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बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

नमन - नामवर सिंह और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
26 जुलाई 1926 में यूपी के चंदौली जिले के जीयनपुर गांव में पैदा हुए डॉ. नामवर सिंह हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे। उनकी गिनती हिंदी साहित्य जगत के बड़े समालोचकों में थी।

हिंदी के मशहूर साहित्यकार और समालोचक डॉक्टर नामवर सिंह का निधन हो गया है। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मंगलवार रात तकरीबन 11.50 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। खराब सेहत की वजह से पिछले कुछ समय से वह एम्स में भर्ती थे।

इसी साल जनवरी में वह अपने घर में अचानक गिर गए थे। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों के मुताबिक लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर बुधवार दोपहर बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। 26 जुलाई 1926 में यूपी के चंदौली जिले के जीयनपुर गांव में पैदा हुए डॉ. नामवर सिंह हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे। उनकी गिनती हिंदी साहित्य जगत के बड़े समालोचकों में थी। उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था।

डॉ. नामवर सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के अलावा दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में लंबे अरसे तक अध्यापन कार्य किया था। बीएचयू से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाले नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य जगत में आलोचना को नया मुकाम दिया। जेएनयू से पहले उन्होंने सागर और जोधपुर यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया। जनयुग और आलोचना नाम की दो हिंदी पत्रिकाओं के वह संपादक भी रहे। 1959 में उन्होंने चकिया-चंदौली सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद बीएचयू में पढ़ाना छोड़ दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने उनके निधन पर ट्वीट में लिखा, 'हिंदी में फिर सन्नाटे की खबर। नायाब आलोचक, साहित्य में दूसरी परम्परा के अन्वेषी, डॉ नामवर सिंह नहीं रहे। मंगलवार को आधी रात होते-न-होते उन्होंने आखिरी सांस ली। कुछ समय से एम्स में भर्ती थे। 26 जुलाई को वह 93 के हो जाते। उन्होंने अच्छा जीवन जिया, बड़ा जीवन पाया। नतशीश नमन।'

रचनाएं
बकलम खुद - व्यक्तिव्यंजक निबन्धों का संग्रह, कविताओं तथा विविध विधाओं की गद्य रचनाओं के साथ संकलित

शोध 
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग - 1952
पृथ्वीराज रासो की भाषा - 1956 (अब संशोधित संस्करण 'पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य' नाम से उपलब्ध)

आलोचना
आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां - 1954
छायावाद - 1955
इतिहास और आलोचना - 1957
कहानी : नयी कहानी - 1964
कविता के नये प्रतिमान - 1968
दूसरी परंपरा की खोज - 1982
वाद विवाद और संवाद - 1989


आज हम सब हिंदी साहित्य में नामवर सिंह जी के स्थान और योगदान का स्मरण करते हुए उन्हें शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शनिवार, 28 मई 2016

आज़ादी के दो अमर दीवानों को ब्लॉग बुलेटिन का नमन

नमस्कार दोस्तो,
तारीख और दिन रोज ही बदलते हैं किन्तु कोई-कोई दिन-तारीख विशेष बन जाती है. कुछ ऐसी ही विशेष तिथि 28 मई है. ये संयोग है कि ये दिन दो अमर क्रांतिकारियों, विनायक दामोदर सावरकर तथा भगवती चरण वोहरा से सम्बंधित है. इस संयोग में भी अपनी विशेषता ये है कि आज एक अमर शहीद की जयंती है और एक अमर शहीद की पुण्यतिथि. जी हैं, आज 28 मई को देश वीर सावरकर को उनके जन्मदिन पर याद करता है तो भगवती चरण वोहरा को उनकी पुण्यतिथि के लिए.
विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र (तत्कालीन नाम बम्बई) प्रान्त में नासिक के निकट भागुर गाँव में हुआ था. वीर सावरकर के संबोधन से स्वीकारे गए विनायक जी भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे. अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लगातार संघर्षरत रहने के कारण उनको 24 दिसम्बर 1910 को आजीवन कारावास की सजा दी गयी. इसके बाद 31  जनवरी 1911 में आपको दोबारा आजीवन कारावास दिया गया. वीर सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने दो बार आजन्म कारावास की सजा दी, जो विश्व के इतिहास की पहली एवं अनोखी सजा थी. नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए उन्हें 7 अप्रैल 1911 को काला पानी की सजा सुनाकर सेलुलर जेल, अंडमान निकोबार भेज दिया गया. जहाँ से पूरे दस वर्ष का कारावास भोगकर वे 1921 में मुक्त होकर स्वदेश लौटे और फिर तीन वर्ष जेल की सजा काटी. जेल में ही उन्होंने हिंदुत्व पर शोध ग्रन्थ लिखा. हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय वीर सावरकर को जाता है. वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे. वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढँग से लिपिबद्ध किया है. उन्होंने 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था

वीर सावरकर 


भगवती चरण वोहरा का जन्म 4 जुलाई 1904 को आगरा में हुआ था. वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी थे. हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य भगवती चरण वोहरा का कार्य भगत सिंह व अन्य साथियों से सलाह-मशविरे से मसविदे को तैयार करने का रहता था. नौजवान भारत सभा के उत्कर्ष में आपका और भगत सिंह का ही प्रमुख हाथ था. भगत सिंह के अलावा वे ही संगठन के प्रमुख सिद्धांतकार थे. अपनी सूझबूझ के चलते वे कभी गिरफ्तार नहीं हुए. क्रांतिकारी विचारक, संगठनकर्ता, वक्ता, प्रचारकर्ता, आदर्श के प्रति निष्ठा व प्रतिबद्धता तथा अपराजेय हौसला आदि गुण भगवती जी में विद्यमान थे. लखनऊ के काकोरी केस, लाहौर षड्यंत्र केस और फिर लाला लाजपत राय को मारने वाले अंग्रेज सार्जेंट सांडर्स की हत्या में भी वे आरोपित थे. इतने आरोपों से घिरे होने के बाद भी उन्होंने स्पेशल ट्रेन में बैठे वायसराय को चलती ट्रेन में ही उड़ा देने का भरपूर प्रयास किया. क्रांतिकारी कार्यों से पीछे न हटने वाले भगवती चरण वोहरा ने अपनी धर्मपत्नी दुर्गा को भी अपना सक्रिय सहयोगी बनाया. यही सक्रिय क्रांतिकारी महिला भारतीय स्वातंत्र्य इतिहास में दुर्गा भाभी के रूप में प्रसिद्द हुई. भगवती चरण जी की मृत्यु बम परीक्षण के दौरान हुई एक दुर्घटना में 28 मई 1930 को हुई. 

भगवती चरण वोहरा 


आज की बुलेटिन समर्पित है अपने शौर्य, आत्मबल, संघर्ष से स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नए आयाम स्थापित करने वाले दोनों अमर शहीदों, वीर क्रांतिकारियों को. उनको श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए सादर नमन.

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सोमवार, 23 नवंबर 2015

आइये संकल्पित हों अपने जाँबाज़ सैनिकों के लिए - ११५०वीं बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज की बुलेटिन ११५०वें पड़ाव पर आ चुकी है और इस विशेष अवसर को हमने समर्पित किया है अपने देश के उन जाँबाज़ सैनिकों को जो हमारी स्वतंत्रता के लिए, हमारी सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं; समर्पित किया है उन बहादुर सैनिकों को जिन्होंने दुश्मनों को नेस्तनाबूत करने में कोई कसर नहीं रखी; समर्पित किया है उन अमर शहीदों को जिन्होंने अपने जीवन को कुर्बान कर दिया किन्तु देश की, देशवासियों की स्वतंत्रता, सुरक्षा पर तनिक भी आँच नहीं आने दी. देश के सभी शहीद सैनिकों को, अपने कर्तव्य में निस्वार्थ भाव से निमग्न रहने वाले समस्त सैनिकों को नमन.
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अपने जीवन को कुर्बान कर देने वाले, पल-प्रति-पल मौत के साये में बैठे रहने वाले, अपने घर-परिवार से दूर नितांत निर्जन में कर्तव्य निर्वहन करने वाले जाँबाज़ सैनिकों के लिए बस चंद शब्द, चंद वाक्य, चंद फूल, दो-चार मालाएँ, दो-चार दीप और फिर उनकी शहादत को विस्मृत कर देना, उन सैनिकों को विस्मृत कर देना. बस! इतना सा ही तो दायित्व निभाते हैं हम. ये अपने आपमें कितना आश्चर्यजनक है साथ ही विद्रूपता से भरा हुआ कि जिन सैनिकों के चलते हम स्वतंत्रता का आनंद उठा रहे हैं उन्हीं सैनिकों को हमारा समाज न तो जीते-जी यथोचित सम्मान देता है और न ही उनकी शहादत के बाद. समूचे परिदृश्य को राजनैतिक चश्मे से देखने की आदत के चलते, वातावरण में तुष्टिकरण का रंग भरने की कुप्रवृत्ति के चलते, प्रत्येक कार्य के पीछे स्वार्थ होने की मानसिकता के चलते समाज में सैनिकों के प्रति भी सम्मान का भाव धीरे-धीरे तिरोहित होता जा रहा है. न केवल सरकारें वरन आम नागरिक भी सैनिकों को देश पर जान न्यौछावर करने वाले के रूप में नहीं वरन सेना में नौकरी करने वाले व्यक्ति के रूप में देखने लगे हैं; उनके कार्य को देश-प्रेम से नहीं बल्कि जीवन-यापन से जोड़ने लगे हैं; उनकी शहादत को शहादत नहीं वरन नौकरी करने का अंजाम बताने लगे हैं. ऐसा इसलिए सच दिखता है क्योंकि अब सैनिकों के काफिले शहर से  ख़ामोशी से गुजर जाते हैं. उनके निकलने पर न कोई बालक, न कोई युवा, न कोई बुजुर्ग जयहिन्द की मुद्रा में दिखता है, न ही भारत माता की जय का घोष सुनाई देता है. समाज की ऐसी बेरुखी के चलते ही सरकारें भी सैनिकों के प्रति अपने कर्तव्य-दायित्व से विमुख होती दिखने लगी हैं. यदि ऐसा न होता तो किसी शहीद सैनिक के नाम पर कोई नेता अपशब्द बोलने की हिम्मत न करता; किसी सैनिक की शहादत को तुष्टिकरण से न जोड़ा जाता; किसी सैन्य कार्यवाही को फर्जी न बताया जाता.
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संभव है कि एक सैनिक के लिए अपनी जीविका के लिए सेना में जाना मजबूरी रहती हो किन्तु किसी सैनिक की शहादत के बाद भी उसकी संतानों के द्वारा उस पर गर्व करना, सैनिक बनकर देश की रक्षा करने का संकल्प लेना, उस अमर शहीद के परिजनों द्वारा तिरंगे पर बलिदान होते रहने की कसम उठाना तो मजबूरी नहीं हो सकती? बहरहाल, देर तो अभी भी नहीं हुई है. हम सभी को एकसाथ जागना होगा, निरंतर जागे रहना होगा. न सही प्रतिदिन तो माह में किसी एक दिन समस्त सैनिकों को पूरे सम्मान के साथ याद तो कर ही सकते हैं. न सही उनके लिए कोई भव्य आयोजन मगर अपने बच्चों को अपने सैनिकों की वीरता के बारे में तो बता ही सकते हैं. न सही किसी राजनीति का समर्थन किन्तु सैनिकों के अपमान में बोले जाने वाले वचनों का पुरजोर विरोध तो कर ही सकते हैं.
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समाज किसी भी दशा में जाए, राजनीति अपनी करवट किसी भी तरफ ले, तुष्टिकरण की नीति क्या हो, ये अलग बात है मगर सच ये है कि ये सैनिक हैं, इसलिए हम हैं; सच ये है कि सैनिकों की ऊँगली ट्रिगर पर होती है, तभी हम खुली हवा में साँस ले रहे हैं; सच ये है कि वो हजारों फीट ऊपर ठण्ड में अपनी हड्डियाँ गलाता है, तभी हम बुद्धिजीवी होने का दंभ पाल पाते हैं; सच ये है कि वो सैनिक अपनी जान को दाँव पर लगाये बैठा होता है, तभी हम पूरी तरह जीवन का आनन्द उठा पाते हैं; सच ये है कि एक सैनिक अपने परिवार से दूर तन्मयता से अपना कर्तव्य निभाता है, तभी हम अपने परिवार के साथ खुशियाँ बाँट पाते हैं. देखा जाये तो अंतिम सच यही है; कठोर सच यही है; आँसू लाने वाला सच यही है; तिरंगे पर मर मिटने वाला सच यही है; परिवार में एक शहादत के बाद भी उनकी संतानों सैनिक बनाने वाला सच यही है. कम से कम हम नागरिक तो इस सच को विस्मृत न होने दें; कम से कम हम नागरिक तो सैनिकों के सम्मान को कम न होने दें; कम से कम हम नागरिक तो उनकी शहादत पर राजनीति न होने दें; कम से कम हम नागरिक तो उन सैनिकों को गुमनामी में न खोने दें.
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आइये संकल्पित हों, अपने देश के लिए, अपने तिरंगे के लिए और उससे भी आगे आकर अपने जाँबाज़ सैनिकों के लिए. जय हिन्द, जय हिन्द की सेना..!! अंत में पुनः एक नई सुबह की कामना के साथ, वीर सैनिकों को नमन करते हुए आज की बुलेटिन, ११५०वीं बुलेटिन आपके सामने है.

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शुक्रवार, 21 मार्च 2014

विश्व वानिकी दिवस, खुशवंत सिंह और ब्लॉग बुलेटिन

सभी चिट्ठाकार मित्रों को सादर नमन।।


आज विश्व वानिकी दिवस है। वानिकी दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। विश्व वानिकी दिवस पहली बार वर्ष 1971 ई. में इस उद्देश्य से मनाया गया था कि दुनिया के तमाम देश अपनी मातृभूमि की मिट्टी और वन - सम्पदा का महत्व समझे तथा अपने - अपने देश के वनों और जंगलों का संरक्षण करें। अगर हम अपने देश की बात करे तो भारत की 22.7 % भूमि पर ही वनों और जंगलों का अस्तित्व रह गया। लेकिन बढ़ती जनसंख्या, प्रदूषण और लकड़ियों की बढ़ती मांग के कारण ये जंगल भी जल्दी ही विलुप्ति के कगार पर आ जाएँगे। इसीलिए हमें ईश्वर की दी गई अमूल निधि यानि हमारे जंगलों को बचाना होगा। पृथ्वी पर इस हरे सोने के अस्तित्व के लिए हमें अपने आसपास पेड़ - पौधे अवश्य लगाने चाहिए। जय हिन्द। जय भारत।।

खुशवंत सिंह 

कल मशहूर पत्रकार, स्तम्भकार और लेखक खुशवंत सिंह जी का निधन हो गया। खुशवंत जी का जन्म 2 फरवरी, 1915 ई. को हदाली ( अब पाकिस्तान में ) में हुआ था। खुशवंत जी की प्रसिद्ध अंग्रेजी कृतियाँ है :- "ट्रेन टू पाकिस्तान", "आई शैल नॉट हियर द नाइटिंगल", "देल्ही", "ए हिस्ट्री ऑफ द सिख्स", "द सनसेट क्लब", "द लैसंस ऑफ माई लाइफ" आदि। वर्ष 1984 ई. में उन्होंने "ऑपरेशन ब्लू स्टार" के विरोध में "पदम् भूषण" सम्मान लौटा दिया था। आज हम सब खुशवंत सिंह जी को मौन श्रद्धांजलि अर्पित करते है सादर।।


अब चलते हैं आज कि बुलेटिन की ओर ……… 














आज कि बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे।।

लेखागार