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रविवार, 18 अगस्त 2019

विराट व्यक्तित्व नेता जी की रहस्यगाथा : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
कहते हैं कि जो आया है वो जायेगा ही मगर कोई आने वाला जाने के बजाय विलुप्त हो जाये तो? क्या ऐसा भी होता है कि आने वाला विलुप्त हो जाये? यदि ऐसा होता भी है तो वह विलुप्त क्यों हुआ? यदि खुद अपनी मर्जी से विलुप्त नहीं हुआ तो फिर किसने विलुप्त करवाया? उसके खुद विलुप्त होने में, किसी के द्वारा विलुप्त करवाए जाने में लाभ किसका? विश्व की तमाम रहस्यगाथाओं से ज्यादा बड़ी और रहस्यमयी गाथा नेता जी के विलुप्त होने की गाथा है. यह रहस्यमयी इसलिए भी है कि नेता जी का व्यक्तित्व जितना विराट और चुम्बकीय रहा है, उसी अनुपात में या कहें उससे भी अधिक जनमानस के बीच उनकी गाथा तैरती रही है, आज के दिन यानि 18 अगस्त 1945 को उनके गायब हो जाने की. कोई कुछ भी कहे मगर तमाम सारे घटनाक्रम, अनेक तथ्य इशारा इस तरफ करते हैं कि आज के दिन हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी.


उनकी मृत्यु को जिस विमान दुर्घटना में हुआ प्रचारित किया जाता है, कहा जाता है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना ताइवान में हुई ही नहीं. इसका ऐतिहासिक प्रमाण यह है कि 03 सितंबर 1945 को अमेरिकी सेना ने जापानी सेना को हराकर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद उसकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि ताइवान में पिछले छह महीने से कोई विमान हादसा नहीं हुआ था. यहां यह गौर करने वाली बात है कि अपनी कथित मौत से दो दिन पहले 16 अगस्त 1945 को नेताजी वियतनाम के साइगॉन शहर से भागकर मंचूरिया गए थो जो उस समय रूस के क़ब्ज़े में था. नेता जी की मौत के रहस्य पर क़िताबें लिखने वाले और मिशन नेताजी के संस्थापक पत्रकार-लेखक अनुज धर ने अपनी लिखी क़िताबों में ताइवान सरकार के हवाले से दावा किया है कि 15 अगस्त से 05 सितंबर 1945 के दौरान कोई विमान हादसा नहीं हुआ था.

ऐसी चर्चाएँ बराबर बनी रहीं कि नेता जी रूस चले गए जहाँ से बाद में उनको भारत आने का सुरक्षित रास्ता प्रदान किया गया. भारत में उनके प्रवास की सर्वाधिक चर्चा फ़ैजाबाद के गुमनामी बाबा के रूप में रही हैं. यद्यपि बहुत से लोगों का मानना है कि नेता जी का व्यक्तित्व जिस तरह का था वैसे में संभव नहीं कि वे गुमनामी में अपना जीवन व्यतीत कर देते. इसके बाद भी सम्बंधित व्यक्ति को लेकर लोगों में विश्वास बना हुआ है कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ही थे. गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके नेताजी होने की बातें फैलने लगीं तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं. वे गुमनामी बाबा के कमरे से बरामद सामान देखकर यह कहते हुए फफक पड़ी थीं कि यह सब कुछ उनके चाचा का ही है. इसके बाद स्थानीय लोगों ने आन्दोलन करना शुरू कर दिया. लम्बे समय तक चले सामाजिक और न्यायिक प्रयासों के बाद मामले की सुनवाई करते हुए 31 जनवरी 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि गुमनामी बाबा के सामान को संग्रहालय में रखा जाए ताकि आम लोग उन्हें देख सकें.

गुमनामी बाबा के सामान से मिली नेता जी की तस्वीर 

लखनऊ बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था-
ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की स्मृति या उनकी धरोहर आने वाली नस्लों के लिए प्रेरणादायक है. अगर फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा, जिनके बारे में लोगों का विश्वास था कि वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं और उनके पास आने-जाने वाले लोगों व उनके कमरे में मिली तमाम वस्तुओं से इस बात का तनिक भी आभास होता है कि लोग गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में मानते थे तो ऐसे व्यक्ति की धरोहर को राष्ट्र की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए.

नेता जी की मृत्यु की जांच से सम्बंधित बने आयोगों की अपनी-अपनी रिपोर्ट्स रही हैं. जिस तरह का रहस्य, जिस तरह की गोपनीयता नेता जी की मृत्यु को लेकर बनाई जाती रही है, वैसी ही गुमनामी बाबा के निधन और उनके अंतिम संस्कार को लेकर बनाई गई. यह सब इस रहस्य को और गहरा करता है. अंतिम सत्य क्या है यह तो उसी सत्य को भोगने वाला ही जानता है मगर एक सत्य यह है कि जनमानस को विश्वास है कि नेता जी की मृत्यु आज के दिन बताई जाने वाली तथाकथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी. उनकी मौत का रहस्य अभी भी रहस्य है. जब तक यह रहस्य उजागर नहीं होता तब तक उनकी मौत को स्वीकारना नेता जी के अस्तित्व को, उनकी विराटता को नकारना ही होगा. आज के दिन वे विलुप्त हुए हैं, मृत नहीं और यह भी अपने आपमें परम सत्य है कि विलुप्त होने वाले मरते नहीं वरन अमरत्व को प्राप्त कर जाते हैं. महाकाल बन जाते हैं.
जय हिन्द

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रविवार, 18 नवंबर 2018

दोस्तों का प्यार - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
आज एक कविता, स्व-रचित दोस्तों के नाम समर्पित....
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मुझ पर दोस्तों का प्यार,
यूँ ही उधार रहने दो।
बड़ा हसीन है ये कर्ज़,
मुझे कर्ज़दार रहने दो।

वो आँखें छलकती थीं,
ग़म में ख़ुशी में मेरे लिए।
उन आँखों में सदा,
प्यार बेशुमार रहने दो।

मौसम लाख बदलते रहें,
आएँ भले बसंत-पतझड़।
मेरे यार को जीवन भर,
यूँ ही सदाबहार रहने दो।

महज़ दोस्ती नहीं ये,
बगिया है विश्वास की।
प्यार, स्नेह के फूलों से,
इसे गुलज़ार रहने दो।

वो मस्ती, वो शरारतें,
न तुम भूलो, न हम भूलें।
उम्र बढ़ती है ख़ूब बढ़े,
जवाँ ये किरदार रहने दो।


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रविवार, 23 सितंबर 2018

मानवीयता की प्रतिमूर्ति रवि शाक्या को नमन : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
आज आपके सामने एक ऐसे व्यक्ति की कहानी लाना चाहते हैं, जो सरकारी सेवा में है और जिम्मेवार पद पर है. इसके बाद भी सामाजिक कार्यों में जमकर रुचि लेते हैं, सक्रिय रहते हैं. यूँ तो उन्हें हमारे जनपद जालौन के लोग ट्री-मैन कहकर सम्मान देते हैं पर यह कहानी उससे कुछ अलग है. पहले आपको कुछ बता दें उनके ट्री-मैन संबोधन के लिए. असल में आप रेलवे में पदासीन हैं किन्तु पर्यावरण के लिए, पौधारोपण के लिए लगातार, नियमित रूप से सक्रिय रहते हैं. वे न केवल सक्रिय रहते हैं वरन पौधारोपण के लिए पौधे भी उपलब्ध करवाते हैं, उनकी सुरक्षा करवाते हैं, उनके पल्लवित-पुष्पित करवाते हैं. जगह का चयन करके वे पौधारोपण करवाने के बाद उनकी सुरक्षा का ख्याल रखते हैं.

इसके अलावा रेलवे में अपनी सेवाएँ देने के कारण वे लाखों-लाख लोगों के संपर्क में भी आते हैं. सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय होने के कारण वे यहाँ भी अपने सक्रिय मन-मष्तिष्क के चलते कार्यशील रहे. नौकरी को महज नौकरी न मानते हुए उसके अन्दर से भी सामाजिकता निकालते रहे. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व माननीय रविकांत शाक्या जी के इस कार्य को आप सब उन्हीं की जुबानी पढ़ें तो ज्यादा आनंद आएगा. हम तो इस बुलेटिन के माध्यम से सम्पूर्ण बुलेटिन परिवार की तरफ से उनका हार्दिक वंदन-अभिनन्दन करते हैं. लीजिये, देखिये, वे क्या कार्य कर रहे हैं, उन्हीं की जुबानी.

बांये रवि शाक्या जी 

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कभी कभी जिंदगी में कुछ अप्रत्याशित घटनाएं घट जाती हैं जिन के कारण जीवन मे काफी बदलाव आ जाता है। ऐसे ही लगभग 35 वर्ष पूर्व मेरे फुफेरे भाई का बेटा मनोज जो मुझसे लगभग 3 वर्ष बड़ा था और इंटर में पढ़ रहा था अचानक घर मे पड़ी डांट के कारण घर से चला गया। जिसे आज तक परिवारीजन ढूंढ रहे हैं उसके लौट आने का विश्वास अभी भी है उन्हें। भाई के परिवार का दुख देखकर मुझे भी एक लक्ष्य प्रदान कर दिया और इसकी शुरुआत मेरी रेलवे में जॉब लगने के वर्ष 1995 से हुई।
ट्रेन में टिकट जांच के दौरान घर से भागे, बिछुड़े बालक, बालिकाएं, युवक, युवतियां मिले, जिनमे मध्य-प्रदेश, उत्तर-प्रदेश, राजस्थान, बिहार, नेपाल, बंगाल , हरियाणा इत्यादि से भागे हुए थे। उन्हें येन-केन-प्रकारेण, साम, दाम, दंड, भेद से इमोशनली ब्लैकमेल कर उनके घर से सम्पर्क स्थापित कर उन्हें स्वयं के खर्च पर उनके परिवारीजनों का सौंपा। परिवारीजन के आने तक अपने घर मे रखा। आज भी बहुत से परिवार ऐसे हैं जो जुड़े हुए हैं। कई बार कुछ परिजनो ने पैसे देने का प्रयास किया पर उनकी आंखों की तरल दृष्टि ही मेरा परितोष होती है लगता है कि मेरा भतीजा वापस मिल गया।
इसी कड़ी में दिनांक 20 सितंबर को सिरौली (खागा) निवासी रामजी उर्फ पुष्पराज सिंह सेंगर को उसके घर पहुंचाया। अब तक कुल 79 बच्चे सकुशल घर पहुंच चुके हैं और उनके परिवार की अप्रतिम खुशी मेरे लिए भी मुस्कुराहट का कारण बनी।

शनिवार, 26 मई 2018

बुन्देलखण्ड की प्रतिभाओं को मंच देगा फिल्म समारोह : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
बुन्देलखण्ड सदैव से अनेकानेक रत्नों से सुशोभित रहा है. शौर्य, सम्मान, कला, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि में यहाँ विलक्षणता देखने को मिलती आई है. यहाँ के निवासी अपने-अपने स्तर पर बुन्देलखण्ड की संस्कृति को उत्कर्ष पर ले जाने का कार्य करते रहते हैं. इसी कड़ी में बुन्देलखण्ड निवासी फिल्म अभिनेता राजा बुन्देला उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी (जो फ़िल्मी दुनिया का जाना-पहचाना नाम है) द्वारा ओरछा में इस वर्ष, 2018 में भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया. पाँच दिवसीय यह आयोजन 18 मई से लेकर 22 मई तक चला. राजा बुन्देला फिल्मों की दृष्टि से जाना-पहचाना नाम है और उनकी एक विशेषता यह भी है कि मुम्बई में रहने के बाद भी वे बराबर, नियमित रूप से बुन्देलखण्ड से सम्पर्क बनाये हुए हैं. बुन्देलखण्ड राज्य की माँग में भी उनकी आवाज़ सुनाई देती है.


बुन्देलखण्ड की उस पावन धरा में, जहाँ श्रीराम राजा रूप में विराजमान हैं, भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन अपने आपमें सुखद एहसास जगाता है. ओरछा में राजा बुन्देला द्वारा स्थापित, संस्कारित रुद्राणी कलाग्राम में पाँच दिवसीय फिल्म समारोह का आयोजन निश्चित ही बुन्देलखण्ड की उन प्रतिभाओं को एक मंच दिया, जो स्व-प्रोत्साहन, स्व-संसाधनों से फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. ओरछा में बेतवा नदी के किनारे लम्बे-चौड़े प्राकृतिक क्षेत्र में फैले रुद्राणी कलाग्राम में भारतीय फिल्म समारोह के लिए दो टपरा टॉकीज बनाई गईं हैं. टपरा टॉकीज एक तरह की अस्थायी व्यवस्था होती है जो बाहर से महज एक विशालकाय तम्बू जैसी प्रतीत होती है मगह अन्दर से पूरी तरह से किसी हॉल का एहसास कराती है. एक टपरा टॉकीज में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बनी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है और दूसरी में हिन्दी फीचर फ़िल्में दिखाई जा रही हैं. इसके साथ-साथ सांध्यकालीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में, हरे-भरे घने वृक्षों के आँचल में मुक्ताकाशी मंच का निर्माण किया गया है. कलाग्राम के दूसरी ओर बने स्थल पर फिल्म से सम्बंधित विषय पर आख्यान की भी व्यवस्था है. जहाँ फ़िल्मी दुनिया के रोहिणी हट्टंगड़ी, रजत कपूर, केतन आनंद, नफीसा अली, यशपाल शर्मा जैसे नामचीन कलाकार सबसे रू-ब-रू होते हैं.


सबकुछ यथावत चलता देखकर अच्छा लगा. एक अकेले व्यक्ति राजा बुन्देला के प्रयास और उनके छोटी सी टीम के समर्पण से यह समारोह सुखद अनुभूति दे रहा है. यद्यपि इस पहले प्रयास में कुछ कमियां भी देखने को मिलीं तथापि वे इस कारण नकारने योग्य हैं क्योंकि एक तो यह पहला प्रयास है, दूसरे बिना किसी तरह की आर्थिक मदद के इतना बड़ा आयोजन करवाना अपने आपमें जीवट का काम है. राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी इन कमियों को देख-महसूस कर रहे हैं और अगले आयोजन में इनको सुधारने की इच्छाशक्ति भी व्यक्त करते हैं. यही संकल्पशक्ति ही ऐसे समारोहों का भविष्य तय करती है. जिस स्तर का समारोह हो रहा है, जिस तरह का उद्देश्य लेकर समारोह संचालित है, जिस तरह का मंच कलाकारों को प्रदान किया जा रहा है उससे आने वाले समय में निश्चित ही बुन्देलखण्ड को, यहाँ के कलाकारों को फिल्म क्षेत्र में उत्कृष्ट पहचान मिलेगी. बुन्देलखण्ड की कला-प्रतिभाओं को शुभकामनाओं, उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना सहित आज की बुलेटिन आपके सामने प्रस्तुत है.

रविवार, 29 अप्रैल 2018

पेन्सिल में समाहित सकारात्मक सोच : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
पर्यावरण को बिगाड़ने के बाद अब हर तरफ से पर्यावरण संरक्षण की आवाजें सुनाई देने लगी हैं. यह हम इंसानों का स्वभाव बन गया है कि पहले किसी भी वस्तु, सामग्री को नष्ट होने की कगार तक ले जाते हैं फिर अचानक नींद से जागने जैसी स्थिति में आकर उसे बचाने की पहल शुरू कर देते हैं. हवा, पानी, धरती, वृक्ष, पक्षी, पशु यहाँ तक कि इंसानों के सम्बन्ध में यही स्थिति देखने को मिल रही है. प्रयास कितने रंग ला रहे हैं, कितने रंग लायेंगे ये तो भविष्य के गर्भ में है मगर इन प्रयासों के बीच एक प्रयास दिखाई दिया, जिसने व्यक्तिगत रूप से हमें प्रभावित किया.

Lacoptal टेबलेट बनाने वाली एक कंपनी की तरफ से पेंसिलों का गिफ्ट पैक हमारे घर आया. आम पेंसिलों की तरह दिखने वाली इन पेंसिलों की एक विशेषता ने प्रभावित किया. सभी पेंसिलों के अंतिम छोर पर हरे रंग का एक भाग बना हुआ है. इस भाग में किसी न किसी पौधे के बीज रखे गए हैं. कंपनी द्वारा दिए गए पैकेट पर स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि इन पेंसिलों को उपयोग करने के बाद गमले में या मिट्टी में तिरछा लगा कर उनको कुछ दिन पानी दिया जाये. दो-चार दिन में हरा भाग गल जायेगा और उसमें रखे बीज मिट्टी, पानी आदि का साथ लेकर अंकुरित हो जायेंगे जो पौधे का रूप धारण करेंगे. कई-कई पौधों के बीज अलग-अलग पेंसिलों में रखे गए हैं. सूरजमुखी और टमाटर के बीज वाली पेन्सिल आपके सामने है.


निश्चित ही यह छोटा प्रयास है मगर इसके कई आयाम निकल रहे हैं. इससे बच्चों को पौधारोपण करने की प्रेरणा मिलेगी. उनमें अपने पर्यावरण के प्रति सकारात्मकता विकसित होगी. पेन्सिल से पौधों का निकलना देख बच्चों में ख़ुशी का संचार होगा और वे अपनी सक्रियता को सार्थक दिशा में ले जा सकेंगे. ऐसे छोटे-छोटे प्रयास हम सभी को करने चाहिए.

चलिए, इस प्रयास को साधुवाद देते हुए आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रेषित कर रहे हैं, आनंद लीजिये.

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रविवार, 22 अप्रैल 2018

प्लास्टिक प्रदूषण की समाप्ति कर बचाएं अपनी पृथ्वी : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
पर्यावरण के प्रति गैर-संवेदनशीलता दिखाने के खामियाजे जब समाज में परिलक्षित होने लगे तो चारों तरफ से इसके संरक्षण की आवाजें उठने लगीं. इसी क्रम में आज, 22 अप्रैल को सम्पूर्ण दुनिया पृथ्वी दिवस मनाने में लगी है. यह एक वार्षिक आयोजन है, जिसे पर्यावरण संरक्षण, पृथ्वी को बचाने रखने के लिए काम करने और जागरूकता फैलाने के प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को  आयोजित किया जाता है. पृथ्वी पर रहने वाले तमाम जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को बचाने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ाने के उद्देश्य से पृथ्वी दिवस मना ये जाने का प्रस्ताव रखा गया. इस दिवस की स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप की थी. वर्तमान में इस दिवस को 192 से अधिक देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है. 22 अप्रैल 1970 में वाशिंगटन में एक सम्मलेन में अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने पर्यावरण पर राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन किया. इस दौरान अनेकानेक कार्यक्रम आयोजित किये गये और लोग पर्यावरण-सुरक्षा के समर्थन में सड़कों पर निकल आए. लगभग बीस लाख अमेरिकी नागरिकों ने स्वस्थ और स्थायी पर्यावरण के लक्ष्य के साथ भाग लिया. बड़े पैमाने पर रैली का आयोजन किया गया.


प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले विश्व पृथ्वी दिवस को किसी न किसी थीम पर आधारित किया जाता है. इस साल यानी 2018 में पृथ्वी दिवस की थीम प्लास्टिक प्रदूषण की समाप्ति को बनाया गया है. इसके अनुसार पृथ्वी दिवस 2018 मूल रूप से प्लास्टिक को लेकर मानवीय रवैया और व्यवहार को बदलने के लिए आवश्यक जानकारी और प्रेरणा प्रदान करने के लिए समर्पित है. लोगों को प्लास्टिक की खपत पर कटौती करने के लिए प्रोत्साहित करना है. देखने में आ रहा है कि प्लास्टिक धरती के अन्दर जाकर अब भूमिगत जल में मिलने लगी है. इसके तथ्य भी मिले हैं कि प्लास्टिक कणों की उपस्थिति पेयजल में होने लगी है. यह भविष्य के लिए घातक संकेत है. यदि इसका निदान शीघ्र न खोजा गया तो आने वाली पीढ़ी पेयजल के साथ प्लास्टिक कणों को पीने को विवश होगी.  

पर्यावरण-संरक्षण के प्रति होने वाले तमाम सारे आयोजनों के बाद भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता है अभी भी देश और दुनिया में इस तरफ जागरूकता की कमी है. सामाजिक, राजनैतिक स्तर से इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाए जाते नहीं दिखते हैं. कतिपय पर्यावरण-प्रेमी अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं किंतु यह किसी एक व्यक्ति, संस्था तक सीमित नहीं होना चाहिए. सम्पूर्ण समाज को पर्यावरण-संरक्षण के प्रति सजग होना पड़ेगा तभी बात बनेगी. पृथ्वी के पर्यावरण को, पृथ्वी को बचाने के लिए हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते तो इतना तो कर ही सकते हैं कि पॉलिथीन के उपयोग को नकारें. रिसाइकल प्रक्रिया को प्रोत्साहित करें क्योंकि जितनी ज्यादा सामग्री रिसाइकल होगी, पृथ्वी का कचरा उतना ही कम होगा.

आइये हम सभी इस ओर सजगता के साथ कदम बढ़ाते हुए आज की बुलेटिन की तरफ चलें.

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रविवार, 25 फ़रवरी 2018

एक लम्हे में चाँदनी से जुदाई : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज देर रात भारतीय फिल्मों के उन दीवानों के लिए बुरी खबर लेकर आई जो अभिनेत्री श्रीदेवी के प्रशंसक रहे हैं. उनका 24 फरवरी 2018 को देर रात कार्डिएक अटैक से दुबई में निधन हो गया. वे एक पारिवारिक वैवाहिक समारोह में शामिल होने दुबई गई हुई थीं.


उनका जन्म 13 अगस्त 1963 को हुआ था. उन्होंने हिन्दी फिल्मों सहित तमिल, मलयालम, तेलगू, कन्नड़ आदि फिल्मों में भी काम किया था. अपने फिल्मी कैरियर में उन्होंने 63 हिन्दी, 62 तेलुगु, 58 तमिल, 21 मलयालम फिल्मों में काम किया. उनको भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार भी कहा जाता है. श्रीदेवी ने सन 1975 में बनी फिल्म जूली से हिन्दी सिनेमा में बाल कलाकार के रूप में प्रवेश किया. एक अभिनेत्री के रूप उनकी पहली फिल्म तमिल में आई, जिसका नाम मून्द्र्हु मुदिछु था. बाल कलाकार के रूप में सन 1975 में बॉलीवुड में प्रवेश करने वाली श्रीदेवी की बतौर अभिनेत्री पहली फिल्म सन 1978 में प्रदर्शित हुई सोलहवाँ सावन थी लेकिन सबसे अधिक पहचान सन 1983 में प्रदर्शित हुई फिल्म हिम्मतवाला से मिली. उनकी प्रसिद्द फिल्मों में सदमा, नागिन, निगाहें, मिस्टर इन्डिया, चालबाज़, लम्हे, खुदा गवाह, जुदाई आदि शामिल हैं. श्रीदेवी ने पाँच फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त किये. इसके अलावा उनको सन 2013 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

उनके निधन पर ब्लॉग बुलेटिन परिवार की ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं.

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रविवार, 14 जनवरी 2018

मकर संक्रांति पर ब्लॉग बुलेटिन की शुभकामनायें करें स्वीकार

नमस्कार साथियो,
आज पूरे देश में मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाया जा रहा है. सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं. इसी दिन, पौष मास में सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है. मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है अर्थात सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर दिशा में जाने लगता है. जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर से चलता है तब उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर जाने लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं.  वैसे तो सूर्य संक्रांति बारह हैं किन्तु इनमें से चार- मेष, कर्क, तुला, मकर संक्रांति महत्वपूर्ण हैं. मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त में स्नान, दान और पुण्य के शुभ समय का विशेष महत्व है.


विभिन्न नाम भारत में
मकर संक्रान्ति - छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, और जम्मू
ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल - तमिलनाडु
उत्तरायण - गुजरात, उत्तराखण्ड
माघी - हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब
भोगाली बिहु - असम
शिशुर सेंक्रात - कश्मीर घाटी
खिचड़ी - उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार
पौष संक्रान्ति - पश्चिम बंगाल
मकर संक्रमण – कर्नाटक

विभिन्न नाम भारत के बाहर
बांग्लादेश - पौष संक्रान्ति
नेपाल - माघे सङ्क्रान्ति या माघी सङ्क्रान्ति, खिचड़ी सङ्क्रान्ति
थाईलैण्ड - सोङ्गकरन
लाओस - पि मा लाओ
म्यांमार - थिङ्यान
कम्बोडिया - मोहा संगक्रान
श्रीलंका - पोंगल, उझवर तिरुनल


बुलेटिन परिवार की ओर से सभी को इस पावन पर्व की शुभकामनाओं सहित आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है.

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रविवार, 19 मार्च 2017

राजनीति का ये पक्ष गायब क्यों : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आख़िरकार उत्तर प्रदेश में सरकार बन गई. आज शपथ ग्रहण कार्यक्रम भी संपन्न हो गया. हिन्दुत्वादी छवि रखने वाले योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये गए. उनके साथ दो उप-मुख्यमंत्री भी बनाये गए. इसका सभी लोग अपने-अपने स्तर पर अपना-अपना आकलन कर रहे हैं. नए मुख्यमंत्री के लिए आने वाला समय काफी कठिन साबित होने वाला है, जो यकीनन उनकी परीक्षा लेगा. एक तरफ जहाँ राम मंदिर निर्माण मुद्दा सामने आएगा वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास को व्यावहारिक रूप से लागू करना भी होगा. ये तो आने वाला समय बताएगा कि योगी और उनका मंत्रिमंडल इसके अलावा अन्य मुद्दों पर कितना खरा उतरता है किन्तु आज शपथ ग्रहण पश्चात् मंच पर जो दृश्य उभर कर सामने आया वो व्यापक सन्देश देता है बशर्ते उस सन्देश को पूर्वाग्रह-रहित होकर देखा-समझा जाये.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (मध्य में) बाँए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दांए उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा 

लखनऊ में स्मृति उपवन में संपन्न शपथ ग्रहण समारोह के बाद मंच पर एक दूसरे से अभिवादन की श्रंखला में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव जी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी से बड़ी ही गर्मजोशी से मिले. मिलने के साथ-साथ उन्होने मोदी जी के कान में कुछ कहा. इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा इशारा करके उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को बुलाकर नरेन्द्र मोदी जी से मिलने का इशारा किया. अखिलेश ने मुस्कुराकर मोदी जी से हाथ मिलाया साथ ही मोदी जी ने भी पूरे स्नेह से अखिलेश जी के कंधे को देर तक थपथपाया. इसी दौरान मुलायम सिंह ने भी हँसकर अखिलेश की ओर इशारा करते हुए कुछ कहा. पूरे चुनाव भर एक दूसरे के लिए अत्यधिक कटु शब्दों, वाक्यों, बयानों का इस्तेमाल करने वाले ये नेता आपस में किस तरह बिना किसी मनमुटाव के मिले ये सीखने वाली बात है. 


ये बातें ख़ास तौर से उन लोगों को सीखनी चाहिए जो राजनीति में दूर तक जाना चाहते हैं; जो जिला, तहसील, ब्लॉक, नगर की राजनीति करने में लगे हैं. ऐसे लोग जरा-जरा सी बात पर आपसी रंजिश निभाने लगते हैं. आपसी कटुता इस कदर बढ़ जाती है कि हत्याएँ तक हो जाती हैं. स्पष्ट है कि ये राजनीति नहीं है. समझना-सोचना-सीखना होगा कि जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इन बड़े नेताओं में ऐसी कटुता नहीं दिखाई देती तो जरा-जरा से पद के लिए, छोटे-छोटे लाभ के लिए आपस में छोटे नेताओं में वैर-भाव क्यों पनप जाता है?

बहरहाल, उत्तर प्रदेश की नई सरकार को बधाई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रिमंडल को बधाई, शुभकामनायें कि उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश के रूप में अपनी पहचान बनाये.

लीजिये, आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है.

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रविवार, 12 मार्च 2017

होली के रंगों में सराबोर ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो
आप सभी को रंगोत्सव होली की हार्दिक शुभकामनायें.


होली के ठीक पहले देश के पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों ने होली के साथ दीपावली मनाने का अवसर विजयी दलों के समर्थकों को उपलब्ध करवा दिया है. वर्तमान चुनाव परिणामों ने आश्चर्यजनक स्थितियों को जन्म दिया है. मतदाताओं ने उत्तर प्रदेश में इस बार प्रचंड बहुमत दिया, ये अपने आपमें आश्चर्य का विषय है. इसके अलावा प्रदेश के अन्य दो दल, जो कि जातिगत, धर्मगत आधार पर राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं, वे आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सके. भले ही यही अंतिम निष्कर्ष न कहा जाये किन्तु इतना तो दिखाई दे रहा है कि प्रदेश के मतदाताओं ने इस बार जाति, मजहब को नाकारा ही है.


इसके अलावा यदि मणिपुर के चुनावों पर निगाह डालें तो वहाँ एक आश्चर्यजनक घटना ये हुई की विगत सोलह वर्षों से चले आ रहे अनशन को समाप्त करके राजनीति में उतरने वाली इरोम शर्मिला को महज नब्बे मत प्राप्त हुए. क्या समझा जाये इसे? क्या मणिपुर के मतदाताओं ने इरोम को नकार दिया? क्या वहाँ की जनता उस कानून के पक्ष में है जिसका विरोध इरोम करती रही हैं? क्या नक्सलियों का कोई खौफ इन चुनावों में इरोम को इतने कम मत दिलाने का कारक बना?


बहरहाल, चुनावों के सबके अपने-अपने आकलन होते हैं. अपने-अपने तर्क होते हैं. इस तर्क-वितर्क से इतर आकर रंगोत्सव का आनंद लिया जाये. रंग-बिरंगी होली के इस पर्व पर कोई प्रवचन नहीं, कोई समाज-सुधार जैसी बात नहीं. बस, खूब आनंद उठायें होली का, रंगों का, गुझिया का, रिश्तों का, संबंधों का. कमी आजकल बस आनंद की हो रही है.

तो पुनः होली की शुभकामनाओं के साथ आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है.

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रविवार, 29 जनवरी 2017

बीटिंग रिट्रीट 2017 - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज दिल्ली के विजय चौक पर हुये 'बीटिंग रिट्रीट' के साथ ही इस साल के गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हो गया. बीटिंग रिट्रीट गणतंत्र दिवस समारोह की समाप्ति का सूचक है. इस कार्यक्रम में थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बैंड पारंपरिक धुन के साथ मार्च करते हैं. आज इनके साथ बीएसएफ, सीआरपीएफ और दिल्ली राज्य पुलिस के बैंड्स ने भी अपनी सहभागिता की. यह सेना की बैरक वापसी का प्रतीक होता है जो परम्पराओं और आधुनिकता का निर्वहन करता है.


गणतंत्र दिवस के पश्चात हर वर्ष 29 जनवरी को बीटिंग रिट्रीट कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. समारोह का स्थल रायसीना हिल्स के नजदीक स्थित विजय चौक होता है, जो राजपथ के अंत में राष्ट्रपति भवन के उत्तर और दक्षिण ब्लॉक द्वारा घिरा है. बीटिंग रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है. रिट्रीट धुन के बजने के साथ ही राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान-पूर्वक उतारकर ले जाया जाता है. सभी महत्‍वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है.






प्रतिवर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग रिट्रीट आयोजन किया जाता है. यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं. इस बार के आयोजन में सोलह मिलिट्री और सोलह पाइप बैंड ड्रमर इसमें शामिल हुए. बीटिंग रिट्रीट 2017 में राग यमन की प्रस्तुति पहली बार हुई है. पूरे आयोजन में इस बार कुल 26 प्रस्तुतियाँ हुईं जिनमें से ज्यादातर देशी धुनों पर आधारित रहीं. स्क्वाड्रन लीडर जी. रामचंद्रन आज के समारोह में प्रिंसिपल कंडक्टर रहे.



ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं. ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्मा गाँधी की प्रिय धुनों में से एक कही जाती है) बजाई जाती है, इसे विलियम एच० मग ने तैयार किया था. इसके अलावा ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्‍स बजाई जाती हैं, जो काफ़ी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्‍य बनता है. इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्‍टर राष्‍ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं. तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है. बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन सारे जहाँ से अच्‍छा बजाते हैं. ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्‍ट्रीय ध्‍वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्‍ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता है.



आज शाम को हुये इस कार्यक्रम को नीचे दिये वीडियो पर देख सकते है. यह वीडियो दूरदर्शन के यू ट्यूब चैनल से लिया गया है. इस साल भी दूरदर्शन ने पिछले सालों की तरह यू ट्यूब पर बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम का सीधा प्रसारण  किया था. इसे आप इस वीडियो के द्वारा देख सकते हैं. 



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