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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

इंटरनेट माध्यमों की नश्वरता : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
क्षणभंगुर जीवन की कलिका, काल प्रात को जाने खिली न खिली, ये पंक्ति बचपन से सुनते आ रहे हैं. इसी के साथ बताया जाता रहा कि ये जीवन नश्वर है, एक न एक दिन मिट्टी में मिल जाना है, समाप्त हो जाना है. बचपन में तो इसके अर्थ, सन्दर्भ, प्रसंग समझ-रट लिया करते थे मगर इसका यथोचित भावार्थ उम्र बढ़ने के साथ हुआ. जीवन की नश्वरता देखी भी, समझी भी, एहसास भी की. जीवों के जीवन की नश्वरता की तरह वे सभी तत्त्व नश्वर ही कहे जा सकते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में जीवन है. 


यही नश्वरता कुछ समय से अन्य दूसरे तत्त्वों में भी दिखाई देने लगी है. एक क्षण को यह हास्य का विषय हो सकता है किन्तु गंभीरता से देखा जाये तो इसके प्रति सजग-सचेत रहने की आवश्यकता है. ठीक उसी तरह जैसे कि हम अपने जीवन के प्रति रहते हैं, स्वास्थ्य के प्रति रहते हैं, शरीर के प्रति रहते हैं, सुरक्षा के प्रति रहते हैं. वर्तमान जीवन में अपनी सशक्त उपस्थिति बना चुके ये तत्त्व अनादिकाल से हमारे साथ नहीं हैं वरन इसी आधुनिक समाज, आधुनिक तकनीक, संचार-क्रांति के उत्पाद हैं. इनको सोशल मीडिया के रूप में, ईमेल के रूप में, विभिन्न वेबसाइट के रूप में, इंटरनेट के बहुत से माध्यमों में बने एकाउंट के रूप में, मोबाइल के रूप में देखा-समझा जा सकता है.

हो सकता है कि आपको आश्चर्य लग रहा हो कि इनके साथ कैसी नश्वरता? इनको लेकर कैसी सजगता? आश्चर्य के बीच शायद आप सबको खबर हो गई होगी कि गूगल प्लस अप्रैल माह के पहले हफ्ते से बंद होने जा रहा है. गूगल की तरफ से जारी एक विज्ञप्ति में विस्तार से इसके बारे में बताया गया है. यदि स्मरण हो तो ऐसा ही कुछ सालों पहले ऑरकुट के साथ भी हुआ था. कुछ ईमेल सुविधा देने वाले माध्यम भी अब उतने उपयोग में नहीं हैं जितने कि किसी दौर में हुआ करते थे. बीच-बीच में व्हाट्सएप्प को लेकर भी ऐसी आशंकाएँ, खबरें सामने आती रहीं किन्तु वह अभी तक हम सबके बीच जीवित है. इन सबके अलावा ब्लॉग एग्रीगेटर भी समय-समय पर इस तकनीकी संसार से मिटते गए. बहुत से ब्लॉग , वेबसाइट भी काल-कलवित होते गए.

एक दृष्टि से देखा जाये तो हमारे अधिकार-क्षेत्र में होने के बाद भी इन सभी माध्यमों पर मालिकाना हक़ किसी और का होता है. उत्पाद के न चलने, उपभोक्ताओं के मध्य प्रसिद्द न होने की दशा में उसके बंद किये जाने का निर्णय उसी मालिक का होता है. ऐसे में सजगता इतनी बनाये रखनी है कि जो भी सामग्री आप अपने किसी भी माध्यम पर शेयर कर रहे हैं वह आपके पास किसी न किसी माध्यम में सुरक्षित रहनी चाहिए. ताकि आपातकाल की स्थिति में आप उसका उपयोग कर सकें. इसके अलावा किसी भी माध्यम पर निर्भरता इतनी नहीं होनी चाहिए कि वही आपका जीवन समझ आने लगे. ऐसा होना वर्तमान में तो स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल ही रहा होगा, उसका पूर्णतः बंद होना मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. हालाँकि इनके जीवन की साँस बंद होने के पहले, इनका जीवन समाप्त होने के पहले इनके उपभोगकर्ताओं को पर्याप्त सूचना-समय प्रदान किया जाता है फिर भी किसी भी जीव-तत्त्व के जीवन की नश्वरता की तरह इन तकनीक तत्त्वों, माध्यमों को भी नश्वर मानते हुए इनके साथ सुरक्षित समय व्यतीत करने की कोशिश की जानी चाहिए.

आपके तमाम सारे एकाउंट, ब्लॉग, वेबसाइट, व्हाट्सएप्प, फेसबुक आदि सालों-साल आपका साथ देते रहें, दीर्घायु हों. इसी कामना के साथ आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है.

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मंगलवार, 17 जुलाई 2018

इमोजी का संसार और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
सोशल मीडिया के इस दौर में उसके सभी मंचों पर इमोजी (Emoji) का प्रयोग बातचीत में खूब हो रहा है. कोई बातचीत बिना इमोजी के पूरी नहीं होती है. इमोजी का आरम्भ जापान से हुआ था. सन 1999 में जापान के डिजायनर शिगेताका कुरिया ने इमोजी का निर्माण किया. वे एक सेलफोन कंपनी में काम किया करते थे. इसी कंपनी के मोबाइल में इस्तेमाल के लिए उन्होंने इमोजी का अविष्कार किया. इमोजी को वैश्विक बाजार में ले जाने का श्रेय एप्पल कंपनी को जाता है. एप्पल ने सन 2007 में अपने i-phone में दो तरह के कीबोर्ड बनाये, जिसमें एक को इमोजी कीबोर्ड के नाम से जाना गया. इसके बाद धीरे-धीरे समूची दुनिया में इमोजी प्रसिद्द होने लगा. सन 2013 में एंड्राइड मोबाइल ने भी इमोजी को अपना लिया.


समय गुजरता रहा, इमोजी लोगों की बातचीत में शामिल होता रहा. उसको मिलती लगातार प्रसिद्धि के चलते इमोजिपेडिया नामक वेबसाइट का उदय हुआ. इसमें सभी तरह की इमोजी मिल जाती हैं. कालांतर में सन 2014 में इमोजिपेडिया के संस्थापक जेरेमी बर्ज ने विश्व इमोजी दिवस की शुरुआत की. तभी से प्रतिवर्ष 17 जुलाई को विश्व इमोजी दिवस का आरम्भ हो गया. इस दिन को विश्व इमोजी दिवस के रूप में मनाये जाने का कारण यह है कि इसी दिन एप्पल कंपनी ने अपने i-phone में इमोजी कैलेण्डर लांच किया था. सन 2013 में इमोजी (Emoji) शब्द को ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में शामिल किया गया. यहाँ एक जानकारी और देते चलें कि इमोजी (Emoji) का अर्थ किसी भी रूप में Emotion से नहीं है. असल में यह एक जापानी शब्द है जो e और moji से मिलकर बनाया गया है. जापानी में e का अर्थ Picture से और moji का अर्थ Character से लगाया जाता है. इमोजी के इस्तेमाल को लेकर माना जाता है कि दुनिया भर में प्रतिदिन 600 करोड़ इमोजी का उपयोग सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर किया जाता है.

सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला इमोजी - Face with Tears of Joy

उपयोग के मामले में दूसरे नंबर वाला इमोजी - Smiling Face with Heart-Eyes

इमोजी अब एक नई भाषा के रूप में जन्म ले चुकी है और लगातार वृद्धि भी कर रही है. बातचीत को सहज और आसान बना रही है किन्तु इसी इमोजी का गलत उपयोग नुकसानदेह भी साबित हो सकता है. एक खबर के अनुसार फ़्रांस में एक युवा को तीन माह की कैद की सजा सुनाई गई थी. उसने अपनी गर्लफ्रेंड को पिस्तौल वाली इमोजी भेज दी. जिसके चलते अदालत ने माना कि उस लड़के ने अपनी गर्लफ्रेंड को जान से मारने की धमकी दी है. ऐसी कोई खबर अभी अपने देश में नहीं आई है फिर भी इमोजी का सहज, सरल, सुरक्षित, अर्थपरक इस्तेमाल करते हुए आनंद लीजिये आज की बुलेटिन का.  

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शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

सोशल मीडिया पर हम सब हैं अनजाने जासूस : ब्लॉग बुलेटिन

सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होने के कारण आज बहुतायत लोगों द्वारा इसे पसंद किया जा रहा है. कोई भी व्यक्ति सहजता से अपनी बात को वैश्विक स्तर तक पहुँचा रहा है. उसके लिए अब न किसी संस्थान की जरूरत है, न किसी सम्पादक की मनमर्जी का सवाल है. अब व्यक्ति पूरी स्वतन्त्रता के साथ अपने विचारों का प्रकटीकरण कर रहा है. वैचारिक स्वतन्त्रता के इस दौर में जहाँ किसी व्यक्ति को असीमित आसमान मिला है, वहीं निर्द्वन्द्व रूप से एक तरह का घातक हथियार भी उसके हाथ में लग गया है.


लोगों ने अपनी रुचियों को स्थापित करने का रास्ता भी तलाशा है. अव्यवस्थाओं के विरुद्ध एकजुट होना शुरू किया है. सरकार के कार्यों की प्रशंसा हुई तो उसकी बुराई भी की गई है. इसके बाद भी सोशल मीडिया पर मिली यह स्वतन्त्रता अपने साथ एक तरह की बुराई लेकर भी आई है. स्वतन्त्रता के अतिउत्साह में लोग इस तरह की सामग्री को सामने ला रहे हैं जो किसी भी रूप में समाज-हित में नहीं कही जा सकती हैं. सरकार, शासन, प्रशासन से सम्बन्धित लोगों ने इधर-उधर से, गोपनीय ढंग से जानकारी लेकर उसको सोशल मीडिया पर प्रकट करने का कार्य किया है. सरकारी आँकड़ों, खबरों को तोड़मरोड़ कर विकृत, भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है. धर्म, जाति को आधार बनाकर अन्य दूसरे धर्मों, जातियों पर टिप्पणी करने का काम अब इस मंच पर बहुतायत में होता दिखता है. और तो और व्यक्तियों द्वारा अपने जीवन की अंतरंगता को सामने रखा गया. पति-पत्नी के बीच की गोपनीयता को सार्वजनिक किया गया. इन कदमों को भले ही व्यक्तियों की जागरूकता का पैमाना समझा जाने लगा हो किन्तु जानकारी के स्तर पर, सूचनाओं के स्तर पर यह किसी खतरे से कम नहीं है.

हो सकता है कि बहुत से लोगों को ये कपोलकल्पना जैसा लगे किन्तु हम अनजाने अपने देश की, अपने समाज की, अपने परिवार की सूचनाओं को विदेशी हाथों में सहजता से पहुँचा रहे हैं. हम सब मुफ्त मिली स्वतन्त्रता और मुफ्त मिले मंच के द्वारा अनायास ही चित्रों, विचारों, तथ्यों द्वारा जानकारी, सूचना आदि खतरनाक हाथों में देते जा रहे हैं. हम सोशल मीडिया के माध्यम से सहजता से विदेशी मंचों तक सूचना प्रेषित करने में लगे हैं कि हमारे देश में कोई एक वर्ग किसी दूसरे वर्ग के प्रति क्या सोच रखता है. एक जाति के लोग दूसरी जाति के लिए किस तरह की सोच रखते हैं. सोचने वाली बात है कि कहीं हम सब विचाराभिव्यक्ति के अतिउत्साह में स्वयं ही तो सभी सूचनाएँ, जानकारियाँ विदेश तो नहीं भेजे दे रहे? हम सभी को ये विचार करना होगा कि सबकुछ पोस्ट कर देने, प्रचारित कर देने की लालसा में हम विदेशों के लिए जासूसी तो नहीं किए जा रहे? सजग होना, सजग रहना आज के  दौर में अत्यावश्यक है.

शेष तो समझदार सभी हैं. आप सब आनंदित होइए आज की बुलेटिन के साथ.

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गुरुवार, 9 जून 2016

सोशल मीडिया का अनुशासन

सभी मित्रों को देव बाबा की राम राम, आज न्यूयॉर्क में बारिश का मौसम था और ऐसे मौसम में बूँदों की टिप टिप के बीच चाय पकौड़ों का दौर चला। हमारे एक मित्र सपरिवार घर आये और फिर बातचीत के लम्बे सिलसिले के बाद गंभीर सोच में पड़ गया। आइये इस चिंतन से आपको भी अवगत कराता हूँ....

हम सभी लोग आजकल एक अजीब से दौर से गुज़र रहे हैं, आज कल तकनीक से लोग पास आये हैं और ठीक उसी समय इसी तकनीक ने लोगों को दूर भी किया है। यदि समझना मुश्किल हो रहा हो तो फिर एक अजीब सा किस्सा है सुनिए। कोई भी दो पात्र चुनिये, नाम हैं जो मन करे रख लीजिये क्योंकि यह दोनों ही पात्र अपने हर घर में हैं। बहरहाल शर्मा जी और उनकी पत्नी दोनों ही सोशल मीडिया में बहुत सक्रिय हैं, दोनों के जबरदस्त फैन फालोवर हैं और वह दोनों ही इसी सोशल मीडिया के ज़रिये मिले, फिर चैटिंग हुई, फिर मुलाकातों का सिलसिला कई वर्षों तक चला और फिर वैवाहिक सम्बन्ध में दोनों बंध गए। शुरूआती समय में सब कुछ किसी आदर्श परिवार जैसा ही रहा लेकिन धीरे धीरे स्थिति बदलने लगी। शर्माजी जब देखो तब इसी सोशल मीडिया में घुसे रहते, कभी पुर्तगाल के किसी दोस्त को ट्रैवेल प्लान समझाते, तो गुवाहाटी के किसी दोस्त को निवेश का नुस्खा। उनकी पत्नी को बड़ी चिढ़न होती कि शर्मा जी के पास रविवार की शाम को भी चाय साथ पीते समय इस मोबाइल से चिपके रहने की क्या ज़रूरत है। किचन में काम करते समय यदि कोई सलाह लेनी हो तो आवाज़ पर कोई उत्तर नहीं, बच्चे को लेकर कोई विमर्श करना हो तो भी समय का अभाव, पूरा समय फालतू की टिपर पिटर में जा रहा है। धीरे धीरे यह चिढ बढ़ने लगी और शर्मा जी का मोबाइल उनकी पत्नी को किसी सौत की तरह लगता था। कुछ दिनों के बाद शर्मा जी की पत्नी जो खुद ही सोशल मीडिया की चैम्पियन थीं वह अब सबसे किनारा करके खुद को परिवार में व्यस्त रखने लगीं। मैंने यूँ ही एक दिन उनसे बात की तो पाया कि यदि शर्माजी को कोई बात बतानी है तो डाइनिंग टेबल पर भी बोल कर कहने की जगह उनको व्हाट्सप्प पर भेजिए तो जल्दी उत्तर देंगे। अब आप ही बताइये कि मैं क्या करूँ। 

शर्मा जी का परिवार मेरे लिए बहुत घनिष्ठ था सो मुझे लगा इस विषय पर कोई ब्लॉग पोस्ट लिखना शायद अधिक श्रेयस्कर होगा। 

मित्रों हम सभी आजकल की आपाधापी में भी सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय हैं और यह फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम ने यकीनन सूचना के क्षेत्र में एक क्रांति ला दी है। यहाँ समस्या यह सोशल मीडिया की साइट्स नहीं बल्कि हमारा उनके प्रति रवैया है। यह ज़िन्दगी का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन कितना महत्त्व देना है और उनसे कितना संभलकर रहना है यह बहुत ज़रूरी है। जब तक आप उसे चला रहे हैं ठीक है लेकिन यदि वह आपको चला रहा है तब समझिए खतरे की घंटी है। 

क्या आप दिन रात मोबाइल से चिपके रहते हैं यहाँ तक की सोते समय भी मोबाइल अपने सिराहने रखते हैं? यदि हाँ तो फिर समझिए सलाह नंबर-1 की मोबाइल को दूर रखिये। मैं इस तरीके को बहुत अचूक मानता हूँ क्योंकि सुबह का अलार्म बजने पर मुझे उठना ही पड़ता है। इससे समय पर उठ जाने पर योग, व्यायाम और तैयार होने का समय भी मिल जाता है। 

हर मैसेज और सवाल या स्टेटस पर तुरंत उत्तर देना ज़रूरी नहीं और आपके परिवार का समय अधिक जरुरी है, बच्चे के साथ खेलिए, बाहर जाइये कोई शौक को पूरा कीजिये जैसे कि फोटोग्राफी, कोई वाद्ययंत्र बजाना सीखिए कुछ भी कीजिये लेकिन खुद को किसी सकारात्मक चीज में व्यस्त कीजिये।
जहाँ तक हो सके मोबाइल के इस्तेमाल में कोई खुद पर ही अनुशासन रखिये, याद रखिये बड़ा होने पर आपका बच्चा यह कभी नहीं बोलेगा की तुमने जबरदस्त स्टेटस लिखे थे लेकिन वह यह ज़रूर बोलेगा कि पापा तुम्हारे पास तो मेरे लिए समय ही नहीं था। ठीक यही हाल बुजुर्गों के प्रति रवैये के लिए भी है। मूर्खता की ऐसी हद है कि साल भर अपने बाप का हाल न पूछने वाला बेटा फादर्स-डे की फोटो शेयर करता है और उसे हज़ारो लाइक मिलते हैं। समझने की बात है कि सेव-दी-टाइगर की फोटो शेयर करने से जंगल में शेर सुरक्षित नहीं हो जाते, ग्लोबल वार्मिंग की फोटो शेयर करने से ग्लेसियर पिघलना बंद नहीं होते। 

समझ कर देखिये, शायद थोड़े से सोशल मीडिया के अनुशासन से आपकी ज़िन्दगी थोड़ी संभल जाए। 

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बुधवार, 19 मार्च 2014

ट्विटर और फेसबुक पर चुनावी प्रचार - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दल अपने प्रचार के लिए ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं। यह देखते हुए चुनाव आयोग ने इन साइटों पर विज्ञापन जारी करने के लिए राजनीतिक दलों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया है। इनमें यह भी कहा गया है कि विज्ञापन जारी करने से पहले उन्हें उसका विषय वस्तु सही है या नहीं इसका प्रमाण पत्र लेना होगा।
आयोग ने इन सोशल नेटवर्किंग साइटों को कहा है कि वे राजनीतिक दलों और किसी प्रत्याशी द्वारा विज्ञापन पर किए गए खर्च का ब्योरा रखें ताकि आयोग को जब जरूरत पड़े तो उन्हें पेश कर सकें। प्रमुख सोशल नेटवर्किंग साइटों को मंगलवार को लिखे अलग-अलग पत्र में आयोग ने उन्हें यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान उनके द्वारा जो जारी की गई सामग्री गैर कानूनी या दुर्भावनापूर्ण या आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। कहा गया है कि सोशल मीडिया को जो दिशा निर्देश जारी किया गया है वह पेड न्यूज की समस्या पर लगाम लगाने के आयोग के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी प्रचार नीति के तहत खासकर युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए फेसबुक और ट्विटर का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया था।
इस खबर को पूरा पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ |

अब देखना यह है कि प्रमुख राजनीतिक दल अपनी प्रचार नीति बनाते समय आयोग के निर्देशों का कितना ख़्याल रखते है !!

सादर आपका
शिवम मिश्रा
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बज गयी दुंदुभी, सज गये महारथी

गुजरी तारीख

मध्य मार्ग

आखिर क्यों ?

कुकिंग ऑयल और टमाटर सॉस में मिलावट

यह भी तो ज़रूरी है न !

ओस मेँ भीगी औरत

मोबाइल से टेस्ट पोस्ट

शैतानों की दुनिया में ... साधू बन कर जीना.. क्या समझदारी है??

MH370 विमान में लापता हुए लोगों के लिए मंगलकामना करता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया'

काहे रिसइलू

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

कैसे कैसे लोग ???

नमस्कार दोस्तों 

सबसे पहले आप सबसे माफ़ी चाहूँगा कि पिछले दो दिन १५ - १६ दिसम्बर को बुलेटिन आप तक नहीं पहुँच पाई | कुछ तकनीकी कारणों के चलते बुलेटिन लगा पाने में असमर्थ रहे | खैर चलिए आज बहुत समय बाद बुलेटिन लगाने का अवसर प्राप्त हुआ है | पिछले दिनों रश्मि दी ने जो अवलोकन कर पोस्ट लगाई वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण रहीं | उनके अवलोकन के कारण सभी को बहुत हौसला प्राप्त हुआ | अपनी-अपनी लेखनी में और ज्यादा परिपक्वता लाने और सुधार करने का भी मौका मिलेगा | आज आप सभी के साथ मैं अपना एक निजी अनुभव साँझा करना चाहता हूँ | उम्मीद करता हूँ आप सबके विचार और बहुमूल्य टिप्पणियां ज़रूर प्राप्त होंगी | 


अभी हाल ही में एक बहुत ही गहन अनुभव हुआ | जीवन में हम सब को बहुत से उतार चढ़ाव और विषम परिस्थितियों से गुज़ारना पड़ता है | ऐसी परिस्थियों में हमें अपना संयम बनाये रखने की आवश्यकता होती है | अपनी बुद्धि, विवेक और चेतना के सहारे से ही ऐसे कठिन समय में  अपने निर्णय लेने होते हैं | ऐसे समय में हमारा सामना और संपर्क अनेक प्रकार के लोगों से भी होता है | उनमें से कुछ लोग हमारा मनोबल तोड़ने की कोशिश करते हैं, कुछ हमें सांत्वना देते नज़र आते हैं, कुछ अपनी बातों से आपका अपमान भी करते हैं, कुछ अपने अनुभवों के आधार पर हमें नए रास्ते दिखने की कोशिश करते हैं, कुछ हमारे ऊपर दोषारोपण करते हैं, कुछ लोग हमें इस्तेमाल करना चाहते हैं, कुछ ना जानते हुए भी हमें परखने लगते हैं, कुछ सिर्फ अनुमान के बल पर अपना मत देने लग जाते हैं और कुछ दोस्ती का झूठा चोगा पहन कर आप से आपकी निजी ज़िन्दगी के बारे में सब कुछ जानने की कोशिश करते हैं और सब कुछ जान लेने पर वह आपका उपभोग करना चाहते हैं या अपनी कटीली विचारधारा से आपको चोट पहुंचाते हैं | आज ऐसे ही कुछ लोगों के बारे में मैं आपके ख्याल जानने की इच्छा से यह लेख आप तक पहुंचा रहा हूँ | 

ऐसे लोग दरअसल दो मुंहे सांप की तरह होते हैं | जो आपकी तकलीफ़ में अपने आनंद को ढूंढते हैं और अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते या फिर अपने झूठे अहम के चलते आपकी हर बात को गलत ठहराने मैं लगे रहते हैं और आपको छोटा महसूस करा नीचा दिखने का प्रयास करते हैं | एक तरफ वो दोस्ती का दम भरते हैं और दूसरी ओर आपको ही चोट पहुँचाने की चेष्टा करते हैं | कुछ जान बूझ कर और कुछ अनजाने में भी ऐसा करते हैं | 

अभी हाल ही में मेरा भी एक ऐसे व्यक्ति से सामना हुआ | हालाँकि वह पुराने परिचित थे | परन्तु कई सालों बाद उनसे मुलाक़ात हुई | शुरू शुरू में वार्तालाप बहुत सुखद रहा | वक़्त गुज़रते बातों का सिलसिला बढ़ा और निजी ज़िन्दगी के अनुभवों का आदान प्रदान होना शुरू हुआ | मुझे उन्हें समझकर और उनकी मानसिकता को देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि उन्हें मेरे जीवन के बारे में जानने में ज्यादा दिलचस्पी थी बनिज्बत अपने बारे में बताने और बात करने के | बात बात पर दोस्ती का उलाहना दिया जाता और जताया जाता कि वह मेरे कितने घनिष्ट है | परन्तु जब भी उनसे उनके विषय में कोई सवाल किया जाता तो वह तुरंत बात को घुमा देते, या उस दौरान हो रही बातचीत से पलायन कर लेते या फिर सवाल के जवाब में एक और सवाल खड़ा कर देते | हमेशा खुश रहने वाले, ज़िंदादिल और जीवंत रहने का दिखावा करने वाला वह प्राणी मुझे मानसिक रूप से बहुत ही बीमार प्रतीत हुआ | धीरे धीरे उन्होंने अपने खयालातों को शब्दों को चाशनी में भिगो भिगो कर परोसना प्रस्तुत किया और यह दर्शाना प्रस्तुत किया कि वह कितने बड़े विद्वान् हैं | उन्हें मेरी हर बात काटने में बेहद ख़ुशी होने लगी | उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे वो मुझे अपने समक्ष कितना तुच्छ और अज्ञानी समझते हैं | किसी बात पर यदि उन्हें ज़िरह या चर्चा करने या उनके विचार जानने की इच्छा जताई तो तुरंत बात को वहीँ खत्म कर देने की कवायत शुरू हो गई | मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी किताबें पढने वाला व्यक्ति भला ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता है | हर बात में अपनी बातों को सिद्ध करना, तर्क-वितर्क तो छोड़िये तुरंत कुतर्क पर उतर आना और बहस में पड़ जाना किसी समझदार और शिष्ट इंसान के व्यक्तित्त्व पर प्रश्न चिन्ह अंकित कर ही देता है | खैर नतीजा यह सामने आया के मैंने उनके समक्ष हाथ जोड़ दिए और उनसे अब किनारा कर लिया है | 

मेरा सवाल सभी से बस इतना है कि ऐसे लोग जो सोशल मीडिया साइट्स पर या निजी जीवन में आपसे जुड़ते हैं या आप उनकी पोस्ट्स पढ़कर उन्हें जोड़ते हैं या अपना दोस्त बनाते हैं, वह कहाँ तक सही होता हैं ? क्या ऐसे लोगों के साथ अपने निजी अनुभवों को बांटा जाना चाहियें ? क्या जो सामग्री वह पोस्ट करते हैं उनकी मानसिकता भी वैसी ही होती है ? क्या जो चेहरा वह लोगों को दिखाते हैं वह उनका असली चेहरा होता है ? क्या वह अपने को दूसरों से ऊपर समझते हैं और श्रेष्टता मनोग्रन्थि रुपी बीमारी उनसे चिपकी होती है ? क्या सोशल मीडिया के ज़रिये वह अपने मानसिक स्तर से विपरीत आचरण करते हैं ? क्या अपनी खीज, खिन्नता और अपने जीवन में मिले खालीपन को भरने की कोशिश करने के लिए वह यहाँ जुड़ते हैं और दूसरों से दोस्ती करते हैं ? क्या दूसरों की ज़िन्दगी में झाँकने, उन्हें अपमानित करने और दूसरों की परिस्थितियों का मज़ाक बनाना उनका शौक होता है ? ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना उचित होगा ? ऐसे लोगों की मानसिक संतुलन के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ? ऐसे लोगों को मानवीयता की किस श्रेणी में रखा जाना चाहियें ? 

बस आज इस बात को लेकर मेरा चर्चा करने का मन है | मेरे सवालों के जवाब आपकी टिप्पणियों के रूप में मिलें तो बहुत अच्छा लगेगा |  

आज की कड़ियाँ 












अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

लेखागार