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सोमवार, 12 अगस्त 2019

ढाई हज़ारवीं ब्लॉग-बुलेटिन बनाम तीन सौ पैंसठ

सायद एही साल का बात है या लास्ट ईयर का. समय पुस्तक मेला का था, इसलिये साल चाहे जो भी हो, हम तब तक दिल्ली से निकाले नहीं गये थे. पुस्तक मेला का तमाम गहमा-गहमी के बीच मेला घूमना अऊर बहुत सा किताब खरीदना त होबे किया, एगो अलग अनुभब ई हुआ कि ब्लॉग के पुराना समय के दोस्त लोग से मिलना-मिलाना भी हुआ. अऊर हमारे लिये त भतीजा अभिसेक अऊर बेटी झूमा को लेकर घूमने का एगो अलगे मजा है. किताब खरीदने के साथ-साथ उसका समीच्छा भी साथे साथ हो जाता है.

ई सबके साथ एगो बात जो ई पुस्तक मेला का आकर्सन होता है, ऊ होता है अपने दोस्त लोग के किताब का बिमोचन. उसमें भाग लेना, किताब को खरीदकर पढ़ना अऊर उनके साथ अपना नाम भी जुड़ा होने का एगो अलगे आनन्द है. तनी देर के लिये हम भी ऊ लोग के साथ सेलेब्रिटी का स्टैटस पा लेते हैं. बाकी हमको कभी ई बात का मलाल नहीं हुआ कि हमरा कोनो किताब कभी नहीं छपा. बहुत लोग बोला, लेकिन हमरा मुस्कुराने के अलावा कोई जवाब नहीं रहा.

आज अर्चना तिवारी जी से भी एही बात हो रहा था. हम उनको बोले कि हम जेतना अच्छा पाठक हैं, ओतने खराब लेखक हैं, इसलिये किताब लिखने के तरफ कभी ध्यान नहीं गया.  हाँ ई बात अऊर है कि मार्केट में हमसे भी खराब लिखने वाला लोकप्रिय लोग है, इसलिये कभी-कभी हमको भी अपना लिखा अच्छा लगता है.  हम अऊर अर्चना जी एक दूसरा के बात से सहमत थे कि अभी हमलोग को किताब के तरफ से ध्यान हटा लेना चाहिये. 

वैसे भी हम आजकल लघुकथा के तर्ज पर लघु-कबिता लिखने का कोसिस कर रहे हैं. अब काहे कि ई कोसिस है इसलिये  बहुत कम लोग को इसके बारे में पता है. हमारा बुलेटिन का टीम में भी रश्मि दी, वाणी जी अऊर शिवम बाबू को सायद इसका खबर होगा. बाकी त जब तक छप नहीं जाते, तब तक छिपे रहने में भलाई है. ई कबिता लिखने का काम भी हम रोज का एगो कबिता के हिसाब से करते हैं अऊर कमाल का बात है कि मजाक मजाक में साल भर में 365 से जादा हो गया है हमरा ई टाइम पास.  

खैर, ई सब त बात से निकला बात है. असली बात जो हम आप लोग को बताने जा रहे हैं ऊ एही साल का फरवरी का घटना है सायद. एक रोज हम अभिसेक को फोन लगाकर बोले
-      अभिषेक! अब तैयार हो जाओ विमोचन के लिये!
-      किसका विमोचन चचा?
-      विमोचन किताब का होता है, तो किताब का ही होगा न!
-      बताइये कहाँ चलना है और कब... किनके किताब का विमोचन है?
-      अभी तय नहीं हुआ है!
-      मतलब??
-      देखो विमोचन का तारीख पक्का है 14 फरवरी और जगह भी तय है – इण्डिया गेट!
-      ठीक है चचा, लेकिन किनके किताब का विमोचन है, ये तो बताइये!
-      तुम्हारे चचा का किताब अभी फाइनल नहीं हुआ है, जिस दिन हो गया उस दिन इसी डेट और वेन्यु पर तुम्हारे हाथों विमोचन होगा.
-      आप मजाक कर रहे हैं चचा, आपका बर्थ-डे तो 12 फरवरी को होता है, चौदह को तो वैलेंटाइन डे होता है.
-      वही तो. सोचते हैं अपनी कबिता का किताब छपवा ही देते हैं और कीमत होगा पचास रुपया. इण्डिया गेट पर तुम्हारे हाथों विमोचन होगा, क्योंकि मेरी कविताओं को जितनी इज़्ज़त तुमने दी है शायद किसी ने नहीं दी. ऐसे में अनावरण तुम्हारे हाथों होगा और हमलोग इण्डिया गेट पर आये हुये वैलेंटाइन डे के जोड़ों को कहेंगे कि दूसरे दिन सूख जाने वाले गुलाब से अच्छा है कि ये ताज़ी कविता की किताब दो अपने चाहने वाले को जिसकी ख़ुशबू वो ज़िंदगी भर महसूस करेगा/ करेगी.
-      अच्छा आइडिया है चचा!

अभिसेक भी हमरे हाँ में हाँ मिला दिया जइसा ऊ हमरे हर बेसिर पैर के बात के साथ करता है. लेकिन हमरे बात में भी दम था. कुछ समय बाद अनुराग शर्मा जी भी अमेरिका से आए तो मिलने आए और किताब का नाम भी सुझाए – तीन सौ पैंसठ! 

अब कास्मीर से 370 खतम हो गया है,  त हमरा 365 भी आजाद होइये जाएगा. देखिये न 365 केतना छोटा संख्या है उस संख्या के आगे जहाँ तक हमारा ब्लॉग-बुलेटिन पहुँच गया है – अढ़ाई हज़ार यानि पच्चीस सौ! 


जय हो!!!


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शिव मंदिर, जटोली का

डॉ॰ विक्रम साराभाई की १०० वीं जयंती

मिलन

प्रेम और प्रकृति

कश्मीर में फिर महकेगी अमन की फिजा। जगदीश बाली

आज स्यापा या खामोशी?

रोज़ प्रातः बोलते हैं विश्व का कल्याण हो ...

युद्ध तुम्हारा शेष रहेगा समतल जब तक राह न होगी....

बैलेंस्ड-डाइट

पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस 15 से 14 अगस्त क्यों हुआ?

सुषमा स्वराज ----- देश की आम स्त्रियों के लिए प्रेरणादायी व्यक्तित्व

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शनिवार, 22 जून 2019

रहा गर्दिशों में हरदम: २४५० वीं ब्लॉग बुलेटिन

जब आदमी साइंस पढ़ता है त अपने आप को एतना बुद्धिमान समझने लगता है कि उसको बुझाता है जइसे दुनिया का सब सवाल का जवाब उसके पास है. लेकिन ऊ भुला जाता है कि पेड़ के ऊपर चढ़ा हुआ आदमी को दूर से आता हुआ रेलगाड़ी देखाई देता है, मगर पेड़ के नीचे खड़ा आदमी नहीं देख पाता है. इसलिये दुनो आदमी का कहना कि गाड़ी आ रहा है अऊर नहीं आ रहा है, सही है. साइंस का जेतना भी ज्ञात सिद्धांत है उसके हिसाब से कोई बैज्ञानिक सही हो सकता है, मगर सब सिद्धांत उसको ज्ञात है ई बात का सर्त ऊ नहीं लगा सकता.

एतना भूमिका ई बात के लिये  कि जबतक हम ज्योतिस के बारे में नहीं पढ़ाई किये थे तब तक सब बेकार लगता था, मगर जब पढ़े, कुछ प्रैक्टिस किये तब बुझाया कि कमाल का चीज है. साइंस पढ़ने के बावजूद भी भरोसा हो गया. तब जाकर हम सबसे जादा याद किये सेक्सपियर साहब को. काहे कि ज्योतिस के मामला में ऊ हमारे गुरु हैं. उनका नाटक मैकबेथ ज्योतिस के सिद्धांत को ब्याबहारिक रूप से साबित करता है. खैर ऊ कहानी फिर कभी. चलिये ज्योतिस का एगो खास बात हम अपने बारे में बताते हैं अऊर इसमें कोई मिलावट नहीं है, काहे कि इस बात को हमारे अऊर आप लोग में से बहुत से लोग के दोस्त भी सुईकार किये जो ज्योतिस के बहुत बड़े जानकार हैं – पण्डित सिद्धार्थ जोशी जी.

आपके कुण्डली में खराब स्थान होता है अऊर खराब ग्रह होता है, साथ में अच्छा स्थान अऊर अच्छा ग्रह भी होता है. हमारा कुण्डली में भी है, लेकिन आपको ताज्जुब होगा कि जेतना अच्छा ग्रह है, सब खराब स्थान में है अऊर खराब ग्रह अच्छा घर में बइठा हुआ है. नतीजा सारा जिन्नगी में हम फेलियर रहे, हमारा तय किया हुआ कोई काम कभी नहीं हुआ. जो अच्छा हुआ उसके लिये एतना नाक रगड़ना पड़ा कि खुसी का मजा खतम हो गया.

दिल्ली में आकर महसूस हुआ कि चलो अब थोड़ा सा टाइम बचा है, एहीं से सीनियर सिटिजन गति को प्राप्त हो जाएँगे. लिखना पढ़ना साल भर से बंद था, सोचे थे धीरे-धीरे सुरु करेंगे. सुरुआत भी किये अपने ब्लॉग पर अऊर जिस दिन सुरू किये उसी दिन हमारा ग्रह-नछत्तर के पेट में दरद सुरू हो गया. अऊर इससे पहले कि हम नॉर्मल होते, हमरा बदली गुजरात हो गया. पुराना जगह, मगर नया काम. इस बार मानसिक सांति, मगर समय का भीसन कमी. रात को नौ बजे के बाद कभी दस बजे लौटना अऊर थक कर टीवी देखते हुये खाना खाकर सो जाना. कुल मिलाकर नतीजा एही कि हमारा लिखना बंद.

आपलोग कहियेगा कि एक घटना से कोई नियम नहीं बनता कि हमारा कुण्डली खराब है अऊर हमारा ग्रह गोचर गड़बड़ है. लेकिन जाने दीजिये कोई कहा है कि आँसुओं का बिज्ञापन नहीं करना चाहिये, दुनिया में पहिले से बहुत जादा है. एक एक कहानी सुनाने बइठेंगे त लिखने वाला एक एक उपन्यास लिख जाएगा. 

इसलिये आज त बस उत्सव का बात करना है. हमारा ब्लॉग-बुलेटिन का टीम का लोग आप लोग को ब्लॉग-बुलेटिन ब्लॉग-रत्न सम्मान प्रतिजोगिता के बारे में पहिले से बता चुके हैं. इसलिये हम आपसे बिनती करेंगे कि इसमें बढ़चढ़कर भाग लीजिये. ई प्रतिजोगिता का मतलब हार-जीत ईनाम सम्मान नहीं है, बस ब्लॉग का दुनिया में जो भी सकारात्मक और रचनात्मक काम चल रहा है उसको जगाए रखना है. आज आपका आभासी दुनिया से गायब हो जाने पर लोग आपको खोजता है, आपके परिबार के खुसी में जस्न मनाता है, आपके अच्छा स्वास्थ का कामना या आपके दु:ख में साथ मिलकर आँसू बहाता है, ऊ आपके परिबार से बाहर एही ब्लॉग के दुनिया का दोस्त लोग है. 

हमारा टीम का अथक प्रयास अऊर लगन का नतीजा है कि हमलोग आज 2450 वाँ पोस्ट तक पहुँच गये. बिना आप लोग के सहजोग के ई कहाँ सम्भब था. हम भले केतनो ब्यस्त हों, बुलेटिन पर अपना पोस्ट लिखना कभी नहीं भूलते हैं, चाहे केतना भी परेसानी हो.

अब ई बात हमरा सितारा अऊर ग्रह लोग को मत बता दीजियेगा, नहीं त बस समझ लीजिये कि हमरा एहाँ लिखना भी बंद हो जाएगा.


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गाँव का जीवन

हवाई सर्वेक्षण.......

वडोदरा से अहमदाबाद डीएमयू से और जलाराम के पराठे

ज़िंदगी और मौत ....इन्द्रा

हमारी प्राचीन विरासत

माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

आप अच्छे हो - लघुकथा

लोहे का घर-53

पहली गर्भावस्था के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

बरखा

कैसी प्रगति कैसा विकास

गीत : उम्र गुजरती है सपनों की तुरपाई में

चूड़ियाँ भी अपनी हद जानती हैं

प्रधानाध्यापक की गवाही

प्रभा-लेखन

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बुधवार, 13 मार्च 2019

तेरा, तेरह, अंधविश्वास और ब्लॉग-बुलेटिन



आज भले बुधवार का दिन होबाकी तारीख तेरह है. माने लोग एगो भयंकर मोहावरा बनाए हुये है:  फ्राइडे द थर्टींथ! कोई हमसे पूछकर देखे त त फ्राइडे द थर्टींथ से जादा भयंकर अऊर डरावना हमरे बास्ते कोनो मन-डे यानी सोमवार होता है. हमरा सारा कारीबी लोग जानते हैं कि हमको ई जनम में कोनो से डर लगता हैत ऊ सोमवार है. मगर अंधबिस्वास हैत हइये हैउसका कोनो इलाज नहीं.   


जमाना चाहे केतना भी एड्भांस हो जाएअंधबिस्वास खतम नहीं होता है. अऊर अंधबिस्वास भी अजीब-अजीब तरह का पालता है लोग जिसका कोनो सिर पैर नहीं होता है. अब बताइए कि दही खाकर काम करने से ऊ काम सफल होता हैत सफलता में दही का हाथ है कि अदमी के मेहनत का! करिया बिलाई रस्ता काट दे त काम बिगड़ जाता है. अऊर कहीं बिलाइये का एक्सीडेण्ट हो जाए त कौन दोसी. घर से निकलते कोई छींक दिया त काम खराब. अऊर काम अच्छा हो गया तब?

अब केतना गिनाया जाए. जेतना समाजओतना अंधबिस्वास. कहाँ से सुरू हुआअऊर कब से चला आ रहा है ई सबकोई नहीं जानता है. अब देखिए नहम जोन अपार्टमेंट में रहते हैंउसमें फ्लैट नं. 420 का नम्बर मिटा के भाई लोग 421 बना दिया है. अब सोचिए तनम्बर 420 होने से अदमी दू नम्बरी हो जाता है काबाकी मन का भरम का कोनो ईलाज नहीं. 


नम्बर से एगो अऊर बात याद आ गया. होस्पिटल में कभी देखे हैं 13 नम्बर बेड नहीं होता है. अरे भाई तेरह नम्बर का पावर एतना तगड़ा हो गया कि डाक्टर का काबलियत भी हार जाता है! कमाल है!! अब इम्तेहान में रोल नम्बर 13 हो गयात पढाइए छोड़ कर बईठ थोड़े जाता है अदमी. बाबा नानक देव त 13 के नम्बर से समर्पन का दर्सन सिखा गये दुनिया को. 

अब एगो मजेदार बात बताते हैं. सायद बहुत सा लोग को मालूम होगा. बाकी जो लोग नहीं जानता है उनको बताते हैं. चंडीगढ शहर में बहुत सेक्टर हैलेकिन 13 नम्बर सेक्टर नहीं है. इहो अंधबिस्वास का नतीजा है. लेकिन इसमें भी खूब सुंदर अंधबिस्वास छिपा है. जेतना सेक्टर हैउसका नम्बर एतना हिसाब से बइठाया हुआ है कि आप कोनो आमने सामने वाला दूगो सेक्टर का नम्बर जोड़िए त ऊ 13 का गुणक होगा. जैसे 44 सेक्टर का सामने 34 सेक्टरदुनो का जोड़ हुआ 44+34=78 और 78= 13X6. अब एही फार्मूला सब सेक्टर के नम्बर पर लागू होता है. केतना खूबसूरत गणित है...चाहे खूबसूरत अंधबिस्वास. 13 नम्बर सेक्टर नहीं हैमगर सभे सेक्टर के बीच मौजूद है.


मगर आज का तारीख के साथ बहुत सा ऐतिहासिक घटना भी जुड़ा हुआ है. आज ही के रोज नाना फड़नवीस का निधन हुआ था जो पेशवा साम्राज्य में परभावसाली मंत्री थे अऊर आज भी भरत के मेकाइवली के रूप में जाने जाते हैं. महान सितार वादक उस्ताद विलायत ख़ाँ का भी निधन आज ही के रोज हुआ था. अऊर आज के दिन महान क्रांतिकारी ऊधम सिंह लंदन में एक सभा के दौरान गवर्नर माइकल ओडवायर को मारकर जालियाँवाला बाग के भीसन नरसन्हार का बदला लिये थे.

आइये उन सब महान लोग को याद करते हुये हमरे तरफ से न तीन में न तेरह में... सॉरी न तेईस में न चौबीस में यानि 2350 वाँ ब्लॉग बुलेटिन में सामिल ब्लोग-पोस्ट का आनंद लें!!

                             -      सलिल वर्मा
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मंदिर को जाती सड़क

बेटियों की जिंदगी सहेजने के लिए विदेशी दूल्हों पर सख्ती जरूरी

तितली तेरे रंग

यादें

ताकि सनद रहे ( मेरे देश की पुलिस और उसके कानून ) डॉ लोक सेतिया

बेटी कल विदा होंगी

बरगद होने के बाद तुम समझोगे

विरह गीत

पेड़ और कविता

मरुधर में बोने सपने हैं

७९ साल पहले लिया गया था जलियाँवाला नरसंहार का प्रतिशोध

कुछ पैगाम भेजे हैं

चिट्ठाजगत और घर की बगल की गली का शोर एक सा हुआ जाता है

उसकी थकान - भगवत रावत

अस्माकं विद्यालय

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मंगलवार, 22 जनवरी 2019

छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई - 2300 वीं ब्लॉग बुलेटिन

साल का सुरुआत अभी होबे किया है त आज हमको भी बहुत सा पुराना-नया बात याद आ रहा है. ऊ ब्लॉग का स्वर्न काल थाजब नया नया दाखिल हुये थे. बहुत सा लोग तबतक स्थापित हो चुका था अऊर जिनका लेखन हमको बहुत परभावित करता था. सच पूछिये त जेतना सिर्सस्थ लोग आज भी देखाई देता है उनमें हम सबसे जुनियर हैं. मगर धीरे-धीरे हमरा भी पहचान बनता चला गया अऊर कुछ लोग बिहारी होने के बावजूद भी इज्जत देने लगा. इसका सबसे बड़ा कारन जानते हैं का थाहमरा ईमानदारी.

दरसल ब्लॉग-जगत में बहुत बे-ईमानी चलता था. ऊ जमाना था जब बहुत सा “बड़ा लेखक” लोग भी बिना ब्लॉग पढे हुये कमेण्ट में बहुत अच्छाकमाल का लिखा है आपनेबहुत प्रेरक रचना है... ई सब बात लिख देता था. बहुत सा लोग पिछला कमेण्ट पढकर हेर-फेर करके नया टिप्पणी चेप देता था. असल में ऊ लोग का भी मजबूरी थाकाहे कि उनको एक रोज में सैकड़ों पोस्ट पर कमेण्ट जो करना पड़ता थाताकि उनके पोस्ट पर भी ऊ लोग आकर हाजिरी लगाए. अब एतना पोस्ट पढकर कमेण्ट करने में त हालत खराब हो जाएगाओही से एक झटका में सबको निपटा देते थे.

हमरा खराबी एही था कि हम बहुत कम पोस्ट पढते थेमगर पढला के बाद कमेण्ट करते थे. अ आप लोग को भरोसा दिलाते हैं कि आज भी हम बिना पढे कम से कम टिप्पणी त नहिंये करते हैं. एही हाल हमरा फेसबुक पर भी है. बहुत कम पोस्ट लिखते हैंगिना चुना लोग को पढते हैं अऊर टिप्पणी का ओही स्टैंडर्ड बनाकर चलते हैं.

एही चक्कर में केतेना बार अइसा हुआ कि टिप्पणी में कोई कबिता हम लिख दियेत उसको ओहीं पोस्ट करके हम भुला जाते थे. कभी कभी बाद में खोजने से भी नहीं मिलता था. दरसल हम जेतना अपना कबिता को नेग्लेक्ट किये हैं कि अगर हमरा कबिता हमसे बदला लेना चाहे त हमको सात जन्म तक कबिता से वंचित रख सकता है. मगर हमरा कबिता को भी मालूम है कि हम कबिता के बिना नहीं रह सकते हैं अऊर कबिता हमरे साँस साँस में बसता है.


बस गुअजरा हुआ साल में हम कबिता के साथ एगो परयोग किये. सुबह-सुबह व्हाट्स ऐप्प पर लोग एन्ने-ओन्ने का फॉरवर्ड किया हुआ मेसेज भेजता रहता हैहम कभी उसको फ़ॉरवर्ड नहीं करते हैं. हम अंगरेजी का बहुत सा सूक्ति का हिन्दी में भाव अनुवाद करके अऊर उसको एकेदम अपना बनाकर कबिता के रूप में ढाल दिये. फिर उसको अपने पसंद का संदेस से मिलता जुलता फोटो (अऊर कभी कभी अपना फ़ोटो) के साथ अपना करीबी लोग को भेजना सुरू कर दिये. हमरा भी सर्त एही था कि उसको कभी भी फेसबुक पर सेयर नहीं किये. कुछ चाहने वाले लोग शेयर कर दिये त हमको कोनो आपत्ति भी नहीं हुआ.

बस एही सिलसिला अभी तक चल रहा है. इसी बहाने हम अपने अंदर लुकाया हुआ कबि को बाहर निकालने का कोसिस भी किये अऊर कबिता के प्रति जो हमरा करजा था ऊ हो धीरे धीरे चुका दिये. आज लगभग 200 कबिता हम लिख चुके हैं अऊर आप लोग के आसीर्बाद से अभी भी चल रहा है. कबिता अच्छा है या बुरा है मालूम नहींलेकिन बहुत से परसिद्ध लोग से अच्छा कबिता है ई बात त हम अपना खुद का आलोचक होने के नाते भी कह सकते हैं.

कभी मौका मिला त अगिला बार हम अपना कबिता के साथ ब्लॉग-बुलेटिन पेस करेंगे. फिलहाल त देखते देखते 2300 वाँ बुलेटिन आपके सामने आ गया. बधाई आप सब लोगों कोकाहे कि बहुत मोस्किल से हमलोग ई बुलेटिन को आगे बढा पा रहे हैं. सबके साथ बेक्तिगत समस्या हैमगर ऊ का कहते हैं कि आदत हो त छूटियो जाता हैलत कहाँ छूटता है- छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई!
                                                          - सलिल वर्मा 
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गीत नया मत लिखना तब तक

शिकारी माता और कमरुनाग यात्रा- हिमाचल

नये साल में क्या बदलेगा

हे कृष्ण

♥♥♥♥♥अपने औचित्य... ♥♥♥♥♥♥

इस दिन का नेग

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी १: ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हट के जरा बच के ये है बम्बे मॅरेथॉन!!

अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह जी की १२७ वीं जयंती

एलोवेरा का जूस

दीदी के भाई जी

खंडहर-सी जिंदगी

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लेखागार