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मंगलवार, 19 जून 2018

एक ही थाली में खाने से प्यार बढ़ता है ?




अपनी कुर्सी पर बैठो न,
लो अपनी थाली,
ये एकसाथ बैठने के लिए हाय तौबा क्यूँ !
कौन कहता है ,
कि एकसाथ,
एक ही थाली में खाने से
प्यार बढ़ता है ?
ऐसी बात होती तो संयुक्त परिवार एकल न हो गया होता,
बड़े से घर मे कई चूल्हे नहीं जलते ...

पहले एक बड़ी सी थाली में,
लगभग पूरा कुनबा साथ ही खाता था,
एक बड़े से बिस्तर पर,
सब घोड़े बेचकर सोते थे ।
लेकिन, हर बार 
खेत बंट गया,
घर का हिस्सा हिस्सा हो गया,
अन्न के दाने दाने बंट गए,
कई मूल्यवान चीजें संदूक में छुपा दी गईं ।
नाटकीयता के भात-दाल,
तरकारी,तीसी की चटनी,
पापड़, अंचार खाते हुए
सब नाक भौं सिकोड़ने लगे,
जाने कैसा प्यार बढ़ा 
कि सब उचककर एक दूसरे को देखने लगे,
टोना टोटका करवाने लगे,
और अपनी अपनी किस्मत पर रोने लगे ।
दर्जन भर भाई बहन,
एक दूसरे से मुँह फेरे चलते हैं , 
लेकिन जब होती है कोई मिलने की वजह ,
तो सभी समाज मे कहते हैं,
हम तो संयुक्त बनकर रहे हैं ...
समाज भी वक्र दृष्टि से देखता कहता है,
"बिल्कुल"
सब हमारा देखा सुना है ।"

हर किसी को दूसरे की ढोल सुहानी लगती है
और वह उसे फाड़ने के मंसूबे बनाता है,
एक थाली में गिंज गाँजकर खाते हुए ।

सोमवार, 18 जून 2018

बिहार विभूति डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह जी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
अनुग्रह नारायण सिंह (अंग्रेज़ी: Anugrah Narayan Sinha, जन्म: 18 जून ,1887; मृत्यु: 5 जुलाई, 1957) भारतीय राजनेता और बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री, सह वित्तमंत्री (1946-1957) थे। अनुग्रह बाबू (1887-1957) भारत के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, वकील, राजनीतिज्ञ तथा आधुनिक बिहार के निर्माता रहे थे। उन्हें 'बिहार विभूति' के रूप में जाना जाता था। वह स्वाधीनता आंदोलन के योद्धा थे। स्वाधीनता के बाद राष्ट्र निर्माण व जनकल्याण के कार्यो में उन्होंने सक्रिय योगदान दिया। अनुग्रह बाबू ने महात्मा गांधी एवं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ राष्ट्रीय आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।



आज बिहार विभूति डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह जी की 131वें जन्म दिवस पर हम सब उनके अतुलनीय योगदान को स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  ... अभिनन्दन।।

रविवार, 17 जून 2018

फदर्स डे और हमारे बुजुर्ग - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज जून महीने का तीसरा रविवार है ... हर साल की तरह इस साल भी जून का यह तीसरा रविवार फदर्स डे  के रूप मे मनाया जा रहा है ... पर क्या सिर्फ एक दिन पिता को समर्पित कर क्या हम सब उस के कर्ज़ से मुक्त हो सकते है ... क्या यही है क्या वास्तव मे हमारा संतान धर्म ??? क्या इतना काफी है उस पिता के लिए जिस ने हमें जन्म दिया ... हमें अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाया !!??

एक रिपोर्ट के अनुसार कहने को तो हमारे देश में बुजुर्गो की बड़ी इज्जत है, मगर हकीकत यह है कि वे घर की चारदीवारियों के अंदर भी बेहद असुरक्षित हैं। 23 फीसदी मामलों में उन्हें अपने परिजनों के अत्याचार का शिकार होना पड़ रहा है। आठ फीसदी तो ऐसे हैं, जिन्हें परिवार वालों की पिटाई का रोज शिकार होना पड़ता है।

बुजुर्गो पर अत्याचार के लिहाज से देश के 24 शहरों में तमिलनाडु का मदुरई सबसे ऊपर पाया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश का कानपुर दूसरे नंबर पर है। गैर सरकारी संगठन हेल्प एज इंडिया की ओर से कराए गए इस अध्ययन में 23 फीसदी बुजुर्गो को अत्याचार का शिकार पाया गया। सबसे ज्यादा मामलों में बुजुर्गो को उनकी बहू सताती है। 39 फीसद मामलों में बुजुर्गो ने अपनी बदहाली के लिए बहुओं को जिम्मेदार माना है।

बूढ़े मां-बाप पर अत्याचार के मामले में बेटे भी ज्यादा पीछे नहीं। 38 फीसदी मामलों में उन्हें दोषी पाया गया। मदुरई में 63 फीसदी और कानपुर के 60 फीसदी बुजुर्ग अत्याचार का शिकार हो रहे हैं। अत्याचार का शिकार होने वालों में से 79 फीसदी के मुताबिक, उन्हें लगातार अपमानित किया जाता है। 76 फीसदी को अक्सर बिना बात के गालियां सुनने को मिलती हैं।

69 फीसदी की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। यहां तक कि 39 फीसदी बुजुर्ग पिटाई का शिकार होते हैं। अत्याचार का शिकार होने वाले बुजुर्गो में 35 फीसदी ऐसे हैं, जिन्हें लगभग रोजाना परिजनों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है। हेल्प एज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथ्यू चेरियन कहते हैं कि इसके लिए बचपन से ही बुजुर्गो के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है। साथ ही बुजुर्गो को आर्थिक रूप से सबल बनाने के विकल्पों पर भी ध्यान देना होगा।

सादर आपका
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Fathers Day पर पढ़िए अज्ञेय की कविता – चाय पीते हुए

अब्बा, पिता

पिता

भारतीय परिवार और पिता

पिताजी आप अच्छे थे

विरोधियों को टोंटी-तोड़ जवाब !

शहीदी पर्व गुरु अर्जन देव जी महाराज

तुम्हे लड़ना होगा

‘उलूक’ तू दो हजार में उन्नीस जोड़ या इक्कीस घटा तेरी बकवास करने की आदत का सरकार पेटेंट कराने फिर भी नहीं जा रही है

महाबलिदानी महारानी लक्ष्मी बाई की १६० वीं पुण्यतिथि

शामें जब खुबसूरत होती थी

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अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 16 जून 2018

ईद मुबारक - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।



समस्त देशवासियों को ईद मुबारक। ये ईद सभी देशवासियों के लिए ढेरों खुशियाँ लाएँ, बस इतना है। सादर।।



आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

शुक्रवार, 15 जून 2018

जन्म दिवस - अभिनेत्री सुरैया और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
सुरैया (जन्म: 15 जून, 1929 - मृत्यु: 31 जनवरी, 2004) पूरा नाम सुरैया जमाल शेख़, हिन्दी फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और गायिका थीं। 40वें और 50वें दशक में इन्होंने हिन्दी सिनेमा में अपना योगदान दिया। अदाओं में नज़ाकत, गायकी में नफ़ासत की मलिका सुरैया जमाल शेख़ ने अपने हुस्न और हुनर से हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक नई इबारत लिखी। वो पास रहें या दूर रहें, नुक़्ताचीं है ग़मे दिल, और दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है जैसे गीत सुनकर आज भी जहन में सुरैया की तस्वीर उभर आती है।

15 जून, 1929 को गुजरांवाला, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी सुरैया अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। नाज़ों से पली सुरैया ने हालांकि संगीत की शिक्षा नहीं ली थी लेकिन आगे चलकर उनकी पहचान एक बेहतरीन अदाकारा के साथ एक अच्छी गायिका के रूप में भी बनी। सुरैया ने अपने अभिनय और गायकी से हर कदम पर खुद को साबित किया है।

सुरैया के फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बड़े रोचक तरीक़े से हुई। गुजरे ज़माने के मशहूर खलनायक जहूर सुरैया के चाचा थे और उनकी वजह से 1937 में उन्हें फ़िल्म 'उसने क्या सोचा' में पहली बार बाल कलाकार के रूप में भूमिका मिली।1941 में स्कूल की छुट्टियों के दौरान वह मोहन स्टूडियो में फ़िल्म 'ताजमहल' की शूटिंग देखने गईं तो निर्देशक नानूभाई वकील की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने सुरैया को एक ही नज़र में मुमताज़ महल के बचपन के रोल के लिए चुन लिया। इसी तरह संगीतकार नौशाद ने भी जब पहली बार ऑल इंडिया रेडियो पर सुरैया की आवाज़ सुनी और उन्हें फ़िल्म 'शारदा' में गवाया। 1947 में भारत की आज़ादी के बादनूरजहाँ और खुर्शीद बानो ने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली, लेकिन सुरैया यहीं रहीं।

देवानंद और सुरैया
एक वक़्त था, जब रोमांटिक हीरो देव आनंद सुरैया के दीवाने हुआ करते थे। लेकिन अंतत: यह जोड़ी वास्तविक जीवन में जोड़ी नहीं पाई। वजह थी सुरैया की दादी, जिन्हें देव साहब पसंद नहीं थे। मगर सुरैया ने भी अपने जीवन में देव साहब की जगह किसी और को नहीं आने दिया। ताउम्र उन्होंने शादी नहीं की और मुंबई के मरीनलाइन में स्थित अपने फ्लैट में अकेले ही ज़िंदगी जीती रहीं। देव आनंद के साथ उनकी फ़िल्में 'जीत' (1949) और 'दो सितारे' (1951) ख़ास रहीं। ये फ़िल्में इसलिए भी यादगार रहीं क्योंकि फ़िल्म 'जीत' के सेट पर ही देव आनंद ने सुरैया से अपने प्रेम का इजहार किया था, और 'दो सितारे' इस जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म थी। खुद देव आनंद ने अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में सुरैया के साथ अपने रिश्ते की बात कबूली है। वह लिखते हैं कि सुरैया की आंखें बहुत ख़ूबसूरत थीं। वह बड़ी गायिका भी थीं। हां, मैंने उनसे प्यार किया था। इसे मैं अपने जीवन का पहला मासूम प्यार कहना चाहूंगा।

अभिनय के अलावा सुरैया ने कई यादगार गीत गाए, जो अब भी काफ़ी लोकप्रिय है। इन गीतों में, सोचा था क्या मैं दिल में दर्द बसा लाई, तेरे नैनों ने चोरी किया, ओ दूर जाने वाले, वो पास रहे या दूर रहे, तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी, मुरली वाले मुरली बजा आदि शामिल हैं।

31 जनवरी, 2004 को सुरैया दुनिया को अलविदा कह गईं। संगीत का महत्व तो हमारे जीवन में हर पल रहेगा लेकिन सार्थक और मधुर गीतों की अगर बात आएगी तो सुरैया का नाम जरूर आएगा।

[ जानकारी स्त्रोत - भारतकोश ~ सुरैया ]

आज महान कलाकार सुरैया जी के 89वें जन्मदिवस के अवसर पर हिंदी ब्लॉगजगत और ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 
















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  ... अभिनन्दन।।

गुरुवार, 14 जून 2018

विश्व रक्तदान दिवस और ब्लॉग बुलेटिन


प्रिय साथियो,
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हर साल 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस (World Blood Donor Day) मनाया जाता है. संगठन ने विख्यात ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और भौतिकीविद कार्ल लेण्डस्टाइनर (जन्म 14 जून 1868) की स्मृति में उनके जन्मदिन को रक्तदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया. उन्होंने रक्त में अग्गुल्युटिनिन की उपस्थिति के आधार पर इसे अलग-अलग रक्त समूहों - , बी, में वर्गीकृत किया था,  जिसके लिए उन्हें वर्ष 1930 में शरीर विज्ञान में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था. वर्ष 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान नीति शुरू की. इसी वर्ष संगठन ने लक्ष्य रखा था कि देश अपने यहाँ स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा दें. इसका उद्देश्य यह था कि ज़रूरत पड़ने पर रक्त के लिए पैसे देने की ज़रूरत न पड़े. अब तक लगभग 49 देशों ने ही इस पर अमल किया है. ये दुर्भाग्य का विषय है कि आज भी कई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, रक्तदाता पैसे लेता है. ब्राजील में तो यह क़ानून है कि आप रक्तदान के पश्चात् किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ले सकते.


हमारे देश में आज भी ऐसी धारणा है कि रक्तदान से शरीर कमज़ोर हो जाता है. रक्त की भरपाई होने में महीनों लग जाते हैं. यह ग़लतफहमी भी बहुत से लोगों में है कि नियमित रक्त देने से रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और बीमारियां जल्दी जकड़ लेती हैं. ऐसे अनेक भ्रमों के चलते लोग रक्तदान का नाम सुनकर ही काँप जाते हैं. विश्व रक्तदान दिवस का उद्देश्य ऐसी भी भ्रांतियों को दूर करके लोगों को रक्तदान को प्रोत्साहित करना है. भारतीय रेडक्रास के राष्ट्रीय मुख्यालय के अनुसार देश में रक्तदान को लेकर भ्रांतियाँ कम हुई हैं पर अब भी बहुत काम किया जाना बाकी है. संभवतः ऐसा बहुत कम लोगों को मालूम है कि मनुष्य के शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है. इससे रक्तदान से कोई भी नुकसान नहीं होता. रक्तदान के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जिसका वजन 45 किलोग्राम से अधिक हो, जिसे एचआईवी, हेपेटाटिस जैसी बीमारी न हुई हो वह रक्तदान कर सकता है. एक बार में 350 मिलीग्राम रक्त दिया जा सकता है उसकी पूर्ति शरीर चौबीस घण्टे के अन्दर कर लेता है. पूर्ति के बाद रक्त सम्बन्धी गुणवत्ता की 21 दिनों में पूर्ण हो जाती है. चिकित्सा विज्ञान ये भी कहता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से रक्तदान करते हैं उन्हें हृदय सम्बन्धी बीमारियां कम होती हैं. इसके अलावा सबसे ख़ास बात ये है कि हमारे रक्त की संरचना ऐसी होती है कि उसमें समाहित रेड ब्लड सेल तीन माह में अपने आप ही ख़त्म हो जाते हैं इस दृष्टि से भी प्रत्येक स्वस्थ्य व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है.

आइये हम सब भी रक्तदान करने हेतु आगे आयें और लोगों की सहायता करें.

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बुधवार, 13 जून 2018

एक भयानक त्रासदी की २१ वीं बरसी

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज से ठीक २१ वर्ष पहले साउथ दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा अग्निकांड में 59 लोगों की आग में झुलसकर मौत हुई थी। देश की राजधानी में हुए इस भीषण हादसे में सिनेमा मालिकों की लापरवाही साफ तौर पर सामने आई थी। आग सिनेमा हाल के बेसमेंट में रखे जनरेटर से शुरू हुई और धीरे-धीरे पूरे हाल को आग ने अपने आगोश में ले लिया। हाल के भीरत भगदड़ मचने से 100 से ज्यादा लोग घायल भी हुए थे। सिनेमा के मालिक गोपाल और सुशील अंसल को इस अग्निकांड का दोषी माना गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दोनों भाइयों पर 30-30 लाख का जुर्माना लगाकर उन्हें रिहा कर दिया। 

क्या था पूरा मामला
साउथ दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में शुक्रवार, 13 जून 1997 को फिल्म 'बॉर्डर' का शो चल रहा था। इस दौरान बेसमेंट में लगे जनरेटर से आग धधक उठी। हादसे के बाद हाल में भगदड़ मच गई और 59 लोग आग में जिंदा जल गए। सिनेमा हॉल में क्षमता से अधिक लोग बैठे थे। मरने वालों में महिलाओं और छोटे बच्चों की संख्या अधिक थी। साथ ही जांच में पता चला कि सिनेमा हाल में सुरक्षा और आग के पुख्ता इंतजाम नहीं थे।

आज इस दुखद दुर्घटना की २१ वीं बरसी के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम मृतकों को अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि देते हैं |

ॐ शांति ... शांति ... शांति ... 

सादर आपका
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निन्यानवे फीसद देवानंद एक फीसद जोशी

रिश्ता

तू चन्दा मैं चाँदनी - 3

'राष्ट्रवाद, भारतीयता और पत्रकारिता' पर विमर्श को दिशा देती एक पुस्तक

बिना समझे, दौड़ना खतरनाक हो सकता है -सतीश सक्सेना

बेचैनी...

शबनमी ख्वाब

एटलस साईकिल पर योग- यात्रा भाग ७: औरंगाबाद- जालना

विनोद नायक की लघुकथा: दवा और दुआ

आदमी होने का मतलब

मेहदी हसन साहब की छटी पुण्यतिथि

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

मंगलवार, 12 जून 2018

विश्व बालश्रम निषेध दिवस और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
आज 12 जून है और यह दिन विश्व बालश्रम निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा  समाज में बालश्रम निषेध को लेकर जागरूकता लाने के लिए सन 2002 से इस दिवस को मनाये जाने की शुरूआत की गई. भारत में बालश्रम की समस्या को देखते हुए भारत सरकार ने इसे समाप्त करने को क़दम उठाए हैं. भारतीय संविधान के द्वारा खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाया गया है. केंद्र सरकार की ओर से सन 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित भी किया गया. इसके अनुसार खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है. इसके अलावा सन 1987 में राष्ट्रीय बालश्रम नीति भी बनाई गई. भारतवर्ष में बच्चों को ईश्वर का रूप मानने के बाद भी वर्तमान परिदृश्य भिन्न है. ग़रीब बच्चे शोषण का शिकार हो रहे हैं. वे स्कूल छोड़कर बालश्रम हेतु मजबूर हैं. इससे बच्चों का मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक एवं सामाजिक विकास प्रभावित होता है. इसी कारण से बालश्रम को मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है. इसके बाद भी आज घरेलू नौकर, होटलों, कारखानों, सेवा-केन्द्रों, दुकानों आदि में बच्चों को काम करते देखा जा सकता है. इनके अलावा कूड़ा बीनना, पॉलीथीन उठाना आदि अनेक कार्य हैं जिनके द्वारा बच्चे अपने बचपन के बजाय नरक जी रहे होते हैं. ऐसे कार्यों से वे अपने परिवार का पेट पालते हैं. ऐसे कामों में लम्बे समय तक संलिप्त रहने के कारण ये धीरे-धीरे नशे का, यौन शोषण का शिकार होने लगते हैं.


पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार एवं राज्य सरकारों की पहल इस दिशा में सराहनीय है. बच्चों के उत्थान के लिए अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया गया है, जिससे बच्चों के जीवन और शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव दिखे. शिक्षा का अधिकार भी इस दिशा में एक सराहनीय कदम है. भारतीय संविधान ने अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत की विभिन्न धाराओं के माध्यम से व्यवस्था की है कि

चौदह साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा (धारा 24)
राज्य अपनी नीतियां इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके और बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो तथा वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रवेश करें (धारा 39-ई)
बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर तथा सुविधाएं दी जायेंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जायेगा (धारा 39-एफ)
संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)

इसके बावजूद बालश्रम की समस्या अभी भी एक विकट समस्या के रूप में विराजमान है. हम सभी को मिलकर प्रयास करने चाहिए कि देश की भावी पीढ़ी का बहुत बड़ा भाग इस तरह खुद को अंधकारमय जीवन में धकेलने को मजबूर न हो. उनकी शिक्षा, उनके जीवन-यापन के उचित प्रबंधन के लिए सरकारों को बराबर सक्रिय बनाये रखने के लिए हम सबको भी सजग, सक्रिय रहना होगा. इस कामना के साथ कि हम बालश्रम को बढ़ावा नहीं देंगे, बालश्रम का समर्थन नहीं करेंगे, अपने आसपास बालश्रम नहीं होने देंगे बढ़ते हैं आज की बुलेटिन की तरफ.  

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सोमवार, 11 जून 2018

२ महान क्रांतिकारियों की स्मृतियों को समर्पित ११ जून

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
 
 
राम प्रसाद 'बिस्मिल' (जन्म: ११ जून १८९७ फाँसी: १९ दिसम्बर १९२७)

राम प्रसाद 'बिस्मिल' भारत के महान क्रान्तिकारी व अग्रणी स्वतन्त्रता सेनानी ही नहीं, अपितु उच्च कोटि के कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार भी थे जिन्होंने भारत की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। शुक्रवार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी विक्रमी संवत् १९५४ को उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर शाहजहाँपुर में जन्मे राम प्रसाद जी को ३० वर्ष की आयु में सोमवार पौष कृष्ण एकादशी विक्रमी संवत् १९८४ को बेरहम ब्रिटिश सरकार ने गोरखपुर जेल में फाँसी दे दी। 'बिस्मिल' उनका उर्दू तखल्लुस (उपनाम) था जिसका हिन्दी में अर्थ होता है आत्मिक रूप से आहत। बिस्मिल के अतिरिक्त वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कवितायें लिखते थे। उन्होंने सन् १९१६ में १९ वर्ष की आयु में क्रान्तिकारी मार्ग में कदम रक्खा और ३० वर्ष की आयु में फाँसी चढ़ गये। ग्यारह वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें से ग्यारह उनके जीवन काल में प्रकाशित भी हुईं। ब्रिटिश सरकार ने उन सभी पुस्तकों को जब्त कर लिया ।
लीला नाग (02/10/1900 - 11/06/1970)

लीला नाग का जन्म ढाका के प्रतिष्ठित परिवार में 2 अक्तूबर 1900 ई. में हुआ था। उनके पिता का नाम गिरीश चन्द्र नाग और माता का नाम कुंजलता नाग था | 

लीला नाग (बाद में लीला राय) का भारत की महिला क्रांतिकारियों में विशिष्ट स्थान है। पर दुर्भाग्य से उन्हें अपने योगदान के अनुरूप ख्याति नहीं मिल पाई।

1947 के विभाजन के दंगों के दौरान लीला राय गांधी जी के साथ नौआखली मे  मौजूद थी ... गांधी जी के वहाँ पहुँचने से भी पहले लीला राय ने वहाँ राहत शिविर की स्थापना कर ली थी और 6 दिनों की पैदल यात्रा के दौरान लगभग 400 महिलाओं को बचाया था | 

आज़ादी के बाद लीला राय कलकते मे ही जरुरतमन्द महिलाओं और ईस्ट बंगाल के शरणार्थीयों के लिए कार्य करती रही |

कलकते मे ही 11 जून 1970 को लीला राय जी का निधन हुआ |

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से आज हम इन दोनों महान क्रांतिकारियों को सादर नमन करते हैं !! 
वन्दे मातरम !!
इंकलाब ज़िंदाबाद !!
सादर आपका
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याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके

माँ हो ऐसी ~

महिला शक्ति : फर्श से अर्श तक ऐसा था प्रथम 'महिला फाइटर पायलट' अवनि चतुर्वेदी का सफर, 7 खास बातें

नीरजा - एक वीरांगना

प्यारी सी बच्ची

हीरे सा प्रतिमान

आदमी और कहानी

कुछ तो है...

लघुकथा- अच्छी पत्नी चाहिए तो...

साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो ...

बर्थ नंबर तीन...

जरूरी है फटी रजाई का घर के अन्दर ही रहना खोल सफेद झक्क बस दिखाते चलें धूप में सूखते हुऐ करीने से लगे लाईन में

ग़ज़ल

कहानी नहीं है ( बेबसी जुर्म है ) - डॉ लोक सेतिया

तू चन्दा मैं चाँदनी - 2

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अब आज्ञा दीजिये ...  

जय हिन्द !!!

रविवार, 10 जून 2018

८ जून को मनाया गया समुद्र दिवस

 जून 8, 2018 को Ocean Day यानि समुद्र दिवस मनाया गया |
समुद्र में बहुत कचरा जमा हो चुका है और मनुष्य ने अपने फायदे के लिए प्राकृतिक संसाधनों का इस हद तक दोहन कर लिया है कि अब स्थिति खराब होने को हैं। आप सोच सकते हैं कि अब स्थिति ऐसी है जहाँ मॉरीशस, मालदीव जैसे देश आने वाली शताब्दी शायद न देख पाएं... समुद्र में गंदगी, ग्लोबल वार्मिंग, उत्तरी ध्रुव पर जमे ग्लेसियर का अजीब तरीके से पिघलने का क्रम और नदियों में समाप्त होता पानी.. जल स्तर का लगातार नीचे चले जाना... इस मामले में हम भारतीयों का हाल तो खैर बहुत ही खराब है... हम तो खैर विश्व की सबसे अनुशासनहीन जनता हैं सो हमको अब भी कोई फर्क नहीं पड़ता|
 
रामायण में जब प्रभु श्री राम ने समुद्र से लंका जाने के लिए मार्ग मांगा तो समुद्र देव ने गर्जना ही की... इस घनघोर गर्जना के बाद जब राम ने अपने बाण से समुद्र सुखा देने की चेतावनी दी और तब ही समुद्र प्रकट हुए... वह तो खैर भगवान थे सो समुद्र स्वयं प्रकट हुआ लेकिन अब शायद राम स्वयं ही पुकारें तो भी समुद्र के प्रकट होने की स्थिति कभी नहीं आएगी क्योंकि समुद्र बचेगा ही नहीं... एकदम साफ दिख रहे समुद्र में भी महज़ पन्द्रह मिनट की सफाई के बाद कुछ यह निकला सो कल्पना कीजिये यदि पूरे समुद्र की सफाई हो तो पृथ्वी में मनुष्य के रहने की जगह बचेगी? 

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सोनम की समझदारी

एक किला जहाँ पूरी बारात ही गायब हो गयी

खुशफ़हम जिंदगी

कविता : दुनियाँ

दर्द.........विजय कुमार सप्पत्ति

तू चन्दा मैं चाँदनी - 1

इस अभेद में भेद को जान लेना तुम, पहाड़ों पर बारिशों के बाद जब कांस के फूल खिलेंगे तुम खुश होना-

मधुपुर मेरा मालगुडी है

थि‍कसे मठ - लद्दाख

घर की दहलीज़ !!!!

क्या जल रहा है...?

शनिवार, 9 जून 2018

चौधरी दिगम्बर सिंह और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
चौधरी दिगम्बर सिंह
चौधरी दिगम्बर सिंह (अंग्रेज़ी: Chaudhary Digamber Singh, जन्म: 9 जून, 1913 - मृत्यु: 10 दिसम्बर, 1995) स्वतंत्रता सेनानी थे और चार बार लोकसभा सांसद रहे। इन्होंने सहकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। किसानों की 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम' में संशोधन का सबसे पहला प्रयास इनका ही था। किसानों की बात संसद में कहने के लिए दिगम्बर सिंह प्रसिद्ध थे। राजा महेन्द्र प्रताप, मनीराम बागड़ी और राजा मानसिंह जैसे नेताओं को इन्होंने लोकसभा चुनावों में हराया था। लगभग 25 वर्ष ये 'मथुरा ज़िला सहकारी बैंक' के अध्यक्ष रहे। मथुरा में 'आकाशवाणी' की स्थापना करवाने का श्रेय इन्हें ही जाता है।



आज चौधरी दिगम्बर सिंह जी की 105वीं जयंती पर हम सभी उनको शत शत नमन करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शुक्रवार, 8 जून 2018

सपने हैं ... सपनो का क्या - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

पत्नी: मैं आठ दिनों के लिए मायके जा रही हूँ। मुझे मालूम है कि तुम्हें खाना बनाना नहीं आता और रात का खाना तुम्हें ताजा और गर्म चाहिए। इसीलिए मैंने अपनी सहेली स्वाति को बोल दिया है कि, वो रात में आकर खाना बना दिया करे। अगर रात में उसे देर हो गई तो वो यहीं रह जाएगी और सुबह तुम्हारा चाय, नाश्ता और टिफिन बनाकर ही अपने घर जाएगी।

इसी प्रकार अगर कभी बोरियत महसूस करो तो, सामने बिल्डिंग में रहने वाली स्मिता को फोन करना, वो आ जाएगी गप्पें मारने, मैंने उसे भी बोल दिया है, वैसे तो वो खुद के घर में एक काम नहीं करती, यहाँ आकर तुम्हें कंपनी तो देगी।

मैं नहीं हूँ सोचकर रोज भी पियोगे तो प्रॉब्लम नहीं है, भैया ने तुम्हें जो स्कॉच व्हिस्की की बॉटल दिए थे, वो टीवी के पास ही रखी है। कंपनी देने के लिए पड़ोसी शर्मा जी और भाभी को बुला लेना, वैसे तो वो मियाँ-बीवी रस्ता ही देखते रहते हैं, बुलावे का, लेकिन तुम लिमिट में ही पीना।

ऐसी बीवी हिमालय पर दस साल तपस्या करने के बाद भी नहीं मिलती!

सपने हैं सपनो का क्या?

सादर आपका
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फूफा जी का डांस

Anshu Mali Rastogi at चिकोटी

मुक्त सदा जो मन तनाव से

सुनो...

Rewa tibrewal at प्यार

सफ़ेद मछली

sadhana vaid at Sudhinama

आईने में दरार पड़ चुकी है

व्यथा

Meena Sharma at चिड़िया

दहलीज़ पर कालिदास

छठवांवेद ---------mangopeople

anshumala at mangopeople

दशरथ मांझी की राह चला एक और मांझी

Kavita Rawat at KAVITA RAWAT

डर है तो इंसान है , वर्ना हैवान है ...

डॉ टी एस दराल at अंतर्मंथन

अंतिम विदा

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी at palash "पलाश"

सेना और राष्ट्र का गौरव खंडित हुआ कश्मीर में सीज फॉयर से

विकेश कुमार बडोला at हरिहर

Meenakshi Temple , Madurai

Naresh Sehgal at Dreams of Kailash

संविधान ...खतरे में।।

९ वीं बरसी पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

शिवम् मिश्रा at बुरा भला
 
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 अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 7 जून 2018

उपग्रह भास्कर एक और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
आज, 7 जून का दिन भारतीय उपग्रहों के सन्दर्भ में यादगार दिन है. इसी दिन भास्कर एक प्रक्षेपित किया गया था. भास्कर एक और भास्कर दो उपग्रह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा निर्मित दो उपग्रह थे. इन उपग्रहों को भारत के पहले कम कक्षा पृथ्वी अवलोकन उपग्रह श्रृंखला हेतु निर्मित किया गया था. इनके माध्यम से टेलीमेटरी, समुद्र विज्ञान और जल विज्ञान पर आंकड़े जुटाए गए. भास्कर एक, जिसका वजन 444 किलोग्राम था, वर्ष 1979 को सोवियत राकेट इंटरकॉसमॉस प्रक्षेपण यान से प्रक्षेपित किया गया था. इसमें 600 नैनोमीटर और 800 नैनोमीटर के दो कैमरों के द्वारा जल विज्ञान, वानिकी और भूविज्ञान से संबंधित आँकड़े एकत्र किये गए थे. इस उपग्रह ने समुद्र और भूमि की सतह का डेटा प्रदान किया था. इसके बाद 20 नवम्बर 1981 को भास्कर दो को प्रक्षेपित किया गया था. 



भास्कर - एक
मिशन
प्रायोगिक सुदूर संवेदन
भार
442 कि.ग्रा.
ऑनबोर्ड पॉवर
47 वॉट्स
संचार
वीएचएफ़ बैंड
स्थिरीकरण
प्रचक्रण स्थिरीकृत (प्रचक्रण अक्ष नियंत्रित)
नीतभार
टीवी कैमरा, तीन बैंड माइक्रोवेव रेडियोमीटर (एसएएमआईआर)
प्रमोचन दिनांक
7 जून, 1979
प्रमोचन स्थल
वोल्गोगार्ड प्रमोचन केन्द्र (संप्रति रूस में)
प्रमोचन यान
सी-1 इंटर कॉसमॉस
कक्षा
519 x 541 कि.मी.
आनति
50.6°
मिशन कालावधि
एक वर्ष (नामीय)
कक्षीय जीवन
लगभग 10 वर्ष (1989 में पुनःप्रवेश)
स्त्रोत – भारतकोश


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