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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

ठिठके एहसास - 4



एहसास -
कभी इस मुंडेर
कभी उस मुंडेर
दानों की प्रत्याशा में 
गौरैया बन जाते हैं 
प्यास लगी तो नदी,झरनों की तलाश में 
लम्बी उड़ान भरते हैं 
मिल गया दाना,पानी तो ठिठक जाते हैं 
..... फिर जल्दी जल्दी चोंच में भर लेते हैं ....


वन्दना महतो - http://vandanamahto.blogspot.in/

आज भी
मेरे कमरे में, वो
हमेशा की तरह झाँक रही है.
मेरे सुख व दुःख,
आक्रोश व पश्चात्ताप,
जय व पराजय,
जैसे हर क्षण का सदियों से, वो
हिसाब रख रही है.
कभी तुम्हें-भूल मुझे सुलाने की प्रयत्न,
तो कभी तुम्हारी-ही याद में
जगे रहने की मनुहार करती है वो.
एक क्षण को तो तुमसे ही
दूर कर जाती है वो,
तो दूसरे ही क्षण तुम्हारी
ही बातें गुनगुनाती रहती है वो.
मेरे सबसे करीब रहते हुए भी
क्यूँ तुम इतनी दूर रहती हो,
कभी बुरी, तो कभी इतनी अच्छी क्यूँ लगती हो.
"अमावस की रात में भी रोशनी के दायरें मिलते हैं,
चाँद नहीं तो क्या हुआ, सितारें भी चमकते हैं"- यूँ कहते हुए
तुम कितना मुझे समझाती हो.
हाँ! मेरी खामोशी,
मेरा कितना ख्याल तुम रखती हो.


कमलेश अग्रवाल - http://astitva53.wordpress.com/
(यह एक रूपक कविता है जिसमें कुम्भार पिता,घड़ा पुत्री एवं ग्राहक दामाद के रूप में)


एक कुंभार ने बड़े जतन से एक घड़ा बनाया 
उसे पकाया, पकाके उसे निखारा 
तभी एक ग्राहक उसकी निगाह़ मे आया 
जनाब, घड़ा ग्राहक को खुब पसंद आया 
फ़िर क्या था... 
घड़ा ग्राहक के संग चल पड़ा 
अब मालिक बड़ा ही खुश था 
अपनी किस्मत पर बड़ा ही गर्वित था
पर प्रभु को ये मंजुर नहीं था 
कुछ महिनों बाद---वही ग्राहक कुंभार के पास आया
उसने कुंभार से कहा,
भाई कुंभार, ये घड़ा मेरे ही सिर मारना था?
तुम्हें पता है ये किस कदर रिश्ता है?
कुंभार ने हाथजोड़ नम्रता से कह,"जनाब, घड़ा तो रिसना ही अच्छा होत है"
यह सुन ग्राहक बिगड़ते हुये बोला,
"अच्छा ये बात है! तब रिसना घड़ा आप को ही मुबारक
रोज़ इसका ठंडा पानी पीओ और राम-राम कहो
इतना सुनते ही कुंभार मुंह लटकाये एक गुन्हेग़ार की भांति यूं बोला, 
"लाईये साहब, मैं इसका रिसना बंद कर दुं और इसे आपके पसंद का ही कर दुं " 
ग्राहक ये सुनते ही इठलाया, अपनी चतुराई पर मुस्कराया ,
घड़ा कुंभार को थमाते हुये बोला- 
"ठीक से मरम्मत करना,अगलीबार शिकायत नहीं करुंगा,इसे तुम्हारे सिर ही पटकुंगा" 
कुंभार ने घड़ा हाथ मे लिया बेबस हो घड़े से यूं कहा, 
"मुझे तुम से कतई ये उम्मीद न थी...(२) 
क्यों मेरे परिश्रम को लज्जित किया तुमने ? 
क्या तुम नहीं चाहते कि मेरे और घड़े भी बिकें ?" घड़ा खामोश था 
अंदर ही अंदर आंसु पिये था 
आंखे नम कर वह यूं बोला, 
"अब मालिक ऎसा न होगा, रिसना मेरा तुरंत ही बंद होगा 
गुस्ताख़ी चाहता हुं इस शिकायत के लिये, न होगि चूक भविष्य के लिये " 
कुछ दिनों बाद जब ग्राहक आया 
कुंभार ने वह घड़ा सा-आदर ग्राहक को थमाया  
विनीत सह हाथज़ोड ग्राहक से यों कहा.. 
"जनाब, इसका रिसना अब बिल्कुल बंद है 
अब हर प्रकार से ये आप के ही अनुकूल है " 
ग्राहक अब बड़ा खुश था, अपने किये पर बड़ा गर्वित था 
पर बेचारा घड़ा बड़ा ही खिन्न व मज़बुर था 
वह सोच रहा था..
काश ! ग्राहक के हाथों की पकड़् छूटे और वह इस दंभी दूनिया से ज़्ल्द ही उठे---

  
आत्माराम शर्मा  - http://atmaramsharma.blogspot.in/

प्यार की खातिर

गुजर गए दिन

राजा और रंक में जो भेद होता है, वही उसमें और मुझमें था। मैं सपने देखता था और जाहिर है कि सपने देखने पर कोई पाबंदी न उस समय थी, न आज है। उसका भाई मेरा दोस्त था। दसियों बार मैंने उसके भाई से अपनी मन की बात कही थी। कहा था कि चार पैसे कमाने की लियाकत अगर मैंने पायी तो तुम्हारी बहन का हाथ मागूंगा, तब तुम मना नहीं करना। उसने कहा एीक है पहले कुछ बन तो जाओ। समय बदला और मेरी रोजी-रोटी की जुगाड़ जम गयी। मैंने उसके भाई को उसका वादा याद दिलाया। भाई ने पहले हां की, फिर अगले ही दिन बदल गया। मेरे दिल पर चोट लगी। मैंने बहुत चिरौरी की। कहा की ऐसा न करो। यह जो मैं आज हूं वह तुम्हारी बहन के प्रेम में पड़कर ही बना हूं। मेरी पूरी उपलब्धि तुम्हारी बहन की अमानत है। अगर तुम्हारी बहन मुझे स्वीकार नहीं करती तो मैं इस उपलब्धि को लिये-लिये कहां फिरूंगा। जैसा कि जालिम जमाना करता है, वही उसके भाई ने किया। वह नहीं माना और अपने वादे से मुकर गया। मैं रोया, मेरा दिल रोया और वक्त ने घाव भरने शुरू कर दिये।

वक्त की करवट

इतने लम्बे अरसे के बाद आज उसका फोन आया। वह मुझसे मिलना चाहता था। मैंने कहा किसलिये। वह बोला कुछ बात करना चाहता हूं। मैंने कहा आ जाओ। हमने मिलकर बातें की। बैएकर दारू पी। मुझे उसको दारू पिलाना अच्छा लग रहा था। अच्छा इसलिए क्योंकि वह परेशान था। फटेहाल था। बेरोजगार था। उसकी बातों में उसका पुराना दम्भ गलकर बह रहा था। मैंने उसे और दारू पिलायी। वह रोने लगा। बोला तुम मेरे लिये कुछ करो। हजार-दो हजार की नौकरी की जुगाड़ ही करा दो। उसकी आंखों में तैरती बेचारगी देखकर मुझे भीतर तक संतोष हुआ। मैंने कहा कि देखो यार तुम्हारी बहन के लिए अब भी मेरे दिल में कोमल भावनाएँ हैं। उन भावनाओं को आज मैं किस रूप में देखूं यह स्पष्ट नहीं है। क्योंकि वह भी शादीशुदा है और मेरा भी परिवार है। उन्हीं पुरानी मीएी भावनाओं को ध्यान में रख मैं तुम्हारे लिये जो बन पड़ेगा वह करूंगा। मेरा इतना कहना था कि वह लगभग रोते हुए मुझसे लिपटने लगा और बोला कि बिलकुल एीक कहते हो। मैं यही सोचकर तुम्हारे पास आया था कि तुम्ही मेरी बहन से सच्चा प्यार करते थे। उस सच्चे प्यार की खातिर मेरी मदद तुम जरूर ही करोगे और देखो मेरा सोचना कितना एीक निकला। आखिर तुम मेरी मदद करने के लिए मान ही गये। 

देना पड़ेगा

स्टेशन पर उसे छोड़कर मैं वापस लौटा। मन में उसके लिए गालियां उमड़ रही हैं। स्वार्थी, कमीना। दूसरे क्षण उसकी बहन का कोमल चेहरा मेरी आंखों में उतर आया है। आज मेरी जो भी औकात है, वह उसके बाप के सामने प्रस्तुत करने के लिए ही मैंने कमाई थी। औकात की इस कमाई को मैं उसके सामने तो प्रस्तुत नहीं कर सका, लेकिन इस कमीने को मैं अपने व्यक्तित्व की एक फूटी कौड़ी भी देने को तैयार नहीं हूं। मेरी आंखों में उसकी बहन के कोमल चेहरे में याचना उभरती है। गाली देती हुई मेरी जीभ लड़खड़ाने लगती है। मैं कमजोर पड़ने लगता हूं। वह व्यक्तित्व जो मैंने उसकी बहन के लिए कमाया था, उसका भाई उसमें से कुछ हिस्सा मांगने आया था। शायद मुझे कुछ भुगतान करना पड़ेगा। मेरे दिल की कोमल भावनाओं के खातिर शायद मुझे उसकी कुछ मदद करनी पड़ेगी।

अगली उड़ान भरती हूँ ... गौरैया को खुद में जी लेती हूँ 

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

ठिठके एहसास - 3



सुर,ताल...यूँ कहो सरगम 
कभी तुम्हारी लटों से उलझे हैं
टाई की गांठ में कोई राग मचला है 
बच्चे की पहली रुदन में मल्हार राग गूंजा है 
यह सच है कि किसी भी राग में 
कोई भी बंदिश गाने से पहले 
उस राग विशेष का समां बाँधना ज़रूरी होता है-
इसलिये, आरोह, अवरोह, पकड़, आलाप आदि गा कर राग को स्थापित किया जाता है
पर कभी कभी पूरी कायनात राग विशेष का समां बाँध देती है
. वाद्य-यन्त्र अदृश्य परन्तु मुखर ...और एहसासों के ठिठके कदमों के संग हम !!!

पल्लवी त्रिवेदी - http://kuchehsaas.blogspot.in/

मैं तुम्हारे साथ सुरों से बंधी हुई हूँ! न जाने कौन से प्रहर में कौन सा कोमल सुर आकर हौले से मेरे तार तुमसे बाँध गया! शायद उस दिन जब तुम भैरव के आलाप के साथ सूरज को जगा रहे थे तभी रिषभ आकर मेरे दुपट्टे के सितारों में उलझ गया होगा या फिर उस दिन जब मैं सांझ की बेला में घंटियाँ टनटनाती धूल के बादल उड़ाती गायों को यमन की पकड़ समझा रही थी तब शायद निषाद आवारागर्दी करता हुआ तुम्हारे काँधे पर जाकर झूल गया होगा!
तुमने एक बार कहा था कि " आसमान से सुर बरसते हैं... बस उसे सुनने के लिए चेहरे पर नहीं दिल में कान होना चाहिए " फिर जिस दिन तुमने रात को छत की मुंडेर पर बागेश्री के सुरों को हौले से उड़ा रहे थे तब मेरे दिल में भी कान उग आये थे! और दो आँखें भी जिनसे मैंने पूरी श्रष्टि के कोने कोने से सुरों को बहकर तुम्हारे पास आकर पालथी लगाकर बैठते देखा था!
और तुम्हे याद है वो रात जब आखिरी पहर चाँद ने हमसे सोहनी की फरमाइश की थी और बादलों पर ठुड्डी टिकाये चांद तक हमने एक तराना पहुँचाया था ..तब तुम्हारे साथ मींड लेते हुए मैंने मेरी आत्मा को तुम्हारी आत्मा में घुलते देखा था! मेरी आँख की कोर से निकले आंसू को गंधार ने संभाला था और एक सुर भीगकर हवा में गुम हो गया था!
सुरों की माला हमने एक दूसरे के गले में पहनायी है! षडज से निषाद तक हमारी साँसें एक लय में गुंथी हुई चल रही हैं! मुझे नहीं जाना है ताजमहल, न ही देखना है इजिप्ट के पिरामिड कि मैंने तुम्हारे साथ विश्व के सात आश्चर्यों की यात्रा कर ली है!


मैं अकेला रहता हूँ..
आते हैं लोग जाते हैं... 
मैं अकेला रहता हूँ..

साथ कोई चलने वाला नहीं... 
जो साथी है वो साथ नहीं...
.....है दूर कहीं 
अकेला ही इस भीड़ से जूझता  हूँ 
...मैं अकेला रहता हूँ...

कहने को महफिल सजी रहती है आसपास... 
शामिल  होके भी में उनमें शामिल नहीं... 
मैं अकेला रहता हूँ...
कहते है तन्हाई सिखाती है बहुत कुछ.. 
पर रूलाती भी है अक्सर.. 
आंसू देखो रोज़ लड़ते है मुझसे 
रूठ भी जाते हैं कभी...
.........पूछते हैं... 
क्या कोई भी नहीं यहाँ क्या?.. 
समझा नहीं पाता उन्हें क्यूँ मैं अकेले रहता हूँ...

हँसते चेहरे के पीछे भी... 
लाखो छुपे आंसू होते हैं.. 
यूँ तो दीखते नहीं उजाले में.. 
अंधेरो से प्यार करते हैं.... 
लोग समझेंगे नहीं...
देख नहीं पातें हैं कि मैं अकेला रहता हूँ..

खुशी दो पल मिल जाती है 
..तो अहसास होता है की साँस अभी बाकी है.. 
अपने आप को आईने में देख नहीं पाता आजकल
डरता हूँ कहीं आईने को भी शिकायत न हो मुझसे.. 
कि  क्यूँ मैं अकेला रहता हूँ....

दर्द है पर खुशी मिलती है... 
खुद से जब दो बातें करता हूँ,..
..अच्छा लगता है...

समझाता हूँ दिल को कभी कभी.. 
ये सोनेपन का आलम मुख्तसर.. 
बस इंतज़ार है कोई ख़ास के वापस आने का
 फिर नहीं कहूँगा 
....कि  मैं अकेला रहता हूँ..

रमाकांत सिंह - http://zaruratakaltara.blogspot.in/

अब सिद्धार्थ बुद्ध नहीं बनेगा
शुद्धोधन अपने पुत्र पर
यशोधरा अपने त्याग पर
कभी गर्व नहीं कर सकेंगे।

क्यों अवतरित होगा भगीरथ
तर्पण करने पूर्वजों के
नहीं बहेगी चन्द्रशेखर की 
जटाओं से गंगा की धारा।

निरपराध बर्बरीक 
अब अपनी गर्दन बचा लेगा
कृष्‍ण के सुदर्शन चक्र से
ठहाका मारेगा स्वजनों के वध पर
परम आनंद लेगा 
सशरीर युद्ध की विभीषिका का।
धृतराष्‍ट प्रसन्न है अपनी दृष्टिटहीनता पर
गांधारी की नंगी आंखों में कोई क्लेष नहीं
दुर्योधन पारंगत हो गया है
युद्ध और राजनीति में।
समय और चक्र!

काट लेगा एकलव्य गुरु द्रोण का अंगूठा
प्रवीण क्यों होगा
अर्जुन
छल से धर्नुविद्या में
किन्तु समर भूमि मे 
कर्ण ही बलि और महानायक होगा।
गोपियों का मोह भंग हो गया
गोकुल का ग्वाला अपंग हो गया
नाग कालिया दह से बाहर निकल

राजपथ पर विष उगल गया
लाक्षागृह का निर्माण पांण्डव करायेंगे
यशोदानंदन कदंब पर बैठे बंशी बजायेंगे
पॉचजन्य धरा रह जायेगा।
परीक्षित बच जायेगा
खण्ड-खण्ड होगा भरत का भरतखण्डे
संजय बदला-बदला धृतराष्‍ट संजय बन गया
समय और च्रक!

अब दशरथ का शब्दभेदी बाण भोथरा हो गया है
श्रवन मरेगा ही नहीं, न मां बाप श्राप देंगे
न होगा पुत्र शोक, न रावण का नाश।
न बाली का वध न सुग्रीव की मित्रता
राघवेद्र सरकार भी अब मर्यादित हो गये हैं
उर्मिला द्वार पर प्रतीक्षा करे
शनै-शनै रामराज्य की कल्पना मे
ऋषियों के साथ जनपद भी आत्मदाह कर लेंगे
गर्व से रावण राज करेगा लंका पर
विभीषण आज्ञाकारी अनुज बन राज-सुख भोगेगा
समय और चक्र!

शकुन्तला अब घर पर नहायेगी
तब ही अंगूठी अंगुली में बच पायेगी
दुष्‍यंत हर पल याद करता रहेगा
राज काज में भी दिया हुआ वादा
भरत निर्भीक खेलेगा सिंह की जगह न्याय से।
हरबोलवा गायेगा झांसी की रानी?
देश की खातिर भगत चढेगा फांसी?
वतन फरोशी के बिस्मिल गीत गायेगा?
चारों पहर बह रही है खून की नदियां
दिल और दिमाग जैसे कुंद हो गया
समय और चक्र!

एहसास ठिठके हो न हों 
मैं अन्यमनस्क - 
सोच और सोच से जुड़े व्यक्ति की व्याख्या
अपने एह्सासित धरातल पर कर रही हूँ...
नहीं...कदापि मुझे सार तत्व निकालने का अधिकार नहीं
पर अपनी सोच को मैं बाधित नहीं कर सकती 
मैं बाध्य हूँ इन एहसासों की सहयात्री बनने को ..... क्रमशः 

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

ठिठके एहसास - 2



प्रकृति के रोम रोम में कौन सा रस नहीं,कहीं फूल,कहीं फल,कहीं नदी,कहीं झरने,कहीं रेत,कहीं बंजर,कहीं पर्वत....जितने रास्ते,उतने मायने- उपजाऊ धरती यदि अवर्णनीय है तो बंजर धरती से भी आगाज़ उठते हैं....कौंधती है प्रश्नों की बिजलियाँ- आखिर क्यूँ ! आधी जगह बारिश और एक कदम आगे धूप....इस अदभुत दृश्य के निकट ठिठकती है आँखें,मन और बादलों के समूह जैसी सोच ! मन और मस्तिष्क की सोच लेखन का उदगम है .... विराम लेना चाहो तो भी विराम नहीं .... एहसास ठिठके भी रहते हैं और चलते भी हैं,
कुछ ठिठके ख्याल चलते हुए - इस मन से उस मन तक -

 मन्टू कुमार -  http://mannkekonese.blogspot.in/

मै कौन हूँ???
यह एक ऐसा अटल सवाल है,जिसका जवाब पल-पल बदलता है और हमें सोचने पर मजबूर करता है |जिंदगी के हर सफर पर...हर मोड़ पर यह ओट बनकर जवाब माँगता है जो अब-तक के जवाबों से शायद संतुष्ट नही |
हम देखते हैं कि कभी-कभी किसी बात के अंत में यही जिंदगी हमसे कुछ दूर पर खड़ी होकर,हमारी नादानी पर मुस्कुरा रहीं होती है,जिससे इस सच का पता चलता है कि हमने आज-तक इस सवाल के जवाब देने में कहीं ना कहीं झूठ का सहारा लिया है | जिंदगी सही मायने में आगे बढ़े तो इसके लिए सच्चाई को आगे आना ही पड़ेगा और इसका फैसला हमारे हाथों में है |
हम खुद के नज़रिए में अपने-आप को काबिल मानकर मन को तसल्ली दिला सकते हैं पर जिंदगी केवल अपने खुद से नही चलती,इससे जुड़े हैं कई और जिनकी नज़र में हमारे वजूद का एहसास काफी हद तक मायने रखता है...यहीं जीवन का सच है...थोड़ा अजीब है पर सच है |
मेरे जिंदगी से भी जुड़े है कई ऐसे शख्स जिनकों,मुझसे उम्मीद है...शायद मै नही जानता कि वे मेरे बारे में क्या नज़रिया रखते हैं पर इतना जानता हूँ कि मेरी जिंदगी में सच्चे मन से इनका होना...सबकुछ बयां कर देता है(शायद)...
मै कौन हूँ ???
मै हूँ...
उस पिता का बेटा..." जो यह सोचकर आश लगाए बैठा है कि जो सपने मै नहीं देख सका वो अपने बेटे को हर नामुमकिन कोशिश करके जरुर दिखाऊँगा...जो कसक अधूरी रह गई वो बेटे के सहारे पूरा करूँगा "
मै हूँ...                               
उस माँ का बेटा..." जो दरवाजे पर बाट जोहे खड़ी रहती है...अपने सच्चे बेटे के इंतजार में जो दुनिया के नज़र में कैसा भी हों...जो जी भर के देखना चाहती है...जो फिर से गले लगाना चाहती है...चूमना चाहती है...फिर से दुलारना चाहती है "
मै हूँ...
उस बहन का भाई..."जो मजबूरन वो ना कर सकीं,मुझसे चाहती है...जिसके आँखों तले एक कामयाब भाई का 
सपना पल रहा है...जिसको इंतजार है एक मजबूत कलाई पर राखी बाँधने को "
मै हूँ...
उस भाई का भाई..."जिसको विश्वास है मुझपर...हर एक फैसले पर...जो उन्हीं राहों को पीछा करता हुआ चला
आ रहा है,जहाँ मेरे कदमों के निशान मौजूद है "
मै हूँ...
उस दोस्त का दोस्त..."जिसने हर हालात में..हर पल..हर दम..मुझे जिंदगी को जीना सिखाया...जो आज मेरे पास नही पर दिल के बहुत करीब है "
मै हूँ...
किसी पराए के लिए अपना..." जो अनजान..बेखबर है...जिसको किसी अपने की तलाश है,इस छोटी सी दुनिया में "
मै हूँ...
एक आम आदमी जैसा दिखने वाला प्राणी...जो जिंदगी के हर पहलू को स्वीकारता आया है...जो जिंदगी के हर रंग को जीना चाहता है...जो इस बात में विश्वास रखता है कि दूसरों की खुशी में ही अपनी खुशी है...जिसने सिखा है हर एक को अहमियत देना...जिसको कुछ पाने की ललक है और खोना भी बखूबी जानता है "

मै तो इतना सा जानता हूँ कि जब कोई किसी से उम्मीद रखता है,तो सामने वाले को भी चाहिए कि वह उसके उम्मीदों पर खरा उतरे...क्यूंकि अगर उम्मीद पूरी ना हों तो बहुत दुःख होता है |


-निहार रंजन -   http://kalambinbaat.blogspot.in/

इस कविता को पोस्ट करने से पहले यह बता दूँ की अपनी मिट्टी के कण-कण से मुझे बेहद प्यार है. यह देख कर बहुत अच्छा अनुभव होता है कि देश विकासरत है. हाँ कुछ ऐसी समस्याएँ जरूर हैं जिन्हें जिनपर सबको ध्यान देने की ज़रुरत है ताकि हर मायने में अपने देश को महान कहा जा सके. जो बातें अपने देश के बारे में  महान हैं उस पर सवाल नहीं है  यहाँ. ना ही वो कम होने वाले हैं. सवाल है यहाँ उन बातों पर जिनके बारे कदम उठाने की ज़रुरत है.

कैसे कह दूँ भारत महान?

जहाँ आज भी मर जाती बेटी 
जीवन में आने से पहले 
होती कलंकित वो जननी 
कुलदीपक जो ना जन ले 
हर क्षण वह फिर जलती है 
क्या है मुझे इसका अभिमान?
कैसे कह दूँ भारत महान?

जहाँ आज भी वर्ण-विभेद 
एक सामाजिक रोग है 
छुआछूत का दंश सह रहे 
अब भी करोड़ो लोग हैं 
जब तक ना हो इन रोगों का 
एक व्यापक समाधान 
कैसे कह दूँ भारत महान?

जहाँ आज भी एक अदना सा जन 
पिसता अफसर बेईमानों से 
हो जाती दफ़न जिनकी पीड़ा 
कुछ अखबारी हंगामों में 
और जंग कानूनी लड़ते 
हो जाते वो निष्प्राण 
कैसे कह दूँ भारत महान? 

जहां है अब भी अबला नारी 
जिसका शोभा है लाचारी 
धर्म, अशिक्षा से बंधीं
अब भी कैद है वो बेचारी 
वो बिना बताये दर्द-ए-दिल 
मर जाती सीकर जुबान 
कैसे कह दूँ भारत महान?

जहाँ आज भी लड़ते है कुछ लोग 
अपनी मज़हब की शान पर 
और रह रह सुलगा देते हैं 
घर एक-दूसरे का जान कर 
फिर बहती है खून की नदियाँ 
जिसमे आखिर मरता है “इंसान” 
कैसे कह दूँ भारत महान?

जहाँ आज भी स्तनों का उभार
लड़की को औरत बनाती है 
और गुड़िया के संग संग 
एक बच्चा भी दे जाती है 
फिर साल बीसवां लगते ही 
विधवा होकर होता उनका बलिदान*
कैसे कह दूँ भारत महान?

* एक सच्ची कथा व्यथा की जिससे मैं अवगत हुआ दो तीन महीने पहले. एक बच्ची जो १५ साल की उम्र में पत्नी बनती है, १७ साल की उम्र में माँ और २०वाँ साल आते आते विधवा. फिर उसका जीवन ऐसे समाज में गुजरना है जहाँ पुनर्विवाह की अनुमति नहीं है.

मेघा मल्लिक  -   http://mallickmegha.blogspot.in/

वक़्त की दरिया बहुत तेज़
बहती है ..
थामने की कोशिश करो तो
रेत सी फिसलती है 
गोया चंद दिनों पहले की
बात है..
फख्र से भाल उठा कर ,
आसमां से कहते थे,
थोडा और ऊँचा हो जा तू,
आगे मुझे तुझसे जाना है..
समीर ने भी अपनी ,
अमीरी की मंद-मंद,
तो कभी द्रुत चाल दिखाई,
हँस कर कहती रही उससे भी,
इठला ले थोड़ा तू भी हरजाई...
दिन बीतता रहा निशा की आड़ में,
सपने सुनहले बुनते रहे हम,
वक़्त की धार में....
सपने जो देखा,वो पाते गए हम,
प़र चाहत ख़तम ना हुई ,
खुद से ही दूर होते रहे हम,
हँसी आती है अब,
आह..
कितने बेवकूफ थे हम,
कल की चाह में "आज"खोते गए हम...

संगीता स्वरुप - http://geet7553.blogspot.in/

बैठी थीं दो स्त्रियां 
कानन कुञ्ज में 
गुमसुम सी 
नि:मग्न हुई 
अचानक एक 
बोल उठी ,
मांडवी ! ज़रा कहो तो ,
तुम  आपबीती .
निर्विकार भाव से 
बोली मांडवी कि 
क्या कहूँ और 
कौन सुनेगा हमें 
कौन पहचानता है 
बोलो न श्रुतिकीर्ति? 
हाँ  सच है - 
हम सीता  की भगिनियाँ
भरत, शत्रुघ्न की भार्या 
कहाँ- कहीं बोलो कभी 
हमारा नाम आया ? 
सीता का त्याग और 
भातृ - प्रेम लक्ष्मण का 
बस यही सबको 
नज़र आया .
उर्मिला का 
विरह वर्णन भी 
साकेत में वर्णित है 
इसी लिए 
उसका भी नाम
थोड़ा चर्चित है ..
हमारे नामों को 
कौन पहचानता है ?

श्रुतिकीर्ति की बात सुन 
मांडवी अपनी सोच में 
गुम हो गयी 
जिया था जो जीवन 
बस उसकी यादों में 
खो गयी ..
जब आये थे भरत 
ननिहाल से तो 
उनका विलाप याद आया 
राम को वापस लाने का 
मिलाप याद आया .
लौटे थे भाई की 
पादुकाएं ले कर 
और त्याग दिया था 
राजमहल को 
एक कुटी बना कर .
सीता को वनवास में भी 
पति संग सुख मिला था 
मुझे तो राजमहल में रह 
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ 
क्या वो 
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम 
अपनी पहचान भी 
खो गया है..
यह कहते सुनते  वो 
स्त्री छायाएं  न जाने 
कहाँ गुम हो गयीं 
और मेरे सामने एक 
प्रश्नचिंह  छोड़ गयीं ..
क्या सच ही 
इनका त्याग 
कोई त्याग नहीं था 
या फिर रामायण में 
इनका कोई महत्त्व नहीं था ???    


सुशील - http://ulooktimes.blogspot.in/

वैसे कुत्ते के पास मूँछ है 
पर ध्यान में ज्यादा 
रहती उसकी टेढी़ पूँछ है 
उसको टेढा़ रखना 
अगर उसको भाता है 
हर कोई क्यों उसको 
फिर सीधा करना चाहता है 
उसकी पूँछ तक रहे बात 
तब भी समझ में आती है 
पर जब कभी किसी को 
अपने सामने वाले की 
कोई बात पागल बनाती है 
ना जाने तुरंत उसे 
कुत्ते की टेढी़ पूँछ ही 
क्यों याद आ जाती है 
हर किसी की कम से कम 
एक पूँछ तो होती है 
किसी की जागी होती है 
किसी की सोई होती है 
पीछे होती है इसलिये 
खुद को दिख नहीं पाती है 
पर फितरत देखिये जनाब 
सामने वाले की पूँछ पर 
तुरंत नजर चली जाती है 
अपनी पूँछ उस समय 
आदमी भूल जाता है 
अगले की पूँछ पर 
कुछ भी कहने से बाज 
लेकिन नहीं आता है 
अच्छा किया हमने 
अपनी श्रीमती की 
सलाह पर तुरंत 
कार्यवाही कर डाली 
अपनी पूँछ कटवा कर 
बैंक लाकर में रख डाली 
अब कटी पूँछ पर कोई 
कुछ नहीं कह पाता है 
पूँछ हम हिला लेते हैं 
किसी के सामने 
जरूरत पड़ने पर कभी 
तो किसी को नजर 
भी नहीं आता है 
इसलिये अगले की 
पूँछ पर अगर कोई 
कुछ कहना चाहता है 
तो पहले अपनी पूँछ 
क्यों नहीं कटवाता है !!

सहमति हो या असहमति
कुठाओं में उलझा हो मन
बाँध टूट जाए तो प्रकृति के कण कण कलम की नोक पर होते हैं - क्रमशः 

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

ठिठके एहसास - 1




लहरों का आवेग,किनारों को छूना - कुछ नम मिट्टियों की यादें साथ ले जाना,अपनी गहराइयों में उन्हें रखना - और कहीं एक लम्हें का ठिठककर रुक जाना . उन एक लम्हों से मैं हर दिन गुजरती हूँ - नाम अलग अलग,पर शब्द भावों के सहयात्री . कभी मिले नहीं,न काल परिचय- फिर भी एक अनोखा रिश्ता . इन्हीं रिश्तों में ठिठके अपने अंदरूनी एहसासों को लिए मैं आई हूँ,पढकर जान ही लेंगे आप कि एहसास कहाँ,कब,किस तरह ठिठक जाया करते हैं. मुझे अच्छा लगता है चिड़िया बनना,चोंच में एहसासों के दाने उठा एहसासों के घर की छत पर उन्हें रख आना - भूख तो लगती है न ..... तो सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर आना होगा ही....गेंहू के सुडौल दानों से एहसास कभी धूप,कभी छाँव,कभी अचानक हुई बारिश से.... 
ओह,अब रहने भी देती हूँ भूमिका की सांकलों को यूँ हीं ..... एहसासों का निवाला लीजिये,और तृप्त हो जाइए -

प्रवीण यादव - http://pravinydv.blogspot.in/

मैं उसका हाथ थामे खड़ा हूँ.. चाँद की मद्धम रौशनी उसकी आँखों की चमक और बढ़ा रही है। मैं खामोश हूँ पर लाखों सवाल हैं जो उसकी लहराती लटों में उलझ उलझ कर मुझे बेचैन कर रही हैं... मुझे जवाब नहीं मिलता है और मैं भी उसकी सुनहली लटों में उलझ जाता हूँ।

मेरी बेचैनी को महसुस कर वो मेरी तरफ देखती है और मेरे सारे सवालों को पढ़ लेती है... उसकी आँखों की चमक अब बूंदें बनकर लुढ़कने को आतुर हैं। मैं देखता हूँ की उनमें चाँदनी की चमक से ज्यादा मेरी यादें घुली हैं.... ।
अब मेरे सवालों को जवाब की जरुरत नहीं हैं ... लाखों सवालों का जवाब बस एक बूंद ने दे दिया।
मैं चुप हूँ.. वो अब भी मेरी आँखों में झांक रही है मानो पूछ रही हो अब भी कोई सवाल बाकी है ?

मैं खो जाता हूँ उसकी आँखों में .... अब उसकी आँखों में मैं खुद को महसुस कर रहा हूँ। वो मेरा हाथ थामें चाँद को निहार रही है....और मेरी निगाहें उस चकोर के पीछे दौड़ रही है जो बेचैनी से चाँद को छू लेना चाहता है। मैं उसके हाथों के स्पर्श को सुनता हूँ जो मुझसे कह रही है- “  मुझे चाँद नहीं बनना मुझे बस तुम्हारा स्पर्श चाहिए। मैं उसका हाथ जोर से थाम लेता हूँ ... उसके चेहरे की सिकन गायब हो जाती है। 
हम हाथ थामे नदी की भींगी रेत पर चलने लगते है .... किनारे की भींगी-भींगी रेत देखकर वो कहती है- “  लहरें क्यों किनारों को बिना कुछ कहे स्पर्श कर के लौट जाती है.. और किनारों के पास सिर्फ भींगी यादें छोड़ जाती है…. ”
मैं लहरों को देखकर कहता हूँ- “ लहरें लौटती नहीं हैं..... लहरें तो किनारे को अपना सर्वस्व सर्मपण कर देती है.....।
वो अपना सर मेरे कंधो पर टिका देती है.... और मैं चाँद को देखने लगता हूँ.....

  राहुल - http://rahul-dilse-2.blogspot.in/

अनाम मौसम सा
तेरा नाम
उमड़ते बादलों सा
तेरा चेहरा
कुछ पत्तियों के
आँख खुलने जैसी
तुम्हारी बातें...
अधखुली..अनकही  
रोज बदलती तारीखों में
कोई एक दिन सा
अब भी होता है
मेरा दिन..
किश्तों में आते-जाते
बेपरवाह मौसम
 नहीं जानते
आसपास.
तुम नही..

कभी नहीं..
रोज बदलती तारीखों में
बेमौसम 
बरसती..
गुनगुनाती धूप
 इतने कालचक्र को जीते
कहानियों में 
नासमझ मन
जैसा होता है
अब भी मेरा बसंत..
                               

कभी  कभी ऐसा होता है की कविता , कविता नहीं बन पाती, मन के अंदर बहुत सारे एहसास एक साथ उठते हैं, पता नहीं चल पाता किस एहसास को कवितायों में कैद करूँ...कविता में कैद भी कर सकता हूँ या नहीं, पता नहीं......ऐसे में ही, कल शाम थोड़ा सा कुछ लिखने का प्रयास किया...इसे कविता कह लीजिए या फिर ऐसे ही कोई रैंडम थॉट...

कल  सुबह तुम्हारी यादों के साथ उठा.. 
कमरे में नज़र  घुमाई तो देखा,
टेबल की हर चीज़ बिखरी पड़ी थी..
तुमने  जो डायरी दिया था, वो भी आधी खुली हुई सी,
टेबल से लटक रही थी..
एक  पल सोचा टेबल फिर से समेट दूँ..
धुल जो पड़ी है टेबल पे, उसे साफ़ कर दूँ..
पर समेटने का दिल नहीं कर रहा था..
तुम्हारी यादों का हैंगओवर उतरा नहीं था.
वहीँ नीचे फर्श पे , 
वो खूबसूरत लाल-गुलाबी डिजाईन वाला लेटर गिरा हुआ था,
वो लेटर उसी लेटर-पैड का पहला लेटर था
जिसे तुमने आर्चीस से ख़रीदा था.. 
और देते वक्त मुझसे कहा था, 
इस लेटर को हिफाज़त से रखना..
इसमें लिखी हुई बातों को हमेशा याद रखना..
उस लेटर को एक प्लास्टिक में लपेट रख लिया था मैंने..
दस साल हो गए, लेकिन प्लास्टिक अभी भी वही है..
किनारे से थोड़ी फट गयी है, ऊपर से कुछ पुरानी भी हो गयी है..
लेकिन लेटर के ऊपर कभी धुल नहीं जमने दिया उस प्लास्टिक ने..
वो लेटर आज भी उतना ही नया है जैसे दस साल पहले..
जब भी वो लेटर पढ़ता हूँ, तुम्हारी बातों की महक महसूस करता हूँ,
कल भी दिन में पांच दफे उस लेटर को पढ़ा था..
पता नहीं क्यों, हर बार पढ़ने के बाद सर भारी सा लगा.. 
ऑफिस में, ४ कप चाय भी पिया, सोचा कुछ तो हैंगओवर उतरेगा,
पर ये तुम्हारी यादों का हैंगओवर है..कैसे उतरता इतनी जल्दी...


वनवास कठिन होता है.
और होता है कुछ ज़्यादा ही
जब स्वनिर्णित होता है.

क्योंकि किसी ने कहा अगर
वनवास पे जाने को,
तो तुम चले भी जाओगे.
धर्म की, कर्त्तव्य की
मजबूरियों पर 
तोहमत लगाओगे.
लेकिन जब 
बिना किसी आग्रह 
स्वयं ही जाना हो,
तो मन में कैकेयी, मंथरा
या फिर कौरव, शकुनी
कहाँ से लाओगे?

किसी ने बाँध दी 
सीमायें अगर  
तो चुप रह जाना भी 
सहज होता है.
जो स्वयं को स्वयं ही 
बांधना पड़े,
तो वो असीम बल,
वो आत्म-विश्वास
कहाँ से लाओगे?

वनवास कठिन होता है.
और होता है कुछ ज़्यादा ही
जब स्वनिर्णित होता है.
....................................................................
विस्मित,विस्मृत ठिठकी मैं
एहसासों से बनाया है अपना घोंसला
वृक्ष के पत्तों से की है दोस्ती
एक टोकरी चाँदनी का कंदील जलाया है
और कलम की सूई से
भावनाओं की धरती पर
शब्द टांक रही हूँ.... तब तक............जब तक यात्रा है...  

क्रमशः 

लेखागार