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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

इस देश में बीमार पड़ने का हक़ किसी गरीब को नहीं है



धंधे में शामिल होने जाता एक एम्बुलेंस 


आज फिर वही छ: साल पुरानी वाली तल्ख़ स्थतियों से गुजरा जिनसे मैं और परिवार तब गुजरे थे जब मैं अचानक ही बहुत अधिक अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती हो गया था और तब से लेकर आज तक जाने कितनी ही बार ऐसी अनेकों परिस्थितयों हालातों घटनाओं को अपने आसपास , मित्रों ,और उनके आसपास भी घटते हुए देखा सुना , उससे यही निष्कर्ष निकला कि , 

इस देश में बीमार पड़ने का हक़ मध्यमवर्ग/गरीब वर्ग को नहीं है , क्योंकि अस्पताल देश की राजधानी समेत सारे छोटे नगरों कस्बों तक में सिर्फ और सिर्फ इसलिए खुले हैं कि तीमारदारों की अस्थि तक चूस कर बीमार को लाश में तब्दील करके आपको वापस कर दें | 

सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का अड्डा बन चुके ऐसे तमाम अस्पताल , उनमें चिकित्सा के नाम संगठित लूट इंसान से हैवान बन चुके चिकिस्तक ,उनके सहयोगी सब के सब संगठित अपराध के दोषी हैं जिन्हें तत्काल सूली पर चढाया जाना चाहिए | 

सबसे आखिरी बात , अपने परिवार को सबसे बड़ा अनमोल धरोहर जो आप दे सकते हैं और जो देना चाहिए  वो है खुद को बीमार होने से बचाना | 

हो सकता है कि ,ऐसा सबके साथ न हुआ हो , तो आप खुशकिस्मत हैं और अपवाद हैं , अस्पताल से लौटा हूँ , क्षुब्ध भी हूँ और बेहद व्यथित भी , आप आज की ये पोस्टें पढ़िए

पहले पढ़िए ये पोस्ट , बाकी सब है इसके बाद
धूमिल के संग बैठ लीजिये आप लोहे का स्वाद 


अरे रुकिए महाराज , आप आखिर चले किधर
मुकेश सिन्हा कह रहे मेरा नदी सा है ये सफर 


कोई देखता होगा ,कोई बोलता होगा
डा शरद कह रहीं , कोई सोचता होगा


रुक जा प्यारे , अभी तो यहीं रह ,
रश्मि जी के साथ ,बीती बात की तरह


कोई फूला गुमान में , कोई घमंड में ऐंठा
अनुराधा कह रही हैं ,जमाना बैरी बन बैठा 


चलिए अब इससे थोड़ा इतर पढ़ के आएं
जानिये आखिर क्या राफेल के मार्ग में बाधाऐं 


घूम फिर के जीवन अपना तुम भी सवारो
कह रहे नीरज जाट ,मैं मुसाफिर हूँ यारों

शुभ रात्रि | अपना ख्याल रखिये तभी आप अपनों का ख्याल रख पाएंगे 


गुरुवार, 30 अगस्त 2018

गाँव से शहर को फैलते नक्सली - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
पिछले दिनों पुलिस ने संदिग्ध शहरी नक्सलियों के ठिकानों पर देशभर में छापेमारी की और कइयों को गिरफ्तार किया. भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच के दौरान पुलिस ने एक पत्र बरामद किया जिसके द्वारा नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश का खुलासा हुआ. इसकी जांच करते हुए यह कार्यवाही की गई. इस छापेमारी में प्रमुख वरवर राव, गौतम नौलखा, अरुण परेरा, सुधा भारद्वाज निशाने पर रहे हैं. शहरी नक्सली के रूप में कुख्यात ये लोग पिछले कुछ दिनों से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर थे. गिरफ्तार शहरी नक्सलियों को 6 सितंबर को उच्चतम न्यायालय में होने वाली अगली सुनवाई तक घर में ही नजरबंद रखा जाएगा. यह फैसला तीन जजों की बेंच ने सुनाया. अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि विरोध लोकतंत्र का सुरक्षित द्वार है. यदि आप सुरक्षित द्वार मुहैया नहीं करवाएंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा.


सच है, लोकतंत्र में विरोध होना चाहिए पर किस हद तक? विरोध हो मगर उसका स्वरूप भी तो निर्धारित हो. नक्सलवाद का चेहरा आज सिर्फ हिंसात्मक गतिविधियों के रूप में जाना जाता है. भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल द्वारा सन 1967 में सत्ता के खिलाफ़ शुरू हुआ सशस्त्र आंदोलन पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ, जिसे अब नक्सलवाद के नाम से जाना जाता है. वे दोनों नेता चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से प्रभावित थे और मानते थे कि न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है. वर्तमान में नक्सलवाद सरकार के सामानांतर एक सत्ता स्थापित करने की मानसिकता से काम कर रहा है. अब उनक्सलियों द्वारा आदिवासियों की आड़ लेकर राजनैतिक संरक्षण प्राप्त किया जा रहा है जो कहीं न कहीं उन्हें सत्ता के करीब लाता है जो आज राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. वर्तमान में देश के लगभग एक सैकड़ा जिलों में नक्सलवादियों का कब्ज़ा है. यह क्षेत्रफल लगभग 92 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है. यह देश के दस राज्यों - उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि तक फैला हुआ है.

शहरी नक्सली के रूप में चिन्हित किये गए जिन लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं, उनके समर्थन में सरकार विरोधी दल तुरंत सामने आ गए. दरअसल ऐसे लोग वे चेहरे हैं जो भले ही शैक्षिक प्रोफाइल और चेहरे से सभ्य समझ आते हों मगर ये लोग आदिवासी क्षेत्रों में जाकर लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काते हैं. वहां की विकास की परियोजनाओं में बाधा उत्पन्न करते हैं. इनका यही उद्देश्य रहता है कि पिछड़े क्षेत्रों में किसी भी तरह से विकास न होने पाए. यही पढ़े-लिखे शहरी नक्सली ग्रामीणों को सरकार के विरुद्ध उकसाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. इनके भड़काऊ बयानों और कृत्यों से ही हिंसा भड़कती है और सरकार के खिलाफ आंदोलनों की राह आसान की जाती है. शहरी नक्सलियों के समर्थन में भले ही राजनैतिक दल सरकारी कार्यवाही का विरोध कर रहे हों मगर उन्हें सोचना चाहिए कि यहाँ मामला देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा का है. इससे पूर्व की केद्र सरकार ने भी एक समय शहरी नक्सलियों को वनों, जंगलों, गाँवों में रह रहे नक्सलियों से अधिक खतरनाक बताया था. आज वही सरकार के इस कदम का विरोध कर रही है. हर एक कदम पर राजनैतिक लाभ लेने की मानसिकता को जब तक छोड़ा नहीं जायेगा, तब तक राष्ट्रहित की बात करना बेमानी होगा. जिस तरह से देश भर में केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, देश में अघोषित आपातकाल लगा बताया जा रहा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा लगा होना बताया जा रहा हो वह राजनैतिक दृष्टि से, सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है. हालाँकि जो लोग केंद्र सरकार का, भाजपा का, नरेन्द्र मोदी का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगे हों वे प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश करने वालों का विरोध क्यों करेंगे? उन्हें शहरी नक्सली शब्द भी काल्पनिक अवधारणा महसूस हो रही होगी.

आइये उनकी इस काल्पनिक अवधारणा के बीच थोड़ा सा समय निकाल कर आज की बुलेटिन का आनंद लें.

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बुधवार, 29 अगस्त 2018

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
मेजर ध्यान चन्द ( Major Dhyan Chand ) ( जन्म - 29 अगस्त, 1905, इलाहाबाद, मृत्यु - 3 दिसंबर, 1979, नई दिल्ली ) एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे, जिनकी गिनती श्रेष्ठतम कालजयी खिलाड़ियों में होती है। मानना होगा कि हॉकी के खेल में ध्यानचंद ने लोकप्रियता का जो कीर्त्तिमान स्थापित किया है उसके आसपास भी आज तक दुनिया का कोई खिलाड़ी नहीं पहुँच सका।

1922 में भारतीय सेना में शामिल हुए और 1926 में सेना की टीम के साथ न्यूज़ीलैंड के दौरे पर गए। 1928 और 1932 के ओलंपिक खेलों में खेलने के बाद 1936 में बर्लिन ओलम्पिक में ध्यानचंद ने भारतीय टीम का नेतृत्व किया और स्वयं छ्ह गोल दाग़कर फ़ाइनल में जर्मनी को पराजित किया। 1932 में भारत के विश्वविजयी दौरे में उन्होंने कुल 133 गोल किए। ध्यांनचंद ने अपना अंतिम अंतर्राष्ट्रीय मैच 1948 में खेला। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए।

ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। आँकड़ों से भी पता चलता है कि वह वास्तव में हॉकी के जादूगर थे। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। दूसरा विश्व युद्ध न हुआ होता तो वह छह ओलिंपिक में शिरकत करने वाले दुनिया के संभवत: पहले खिलाड़ी होते ही और इस बात में शक की क़तई गुंजाइश नहीं इन सभी ओलिंपिक का गोल्ड मेडल भी भारत के ही नाम होता।

हिटलर और सर डॉन ब्रैडमैन भी थे प्रशंसक 

ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंदर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाई तो 29 अगस्त को वह ध्यानचंद को नमन करने के लिए तैयार है, जिसे भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। ब्रैडमैन हाकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। वह 1935 की बात है जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और ध्यानचंद दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह सेगोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं। यही नहीं ब्रैडमैन को बाद में जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का क़ायल बना दिया था। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर भी एक ही नाम छाया था और वह था ध्यानचंद।

1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।

विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसम्बर, 1979 को सुबह चार बजकर पच्चीस मिनट पर नई दिल्ली में देहांत हो गया। झाँसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहाँ वो हॉकी खेला करते थे। अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, "आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूँ" वो साधारण आदमी नहीं थे लेकिन वो इस दुनिया से गए बिल्कुल साधारण आदमी की तरह।

मेजर ध्यानचन्द जी की 113वीं जयंती पर पूरा देश उनको याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।  

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

नेत्रदान कर दुनिया करें रोशन - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज सुबह-सुबह समाचार पत्र में मात्र छत्तीस घंटे जीवित रहे शिशु द्वारा दो नेत्रहीन व्यक्तियों को रौशनी दिए जाने की खबर पढ़ी. किसी गंभीर इन्फेक्शन के चलते नवजात शिशु चंद घंटे ही इस दुनिया में रहा. उसके इलाज के भागदौड़ में लगे परिजन उसका नाम तक न सोच पाए थे. बाद में उसको दफनाये जाने के दौरान ही श्मशान घाट में उसका नामकरण कर शिवा नाम से पुकारा गया. उसी समय कुछ जागरूक समाजसेवियों की पहल पर उसके परिजनों को नेत्रदान के लिए समझाया गया. परिजनों ने उनकी बात स्वीकारते हुए नेत्रदान की प्रक्रिया पूर्ण करके नन्हे शिवा को इस संसार से भले ही अलविदा कर दिया गया हो मगर उसकी आँखों के सहारे दो व्यक्ति इस दुनिया को देख सकेंगे.


उस नवजात के द्वारा किये गए नेत्रदान से दो लोग ये दुनिया देख सकेंगे किन्तु अभी भी बहुत से लोग हैं जो देख नहीं सकते. कई लोग जन्म से नेत्रहीन हैं तो कुछ लोग हादसों में अपनी आंखें गंवा चुके हैं. आँखें हमें जीवित रहने के दौरान रोशनी देती ही हैं और यदि हम चाहें तो मृत्यु के बाद भी वे किसी दूसरे को रौशनी दे सकती हैं. जब भी नेत्रदान की चर्चा की जाती है तो अनेक लोग इस अन्धविश्वास में पड़ जाते हैं कि नेत्रदान के बाद वे अगले जन्म में नेत्रहीन पैदा होंगे. लोगों में नेत्रदान के प्रति जागरूकता लाने के लिए देश में प्रतिवर्ष 25 अगस्त से 8 सितम्बर तक राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाता है. हमारे देश में करीब ढ़ाई लाख लोग हैं जो कि कर्निया की समस्या से पीड़ित हैं. यदि ऐसे लोगों को किसी मृत व्यक्ति का कार्निया लगा दिया जाये तो इनको दृष्टि मिल सकती है. ऐसा उसी दशा में संभव है जबकि कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही नेत्रदान की घोषणा लिखित रूप में ना कर दे.नेत्रदान करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति की मृत्यु के छह घंटे के भीतर ही उसका कार्निया निकाल कर चौबीस घंटे के भीतर नेत्रहीन व्यक्ति को लगाया जा सकता है.


नेत्रदान के बारे में सामान्य सी जानकारी ये है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी उम्र, लिंग, रक्तसमूह और धर्म का हो, नेत्रदान कर सकता है. लेंस या चश्मे का उपयोग करने वाले व्यक्ति, जिनकी आँखों की सर्जरी हुई हो वे व्यक्ति भी नेत्रदान कर सकते हैं. बीमारी की दशा में एड्स, हेपेटाइटिस बी/सी, रेबीज, टिटनेस, मलेरिया आदि जैसे संक्रमण से पीड़ित व्यक्ति नेत्रदान नहीं कर सकते हैं. इसके अलावा मधुमेह, रक्तचाप, अस्थमा आदि से पीड़ित व्यक्ति नेत्रदान कर सकते हैं. यहाँ तक कि मोतियाबिंद से पीड़ित रोगी भी नेत्रदान कर सकता है.
नेत्रदान एक नेक काम है. कोई भी व्यक्ति अपनी आंखें दान करके दो व्यक्तियों के जीवन में उजाला ला सकता है. आइये संकल्प लें नेत्रदान का और अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करें. अपने समाज के नेत्रहीन व्यक्तियों को रौशनी प्रदान करें, उनकी आँखों के सहारे इस दुनिया को आजीवन देखें.  

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सोमवार, 27 अगस्त 2018

ऋषिकेश मुखर्जी और मुकेश - ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
ऋषिकेश मुखर्जी

मुकेश
आज हिंदी फिल्म जगत के दो महान कलाकारों की पुण्यतिथि है एक हैं महान फिल्म निर्माता- निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी और दूसरे हैं महान गायक मुकेश। हिंदी फिल्म जगत में इन दोनों ही महान शख्सियतों ने अपना अतुलनीय और सराहनीय योगदान दिया। ऋषिकेश मुखर्जी और मुकेश ने एक साथ केवल दो फिल्मों में काम किया है और वो फिल्म है अनाड़ी (1959) और आनंद(1971)। इन दोनों ही फिल्म के गाने उस दौर में काफी प्रसिद्ध हुए थे। अनाड़ी (1959) फिल्म का गीत "सब कुछ सीखा हमने" और आनंद(1971) फिल्म के दो गीत "मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, सपने सुरीले सपने" तथा "कहीं दूर जब दिन ढल जाएँ"। अनाड़ी (1959) फिल्म के गीत "सब कुछ सीखा हमने" के लिए मुकेश जी को 1959 के सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था। जबकि ऋषिकेश मुखर्जी जी को फिल्म आनंद(1971) के लिए सर्वश्रेष्ट कहानी और बेस्ट एडिटिंग का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला था। इन दोनों ने ही हिंदी फिल्म जगत को असीम ऊँचाइयों तक पहुँचाया।


आज इनकी पुण्यतिथि पर पूरा हिंदी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम इन्हें नमन करती है और हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करती है।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 26 अगस्त 2018

आओ रक्षा करें इस "बंद - धन" की

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज पूरे दिन में आप को भी रक्षाबंधन से जुड़े अनेकों संदेश मिले होंगे ... मुझे भी मिले लेकिन सब से बढ़िया संदेश ये लगा ...


आइये इस संदेश को पूर्ण सार्थकता देते हुये ... आज के दिन इस "बंद - धन" की रक्षा  की शपथ लें क्यूँ कि मकबूल शायर मुनव्वर राणा साहब ने बिलकुल वाज़िब फ़रमाया है कि ... 

किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा ~मुनव्वर राना

ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं | 

सादर आपका 
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हाइकू -राखी पर

राखी

राखी बांधने का मकसद

यह राखी बंधन है ऐसा

204. दिगम्बर जेठू, बालिका नृत्यांगना तथा नैसर्गिक हँसी

एक वसीयत मेरी भी ....... निवेदिता

मधुकर मत कर अंधेर

...उसकी आंखों से देख रहा हूं......

परिप्रेक्ष्य : ग्यारहवां विश्व हिंदी सम्मेलन : संतोष अर्श

काली भेंड़

भीड़ का ज़मीर

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

शनिवार, 25 अगस्त 2018

अकेले हम - अकेले तुम

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

कभी रोता हूँ, वो किसी को दिखाई नहीं देता;
कभी चिंतित रहता हूँ, कोई परवाह नही करता;
कभी मायूस होता हूँ, कोई पूछने तक नही आता;
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पर जब कभी चाट की दुकान पर अकेला जाता हूँ; कोई ना कोई पीछे से आ ही जाता है और पूछ लेता है -

 "क्या  शिवम् भाई अकेले-अकेले !!??"

सादर आपका
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अमित उपमन्यु की ताज़ा कविता

निराशा की राजनीति कब तक ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

दो निर्णय ..(भाग २)

भूख ने रुप बदल लिया

चौधरी साहब तारीफों के अफसरिया लालन-पालन को भूल तीखी आलोचनाओं की तैयारी से यहां आइए

बेटियाँ राष्ट्र संस्कृति की शिक्षिका हैं ....

३२२.दूरी

सोशल मीडिया में होने वाला है ऐतिहासिक सामाजिक युद्ध और राजनैतिक जोंबी

दूनं शरणं गच्छामि

सही कहा गया है ... भगवान केवल भक्तं भाव के भूखे होते हैं !!

पिया तुमसे भला तो ये जमाना है ------ mangopeople

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 अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!! 

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

शुरू हो रहा है ब्लॉगरों के मिलने का सिलसिला




अरे अरे आप चौंकिए मत , मुझे पता है कि , वर्ष के उत्तरार्ध में आयोजित किए जाने वाले ब्लॉग बैठक के लिए हम सब उत्सुक हैं , तो ये तो उससे पहले की बात कर रहा हूँ |

दिल्ली में प्रत्येक वर्ष लगने वाला दिल्ली पुस्तक मेला आज से शुरू हो गया है और अब हमारे तमाम ब्लॉगर ,ब्लॉगर से नामी गिरामी लेखक और जाने क्या क्या हो गए हैं | मगर इन पुस्तक मेले के दिनों में सबकी अचानक और नियोजित भी,  मुलाक़ात , बात , किताबें , सब कुछ कुल मिलकर यादगार बन जाते हैं |

मैं खुद कम से कम तीन दिन वहां पाया जाता हूँ | तो तैयार हो जाइये आपको अगले एक हफ्ते ताक ऐसी मुलाकातों की रपट पढ़ने देखने को मिलेगी , चलिए वो तो जब मिलेगी तब मिलेगी , फिलहाल आपको ये उम्दा पोस्टें पढ़नी हैं |

बबीता सिंह बता रही हैं एक सटीक और प्रभावी निबंध कैसे लिखें 

प्रतिभा कटियार की दुनिया में उनका साथ दें

प्यार की सौंगंध क्या चीज़ है।.....ये बता रही हैं डा शरद सिंह

जीवन अनमोल है , सचमुच ही है , और यही कह रही हैं आज अपने ब्लॉग में शशि पुरवार जी

अनुराधा चौहान ने अपने मन की पीड़ा यहां उड़ेल दी है , आप भी बांचिए और बाँटिये

गोदियाल जी अपनी सशक्त लेखनी से सोशल नेटवर्किंग में बढ़ते एंटी सोशल नेट्वर्किंग से उसके खतरे में पड़ने की चेतावनी दे रहे हैं |

बारिश में ओस की बूँद सहेज कर लाई हैं रेवा जी , देखिये आप भी

आज अमर शहीद राजगुरू की ११० वीं जयंती पर उनको नमन कर रहे हैं भाई शिवम् मिश्रा अपने ब्लॉग बुरा भला पर |

चलिए आज के लिए इतना यही , फिर मिलता हूँ जल्दी ही |

पढ़ते रहिये , लिखते रहिये
फेबुक के साथ यहां भी दिखते रहिये |

आप सबको स्नेह और शुभकामनायें , शुभरात्रि 

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

छाता और आत्मविश्वास

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

छाता बारिश को तो नहीं रोक सकता परन्तु बारिश में खड़े रहने का हौसला अवश्य देता है।
इसी प्रकार आत्मविश्वास सफलता को सुनिश्चित तो नहीं करता परन्तु सफलता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा अवश्य देता है।

सादर आपका 
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समय के पदचिन्ह...

बारौठी , एक हरियाणवी रिवाज़ जो अब लुप्त हो गई है ---

बत्तीस साल बहुत से सवालों की उम्र होती है...

झील सी गहरी आँखें

भारतीय पत्रकारिता के कुलदीप रहे हैं , कुलदीप नैय्यर

पाया परस जब नेह का

वो आँखें

कुलदीप नैयर - एक क़द का उठ जाना

नकारात्मक खबरें और बढ़ता ‘आप’ का क्षरण

कुछ यूं ही

दो निर्णय

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 22 अगस्त 2018

शुक्रिया आपका जो हमसे मिले - 2150 वीं ब्लॉग-बुलेटिन


हमलोग के जिन्नगी में केतना तरह का लोग हमरे साथ होता है... कोनो बहुत अच्छा दोस्त अऊर कोनो के साथ एकदम नहीं मन मिलता है. लेकिन हमलोग के सोचने का तरीका हमेसा एक्के होता है – अपना आप को केंद्र मानकर. तनी बिस्तार से बताते हैं. अब कोई अदमी हमरा बहुत करीबी दोस्त है, त हम सबसे पहिले एही कहते हैं कि अच्छा अदमी को अच्छा दोस्त मिलिये जाता है. यानि हम अपने आप को खुद्दे अच्छा मानने लगते हैं अऊर एही से समझते हैं कि हमको दोस्त भी बढ़िया मिला है. मगर इसके उलट कोनो खराब अदमी के बारे में हम नहीं कहते कि हम खराब थे एही से ऊ खराब अदमी हमसे टकरा गया. बल्कि हम त इहाँ तक सुने हैं कहते हुए कि हमरे जइसा अदमी के साथ जिसका नहीं निभा उसका किसी के साथ नहीं निभ सकता है.

हम त एक्के बात जानते हैं कि ई सब संजोग का बात है. ऊपरवाला हमको किसके साथ मिलाने का प्रोग्राम बनाया है, हम कभी नहीं जान सकते अऊर काहे मिलाया है, ई जानना त असम्भव है. ओसो एगो कथा सुनाते हैं कि बुद्ध एक बार कहीं रास्ता में जा रहे थे, तब उनको रास्ता में एगो पत्थर से ठोकर लग गया. चोट भी लगा होगा, बाकी ऊ झुककर ऊ पत्थर को धन्यवाद दिये अऊर आगे बढ़ गये. आनंद उनको पूछा कि आपको त पत्थर से चोट लगा था, त आप काहे पत्थर को धन्यवाद दिये. गौतम बुद्ध बोले –हो सकता है कभी हम ई पत्थर को चोट पहुँचाए होंगे, इसलिये आज ई हमको चोट पहुँचाया. हम त इसलिये धन्यवाद दिये कि ई अगर चाहता त हमारा माथा भी फोड़ सकता था.

अब ई सब हिसाब-किताब त ओही परमात्मा के हाथ में है. कोई अच्छा अदमी से मुलाकात हुआ त उससे मिलाने का धन्यवाद उसको दिजिये अऊर बुरा अदमी मिला त सोचिये कि परमात्मा हमरे गलत व्यवहार के कारण हमको लौटा दिया ओही बुरा ब्यबहार. दुन्नो उसी का दिया हुआ है, हमरा इसमें कोनो जोगदान नहीं है.

हमरा दू गो बच्चा न्यु यॉर्क चला गया है. बेटी राखी बाँधती है. अब राखी भेजने में तरह तरह का समस्या आ रहा था. सिरीमती जी का ताना अलगे रोज सुनने को मिलता था कि आपके आलस में अब राखी के बाद राखी जाएगा. अचानक सोचते-सोचते ध्यान आया कि अपने देव बाबू त न्यु यॉर्क में हैं. एक बार उनको रिक्वेस्ट करके देखते हैं, अगर काम बन गया त ठीक है, नहीं त देखेंगे. लेकिन उम्मीद था कि काम हो जाएगा.

सनीचर का दिन हम उनको मेसेज किये कि एगो काम है, अगर हो सके त किरपा कीजिये. ऊ पूछे कि पता बताइये, हम बता दिये. जवाब आया कि ई त हमरे ऑफिस के बगल में है. हम कल रबिबार को खरीद लेते हैं अऊर सोमबार को दे आएँगे, आपके डेलिवरी बॉय बनकर. हमको फिलिम “चुपके चुपके” याद आ गया कि कम से कम फूल-पत्ती तो कह सकते हो, हम बोल दिये डेलिवरी बॉय नहीं संदेशवाहक त कह सकते हैं.

अब हम कहें कि हमरे नीमन सोभाव के कारण ई सम्भव हुआ त बेकार बात होगा. परमात्मा को हमरा कस्ट समझ में आया अऊर ऊ देव बाबू का खयाल हमरे दिमाग में दिये. देव बाबू हमारा इज्जत करते हैं त हमरा बात रखे. इसमें हमरा त कोनो कमाल नहीं है.

हम जब सोचने लगते हैं कि ई सब कमाल हमरा है तब हम अदमी को जइसा ऊ है, ओइसहिं सुइकार करने के जगह उसको ठोंक-पीटकर अपने मुताबिक बनाने में लग जाते हैं. अऊर ई जादा दिन नहीं चल पाता है.

अजय कुमार झा जी का आगमन, 𝟮𝟭𝟱𝟬 वाँ बुलेटिन अऊर एतना सीरियस बातचीत. त चलिये एगो चुटकुला सुनाते हैं बचपन में सुने थे.

एगो लड़की बिआह के बाद ससुराल गई त कम उमर का बिआह था, इसलिये ससुराल का कायदा कानून नहीं पता था. किसी भी अदमी को कुछ बोल देती थी. घर में लोग समझाया कि ससुराल में सबको इज्जत से पुकारना चाहिये. एक रोज ऊ अपनी सास के पास भागल भागल आई. सास पूछी – का हुआ. ऊ बोली- सास जी, अपना गाय जी का बछड़ा जी, ससुर जी का धोती जी पर गोबर जी कर दिये हैं.

त आप भी ठहाका लगाइये अऊर आनंद लीजिये मजेदार मजेदार पोस्ट सब का. 


                                                                                                    - सलिल वर्मा
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रेडियो श्रोता दिवस - 20 अगस्त

वी.एस.नायपॉल : आधा जीवन (Half a Life) - २ : जय कौशल

ग़ाफ़िल ये शानोशौकत है

फीड बैक का मतलब प्रतिक्रिया दिया जाता है जिसमें लेकिन मजा नहीं आता है फीड बैक से जैसे सब कुछ पता चल जाता है

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब की १२ वीं पुण्यतिथि

अबकी बार राखी में जरुर घर आना

इस्मत चुग़तई की कहानियां पढ़ना है तो दिल-दिमाग़ खुला होना चाहिए - डॉ शरद सिंह

किताबों की दुनिया -191

शिकवों से भरा महबूब का ख़त है

अंधा मुग़ल

यह भी बलात्कार का ही मामला है

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मंगलवार, 21 अगस्त 2018

कोई उदासी, है यहीं कहीं है



सबकुछ सहज सा लगता हुआ,कितना असहज होता है।  हँसते हँसते रोने का सबब समझ में नहीं आता, लेकिन कहीं तो कुछ होता है, जो मन को जकड़ लेता है। नीलम प्रभा जी की कलम का जादू कई दिलों में घर बना लेता है।  आइये, इस घर के कमरों में हम गुनगुनायें 


ऐसी तो बात नहीं है, तू मेरे साथ नहीं है,
फिर भी कोई उदासी, है यहीं कहीं है। 
वे ही दिन,वही मौसम है,
रंगीं ख़ुशियों का आलम है 
क्यूँ ये चाँदनीमुझे,आज लगे थोड़ी कम कम है,
सबकुछ सुहाना हसीं है,
कोई कमी तो नहीं है,
फिर भी कोई उदासी  ... 

सपनीली मुस्कानों में,बागों बियाबानों में,
चलते रहे सय्याह से मौजों में, तूफ़ानों में,
चाहत की दुनिया वही है, इसका तो दिल को यकीं है,
फिर भी कोई उदासी, है यहीं कहीं है  ... 
कल हो ना हो, किसे है ख़बर,जाने कहाँ तक हो सफ़र,
क्या जाने किस पल उठ चलें, छोड़ के सूनी ये रहगुज़र,
अभी तो जवां ज़िन्दगी है,दिलकश बड़ी दिलनशीं है,
फिर भी कोई उदासी, है यहीं कहीं है  ... 

बातें ... खुद से - स्वप्न मेरे

ठिकाना : न्याय की देवियों की कम हिस्सेदारी

ये बाजार .. तुम्हारा ही बनाया हुआ है - कडुवा सच

प्यार की दास्ताँ अनलिखी रह गई
उम्र भर आंख में इक नमी रह गयी
कब हुआ ,क्या हुआ, क्यों हुआ पूछ मत
था कहीं जिस्म, औ' जाँ कहीं रह गई
दर्द दिल में दबाती रही मैं मगर
नज़्म अश्क़ों में' भीगी हुई रह गई
खेल है ज़िंदगी जानती हूँ मगर
क्यों मुझी से फ़क़त खेलती रह गई
क्यों न पूछा ख़ुशी तूने' मेरा पता
घर मिरे क्या बता थी कमी रह गई
क्या थी मेरी ख़ता जो तू रूठी रही
क्यों खफ़ा मुझसे' तू ज़िंदगी रह गई
जब कभी नाम तेरा लिया बज़्म में
दिलमें' ज्यूँ इक कसक सी उठी रह गई
यूँ तो' नज़्में हुई हैं , मुक़म्मल सभी
बस तिरे नाम की अधलिखी रह गई
इस क़दर दर्द ने 'हीर' बेंधा ज़िगर
एक नाज़ुक कली अधखिली रह गई

सुनो...............
अपने आने की ख़बर
कुछ देना इस तरह मुझको
जैसे मन्दिर की घंटियाँ
टुनटुना उठती हैं
और एक पावन सुगंध
फ़ैल जाती है
फिजा में
इस दो पल के मिलने में ही
मैं अपने जीवन के
सब पल काट लूंगी
जैसे दो पल के ध्यान में
हो जाती है सब मुरादें पुरी
और दो दाने प्रसाद
के पा कर रूह तक
पावन हो जाती है!!!!

जो उसके संग की चाहना हो
तो बनना दरख़्त
वो चिड़िया बन हमेशा फुदकती रहेगी टहनियों पे
पिंजरा न बन जाना
कि कैद कर लो रूह!
या बन जाना रात
वो तुम्हारे अंतर्मन पर चमकती रहेगी चाँद सी
सुनो !न बन जाना अग्नि से भरा आकाश
कि जल जाएं चांदनी के पंख!
या बनना सागर
मछली सी मटकती रहेगी
न बन जाना जाल
कि तड़पने लगे फंस कर!
बनना सखा
वो हर राज़ खोलती रहेगी परत दर परत
सुनो! न बनना साहब
कि जी हुजूरी में खो बैठे गरिमा!
बनना प्रेमी
वो ताउम्र सम्मोहित प्रेयसी रहेगी
सुनो !न बन जाना वो पति
जिसे दरकार हो सिर्फ एक छाया की!

लेखागार