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बुधवार, 23 जनवरी 2019

122वीं जयंती - नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
सुभाष चंद्र बोस (अंग्रेज़ी: Subhash Chandra Bose, जन्म - 23 जनवरी, 1897 ई., कटक, उड़ीसा; मृत्यु (विवादित) - 18 अगस्त, 1945 ई., जापान) के अतिरिक्त भारत के इतिहास में ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ, जो एक साथ महान् सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाड़ी और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरुषों, नेताओं के समकक्ष साधिकार बैठकर कूटनीति तथा चर्चा करने वाला हो। भारत की स्वतंत्रता के लिए सुभाष चंद्र बोस ने क़रीब-क़रीब पूरे यूरोप में अलख जगाया। बोस प्रकृति से साधु, ईश्वर भक्त तथा तन एवं मन से देशभक्त थे। महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह को 'नेपोलियन की पेरिस यात्रा' की संज्ञा देने वाले सुभाष चंद्र बोस का एक ऐसा व्यक्तित्व था, जिसका मार्ग कभी भी स्वार्थों ने नहीं रोका। जिसके पाँव लक्ष्य से कभी पीछे नहीं हटे, जिसने जो भी स्वप्न देखे, उन्हें साधा। नेताजी में सच्चाई के सामने खड़े होने की अद्भुत क्षमता थी।

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, सन 1897 ई. में उड़ीसा के कटक नामक स्थान पर हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी शक्तियों के विरुद्ध 'आज़ाद हिंद फ़ौज' का नेतृत्व करने वाले बोस एक भारतीय क्रांतिकारी थे, जिनको ससम्मान 'नेताजी' भी कहते हैं। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। पहले वे सरकारी वक़ील थे, लेकिन बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधान सभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें 'रायबहादुर का ख़िताब' दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र बोस उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थे। सुभाष उन्हें 'मेजदा' कहते थे। शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था।

भारतीयों के साथ अल्पावस्था में अंग्रेज़ों का व्यवहार देखकर सुभाष चंद्र बोस ने अपने भाई से पूछा- "दादा कक्षा में आगे की सीटों पर हमें क्यों बैठने नहीं दिया जाता है?" बोस जो भी करते, आत्मविश्वास से करते थे। अंग्रेज़ अध्यापक बोस जी के अंक देखकर हैरान रह जाते थे। बोस जी के कक्षा में सबसे अधिक अंक लाने पर भी जब छात्रवृत्ति अंग्रेज़ बालक को मिली तो वह उखड़ गए। बोस ने मिशनरी स्कूल को छोड़ दिया। उसी समय अरविन्द ने बोस जी से कहा- "हम में से प्रत्येक भारतीय को डायनमो बनना चाहिए, जिससे कि हममें से यदि एक भी खड़ा हो जाए तो हमारे आस-पास हज़ारों व्यक्ति प्रकाशवान हो जाएँ। अरविन्द के शब्द बोस के मस्तिष्क में गूँजते थे। सुभाष सोचते- 'हम अनुगमन किसका करें?' भारतीय जब चुपचाप कष्ट सहते तो वे सोचते- 'धन्य हैं ये वीर प्रसूत। ऐसे लोगों से क्या आशा की जा सकती है?'

एक संपन्न व प्रतिष्ठित बंगाली वक़ील के पुत्र सुभाष चंद्र बोस की शिक्षा कलकत्ता के 'प्रेज़िडेंसी कॉलेज'[1]और 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' से हुई, और उसके बाद 'भारतीय प्रशासनिक सेवा' (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के 'कॅम्ब्रिज विश्वविद्यालय' भेज दिया। सन 1920 ई. में बोस ने 'इंडियन सिविल सर्विस' की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन अप्रैल सन 1921 ई. में भारत में बढ़ती राजनीतिक सरगर्मी की ख़बर सुनकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। अपने पूरे कार्यकाल में, ख़ासकर प्रारंभिक चरण में, बोस को अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस (1889-1950 ई.) का भरपूर समर्थन मिला, जो कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के एक धनाढ्य वक़ील होने के साथ-साथ प्रमुख कांग्रेसी राजनीतिज्ञ भी थे।

आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज के सदस्य
सुभाष चंद्र बोस ने पाँच वर्ष की आयु में अंग्रेज़ी का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया था। युवावस्था इन्हें राष्ट्रसेवा में खींच लाई। गाँधी जी से मतभेद होने के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गए और ब्रिटिश जेल से भागकर जापान पहुँच गए। बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू कर दिया।

'नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था।

क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा-इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे।

और जापानी सैनिकों के साथ उनकी तथाकथित आज़ाद हिंद फ़ौज रंगून (अब यांगून) से होती हुई थल मार्ग से भारत की ओर बढ़ती, 18 मार्च सन् 1944 ई. की कोहिमा और इम्फ़ाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुँच गई। जापानी वायुसेना से सहायता न मिलने के कारण एक भीषण लड़ाई में भारतीयों और जापानियों की मिली-जुली सेना हार गई और उसे पीछे हटना पड़ा। लेकिन आज़ाद हिंद फ़ौज कुछ अर्से तक बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और बाद में हिंद-चीन में अड्डों वाली मुक्तिवाहिनी सेना के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेज़ों से युद्ध किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने के लिए मजबूर किया था। सन् 1943 से 1945 तक 'आज़ाद हिन्द सेना' अंग्रेज़ों से युद्ध करती रही। अन्ततः ब्रिटिश शासन को उन्होंने महसूस करा दिया कि भारत को स्वतंत्रता देनी ही पड़ेगी।

नेताजी बोस का ऐतिहासिक भाषण

रंगून के 'जुबली हॉल' में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया भाषण सदैव के लिए इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, जिसमें उन्होंने कहा था -

"स्वतंत्रता संग्राम के मेरे साथियो! स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल की तरह चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सकें। 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।' खून भी एक दो बूँद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमें में ब्रिटिश साम्राज्य को डूबो दूँ।"

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा"

जब भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था और नेताजी आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए सक्रिय थे। तब आज़ाद हिंद फ़ौज में भरती होने आए सभी युवक-युवतियों को संबोधित करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा- "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।"

'हम अपना खून देने को तैयार हैं', सभा में बैठे हज़ारों लोग हामी भरते हुए प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने उमड़ पड़े। नेताजी ने उन्हें रोकते हुए कहा- "इस प्रतिज्ञा-पत्र पर साधारण स्याही से हस्ताक्षर नहीं करने हैं। वही आगे बढ़े, जिसकी रगों में सच्चा भारतीय खून बहता हो, जिन्हें अपने प्राणों का मोह न हो, और जो आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार हों।"

नेताजी की बात सुनकर सबसे पहले सत्रह भारतीय युवतियाँ आगे आईं और अपनी कमर पर लटकी छुरियाँ निकाल कर, झट से अपनी उंगलियों पर छुरियाँ चलाकर अपने रक्त से प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने लगीं। महिलाओं के लिए 'रानी झांसी रेजिमेंट' का गठन किया गया, जिसकी कैप्टन बनीं लक्ष्मी सहगल।

नेताजी का राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम
युवा सुभाष चन्द्र बोस 
सुभाष बाबू हिन्दी पढ़ लिख सकते थे, बोल सकते थे, पर वह इसमें बराबर हिचकते और कमी महसूस करते थे। वह चाहते थे कि हिन्दी में वह हिन्दी भाषी लोगों की तरह ही सब काम कर सकें। एक दिन उन्होंने अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा- "यदि देश में जनता के साथ राजनीति करनी है, तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है। बंगाल के बाहर मैं जनता में जाऊं तो किस भाषा में बोलूं। इसलिए काँग्रेस का सभापति बनकर मैं हिन्दी खूब अच्छी तरह न जानूं तो काम नहीं चलेगा। मुझे एक मास्टर दीजिए, जो मेरे साथ रहे और मेरा हिन्दी का सारा काम कर दे। इसके साथ ही जब मैं चाहूं और मुझे समय मिले, तब मैं उससे हिन्दी सीखता रहूँ।"

श्री जगदीश नारायण तिवारी को, जो मूक काँग्रेस कर्मी थे और हिन्दी के अच्छे शिक्षक थे, सुभाष बाबू के साथ रखा गया। हरिपुरा काँग्रेस में तथा सभापति के दौरे के समय वह बराबर सुभाष बाबू के साथ रहे। सुभाष बाबू ने बड़ी लगन से हिन्दी सीखी और वह सचमुच बहुत अच्छी हिन्दी लिखने, पढ़ने और बोलने लगे। 'आज़ाद हिंद फ़ौज' का काम और सुभाष बाबू के वक्तव्य प्राय: हिन्दी में होते थे। सुभाष बाबू भविष्यदृष्टा थे, जानते थे कि जिस देश की अपनी राष्ट्रभाषा नहीं होती, वह खड़ा नहीं रह सकता।'

एक रहस्य - नेताजी की मृत्यु
'इंडियन नेशनल आर्मी' के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी रहस्य छाया हुआ है। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में मानी जाती है। समय गुजरने के साथ ही भारत में भी अधिकांश लोग ये मानते है कि नेताजी की मौत ताईपे में विमान हादसे में हुई। इसके अलावा एक वर्ग ऐसा भी है, जो विमान हादसे की बात को स्वीकार नहीं करता। ताईपे सरकार ने भी कहा था कि 1944 में उसके देश में कोई विमान हादसा नहीं हुआ। माना जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण के कुछ दिन बाद दक्षिण पूर्वी एशिया से भागते हुए एक हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त, 1945 को बोस की मृत्यु हो गई। एक मान्यता यह भी है कि बोस की मौत 1945 में नहीं हुई, वह उसके बाद रूस में नजरबंद थे। उनके गुमशुदा होने और दुर्घटना में मारे जाने के बारे में कई विवाद छिड़े, लेकिन सच कभी सामने नहीं आया। हालांकि एक समाचार चैनल से ख़ास साक्षात्कार में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस ने कहा था कि उन्हें भी इस बात पर पूरा यकीन है कि उनके पिता की मौत दुर्भाग्यपूर्ण विमान हादसे में हो गई। उन्होंने कहा था कि नेताजी की मौत का सबसे बड़ा कारण विमान हादसा ही है। कमोबेश उनकी मौत विमान हादसे की वजह से मानी जाती है। इससे इतर जो बातें हैं महज अटकलबाजी हो सकती हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई। अनिता ने इस इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अगर नेताजी विमान हादसे के बाद कहीं छिपे होते तो उन्होंने अपने परिवार से संपर्क करने की कोशिश की होती और नहीं तो जब देश आजाद हुआ तो वे भारत अवश्य ही वापस लौट आते।[4] अधिकांश लोगों का यही मानना है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया से भागते हुए हवाई दुर्घटना में जल जाने से हुए घावों के कारण ताइवान के एक जापानी अस्पताल में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु पर किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। लोगों को लगा कि किसी दिन वे फिर सामने आ खड़े होंगे। आज इतने वर्षों बाद भी जनमानस उनकी राह देखता है। वे रहस्य थे ना, और रहस्य को भी कभी किसी ने जाना है?

भारत के सर्वकालिक नेता - नेताजी बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, माँ भारती के सच्चे सपूत थे। नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे, जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे, जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी। नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी वाक्‌-‌शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर 'स्वतंत्रता आंदोलन' चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।





आज भारत के महान नेता, आधुनिक भारत के निर्माता और स्वतंत्रता संग्रामी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 122वीं जयंती पर हम सब देश के लिए उनके अतुल्य योगदान का स्मरण करते हुए नेताजी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जय हिन्द। जय भारत



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई - 2300 वीं ब्लॉग बुलेटिन

साल का सुरुआत अभी होबे किया है त आज हमको भी बहुत सा पुराना-नया बात याद आ रहा है. ऊ ब्लॉग का स्वर्न काल थाजब नया नया दाखिल हुये थे. बहुत सा लोग तबतक स्थापित हो चुका था अऊर जिनका लेखन हमको बहुत परभावित करता था. सच पूछिये त जेतना सिर्सस्थ लोग आज भी देखाई देता है उनमें हम सबसे जुनियर हैं. मगर धीरे-धीरे हमरा भी पहचान बनता चला गया अऊर कुछ लोग बिहारी होने के बावजूद भी इज्जत देने लगा. इसका सबसे बड़ा कारन जानते हैं का थाहमरा ईमानदारी.

दरसल ब्लॉग-जगत में बहुत बे-ईमानी चलता था. ऊ जमाना था जब बहुत सा “बड़ा लेखक” लोग भी बिना ब्लॉग पढे हुये कमेण्ट में बहुत अच्छाकमाल का लिखा है आपनेबहुत प्रेरक रचना है... ई सब बात लिख देता था. बहुत सा लोग पिछला कमेण्ट पढकर हेर-फेर करके नया टिप्पणी चेप देता था. असल में ऊ लोग का भी मजबूरी थाकाहे कि उनको एक रोज में सैकड़ों पोस्ट पर कमेण्ट जो करना पड़ता थाताकि उनके पोस्ट पर भी ऊ लोग आकर हाजिरी लगाए. अब एतना पोस्ट पढकर कमेण्ट करने में त हालत खराब हो जाएगाओही से एक झटका में सबको निपटा देते थे.

हमरा खराबी एही था कि हम बहुत कम पोस्ट पढते थेमगर पढला के बाद कमेण्ट करते थे. अ आप लोग को भरोसा दिलाते हैं कि आज भी हम बिना पढे कम से कम टिप्पणी त नहिंये करते हैं. एही हाल हमरा फेसबुक पर भी है. बहुत कम पोस्ट लिखते हैंगिना चुना लोग को पढते हैं अऊर टिप्पणी का ओही स्टैंडर्ड बनाकर चलते हैं.

एही चक्कर में केतेना बार अइसा हुआ कि टिप्पणी में कोई कबिता हम लिख दियेत उसको ओहीं पोस्ट करके हम भुला जाते थे. कभी कभी बाद में खोजने से भी नहीं मिलता था. दरसल हम जेतना अपना कबिता को नेग्लेक्ट किये हैं कि अगर हमरा कबिता हमसे बदला लेना चाहे त हमको सात जन्म तक कबिता से वंचित रख सकता है. मगर हमरा कबिता को भी मालूम है कि हम कबिता के बिना नहीं रह सकते हैं अऊर कबिता हमरे साँस साँस में बसता है.


बस गुअजरा हुआ साल में हम कबिता के साथ एगो परयोग किये. सुबह-सुबह व्हाट्स ऐप्प पर लोग एन्ने-ओन्ने का फॉरवर्ड किया हुआ मेसेज भेजता रहता हैहम कभी उसको फ़ॉरवर्ड नहीं करते हैं. हम अंगरेजी का बहुत सा सूक्ति का हिन्दी में भाव अनुवाद करके अऊर उसको एकेदम अपना बनाकर कबिता के रूप में ढाल दिये. फिर उसको अपने पसंद का संदेस से मिलता जुलता फोटो (अऊर कभी कभी अपना फ़ोटो) के साथ अपना करीबी लोग को भेजना सुरू कर दिये. हमरा भी सर्त एही था कि उसको कभी भी फेसबुक पर सेयर नहीं किये. कुछ चाहने वाले लोग शेयर कर दिये त हमको कोनो आपत्ति भी नहीं हुआ.

बस एही सिलसिला अभी तक चल रहा है. इसी बहाने हम अपने अंदर लुकाया हुआ कबि को बाहर निकालने का कोसिस भी किये अऊर कबिता के प्रति जो हमरा करजा था ऊ हो धीरे धीरे चुका दिये. आज लगभग 200 कबिता हम लिख चुके हैं अऊर आप लोग के आसीर्बाद से अभी भी चल रहा है. कबिता अच्छा है या बुरा है मालूम नहींलेकिन बहुत से परसिद्ध लोग से अच्छा कबिता है ई बात त हम अपना खुद का आलोचक होने के नाते भी कह सकते हैं.

कभी मौका मिला त अगिला बार हम अपना कबिता के साथ ब्लॉग-बुलेटिन पेस करेंगे. फिलहाल त देखते देखते 2300 वाँ बुलेटिन आपके सामने आ गया. बधाई आप सब लोगों कोकाहे कि बहुत मोस्किल से हमलोग ई बुलेटिन को आगे बढा पा रहे हैं. सबके साथ बेक्तिगत समस्या हैमगर ऊ का कहते हैं कि आदत हो त छूटियो जाता हैलत कहाँ छूटता है- छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई!
                                                          - सलिल वर्मा 
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गीत नया मत लिखना तब तक

शिकारी माता और कमरुनाग यात्रा- हिमाचल

नये साल में क्या बदलेगा

हे कृष्ण

♥♥♥♥♥अपने औचित्य... ♥♥♥♥♥♥

इस दिन का नेग

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी १: ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हट के जरा बच के ये है बम्बे मॅरेथॉन!!

अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह जी की १२७ वीं जयंती

एलोवेरा का जूस

दीदी के भाई जी

खंडहर-सी जिंदगी

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सोमवार, 21 जनवरी 2019

74वीं पुण्यतिथि - महान क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता संग्रामी रासबिहारी बोस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स सादर नमस्कार।
महान क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता संग्रामी रासबिहारी बोस
रासबिहारी बोस (अंग्रेज़ी: Rash Bihari Bose, जन्म: 25 मई, 1886; मृत्यु: 21 जनवरी, 1945) प्रख्यात वकील और शिक्षाविद थे। रास बिहारी बोस प्रख्यात क्रांतिकारी तो थे ही, सर्वप्रथम आज़ाद हिन्द फ़ौज के निर्माता भी थे। देश के जिन क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता-प्राप्ति तथा स्वतंत्र सरकार का संघटन करने के लिए प्रयत्न किया, उनमें श्री रासबिहारी बोस का नाम प्रमुख है। रास बिहारी बोस कांग्रेस के उदारवादी दल से सम्बद्ध थे। रास बिहारी बोस ने उग्रवादियों को घातक, जनोत्तेजक तथा अनुत्तरदायी आंदोलनकारी कहा। रासबिहारी बोस उन लोगों में से थे जो देश से बाहर जाकर विदेशी राष्ट्रों की सहायता से अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण तैयार कर भारत की मुक्ति का रास्ता निकालने की सोचते रहते थे। 1937 में उन्होंने 'भारतीय स्वातंय संघ' की स्थापना की और सभी भारतीयों का आह्वान किया तथा भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।


आज भारत के महान क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता संग्राम नेता रासबिहारी बोस जी की 74वीं पुण्यतिथि पर हम सब उनको शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~


आपदा में देवदूत सरीखे जवान





आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए नमस्कार। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 20 जनवरी 2019

भारत के 'जेम्स बॉन्ड' को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज २० जनवरी है ... आज ही के दिन सन १९४५ में भारत के वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित कुमार डोभाल जी का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में एक गढ़वाली परिवार में हुआ था।

अजीत कुमार डोभाल सेवानिवृत्त आई.पी.एस. एवं भारत के वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। वे 30 मई, 2014 से इस पद पर हैं। डोभाल भारत के पांचवें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। वे भारत के ऐसे एकमात्र नागरिक हैं जिन्हें शांतिकाल में दिया जाने वाले दूसरे सबसे बड़े पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया है। 

आइये जानते हैं डोभाल के बारे में रोचक तथ्य
  • भारतीय सेना के एक महत्वपूर्ण ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के दौरान उन्होंने एक गुप्तचर की भूमिका निभाई और भारतीय सुरक्षा बलों के लिए महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई जिसकी मदद से सैन्य ऑपरेशन सफल हो सका। इस दौरान उनकी भूमिका एक ऐसे पाकिस्तानी जासूस की थी, जिसने खालिस्तानियों का विश्वास जीत लिया था और उनकी तैयारियों की जानकारी मुहैया करवाई थी।
  • जब 1999 में इंडियन एयरलाइंस की उड़ान आईसी-814 को काठमांडू से हाईजैक कर लिया गया था तब उन्हें भारत की ओर से मुख्य वार्ताकार बनाया गया था। बाद में, इस फ्लाइट को कंधार ले जाया गया था और यात्रियों को बंधक बना लिया गया था।
  • कश्मीर में भी उन्होंने उल्लेखनीय काम किया था और उग्रवादी संगठनों में घुसपैठ कर ली थी। उन्होंने उग्रवादियों को ही शांतिरक्षक बनाकर उग्रवाद की धारा को मोड़ दिया था। उन्होंने एक प्रमुख भारत-विरोधी उग्रवादी कूका पारे को अपना सबसे बड़ा भेदिया बना लिया था।
  • अस्सी के दशक में वे उत्तर पूर्व में भी सक्रिय रहे। उस समय ललडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट ने हिंसा और अशांति फैला रखी थी, लेकिन तब डोभाल ने ललडेंगा के सात में छह कमांडरों का विश्वास जीत लिया था और इसका नतीजा यह हुआ था कि ललडेंगा को मजबूरी में भारत सरकार के साथ शांतिविराम का विकल्प अपनाना पड़ा था।
  • डोभाल ने वर्ष 1991 में खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट द्वारा अपहरण किए गए रोमानियाई राजनयिक लिविउ राडू को बचाने की सफल योजना बनाई थी।
  • डाभोल ने पूर्वोत्तर भारत में सेना पर हुए हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक की योजना बनाई और भारतीय सेना ने सीमा पार म्यांमार में कार्रवाई कर उग्रवादियों को मार गिराया। भारतीय सेना ने म्यांमार की सेना और एनएससीएन खाप्लांग गुट के बागियों सहयोग से ऑपरेशन चलाया, जिसमें करीब 30 उग्रवादी मारे गए हैं।
  • डोभाल ने पाकिस्तान और ब्रिटेन में राजनयिक जिम्मेदारियां भी संभालीं और फिर करीब एक दशक तक खुफिया ब्यूरो की ऑपरेशन शाखा का लीड किया।
  • डोभाल ने इंदिरा गांधी के साथ भी काम किया। अटल बिहारी वाजपेयी के भी संकटमोचक बने और वर्तमान में नरेंद्र मोदी के भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के सबसे बड़े योद्धा बने हैं।

७४ वीं वर्षगांठ के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से श्री अजीत कुमार डोभाल जी को हार्दिक शुभकामनाएं |

सादर आपका

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इंसान में इंसानियत ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

ठीक हो न जाएँ

लोकतंत्र खतरे में ......भौतई खतरे में ...

जी डी एस मीट : सेंट्रल पार्क 6 जनवरी 2019

३४२. रेलगाड़ी

बैक-बेंचर - पल्लवी त्रिवेदी

601. फ़रिश्ता (क्षणिका)

गुलाबी इश्क के पन्ने

पुस्तक प्रकाशन: लेखक और प्रकाशक का द्वंद्व

उल्टा स्वस्तिक भी शुभ की कामना से...अजब गजब मान्यताएं

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत कुमार डोभाल की ७४ वीं वर्षगांठ

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

शनिवार, 19 जनवरी 2019

ये बदलते हुए नकाबों का मौसम है



पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में इतना बदलाव तो यकीनन ही आया है कि , अब लोगों को वो राजनीति स्पष्ट दिख रही है और शायद समझ भी आ रही है जिससे कभी आम लोगों का दूर दूर तक यदि वास्ता था तो सिर्फ इतना की वोटिंग वाले दिन एक छुट्टी मिलेगी | अब न सिर्फ मतदाताओं का मतदान के प्रति रुझान बढ़ा है बल्कि खुद सारे राजनीतिक दल भी बखूबी समझने लगे हैं कि आम मतदाता अब न सिर्फ जागरूक हो रहा है बल्कि सही गलत की पहचान भी कर रहा है |  ये वर्ष देश के लिए नई सरकार नए प्रतिनिधि चुनने का समय है , 

इसलिए सजग रहिये और सतर्क रहिये। .....


स्वाभिमान -लघुकथा 

अजब गजब मान्यताएं 

हीन भावना से ग्रस्त हैं हम 

सांची के स्तूप 

जमीन को तरस रहे गुम्बद 

गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय 

गोवा में दो दिन 

संतरा और कीनू 

अब आज्ञा दीजिये। ..खूब पढ़िए और खूब लिखिए 

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

बढ़ती ठंड और विभिन्न स्नान

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

ठण्ड बढ़ रही है। अब स्नान के निम्न प्रकारों को इस्तेमाल किया जा सकता है।

1. कंकडी स्नान: इस स्नान में पानी की बूंदों को अपने ऊपर छिडकते हुए, मुँह धोया जा सकता है।
2. नल नमस्कार स्नान: इस में आप नल को नमस्ते कर लें स्नान माना जायेगा।
3. जल स्मरण स्नान: यह उच्च कोटि का स्नान है, इसको रजाई के अन्दर रहते हुए पानी से नहाने को याद कर लो नहाया हुआ माना जायेगा।
4. स्पर्शानूभूति स्नान: इस स्नान में नहाये हुए व्यक्ति को छूकर 'त्वं स्नानम्, मम् स्नानम्' कहने से स्नान माना जायेगा।

इसके अलावा शीतकाल को देखते हुए आधुनिक स्नान भी हैं, जैसे:

1. Online Bath: कंप्यूटर पर गंगा के संगम की फोटो निकाल कर उस पर 3 बार माउस क्लिक करें और फेसबुक पर उसे Background Photo के रूप में लगाएं।
2. Mirror Bath: दर्पण में अपनी छवि को देखकर एक-एक कर तीन मग पानी शीशे पर फेंकें और हर बार "ओह्हहा" करें।
3. Virtual Bath: सूरज की ओर पीठ कर अपनी छाया पर लोटे से पानी की धार गिराएँ और जोर-जोर से "हर-हर गंगे" चिल्लाएं।

यकीनन ताजगी महसूस होगी।

सादर आपका 
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851-जाड़े की धूप

867 भारत भूमि(माधव मालती छन्द)

ज़िन्दगी

गढवाल केन्द्रीय विश्वविध्यालय के कुछ चित्र 

शिशिर

न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम 

शाम की आग़ोश में आमेर !

शॉल, कोट, स्वेटर और जाड़े की रात ... - डॉ. शरद सिंह

मानवता का कत्ल

व्यंग्य : आँख दिखाना

अम्मा का निजी प्रेम

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!! 

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

प्रत्यक्ष गवाह - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एडमंड बर्क बहुत बड़ा इतिहासकार हुआ करता था । वह विश्व का इतिहास लिख—रहा था। उसने इतिहास लिखने में कोई बीस—बाईस वर्ष खर्च किये थे। और बाईसवें वर्ष यह घटना घटी कि उसके घर के पीछे हत्या हो गयी। वह भागा हुआ पहुंचा—शोरगुल सुना, लाश पड़ी थी, अभी आदमी ठंडा भी नहीं हुआ था, अभी खून गर्म था, हत्यारा पकड़ लिया गया था, उसके हाथ में रंगीन छुरा था खून से लहूलुहान, उसके शरीर पर भी खून के दाग थे, राह पर खून की धार बह रही थी और सैकडों लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। बर्क पूछने लगा लोगों से कि क्या हुआ? एक ने एक बात कही, दूसरे ने दूसरी बात कही, तीसरे ने तीसरी बात कही। जितने मुंह उतनी बातें। और वे सभी चश्मदीद गवाह थे। उन सबने अपनी आख के सामने यह घटना देखी थी।

बर्क बड़ी मुश्किल में पड़ गया। बर्क बड़ी चिंता में पड़ गया। वह घर के भीतर गया और उसने बाईस साल मेहनत करके जो इतिहास लिखा था उसमें आग लगा दी। उसने कहा, मेरे घर के पीछे हत्या हो, आख से देखनेवाले लोगों का समूह हो और एक आदमी दूसरे से राजी न हो कि हुआ क्या, कैसे हुआ, हर एक की अपनी कथा हो—और मैं इतिहास लिखने बैठा हूं सारी दुनिया का! प्रथम से, शुरुआत से! क्या मेरे इतिहास का अर्थ?

हम वही देख लेते हैं जो हम देखना चाहते हैं। उसमें कोई हत्यारे का मित्र था। उसे बात कुछ और दिखायी पड़ी। उसमें कोई जिसकी हत्या की गयी थी उसका मित्र था, उसे कुछ बात और दिखायी पड़ी। जो तटस्थ था, उसे कुछ बात और दिखायी पड़ी। सब प्रत्यक्ष गवाह थे। मगर क्या गवाही दे रहे थे!

ओशो : मेरा स्वर्णिम भारत

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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निद्रालिंगन

जार्ज बर्नार्ड शॉ ने सिखाया है - किताबें भेंट क्यों नहीं करनी चाहिए

लव इन दिसम्बर: साड़ी, कोहरा और उतरता बुखार

जनम- दिन

दही के सैंडविच बनाने की विधि

दोस्त

सहजि सहजि गुन रमैं : संदीप नाईक

रस काव्य

चुटकुले - 1

'द ग्रेटेस्ट' मुहम्मद अली की ७७ वीं जयंती

पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं

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अब आज्ञा दीजिए ...     

जय हिन्द !!!

बुधवार, 16 जनवरी 2019

कुम्भ की पावनता से निखरी ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
प्रयागराज में इस समय कुम्भ की पावनता बिखरी हुई है. कुम्भ पर्व हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुम्भ पर्व स्थल में पावन नदी में स्नान करते हैं. इसके आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुम्भ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है. इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया. सभी देवताओं ने भगवान विष्णु को सारा वृतान्त सुनाया. तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी. 


समुद्र मंथन के पश्चात् निकले अमृत कुंभ को देवताओं का इशारा पाते ही इंद्रपुत्र 'जयंत' अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया. ऐसा देख दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्य अमृत को लेने के लिए जयंत के पीछे पड़ गए. बीच रास्ते में उन्होंने जयंत को पकड़ा. इसके बाद अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक युद्ध होता रहा. युद्ध शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया. इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत हुआ. कहते हैं कि इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों-प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक में कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं. इन्हीं स्थानों पर जहाँ अमृत बूँदें गिरी थी, वहाँ कुम्भ पर्व होता है. 


कुम्भ के इस पावन-पर्व पर हमारे मित्र डॉ० अनुज भदौरिया ‘जालौनवी’ की एक रचना, जो कुम्भ से संदर्भित है. आइये आज की बुलेटिन के साथ-साथ उसका भी आनंद लें.
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दुर्वासा के श्राप से इंद्र हुए कमजोर,
देवों पर छाई घटा विपदा थी घनघोर.
देवताओं की हो गयी असुरों से जब हार,
सब मिल पहुंचे देव-गण विष्णुजी के द्वार.
रो-रोकर कहने लगे जब अपना वृतान्त,
क्षीरसिन्धु-मंथन करो बोले तब श्रीकान्त.
देव-दैत्य मंथन किये, निकला अमिय तुरंत,
तब अमृत के कलश को लेकर गया जयंत.
दैत्यों ने पीछा किया, पकड़ा इंद्र कुमार,
बारह दिन तक फिर हुआ अविरल हाहाकार.
अमिय-बिंदु इस युद्ध में गिरे धरा पर चार,
नासिक में, उज्जैन में, प्रयाग और हरिद्वार.
रूप मोहिनी का किया धारण तब भगवान,
युद्ध शांत को दे दिया सबको अमृत दान.
कुल बाराही कुम्भ है, पर पृथ्वी पर चार,
शेष आठ सुरलोक में देवों के अधिकार.
चन्द्र, सूर्य, गुरु, वर्ष जिस और राशि का योग,
जहाँ गिरा था अमिय-रस, वहीं कुम्भ संयोग.

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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

७१ वें सेना दिवस पर भारतीय सेना को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |



 सैनिक.... आखिर एक सैनिक की क्या पहचान है। देश के लिए मर मिटनें का जज्बा लिए एक वीर सैनिक जब देश पर शहीद होनें निकल पडता है तो फ़िर उस समय न वह देश में फ़ैले भ्रष्टाचार के बारे में सोचता है और न ही किसी राजनीतिक नफ़े नुकसान का आंकलन ही करता है। अब साहब हैरानी तब होती है जब अपनें समाज के ही कुछ "बुद्धिजीवी" अपनी ही सेना पर ही व्यंग्य कस देते है वह भी ऐसा जिसके बारे में सोच कर भी हैरानी होती है । अजी जनाब सेना क्या करती है जानना है तो फ़िर ज़रा समाचार पत्र पर नज़र डालिए...

अगर प्रिंस खड्डे में गिरे तो निकालनें के लिए सेना, मुम्बई में बाढ आ जाए तो सेना, कोई भी आपदा आए तो सेना, अजी अगर नेताओं की सुरक्षा हो तो सेना, अगर कहीं जाना हो तो सेना, अगर आपकी तीर्थ यात्रा हो तो सेना, आपकी ट्रेन फ़ंसे तो सेना और आपके पुल टूटे तो सेना.. जब सरकारी ठेकेदार कामनवेल्थ का ब्रिज गिरा दे तब उसे चौबीस घंटे में खडा करे सेना.. अजी जनाब सेना से आप कुछ भी करा लीजिए आज तक सेना नें मना किया है? तो फ़िर ऐसे में नेताओं की तरह सेना पर बयान बाज़ी से बचिए... ज़िम्मेदारी का परिचय दीजिए और सेना की कद्र कीजिए।
फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा
 

आज १५ जनवरी है ... आज ही दिन सन १९४८ मे फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा ने भारतीय सेना के पहले कमांडर इन चीफ़ के रूप मे कार्यभार संभाला था ... तब से ले कर आज तक हर साल १५ जनवरी को भारतीय सेना अपना सेना दिवस मनाती आई है ! हर साल इस दिन भारतीय सेना का हर एक जवान राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण की कसम को दोहराता है और एक बार फिर मुस्तैदी से तैनात हो जाता है राष्ट्र सेवा के लिए ! इस दिन की शुरुआत दिल्ली के अमर जवान ज्योति पर शहीदों को सलामी दे कर की जाती है ! इस साल भारतीय सेना अपना ७१ वां सेना दिवस मना रही है !
ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से भारतीय सेना को ७१ वें सेना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं| 
सादर आपका
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इस घर को उस घर से निकाल किसी और घर में मिलाने का जल्दी ही कमाल होगा

सतजुगी डकैती (हास्य)

खुशियो की शहनाईयां

कुछ मेरी कलम से यशोदा अग्रवाल पढ़ने का जूनून :)

आई लव यू

आकर्षण और प्रेम...

सिरा सुख दुःख का ...

दोस्त बहुत हैं यहाँ कोई यार नही....!!!

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ में सम्मान/पुरस्कार समारोह 2018

युद्ध और शांति

७१ वां भारतीय सेना दिवस

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!! 


जय हिन्द की सेना !!!

सोमवार, 14 जनवरी 2019

अंग्रेजी के "C" से हुआ सिरदर्द - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


गाँव की नयी नवेली दुल्हन 👰 अपने पति से अंग्रेजी भाषा सीख रही थी, लेकिन अभी तक वो "C" अक्षर पर ही अटकी हुई है।

क्योंकि, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि "C" को कभी "च" तो कभी "क" तो कभी "स" क्यों बोला जाता है❓😒

एक दिन वो अपने पति से बोली, आपको पता है,
"चलचत्ता के चुली भी च्रिचेट खेलते हैं" 🤢

पति ने यह सुनकर उसे प्यार से समझाया,  यहाँ "C" को "च" नहीं "क" बोलेंगे।
इसे ऐसे कहेंगे, "कलकत्ता के कुली भी क्रिकेट खेलते हैं।"

पत्नी पुनः बोली- "वह कुन्नीलाल कोपड़ा तो केयरमैन है न ❓" 🤔

पति उसे फिर से समझाते हुए बोला, "यहाँ"C" को "क" नहीं "च" बोलेंगे।
जैसे, चुन्नी लाल चोपड़ा तो चेयरमैन है न

थोड़ी देर मौन रहने के बाद पत्नी फिर बोली,"आपका चोट, चैप दोनों चाटन का है न ❓" 🤔

पति अब थोड़ा झुंझलाते हुए तेज आवाज में बोला, अरे तुम समझती क्यूं नहीं, यहाँ "C" को "च" नहीं "क" बोलेंगे
ऐसे, आपका कोट, कैप दोनों कॉटन का है न 😒

पत्नी फिर बोली - अच्छा बताओ, "कंडीगढ़ में कंबल किनारे कर्क है ❓ "

अब पति को गुस्सा आ गया और वो बोला, "बेवकुफ,  यहाँ "C" को "क" नहीं "च" बोलेंगे।
जैसे - चंडीगढ़ में चंबल किनारे चर्च है न❓

पत्नी 😕 सहमते हुए धीमे स्वर में बोली," और वो चरंट लगने से चंडक्टर और च्लर्क मर गए क्या ❓" 😕

पति अपना बाल नोचते हुए बोला," अरी मुरख, यहाँ "C" को "च" नहीं "क" कहेंगे...करंट लगने से कंडक्टर और क्लर्क मर गए ❓क्या 😫😫😫

इस पर पत्नी धीमे से बोली," अजी आप गुस्सा क्यों हो रहे हो... इधर टीवी पर देखो-देखो...

"कंटीमिटर का केल और किमेंट कितना मजबूत है"❕

पति अपना पेशेंस खोते हुए जोर से बोला, "अब तुम आगे कुछ और बोलना बंद करो वरना मैं पगला जाऊंगा।"

ये अभी जो तुम बोली यहाँ "C" को "क" नहीं "स" कहेंगे - सेंटीमीटर, सेल और सीमेंट 😒

हाँ जी पत्नी बड़बड़ाते बोली, "इस "C" से मेरा भी सिर दर्द 😰 करने लगा है।

और अब मैं जाकर चेक खाऊंगी, उसके बाद चोक पियूँगी फिर चाफी के साथ चैप्सूल खाकर सोऊंगी तब जाकर चैन आएगा।

उधर जाते-जाते पति भी बड़बड़ाता हुआ बाहर निकला..

तुम केक खाओ, पर मेरा सिर न खाओ..
तुम कोक पियो या कॉफी, पर मेरा खून न पिओ..
तुम कैप्सूल निगलो, पर मेरा चैन न निगलो..😒☹😒😒😒😒😒😒😒😒😒😒😒😒
सादर आपका 

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पत्थरों के शहर में

कैसे ना तारीफ करें

उत्तर प्रदेश में अकेले लड़कर कांग्रेस वोटकटवा बनना चाहती है?

कास पठार... महाराष्ट्र में ‘फूलों की घाटी’

पंचम वेद - भाग एक ----------- mangopeople

जॉप नाउ और बिग बास्केट

बसपा-सपा ने क्यों की कांग्रेस से किनाराकशी?

उसमें कोई छंद नहीं था

मैं लिखूँगी उनका नाम

चिट्ठाकारी और दस साल

जानिए…क्‍या है अघोर संप्रदाय, और कैसे होते हैं अघोरी साधु

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अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!!

रविवार, 13 जनवरी 2019

शुभकामनायें प्रथम अंतरिक्ष यात्री को : ब्लॉग बुलेटिन


सन 1984 को जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूछने पर कि अंतरिक्ष से भारत कैसा लगता है, तब सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा का जवाब देने वाले भारत के पहले अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा आज, 13 जनवरी को सत्तरवीं उड़ान की तरफ अग्रसर हैं. उनका जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था. उन्होंने अपनी सैनिक शिक्षा हैदराबाद में ली थी. पायलट बनने की इच्छा रखने वाले राकेश शर्मा भारतीय वायुसेना द्वारा टेस्ट पायलट भी चुन लिए गए. 20 सितम्बर 1982 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा तत्कालीन सोवियत संघ की अंतरिक्ष एजेंसी इंटरकॉस्मोस के अभियान के लिए चुना गया.


2 अप्रैल 1984 के रूप में वह ऐतिहासिक दिन आया जबकि सोवियत संघ के बैकानूर से सोयूज टी-11 अंतरिक्ष यान ने तीन अंतरिक्ष यात्रियों- राकेश शर्मा, अंतरिक्ष यान के कमांडर वाई०वी० मालिशेव और फ़्लाइट इंजीनियर जी० एम स्ट्रकोलॉफ़- के साथ उड़ान भरी. सोयूज टी-11 ने इन तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को सोवियत रूस के ऑबिटल स्टेशन सेल्यूत-7 में पहुँचा दिया. राकेश शर्मा विश्व के 138वें अंतरिक्ष यात्री बने. उन्होंने सात दिन स्पेस स्टेशन पर बिताए. इन सात दिनों में उन्होंने 33 प्रयोग किए. सेल्यूत-7 में रहते हुए भारत की कई तस्वीरें उतारीं.  

अंतरिक्ष मिशन पूर्ण हो जाने के बाद भारत सरकार ने राकेश शर्मा और उनके दोनों अंतरिक्ष साथियों को अशोक चक्र से सम्मानित किया. इसके साथ-साथ उन्हें हीरो ऑफ़ सोवियत यूनियन सम्मान से भी विभूषित किया गया था. विंग कमाडर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद राकेश शर्मा हिन्दुस्तान एरोनेट्किस लिमिटेड में टेस्ट पायलट के तौर पर कार्य करते रहे. सन 2006 में राकेश शर्मा को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की समिति में सदस्य के रूप में शामिल किया गया.
राकेश शर्मा जी के जन्मदिन पर उनको हार्दिक शुभकामनाएं.

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