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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं यानि बच्चे किसी से कम नहीं

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -

अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये आज पेश है अवलोकन २०१३ का बाल दिवस विशेषांक ...

प्रतिभाओं की कमी नहीं तो बच्चे किसी से कम नहीं - फिर ज़रूरी है उनकी बातें,उनके लिए कुछ विशेष ! आज तो बच्चों का दिन है,चाचा नेहरू की मुस्कान और उनके गुलाब की तरह देश का उज्जवल भविष्य, तो देते हैं कुछ सार्थक उपहार,जिससे बच्चों के चेहरे हो जाएँ गुलाब - सबके दिल हो जाएँ बाग़-बाग़ यानि garden garden :)



 “साहित्य संगीत कला विहीनः,साक्षत पशु पुच्छ विषाण हीनः”—मतलब यह कि साहित्य संगीत और कला से विहीन मनुष्य पूंछ और सींग रहित पशु के समान होता है। यह श्लोक बहुत पहले लिखा गया था।पर इसकी सार्थकता हमेशा रहेगी। वैसे तो इसमें कही गई बातें हर व्यक्ति के ऊपर लागू होती हैं लेकिन अगर हम इस श्लोक को बच्चों के विकास के संदर्भ में देखें तो इसकी प्रासंगिकता आज के समय के लिये और भी बढ़ जाती है।
   आज बच्चों के अंदर जो उच्छृंखलता,उद्दण्डता और विद्रोही होने के हालात पैदा हो रहे हैं उसके पीछे बहुत से कारण हैं।बच्चों के चारों ओर का वातावरण,उनका पारिवारिक माहौल,स्कूल की स्थितियां,दोस्तों की संगत,टी0वी0,इण्टरनेट इत्यादि। इन्हीं में से एक कारण है उनका कला जगत से दूर होना। आज आपको बहुत कम परिवार ऐसे मिलेंगे जहां बच्चों को किसी कला से जोड़ने की कोशिश होती दिखाई पड़े।ज्यादातर अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर इंजीनियर,डाक्टर,
आई0ए0एस0,पी0सी0एस0 या कोई बड़ा अफ़सर बन जाय। और इसके लिये वे बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवायेंगे। कई-कई ट्यूशन और कोचिंग सेण्टर्स भेजेंगे हजारों रूपये खर्च करेंगे।मतलब सुबह से शाम तक सिर्फ़ और सिर्फ़ पढ़ाई।थोड़ा बहुत जो समय बचा वो टी0वी0,इण्टरनेट के हवालें। नतीजा सामने है।बच्चों के ऊपर बढ़ता मानसिक दबाव,तनाव,रिजल्ट खराब होने पर डिप्रेशन,हीन भावना जैसी मनोग्रन्थियां बच्चों को जकड़ने लगती हैं।कहीं बच्चा अधिक निराशा में पहुंचा तो वो आत्महत्या तक करने की कोशिश कर बैठता है।
    जबकि इन सारी दिक्कतों से अभिभावक अपने बच्चों को बचा सकते हैं। सिर्फ़ उसे किसी भी कला से जोड़ कर।चाहे वह गायन हो,नृत्य हो,स्केचिंग,पेण्टिंग म्युजिक,अभिनय या फ़िर कोई अन्य कला हो। इनसे जुड़ने से बच्चे के अंदर आत्मविश्वास पैदा होगा। उसे लगेगा कि वह किसी चीज में तो दक्ष है।
                         
            ऐसा नहीं है कि आज समाज से या परिवार से कलाओं का लोप हो गया है। कलाओं का स्थान आज भी परिवारों में है। परन्तु आज उसका स्वरूप,मकसद बदलता जा रहा है।बहुत से परिवारों में आज भी बच्चों को नृत्य,संगीत,अभिनय आदि कलाओं का प्रशिक्षण दिलवाया जा रहा है। लेकिन उसके पीछे उनका मकसद व्यावसायिक हो गया है न कि बच्चों का आत्मिक विकास। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा आगे चलकर उस कला के माध्यम से  धन कमा सके। जब कि ऐसा नहीं होना चाहिये। किसी भी कला का सर्वप्रथम उद्देश्य बच्चों को या किसी भी व्यक्ति को एक अच्छा इन्सान बनाना होता है। उसे अनुशासन सिखाना होता है।व्यावसायिकता तो बहुत आगे की बात होती है। और फ़िर यह जरूरी नहीं है कि हर बच्चा गायन सीख कर सोनू निगम या अभिनय सीख कर शाहरुख खान बने ही। लेकिन इतना तय है कि वह बच्चा उस कला के माध्यम से अनुशासित जरूर हो जायेगा।समय की पाबन्दी जरूर सीखेगा।मेहनत करना जरूर सीखेगा। उसके अंदर आत्मविश्वास जरूर पैदा होगा—कि वह भी कुछ करने लायक है।
        हमारे अभिभावकों को भी यह बात समझनी चाहिये कि यदि वे अपने बच्चों को पढ़ाई के,स्कूल के तमाम दबावों और तनावों से छुटकारा दिला सकते हैं तो इस काम में कोई भी कला निश्चित रूप से किसी दवा,चिकित्सक,मनोचिकित्सक से बढ़ कर कारगर सिद्ध हो सकती है। इतना ही नहीं कला भी उसके सम्पूर्ण विकास में उतनी ही सहायक होगी  जितना कि पढ़ाई-लिखाई या खेलकूद। मैं इस बात को पुष्ट करने के लिये यहां एक उदाहरण दूंगा। मैंने अपने एक मित्र से कहा कि आप अपने बेटे को शैक्षिक दूरदर्शन के कार्यक्रमों में क्यों नहीं भेजते?बस इतना कहना था कि वो उखड़ गये मेरे ऊपर। उन्होंने सीधे-सीधे मुझसे कह दिया कि “मैं अपने बच्चों को बर्बाद नहीं करना चाहता। और अब दुबारा कभी मुझसे यह बात मत कहना।” मैं उनका गुस्सा देख कर चुप हो गया। लगभग पांच छः साल के बाद मेरे वही मित्र अपने बच्चे को लेकर मेरे पास आये। उस समय उनका बच्चा कक्षा 8 में था। उन्होंने मुझसे कहा कि “इसे कुछ याद ही नहीं होता।दिन रात पढ़ता रहता है। और भेजे में कुछ घुसता ही नहीं।खेलने कूदने में भी मन नहीं लगता।कुछ कह दो तो रोने लगता है।” वो अपने बेटे के भविष्य को लेकर काफ़ी चिन्तित भी लग रहे थे।मैंने उन्हें शान्त कराया। और उनसे अनुरोध करके उनके बेटे को मैंने एक इन्स्ट्रुमेण्टल म्युजिक की क्लास ज्वाइन करवा दी। लड़के ने बांसुरी बजाना सीखना शुरू किया। और छःमहीने बितते बीतते उस बच्चे का पूरा स्वभाव ही बदल गया। उसका सारा गुस्सा,सारी उद्दण्डता गायब। वह अब पढ़ने में भी रुचि लेने लगा था। उनका वही जिद्दी,शैतान बच्चा हाई स्कूल,इण्टर प्रथम श्रेणी में पास हुआ। फ़िर इन्जीनियरिंग पास किया।आजकल वही बच्चा एक मल्टीनेशनल कम्पनी में है।
                     
यह सब बताने का मेरा यहां सिर्फ़ यही उद्देश्य था कि आप अपने बेटे को पढ़ाई,लिखाई के साथ ही किसी कला से भी जोड़िये।क्योंकि कला सिर्फ़ एक मनोरंजन या व्यवसाय का साधन ही नहीं है बल्कि यह ----
बच्चे को अनुशासित बनाती है।
बच्चे के अंदर आत्मविश्वास भरती है।
वह किसी भी काम को एक व्यवस्थित और साफ़ सुथरे ढंग से करना भी सीखता है।
उस कला के माध्यम से बच्चे का मानसिक तनाव भी खतम होता है।
उस कला में रोज नये प्रयोगों के करने से उसका बुद्धि कौशल भी बढ़ता है।
वह अपने भावी जीवन में भी हर काम को बहुत ही सलीके से और कलात्मक ढंग से पूरा करता है।
कला बच्चे के अन्दर कुछ नया करने ,सृजित करने का उत्साह भी पैदा करती है।
कला बच्चे के व्यक्तित्व को सौम्य,हंसमुख और मिलनसार बनाती है।
और सबसे बड़ी और अहम बात यह कि कोई भी कला आपके बच्चे के व्यक्तित्व को सम्पूर्ण बनाती है।
    इसलिये सभी अभिभावकों के साथ ही सभी शिक्षकों से भी यही कहूंगा कि बच्चों को किसी भी कला से जोड़कर देखिये आपको हर रोज उसके व्यक्तित्व,व्यवहार,कौशल और प्रदर्शन का एक नया और अनूठा आयाम दिखाई पड़ेगा।
                           

(कैलाश शर्मा )

एक जंगल में घना पेड़ था,
उसके कोटर में तीतर रहता.
उसका कौआ ख़ास दोस्त था,
वह जुआर के खेत में रहता.

कौए से मिलने की इच्छा से,
तीतर उड़ कर गया खेत पर.
एक खरगोश ने पीछे आकर,
कब्ज़ा किया उसके कोटर पर.

जब तीतर घर आया शाम को,
कोटर में खरगोश को देखा.
तीतर बोला तुम बाहर निकलो,
नहीं जानते है यह घर मेरा?

जब होने लगी बहस दोनों में,
हुए इकट्ठे जंगल के जानवर.
बोले खरगोश से बाहर आओ,
यह तो है तीतर का ही घर.

बोला खरगोश जो घर में रहता,
उसका ही वह घर कहलाता.
मैं बैठा हूँ इस कोटर के अन्दर,
इस पर मेरा हक़ बन जाता.

सभी विचार विमर्श कर के भी
वे नहीं कोई निर्णय कर पाये.
तब सलाह दी बुज़ुर्ग हिरन ने,
निष्पक्ष व्यक्ति को ढूँढा जाये.

तीतर व खरगोश चल दिये,
किसी निष्पक्ष की तलाश में.
उनको मिली जंगली बिल्ली,
जो बैठी थी सुनसान राह में.

तुम क्या हमारा न्याय करोगी,
बिल्ली से बोले वे दोनों जाकर.
बिल्ली बोली मैं ऊँचा सुनती,
कहो बात तुम पास में आकर.

जैसे ही दोनों पास में आये,
बिल्ली झपट पडी दोनों पर.
पकड़ उन्हें अपने हाथों से,
खाया दोनों को खुश होकर.

जो साथी, हमदर्द तुम्हारे,
उनकी राय सदा ही मानो.
अजनबियों की राय हमेशा
सोच समझ कर ही मानो.

ये तो हुआ बड़ों का उपहार - अब बच्चों की प्रतिभा से मिलते हैं और इस विश्वास को मजबूत बनाते हैं -
'होनहार बिरवान के होत चिकने पात'

(अक्षिता यादव)

मैंने इक कहानी पढ़ी और मुझे अच्छी लगी, सो आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ-

एक आदमी गुब्बारे बेच कर जीवन-यापन करता था. वह गाँव के आस-पास लगने वाली हाटों में जाता और गुब्बारे बेचता . बच्चों को लुभाने के लिए वह तरह-तरह के गुब्बारे रखता …लाल, पीले ,हरे, नीले, बैंगनी, काला । और जब कभी उसे लगता कि  बिक्री कम हो रही है वह झट से एक गुब्बारा हवा में छोड़ देता, जिसे उड़ता देखकर बच्चे खुश हो जाते और गुब्बारे खरीदने के लिए पहुँच जाते।

एक दिन वह हाट में गुब्बारे बेच रहा था और बिक्री बढाने के लिए बीच-बीच में गुब्बारे उड़ा रहा था. पास ही खड़ी  एक बच्ची ये सब बड़ी जिज्ञासा के साथ देख रही था . इस बार जैसे ही गुब्बारे वाले ने एक सफ़ेद गुब्बारा उड़ाया वह तुरंत उसके पास पहुंची  और मासूमियत से बोली, ” अगर आप ये काला वाला गुब्बारा छोड़ेंगे…तो क्या वो भी ऊपर जाएगा ?”

गुब्बारा वाले ने थोड़े अचरज के साथ उसे देखा और बोला, ” हाँ बिलकुल जाएगा बिटिया  ! गुब्बारे का ऊपर जाना इस बात पर नहीं निर्भर करता है कि वो किस रंग का है बल्कि इस पर निर्भर करता है कि उसके अन्दर क्या है।.”

कितनी अच्छी बात कही गुब्बारे वाले  ने। ठीक इसी तरह यह बात हमारे जीवन पर भी लागू  होती है। कोई अपने जीवन  में क्या हासिल करेगा, ये उसके बाहरी रंग-रूप पर नहीं बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उसके अन्दर क्या है। अंतत: हमारा attitude (रवैया) हमारा altitude (ऊँचाई) तय  करता है। 

....तो कैसी लगी यह कहानी आप सबको। पसंद आई न और कित्ती अच्छी बात कही गई है इस कहानी के माध्यम से ...

बाल सजग

एक ऐसा ब्लॉग है, जो बना है सिर्फ बच्चों के लिए। इसकी टीम में सभी मजदूर बच्चे हैं, जो 

काम करते हैं और साथ ही कवितायें-कहानियां भी कहते हैं

तो घूमते है थोड़ी देर उनकी दुनिया में -

प्राणी बड़ा ही बंधा हुआ ,
साबित होता जा रहा है ..... 
हर एक प्राणी ,
प्राणी के पीछे से जा रहा है .....
जो वो कर रहा है,
वही करने की वो सोच रहा है ......
न उसकी अपनी समझ है ,
न ही अपनी सोच है ......
जो देख रहा है प्रक्रति और संसार से ,
वो वही कर रहा है ......
हर एक प्राणी ,
प्राणी के पीछे जा रहा है ......
अब वह समय दूर  नहीं ,
जिसमें प्राणी को प्राणी बाधेगा .....
आँगन की उस चौपाल में,
जहां प्राणी ही प्राणी आयेगा .....
प्राणी को देख के ,
प्राणी के मुख में मुस्कान होगी .....

 हर एक प्राणी ,
प्राणी के पीछे जा रहा है .......

                           लेखक  : अशोक कुमार
                           कक्षा : १०
                           अपना घर

मंहगाई ने आसमान छू डाला , 
गरीबों को तो भूखा मार डाला .....
सब्जी मंहगी, अनाज मंहगा,
अब तो हर सामान है  मंहगा .....
पेट्रोल तो इतना मंहगा हो गया, 
गाड़ियों में पेट्रोल डलवाना .....
कितना ज्यादा मंहगा पड गया ,
नया नेता बनाने से ......
कुछ बदलाव नहीं आया ,
सभी चीजों को मंहगाई ने है खाया ......

नाम : चन्दन कुमार, कक्षा : ७, अपना घर 

अंत में साहिर लुधियानवी के गीत की पंक्तियाँ दोहराती हूँ =

'बच्चों तुम तकदीर हो कल के हिंदुस्तान की
बापू के वरदान की, नेहरू के अरमान की...'

बुधवार, 14 नवंबर 2012

लो जी फिर आ गया 'बाल दिवस' - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

कल बड़ा ही सुखद संयोग रहा ... दिवाली और ब्लॉग बुलेटिन की पहली वर्षगांठ ... और अजय भाई ने इस मौके का सदुपयोग करते हुये बीमारी के बाद बुलेटिन मंच पर अपनी वापसी भी की ! 

कल की ही तरह आज का दिन भी कुछ खास है ... आज 'बाल दिवस ' है ... वैसे यह बात और है कि हमारे देश मे इस का कोई खास मतलब नहीं है ... केवल स्कूल मे मनाए जाने वाली एक नाम मात्र की रस्म ही बन कर रह गया है यह दिवस !
 पर आज मैं आपको बाल दिवस को ले कर कोई राजनीति से भरी बातें नहीं बताने जा रहा हूँ बल्कि कुछ जरूरी बातें बता रहा हूँ ... जो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मे हमारे अपने बच्चो से जुड़ी हुई है ... जिन का अगर हम ध्यान रखें तो केवल साल के एक दिन नहीं बल्कि हर दिन हम बाल दिवस मनाएंगे !

 बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए जरूरी है माता-पिता का भरपूर प्यार व सहयोग। उन पर किसी तरह का दबाव बनाने के बजाय हालात के अनुसार उन्हे खुद को ढालना सिखाएं !
पापा की पिटाई, टीचर की डांट, और टयूशन का दबाव। आज हर बच्चे को ऐसी ही उलझनों से गुजरना पड़ता है। बच्चों से जब कोई काम दबाव में करवाया जाता है तो उसका सीधा असर शारीरिक व मानसिक विकास पर पड़ता है। बच्चे होनहार बनें इसके लिए जरूरी है कि उन पर हमेशा निगाह रखी जाए, लेकिन इससे भी कहीं अधिक जरूरी है पैरेट्स बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार अपनाएं। परवरिश ऐसी की जाए कि वे हर स्थिति में अपने को ढाल सकें।
दबाव न बनाएं
बात पढ़ाई की हो या अन्य किसी विषय की। बच्चों पर कभी काम का दबाव न बनाएं। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रत्‍‌ना त्रिपाठी कहती है, ''मॉडर्न लाइफ स्टाइल में बच्चों पर उम्र के हिसाब से हर चीज का अधिक दबाव है। स्कूल में अच्छे नंबर लाने की होड़, घर में पैरेट्स और रिश्तेदारों के सामने इमेज बनाने का दिखावा और सार्वजनिक मंच पर एक्स्ट्रा एक्टिविटी साबित करने की जद्दोजहद। अच्छा रहेगा कि पैरेट्स दूसरों की देखा-देखी न करके बच्चे की क्षमता और पसंद को प्राथमिकता में रखें। ऐसा न करे कि बच्चे की किसी भूल या गलती पर सभी डांट लगा रहे हों तो आप भी उस पर हावी हो जाएं। संयम से काम लें और बच्चे को गलत व सही में अंतर करना सिखाएं।''
आत्मविश्वास बढ़ाएं
आप किसी भी परेशानी से आसानी से उबर सकते है, लेकिन बच्चे तो कोरा कागज होते है। इस उम्र में आप उनके दिमाग में जैसी इबारत लिख देंगे, भविष्य में वे वैसा ही करेगे और सोचेंगे भी। एक पब्लिक स्कूल की शिक्षिका आरती दत्ता कहती है, ''किसी भी गलती पर बच्चे को समझाएं और उसे सही करने के लिए उत्साहित करे। इससे आत्मविश्वास बढ़ेगा। बच्चे को नकारात्मक सोच के भंवर में न फंसने दें और हमेशा यह जताएं कि तुम भी वह सब कुछ कर सकते हो जो दूसरे बच्चे कर लेते है। इससे उनका उत्साह बढ़ेगा और कुछ कर गुजरने का जज्बा विकसित होगा।''
जिज्ञासा शांत करे
बच्चों में बड़ों की अपेक्षा किसी भी चीज को जानने की उत्सुकता अधिक होती है। वे किसी भी विषय को बहुत गहनता से जानना चाहते है। स्कूल में बच्चे के कई बार कोई प्रश्न करने पर उसे टीचर की डांट खानी पड़ती है, बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.सी.एस. गांधी कहते है, ''ऐसे में वे अपनी जिज्ञासा पैरेट्स से शेयर करते है। आप बच्चे से टीचर वाला व्यवहार न करके उसकी जिज्ञासा का समाधान करे। यदि आपको भी उस विषय की जानकारी नहीं है तो जानकारी जुटाकर उसे संतुष्ट करे। इससे उनमें किसी भी बात को गहराई से समझने की आदत विकसित होगी।''
खेलने का मौका
पढ़ाई जरूरी है, लेकिन छोटे बच्चों को खेलने का पूरा मौका दें। बच्चे हमेशा पैरेट्स से अपेक्षा करते है कि वे भी उनके साथ खेलें। इस बात पर अक्सर बच्चों को डांट भी खानी पड़ती है। मनोचिकित्सक डॉ. कलीम अहमद कहते है, ''बच्चों के खेलने का समय निर्धारित रखें। कोशिश करे कि यदि समय है तो उनके साथ खुद भी खेलें। इससे वे अधिक प्रसन्नता के साथ खेल का मजा लेंगे।''
डिप्रेशन से बचाएं
कई बार उनके साथियों की उपलब्धि या अच्छे अंक लाने की बात से बच्चे नीरस हो जाते है। उन्हे डांटने की बजाय आगे अच्छा करने के लिए प्रेरित करे। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आर.सी. गुप्ता कहते है, ''स्कूल से आने के बाद यदि बच्चा गुमसुम रहता है या खाना ठीक से नहीं खाता है तो वजह जानें और समस्या का शांति के साथ समाधान करे। इससे बच्चा डिप्रेशन की चपेट में नहीं आएगा। हर बच्चे का आईक्यू लेवल अलग होता है। बेहतर रहेगा कि अपने बच्चे की तुलना किसी अन्य से न करे।''
(आलेख जागरण से साभार)
सादर आपका 

शिवम मिश्रा

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बाल-दिवस

आज उनका दिन है , जिनके दिलों में ईश्वर बसता है , जिनकी मुस्कान के जरिये अल्लाह हम पर अपना करम बरसाता है | लेकिन एक कड़वा सच ये भी है - झोपड़े के नीचे मुस्कुराता , एक बेचारा बचपन , ना जाने कब बीत गया , उसका वो प्यारा बचपन || कुछ के घर में माँ बाप नहीं , कुछ घर छोड़ कर भागे हैं , कुछ बहकावे में निकल लिए , कुछ पैदा हुए अभागे हैं , चाहे जैसे भी आये हों , सबकी किस्मत कुछ मिलती है , न कागज की वो नावें हैं , न झूलों पर बैठा बचपन || इनके हमउम्र सभी बच्चे , जब खेल खिलौनों में खुश हैं , इनके तो खेल दुकानों में , सुबह से ही सज जाते हैं , जब बाकी सब गिनती सिखने की , घर में कोशिश करते हैं , ये बि... more »

हम बच्चे भारत के !

कालीपद प्रसाद at मेरे विचार मेरी अनुभूति
हम बच्चे भारत माँ के ,चलेंगे सीना तान के चल पड़े हैं राह में ,नया देश हम बनायेंगे, विषमता हम मिटायेंगे ,समानता हम लायेंगे, हम बच्चे भारत माँ के , चलेंगे सीना तान के। गाँधी नेहरू चाहे बन जाएँ ,रहेंगे हम भारत के काम चाहे जो कुछ भी हो , करेंगे हम लगन से, कोई न छोटा कोई न बड़ा ,ऐसा देश हम बनायेंगे हम बच्चे भारत माँ के , चलेंगे सीना तान के। देश के लिए जियेंगे हम , देश के लिए मरेंगे हिन्दु मुश्लिम शिख इशाई, सबसे प्रेम बढायेंगे , जात-पात का भेद भाव को , हम बच्चे न मानेंगे , हम बच्चे भारत माँ के , चलेंगे सीना तान के। भारत एक है ,हम सब एक हैं ,यही हमारा नारा है , भारत माँ के हम बच्चे ... more »

हैपी दिवाली

माधव( Madhav) at माधव

"अभिमन्यु"- मेरा बेटा

जयदीप शेखर at कभी-कभार
यह एक सुखद संयोग है कि (ईस्वी संवत् के हिसाब से) मेरे बेटे का पन्द्रहवाँ जन्मदिन आज दीपावली के दिन ही पड़ा है। भारतीय पंचांग के हिसाब से उसका जन्मदिन गुरू नानक जयन्ती वाले दिन पड़ता है। उसका जन्म हुआ भी पंजाब में है- जालन्धर छावनी के सेना अस्पताल में। उसके जन्म के साथ गुरू नानक देव का आशीर्वाद भी जुड़ा है, जिसका जिक्र मैंने एक ब्लॉग पोस्ट (‘रक्तदान तथा अभिमन्यु का जन्म’) में कर रखा है। उसके जन्म से पहले ही हमने तय कर रखा था कि अगर बेटी हुई, तो वह “उत्तरा” होगी और अगर बेटा हुआ, तो वह होगा- “अभिमन्यु”! खैर, चित्र में वह अपने इस विशेष जन्मदिन के विशेष तोहफे- एक “एयर गन”के साथ है। ... more »

दीपावली पर कुछ कविताएँ

* * * * * * *(1) **प्लास्टिक का तोरण* * दरवाजे पर लगा देख* * बहुत याद आया * * आम का पेड़ * * जो हाल में कटा था.* *(2) **खिलौने बेचने वाले बच्चों ने ,* * खिलौने खेलने वाले बच्चों से कहा, हैप्पी दीवाली.* * * * * * * * * * * *(3) **जग रंगा है रौशनी से,* * दीवाली है, रौशनी की होली.* * * * * * * * * * * *(4) **प्लास्टिक के फूल,* * प्... more »

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ..!!

सुख, समृद्धि, सद्बुद्धि, सौभाग्य से परिपूर्ण हो हर दिवस..प्राणी-मात्र के लिए, हर जीव के लिए शुभकारी एवं मंगलकारी हो मंगल त्यौहार.. ढेरों शुभकामनाएँ..!!! ... "अंतर्मन की ज्योति जले.. करो प्रभुवर उपकार.. जीवन का उद्देश्य.. रक्षा प्राणी-मात्र..!!" ...

इक तो सजन मेरे पास नहीं रे...

गौतम राजरिशी at पाल ले इक रोग नादां...
*{मासिक हंस के नवंबर 2012 अंक में प्रकाशित कहानी}* वो आज फिर से वहीं खड़ी थी। झेलम की बाँध के साथ-साथ चलती ये पतली सड़क बस्ती के खत्म होने के तुरत बाद जहाँ अचानक से एक तीव्र मोड़ लेते हुये झेलम से दूर हो जाती है और ठीक वहीं पर, ठीक उसी जगह पर जहाँ सड़क, झेलम को विदा बोलती अलग हो जाती है, एक चिनार का बूढ़ा पेड़ भी खड़ा है जो बराबर-बराबर अनुपात में मौसमानुसार कभी लाल तो कभी हरी तो कभी गहरी भूरी पत्तियाँ उस पतली सड़क और बलखाती झेलम को बाँटता रहता है। कई बार मूड में आने पर वो बूढ़ा चिनार अपने सूखे डंठलों से भी झेलम और इस पतली सड़क को नवाजता है...आशिर्वाद स्वरुप, मानो कह रहा हो कि लो र... more »

..माँ का अपने बेटे के लिए पत्र

on children 's day today ...missing my son... ...माँ का अपने बेटे के लिए पत्र एक पत्र बेटे के नाम मेरे बेटे ...... बंद पलके जब उठाती हूँ तो तू ही नज़र आता है मुझे दिन में हर वक़्त हर पल तू याद आता है मुझे कैसे तुझे अपने पास बुलाऊं या खुद आ जाऊं ये बिलकुल भी समझ न आये मुझे तुझे खुद से दूर करने की तमन्ना न थी तेरी ज़िन्दगी संवर जाए ये बस उम्मीद है मुझे तेरी हर इच्छा पूरी हो हर सपने का आगाज़ हो तेरी हर नेक मुराद पर यकीन है मुझे कठिन राह पे चलते ,मंजिल पाना है भी मुश्किल फिर भी जीत जाओगे ,लक्ष्य अपना पाओगे ये खुदा से दुआ है मेरी और विश्वास है मुझे तुम हमेशा सलामत रहो ,खुश रहो नेक कर्म और पर... more »

एक वज़ह खुशियों की

गिरिजा कुलश्रेष्ठ at Yeh Mera Jahaan
खुशियों की एक खास वज़ह सी जैसे पहली किरण सुबह की । अभी-अभी तो आयीं थीं ये , अरे होगई पूरे छह की

एक दिन का बाल दिवस ,उम्र भर का अंधेरा

अजय कुमार झा at अजय कुमार झा 

चौदह नवंबर , पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिवस , कहते हैं कि नेहरू जी को बच्चों से इतना स्नेह था कि बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहते थे । सच कहें तो अब तो इन बातों पर भी विश्वास नहीं होता , कहीं कल को किसी आरटीआई के जवाब में सुनने को मिले कि नहीं , भारत सरकार के पास ऐसी कोई आधिकारिक सूचना , आदेश , नहीं है जिसमें इस बात का उल्लेख है कि नेहरू जी के जन्म दिवस को देश बाल दिवस के रूप में मनाएगा । फ़िर एक दूसरी वजह ये भी है ये सोचने की , कि पिछली आधी शताब्दी से more>>

सुतली बमों से उड़ा दिए गए तमाम घरौंदों के नाम

Samar at Mofussil Musings
*बचपन का त्यौहार थी दीवाली. *दिए अच्छे लगते थे पर जान तो पटाखों में ही बसती थी और उनमे भी सबसे ज्यादा हरे 'एटम बम' (शहरी हो जाने के पहले के उन दिनों में उच्चारण बम्ब होता था ) और कसबे के आतिशबाज से लाये उन सुतली बमों में जिनकी आवाज पर आज तक कोई और आवाज भारी नहीं पडी. उन बमों के इस्तेमाल भी तमाम होते थे. आख़िरी, पर सबसे प्रिय, काम होता था बीतती रात के साथ कम होते जा रहे सुतली बमों से बहनों के बड़ी मेहनत से बनाए घरौंदों को उड़ा देना. अब फिर कस्बाई सामाजिकता में जिसमे अपनी बहनें ही नहीं बल्कि मोहल्ले की सारी लड़कियां बहनें होती थीं, घरौंदे कम नहीं पड़ते थे बस बम ख़त्म हो जाते थे. फि... more »

टोंका ग़ज़ल ने एक दिन

Anand Dwivedi at आनंद
सुनते थे इश्क से बड़ा मज़हब नहीं होता जाना कि इश्क से बड़ा करतब नहीं होता मैं चाहता था प्यार में थोड़ा वफ़ा का रंग मालुम हुआ कि आजकल ये सब नहीं होता वो द्रोपदी की चीर के किस्से का क्या करूँ बुधिया की आबरू के लिये रब नहीं होता टोंका ग़ज़ल ने एक दिन, जो कह रहे मियां उससे किसी गरीब का मतलब नहीं होता जन्नत की राह होंगी यकीनन तेरी जुल्फें 'आनंद' से जन्नत का सफ़र अब नहीं होता

काहे का बाल दिवस ???

शिवम् मिश्रा at हर तस्वीर कुछ कहती है ...
*आजादी के छह दशक से अधिक समय गुजरने के बावजूद आज भी देश में सबके लिए शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है। देश में भले ही शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कवायद जारी है, लेकिन देश की बड़ी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने के मद्देनजर सभी लोगों को साक्षर बनाना अभी भी चुनौती बनी हुई है। ऐसे मे सवाल पैदा होता है कि काहे का बाल दिवस ??? 

मैंने जीवन जलाकर रौशन किया तुम्हारे देवता का घर ....

बहुत मंहगा है दीये का तेल और मेरे हाथ हैं खाली मैंने जीवन जलाकर रौशन किया तुम्हारे देवता का घर ....

खोटे सिक्के

shashi priya at दिल से...
'फर्क है, सिक्का दोनों ओर से खोटा होता है.’ फिल्म शोले में ठाकुर ने जेलर से तब कहा जब जय और वीरू को उसने ‘खोटा सिक्का और किसी काम के नहीं’ बता कर ख़ारिज कर दिया था. ये संवाद मशहूर लेखक सलीम-जावेद की जोड़ी की कलम की धार तो दिखलाती है पर जो नहीं जानते उन्हें जानकर आश्चर्य होगा कि शम्मी कपूर की हिट फिल्म ‘प्रोफेसर’ और ‘तीसरी मंजिल’ में उनके दोस्त की अननोटिस रहने वाली भूमिका में सलीम ही थे. अभिनेता के तौर पर सदा खोटे सिक्के की तरह याद किये जाने वाले व्यक्ति. बिलकुल सलीम की तरह की नाकामी देखी सुभाष घई ने. जिनका अभिनय करियर शुरू हुआ और समाप्त हो गया फिल्म उद्योग के ‘हैली कॉमेट’ राजेश खन्... more »

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अब आज्ञा दीजिये ...

पर जाते जाते एक दुआ यह कि भले ही भारत मे बाल दिवस मनाया जाये या न जाये ... इन मासूम चहेरो पर मुस्कान बनी रहे ... आमीन !!

जय हिन्द !!!

सोमवार, 14 नवंबर 2011

१ दिन बाल दिवस - ३६४ दिन भाड़ में जाओ दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

कल हुयी इस नयी शुरुआत पर जो आप सब का प्यार मिला है उसके लिए हमारी पूरी टीम आप सब के सामने नतमस्तक है और हम सब यही आशा करते है कि हमारे लिए आपका यह प्यार दिन दुगनी रात चौगुनी बढता जाए !

जैसा कि आप सब जानते ही है आज १४ नवम्बर है ... यानी बाल दिवस ... पर क्या केवल साल के एक दिन ही बाल दिवस मना लेने से हमारा फ़र्ज़ पूरा हो जाता है ???

बाकी ३६४ दिन का क्या ???

आजादी के छह दशक से अधिक समय गुजरने के बावजूद आज भी देश में सबके लिए शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है। देश में भले ही शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कवायद जारी है, लेकिन देश की बड़ी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने के मद्देनजर सभी लोगों को साक्षर बनाना अभी भी चुनौती बनी हुई है।
सरकार ने  छह से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा प्रदान करने का कानून बनाया है, लेकिन शिक्षाविदों ने इसकी सफलता पर संदेह व्यक्त किया है क्योंकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जद्दोजहद में लगा हुआ है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने के लिए देश में दस लाख अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत पर जोर देते हुए शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की संख्या में वृद्धि और व्यापक शिक्षा के लिए आईसीटी के इस्तेमाल के अलावा शिक्षण के पेशे की गरिमा और मान सम्मान को बहाल करने की आवश्यकता बताई है।
इग्नू के जेंडर एजुकेशन संकाय की निदेशक सविता सिंह ने कहा था कि गरीब परिवार में लोग कमाने को शिक्षा से ज्यादा तरजीह देते हैं। उनकी नजर में शिक्षा नहीं बल्कि श्रम कमाई का जरिया है।
 ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों के जीवनस्तर में सुधार किए बिना शिक्षा के क्षेत्र में कोई भी नीति या योजना कारगर नहीं हो सकती है बल्कि यह संपन्न वर्ग का साधन बन कर रह जाएगी। आदिवासी बहुल क्षेत्र में नक्सलियों का प्रसार इसकी एक प्रमुख वजह है।
सरकार के प्रयासों के बावजूद प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। इनमें बालिका शिक्षा की स्थिति गंभीर है।
विश्व बैंक की रपट में भी भारत में माध्यमिक शिक्षा की उपेक्षा किए जाने पर जोर देते हुए कहा गया है कि इस क्षेत्र में हाल के वर्षो में निवेश में लगातार गिरावट देखने को मिली है।
भारत में माध्यमिक शिक्षा पर विश्व बैंक रपट में माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में निवेश में गिरावट का उल्लेख किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले खर्च का जहां प्राथमिक शिक्षा पर 52 प्रतिशत निवेश होता है वहीं दक्ष मानव संसाधान को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में कुल खर्च का 30 प्रतिशत ही निवेश होता है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा के कुल खर्च का 18 प्रतिशत हिस्सा आता है।
भारत में माध्यमिक स्तर पर 14 से 18 वर्ष के बच्चों का कुल नामांकन प्रतिशत 40 फीसदी दर्ज किया गया जो पूर्वी एशिया और लैटिन अमेरिका में वैश्विक प्रतिद्वन्दि्वयों के कुल नामांकन अनुपात से काफी कम है।
भारत से कम प्रति व्यक्ति आय वाले वियतनाम एवं बांग्लादेश जैसे देशों में भी माध्यमिक स्तर पर नामांकन दर अधिक है।
उच्च शिक्षा की स्थिति भी उत्साहव‌र्द्धक नहीं है। फिक्की की रपट में कहा गया कि महत्वपूर्ण विकास के बावजूद भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में कई तरह की खामियां हैं जो भविष्य की उम्मीदों के समक्ष चुनौती बन कर खड़ी है।
रपट के अनुसार इन चुनौतियों में प्रमुख उच्च शिक्षा के वित्त पोषण की व्यवस्था, आईसीटी का उपयोग, अनुसंधान, दक्षता उन्नयन और प्रक्रिया के नियमन से जुड़ी हुई है।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सकल नामांकन दर की खराब स्थिति को स्वीकार करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री ने कहा कि स्कूल जाने वाले 22 करोड़ बच्चों में केवल 2.6 करोड़ बच्चे कालेजों में नामांकन कराते हैं। इस तरह से 19.4 करोड़ बच्चे स्कूली शिक्षा से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
सरकार का लक्ष्य उच्च शिक्षा में सकल नामांकन दर को 12 प्रतिशत से बढ़ा कर 2020 तक 30 प्रतिशत करने का है। इन प्रयासों के बावजूद 6।6 करोड़ छात्र ही कालेज स्तर में नामांकन करा पाएंगे, जबकि 15 करोड़ बच्चे कालेज स्तर पर नामांकन नहीं जा पाएंगे।
क्या एसे ही 'बाल दिवस' मनाया जाएगा ?? मतलब मालूम है किसी नेता को 'बाल दिवस' का ... 
क्यों मनाया जाता है यह ?? क्या भावना थी 'बाल दिवस' मनाने के पीछे ??? कोई जवाब देगा क्या ... ???
शायद आज के भारत में किसी भी नेता के पास इसका कोई जवाब नहीं है !! होगा भी कैसे ?? जो नेता अपने नेताओ को भूल गए वो उनकी बातो को याद रखेगे ... न.. न ... हो ही नहीं सकता ...

एक छोटा सा संवाद पेश कर रहा हूँ :- 

"टाइम कहाँ है इतना ... और भी काम है ...बड़े आए 'बाल दिवस' मनाने ... कल आ जाना ... मूंछ दिवस के लिए ... तुम सब के सब हो ही ठलुआ ........चलो भागो यहाँ से !! यहाँ अपने लिए टाइम नहीं है और यह आए है 'बाल दिवस' मनाने ??
अच्छा सुनो जब आ ही गए हो तो P.A से मिल लो ... कुछ करवा देते है ... अरे कुछ और नहीं तो बच्चा सब टाफी तो खा ही लेगा ... है कि नहीं ?? अब खुश मना दिए न तुम्हारा 'बाल दिवस' !! अब जाओ बहुत काम बाकी है देश का निबटने को !! "


वैसे यह नेता ठीक कहते है क्या लाभ है 'बाल दिवस' मनाने का ?? जब आज भी हम इन बच्चो को वह माहौल नहीं दे पाये जब यह दो वक्त की रोटी की चिंता त्याग शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर पाए ! 'बाल दिवस' केवल मौज मस्ती के लिए तो नहीं था ... इसका मूल उद्देश तो हर बच्चे तक सब सरकारी सुविधाओ को पहुँचाना था  ... कहाँ हो पाया यह आज़ादी के ६४ साल बाद भी ....

ज़रा सोचियेगा इस विषय पर ...


चलिए अब लिए चलता हूँ आपको आज के 'ब्लॉग बुलेटिन' की ओर ...
आज १४ नवम्बर को बाल दिवस मनाते हुए  नीचे दिए जा रहे है १४ चित्र - हर चित्र पर चटका लगाने पर एक ब्लॉग पोस्ट खुलेगी ... पर हाँ यह साफ़ कर दूँ ... यह जरुरी नहीं कि पोस्ट का विषय भी बाल दिवस हो ... आप तो जानते ही है हम लोग संजीदा कहाँ है बाल दिवस को ले कर जो अब उस पर पोस्ट भी लिखने बैठे ... है कि नहीं ... ;-)

सादर आपका 

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अब आज्ञा दीजिये - कल फिर मुलाकात होगी ...
बाल दिवस की बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं ! 

लेखागार