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मंगलवार, 18 सितंबर 2018

सेल्फी के शौक का जानलेवा पागलपन : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
दूरसंचार तकनीक में आई क्रांति ने घर के किसी कोने में रखे फोन को मोबाइल में बदला और उसी तकनीकी बदलाव ने मोबाइल को बहुतेरे कामों की मशीन बना दिया. विकासशील देश होने के कारण अपने देश में स्मार्टफोन का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. यहाँ मोबाइल को आजकल बातचीत के लिए कम और सेल्फी फोन के रूप में ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है. कम्पनियाँ भी मोबाइल को  सेल्फी के विभिन्न लाभों के साथ बाजार में उतार रही हैं. इस कारण नई पीढ़ी तेजी से इस तरफ आकर्षित हुई है.  इसकी सशक्तता यहाँ तक तो ठीक थी मगर सोशल मीडिया के बुखार ने सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. खुद को अधिक से अधिक प्रचारित, प्रसारित करने के चक्कर में मोबाइल कैमरे का उपयोग सामने वाले की, प्राकृतिक दृश्यों के चित्र खींचने से अधिक सेल्फी लेने के लिए होने लगा है. जगह कोई भी हो, स्थिति कोई भी हो, अवसर कोई भी हो व्यक्ति सेल्फी लेने से चूकता नहीं है. 


ये शौक अब जानलेवा साबित हो रहा है. देश की गंभीर समस्याओं में से एक प्रमुख है मोबाइल कैमरे के द्वारा सेल्फी लेने में दुर्घटना होना. नई पीढ़ी इस जाल में बुरी तरह फँस चुकी है. आज हर कोई रोमांचक, हैरानी में डालने वाली एवं विस्मयकारी सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान की भी परवाह नहीं कर रहा है. कभी ऊंची पहाड़ी की चोटी पर, कभी बीच नदी की धार में, कभी बाइक पर स्टंट करते हुए, कभी ट्रेन से होड़ करते हुए. वे अपनी मनचाही तस्वीरें खींचते हैं और सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर अपने दोस्तों से शेयर करते हैं. इसमें उनमें फैशन और आधुनिक होने के भाव झलकते हैं. यह हरकत इसलिए भी चिंतनीय है क्योंकि ये काम पढ़े-लिखे युवाओं द्वारा किया जा रहा है.
देश में पर्यटन केन्द्रों पर इस तरह के सूचना बोर्ड लगाने का काम तेजी से चल रहा है, जिसमें पर्यटकों से अनुरोध किया गया है कि वे सेल्फी लेते वक्त सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें. इसके बाद भी रोज ही दुर्घटनाएं हो रही हैं. यह समझ से पर है कि खुद को किसलिए, किसके लिए सबसे अलग दिखाने की कोशिश की जाती है? क्यों खतरनाक जगहों पर जाकर स्टंट करते हुए सेल्फी लेने की कोशिश की जाती है? क्यों तेज रफ़्तार बाइक पर, तेज गति से भागती ट्रेन पर सेल्फी लेकर खुद को क्या सिद्ध किया जाता है? इस तरह की जानलेवा हरकतों को सिवाय पागलपन के कुछ नहीं कहा जा सकता है. इस पागलपन को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता है. मोबाइल जिस काम के लिए बना है उसके लिए ही अधिकाधिक उपयोग किये जाने की आवश्यकता है. अन्यथा की स्थिति में यह पागलपन लगातार घरों के चिरागों को बुझाता रहेगा.

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सोमवार, 17 सितंबर 2018

विश्वकर्मा जयंती और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
भगवान विश्वकर्मा
विश्वकर्मा जयन्ती सनातन परंपरा में पूरी धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। इस दिन औद्योगिक क्षेत्रों, फैक्ट्रियों, लोहे, मशीनों तथा औज़ारों से सम्बंधित कार्य करने वाले, वाहन शोरूम आदि में विश्वकर्मा की पूजा होती है। इस अवसर पर मशीनों और औज़ारों की साफ-सफाई आदि की जाती है और उन पर रंग किया जाता है। विश्वकर्मा जयन्ती के अवसर पर ज़्यादातर कल-कारखाने बंद रहते हैं और लोग हर्षोल्लास के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते है। विश्वकर्मा हिन्दू मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवताओं के शिल्पी के रूप में जाने जाते हैं।


आप सभी को विश्वकर्मा जयंती की बहुत बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 16 सितंबर 2018

एक टाँग वाला बगुला - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक बार एक शिकारी अपने नौकर के साथ शिकार पर गया। वहाँ उन्होंने पानी में एक जंगली बगुला देखा।

नौकर एक दम से चिल्लाया, "मारिये साहब, वो एक टाँग वाला बगुला है, उड़ नहीं पायेगा।"

शिकारी ने मुस्कुराते हुए हुश किया और बगुले ने अपनी दूसरी टाँग निकाली और उड़ने लगा। शिकारी ने तुरंत उसे गोली मार दी।

जब नौकर ने शाम को बगुले को पकाया तो उसका मन हुआ कि उसका स्वाद चख लिया जाये। उसे इतना स्वादिष्ट लगा कि वो पूरी टाँग खा गया।

खाने के वक़्त शिकारी ने देखा कि बगुले की एक टाँग गायब है। लेकिन खाने के समय मूड ना बिगड़े इसलिए शिकारी ने चुप-चाप खाना खा लिया। खाना खत्म करने के बाद शिकारी ने अपने नौकर से पूछा कि तुमने जो बगुला पकाया था, उसकी एक टाँग गायब थी।

नौकर ने झट से उत्तर दिया, "नहीं साहब, अगर आप सुबह की तरह हुश करते तो वो अपनी दूसरी टाँग भी निकाल लेता!"

सादर आपका 

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सबका साथ सबका विकास

ये कैसा शहर है..💐

आँख खुली रखना जागना नहीं है, जागरुक होना जागना है.

हरे जिल्द वाली किताब

इमेज को आइकॉन में कन्वर्ट करें इन 5 तरीकों से

रचना प्रक्रिया और विचारधारा

उसने कहा था.....पण्डित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

हिन्दी दिवस और हिन्दी

बह जाते हैं नीर

इन्द्राक्षी दास की कविताएँ

भारतीय वायु सेना के मार्शल अर्जन सिंह जी की प्रथम पुण्यतिथि

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अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!! 

शनिवार, 15 सितंबर 2018

ध्यान की कला भी चोरी जैसी है

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

झेन कथा है, एक बहुत बड़ा चोर था। जब वह बूढ़ा हुआ तो उसके बेटे ने कहा कि अब मुझे भी अपनी कला सिखा दें। क्योंकि अब क्या भरोसा?

वह चोर इतना बड़ा चोर था कि कभी पकड़ा नहीं गया। और सारी दुनिया जानती थी कि वह चोर है। उसकी खबर सम्राट तक को थी। सम्राट ने उसे एक बार बुला कर सम्मानित भी किया था कि तू अदभुत आदमी है। दुनिया जानती है, हम भी जानते हैं, कि तू चोर है। तूने कभी इसे छिपाया भी नहीं, लेकिन तू कभी पकड़ाया भी नहीं। तेरी कला अदभुत है।

तो बूढ़े बाप ने कहा कि यह कला तू जानना चाहता है, तो सिखा दूंगा। कल रात तू मेरे साथ चल। वह कल अपने लड़के को ले कर गया। उसने सेंध लगायी। लड़का खड़ा देखता रहा। वह इस तरह सेंध लगा रहा है, इतनी तन्मयता से, कि कोई चित्रकार जैसे चित्र बनाता हो, कि कोई मूर्तिकार मूर्ति बनाता हो, कि कोई भक्त मंदिर में पूजा करता हो, ऐसी तन्मयता, ऐसा लीन। इससे कम में काम भी नहीं चलेगा। वह मास्टर थीफ था। वह कोई साधारण चोर नहीं था। सैकड़ों चोरों का गुरु था।

लड़का कंप रहा है खड़ा हुआ। रात ठंडी नहीं है, लेकिन कंपकंपी छूट रही है। उसकी रीढ़ में बार-बार घबड़ाहट पकड़ रही है। वह चारों तरफ चौंक-चौंक कर देखता है। लेकिन बाप अपने काम में लीन है। उसने एक बार भी आंख उठा कर यहां-वहां नहीं देखा। चोरी की सेंध तैयार हो गयी, बाप बेटे को ले कर अंदर गया। बेटे के तो हाथ-पैर कंप रहे हैं। जिंदगी में ऐसी घबड़ाहट उसने कभी नहीं जानी। और बाप ऐसे चल रहा है, जैसे अपना घर हो। वह बेटे को अंदर ले गया, उसने दरवाजे के ताले तोड़े। फिर एक बहुत बड़ी अलमारी में, वस्त्रों की अलमारी में, उसका ताला खोला और बेटे को कहा कि तू अंदर जा। बेटा अलमारी में अंदर गया। बहुमूल्य वस्त्र हैं, हीरे-जवाहरात जड़े वस्त्र हैं।

और जैसे ही वह अंदर गया, बाप ने ताला लगा कर चाबी अपने खीसे में डाली। लड़का अंदर! चाबी खीसे में डाली, बाहर गया, दीवाल के पास जा कर जोर से शोरगुल मचाया, चोर! चोर! और सेंध से निकल कर अपने घर चला गया। सारा घर जाग गया, पड़ोसी जाग गए। लड़के ने तो अपना सिर पीट लिया अंदर कि यह क्या सिखाना हुआ? मारे गए! कोई उपाय भी नहीं छोड़ गया बाप निकलने का। चाबी भी साथ ले गया। ताला भी लगा गया। घर भर में लोग घूम रहे हैं। सेंध लग गयी है और लोग देख रहे हैं, पैर के चिह्न हैं। नौकरानी उस जगह तक आयी जहां अलमारी में चोर बंद है।

उसे कुछ नहीं सूझ रहा, क्या करें। बुद्धि काम नहीं देती। बुद्धि तो वहीं काम देती है अगर जाना-माना हो, किया हुआ हो। बुद्धि तो हमेशा बासी है। ताजे से बुद्धि का कोई संबंध नहीं। यह घटना ऐसी है, इतनी नयी है, कि न तो कभी की, न कभी सुनी, न कभी पढ़ी, न कभी किसी चोर ने पहले कभी की है कि शास्त्रों में उल्लेख हो। कुछ सूझ नहीं रहा। बुद्धि बिलकुल बेकाम हो गयी। जहां बुद्धि बेकाम हो जाती है, वहां भीतर की अंतस-चेतना जागती है।
अचानक जैसे किसी ऊर्जा ने उसे पकड़ लिया। और उसने इस तरह आवाज की जैसे चूहा कपड़े को कुतरता हो। यह उसने कभी की भी नहीं थी जिंदगी में, वह खुद भी हैरान हुआ अपने पर। नौकरानी चाबियां खोज कर लायी, उसने दरवाजा खोला, और दीया ले कर उसने भीतर झांका कि चूहा है शायद!

जैसे उसने दीया ले कर झांका, उसने दीए को फूंक मार कर बुझाया, धक्का दे कर भागा। सेंध से निकला। दस-बीस आदमी उसके पीछे हो लिए। बड़ा शोरगुल मच गया। सारा पड़ोस जग गया। वह जान छोड़ कर भागा। ऐसा वह कभी भागा नहीं था। उसे यह समझ में नहीं आया कि भागने वाला मैं हूं। जैसे कोई और ही भाग रहा है। एक कुएं के पास पहुंचा, एक चट्टान को उठा कर उसने कुएं में पटका। उसे यह भी पता नहीं कि यह मैं कर रहा हूं। जैसे कोई और करवा रहा है। चट्टान कुएं में गिरी, सारी भीड़ कुएं के पास इकट्ठी हो गयी। समझा कि चोर कुएं में कूद गया।

वह झाड़ के पीछे खड़े हो कर सुस्ताया। फिर घर गया। दरवाजे पर दस्तक दी। उसने कहा, आज इस बाप को ठीक करना ही पड़ेगा। यह सिखाना हुआ? अंदर गया। बाप कंबल ओढ़े आराम से सो रहा है। उसने कंबल खींचा और कहा कि क्या कर रहे हो? वह तो घुर्राटे ले रहा था। उसने जगाया। उसने कहा कि यह क्या है? मुझे मार डालना चाहते हैं? बाप ने कहा, तू आ गया, बाकी कहानी सुबह सुन लेंगे। मगर तू सीख गया। अब सिखाने की कोई जरूरत नहीं। बेटे ने कहा, कुछ तो कहो। कुछ तो पूछो मेरा हाल। क्योंकि मैं सो न पाऊंगा। तो बेटे ने सब हाल बताया कि ऐसा-ऐसा हुआ।

बाप ने कहा, बस! तुझे कला आ गयी। तुझे आ गयी कला, यह सिखायी नहीं जा सकती। लेकिन तू आखिर मेरा ही बेटा है। मेरा खून तेरे शरीर में दौड़ता है। बस, हो गया। तुझे राज मिल गया। क्योंकि चोर अगर बुद्धि से चले तो फंसेगा। वहां तो बुद्धि छोड़ देनी पड़ती है। क्योंकि हर घड़ी नयी है। हर बार नए लोगों की चोरी है। हर मकान नए ढंग का है। पुराना अनुभव कुछ काम नहीं आता। वहां तो बुद्धि से चले कि उपद्रव में पड़ जाओगे। वहां तो अंतस-चेतना से चलना पड़ता है।

झेन फकीर इस कहानी का उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं, ध्यान की कला भी चोरी जैसी है। वहां इतना ही होश चाहिए। बुद्धि अलग हो जाए, सजगता हो जाए। जहां भय होगा, वहां सजगता हो सकती है। जहां खतरा होता है, वहां तुम जाग जाते हो। जहां खतरा होता है, वहां विचार अपने-आप बंद हो जाते हैं।

ओशो, एक ओंकार सतनाम(प्रवचन-20)

सादर आपका
शिवम् मिश्रा

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अपने ब्लॉग पोस्टस को व्यवस्थित कैसे करें?

कविता : हिंदुस्तान में पली बड़ी है हिंदी

श्रीगणेशजी विघ्नों के नाशक नहीं नाथ हैं

फेवरेट सिनेमा- जापानीज़ वाइफ

मेरा अस्तित्व

किट्टू एक खोज !

क्षितिज

तेरे मेरे मन के नगर क्षितिज के पार होंगे...

जन्मदिवस हिंदी

*हिन्दी फिल्मों के गायक कलाकार*

आतंकवाद क्या है?

मत छुओ इन पलकों को

हिंदी दिमाग को चुस्त बनाती है

मेरी प्यारी बेटी

सफ़र ब्लॉग का ......

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

हिन्दी दिवस की सच्चाई



सौ वर्षों की जो गुलामी हमें मिली थी, वह हमारा ही लोभ था, लोभ के नशे में धुत्त हम गुलाम हो गए, फिर कुछ लोग, फिर बहुत लोग देश की स्वतंत्रता के लिए उठे, शहीद हुए ... तब लोग कहते थे, इतनी आसान नहीं आज़ादी ! युवा पीढ़ी का गर्म खून है और कुछ नहीं ... लेकिन आज़ादी की सुबह एक दिन हुई, आज़ाद सूरज निकला , वन्दे मातरम की गूंज से शहीदों की आत्मा को तर्पण मिला ।
सोच हमारी, भाषा की जानकारी और रुआब में फर्क नहीं कर पाए, अंग्रेजी को घर की भाषा बनाते बनाते हम हर कुर्बानी को शर्मिंदा कर गए ! 
जड़ों की आब अभी बाकी है,
युवाओं का गर्म खून बाकी है,
फिर से एक युद्ध है, 
जिसके लिए यह हिन्दी दिवस है ।
हम कब तक दूसरे देश की मातृभाषा के आगे अपनी मातृभाषा को किनारे रखेंगे, यह तो तय नहीं, पर युद्ध जारी है, प्रश्न मत उठाइये, निष्ठा से इस दिन को मनाइए और घर में बच्चों से हिन्दी में बात कीजिये । 

डायरी के पन्नों से: हिंदी दिवस पर शुभकामनायें


भाषा, अक्षर, लिपि आदि सिर्फ़ अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, एक संस्कृति का आइना भी होते हैं जनाबे -आली, एक भाषा के लिए दूसरी का अपमान करके या एक के सामने दूसरी को हीन समझकर आप अपनी संस्कृति और संस्कार का ही प्रदर्शन करते हैं।
तो यदि आप आने वाले समय में अपने आप को एक सभ्य और सुशिक्षित समाज का एक इंसान कहलवाना चाहते हैं तो अपनी भाषा का सम्मान करना सीखिए और दूसरी का अपमान ना करिए। वरना आने वाली पीढ़ी आपको जाहिल, बेग़ैरत और कूपमंडूक कहेगी।
(शिखा बाबी का सब भाषाओं का शुक्र मनाने वाला शुक्रवारीय ज्ञान)
सुबह से हिंदी पर लिखने को जाने क्या-क्या घुमड़ा मन में लेकिन हिंदी दिवस की कार्यालयीन व्यस्तता में सब धुल-पुछ गया।
फ़िलहाल बस यह कि हिंदी के अपने अलग ही संघर्ष हैं। यह घर-घर में बोली जा रही लेकिन सम्मानित वह है जिसके घर में नहीं बोली जा रही।
इसकी पीड़ा यह है कि इस भाषा का प्रचार-प्रसार जिस माध्यम से सबसे अधिक माना जा रहा उस बॉलीवुड के सितारे मूवी रिलीज़ होने के पहले ही इंग्लिश ट्यूटर रख लेते हैं कि कहीं हिंदी में साक्षात्कार देने से बेइज्जती ना हो जाये।
वह जिस राज्य में लागू होने के लिए सबसे अधिक संघर्ष कर रही है वहाँ ऐसा शायद कोई ही बन्दा हो जिसे राज्य के बाहर सम्पर्क के लिए हिंदी ना आती हो या हिंदी फिल्में ना देखता हो।
वह आज के दिन भी राष्ट्र भाषा नहीं, राजभाषा के रूप में ही मनोनीत की गई थी और 15 वर्ष बाद पूर्ण रूप से राजकाज की भाषा बना दिये जाने का सपना 1963 में दिखाया गया था उसे लेकिन 2017 में भी पूरा नहीं हुआ है। (अब तो 2018 हो गया)
आप मत मनाइए हिंदी दिवस क्योंकि आपके लिए हिंदी एक दिन तक सीमित नहीं।
एक दिन तक तो सीमित मेरे लिए भी नहीं क्योंकि घर में रोटी, समाज में इज्जत सब हिंदी से ही है लेकिन मैंने मनाया हिंदी दिवस क्योंकि मुझे पता है कि आज़ादी के दो साल बाद आज के दिन राजभषा का छद्म दर्जा जो उसे मिला है उसके लिए भी उसे पूरे दो दिन विरोध झेलना पड़ा था।
हिंदी के साथ-साथ मेरे मन मे भी यह सपना पलता तो है ही कि कभी सम्पूर्ण रूप से कम से कम राज-काज की भाषा तो बनेगी ही।
शुभेच्छा हिंदी तुम्हारे लिए

#हिंदी जैसी मीठी कौन
हिंदी जैसी बोली कौन
निज भाषा का विस्तार करें
आओ मिलकर हिंदी में बात करें 

हिंदी पुरस्कार शॉर्टकट - सतीश सक्सेना
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हिंदी दिवस पर गुरुघंटालों, चमचों और बेचारे पाठकों को बधाई कि आज हिंदी, साहित्य चमचों के हाथ, जबरदस्त तरीके से फलफूल रही है, बड़े बड़े पुरस्कार पाने के शॉर्टकट तरीके निकाल कर लोग पन्त , निराला से भी बड़े पुरस्कार हासिल कर पाने में समर्थ हो पा रहे हैं !
ज्ञात हो कि हिंदी के तथाकथित मशहूर विद्वान, जो भारत सरकार , राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कृत हैं, सब के सब किसी न किसी आशीर्वाद के जरिये ही वहां तक पंहुच पाए हैं और इसमें उनके घटिया चोरी किये लेखों, रचनाओं का कोई हाथ नहीं !
अधिकतर हिंदी मंचों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष राजनीतिज्ञों की विरुदावली खुश होकर गाते हैं एवं उनके सामने कमर झुका कर खड़े रहने को मजबूर हैं अगर उन्हें आगामी पद्म पुरस्कारों एवं विदेश यात्राओं में अपना नाम चाहिए !
इस सबके लिए कोई नेताओं के बच्चों के विवाह में काव्य पत्र अर्पित कर अपनी जगह बनाता है तो कोई नेता जी का अभिभाषण लेखन पर अपना हस्त कौशल दिखाता है ! नेताजी के खुश होने का नतीजा, हिंदी के अगले वर्ष बंटने वाले पुरस्कार समारोह में, पुरस्कृत होकर मिलता है ! एक बार मंच पर चढ़ने का आशीर्वाद पाकर, यह हिंदी मार्तण्ड पूरे जीवन हर दूसरे वर्ष, कोई न कोई कृपापूर्वक बड़ा पुरस्कार प्राप्त करते रहते हैं एवं मूर्ख मीडिया जिसको भाषा की कोई समझ नहीं इन्हें ही हिंदी का सिरमौर समझ, बार बार टीवी गोंष्ठियों में बुलाकर, हिंदी कविराज, विद्वान की उपाधि से नवाज, इनके प्रभामंडल में इज़ाफ़ा करती रहती है !
हाल में दिए एक विख्यात सरकारी हिंदी मंच की पुरस्कार लिस्ट देख कर हँसी आ गयी, इस एक ही लिस्ट में परमगुरु, महागुरु , गुरु , शिष्य और परम शिष्यों को सम्मान दिया जाना है इन पुराने भांड गवैय्यों को छोड़, एक भी स्वाभिमानी हिंदी लेखक/कवि इनकी नजर में पुरस्कृत होने योग्य नहीं है ...
जब तक इन चप्पल उठाने वाले, धुरंधरों से छुटकारा नहीं मिलता तबतक हिंदी उपहास का पात्र ही रहेगी !
हिंदी पाठकों को मंगलकामनाएं हिंदी दिवस की !
मुझे पता है शक्की युग में
चोरों का सरदार कहोगे !
ज्ञात मुझे है,चढ़े मुखौटों
में, इक तीरंदाज़ कहोगे !
बेईमानों की दुनिया में हम
बदकिस्मत जन्म लिए हैं !
इसीलिए कर्तव्य मानकर
मरते दम तक शपथ लिए हैं
हिंदी की दयनीय दशा का,मातम दिखलाने आया हूँ !
जिसको तुम संभाल न पाए,अक्षयजल
खारा लाया हूँ !

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

अमर शहीद जतीन्द्रनाथ दास की पुण्यतिथि पर नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 13 सितम्बर अमर शहीद जतीन्द्रनाथ दास की पुण्यतिथि है. उनका जन्म 27 अक्टूबर, 1904 को कोलकाता में एक बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था. जब उनकी उम्र नौ वर्ष की थी तभी उनकी माता का निधन हो गया. सन 1920 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और वे महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गए. इस आन्दोलन में वे गिरफ़्तार किये गए और उन्हें छह माह की सज़ा सुनाई गई. इसके बाद जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने आन्दोलन वापस लिया तो निराश जतीन्द्रनाथ आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में भर्ती हो गए. यहाँ उनकी मुलाकात प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई और वे क्रान्तिकारी संस्था हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये. 


सन 1925 में जतीन्द्रनाथ को दक्षिणेश्वर बम कांड और काकोरी कांड के आरोप में गिरफ़्तार कर नज़रबन्द कर दिया गया. जेल में दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने 21 दिन तक भूख हड़ताल की तो उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखकर सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया. जेल से बाहर आकर उन्होंने अपने अध्ययन और राजनीति को जारी रखा. बाद में कांग्रेस सेवादल में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक बनने के दौरान उनकी भेंट सरदार भगत सिंह से हुई. 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके वे इन्हीं के द्वारा बनाये गए थे. 14 जून 1929 को जतीन्द्र गिरफ़्तार कर लिये गए और उन पर लाहौर षड़यंत्र केस में मुकदमा चला. जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से अनशन शुरू कर दिया. जतीन्द्रनाथ भी इसमें शामिल हो गए. जेल अधिकारियों द्वारा इनका अनशन तुड़वाने के लिए जबरदस्ती इनकी नाक में नली डालकर पेट में दूध डालना शुरू किया. इसी जबरदस्ती में नली उनके फेफड़ों में चली गई. उनकी घुटती सांस की परवाह किए बिना एक डॉक्टर ने दूध उनके फेफड़ों में भर दिया. इससे उन्हें निमोनिया हो गया.

इस अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया. कोलकाता में उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग उपस्थित हुए. बुलेटिन परिवार की ओर से उनको हार्दिक नमन.

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बुधवार, 12 सितंबर 2018

वराह जयन्ती और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
वराह अवतार
वराह जयन्ती भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस तिथि को भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था, और हिरण्याक्ष नामक दैत्य का वध किया। भगवान विष्णु के इस अवतार में श्रीहरि पापियों का अंत करके धर्म की रक्षा करते हैं। वराह जयन्ती भगवान के इसी अवतरण को प्रकट करती है। इस जयन्ती के अवसर पर भक्त लोग भगवान का भजन-कीर्तन व उपवास एवं व्रत इत्यादि का पालन करते हैं।


आप सभी को वराह जयन्ती की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

स्वामी विवेकानंद के एतिहासिक संबोधन की १२५ वीं वर्षगांठ

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज से 125 साल पहले 11 सितंबर, 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो पार्लियामेंट आफ रिलीजन में भाषण दिया था, उसे आज भी दुनिया भुला नहीं पाती। इसे रोमा रोलां ने 'ज्वाला की जबान' बताया था। इस भाषण से दुनिया के तमाम पंथ आज भी सबक ले सकते हैं। इस अकेली घटना ने पश्चिम में भारत की एक ऐसी छवि बना दी, जो आजादी से पहले और इसके बाद सैकड़ों राजदूत मिलकर भी नहीं बना सके। स्वामी विवेकाननंद के इस भाषण के बाद भारत को एक अनोखी संस्कृति के देश के रूप में देखा जाने लगा। अमेरिकी प्रेस ने विवेकानंद को उस धर्म संसद की महानतम विभूति बताया था। उस समय अभिभूत अमेरिकी मीडिया ने स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखा था, 'उन्हें सुनने के बाद हमें महसूस हो रहा है कि भारत जैसे एक प्रबुद्ध राष्ट्र में मिशनरियों को भेजकर हम कितनी बड़ी मूर्खता कर रहे थे।' 
यह ऐसे समय हुआ, जब ब्रिटिश शासकों और ईसाई मिशनरियों का एक वर्ग भारत की अवमानना और पाश्चात्य संस्कृति की श्रेष्ठता साबित करने में लगा हुआ था। उदाहरण के लिए 19वीं सदी के अंत में अधिकारी से मिशनरी बने रिचर्ड टेंपल ने 'मिशनरी सोसायटी इन न्यूयार्क' को संबोधित करते हुए कहा था- भारत एक ऐसा मजबूत दुर्ग है, जिसे ढहाने के लिए भारी गोलाबारी की जा रही है। हम झटकों पर झटके दे रहे हैं, धमाके पर धमाके कर रहे हैं और इन सबका परिणाम उल्लेखनीय नहीं है, लेकिन आखिरकार यह मजबूत इमारत भरभराकर गिरेगी ही। हमें पूरी उम्मीद है कि किसी दिन भारत का असभ्य पंथ सही राह पर आ जाएगा।
सादर आपका 
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सोमवार, 10 सितंबर 2018

पं. गोविंद बल्लभ पंत और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
गोविंद बल्लभ पंत
गोविंद बल्लभ पंत (अंग्रेज़ी: Govind Ballabh Pant, जन्म:10 सितम्बर 1887; मृत्यु: 7 मार्च, 1961) उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी थे। इनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 15 अगस्त, 1947 से 27 मई, 1954 तक रहा। बाद में ये भारत के गृहमंत्री भी (1955 -1961) बने। भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने और जमींदारी प्रथा को खत्म कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। भारत रत्न का सम्मान उनके ही गृहमन्त्रित्व काल में आरम्भ किया गया था। बाद में यही सम्मान उन्हें 1947 में उनके स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान देने, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा भारत के गृहमंत्री के रूप में उत्कृष्ट कार्य करने के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद द्वारा प्रदान किया गया।


आज पं. गोविंद बल्लभ पंत जी के 131वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।  

रविवार, 9 सितंबर 2018

पुलिस और पत्नी में समानताऐं

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

क्या आप जानते है कि पुलिस और पत्नी में कुछ समानताऐं  पाई जाती हैं ... आइये आपको बताते हैं ...

1. ना इनकी दोस्ती अच्छी और ना ही दुश्मनी।

2. इनसे बनाकर रखना मजबूरी है।

3. इनका पता नहीं कब बिगङ जाऐं।

4. अगर ये प्यार से बात करे तो अलर्ट हो जाऐं।

5. दोंनों ही खतरनाक धमकी देते हैं।

6. इनसे बहस में जीतना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

7. ये पहला हिसाब याद रखते हैं।

8. अपने राज कभी नहीं खोलते।

9. इनको जबरदस्ती तारीफ चाहिए।

10. इनसे पंगा लेना खतरनाक साबित हो सकता है।

11. विरोध मौका देखकर करते हैं।

12. सुन भले ही लें आपकी लेकिन करेंगे मन की ही।

13. ये दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं।

14. प्यार में लेकर भी वार करते हैं।

15. दोंनों ही रौब से काम लेते हैं।

16. अपना राज इन्हें बताना खतरनाक साबित हो सकता है।

17. इनकी नजर जेब पर ही रहती है।


इन के अतिरिक्त यदि आप को भी कोई समानता दिखे तो कृपया बतावें |

सादर आपका
शिवम् मिश्रा

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पहले स्वयं को जाँच ले की हम कितने प्राकृतिक कर्म करतें हैं --------mangopeople

मोल्ठी #2 :बस्ग्याल तभी मनेलु जब छोया फुट्ला(बरसात तभी मानी जायेगी जब छोया फूटेंगे)

खामोशियों की जुबान

सखी री मैं उनकी दिवानी

अमर शहीद कैप्टन विक्रम 'शेरशाह' बत्रा जी की ४४ वीं जयंती

घुटने के दर्द ,सूजन से मुक्ति के उपाय

428. भाषा

दिवालिया दिल

खमोशी : हलचल

गिरकर उठने का सुख !

धिना धिन धा !!

ज़िन्दगी आग हैं पानी डालते रहिये

" ज़िंदगी का तर्जुमा ....."

सुनो मेरे मन मितवा

बंधन

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

शनिवार, 8 सितंबर 2018

साक्षरता दिवस सिर्फ कागजों में न रहे - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
आज, 8 सितम्बर को अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस (International Literacy Day) मनाया जाता है. आज के समय में शिक्षा का महत्त्व सभी लोग जानते हैं. शिक्षा के बिना किसी तरह से विकास सम्भव नहीं. देखा जाये तो शिक्षा हमारे जीवन का अनिवार्य अंग है. इसी कारण से सरकार सर्वशिक्षा अभियान चलाकर प्रत्येक व्यक्ति को साक्षर बनाने के लिए विभिन्न योजनायें संचालित कर रही है. यह अपने आपमें सत्य है कि जब देश का हर नागरिक साक्षर होगा तभी देश विकास करेगा.


साक्षरता का तात्पर्य सिर्फ़ पढ़ना-लिखना ही नहीं बल्कि यह सम्मान, अवसर और विकास से जुड़ा विषय है. शिक्षा और ज्ञान को बेहतर जीवन जीने का एक विशेष अंग माना जाता है. निरक्षरता किसी भी देश के विकास में बाधा होती है. साक्षरता दिवस का प्रमुख उद्देश्य नव साक्षरों को उत्साहित करना है. अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस हमारे लिये अहम दिवस है, क्योंकि हमारे जीवन में शिक्षा का बहुत अधिक महत्त्व है. आज के दिन सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि देश का, समाज का प्रत्येक व्यक्ति साक्षर बने.

इस संकल्प के साथ कि हम अपने आसपास के किसी एक ही व्यक्ति को साक्षर बनायेंगे, आज की बुलेटिन की तरफ बढ़ते हैं.

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शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

कौन लिख रहा इतनी किताबें ?




जीवन-मृत्यु,
आरम्भ,मध्य,समापन में, 
संगीत में घुले-पाँच तत्व,
आराध्य,आराधक,
किसने निर्धारित किया?
ये अदृश्य होकर 
कौन लिख रहा इतनी किताबें ?
कुछ अधूरी,कुछ पूरी !
... ऐ लेखक,
मैं तुमसे मिलना चाहूँगी,
ढेर सारी बातों के मध्य,
एक बार बस एक बार,
तुमको छूना चाहूँगी !

रश्मि प्रभा

लेखागार