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बुधवार, 29 अगस्त 2018

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
मेजर ध्यान चन्द ( Major Dhyan Chand ) ( जन्म - 29 अगस्त, 1905, इलाहाबाद, मृत्यु - 3 दिसंबर, 1979, नई दिल्ली ) एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे, जिनकी गिनती श्रेष्ठतम कालजयी खिलाड़ियों में होती है। मानना होगा कि हॉकी के खेल में ध्यानचंद ने लोकप्रियता का जो कीर्त्तिमान स्थापित किया है उसके आसपास भी आज तक दुनिया का कोई खिलाड़ी नहीं पहुँच सका।

1922 में भारतीय सेना में शामिल हुए और 1926 में सेना की टीम के साथ न्यूज़ीलैंड के दौरे पर गए। 1928 और 1932 के ओलंपिक खेलों में खेलने के बाद 1936 में बर्लिन ओलम्पिक में ध्यानचंद ने भारतीय टीम का नेतृत्व किया और स्वयं छ्ह गोल दाग़कर फ़ाइनल में जर्मनी को पराजित किया। 1932 में भारत के विश्वविजयी दौरे में उन्होंने कुल 133 गोल किए। ध्यांनचंद ने अपना अंतिम अंतर्राष्ट्रीय मैच 1948 में खेला। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए।

ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। आँकड़ों से भी पता चलता है कि वह वास्तव में हॉकी के जादूगर थे। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। दूसरा विश्व युद्ध न हुआ होता तो वह छह ओलिंपिक में शिरकत करने वाले दुनिया के संभवत: पहले खिलाड़ी होते ही और इस बात में शक की क़तई गुंजाइश नहीं इन सभी ओलिंपिक का गोल्ड मेडल भी भारत के ही नाम होता।

हिटलर और सर डॉन ब्रैडमैन भी थे प्रशंसक 

ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंदर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाई तो 29 अगस्त को वह ध्यानचंद को नमन करने के लिए तैयार है, जिसे भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। ब्रैडमैन हाकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। वह 1935 की बात है जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और ध्यानचंद दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह सेगोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं। यही नहीं ब्रैडमैन को बाद में जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का क़ायल बना दिया था। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर भी एक ही नाम छाया था और वह था ध्यानचंद।

1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।

विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसम्बर, 1979 को सुबह चार बजकर पच्चीस मिनट पर नई दिल्ली में देहांत हो गया। झाँसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहाँ वो हॉकी खेला करते थे। अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, "आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूँ" वो साधारण आदमी नहीं थे लेकिन वो इस दुनिया से गए बिल्कुल साधारण आदमी की तरह।

मेजर ध्यानचन्द जी की 113वीं जयंती पर पूरा देश उनको याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।  

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

खेल दिवस पर हॉकी के जादूगर की ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तों,
आज पूरा देश राष्ट्रीय खेल दिवस मना रहा है. आज का दिन हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद जी के जन्मदिन पर उनके सम्मान में मनाया जाता है. उनका जन्म 29 अगस्त सन्‌ 1905 ई. को इलाहाबाद में हुआ था. उनको हॉकी का खेल विरासत में नहीं मिला था बल्कि अपनी सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे उन्होंने यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी. आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे महज 16 वर्ष की अवस्था में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भरती हो गए. उनको हॉकी के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है, जिनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और एक दिन दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए. हॉकी में उत्कृष्ट खेल के कारण सेना में उनकी पदोन्नति होती गई. सिपाही से भर्ती होने वाले ध्यानचंद लांस नायक, नायक, सूबेदार, लेफ्टिनेंट, सूबेदार बनते हुए अंत में मेजर बने. यहाँ एक रोचक बात ये है कि उनका मूल नाम ध्यानसिंह था किन्तु उनके रात में चाँद की रौशनी में हॉकी का अभ्यास करने के कारण उनके मित्र उनको चाँद उपनाम से पुकारने लगे. यहीं से उनका नाम ध्यानचंद पड़ गया. इसके साथ-साथ लोग प्यार से उनको दद्दा कहकर भी बुलाते थे.

उनका हॉकी स्टिक और गेंद पर इस कदर नियंत्रण था कि अकसर प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं. हॉलैंड में तो चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी भी गई थी. हॉकी खेलने की उनकी कलाकारी से मोहित होकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश भी की थी किन्तु ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही अपना गौरव समझा. मेजर ध्यानचंद ने अंतर्राष्ट्रीय मैचों सहित अन्य मैचों को मिलाकर 1000 से अधिक गोल किए. उनकी बेहतरीन हॉकी कला के कारण भारतीय टीम ने तीन ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीते. सन 1928 में एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय टीम ने भाग लिया. यहाँ भारतीय टीम सभी मुकाबले जीत हॉकी की चैंपियन बनी. सन 1932 में लास एंजिल्स में हुई ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में ध्यानचंद ने 262 में से 101 गोल किए. निर्णायक मैच में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हरा कर स्वर्ण जीता. इसके बाद सन 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में मेजर ध्यानचंद भारतीय टीम के कप्तान बने. फाइनल में भारतीय टीम ने जर्मन टीम को 8-1 से हरा कर स्वर्ण जीता. द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद उन्होंने अप्रैल 1949 ई. को हॉकी से संन्यास ले लिया था. इसके बाद उन्होंने नवयुवकों को गुरु-मंत्र सिखाने शुरू कर दिए और लम्बे समय तक राष्ट्रीय खेलकूद संस्थान (पटियाला) में भारतीय टीमों को प्रशिक्षित करते रहे.


हॉकी के जादूगर और सबके लोकप्रिय दद्दा को सन 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. सन 1980 में मरणोपरांत उनके सम्मान में भारत सरकार ने डाक टिकट का प्रकाशन करवाया. 3 दिसंबर 1979 को दिल्ली में उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार झाँसी में किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया जहाँ वो हॉकी खेला करते थे.

राष्ट्रीय खेल दिवस की शुभकामनाओं और मेजर ध्यानचंद जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है....

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सोमवार, 29 अगस्त 2016

मेजर ध्यानचन्द और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
मेजर ध्यान चन्द ( Major Dhyan Chand ) ( जन्म - 29 अगस्त, 1905, इलाहाबाद, मृत्यु - 3 दिसंबर, 1979, नई दिल्ली ) एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे, जिनकी गिनती श्रेष्ठतम कालजयी खिलाड़ियों में होती है। मानना होगा कि हॉकी के खेल में ध्यानचंद ने लोकप्रियता का जो कीर्त्तिमान स्थापित किया है उसके आसपास भी आज तक दुनिया का कोई खिलाड़ी नहीं पहुँच सका।

1922 में भारतीय सेना में शामिल हुए और 1926 में सेना की टीम के साथ न्यूज़ीलैंड के दौरे पर गए। 1928 और 1932 के ओलंपिक खेलों में खेलने के बाद 1936 में बर्लिन ओलम्पिक में ध्यानचंद ने भारतीय टीम का नेतृत्व किया और स्वयं छ्ह गोल दाग़कर फ़ाइनल में जर्मनी को पराजित किया। 1932 में भारत के विश्वविजयी दौरे में उन्होंने कुल 133 गोल किए। ध्यांनचंद ने अपना अंतिम अंतर्राष्ट्रीय मैच 1948 में खेला। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए।

ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। आँकड़ों से भी पता चलता है कि वह वास्तव में हॉकी के जादूगर थे। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। दूसरा विश्व युद्ध न हुआ होता तो वह छह ओलिंपिक में शिरकत करने वाले दुनिया के संभवत: पहले खिलाड़ी होते ही और इस बात में शक की क़तई गुंजाइश नहीं इन सभी ओलिंपिक का गोल्ड मेडल भी भारत के ही नाम होता।

हिटलर और सर डॉन ब्रैडमैन भी थे प्रशंसक 

ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंदर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाई तो 29 अगस्त को वह ध्यानचंद को नमन करने के लिए तैयार है, जिसे भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। ब्रैडमैन हाकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। वह 1935 की बात है जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और ध्यानचंद दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह सेगोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं। यही नहीं ब्रैडमैन को बाद में जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का क़ायल बना दिया था। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर भी एक ही नाम छाया था और वह था ध्यानचंद।

1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।

विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसम्बर, 1979 को सुबह चार बजकर पच्चीस मिनट पर नई दिल्ली में देहांत हो गया। झाँसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहाँ वो हॉकी खेला करते थे। अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, "आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूँ" वो साधारण आदमी नहीं थे लेकिन वो इस दुनिया से गए बिल्कुल साधारण आदमी की तरह।

मेजर ध्यानचन्द जी की 111वीं जन्म दिवस पर पूरा देश उनको याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर....


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आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। जय हिन्द। जय भारत।।

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