेटा अपनी नौकरी को ले कर परेशान है
हाथ के साथ है जेब भी है खाली
फ़िर भी आँखों में हैं
एक दुनिया उम्मीद भरी
जब यह उम्मीद
सच बन कर झलके
तब तुम भी दीप सी
दिप -दिप जलना
ज़िन्दगी तुम इधर तब रुख करना

नन्हा सा बच्चा
हैरान है सबको भागता दौड़ता देख कर
जब यह सबकी हैरानी से उभरे
मस्त ज़िन्दगी की राह फ़िर से पकड़े
तब तुम इधर का रुख करना
ज़िन्दगी अपने रंगों से
खूब तुम खिलना...

सोमवार, 8 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (पन्द्रहवाँ दिन) कविता




शिखा वार्ष्णेय को हम उनके शब्दों में पहले जान लें, फिर कुछ कहें -
"अपने बारे में कुछ कहना कुछ लोगों के लिए बहुत आसान होता है, तो कुछ के लिए बहुत ही मुश्किल और मेरे जैसों के लिए तो नामुमकिन फिर भी अब यहाँ कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा न. तो सुनिए. मैं एक जर्नलिस्ट हूँ मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी से गोल्ड मैडल के साथ टीवी जर्नलिज्म में मास्टर्स करने के बाद कुछ समय एक टीवी चैनल में न्यूज़ प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया, हिंदी भाषा के साथ ही अंग्रेज़ी,और रूसी भाषा पर भी समान अधिकार है परन्तु खास लगाव अपनी मातृभाषा से ही है.अब लन्दन में निवास है और लिखने का जुनून है."
ये शिखा ने तब कहा, जब उसने ब्लॉग बनाया, आज वे एक स्थापित ब्लॉगर ही नहीं, किताबों की दुनिया में भी उनके ठोस कदम पड़े हैं, रसोई चिंतन उनका लाजवाब होता है, स्वादिष्ट लज़ीज़ खाने की सरल विधि के साथ वे अपने भुक्खड़ घाट पर और रेडियो पर मिलती हैं। आज वे इस प्रतियोगिता मंच पर अपनी एक कविता के साथ हैं, इस चाह के साथ कि ब्लॉग के दिन लौट आयें। 


वह जीने लगी है…



अब नहीं होती उसकी आँखे नम जब मिलते हैं अपने
अब नहीं भीगतीं उसकी पलके देखकर टूटते सपने।
अब नहीं छूटती उसकी रुलाई किसी के उल्हानो से
अब नहीं मरती उसकी भूख किसी के भी तानो से।

अब किसी की चढ़ी तौयोरियों से नहीं घुटता मन उसका
अब किसी की उपेक्षाओं से नहीं घुलता तन उसका ।

अब नम होने से पहले वह आँखों पर रख लेती है खीरे की फांकें
लेती है कॉफी के साथ केक, सुनती है सेवेंटीज के रोमांटिक गाने।

मन भारी होता है तो वह अब रोती नहीं रहती है
पहनती है हील्स और सालसा क्लास चल देती है।
आखिरकार अपनी जिंदगी अब वह जीने लगी है
क्योंकि पचास के आसपास की अब वह होने लगी है।

रविवार, 7 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (चौदहवां दिन) कहानी




श्रुति अग्रवाल, प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए ब्लॉग बनाया और उनके इस सफल प्रयास ने सिद्ध किया कि चाह हो तो कदम उठते ही उठते हैं, और सफलता भी तब कदम बढ़ाती है। चलिए, उनके इस हौसले के साथ हम भी अपना रिश्ता बनायें और उनको पढ़ें -


अकल्पित   


आने को तो वह गाँव आ गये थे, पर मन बिल्कुल झल्लाया हुआ था। अक्सर वो इस बात का लेखा जोखा करते रहे हैं कि माँ बाप का विरोध करके, जवानी में, ये पढ़ी लिखी पत्नी लाने का निर्णय कर के उन्होंने सही किया था या गलत ... कि अगर अनपढ़ रही होती तो उनकी हर बात को आज्ञा की तरह मानती, थोड़ा साड़ी गहना पा के खुश हो जाती न कि इस तरह, अजनबी सी ठंडी आवाज में फोन करके गाँव आने का दबाव बनाती और उनको अपना इतना व्यस्त कार्यक्रम, यहाँ तक कि दिल्ली जाकर पी एम तक से मिलने का पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम छोड़कर यहाँ आना पड़ता।

घर पँहुचे तो थोड़ा आश्चर्य सा हुआ कि न तो हमेशा की तरह पत्नी अनीता ठसके के साथ सजी धजी, बाहर आकर स्वागत करती हुई मिलीं, न वहाँ उनके आते ही व्यस्त होकर भाग दौड़ करने के लिये घर के नौकर चाकर ही दिखाई दे रहे थे। फिर कमरे में पँहुचे तो लगा जैसे फिज़ा में मरघट सी खामोशी और मुर्दनी छाई हुई हो। अनीता की उड़ी-उड़ी सी रंगत, सूजी आँखें और बिखरे बालों के देख कर वो जरा चिंतातुर से हो उठे।
" क्या बात है, तबियत खराब है? तो हमें यहाँ काहे बुलाया? अाप ही राजधानी आ जातीं, किसी अच्छे डाक्टर से मिला देते!"
एक जोड़ा सूनी सूनी सी निगाहें उनके चेहरे पर आकर टिक गई थीं ... "टी वी देखे हैं दो दिन से?"
फिर झल्ला गये वो, यही पूछने को विधान सभा के चलते सत्र को छुड़वा के इतनी दूर बुला लिया है? इतना नुक्सान सह कर आना पड़ा है उनको!
"दो दिन से टी वी पर गाँव की जिस चौदह साल की बच्ची के बलात्कार की न्यूज चल रही है, जानते हैं कौन है वो? अपने रमेसर की छोटी बिटिया है।"
अरे .... अब याद आया। सचमुच इधर इतने व्यस्त रह गये थे वो कि इसपर ध्यान ही नहीं गया उनका। तब तो ये अच्छा ही हुआ कि इस समय में  वो यहाँ आ गये हैं जब पूरा गाँव  मीडिया वालों से ठसाठस भरा होगा ... इसका तो जबरदस्त फायदा उठाया जा सकता है। इतने-इतने जरूरी कार्यक्रम छोड़ कर गाँव की एक  बच्ची के उद्धार के लिये वो यहाँ दौड़े आए हैं ... इस एक दौरे से सिर्फ़ उनका ही क्या , उनकी पूरी पार्टी का बहुत सारा कलंक धोया जा सकता है ! इसे कहते हैं 'ब्लेसिंग इन डिसगाइस! '.... मन एक्दम से हल्का हो गया और हल्की सी स्मित भी होंठों पर आ सजी। मगर अनिता मानों अपनी ही धुन में हों....
"आपको अंदाज़ है कि ऊ चार लड़के कौन थे?"
उनके जवाब का इन्तजार किये बिना खुद ही बोलने लगीं, "वे लोग आपका मनोहर और उसके दोस्त यार थे!"
सत्य इतना कटु था कि बोलते हुए अनिता की आँखें बेसाख्ता बरसने लगी थीं।"
"पागल हो गई हो? बच्चा है वो तो! ई सब करने की कोई उमर हुई है अभी?"
वो बहुत जोर से चौंके थे पर अनिता किसी भी तर्क से दुविधा ग्रस्त होने को तैयार नहीं थीं।
"काश कि वो बच्चा ही होता! जब से गाँव वापस आया है, अपने आप को सबका मालिक समझ रहा है। खाली नई नई गाड़ी, आवारागर्दी और दोस्ती यारी चल रही है। दारू और पिस्तौल बंदूक भी हो पास में,  तो हमको क्या पता? उसका मोबाइल खोल के देखे हैं हम एक दिन, खाली नंगई से भरा हुआ है। हमको याद पड़ता है कि रमेसर की बिटिया की फोटो भी थी उसमें! आपकी शह पर कूदता रहता है, हमारी कोई सुनवाई नहीं है, फालतू रिरियाते रहते हैं! और घटना वाले दिन से तो बिल्कुल गायब है, घर में लौटा ही नहीं है।"
इसबार अनिता की बात को काट नहीं सके वह।

ये क्या हो गया ! वो भी इतने गलत समय पर? अपोजीशन ने सूँघ भी लिया तो मुसीबत हो जायगी! दिन भर घर में बैठे बैठे करती क्या रहती हैं ई औरत लोग, कि एक बच्चा तक नहीं सँभालता इनसे, पर मुँह से कुछ कह दो तो महाभारत खड़ा कर देंगीं।
"आपलोग को तो हर समय बस हरा हरा सूझता है न, हमको कैसी कैसी मुसीबत से जूझना पड़ता है , जानता है कोई? लोग जैसे घात लगा के बैठे हुए हैं। एक मौका मिला नहीं कि दो मिनट नहीं लगेगा, सब सुख आराम खतम होने में! अब देखती रहियेगा, क्या नहीं करना पड़ेगा खबर को बाहर जाने से रोकने के लिये! किसको किसको मालूम है ये सब? कहीं कोई पुलिस दरोगा घर पर तो नहीं आया था? किसकी ड्यूटी है आजकल यहाँ?"
"क्या करने वाले हैं अब आप?"
" देखिये रमेसर कितना बड़ा मुँह खोलता है चुप रहने के लिये! लड़की को गाँव से हटाना पड़ेगा!"
"क्यों करियेगा ये सब? कि मनोहर निश्चिंत होकर एक और लड़की को निशाना बनाने निकल पड़े?"
यही है.... यही सब वजह है कि उनका मन झल्ला उठता है! ऐसी भी क्या पढ़ाई लिखाई कि वक्त की नाजुकता तक समझ में न आए?
"तो आप ही बताइये क्या करें? जेल में डलवा दें उसको कि फाँसी पर चढा दें? और हम? रिजाइन करके घर पर बैठ जाएँ?"
अनिता की जलती हुई आँखों के कटोरे खौलते हुए आँसुओं से भर गए थे कि याद आने लगा था उन सात वर्षों का संघर्ष .... डाक्टर पीर ओझा, मंदिर मस्जिद की दौड़ .... आसानी से नहीं मिला था ये लड़का .... ईश्वर से छीनकर लाई थीं इसे ! तो क्या पाल पोस कर एक दिन फाँसी पर चढा देने के लिये माँगा था इसको?
पर अब मन पर पत्थर रखना जरूरी हो गया था।
" ठीक है, पर वो लड़की? उसका क्या करें? ब्याह करा दें मनोहर से?"
"दिमाग खराब हो गया है? एक तो नीच जात की लड़की, तिसपर से पता नहीं कौन कौन भोग चुका है उसदिन! घर में लाने लायक है? मनोहर के लायक बची है? कहा न रमेसर को भरपूर पैसा दे देंगें।"
पहले तो चुप रह गई थीं अनीता, पर कुछ था जो खौल रहा था मन में , सो बोलना ही पड़ा ...
"हमको पता है, हम आप लोगों को किसी चीज से रोक नहीं पाएँगे। बहुत कमजोर हैं ... न कोर्ट कचहरी की हिम्मत है, न अपने पेट के जाए को जलील होते देखने की! जो मन हो करिये, हम रास्ते में नहीं आएँगे अब! पर खुद तो प्रायश्चित कर सकते हैं न इसका! मनोहर को भगवान के कहर से बचाने के लिये करना ही पड़ेगा ... रमेसर से बात कर लिये हैं, ई बिटिया को हम गोद ले रहे हैं। एक छोटा सा मकान भी देखा है। अब बहू कहिये या बेटी, आज से हमारा सब कुछ वही होगी। पढाएँगे लिखाएँगें, जीने की हिम्मत देगें और रोज उसके साथ हुई ज्यादती की माफी माँगेंगे उससे। बाबूजी वाले पैसे का जो ब्याज आता है, उसी से काम चल जायगा हमारा! नहीं चाहिये हमको वो राजपाट जो हमारे बेटा को फाँसी के तख्ते पर ले जाय!"

दुःख और विरक्ति भरी ठंडी आवाज थी पर चेहरा निर्णय की दीप्ति से चमक रहा था। और मंत्री जी अवाक् से पत्नी का मुँह देखे जा रहे थे।

शनिवार, 6 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (तेरहवां दिन) कहानी




पूजा अनिल एक मीठी आवाज़, एहसासों की गहरी नदी, शब्दों की बूँद बूँद सागर तक अपना ठिकाना ढूंढती हैं  ... जी हाँ, पाठक ही तो सागर हैं। 
आज यह कहानी प्रवाहित होकर आप तक आई है, सुकून मिलेगा -




-चाय पियोगी?
आयशा हैरान कि यह कौन पूछ रहा!
-???- उसने प्रश्न चिन्ह भेज दिए.
-सॉरी. गलती से आ गया सन्देश आपके पास.
:) - उसने स्माइली भेज दी और फिर अपनी सखी संग गप्पों में व्यस्त हो गई. एक विचार उसके जेहन में बिना ठहरे आगे बढ़ गया कि रोंग फोन काल्स की तरह फेसबुक पर भी रोंग chat काल्स चले आते हैं लोगों से!! इस बीच चाय का नाम सुनकर उसे भी चाय की तलब हो आई. तभी और एक विचार चला आया उसके पास, “जिस तरह टी वी पर पब्लिसिटी से इच्छाएं जगाई जाती हैं, उसी तरह यहाँ एफ बी पर बिना इजाज़त संवेदनाओं को उकेरा जाता है.” उसने स्क्रीन पर समय देखा, शाम के साढ़े चार बजे हैं. चाय पी ही ली जाए, सोच कर उठ आई वो.

-चाय पियोगी?
वही समय! वही बंदा! वही सवाल! आयशा ने सोच लिया कि यह गलती नहीं, शरारत है.
-दो कप भिजवा दो, पतिदेव भी पीयेंगे! तमक कर कहा उसने.
“.................” कोई जवाब नहीं आया.
फेसबुक पर उसकी फ्रेंड लिस्ट में था सोमेश नाथ.  उसने लिस्ट चेक की तो परिचितों के अलावा जाने कितने अपरिचित लोग अपनी सम्पूर्ण, अपूर्ण और अर्ध पूर्ण जन्म कुंडली के साथ उसके फ्रेंड पेज की शोभा बढ़ा रहे थे. उन्ही में से एक थे यह जनाब. बड़ा ही निरर्थक विचार आया तब उसके दिमाग में, “परिवार और अपने दोस्तों के लिए इस सोशल साईट पर आई थी मैं और अब जाने कितने तो  अनजान अपरिचित लोगों को मित्र बना रखा है यहाँ! जिनमे से कईयों के तो नाम भी नहीं मालूम! क्यों इन अपरिचित लोगों को अपने किले में सेंध लगाने दे रही हूँ?” खोखला विचार साबित हुआ यह और तत्काल नया विचार अपनी जगह बनाने में सफल हुआ. “इन्ही अपरिचित मित्रों में से कुछ बहुत अच्छे और साथ देने वाले मित्र मिले हैं और कुछ तो खूब हौसला अफजाई करते हैं. फिर भी यह बात तो सत्य है कि कई लोग फ्रेंड पेज पर नाम मात्र के लिए हैं. सबसे पहचान और बात कभी हुई ही नहीं और संभवतः होगी भी नहीं!”

इतने विचारों के बीच आयशा सोमेश नाथ की प्रोफाइल तक पहुँच चुकी थी. हिस्टरी के साथ इलेक्ट्रोनिक इंजीनियरिंग का कॉम्बो था यह बंदा. पहली जनवरी को जन्म दिन और अपने बारे में फ़रमाया था :-
“ना समझ यूँ ही गुज़रता राही मुझे,
रोशन हुआ करती है दुनिया मेरे नाम से.”

कुछ प्रोफाइल पिक्चर्स थे उसके स्वयं के, संजीदा किन्तु शरारती नौजवान दिखा इन चित्रों में वह. कुछ प्रकृति के चित्र लगा रखे थे उसने, कुछ दोस्तों के साथ.
कुछ खास प्रभावित नहीं किया आयशा को इस प्रोफाइल ने. उसने याद करने की कोशिश की पर नहीं याद आया कि कब उसने यह मित्रता स्वीकार की थी! उसने नज़रें हटा लीं कि होगा कोई बंदा, भूले भटके टकरा गया होगा एफ बी पर. एक ही बात थी जो आयशा के गले बिलकुल नहीं उतर रही थी, वो यह कि अजमेर का रहने वाला था सोमेश!! ऐसे ऊटपटांग बंदे सहन नहीं होते थे आयशा को उसके अपने ही शहर में. फिर एक विचार आया उसे, कि ऐसे चम्पू यहीं क्यों भरे पड़े हैं? मेरे शहर को बदनाम किये हुए हैं! हुंह...!!

तभी फिर से पिंग हुआ. दो कप चाय की तस्वीर के साथ एक मुस्कान भी आई.
फिर एक मेसेज – “आप दोनों के लिए चाय.” J
आयशा जाने के लिए सोच रही थी, फिर रुक गई.
-थेंक यू. उसने लिखा.
- J जवाब में फिर एक मुस्कान आई.

 कुछ ही दिनों में बातों का सिलसिला चल पड़ा आयशा और सोमेश के बीच.  बातों ही बातों में एक दिन दोनों कॉफी के लिए सी सी डी चले आये. सिने मॉल में एक दूसरे को आमने सामने पहली बार मिले दोनों. मध्यम कद काठी की सांवली  सुन्दर आयशा ने जब कद्दावर सोमेश को देखा तो बहुत पहले उसके बारे में सोचा हुआ चम्पू वाला ख़याल रद्द कर दिया आज. सोमेश तस्वीरों में ही शरारती नहीं दीखता था, स्वभाव से भी खूब शरारती था. वहाँ टेबल पर जैसे ही आयशा ने मोबाइल रखा, नज़र छुपा कर सोमेश ने उस पर कब्ज़ा कर लिया. कुछ देर बाद जब आयशा को ध्यान आया कि उसका मोबाइल गायब है तो वो परेशान हो उठी. शरारती सोमेश उसकी मदद करता रहा खोजने में, खुद के पास ही उसका मोबाइल छिपाए हुए. जब थक हार कर आयशा जाने लगी तो सोमेश ने खूबसूरत अंदाज में उसका मोबाइल पेश किया कि “लीजिए मैडम ! और ज़रा सावधान रहिये, किसी दिन कोई आपका दिल चुरा ले जाएगा और आप यूँ ही खोजती रह जायेंगीं.”
आयशा थोडा नाराज़ हुई उस से, फिर उसकी मनुहार से मान गई. सोमेश आयेशा को मैडम ही कहता था, वो उस से आठ साल बड़ी थी और बड़े होने का खूब हक भी  जताती उस पर.

गुलमोहर कॉलोनी और सूरज विहार कॉलोनी में बमुश्किल 7-8 मिनट का फासला है. इन दोनों कॉलोनी के बीच बसा हुआ है सिने मॉल. दोनों के मिलने का अड्डा बन गया सिने मॉल और आना सागर का तट. दोस्ती से शुरू हुआ यह मेल मिलाप गुपचुप प्रेम में परिवर्त्तित होता गया. दोनों ही जान ना पाए कब दोनों प्रेम का खेल खेलने लगे! दिल एक ऐसा खिलौना है जो आपके जाने बिना ही आपको उसके साथ खेलने देता है, और जब तक आप यह जान समझ पायें कि आप अपने ही दिल से खेल रहे हैं, तब तक या तो यह खिलौना टूट चुका होता है या फिर टूटने के छोर पर खड़ा होता है.

आयशा की दीवानगी का आलम यह कि वह अपनी सखियों के साथ बिताने वाला पूरा समय सोमेश पर खर्च कर देती. सोमेश अपने दफ्तर से निपट कर सीधे आयशा से मिलने आता, जो अक्सर आना सागर की गोल छतरी के किनारे उसकी प्रतीक्षा करते मिलती.

कई बार किस्मत अजीब खेल खेलती है, ऐसे खेल जो किसी भी व्यक्ति की समझ से परे होते हैं. आयशा के पति की जॉब केरल में थी. बेटा बोर्डिंग में पढ़ रहा था. दोनों ही छुट्टियों में घर आते थे, अकेली आयशा के लिए बस सखियों का ही सहारा था. ऐसे में सोमेश का मिलना जैसे उसे पंख दे गया. उड़ान का सामान दे गया. बंद अलमारी में रखी हुई खुली किताब थी आयशा. कोई भी अलमारी खोल कर इस खुली किताब को पढ़ सकता था. सोमेश को अधिक देर नहीं लगी इस किताब को पढ़ने में. सोमेश अकेला जीव! ना कोई घर ना घरवाले. उसके लिए आयशा सूखे में बारिश की तरह अवतरित हुई! कैसा खेल था यह किस्मत का कि दोनों एक दूसरे की ओर बिना व्यवधान खींचते चले गए! स्पिरिचुअल साइंस कहती है कि इस जीवन में हम उन्ही व्यक्तियों से मिलते हैं, जिनके साथ किसी तरह का लेना देना बकाया होता है. इनमे सबसे अधिक हिस्सा पति पत्नी का होता है, फिर माता पिता, भाई बहन का और फिर प्रेमी प्रेमिकाओं का. क्या यही संयोग इन दोनों के जीवन को बाँध रहा था? कितना हिस्सा रहा होगा इन दोनों का एक दूसरे के जीवन में?

आयशा जितनी बार उस से मिलती, सोमेश की हर मुलाक़ात उसकी यादों में सुरक्षित हो जाती. जाने कब आयशा की आँखों में सोमेश की यादों के घरौंदे बनने लगे थे. छोटे छोटे, प्यारे प्यारे, सुन्दर सतरंगी घरौंदे. वो सोमेश से जुडी हर याद से उन घरौंदों को सजाने लगी. धीरे धीरे इन घरौंदों ने एक कॉलोनी की शक्ल ले ली. और बढते बढते इन से एक यादों का शहर बस गया. सुन्दर, सजीला, अनोखा, चमकदार शहर! कोई भूल से उसकी आँखों में झाँक लेता तो उस से पूछ लेता, “सूरज तुम्हारी आँख में रहता है क्या?” वो हंस कर कहती, “नहीं, मेरी आँखों में तो प्यार और खुशी रहते हैं.” लोग उसे पागल समझ उस पर हँसते और उस से दूर हो जाते. जाने सच में उन्हें पागल लगती वो या शायद डर जाते कि कहीं उनकी खुशी भी आयशा की आँखों में ना समा जाये! वो अपनी पलकें बंद कर लेती कि रोशन इस शहर की चमक किसी को चौंधिया ना दे! फिर भी प्रस्फुटित रौशनी की चमकदार किरणें आँखों के बाहर बिखर ही जातीं और वो उन यादों की किरणों को अनमोल हीरे की तरह संजो कर रखने में जुटी रहती.

देह के झूले पर पति का नाम चिपकाए झूलने वाली आयशा रात भर सो नहीं पाई. साजन पास नहीं, प्रेमी भी दूर, आयशा बेचैन हो उठी उस रात. सोमेश को 2 दिन के लिए शहर से बाहर जाना था, इस बीच एक रात को भी आना था. रात आई! उतनी ही खूबसूरती से आई जैसे नन्हा बच्चा हौले से आकार माँ से लिपट जाए और माँ खुद बच्ची बन पुलक पुलक जाए. हलकी ठंडी हवा के झोंके रात के चाँद  को देखने का बहाना दे रहे थे. पर आयशा इस खूबसूरत रात में याद की गोद में जा दुबकी. यादों के समुन्दर में गहरे डूबकर उसने प्रेमपत्र लिखा आज और भूल गई कि किसके लिए लिखा उसने यह! शायद पति को लिखा! ना, ना, शायद सोमेश को लिखा! ये भी सच  नहीं..उसने एक ही साथ दोनों को लिखा!

                     

“मैं हर उस समय तुमसे बात कर रही होती हूँ जब तुम कहीं नहीं होते और हर जगह होते हो. मेरा मन तुमसे तब भी बतियाता है जब तुम मुझसे सांस भर की दूरी पर होते हो और तब भी जब मीलों दूर बैठे तुम मुझे मन ही मन याद कर रहे होते हो. दूरियों के पलों में तुम्हारी याद को सूंघने के लिये मैं तुम्हारे नाम की हिचकी की प्रतीक्षा करते हुये एक पल भी तुम्हें भुला नहीं पाती. पर यादें, यादों की डोर थामे हिचकी की जगह मुस्कान ले आती हैं. इन यादों और  मुस्कानों के साथ भी तुमसे मेरी बात निरंतर चलती रहती है, बिना कहीं रुके  और निःशब्द.  तब तक, जब तक कि मेरे कान तुम्हारी फुसफुसाहट से सुर्ख हो, लजा कर एक नाज़ुक सा गीत सुनने ना चल पड़ें.

तुम पूछते हो मुझसे ," क्या बात करती रहती हो मुझसे मेरी अनुपस्थिति में?"
मैं कहना कुछ और चाहती हूँ पर कहती कुछ और हूँ -"यह मेरी और यादों के बीच की बात है, तुम्हें बता दिया तो राज़ खुल जायेगा."
तुम मन ही मन थोडा बुझ जाते हो पर हँसते हुए यूँ जताते हो जैसे मेरी हर बात तुम्हारे लिये खास है .

मैं कहना चाहती हूँ  कि मैं तुमसे वो सारी बातें करती हूँ जो हमने तब नहीं की जब हम बात कर रहे थे, आज सुबह, आज दोपहर या आज शाम, वो बातें भी जो हमने नहीं कही थी कल  या परसों या बहुत दिनों तक की गई बातों में. मैं कहना चाहती हूँ कि तुम नहीं जानते पर तुम भी मेरे लिये अनोखे हो, अद्भुत हो, बहुत खास हो.  मैं तुमसे कह नहीं पाती कि जब मैं तुम्हें अप्रत्यक्ष अपने पास अनुभव करती हूँ तब तुम त्वचा बन जाते हो.  तब मैं तुम्हें अपनी त्वचा पर ओढ़ लेती हूँ, जो सरसराती है मेरे पूरे तन पर करती हुई गुदगुदी और मैं मुस्कुराते हुये सिमटती जाती हूँ दो त्वचाओं के बीच, यह जानते हुये कि इस सरसराहट से उपजी गर्मी मेरी देह को पिघला देगी. और जब मैं पूर्ण तौर पर घुल जाउंगी  तब तुम्हारी हथेली पर बचा रह जायेगा एक नाम जो पूर्व की लालिमा से उत्पन्न होकर पश्चिम के धुंधलके में ढल कर विलुप्त हो जायेगा.

सुनो..! कभी बिछड जाएँ तो याद रखना कि जिस तरह मेरा आना तय था, उसी तरह मेरा जाना भी तय है. मैं तुम्हारे भीतर की खोज की तरह आई थी, अब स्वयं को खो कर जा चुकी हूँ. मेरी तिल भर यादें हवाओं की तरह तुम्हारे साथ रहेंगी, यह आयेंगी और जायेंगी. तुम इन्हें देख कर कभी  रो पड़ोगे कभी हंस दोगे. तुम्हारे आंसुओं में झिलमिलाती हुई मैं सदा रहूंगी और तुम्हारी हंसी में छिपी मुस्कान भी मेरी ही होगी.

किसी दिन जब तुम अपने दोनों हाथों में पकड़ लोगे हवा में घुली हुई मीठी महक  तब मैं और तुम फिर बात करेंगे, अनजानी अनकही बातें, मेरी और तुम्हारी बातें, यादों की बातें, अनंत बातें, अनेक बातें, जादुई बातें, किसी धुंधलके में समाप्त ना होने वाली बातें.
बहुत प्रेम.
आयशा.”
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दो दिन बाद आयशा और सोमेश मिले. आयशा बेहद खुश थी. मनचला शरारती सोमेश उस से चिपक जाना चाहता था. आयशा हर तरह जोर लगाकर उस से दूर जाने की कोशिश करती, वो आयशा के और करीब आता. यह आना इतना सरल होता कि आयशा अपनी कठिनाई से दूर जाने के प्रयत्न को स्थगित कर उसकी सरलता को अपना लेती. आयशा का ठहर जाना सोमेश की मंजिल होता और सोमेश का बेवजह आयशा को निहारते रहना आयशा के लिए सोमेश की सबसे मधुर हरकत होता. सोमेश ढलते हुए सूरज के सामने जा खड़ा होता ताकि आयशा पर सूरज ना आये. वो कहता, इस से तुम खो जाती हो, बस तुम्हारी परछाई दिखती है. मैं तुम्हे देखना चाहता हूँ. बार बार देखना चाहता हूँ. जैसे ही सूरज डूबता वो लपक कर आयशा का हाथ पकड़ लेता. पकडे हुए हाथ को चूम कर तसल्ली करता कि आयशा ही है वहाँ, उसकी परछाई नहीं. पेन से उसके हाथ पर अपना नाम लिखता और कहता, अब सुबह तक हाथ ना धोना तुम, आज की रात मैं तुम्हारे साथ सोऊंगा. अपने साथ उसके सोने की बात आयशा के पूरे शरीर को झंकृत कर देती, उसके तन की एक एक कोशिका सोमेश की छुअन की अनुभूति से रोमांचित होती. इस रोमांच को देर तक अपने साथ रखने के लिए वो अपनी आँख बंद कर लेती उसे अपने तन पर फिसलने देती. यह ऐसी अनुभूति होती जो उसे कई कई रातों तक अपना हाथ ना धोने देती. वो जी भर कर इस अनुभूति को जीती. सोमेश उसके जीवन से खुशी चुराकर जीता.

दोनों की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता गया, एक दूसरे की बांहों में उनके अनेकों दिन गुजरते. संवेदनाएं भी उनकी एकाकार होने लगी. आयशा उस से कहती थी, “खुश तुम होते हो, होंठ मेरे मुस्कुराते हैं. दिल तुम्हारा रोता है, आँखें मेरी लाल हो जाती हैं. जब किसी दर्द की पीड़ा से गुजरते हो तुम, तब उस दर्द से मैं कराह उठती हूँ. जब कोई अवसाद तुम्हे अपनी गिरफ्त में लेता है तब मैं अपने रोम रोम में उस तकलीफ को भुगत रही होती हूँ. सिगरेट तुम पीते हो, फेफड़े मेरे काले होते हैं! बोलो, यह कैसा सम्बन्ध है?”
सोमेश उसे कहता, “क्योंकि मेरी हो तुम. हमेशा के लिए मेरी हो तुम.” आयशा उस से लिपट जाती. दोनों खुश हो जाते. संभवतः यही उनकी चरम खुशी थी. संभवतः इस से बड़ी खुशी दोनों ने कभी जानी ही नहीं थी! संभवतः इसी खुशी से उनका जीवन चल रहा था?

     मन का चंचल होना उसके गतिमान होने की निशानी है तो विवेकपूर्ण सोच विचार की भूमि देना भी उसी की बोधगम्यता है. कई बार आयशा सोचने लगती, वो जो कुछ अनुभव कर रही और जो कुछ घट रहा इस समय उसके जीवन में, क्या वह नैतिक है? क्या वह कोई अनैतिक काम कर कर रही है? पर सच तो यह था कि उसे इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं लगता. यह प्रेम इतना स्वाभाविक था कि कब इसने उन दोनों के जीवन में जगह बना ली, कब उन्हें इस प्रेम के रूप में ढाल लिया, कब वह इसकी सौम्यता के रंग में रंग गई, यह सारी बातें जानने बूझने का पल कभी आया ही नहीं. ना कभी प्रेम का इज़हार हुआ था उनके बीच ना ही कभी औपचारिक घोषणा. बस उन्होंने इस प्रेम को अपनी बातों में अनुभव किया और प्रेम अपने आकार को स्वयं पसारता गया, जब तक वे यह जान पाते कि वे इस प्रेम का पोषण कर रहे थे, तब तक प्रेम अपना पूर्ण आकार ले चुका था. जिस पल उसने यह जाना कि उनके बीच प्रेम अपनी जगह बना कर ठोस रूप में उपस्थित है, उसी पल उसके मन में नैतिकता का सवाल भी आया. उस पल में वो अपनी भावनाओं पर हैरान होने से ज्यादा अपने विश्वास को लेकर असमंजस में थी. क्या मैं अपने पति को धोखा दे रही हूँ? क्या सोमेश के प्रति प्रेम सिर्फ भ्रम है? दोनों ही प्रश्नों का जवाब नहीं होने की स्थिति में क्या मैं दो पुरुषों से एक साथ प्रेम कर रही हूँ? वही समय सही समय था जब आयशा इस असमंजस भरे प्रश्न को घूर घूर कर देख रही थी, उसका अवलोकन कर रही थी और हर तरह से इसका जवाब पाने का प्रयत्न कर रही थी. इस छटपटाहट को उसने अपने पूरे वजूद में महसूस किया. तन के एक छोर से दूसरे छोर तक इसका जवाब ना मिलने की पीड़ा अनुभूत की. शरीर में बसे जल की नमी और नखों की शुष्कता से जानना चाहा. हर बार उसे यही प्रत्युत्तर मिला कि पति के लिए उसकी चाहत समुन्दर की गहराई की तरह है, अथाह, अनंत. पर कहीं किसी कोने में सोमेश ने बहुत ही शालीनता से, बहुत ही सभ्य नमूने अपनी जगह बना ली है.

सोमेश अपनी बातों से आयशा के पूरे शरीर को छूता और वो हर घडी अपनी तेज होती साँसों की रफ़्तार में उस प्रेम को अनुभव करती.सारा शरीर इस झंकार को अनुभव करता. मन वहीँ ठहर जाता और प्रेम फुहार में भीगने का सम्पूर्ण आनंद उठाता. उसका भीगना वैसा ही होता जैसे ठन्डे पानी में ठंडी बर्फ को स्थापित कर दिया जाये. कि जल से बनी और जल में समाहित हो गई. कि दो रूप होते हुए भी एक ही समान तत्त्वों की संरचना रखकर किसी एक समय में एक दूसरे में इस तरह एकाकार हो जाना जैसे कभी अलग थे ही नहीं. वो इस मिलन को इतना शाश्वत अनुभव करती कि उसे इस से ज्यादा प्राकृतिक होना असम्भव प्रतीत होता. वो कहती, जो इतना शाश्वत है, वो अनैतिक हो ही नहीं सकता.

हाँ, एक अनिश्चितता अवश्य थी उसके मन में. वो सोमेश को लेकर कभी किसी से कोई बात नहीं कर पाती थी. बहुत कुछ खो देने का डर हावी हो जाता था इस विचार से ही कि दुनिया में उन दोनों के रिश्ते का कोई महत्त्व नहीं है! और सच भी था यह डर. जिस दिन सोमेश शादी करके घर बसा लेगा, इस रिश्ते का कोई अस्त्तित्त्व ही नहीं बचेगा.

इस बार सोमेश को अपने काम से 5 दिन के लिए बाहर जाना पड़ा. इतने दिनों का बिछोह कहाँ झेल पाती आयशा! मन में जाने कैसे कैसे विचार आने लगे उसे! उसे लगा कि सोमेश जान बूझ कर उस से दूर जाने की कोशिश कर रहा था. कि अब वो उसे छोड़ किसी और की तरफ आकृष्ट हो गया है. पांच दिन बाद भी सोमेश की कोई खबर नहीं आई तो आयशा चिंतित हो उठी. उसने सोमेश के ऑफिस में फोन लगाया तो पता लगा कि वो किसी मीटिंग में है, फिलहाल बात नहीं हो पायेगी. पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसे ठगा जा रहा है. कि जैसे सोमेश उसे टाल रहा है. कि उसने जान बूझ कर मीटिंग का बहाना बनाया है.

उसका ऐसा सोचना असत्य नहीं था. जो सिर्फ एक विचार भर था, वही सत्य बन गया था. उसके इस तरह सोचने में संभवतः वह ताकत थी कि जो कुछ उसने विचार किया, उसे सच होना ही था.

दिन गुजरते गए. सोमेश उसके फोन काल्स टालता रहा. फेसबुक पर भी कोई जवाब नहीं. इमेल से भी नाउम्मीदी मिली. उम्मीद और नाउम्मीद के बीच झूलता झूला है जिंदगी. जितना धक्का उम्मीद की तरफ लगता है, उतनी ही गति से नाउम्मीद की तरफ खींचता है. एक पल उसे लगता कि अब सोमेश का कॉल आएगा, अब आएगा. फिर अगले ही पल निराशा में घिरी धारा बन जाती थी वो. धीरे धीरे रेंगती हुई. जिसमे ना ही गति होती और ना चाल, ना ही कहीं जाने की दिशा.

जिसे उसने अपने जीवन में पूरी हैसियत भरी जगह दी हो, जिसे हर परिस्थिति में स्वयं से बढ़कर प्रेम दिया हो, जिसके लिए मन बार बार तड़पा हो, जो इस कदर करीब हुआ हो कि उसकी धडकनों में अपनी आवाज़ सुनाई दी हो, उसे बेवफा मानने को बिलकुल तैयार नहीं थी वह.

उसकी आँखों में बसे घरौंदे धीरे धीरे वीरान हुए जा रहे थे. उनकी रौशनी धीरे धीरे बुझती जा रही थी. अँधेरे बसने लगे थे वहाँ. और हर बार उसके मन के अंधेरों की तरह  सघन हुए जा रहे थे अँधेरे. लोग अब भी उसकी आँखों में झांकते और उस से दूर भाग खड़े होते. उन्हें अँधेरे इतने गहरे तक दीखते कि उसके आंसुओं पर किसी की दृष्टि ही ना जाती. वो फिर अपनी आँखें बंद कर लेती और अपने ही अंधेरों में विलुप्त हो जाती.

उधर सोमेश ने उस से असत्य कहा था कि वो बाहर जा रहा था. सत्य तो यह था कि उसके जीवन में एक नई युवती का प्रवेश हो चुका था. वो उसके साथ समय बिताने लगा था. आयशा सिर्फ उसकी अपूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने का साधन भर थी. नया साधन मिलते ही आयशा को छोड़ने में उसे कोई झिझक नहीं हुई. उसे किसी तरह की कोई परवाह भी ना थी कि उसकी अनुपस्थिति से आयशा परेशान हुई होगी इसलिए उसने आयशा को सही स्थिति बताने का प्रयत्न ही नहीं किया था.

एक दिन उम्मीदों के रथ पर सवार आयशा ने पुनः सोमेश को फोन किया. इस बार उसने फोन उठाया. आयशा को अनंत खुशी हुई. नाउम्मीद का झूला कुछ कुछ उम्मीद की और झूल गया. उसने सारे अवसाद को पीछे छोड़ बहुत उत्साह से सोमेश से पिछले कई दिनों तक बात ना करने का कारण पूछा. सोमेश ने बहुत ही बेमन से उसे टाल दिया कि “वो व्यस्त रहा था, समय नहीं निकाल पाया बात करने का.” आयशा ने अब उम्मीद के तार को टूटते हुए महसूस किया फिर भी भरपूर प्रेम से भावनाओं में बह उसने जानना चाहा कि इतने दिन उसे आयशा की याद नहीं आई? इस बार सोमेश का जवाब सुनकर उसकी आँखों के बचे खुचे घरौंदे पूरी तरह टूट गए, धूल में मिल गए, ध्वस्त हो गए, जल कर राख हो गये.

आयशा के कानों में सिर्फ सोमेश के शब्द ठहर गये, “आप मुझसे बड़ी हैं, मुझसे इस तरह की बातें करना आपको शोभा नहीं देता. आप ज़रा सोच समझ कर और अपनी उम्र के लिहाज से बात कीजिये.”
भरपूर संजीदगी से कहे गये इस तमाचेनुमा अक्षरक्ष सत्य ताने ने मन के भीतरी तहों में सुलगती हल्की चन्दन सी आग को प्रचंड ज्वाला बना दिया. इस अग्नि में सोमेश के नाम के सारे घरौंदे जल गये. तब आयशा की आँखों में इतनी राख थी कि वो स्वयं के मन को ही ना टटोल पाई, मन के भीतर कुछ दिखा भी नहीं उसे.


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