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गुरुवार, 21 मार्च 2013

पोस्ट हमारी – लिंक तुम्हारे : ४५०वीं ब्लॉग-बुलेटिन



पिछला दू महीना से टेंसन के जंगल में अइसा भटक रहे हैं कि का बताएं. मुसीबत, बीमारी अऊर नौकरी का माया मिरिग एतना दौडाया है हमको कि दिमागी सांति की सीता मैया भी सोचती होंगी कि कउन साईत-महूरत में हम ई मिरिग लाने गए. मगर ओही बात कि परेसानी का मार्केटिंग करने से का फ़ायदा, एही से सीधा बुलेटिन नंबर साढ़े चार सौ पर आते हैं.

बंगाल में एगो बी-ग्रेड सिनेमा बनाने वाला है स्वपन साहा (नाम भुला रहे हैं-मगर लगता है सहिये है). टेक्नीशियन स्टुडियो, टॉलीगंज, कोलकाता में उनका सिनेमा का सेट लगा हुआ था. एगो घर का दिरिस. मामूली बात लगेगा आपको. बाकी कमाल ई था कि ओही घर के सेट में एक साथ तीन अलग अलग सिनेमा का सूटिंग, अलग-अलग कलाकार के साथ चल रहा था. मतलब खर्चा एक अऊर चर्चा तीन.

कोई मजाक में पूछ दिया कि स्वपन दा, आपको बुझाता नहीं है कि पब्लिक को मालूम चल जाएगा कि एही सेट फलाना सिनेमा में भी था. ओही सोफा, ओही परदा, ओही रंग, ओही टी-सेट. स्वपन साहा हंसकर बोले कि पागोल रे तुमी. आम सिनेमा देखने वाला का याददाश्त बहुत कमजोर होता है. ऊ बस सिनेमा देखता है; सोफा, पर्दा अऊर टी-सेट नाहिं. हम फालतू में काहे खर्चा करने जाएँ.

आज स्वपन साहा का इयाद ई कारन से आया कि हमरा जब ई बुलेटिन बांचने का नंबर आया त हमहूँ सोचे कि हमेसा के जइसा कुछ लिख देते हैं, कुछ लिंक लगा देते हैं, कुछ बात बना देते हैं. एतना दिन बाद हमको देखकर पब्लिक अइसहीं खुस हो जाएगा (कमाल का ओभर-कॉन्फिडेंस है), कोई सोचेगा भी नहीं कि देहाती भुच्च कहीं का, एतना दिन से लापता है, त ई सब ब्लॉग पढ़ा कब. खाली लिंक फैला कर डीऊटी पूरा कर दिहिस.

हमरा अंतरात्मा हमको धिक्कारा अऊर आवाज सुनाई दिया, “बिहारी! तुझे ब्लॉग में लोग तेरी पोस्ट के कारन नहीं, तेरे कमेन्ट के कारण जानते है. इसलिए बिना पढ़े लिंक भी मत दे. वैसे भी गुजरात में रहने के कारण तू बहुतों की आँखों की किरकिरी बना है. एक तो बिहारी और ऊपर से गुजरात में.”

त हम भी होस में आ गए. तुरत अर्चना को संपर्क किये, अइसा मुसीबत में हमरी छोटी बहिन हमेसा मदद करती है. बोले, “शिवम ने ४५०वीं बुलेटिन के लिए कहा है. मैं इधर बिलकुल कट-ऑफ हूँ. एक काम करो, पोस्ट हमारी - लिंक तुम्हारे की तर्ज़ पर, मैं पोस्ट लिख देता हूँ, तुम लिंक्स चुन दो. बिलकुल अपनी पसंद के.” ऊ भला कहाँ मना करने वाली थी. त आपलोग भी देखिये, छोट भाई शिवम मिश्र के अनुरोध अऊर छोट बहिन अर्चनाचावजी के सहजोग से पेस है आज का ४५० वाँ बुलेटिन.

आप आनन्द उठाइये, हम फिर से चलते हैं टेंसन के जंगल में. दुआ कीजिये कि जल्दिये लौटें, बस एही डर लगता है कि कहीं लौटने तक सांति की सीता का हरण न हो जाए.

आपका


भैया का आदेस है तो मना करने का तो सवाल ही नहीं पैदा हो सकता …..भैया की सांति की सीता के बाहर खींच दी है - एगो लक्समन रेखा …..और खास बुलेटिन की खातिर मैंने चुनें है, ये लिंक्स खास आपके लिए ----

तो मैंने चुने हैं ये लिंक स्पेशल पोस्ट के लिए -----

१ -- चौखटें   लगी हुई हैं ... आलोक दीक्षित जी के ब्लॉग पर ...

२ -- नई उडा़न पर चलें साथ ... उपासना सिंह जी के साथ ...

३-- उम्मीद तो हरी है  मिलेगी मंजिल अपनी ... ज्योति खरे जी की खोज जारी है ...

४-- अनुभूति  हुई मुझे भी... कालीपद"प्रसाद" जी करवा रहे हैं ...

५--  स्वस्थ जीवन  किसे नहीं पसन्द ?... बता रहे हैं राजेन्द्रकुमार जी

६-- एक   आभा  अनोखी  ....रमाकान्त भैया की ....

७--  इधर उधर छिटके    स्याही के बूटे .....दिखा रही हैं शिखा गुप्ता जी

8--
छू लेंगी आपको  भी  लहरें  ... अगर पूजा के साथ कहीं चल पड़े तो ....
 
९--   अपनी-अपनी  खामोशियाँ  .... साथ लेकर सफ़र कर सकते हैं राहुल मिश्रा के साथ ....

१०--मिलिए एक ऐसी लड़की अंजना दयाल से-जो  रंग बिरंगी एकता  का स्वप्न संजोए हुए  है....

११-- मेरा पन्ना  लेकिन ये कह रहे हैं मेरा है ....भला कौन  है ये ?

१२-- सिंहावलोकन  ... नन्ही सी  गौरैया ...और गज़ब का  अवलोकन ....

१३-- आहुति .तुम्हारे लिए .... सिर्फ़ तुम्हारे

१४-- vikram7 -- पर समय कब ठहरता है ,बता रहे हैं विक्रम सिंह जी

१५--निवेदिता जी खोल लेती है ,कभी आँखों का, कभी मन का -   झरोंखा 

१६ --  Aabshaar    -- औरों से थोड़ा हटकर ही है- विशाल ....

१७ --   क्षितिज का कोना   दिखा रही हैं शैली चतुर्वेदी जी

१८ -- बच्चों का कोना  बनाया है कैलाश शर्मा जी ने  बच्चों के लिए ...

१९ -- सिंपल और इमोशनल पर्सन रेवा खास होने का अहसास करा रही हैं  - Love  के साथ ...

२०-- लाड़ली "सदा " रहती है माँ के करीब ...

२१--अन्नपूर्णा बाजपेयी जी से सुनिए - नूतन (कहानियाँ)  

२२-- एक अनोखा महाकाव्य -   गुरतुर गोठ  पर ...

२३-- उन्मेष - ब्लॉग को लिखते हैं - अर्यमन चेतस पाण्डेय और इनका कहना है - "आप सब मम्मी लोग एक जैसी होती हैं" :-)

२४-- सुनहरी कलम से  तो यही सब रचा जा सकता है,बता रहे हैं - जयकॄष्णराय तुषार ...

२५-- कलम प्रिय सखी है Sehar की और जिसमें है खुशबू जंगल की ......

सादर
अर्चना

ब्लॉग बुलेटिन की पूरी टीम की ओर से आप सब पाठकों का बहुत बहुत आभार ... ऐसे ही अपना स्नेह बनाए रखिएगा !

लेखागार