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शनिवार, 24 मई 2014

कुछ खास बात तो है बुलेटिन में....


इसे आप इत्तेफाक कहें या फिर कुछ और, पिछली बार जब बुलेटिन लिखना शुरू किया था तो 5 बुलेटिन लगाते-लगाते ही मेरी जॉब लग गयी थी, और दूसरी पारी का ये मेरा पाँचवाँ बुलेटिन है और आज ही नयी जॉब की कन्फ़ंर्मेशन मिली है... शायद इन्हीं सब चीजों से इंसान के अंदर अंधविश्वास बढ़ता है और हमें कोई आपत्ति नहीं होती, हो भी क्यूँ भला जब अपना कुछ फाइदा हो रहा हो... खैर ज्यादा कुछ कहने को है नहीं आज, चारो तरफ राजनीति का माहौल है और उसके बारे में जितना लिखने का सोचो कम ही लगता है, इसलिए राजनीति को हर इंसान की अपनी-अपनी समझ पर छोड़ देना चाहिए... इस माहौल से अलग हम खुश हैं और सोमवार से नए ऑफिस के बारे में सोच रहे हैं...   

जब भी नौकरी की बात आती है, कई लोग अक्सर वर्क लोड या थकान की शिकायत करते हैं, क्या आपने कभी सोचा ये नन्ही-नन्ही चिटियाँ ज़मीन के भीतर क्या क्या कर गुजरती हैं.... चलिये देखते हैं ये विडियो और फिर नज़र डालते हैं कुछ इधर-उधर की नयी-पुरानी पोस्ट्स के लिंक पर... 

 

बिहार की राजनीति में आज कल परिवर्तन का दौर है, इसी परिवर्तन को कभी प्रशांत जी ने आड़े हाथों लिया था, राजनीति से आगे बढ़ते हुये चलिये ये राँझा वाला गाना तो सुनते चलें, जन्म लेने से ठीक एक दिन पहले की बात है मेरे आँगन में आदित्य की पहली किरण के साथ ही मेरा नामकरण हो गया था और तब से ही इनकी तरह ही मैं भी कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ... अरे हाँ जब से मैं बंगलौर आया हूँ ये कुंदरु की अधपकी सब्जी से परेशान सा हो गया हूँ, लेकिन ये नहीं सोचा कभी कि क्या होगा रिश्ता मेरा और कुंदरु का, खैर आप जब बंगलौर की सड़कों पे चल रहे होंगे तो ये महसूस करेंगे कि सिग्नल लाल होने पर भी पीछे की गाडियाँ हॉर्न बजाते रहती हैं, कई बार दिल करता हर एक इंसान से जा जाकर कहूँ, नो हॉर्न प्लीज... खैर ये देखिये तीन बेहतरीन पोस्ट कह रही हैं कि  फूल बिछाती इस शय्या पर, खुद को इस तरह देखते हुये शायद इस बार ये प्रेम में मारी नहीं जाएंगी....

तो फिर ज़िंदगी चलने का नाम है, चलते रहिए, लड़ते रहिए और मुसकुराते रहिए.... फिर मिलते हैं....

शनिवार, 10 मई 2014

महंगी होती शादियाँ, कच्चे होते रिश्ते...

भारत एक उत्सवप्रिय देश है. लोग दिल खोलकर उत्सवों में पैसा खर्च करते हैं. इन भव्य शदियों की भव्यता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. ये उस देश की सचाई है, जहाँ आज भी लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं और कइयों को सिर्फ एक वक्त भोजन करके गुजारा करना पड़ता है, देश का आम आदमी आज भी आधारभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है.
अब देश के युवाओं के लिए यह बात विचारणीय है कि शादियों पर इस तरह की फिजूलखर्ची कितनी जायज है? कुछ लोगों का मत है कि शादी जीवन में एक बार होती है तो कंजूसी क्यों की जाए! धूमधाम से शादी के फेर में ही लड़की के माता-पिता जिन्दगीभर कष्ट उठाते हैं.
सोचिए, गर शादियाँ सादगीपूर्वक होने लगें तो लोग बेटियों को भी बोझ नहीं समझेंगे. जन्म से ही उन्हें बेटी की शादी में होने वाले खर्च की चिंता नहीं सताएगी. इससे कन्या भ्रूण हत्याओं में भी कमी आएगी. युवाओं को चाहिए कि वे अपनी शादियों के भव्य तमाशे में पैसा बहाने की अपेक्षा समझदारी से पैसा खर्च करें. इसके लिए अपने माता-पिता से भी इस बात पर विचार करें. शादी में बेवजह दिखावे पर पैसा बर्बाद करने से तो बेहतर है कि किसी जरूरतमंद की मदद कर दी जाए.
शादी-ब्याह के मामले में लोग सोचते हैं कि अगर साधारण रूप से शादी कर दी तो समाज के लोग बातें बनाएँगे या इससे उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी. प्रतिष्ठा की चिंता किए बगैर आप अच्छे कार्य की पहल तो कीजिए, फिर समाज वाले भी आपका अनुकरण करने लगेंगे.
शादियों में होने वाले खर्च आसमान छू रहे है! वही शादियों के बाद रिश्तो की स्थिरता में उतनी ही गिरावट आई है !मेहमान नवाजी का पूर्व में भी विशेष ख्याल रखा जाता था! किन्तु खर्च एक सीमा तक ही किये जाते थे! परन्तु वर्त्तमान में शादियों में खर्च बढ़ा है, उतने ही रिश्तो की स्थिरता समाप्त सी हो गयी है इन दिनों शादियों में खर्च करने की होड़ सी लगी है!सगाई के कार्यक्रम से ही खर्चे प्रारम्भ हो जाते है! महंगे निमत्रण पत्र, निमंत्रण पत्र के साथ गिफ्ट, काकटेल पार्टी, बेचलर पार्टी और शादी पार्टी में रु.पानी की तरह बहाए जाने लगे है! हालीवुड, बालीवुड एक्ट्रेश,महंगे होटलों के आयोजन, महंगे डांस ग्रुप ने शादियों के खर्च को बेलगाम कर दिया है!आदर सत्कार तो उन दिनों भी होता था जब इस तरह के दिखावे नहीं थे! अतिथि के मुख्य द्वार पर आगमन से लेकर भोजन कराने तक अतिथियों का पूरा ख्याल रखा जाता था! ऐसे में यदि शादी के पश्चात रिश्तो में दरार भी आती थी तो पूरा समाज एक साथ खड़े होकर टूटते  रिश्तो को बचाने का प्रयाश करता था!महंगी शादियों में टूटते रिश्तो को बचाने वाला कोई नहीं होता !
जरा सोचिये इतनी महँगी शादियों से क्या मिलता है, क्षणिक ख़ुशी के लिए लाखो करोडो  खर्च करना क्या उचित  है! क्या इन महँगी शादियों पर कोई लगाम  नहीं लगाई जा सकती !शाही शादियों के स्थान पर क्या हम पारिवारिक व आदर सत्कार वाली शादियों का चलन  प्रारम्भ नहीं कर सकते !

रिश्तों की कीमत ज्यादा होनी चाहिए, शादियों की नहीं.... आइए अब चलते हैं आज के फटफटिया बुलेटिन पर.....

अजदक की अलमारी से:- जौने डगर तुम दरस आए सजन,
सच्ची, हम सीरियस बिलकुल नहीं हैं... सिर्फ मज़ाक भर कर रहे हैं....
जिंदगी भर तुम माने नहीं और हम तुम्हे मनाते ही रहे...
पौलिथीन और झुर्रियाँ...
दुनिया एक छलावा है
और जीवन एक किताब...
अपमान से सम्मान का तेज़ बढ़ता है....
मॉल, मोबाइल संस्कृति और मध्यम वर्ग...
एक बात और आत्मखोज...
बेचारा बचपन, उम्र की साँझ और कहाँ है बुढ़ापा ज्यादा....
अब इजाजत दीजिये, फिर मिलते हैं...

सोमवार, 5 मई 2014

यहाँ पेशाब करना मना है....

न जाने कितनी बार ऐसा हुआ कि नजदीकी दूरियों के लिए पैदल चलते समय अपनी नाक बंद करनी पड़ी हो, भारत में फुटपाथ का मतलब ही होता है पेशाब करने का लाइसेन्स मिल जाना... नेचर कॉल का बाहना देने वालों से भी एक सवाल है कि नेचर कॉल तो महिलाओं को भी आती होगी अगर वो कंट्रोल कर सकती हैं तो पुरुष क्यूँ नहीं... कल एक विडियो देखा, मस्त लगा... सड़क किनारे बदबू-गंदगी फैलाते लोगों के साथ साथ यही सलूक सही है... लेकिन शायद सिर्फ इतना करना काफी न हो इसके लिए सरकार को भारी मात्र में पब्लिक मूत्रालय बढ़ाने होंगे, साथ ही साथ ये भी सुनिश्चित करना होगा कि पब्लिक यूरीनेशन के खिलाफ कड़ी कार्यवाही हो, आखिर ये शहर हमारा है तो सड़क किनारे यूं बदबू फैलाना कहाँ तक सही है.... और तो और मेरे घर के पास एक बहुत ही खूबसूरत सा पार्क है बहुत बड़ा और हरा भरा... हम वहाँ फ्रेश हवा लेने जाते हैं, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो दीवार से सटा कोना देखकर फ्रेश हो जाते हैं, मतलब इससे ज्यादा घृणित और क्या हो सकता है... मतलब पढ़-लिख कर भी यूं जाहिलों वाला काम करने में जाने क्या मज़ा है... फिलहाल तो ये विडियो देखिये और सोचिए अगर शहर के सभी फुटपाथ साफ सुथरे हों तो वहाँ से गुजरने में कितना आनंद आए....


आज के दिन आपके लिए लाया हूँ 20 लिंक्स, कुछ पुराने कुछ नए....  स्वप्न जगत से बाहर निकलिए और जानिए ये आदर नहीं राजनीति है, और किसी को कुछ कहना हो तो यूं नकारिए नहीं, जैसे यहाँ कहा जा रहा है... सुनो मेरे सपनों के राजकुमार...माफी चाहता हूँ लेकिन माँ की परिभाषा कोई भला कैसे लिख सकता है.... और यूं आखिरी खत लिख देना सही तो नहीं.... जीना इसी का नाम है, ना मानिए तो पढ़ लीजिये ये लाल डब्बे में पड़ी लाल चिट्ठियाँ ... अगर आपको प्रेम के निष्कर्ष पता न हो तो पढ़ सकते हैं.... अभी तो प्याज सस्ते हैं तो प्याज से मुलाक़ात करते जाइए, फिर फिसल गया वक़्त तो न कहिएगा कि महंगे हो गए हैं.... पल तो यूं ही आते-जाते रहते हैं, लेकिन दर्द के स्याह प्याले कौन पिये.... एक सितारे की जीवन यात्रा पढ़िये और देखिये अभी क्या बाकी है.... क्यूंकि गहनता ही दुख का मूल कारण है, इसलिए खुद को संभाल लो और संभाल जाओ आज... शायद कोई समझा न सके लेकिन कीवी के फायदे अनेक हैं...चलते चलते पुरुष ब्लॉगर कृपया अलग लाइन में आयें...

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

एक गणित के खिलाड़ी के साथ आज की बुलेटिन....

आज श्रीनिवास रामानुजन् की पुण्यतिथि है...  श्रीनिवास रामानुजन् (22 दिसम्बर, 1887 – 26 अप्रैल, 1920) एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया। ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और मात्र 33 साल की उम्र में देहत्याग करने से पहले अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है....
रामानुजन की पारंपरिक शिक्षा बस दसवीं तक ही थी, दसवीं के बाद ये गणित में इस कदर डूब गए कि गणित को छोडकर बाकी सारे विषयों में वो दो-दो बार अनुत्तीर्ण हुये....
विद्यालय छोड़ने के बाद का पांच वर्षों का समय इनके लिए बहुत हताशा भरा था। भारत इस समय परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा था। चारों तरफ भयंकर गरीबी थी। ऐसे समय में रामानुजन के पास न कोई नौकरी थी और न ही किसी संस्थान अथवा प्रोफेसर के साथ काम करने का मौका। बस उनका ईश्वर पर अटूट विश्वास और गणित के प्रति अगाध श्रद्धा ने उन्हें कर्तव्य मार्ग पर चलने के लिए सदैव प्रेरित किया। वे इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी गणित के अपने शोध को चलाते रहे। इस समय रामानुजन को ट्यूशन से कुल पांच रूपये मासिक मिलते थे और इसी में गुजारा होता था। रामानुजन का यह जीवन काल बहुत कष्ट और दुःख से भरा था। इन्हें हमेशा अपने भरण-पोषण के लिए और अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए इधर उधर भटकना पड़ा और अनेक लोगों से असफल याचना भी करनी पड़ी.... लेकिन एक दिन वो सफल हुये उनके शोध पत्रों को विदेशों में सराहा गया, लेकिन बुरा वक़्त बीमारी के रूप में उनके साथ ही था... मात्र 33 साल की उम्र मे चला गया ये महान गणितज्ञ.... उन्हें ब्लॉग-बुलेटिन की टीम की तरफ से उनके योगदान के लिए धन्यवाद और श्रद्धांजलि.....

आज की धड़ाधड़ बुलेटिन में सबसे पहले नज़र डालते हैं, गोखले की दक्षिण अफ्रीका यात्रा पर, फिर देख लीजिये ब्लॉग लेखन के कुछ तजुर्बे, साथ में पढ़ते जाइए बाउ और नेबुया की झांकी का 27वां भाग, बाकी भाग भी पढ़ ही लीजिएगा लगे हाथों.... अब चूंकि परिवर्तन बेहतर हो तो प्रशंसनीय है इसलिए मेरी बुलेटिन कुछ पुरानी ब्लॉग पोस्ट्स मे भी झाँका करेगी.... तो गर कुछ पुरानी यादों में झाकें तो कहीं कोई शाम का साया सा दिखता है.... फिर कुछ प्रश्न भी हैं और तीन पागल भी.... है "नील" की साँसों में अब भी तुम्हारे सरगम सिर्फ ऐसा बोलना  काफी नहीं बल्कि फिर कुछ दस्तखत करने पर दिखेगा आम का पेड़..... बदला सा क्षितिज.....और हवा की काट. और चलते चलते बजाते चलते हैं समर शंख....

ठीक, अभी तो हम चलते हैं खाना बनाने, लेकिन सारे ज़रूरी कामों के बीच पढ़ना-लिखना जारी रहे यही कोशिश है.... खुश रहिए, मुसकुराते रहिए और इस बार ज़रूर वोट दीजिये.... अगले शनिवार फिर मिलते हैं.......

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

ब्लॉग बुलेटिन के साथ चलिये गुलज़ार से गुल्ज़ारियत तक...

हम जब छोटे थे तो हर इतवार को जंगलबुक आता था, तब तक हम कोनो गुलज़ार-उलजार को नहीं जानते थे.... लेकिन हमको ऊ चड्ढी पहन के फूल खिला है वाला गाना बहुत अच्छा लगता था.... मतलब एकदम डांस करने का फीलिंग आता था, अब हम लोग तो अइसने गाना पे डांस करते थे ऊ वखत... तब तक उन्होने बीड़ी जलईले नय न लिखा था....
फिर एक दिन टीवी पर आनंद सिलेमा आ रहा था, हम तो तब्बो बच्चे ही थे लेकिन जब ऊ लाइन आता है न "मौत तू एक कविता है"... तो लगा वाह अमिताभ बच्चन क्या डायलोग मारा है, तब तक ई थोड़े न पता था कि ई डायलोग सब हीरो नय कोनो औरे कोई लिखता है....
फिर बड़ा और समझदार होने के रास्ते पर कितना बार बहुते कुछ अच्छा लगा लेकिन समझ नहीं आता था कि इतना अच्छा कौन है जो इतना कुछ लिखता है... बहुत दिन बाद जब औडियो केसेट खरीदने का उम्र आया तो कई मनपसंद एल्बम पर एक नाम लिखा पाता था "गुलज़ार".... जगजीत दा ने भी उनकी कितनी गजलें  गायीं.... नाम में ही कोनो जादू सा था, फिर धीरे धीरे ऐसी गुल्ज़ारियत चढ़ी कि अब नहीं उतर सकती... हर गजल, हर शब्द जैसे कहीं जन्नत से उतार लाते है वो.. फिर जाना कि वो फिल्में भी बनाते हैं, उनकी बनाई सारी फिल्में एक एक कर देख डालीं... वाह !!! बस एक्के  लफ्ज निकला हर बार....
खैर, अभी पता चला उनको "दादा साहब फाल्के पुरस्कार" मिला है... वैसे तो एक वक़्त ऐसा भी आता है जब ई  सब पुरस्कार इतना माने नहीं रखते, इंसान अपना धुन में काम करते चले जाता है फिर भी बधाइयों का गुलदस्ता भेज देते हैं और ऊपर वाले से प्रार्थना कर सकते हैं कि उन्हें लंबी उम्र बख्से..
               
चलिये अब आते हैं आज की बुलेटिन पर, ढूंढते हैं कुछ ऐसी जगहें जहां गुलज़ार का जिक्र हुआ हो.... ऋचा जी लिख रही हैं कुछ गुल्ज़ारिशें, जोया जी गुलज़ार की तरफ से पूछ रही हैं, वो आई थी क्या ??, आवाज़ के जादूगर युनूस भाई रेडियोवाणी पर सुना रहे हैं, 'हम चीज़ हैं बड़े काम की यारम'    , घुमक्कड़ मनीष कुमार जी दिखा रहे हैं रद्दी का अखबार और बातें कर रहे हैं गुलज़ार की.... विवेक जैन के यहाँ हैं, दर्द और गुलज़ार... एक अंजाने ब्लॉग पर मिल गयी मुझे कहानी गुलज़ार के पहले गीत की... पारुल 'पुखराज' जी के ब्लॉग पर गुलज़ार/खय्याम/भूपेंद्र-आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं , अभिषेक भाई के ब्लॉग पर आप भी जी सकते हैं गुलज़ार के साथ बिताए लम्हों की पूरी सीरीज....  इस सीरीज में कुल सात पोस्ट्स हैं पढ़िएगा ज़रूर....

तो आज के बुलेटिन की रेलगाड़ी यहीं तक, बहुत शॉर्ट नोटिस पर ये विशेष रेलगाड़ी खामोश दिल के स्टेशन से निकली है आइए बैठिए और सफर का आनंद लीजिये....

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

नहीं रहे दारा सिंह ... ब्लॉग बुलेटिन

मित्रो आज का दिन मेरे लिए बहुत खास बन गया है ... पर दिन की शुरुआत बहुत बुरी हुई थी ... जब दारा सिंह जी के निधन का समाचार मिला | मैं हमेशा से ही उनका फैन रहा हूँ !
पिछले काफी अरसे से मैं एक बढ़िया जॉब ढूंढ रहा था ... सो आज मुझे मिल गयी ... सोमवार से जॉइन करना है ... आप सब का आशीर्वाद चाहिए होगा ! पर मेरी इस खुशी के पीछे आज एक छोटा सा दर्द भी है  ... दर्द है अब नियमित न रह पाने का ... पर भरोसा रखिए एक बार वहाँ जमते ही मैं फिर हाजिर हो जायुंगा आप सब का प्यार पाने और आप सब को नई नई पोस्टो तक ले जाने के लिए ... आज फिलहाल कुछ पोस्टें पेश है पर सिर्फ उनके लिंक ही दे पाया हूँ ... माफ कीजिएगा !

जैक एग्यूरो की कविता

Cinderella Fairy Tale

 सद्बुद्धि

 अरे...अरे...मैं गिर पड़ा.....

 बुनियाद...

 नज्म

 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही नहीं, विश्वसनीयता भी ज़रूरी

 आज की हलचल में ---- रात बरसता रहा चाँद बूंद बूंद

 सना नना सायँ सायँ... पुरवा करत अठखेली...ब्लॉग4वार्ता....संध्या शर्मा

 फेरारी की सवारी : ताजगी से भरी हुई एक फिल्म
 हरियाया ये विरही सावन धीरज से श्रृंगार करो ......

 अन्धकासुर

बाबा भोलेनाथ का दर्शन

बेबसी का दर्शन

बूंद बूंद रिसती ज़िंदगी

http://lamhon-ke-jharokhe-se.blogspot.in/2012/07/blog-post_11.html
सूना पड़ा है तेरी आवाज़ का सिरा...

http://lamhon-ka-safar.blogspot.com/2012/07/blog-post.html
जीवन शास्त्र... 

http://neerajjaatji.blogspot.com/2012/07/kirti-glacier.html
Kirti Glacier कीर्ति ग्लेशियर

http://mallar.wordpress.com
जामिया मस्ज़िद (श्रीनगर)
-सावन के इस मौसम में -

बिहार के कुलपतियों की नियुक्ति में धांधली. -

अंत मे :- 
दारा सिंह (19 November 1928-12 July 2012)
रुस्तम ए हिन्द दारा सिंह जी को पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम और आप सब की ओर से शत शत नमन और हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि !

शुक्रवार, 29 जून 2012

अपने बच्चों के लिए थोडा और बलिदान करें....


          क्या आपको याद है थियेटर या सिनेमा हॉल में जब आपने पहली फिल्म देखी थी तब आपकी उम्र क्या थी...  खैर छोडिये अगर याद नहीं है तो...  अक्सर मैं देखता हूँ, कई लोग गोद में छोटे बच्चों को लेकर फिल्में देखने चले आते हैं.. क्या आपने भी कभी ऐसा किया है... अब आप पूछेंगे भला इसका इस बुलेटिन से क्या लेना देना है... जी आपने सही कहा इसका इस बुलेटिन से कोई लेना देना नहीं है लेकिन इस बात का बच्चों की सेहत से ज़रूर लेना देना है... इस तरह की लापरवाही भरी हरकत का बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में गहरा प्रभाव पड़ सकता है...
           आपने फिल्मों के सर्टिफिकेट्स के बारे में तो ज़रूर सुना होगा... केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा फिल्मों को सामान्यतः तीन तरह के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं... "U" "U/A" और "A"...
     "U" सर्टिफिकेट उन फिल्मों को दिया जाता है जो आप 4 साल से ज्यादा की उम्र के बच्चों के साथ देख सकते हैं, बहुत कम ही फिल्मों में आपने ये सर्टिफिकेट देखा होगा.. अभी की फिल्मों में फरारी की सवारी  ऐसी ही फिल्मों में से एक है... लेकिन इस तरह की भी फिल्में 4 साल से छोटे बच्चों के साथ देखने से बचना ही चाहिए...
          उसके बाद नंबर आता है "U/A" सर्टिफिकेट वाली फिल्मों का.. इस श्रेणी की फिल्मों के कुछ दृश्यों मे हिंसा, अश्लील भाषा या यौन संबंधित सामग्री हो सकती है, इस श्रेणी की फिल्में केवल 12 साल से बड़े बच्चे किसी अभिभावक की उपस्थिति मे ही देख सकते हैं... मतलब ये फिल्में भी आपको 12 साल से छोटे बच्चों को नहीं दिखानी चाहिए.. आज कल बनने वाली अधिकांशतः फिल्में इसी श्रेणी की होती हैं...
        तीसरी श्रेणी है "A" .. यह वह श्रेणी है जिसके लिए सिर्फ वयस्क यानि 18 साल या उससे अधिक उम्र वाले व्यक्ति ही पात्र हैं...
              चूंकि वो नन्हे बच्चे कुछ बोल नहीं सकते तो उनकी तरफ से मैं आपसे बस इतनी सी गुज़ारिश करना चाहूँगा, अपनी खुशियों का थोडा बलिदान और करें... और बच्चों के साथ फिल्में देखने न जाएँ और न ही घर पर ही उन्हें इस तरह की फिल्में देखने दें... अपने आस पास भी अन्य माता-पिता को इस सम्बन्ध में जागरूक करें... अब रूख करते हैं आज की बुलेटिन की तरफ....

            
संजय ग्रोवर जी अपनी लघु व्यंग्य कथा के माध्यम से कहते हैं इमेज बड़ी चीज़ है, मुंह ढंक के सोईए... और अमित जी बता रहे हैं सोने की मुद्राएं... दराल सर भी थोडा हलके फुल्के ढंग से अपनी नयी पोस्ट रखते हैं... मैं तो पानी पीता ही नही... अपने ब्लॉग क़स्बा पर रवीश कुमार जी बात कर रहे हैं वासेपुर की बंगालन की .... सतीश सक्सेना जी के गीतों की श्रृंखला में जुड़ रहा है गीता हरिदास....  और साथ साथ देखिये रुपये का दिनों दिन का हाल.... एक नयी शुरुआत पर भी नज़र डाल लीजियेगा...काफी दिनों बाद आई वंदना महतो कह रही हैं तुम अब भी... अरे हाँ जी हाँ... अभी भी... उधर अमृतसर की यात्रा वृतांत को आगे बढ़ा रहे हैं अभिषेक... गिरिजेश जी एक पोस्ट रिठेल कर रहे हैं मोलई माट्साब... रश्मि जी के ब्लॉग पर एक ज़ोरदार चर्चा चली हुयी है... आखिर क्यूँ इतना मुश्किल होता है ना कहना... संगीता स्वरुप जी के ब्लॉग पर बिखरी पड़ी हैं जिद्दी सिलवटें... आशा जी के ब्लॉग पर पढ़िए सुरूर.. अंजना जी सुना रही हैं अपनी हंसी... तृप्ति जी अपनी शादी की दसवीं सालगिरह कुछ इस तरह मना रही हैं... दिगंबर नासवा जी के ब्लॉग पर चारो तरफ स्वर्ग बिखरा पड़ा है... जाकर देख आईये... साथ ही देखिये कैसे आँखों से नींद बह रही है.... महेंद्र वर्मा जी को आगत की चिंता नहीं... सोनिया जी के ब्लॉग पर विचारों से मात.... शिवनाथ जी के ब्लॉग पर वो पूछ रहे हैं...क्या मैं 'जिंदा' हूँ... 
और जाते जाते अपना बचपन याद करते जाईयेगा...  क्यूंकि हर तस्वीर कुछ कहती है... 



गुरुवार, 14 जून 2012

अरे आप लिखते क्यूँ नहीं... लिखते रहें...

               आज कल जब अपने रीडर पर ब्लोग्स की तरफ का रुख करता हूँ, तो कईं ब्लोगरों की कमी बहुत खलती है... कई लोग जिंदगी की मशरूफियत में खो गए, तो किसी को अब लेखन आकर्षित नहीं करता.... आज के बुलेटिन में मैं लेकर आया हूँ कुछ ऐसे मिले जुले चिट्ठे, उन चिट्ठाकारों के जो नियमित लिखते हैं, जो आज कल कम लिखते हैं और उनके भी जिन्होंने कई दिनों से कुछ भी नया पोस्ट नहीं किया... तो बातें ज्यादा क्या करूँ बस घूमिये इन लिंक्स पर और प्रेरित कीजिये उन लोगों को जिन्होंने लिखना कम कर दिया है.... और अगर आपकी नज़र में भी कोई ब्लोगर है जिन्होंने कई दिनों से कुछ नहीं लिखा तो अनुरोध कीजिये उनसे यहाँ लौट आने का... निश्चित रूप से हम सभी, ऐसे लोगों को मिस कर रहे हैं...
इंतज़ार रंगों का
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भाई
विश्व रक्तदान दिवसः राह चलते तैयार हो गए रक्तदान के लिए 
मुकम्मल सी वो कुछ यादें :दीप्ति शर्मा
डरता हूँ गाँव जाने से...
ग़ज़ल के बादशाह को आख़िरी सलाम
कभी कभी ना जाने क्यू ?
ज़रूरतें रात—दिन बढ़ती जाती हैं!
हाईवे हो या हिल्स , लेन ड्राईविंग इज सेन ड्राईविंग -- लेकिन सुनता कौन है !
आँखों से थोड़ी बारिश हो..
तलाश... संध्या शर्मा
महज़ हंगामा खड़ा करना ही इनका मकसद नहीं, कोशिश तो यह भी है, कि, इनकी दूकानें चलती रहनी चाहिये....
अब ऐसे लोगों के ब्लॉग के कुछ लिंक जो आज कल कम या बिल्कुल नहीं के बराबर ही लिख रहे हैं....
चार शख्स, चार मिजाज़
खिलौने वाला....
स्त्री क्या है तेरा अस्तित्व
हमारा एक छोटा प्रयास इन्हें इनका बचपन लौटा सकता है - -
मुझे प्यार में मांगना नहीं आता
बादल भी रोने लगे....
फिर एक इंतज़ार
दस्तक
"लोग समझते हैं मैं कवि हूँ"
संगम-तट की रेत पर दो जुड़वा पैरों के निशान
तीन क्षणिकाएं - नष्ट चाँद !
दो बजिया बैराग
सड़क पर औंधे मुंह पड़ा शहर..
आखिर मिल ही गए..
              और चलते चलते सतीश सक्सेना जी की तरफ से एक निमंत्रण स्वीकार कीजिये... दिनाक १६ जून शाम ५.३० बजे दिल्ली में उनकी किताब मेरे गीत का विमोचन समारोह हो रहा है... अरे हाँ साथ में आदरणीय रश्मि प्रभा जी के संपादन में ब्लौगरों के साझा कविता संग्रह खामोश, ख़ामोशी और हम  का भी विमोचन होगा... इस कविता संग्रह में मेरी भी ६ कवितायें संकलित हैं.... ज़रूर जाईयेगा....

गुरुवार, 7 जून 2012

विवाह की सही उम्र क्या और क्यूँ ?? फैसला आपका है...

           5 जून को दिए दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने 15 वर्ष की उम्र में हुए एक मुस्लिम लड़की के विवाह को जायज ठहराया.. वैसे भारतीय संविधान के हिन्दू मैरेज एक्ट के अनुसार विवाह की मानित उम्र लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 तय की गयी है... लेकिन इसमें मुस्लिम, पारसी, ईसाई और जेविश धर्म का जिक्र नहीं किया गया है... इस्लामिक क़ानून के मुताबिक़ कोई भी मुस्लिम लड़की बिना अपने माता-पिता की इजाज़त के शादी कर सकती है, बशर्ते उसने प्यूबर्टी हासिल कर ली हो. अगर उसकी उम्र 18 साल से कम भी है तो उसे अपने पति के साथ रहने का हक़ है... तो क्या भारतीय संविधान भी धर्म के हिसाब से शादी की उम्र तय करेगा... वैसे अगर दूसरे मुल्कों की बात करें तो मुस्लिम देशों को छोड़कर अधिकतर पश्चिमी देशों में विवाह की उम्र लडकों के लिए 18 और लड़कियों के लिए 16 है... हालाँकि एशिया महाद्वीप में अधिकतर जगह लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की भी उचित उम्र 18 ही है... इरान में लड़कियों की न्यूनतम आयु 9 साल निर्धारित की गयी है और ब्रुनेई में तो इससे जुड़ा कोई नियम ही नहीं है यानी वहां बाल विवाह आज भी जायज है... ध्यान रहे कि आज से करीब एक साल पहले कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में सुनाया था कि बिना माता-पिता की अनुमति की कोई भी लड़की 21 साल से कम की उम्र में विवाह नहीं कर सकती... वैसे अगर धर्म, प्रदेश का पक्ष हमलोग दरकिनार कर दें तो भी एक सवाल तो मेरे मन में उठ ही रहा है कि क्या 15 वर्ष की उम्र में विवाह उचित है... अगर हाँ तो इसे बाल विवाह की ही संज्ञा दे दें तो क्या गलत होगा... भले ही लड़की शारीरिक तौर पर थोड़ी तैयार हो लेकिन क्या वो मानसिक तौर पर विवाह की ज़ेम्मेदारियां उठा पाने में सक्षम होगी...बहरहाल उम्मीद करता हूँ इस फैसले का असर आने वाली शादियों पर तो नहीं पड़ना चाहिए... क्यूंकि इतनी कम उम्र में होने वाले विवाह की  संख्याओं में अब कटौती हो रही है और मेरे ख्याल से ऐसा होना भी चाहिए... भले ही कोर्ट ने १५ वर्ष की उम्र को विवाह के लिए पर्याप्त मान लिया हो लेकिन ये फैसला आपको करना है कि आप विवाह के लिए उचित अवस्था क्या मानते हैं...
इस सोच को आपके लिए छोड़कर आईये शुरू करता हूँ आज की बुलेटिन रेलगाड़ी रंग बिरंगे डब्बों के साथ....
            दिल्ली हाई कोर्ट के उक्त फैसले पर फिरदौस जी पूछ रही हैं कि हिन्दुस्तान में कौन सा कानून लागू है... भाई मेरा तो कहना है कि कानून कोई भी हो लेकिन उसके फायदे और नुक्सान पर भी गौर कर लिया जाना चाहिए... क्या 15 साल की उम्र भी कोई शादी की उम्र होती है... ये तो पढने-लिखने और खेलने-कूदने की उम्र होती है.... अरे खेलने कूदने से याद आया, अभी तो बच्चों की गर्मी की छुट्टियाँ चल रही हैं, आपको याद आप गर्मी की छुट्टियों में क्या करते थे, उस समय तो ये कंप्यूटर नाम की बला भी नहीं थी, टीवी भी गिने चुने घरों में ही होता था... वो तरह तरह के खेल और मस्ती जो आप कभी नहीं भूल सकते है न...?? देखिये न पाखी की छुट्टियाँ चल रही है और वो दिखा रही है अपने स्केच... और सतीश पंचम जी को भी देखिये उनके सफ़ेद घर में वो बता रहे हैं 'राजशौचालय' रॉक्स डूड... जाईये उनका राजशौचालय  मेरा मतलब है पोस्ट देख आईये... और निवेदिता जी बोल रही है और घूँघट डालना आ ही गया ...:)चलिए अच्छा ही है ये तो हर भारतीय नारी को आना ही चाहिए... साधना वैध जी बोल रही हैं कोई तो मूरत दे देते...जनपक्ष पर अदम गोंडवी को याद करते हुए अशोक कुमार पाण्डेय जी कह रहे हैं देखना अदम को यहाँ से... दिलीप जी भी अजीब सी ख्वाईश लिए कहते हैं मुझे इंसान न कर, मुझको कैलेंडर कर दे... अरविन्द मिश्र जी कह रहे हैं ग्रीषम दुसह राम वन गमनू ....अशोक सलूजा जी एक दर्द सा बाँट रहे हैं जैसे बस प्यार से पुकार लो ...!!! आशा जी अपने ब्लॉग पर एक कविता में मिलवा रही हैं एक सतर्क और निडर माँ से... सौम्या जी एक छोटी सी कविता लिखते हुए कहती हैं मानो चाँद ना हो... वंदना गुप्ता जी अपनी दो कवितायें पढ़ा रही हैं हमें हे..... मत रोना.. और फिर पीड़ा का पाणिग्रहण कौन करे... रचना जी दिखा रही हैं कुछ पदचिन्ह...   अनुपमा जी के ब्लॉग पर एक कविता पढ़ें मन के नीड़ में...!माधवी शर्मा गुलेरी जी कह रही हैं बदल रहा है सिनेमा और उसकी सुंदरता भी...हम भी आपसे पूरा इत्तेफाक रखते हैं... अब आज की फिल्मों में वो बात कहाँ...                

       

गुरुवार, 24 मई 2012

क्या बुराई है राजनीति को कैरियर बनाने में ...

          आज कल बेरोजगारी अपने चरम पर है, हर किसी के हाथों में डिग्री है, इंजीनियरिंग से कम में तो कोई बात ही नहीं करता... लेकिन नौकरी ... उसके लिए तो गज़ब की मारामारी चल रही है... ऐसी कोई डिग्री, ऐसा कोई कोर्स नहीं जहाँ नौकरी की गारंटी मिलती हो.... ऐसे में सब अपने कैरियर के चुनाव में पेशोपेश में रहते हैं... स्कूल के समय से ही विद्यार्थियों पर दवाब बन जाता है ताकि वो अपना कैरियर चुनकर उसपर अपना 100 परसेंट दे सकें... तरह तरह के इन अवसरों को तलाश करते युवा गलती से भी कभी राजनीति में आने का नहीं सोचते.. आखिर ऐसा क्या है जो उन्हें इस तरफ आने से रोक देता है..बस एक सोच एक विचार मेरे ब्लॉग पर...
          ये मोबाईल और इंटरनेट की दुनिया में चिट्ठियों का सिलसिला तो कहीं खो सा गया... मुझे याद है जब डाकिये को देखकर मेरा बाल मन खुश हो जाता था... खैर एक बहुत ही ग़मगीन कर देने वाली कविता लिखती है संध्या शर्मा जी.... खत...
ज़िंदगी क्या है? कबाड़ के खिलौना बनने से...
खिलौनों के कबाड़ बन जाने की दास्तान...
उम्र बढ़ने के साथ साथ कीमत घटती जाती है...
उफ़ क्या गज़ब का लिखा है... पढ़िए कुछ और ऐसी ही जबरदस्त क्षणिकाएं दिलीप जी के ब्लॉग से....कुछ यूँ ही...स्वप्न मञ्जूषा जी एक मजेदार वाक्या सुनाते हुए कह रही हैं...  कुछ तो बात है.... बिहार के पानी में...! जी हाँ हम भी इत्तिफाक रखते हैं, आप कह रही हैं तो सच ही होगा... अभिषेक कुमार जी अपने ब्लॉग पर एक बता रहे हैं कि, जाको राखे साईयां मार सके ना कोई  ... जी हाँ बिल्कुल सही है... इनकी वीरता के बारे में तो आप सबको भी पढना चाहिए....बब्बन पण्डे जी बाल कविता लिखते हुए बयान कर रहे हैं बढती हुयी गर्मी का दर्द... आग उगल रही आकाश...हम हर वो काम कर रहे हैं जो हमारे इंसान होने पर संदेह पैदा करता है... फिर भी हम ये कहते हुए नहीं चूकते, फिर भी हम इंसान हैं... वहां जाकर अपने विचार भी बताएं उन्हें....विवाह के बाद औरत की ज़िन्दगी तरह तरह के नयी जिम्मेदारियों से घिर जाती है... दिगंबर जी किस तरह बता रहे हैं अपनी ख़ुशी... पढ़िए.. मेरी जाना ... सुमन जी अपने ब्लॉग पर एक छोटी सी कवितानुमा पंक्तियाँ लिखती हैं..  तुम कहते थे न...   संगीता जी अपने ब्लॉग पर दिखा रही हैं, मन समंदर.. ज़रूर देखें... यशवंत जी की तो बात बन गयी और आपकी... विक्की डोनर की एक और समीक्षा पढ़िए मनोज जी के ब्लॉग पर... अपना एक रोचक संस्मरण बाँट रहे हैं महेंद्र श्रीवास्तव... ऊंचे लोग ऊंची पसंद ....  अरुण चन्द्र राय जी के ब्लॉग पर कविता के रूप में रुपया गिर रहा है...

अब आज्ञा दीजिये ... फिर मिलेंगे अगले गुरुवार !

गुरुवार, 17 मई 2012

आज के बुलेटिन की गाडी खामोश दिल के स्टेशन से...

        चूंकि आज पहली बार मैं आप सबके सामने उपस्थित हुआ हूँ तो सबसे पहले अपना परिचय करवा देता हूँ... नाम तो आप पढ़ ही लेंगे लेकिन नाम पर मत जाईयेगा मैं वो शेखर सुमन नहीं जो टीवी पर दिखता है... पिछले ढाई सालों से अपने निजी ब्लॉग पर सक्रिय हूँ शायद आपमें से कईयों ने पढ़ा भी हो " खामोश दिल की सुगबुगाहट" ...  लेकिन पहली बार अपने निजी ब्लॉग के आलावा कहीं और पोस्ट लगा रहा हूँ, और वो भी ब्लॉग बुलेटिन... पहले पोस्ट की चर्चाओं वाले ब्लॉग को देख कर सोचता था, न जाने कितनी मेहनत से चर्चाकार पोस्ट लगाते होंगे... न जाने कितने ब्लॉग छान कर दिन भर का सार लाते होंगे...  बहुत दिन पहले शिवम भैया ने बुलेटिन लगाने कहा था तो आज जब खुद चर्चा लगाने बैठा तो बहुत अच्छा लग रहा है...
तो देर न करते हुए बुलेटिन की इस गाडी को ग्रीन सिग्नल दिखाते हैं... 
            आज दिन की पहली ही पोस्ट पढ़ी, और मन अजीब सा हुआ क्यूंकि ये एक ऐसा विषय है जिसमे मैं भी बहुत दिलचस्पी रखता हूँ, आत्महत्या करने पीछे अलग अलग परिस्थितियां हो सकती हैं... कुछ में इंसान लाचार होता है और कुछ में भाव में बह जाता है... लेकिन इस पर आज केवल पल्लवी जी की राय पढ़ते हैं... अपने विचार भी ज़रूर बताईयेगा उन्हें.... बच्चों समेत सामूहिक आत्महत्या सही या गलत ??
           इतनी भारी-भरकम पोस्ट पढने के बाद आईये थोड़ी चाय पी लेते हैं, लेकिन अरे रुकिए देखिये आपके चाय पीने के अंदाज़ को अमित जी गौर से देख रहे होंगे...  भाई हमें ऐसे चाय पीने की तलब तो नहीं है लेकिन अमित जी का ऐसा लेख पढ़ लिया कि मन कर रहा है कि हम भी पी कर देख लें अपना चाय पीने का अंदाज़... अरे आप भी पढ़िए ये पोस्ट और अपने चाय पीने के अंदाज़ को देखिये... " अंदाज़ चाय पीने के ......"
          स्वप्न मञ्जूषा जी अपनी एक खूबसूरत ग़ज़ल लायी हैं और साथ में उनकी आवाज़ का जादू भी, हर बार की तरह बेहतरीन... चेहरे को देखिये उनकी नज़र से....           ज़िन्दगी में अच्छे रिश्तों और रिश्तों की बारीकियों को समझना बहुत ज़रूरी होता है, इसी विषय पर विजय कुमार जी अपनी कविता में कहते हैं... ज़िन्दगी, रिश्ते और बर्फ .....!
            हर बार कि तरह वंदना जी आज भी कविता के माध्यम से आपको सोचने पर मजबूर करेंगी.... पढ़िए और जाकर टिपिया आईये.... "रूहों को जिस्म रोज कहाँ मिलते हैं........."
            अक्षरों का महत्व भला कौन नहीं जानता, अक्षरों के बिना क्या आज कि ये पीढ़ी कुछ कर पाती, अक्षरों के इन्हीं जीवन को यशवंत माथुर जी अपनी कविता से बखूबी दर्शाते हैं.... आप खुद ही पढ़ लीजिये...
अक्षरों का जीवन .....
           आखिर इंसान उदास क्यूँ होता है... शायद ये भी ज़िन्दगी का ही हिस्सा है, अब हमेशा कोई खुश तो नहीं ही रह सकता न... खैर हरीश जी अपने ब्लॉग पर एक शानदार ग़ज़ल लिखते हैं और ग़मगीन कर जाते हैं.... जिंदा हूँ आज भी मगर गम कि लिबास में...
           अब अगर गजलों की बात हो और स्वप्निल जी की गजलों का जिक्र न हो तो बात कुछ बनेगी नहीं, वो हर बार की तरह एक शानदार ग़ज़ल लिखते हैं....  हँस के बीमार कर दिया देखो
नींद भी अजीब चीज है, नींद में आप जो मर्ज़ी चाहे सोच सकते हैं, अब देखिये न बाबुषा जी  न जाने क्या क्या दिखा रही हैं नींद में.... मेरे केंचुले तुम्हारी मछलियाँ...
            और आखिर में सदा जी के ब्लॉग पर एक बहुत ही प्यारी सी कविता.... संस्‍कारों की हथेली पर ....!!!
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           मन तो कर रहा है कि इस रेलगाड़ी में और डब्बे जोड़ने का लेकिन इस सप्ताह के लिए इतना ही अगले गुरुवार को ये खामोश दिल फिर सुगबुगायेगा और लाएगा नयी बुलेट ट्रेन...  तब तक के लिए हँसते रहें मुस्कुराते रहें...

लेखागार