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बुधवार, 16 जनवरी 2013

क्‍यूं युद्ध युद्ध करते हो

माओवादियों ने दस जवानों को मार गिराया। मीडिया में चर्चा तक नहीं हुई। पाकिस्‍तान की ओर से दो गिराए, तो पूरा देश युद्ध युद्ध चिलाने लगा। सोशल मीडिया की भाषा प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया बोलने लगा। सोशल मीडिया में बैठे ज्‍यादातर बुद्धिजीवी नहीं। वहां बस मुद्दों को हवा दी जाती है। मगर कुछ मुद्दे जरूर सोचने लायक होते हैं। युद्ध की बात करने से पहले उसके बुरे प्रभावों के बारे में सोचना भूल गया मीडिया। हमने पिछले युद्धों में इतना नहीं खोया, जितना अगर युद्ध होगा खोएं। अब युद्ध प्रमाणु हथियारों से होगा। जो भले भारत पाकिस्‍तान की धरती पर फूटे, लेकिन उसका असर पूरे एशिया पर होगा। हमारा हिमालय भी पिघलकर पानी हो जाएगा। वो पानी पता नहीं कितने बचे हुए लोगों को बहाकर ले जाएगा।

बुद्धिमानी से करें फैसला
एक बार की बात है .एक छोटी सी चिड़िया बड़ी सी भैंस को बहुत परेशान  कर रही थी ! कभी वो उसके सिंग पर चढ़ के बैठ  जाती कभी उसकी पीठ पर फुदकने लगती ! कभी उसके ऊपर मंडराने लगती ! भैंस चिड़िया की इन शरारतों  से बहुत परेशान  हो रही थी ! उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था की इस छोटी लेकिन दुष्ट चिड़िया से कैसे छुटकारा पाया जाये और दूसरी तरफ चिड़िया भैंस को परेशां देख कर बहुत खुश थी! आगे पढ़ें

मेरा वह चिराग
दो-चार गलियों की
थी दूरी, पर राह चलते
दिख ही जाता था उसका  घर।
कभी छत पर सूख रहे कपड़े
तो कभी खिड़की  से
झांकता कोई चेहरा
आ ही जाता था नजर। आगे पढ़ें

हमारे आजू-बाजू ही घूमते हैं वहशी दरिंदे
कुछ दिनों से यह लेख लिखने की सोच रहा था, पर समय की कमी के चलते लिख नहीं पाया. अब चूंकि दिल्ली में गैंगरेप का मामला बड़े स्तर पर उठा है तो सोचा मैं भी अपनी बात कह ही दूं. बात तकरीबन 15-20 दिन पहले की है. शाम को चार बजे मैं ऑफिस से बाइक पर घर के लिए निकला. ऑफिस से घर की दूरी 10 किलोमीटर है, तो बाइक से तकरीबन आधा घंटा लग ही जाता है. करीब सवा चार बजे मैं नोएडा-अक्षरधाम (दादरी रोड) हाईवे पर मयूर विहार की तरफ मुड़ रहा था. आगे पढ़ें


कहीं विलेन न बन जाएं
बरिया की नई नई नौकरी लगी थी। बरिया बेहद मेहनती युवा था। काम के प्रति इतना ईमानदार कि पूछो मत, लेकिन बरिया जहां नौकरी करता था, वहां कुछ कम चोर भी थे। बरिया साधारण युवा नहीं जानता था कि जमाना बदल चुका है। मक्‍खनबाजों का जमाना है। काम वालों की भी जरूरत है, क्‍यूंकि घोड़ों की भीड़ में गधे भी चलते हैं। बरिया सबसे अधिक काम करता। वो हर रोज अपने हमरुतबाओं से अधिक वर्क काम करता, जैसे गधा कुम्‍हार के लिए। आगे पढ़ें

एक बैचलर का शिक्षक होना
तीस साल के एक बैचलर का शिक्षक होना
उसके भीतर एक मां का जन्म होना है
जिसे सबसे ज्यादा ममता होती है
क्लास के पढ़ने में कमजोर और शैतान बच्चे पर
उसे डर होता है कि वो फेल हो जाएगा तो  आगे पढ़ें

निदा फ़ाज़ली के पलड़े पर अमिताभ-कसाब...खुशदीप
आंध्र प्रदेश विधानसभा में एआईएमआईएम विधायक दल के नेता अक़बरुद्दीन ओवैसी ने 24 दिसंबर 2012 को  निर्मल, आदिलाबाद में जो कुछ भी कहा, उसकी वजह से 14 दिन की न्यायिक हिरासत में है...अक़बर ने क्या-क्या कहा, इस पर मैं  जाना नहीं चाहता...लेकिन जाने-माने शायर और फिल्म गीतकार निदा फ़ाजली ने एक साहित्यिक पत्रिका को चिट्ठी  में जो लिखा है, आगे पढ़ें

अपनी कमाई का आधा आधा 
नैनीताल के फ्लैट पर लगी कुछ दुकानों पर, बन्दूकें, एयर पिस्टलें और एयर रायफलें रखी हुई थीं। मैं इस तरह की एक दुकान पर गया और बन्दूक चलाने के लिये उससे पैसों के बारे में पूछा। दुकान को एक छोटा सा लड़का देख रहा था। उसने अपना नाम अभितारी बताया और कहा, आगे पढ़ें

स्वामी विवेकानंद के दस घोष वाक्य
1   उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये. 2   तूफान मचा दो तमाम संसार हिल उठता; क्या करूँ धीरे-धीरे अग्रसर होना पड़ रहा है. तूफ़ान मचा दो तूफ़ान! 3 जब तक जीना, तब तक सीखना' -- अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है. आगे पढ़ें

ओह, तो यह है संकट की असली वजह!
बहुधा, असली वजहें कुछ और ही होती हैं.अगर आपको याद होगा तो पिछले पूरे वर्ष भर बारदाना का भारी संकट रहा. गेहूं की फसल जब पक कर तैयार हुई तो उसके भंडारण के लिए बारदाना ढूंढे नहीं मिल रहा था. और, जैसी कि परंपरा है, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो सीधे केंद्र पर आरोप लगा दिया कि बारदाना का संकट उसकी वजह से हो रहा है. और लगता है यह समस्या इस वर्ष भी जारी रहेगी, आरोपों प्रत्यारोपों की झड़ी इस वर्ष भी चलती रहेगी. आगे पढ़ें

खार जैसे रह गए हम डाल पर
सांप, रस्सी को समझ डरते रहे
और सारी ज़िन्दगी मरते रहे
खार जैसे रह गए हम डाल पर
आप फूलों की तरह झरते रहे आगे पढ़ें

रविवार, 6 जनवरी 2013

देश के सामने चार बड़ी समस्‍याएं

इस वक्‍त दुनिया में चार सबसे बड़ी समस्‍याएं हैं। पहली जनसंख्‍या, दूसरी महंगाई, तीसरी बेरोजगारी और चौथी युवाओं को हर हफ्ते होने वाला सच्‍चा प्‍यार।  उधर, पाकिस्‍तानी क्रिकेटर चाहते हैं कि भारत एक बार पाकिस्‍तान का दौरा करे, लेकिन इधर कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि अगर तालिबान पूरी तैयारी में है तो हम क्रिकेटरों के रूप में कुछ नेताओं को भेज सकते हैं। बलात्‍कारी को सजा क्‍या होनी चाहिए मामला विचाराधीन है, उम्‍मीद है जल्‍द जवाब आ जाएगा, आख़री भारतीय सरकार है, फैसला लेने में वक्‍त तो लगेगा ही, लेकिन पक्‍का समय मत पूछिए, क्‍यूंकि कश्‍मीर पर अभी तक विचार विमर्श चल रहा है। तेलांगना के मामले में एक महीना जरूर कहा है, लेकिन उम्‍मीद बहुत कम है, क्‍यूंकि दिल्‍ली गैंगरेप मामले को लेकर भी सरकार आधा महीना खा चुकी है।

टीवी सीरियल के लिए स्त्रियां मर्दों की विटामिन गोली भर है
बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति पर आधारित टीवी सीरियल बालिका वधू अब दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे की शादी सेट में पूरी तरह तब्दील हो चुका है. गले में एक धागा भर पहननेवाली जिस आनंदी को शुरु से ही भारी गहने और कपड़े से चिढ़ रही है,जिसे पहनकर वो अमिया तक नहीं तोड़ सकती थी, अब उसे मेंहदी लगाकर रखने की नसीहत देनेवाले रिश्तेदारों और सहेलियों की सिमरन की तरह सजाया-संवारा जा रहा है..और ये सबकुछ हो रहा है आनंदी के उस ससुराल में जहां वो जगिया की बालिका वधू बनकर आयी और जहां आकर दिन-रात उसने यही सोचा- कैसे इस ससुराल और दादी सा की चंगुल से निकलकर वापस बापू के घर भाग सकती है. लेकिन अगले दो-चार एपीसोड में कलक्टर साहब की पत्नी बनकर अपने पहले ससुराल यानी दादी सा के घर से विदा होनेवाली आनंदी के लिए सामाजिक कुरीति के तहत मिला जगिया, उसके साथ का अतीत और मौजूदा दगाबाजी ही पहला प्यार लगता है. आगे पढ़ें


पल्प फिक्शन से पल्प टेलीविज़न तक
न्यूज़ चैनल अपने आस पास के माध्यमों के दबाव में काम करने वाले माध्यम के रूप में नज़र आने लगे हैं। इनका अपना कोई चरित्र नहीं रहा है। गैंग रेप मामले में ही न्यूज़ चैनलों में अभियान का भाव तब आया जब अठारह दिसंबर की सुबह अखबारों में इस खबर को प्रमुखता से छापा गया। उसके पहले हिन्दी चैनलों में यह खबर प्रमुखता से थी मगर अभियान के शक्ल में नहीं। यह ज़रूर है कि एक चैनल ने सत्रह की रात अपनी सारी महिला पत्रकारों को रात वाली सड़क पर भेज दिया कि वे सुरक्षित महसूस करती हैं या नहीं लेकिन इस बार टीवी को आंदोलित करने में प्रिंट की भूमिका को भी देखा जाना चाहिए। उसके बाद या उसके साथ साथ सोशल मीडिया आ गया और फिर सोशल मीडिया से सारी बातें घूम कर टीवी में पहुंचने लगीं। एक सर्किल बन गया बल्कि आज कल ऐसे मुद्दों पर इस तरह का सर्किल जल्दी बन जाता है। कुछ अखबार हैं जो बचे हुए हैं पर ज्यादातर अखबार भी सोशल से लेकर वोकल मीडिया की भूमिका में आने लगे हैं। आगे पढ़ें


 कितना जरुरी है डर...
 हम बचपन से सुनते आये हैं " डर के आगे जीत है " , जो डर गया समझो मर गया " वगैरह वगैरह। परन्तु सचाई एक यह भी है कि कुछ भी हो, व्यवस्था और सुकून बनाये रखने के लिए डर बेहद जरूरी है। घर हो या समाज जब तक डर नहीं होता कोई भी व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल सकती। घर में बच्चे को माता - पिता  का डर न हो तो वह होश संभालते ही चोर बन जाए, स्कूल में अध्यापकों का डर न हो तो अनपढ़ - गंवार रह जाए, धर्म - समाज का डर न हो तो न परिवार बचें, न ही सभ्यता। और अगर कानून का डर न हो, तो जो होता है , वह आजकल हम देख ही रहे हैं। यानि इतनी अव्यवस्था और अपराध हो जाएँ की जीना मुश्किल हो जाए। आगे पढ़ें

ये कैसा जनादेश है
चीख है
पुकार है
चारों ओर हाहाकार है
लड़कियाँ लाचार है
समाज खूंखार है
बोटियाँ तैयार है
नोचनेवाला होशियार है
सारी दुनिया शर्मसार है आगे पढ़ें

तू चीज बड़ी हैं मस्त मस्त
"तू चीज बड़ी हैं मस्त मस्त", जब यह गाना मार्केट आया था, इससे यह पता चलता हैं की समाज में औरत और मर्द में कितना फर्क हैं। हमारें समाज का बड़ा हिस्सा हैं जो औरत को चीज समझता हैं।
औरत और मर्द में इतना फर्क क्यूँ हैं?  कौन हैं इसके लियें जिम्मेदार?  हमारा सामाजिक ढांचा जो की स्त्री को केवल उपयोग की वस्तु समझता हैं। शायद यही वजह हैं जो स्त्री को हमेशा एक वस्तु की नज़र से देखा जाता हैं और यही बलात्कार की वजह बन जाती हैं, जैसा की 'यूज़ एंड थ्रो'। यही हकीक़त हैं हर एक रेप पीडिता की। आगे पढ़ें

जीवन पानी का बुलबुला है
मित्रो, लम्बे अंतराल के बाद  आप के सामने अपनी नई  पुरानी  तीन कवितायेँ लेकर फिर प्रस्तुत हूँ. आशा है. आप भूले नहीं होंगे. इस बीच कविताओं को गोष्ठियों और कवि  सम्मेलनों के माध्यम से अपने चाहने वालों तक पहुंचता तो रहा हूँ परन्तु अपने इस ब्लॉग के व्यापक मित्र मंच से इन दिनों अवश्य वंचित रहा. आज मैं आप से मिलकर आनंदित हूँ और आप के साथ संवेदनात्मक भागीदारी का आकांक्षी भी हूँ.  -सुरेश यादव आगे पढ़ें

बयान बवालों से 'बुद्धम् शरणम् गच्छामि' की गूंज तक - साप्‍ताहिक हलचल
रविवार, 6 जनवरी 2013।  इसी के साथ नव वर्ष के प्रथम छह दिन खत्‍म होने जा रहे हैं। बीते सप्‍ताह के दौरान ज्‍यादा सुर्खियां बयानों को लेकर हुए बवालों पर बनी। अगर अंतर्राष्‍ट्रीय समाचारों की बात की जाए तो दो से अधिक सप्‍ताह बाद संडी हूक्‍स स्‍कूल के बच्‍चे जहां एक बार फिर स्‍कूल लौटे तो वहीं दूसरी तरफ तालिबानियों की गोली का निशान बनी मलाला को अस्‍पताल से छुट्टी मिल गई। आगे पढ़ें

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

'आम आदमी' की दस्‍तक से मुलाकतों की जगह तक

'आम आदमी' की दस्‍तक, मीडिया को दस्‍त
अन्‍ना हजारे के साथ लोकपाल बिल पारित करवाने के लिए संघर्षरत रहे अरविंद केजरीवाल ने जैसे 'आम आदमी' से राजनीति में दस्‍तक दी, तो मीडिया को दस्‍त लग गए। कल तक अरविंद केजरीवाल को जननेता बताने वाला मीडिया नकारात्‍मक उल्‍टियां करने लगा। उसको अरविंद केजरीवाल से दुर्गंध आने लगी। अब उसके लिए अरविंद केजरीवाल नकारात्‍मक ख़बर बन चुका है। More >>>

 अजहर एक क्रिकेटर, एक नेता
पूर्व भारतीय कप्तान और कलाई से बॉल को ट्विस्ट कर गेंदबाजों की हवाईयां उड़ाने वाले मोहम्मद अजहरुद्दीन ने एक तरह से रिटायरमेंट की घोषणा कर दी. बेशक गुरुवार के पहले वो अगर ऐसा कहते भी कि अब वो क्रिकेट नहीं खेलना चाहते तो इसका कोई मतलब नहीं होता क्योंकि वो भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) की तरफ ही आजीवन प्रतिबंधित कर दिए गए थे. लेकिन, गुरुवार को जैसे सारा कलंक धुल गया. एक खिलाड़ी फिर से सिर उठा कर चल सकता था. 12 वर्षों तक अपमान का दंश झेलना कम नहीं होता है लेकिन फिर भी अजहरुद्दीन ने इस पर कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया. उन्होंने हैंसी क्रोनिए को भी एक तरह से माफ कर दिया. बकौल अजहरुद्दीन "अब वो रहे नहीं तो उसपर किसी तरह की बातचीत ठीक नहीं रहेगी." 
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ईमानदारी का एक दीया
शादी शादी बोल बोल के शादी करवा दी। ऐसा हो रहा था जैसे मै शादी नहीं करती तो कयामत आ जाती। यार कोई  मैं दुनिया की पहली लड़की तो  होती नही बस सात फेरे  लेलो और जि़न्दगी भर सर फोड़ते रहो। शान्त  गुडिया क्या शान्त  जि़न्दगी तो मेरी बरबाद हो गयी आप लोगों के चक्कर में, मै बता रही हूं अब मैं उस भिखारी को और नहीं झेल सकती। मुझे डाईवोर्स चाहिए एट एनी कॉस्ट। हां गुडिया हम डाईवोर्स लेंगे। More>>>


वक़्त वक़्त की बात
पुरानी सदी के डाइलोग:
शशि कपूर: मेरे पास माँ है!
इस सदी के डाइलोग:
रॉबर्ट वाड्रा: मेरे पास सासू माँ है! More>>>





 

 मुलाकातों की जगह
आज फिर कदम उस ओर मुड़ चले हैं कई दिनों के बाद । मुलाकातों की उस जगह में जहाँ हर नए दिन नया अनुभव बांटा जाता है । वह जगह जो हर वक़्त जीवंत नज़र आती है और जीने के लिए साधन को जीवन से जोड़ना सिखाती है। इस गली से गुज़रते हुए क्लास में क्या चल रहा है अक्सर पता चल जाता है गली के माहौल में एक गूँज रहती है। गली में एक घर से बाहर आती हुई एक महिला के कहे शब्दों से पता चल ही रहा है। वो झाड़ू लगाते हुए साथ में बैठी पड़ोसन से कहती-"अब देखो शुरु हो गया स्कूल, आज दूसरा ही दिन है और आवाज़ें सुनों, इन आवाज़ों में अपने घर की आवाज़ें ही खो जाती है। More >>>


पर अब जो आओ बापू.....
देश में जो हाहाकार मची है
मारकाट चीखपुकार मची है
टुकड़े टुकड़े हो जाए ना
आर्यावर्त कहीं खो जाए ना

जाति पांति की हाट सजी है
मजहब की दीवार चुनी है
स्वतंत्रता कहीं बिक जाए ना
देश मेरा खो जाए ना More>>>

 

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

बेरोजगार खुदा से झीलों के बुलबुलों तलक एक पोस्‍ट

आजकल खुदा भी बेरोजगार
सुना है आजकल खुदा भी बेरोजगार है इंसानों ने दिल से निकलकर उसे दुकानों पर बिठा दिया है जब तक दिल की बगिया में था बागबानी करता था कभी रूह की मिट्टी जोत देता कभी मन की फसल सींच देता अच्छे-अच्छे ख्यालों के फूलों से दिल सजा रहता था हमेशा संवेदना की खाद लाकर भी डाल देता था अक्सर और ज़िन्दगी महकती रहती थी । तनख्वाह के तौर पर प्यार के सिक्के ले जाता था। अब तो दुकानों के दफ्तर पर किसी साज-सज्जा के सामान जैसा बिना ज्यादा जगह लिए एक कोने में खड़ा रहता है बुत बनकर और रोज़ सवेरे उसे दुकानदार अगरबत्ती के धुएँ से डराकर "फिंगर ऑन योर लिप्स" की सजा सुनाकर कारोबार में... more »

कौन है यह वाशिंगटन पोस्ट और क्यों मच रहा है हल्ला
*यह नहीं कि वाशिंगटन पोस्ट या टाइम गलत हैं या सही हैं। बस सवाल सिर्फ इतना है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं वह उनकी खबर क्यों है? व्यावसायिक परिदृश्य में देखें तो मीडिया के नाम पर विदेशी मीडिया की मनमानी कतई लोक की आवाज नहीं है। यह नितांत विदेशी कूटनीति का हिस्सा है। इसलिए दुनिया के मंच पर जब देश के संदर्भ में कोई बात की जाए, तो सावधानी रखना जरूरी हो जाता है। *कायदा ए कायनात में भी इंसान को अपनी आवाज पेश करने की इजाजत हक के बतौर बख्सी गई है। यह अच्छी बात भी है। आदिकाल से इंसानी बिरादरी को अनुशासित और गवर्न करने के लिए बनाई गईं व्यवस्थाएं सबसे ज्यादा डरती भी इसी से हैं। आवाजों को अपने-अपन... more »


मेरी जापान यात्रा : माउंट फूजी व हरे भरे खेत खलिहान!
चीन , अमेरिका, ब्राजील और भारत की तुलना में जापान एक छोटा सा देश है। एक ऐसा देश जहाँ की शहरी आबादी भारत के महानगरों को भी टक्कर दे सके। पर जापान के टोक्यो (Tokyo) और ओसाका (Osaka) जैसे महनगरों में दूर दूर तक दिखते कंक्रीट के जंगलों के परे भी एक दुनिया है जो दिखती तब है जब आप इन शहरों से इतर जापान के अंदरुनी भागों का सफ़र करते है। अब आप ही बताइए जिस देश का अस्सी फीसदी इलाका छोटे बड़े पहाड़ों से (अगर ये विषय आपकी पसंद का है तो पूरा लेख पढ़ने के लिए आप लेख के शीर्षक की लिंक पर क्लिक कर पूरा लेख पढ़ सकते हैं। लेख आपको कैसा लगा इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया आप जवाबी ई मेल या वेब साइट पर जाक... more »

एक चर्चित ब्लॉगर
जीवन भी क्या है ? एक यक्ष प्रश्न , हम सुलझाने की कोशिश करते हैं और यह उलझता जाता है . हम एक सिरा पकड़ते हैं और हमारे सामने कई सिरे आ जाते हैं . हम एक इच्छा की पूर्ति के लिए दिन रात मेहनत करते हैं, लेकिन कभी सफलता तो कभी असफलता , बस यह क्रम चलता रहता है , और सफ़र कटता रहता है . हर किसी की मंशा होती है एक बेहतर जीवन जीने की और हर किसी का ख़्वाब होता है कुछ हट कर करने का , कुछ बेहतर करते रहने का , कभी हम अपने लक्ष्यों को पूरा करने में सफल हो जाते हैं तो कभी असफलता हाथ लगती है . लेकिन जीवन है कि आगे बढ़ता रहता है . बस यही सब चलता रहता है इस जीवन में .......मैं भी सोच रहा था कि सप्ताह में ... more »


मंगल दोष के रोड़े दूर करेगा आज शाम गणेश पूजा का यह उपाय

मंगल दोष के रोड़े दूर करेगा आज शाम गणेश पूजा का यह उपाय] हिन्दू पंचाग के मुताबिक आज अंगारिका चतुर्थी है। यानी आज मंगलवार के साथ चतुर्थी तिथि का संयोग बना है। इस शुभ तिथि पर भगवान गणेश की उपासना कुण्डली में अंगारक यानी मंगल दोष से जीवन में आ रही तमाम परेशानियों से छुटकारा देती है। खासतौर पर विवाह, दाम्पत्य, भूमि व खून की बीमारी जैसे परेशानियों में बड़ी राहत मिलती है। भगवान गणेश बुद्धिदाता, विघ्रहर्ता व भौतिक सुख-सुविधा की इच्छा पूरी करने वाले देवता हैं। इसलिए जीवन से तमाम कलह दूर रखने व खुशहाली के लिए आज शाम शुभ योग में यहां तस्वीरों के साथ बताया जा रहा गणेश पूजा का ... more »


यात्रा संस्मरण : मेरी मेलबोर्न यात्रा
रोवेन एटकिंसन उर्फ फनी ‘मि. बीन’ ने जब मुझे समस्त हर्जे-खर्चे समेत मेलबोर्न यात्रा के दस्तावेज़ – टिकट, वीज़ा इत्यादि और साथ में सोने में सुहागा के तौर पर खर्चने के लिए हजार ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अतिरिक्त सौंपे तो लगा कि जैसे मेरे जीवन का एक बड़ा सपना पूरा होने जा रहा है. और हो क्यों न. यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं तो दूरस्थ देश प्रदेश की यात्रा में आपको आनंद आएगा ही. और आप ऐसे मौकों की तलाश में हमेशा रहेंगे ही. शायद ही ऐसा कोई मनुष्य हो जिसे यात्रा में आनंद नहीं आता हो. जहाँ आप रहते हैं वहाँ अपने गांव शहर के उन्हीं इमारतों, उन्हीं सड़कों, उन्हीं लोगों और उन्हीं ... more »

जितेंद्र गोभीवाला- तेरी सर्कस ही अलहदा थी यार

मेरी और जितेंद्र गोभीवाला की पहली मुलाकात आज से करीबन दस पहले हुई थी, जब मैं गांव से बठिंडा शहर पहुंचकर दैनिक जागरण में अपने कैरियर की शुरूआत कर रहा था, और जितेंद्र गोभीवाला की कामेडी भरपूर कैसिट 'कट्टा चोरी हो गया' रिलीज हुई थी। वो छोटी सी मुलाकात, कुछ समय बाद एक अच्‍छी दोस्‍ती में बदल गई। उसका कारण एक ही था, जितेंद्र गोभीवाला का मिलनसार व्‍यवहार और हमारा दोनों का समाज सेवा से लगाव, और एक ही संस्‍था से जुड़ाव। मैं मीडिया लाइन में नया था, और मीडिया वालों का एक टिकाना था 'मेहना चौंक' स्‍थित यूनाइटेड वेलफेयर सोसायटी का ऑफिस या तहसील। यहां पर जितेंद्र से कई बार मुलाकातें हुई। उसको करी... more »

झील से, हवा के बुलबुले निकल रहे थे
नैनीताल झील को साफ रखने के प्रयत्न हो रहे हैं। इस बारे में वहां के उच्च न्यायालय में लोक हित याचिका दायर हुई है। इस चिट्ठी में, उसी के बारे में चर्चा है। नैनीताल झील में नौका विहार करते समय, हम लोगों ने देखा कि झील में कई जगह बुलबुले निकल रहे हैं। पूछने पर हमारे नाव चलाने वाले व्यक्ति शंकर सिंह ने बताया, 'झील का पानी बहुत गंदा हो गया था। इसमें ऑक्सीजन नहीं रह गयी थी। इसलिये मछलियां मर रहीं थीं। झील की सफाई के लिए, उच्च न्यायालय में, एक लोकहित याचिका दायर हुई थी। उसके बाद - २ पावर हाउस बनाये गये हैं जिससे आक्सीजन पानी के अन्दर जगह जगह भेजी जाते है। आप जो यह बुलबुले देख रहे है य... more »

शुक्रवार, 25 मई 2012

“न सोच, न खोज...., से ''सुनहरे कल'' तक

 आपां दोवें रुस बैठे तां मनाउं कौण वे, ओह ओह मैं इस पंजाबी गीत में इतना खो गया था कि मुझे याद ही नहीं रहा कि मैं ब्‍लॉग बुलेटिन लेकर हाजिर हो रहा हूं। ऐसे मौसम में ऐसे गीत अच्‍छे लगते हैं। आपको नहीं पता, आज कल रूठने मनाने का मौसम चल रहा है। जोशी के अस्‍तीफे से मोदी को मनाया गया, तो हाल के दिनों में पार्टी के लिए फैसले और कार्यप्रणाली से शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी नाराज हो गए हैं। ऐसे में भाजपा को हंस राज हंस का गाया हुआ पंजाबी गीत सुनना चाहिए। भाजपा का तो पता नहीं लेकिन इस गीत का फिलहाल मैं आनंद उठाता हूं, आप तब तक पढ़िए। ब्‍लॉग बुलेटिन।
 
“न सोच, न खोज, उड़ जइहें जग है तोप…” ब्‍लॉग-अनुभव से
जीवनगीत है बस ताल से ताल मिलाते रहिए। गीत खोजना मानो जीवन में चांद और सूरज के बीच प्रकाश का कारोबार करना। सिनेमा इसी कारोबार के बीच-बीच में गीत की मिठी-नमकीन दुनिया बसाती है और हमारा मन उसी दुनिया में सो जाने की जिद करने लगती है। दरअसल इन दिनों बहुप्रतिक्षित फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के गीतों को सुनते वक्त ऐसा ही कुछ उल्टा-पुलटा, सीधा-टेढ़ा अनुभव हो रहा है। अनुराग कश्यप की इस फिल्म में गीतों का जो स्वर है वह दरसअसल हिंदुस्तान का स्वर है। फिल्म और गीतों की समीक्षा लिखने की कला से सौ-फीसदी गंवार होते हुए भी अनुराग की इस अंचलमय कृति पर लिखने के लिए जी मचल उठा है। ताकि हम भी पीयूष मिश्र... more »

ज़रा सोचिये .. ब्‍लॉग- स्‍पंदन से
मैं मानती हूँ कि लिखा दिमाग से कम और दिल से अधिक जाता है, क्योंकि हर लिखने वाला खास होता है, क्योंकि लिखना हर किसी के बस की बात नहीं होती और क्योंकि हर एक लिखने वाले के लिए पढने वाला जरुरी होता है और जिसे ये मिल जाये तो "अंधे को क्या चाहिए दो आँखें" उसे जैसे सबकुछ मिल जाता है.और इसीलिए उसके यह कहने के वावजूद "कि कोई बड़ी बात नहीं है पर आपको बता रहा हूँ" मेरा ये पोस्ट लिखना जरुरी हो जाता है .आखिर हर एक ब्लॉगर भी जरुरी होता है और जो ब्लॉगर दूसरे ब्लॉगर के मना करने के वावजूद ना लिखे वो भला कैसा ब्लॉगर:):). इसीलिए सुनिए - अभी कल... नहीं शायद परसों... अजी छोड़िये क्या फर्क पड़ता है .... more »


क्यों बौखलाए हुए हैं शाहरुख खान?  ब्‍लॉग - चवन्नी चैप से

-अजय ब्रह्मात्मज बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ ठीक-ठीक बता सकते हैं कि हाल ही में सुहाना के सामने हुई उनके पिता शाहरुख खान और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों के बीच हुई बाताबाती और झड़प का उन पर क्या असर हुआ होगा? जो भी हुआ, उसे दुखद ही कहा जा सकता है। शाहरुख खान की बौखलाहट की वजह है। वे स्वयं बार-बार कह रहे हैं कि उनके बच्चों के साथ कोई दुव्र्यवहार करेगा तो उनकी नाराजगी लाजिमी है। उन्हें अपनी नाराजगी और गुस्से में कही बातों का कोई अफसोस नहीं है। वे उसे उचित ठहराते हैं। उनके समर्थक भी ट्विटर पर ‘आई स्टैंड बाई एसआरके’ की मुहिम चलाने लगे थे। पूरा मामला तिल से ताड़ बना और अगले द... more »


अपने तो स्वाभिमान की यात्रा निकलती है   ब्‍लॉग चौथा बांदर से
(आज 25-05-2012 को ‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित) थोड़ा कन्फ्यूज़ हूं कि ये स्वाभिमान के लिए यात्राओं का युग है या मन का वहम है। क्योंकि यात्रा निकालने लायक स्वाभिमान किसी में बचा ही कहां है। यहां तो मंहगाई और भ्रष्टाचार ने पहले ही सबके स्वाभिमान की यात्रा निकाली हुई है। वैसे भी आजकल समाज इतना सुरक्षित नहीं बचा कि स्वाभिमान साथ लेकर सड़क पर निकलने का रिस्क उठाया जाए। चेन और मोबाइल स्नेचिंग के बाद अब स्वाभिमान स्नेचिंग की बारी है। स्वाभिमान को लेकर आने वाले समय में लूटपाट मचा करेगी मैं बता रहा हूं। जिसका अपना स्वाभिमान परचुन की दुकान के उधार खाते में ज़ब्त हो चुका होगा वो जरूर... more »


क्रिकेट का दीवानापन - खेलों को पनपने नहीं दे रहा है    ब्‍लॉग- उन्‍मुक्‍त से
इस चिट्ठी में नैनीताल में हॉकी मैच और क्रकेट की दीवनगी के कारण अन्य खेलों के दुर्भाग्य की चर्चा है। यह चित्र आनन्दमय चैटर्जी का है और उनके फ्लिकर चित्र संकलन से लिया गया है। नैनीताल में, हमने मचान रेस्त्रां में दोपहर का खाना खाया। वहां से बाहर निकल कर, शुभा, मित्रों को नैनीताल से भेंट देने कि लिये, कुछ शॉल खरीदने चाहे। वह शॉल देखने चली गयी। मुझे खरीदारी करने पर मजा नहीं आता है। मैं उसके साथ नहीं गया। नैनीताल के फ्लैट में मैदान है। यह झील के बगल में है। वहां पर हमेशा की खेलों की प्रतियोगितायें होती रहती हैं। मैं कई बार यहां प्रतियोगिताओं में... more »

बोली बनाम भाषा ऐंड माथापच्ची इन बिहारी             ब्‍लॉग - लहरें से
इन्सोम्निया...कितना रसिक सा शब्द है न? सुन कर ही लगता है कि इससे आशिकों का रिश्ता होगा...जन्मों पुराना. ट्रांसलेशन की अपनी हज़ार खूबियां हैं मगर मुझे हमेशा ट्रांसलेशन एक बेईमानी सा लगता है...अच्छा ट्रांसलेशन ऐसे होना चाहिए जैसे आत्मा एक शरीर के मर जाने के बाद दूसरे शरीर में चली जाती है. मैं अधिकतर अनुवादित चीज़ें नहीं पढ़ती हूँ...जानती हूँ कि ऐसे पागलपन का हासिल कुछ नहीं है...और कैसी विडंबना है कि मेरी सबसे पसंदीदा फिल्म कैन्तोनीज (Cantonese)में बनी है...इन द मूड फॉर लव. ऐसा एक भी बार नहीं होता है कि इस फिल्म को देखते हुए मेरे मन में ये ख्याल न आये कि ट्रांसलेशन में कितना कुछ छूट गया... more »

मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।     ब्‍लॉग-युवा सोच युवा खयालात से
माता पिता के ख्‍वाबों का जिम्‍मा है मेरे महबूब के गुलाबों का जिम्‍मा है मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता। जॉब से छुट्टी नहीं मिलती विद पे ऐसे उलझे भैया क्‍या नाइट क्‍या डे मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता। भगत सिंह की है जरूरत बेहोशी को मगर यह सपूत देना मेरे पड़ोसी को मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता। क्रांति आएगी, लिखता हूं यह सोचकर वो भी भूल जाते हैं एक दफा पढ़कर मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता। अन्‍ना हो रामदेव हो लताड़े जाएंगे मैडलों के लिए बेगुनाह मारे जाएंगे मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।more »


टैकल पेट्रोल हाइक मक्खन स्टाइल...खुशदीप   ब्‍लॉग-देशनामा से
सरकार बड़ी समझदार है...उसने पेट्रोल के दामों में साढ़े सात रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी सब सोच-समझ कर की है...सरकार को पता है कि तीन-चार दिन देश भर में हो-हल्ला होगा...कुछ ज़्यादा ही हुआ तो सरकार दो-ढाई रुपए का रोल-बैक कर लेगी...फिर जनता भी खुश...चलो कुछ तो सरकार को झुकाया...लेकिन मक्खन सरकार से भी ज़्यादा स्याना है...देखिए उसने पेट्रोल बढ़ोतरी से निपटने के लिए क्या-क्या रास्ते निकाले हैं... मक्खन पेट्रोल पंप पहुंचा... पंप अटैंडेंट ने पूछा...कितने का पेट्रोल डालूं... मक्खन....दस-बीस रुपए का दे दे... अटैंडेंट....क्यों मज़ाक कर रहे हो साहब... मक्खन...ओए, मैं टंकी में नहीं कार के ऊप... more »

सुभीता और सहूलियत     ब्‍लॉग- शब्दों का सफर से
बो लचाल की हिन्दी का एक आम शब्द है* सहूलियत* जिसका प्रयोग सुभीता, सुविधा, आसानी के अर्थ में होता है । सहूलियत का मूल तो अरबी भाषा है मगर हिन्दी में यह फ़ारसी से आया है । दरअसल इसका शुद्ध अरबी रूप *सहूलत* है । मराठी में सुविधा या आसानी के लिए *सवलत* शब्द प्रचलित है । इस *सवलत* में अरबी *सहूलत*के अवशेष देखे जा सकते हैं । * सहूलत* जब फ़ारसी में पहुँचा तो इसका रूप* सोहुलत* हुआ । इस रूप के अवशेष भी मराठी के *सोहलत* में नज़र आते हैं ।* सहूलत* का एक और रूप भी मराठी में है व्यंजन का रूपान्तर सहजता से स्वर में हो जाता है । अरबी *सहूलत* से जिस तरह मराठी में *सवलत *बन रहा है उसी ... more »


सुनहरा कल   ब्‍लॉग-काव्यान्जलि  से
सुनहरा कल, सड़क तट पर लिखे हुए अनगिनत नारे हम एक अरसे से पढ़ रहे है, उनमे से एक 'हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे है'! हमने नारी की पीड़ा को बहुत नजदीक से मौन रह कर देखा है, तंदूर में रोटी की जगह मानव ने एक अबला को किस प्रकार सेंका है! नारी के यौन शोषण से पापों का घडा ये नर पिशाच भर रहें है, फिर भी हम अविरल सुनहरे कल की बात कर रहे है! औषधालय में रोज नूतन अग्निदग्धा लाई जाती है, दहेज न मिलने पर, बेचारी जबरन जलाई जाती है! जलती हुई अबला की चीखें हमे सुनाई नही देती, लुटती हुई नारी की अस्मत हमे दिखाई नही देती! सब कुछ देखते हुए भी, हम पूरी तरह मौन है, हम अनभिज्ञ है कि इस सुनहरे कल का निर्माता कौन है-?,,,... more » 

अच्‍छा तो हम चलते हैं...................समय इजाजत नहीं देता।

बुधवार, 9 मई 2012

वॉट्स विक्‍की डॉनर से बस हमको मोहब्‍बत तक

बेटे, बड़ा होकर क्‍या बनना चाहोगे। मास्‍टर जी, बड़ा होकर डॉनर बनना चाहूंगा। बहुत अच्‍छी बात है बेटा। समाज सेवा करना मानव जीवन का उद्देश्‍य होना चाहिए। पीछे से आवाज आती है, लगता है मास्‍टर जी ने विक्‍की डॉनर नहीं देखी। जय हो।  छोटू विक्‍की डॉनर से याद आया, अभी अभी ब्‍लॉग बुलेटिन पर कुलवंत हैप्‍पी ने वॉट्स विक्‍की डॉनर से बस हमको मोहब्‍बत तक  एक पोस्‍ट डाली है। चल एक चक्‍कर मार आते हैं।

वॉट्स विक्‍की डॉनर रिटर्न   और  वॉट्स विक्‍की डॉनर

रुई का पेड़ A cotton tree or tree cotton

बैंक बैलेंस को छोड़िए, किरपा होए महान

ग़ज़ल और ट्विटर "अँधेरी रात है खुद का भी साया साथ नहीं"

देखो रूठा ना करो ...

मार्क्स, बुद्ध और अनिल म्ह्माने

कहानी-पाठ और परिचर्चा

अपने समय का कठफोड़वा मैं

बस हम को मोहब्‍बत है इंदौर से

चलो दोस्‍तो, अब मैं आपको इंदौर शहर में छोड़कर जा रहा हूं। फिर मिलेंगे, चलते चलते।

लेखागार