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गुरुवार, 6 जून 2019

बच्चों का बचपना गुम न होने दें : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
स्कूल जाते बच्चों की गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं हैं. इसके बाद भी बच्चे तनावमुक्त नहीं दिख रहे हैं. वे प्रफुल्लित नहीं दिख रहे हैं. छुट्टियों के उत्साह में, उल्लास में, मस्ती में, शरारत में, शैतानियों में वे नहीं दिख रहे हैं. मोहल्ले में, बाजार में, किसी पार्क में टहलते-खेलते बच्चे यदि दिख भी रहे हैं तो उनके चेहरों पर आज भी वैसा ही तनाव दिख रहा है जैसा कि स्कूल खुले होने के समय दिखाई देता है. तब के तनाव में और अब के तनाव में बस इतना अंतर समझ आ रहा है कि तब बच्चे स्कूल की ड्रेस में, पीठ पर भारी-भरकम बस्ता टाँगे हुए तनावग्रस्त दिखाई देते थे, अब इनके बिना तनाव में दिख रहे हैं.


भले ही स्कूल जाने की बाध्यता न हो मगर स्कूल जैसे वातावरण से बच्चों के मन को, दिमाग को मुक्ति नहीं मिल सकी है. उनके समय को, उनकी छुट्टियों को, उनके मन को, दिमाग को स्कूल के अप्रत्यक्ष माहौल ने अपने बंधन में बाँध रखा है. स्कूल से मिलने वाला मिला हुआ ढेर सारा गृहकार्य, प्रोजेक्ट आदि बच्चों को अभी भी बोझिल वातावरण प्रदान कर रहे हैं. यही वो बोझ है जिसके दबाव में बचपन गुम हो जाता है, छुट्टियों की मस्ती गुम हो जाती है. बच्चे अब मैदानों में खेलने की बजाय या अपनी कॉपी-किताबों में खोये होते हैं. स्कूल से मिले तमाम सारे अनावश्यक प्रोजेक्ट पूरा करने में व्यस्त रहते हैं. इन सबसे यदि थोड़ा-बहुत समय उन्हें मिलता है तो वह कंप्यूटर में बीतता है या फिर मोबाइल में. अभिभावक भी अपने बच्चों को सबसे आगे देखने की अंधी दौड़ में उनको जबरन पढ़ाई के दबाव में पीसे डाल रहे हैं.

अब बच्चों में कुछ नया सीखने-सिखाने जैसी स्थिति ही नहीं दिखती. अब वे आपस में अपने अनुभव शेयर करने के स्थान पर, कुछ नया बनाने की जगह पर वे ऊटपटांग हरकतों वाले वीडियो बनाते नजर आते हैं. गलियों में मस्ती-शरारत करने के स्थान पर सड़कों पर तेज रफ़्तार बाइक दौड़ाते नजर आते हैं. उनकी सक्रियता, उनकी रचनात्मकता को जैसे ग्रहण लग गया है. इसमें यदि समय दोषी है तो स्कूल, शिक्षक, अभिभावक भी दोषी हैं. अधिक से अधिक अंक लाने की अंधी दौड़ ने बच्चों को उनकी नैसर्गिक प्रतिभा से वंचित कर दिया है. ऐसे में वे जैसे किसी हाथ की कठपुतली बन गए हैं. उनके आचरण में, उनके व्यवहार में एक तरह की कृत्रिमता देखने को मिल रही है. शिक्षकों को, अभिभावकों को इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है. यह ध्यान देने की जरूरत है कि बचपन एक बार ही आता है और इस दौर में मस्ती, शरारत, अपनत्व के बीच अपनाई गई शिक्षा, सीखे गए काम सारे जीवन काम आते हैं.

आइये, अपने बच्चों में, अपने आसपास के बच्चों में उनकी छिपी प्रतिभा को जानने-उजागर करने का काम करें. इसके साथ ही आज की बुलेटिन का भी आनंद उठायें.

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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

वयस्क होता बचपन और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो, 
बच्चियों से साथ लगातार होते आ रहे दुराचार के बीच एक खबर पढ़ने को मिली कि कानपुर में चार नाबालिगों ने चार साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक दुराचार किया. इन चारों में से एक की उम्र बारह वर्ष जबकि अन्य तीन की उम्र छह वर्ष से दस वर्ष के बीच है. उन चारों को गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने बताया कि एक पोर्न फिल्म देखने के बाद उसी का कृत्य उस बच्ची पर आजमाया. बच्चे सुधार गृह में भेज दिए गए हैं, ऐसी खबर है.


वैसे देखा जाये तो ये कोई पहली घटना नहीं है जिसमें इतनी छोटी उम्र में ऐसी हरकतें करना रहा हो. सोशल मीडिया पर आये दिन ऐसे फोटो, वीडियो सामने आते हैं जिनमें छोटी उम्र के बच्चे अपने गुप्तांग एक-दूसरे को दिखाते पकड़े गए हैं. ऐसी भी खबरें मिली हैं जिनमें लड़के-लड़कियाँ आपस में मम्मी-पापा का खेल खेलते पाए गए. इस खेल में उनके द्वारा सेक्स क्रिया करते भी देखा गया है. यह सब अकस्मात नहीं होता है. इसके पीछे पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तंत्र काम करता है. हमारे समाज में सेक्स का सन्दर्भ आज भी दो वयस्कों द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से है. इक्कीसवीं सदी में भी यौन शिक्षा का अर्थ शारीरिक सम्बन्ध के बारे में समझाए जाने से लगाया जाता है. इस तरह की संकुचित मानसिकता के चलते ही सेक्स को लेकर बहुत गलत, भ्रामक धारणाएँ समाज में फैली हुई हैं. यदि गौर करें तो सेक्स सम्बन्धी हरकतें बच्चों द्वारा बहुत छोटी वय से करनी शुरू हो जाती हैं. विषमलिंगी बच्चे आपस में एक-दूसरे के गुप्तांगों को लेकर अचंभित होते हैं. लड़के-लड़कियों के गुप्तांगों में अंतर होने के कारण उनके लिए यह कौतूहल की स्थिति होती है. उस कम उम्र में उनके लिए यह अंतर सेक्स का पर्याय नहीं होता वरन आश्चर्य का विषय होता है.

इसके अलावा परिवारों में बच्चों को उनके क्लास में पढ़ने वाले लड़के/लड़कियों के नाम पर चिढ़ाया जाता है. उनके बॉयफ्रेंड का, गर्ल फ्रेंड का नाम पूछा जाता है. और तो और उनकी शादी तक की बात करके उन्हें चिढ़ाया जाता है. इसके अलावा कुछ माता-पिता अपने छोटे बच्चों के सामने रोमांटिक मूड में बने रहते हैं. अक्सर बेपरवाह होकर बेपर्दा भी हो जाते हैं. बच्चे मासूमियत में भले होते हैं मगर ऐसे कृत्य के बारे में जानना चाहते हैं. उनके लिए यह इसलिए भी गलत नहीं होता क्योंकि उनके मम्मी-पापा ऐसा कर रहे होते हैं. ऐसे में बच्चों द्वारा इस तरह का कृत्य सेक्स के स्थान पर अपनी जिज्ञासा का शमन करने जैसा होता है.

एक बात और, आज जिस पोर्न साइट्स का, इंटरनेट के दुरुपयोग का हम सब रोना रो रहे हैं, उसके बारे में भी सोचिये. आज हर हाथ में मोबाइल है, हर हाथ में इंटरनेट है इसी कारण हर हाथ में पोर्न है. बच्चों के माता-पिता जिस गोपन को पलंग के एक छोर पर संचालित करते हैं, बच्चे उसी गोपन का ज्ञान अपने मोबाइल के माध्यम से करने लगते हैं. बस वे इसके प्रयोग के इंतजार में रहते हैं. जैसे ही वे इसे पाते हैं किसी न किसी रूप में उसका निदान कर लेते हैं. हाथ में पकड़े मोबाइल से लेकर बेडरूम में सजे टीवी तक किसी न किसी रूप में आज के बच्चे सिर्फ और सिर्फ सेक्स देख रहे हैं, अश्लीलता देख रहे हैं. ऐसे में उन्हें समझाना कठिन है कि यह उनकी उम्र के लिए नहीं है.

आइये, बस आधुनिकता का यह तमाशा देखें क्योंकि हम सब भौतिकतावादी दौड़ में सबकुछ भुलाकर लगे हुए हैं. चलिए, अभी तो आज की बुलेटिन देखें और सोचें कि बचपन में वयस्कता का स्वाद चखते बच्चों को कैसे बस बचपन का आनंद लेने दें.

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रविवार, 17 अप्रैल 2016

गुज़रा ज़माना बचपन का - ब्लॉग-बुलेटिन के बहाने

“भाई! तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?”
”मेरे यहाँ आना तुम्हारी शान के ख़िलाफ़ है और तुम्हारे यहाँ जाना मेरे उसूल के ख़िलाफ़. हम दोनों कहीं और ही मिल सकते थे.”
”हम दोनों कहीं और नहीं, सिर्फ़ यहीं मिल सकते थे. हमारे रास्ते एक दूसरे से चाहे कितने भी अलग क्यों न हो जाएँ, हमारे बचपन एक दूसरे से कभी अलग नहीं हो सकते!” – (फ़िल्म दीवार)

ई बचपन चीजे अइसा है कि जिसके बारे में सायर कहता है कि ...
"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी."

ई एतवार का दिन हमरे लिये अपने बचपन से मिलने का दिन होता है. सिरीमती जी मॉर्निंग वॉक के बाद सुबह आठ बजे हमरा चाय बनाकर हमको उठाती हैं, “उठिये रंगोली शुरू होने वाली है!”
रंगोली माने दूरदर्शन पर फिल्मी गाना का प्रोग्राम. बचपन से रंगोली अऊर चित्रहार पूरा परिबार का पसन्दीदा प्रोग्राम हुआ करता था. चित्रहार तो नहीं, मगर रंगोली सायदे छूटता है हमलोग से.

एगो टाइम आया जब लोग दूरदर्सन देखने का मतलब अपना इस्टैंडर गिरा हुआ समझने लगा था. मगर आज भी दूरदर्सन का सिग्नेचर ट्यून जब बजता है त बूढा मन भी बचपन के ओही टाइम में चला जाता है, अऊर लगता है कि जमीन में बैठे हैं हम लोग अऊर कुर्सी, पलंग, खटिया अऊर सोफा पर घर का ऊ सब बुजुर्ग बैठे हुये हैं जो आज हमारे बीच नहीं हैं.

ऊ दूरदर्सन का जमाना भी गजब जमाना था. काला उजला टीवी अऊर छत पर लगा हुआ अंटीना. एगो आदमी घुमा रहा है छत पर चढकर अऊर दोसरका आदमी नीचे से चिल्लाकर उसको फीडबैक दे रहा है, “साफ हो गया... आ रहा है.. ओफ्फोह, केतना घुमा दिये, फिर से पहिलका जगह पर लाओ... अब छोड़ दो, एकदम साफ हो गया है.” आ ऊ बेचारा जइसे अंटीना छोड़कर हटा कि फोटो फिर गायब. तब तक उधर से कोनो का एक्स्पर्ट कमेण्ट आता, “काहे माथा खराब किये हो, ओहीं से खराब आ रहा होगा! तनी अस्थिर से बइठो, अपने ठीक हो जाएगा!”

सिनेमा देखने के लिये एतना जोगाड़ लगाने के बाद सिनेमा का असली मजा आता था.

धीरे-धीरे दूरदर्सन बदला. हम लोग, खानदान, नुक्कड़, फौजी, सर्कस, बुनियाद, रामायण अऊर महाभारत... पूरा परिवार को एक साथ बइठकर देखने पर मजबूर कर देता था. साथ में देखना अऊर बीच-बीच में रिऐक्सन भी देना अऊर सुनना. परिबार में त आस-पास का भी परिबार सामिल होता था.

दूरदर्सन के समाचार का अपना एगो अलगे पहचान था. आज के जइसा स्टार ऐंकर नहीं था, लेकिन आझो जे.वी.रामन, सरला ज़रीवाला, सलमा सुलतान, मीनू, नीति रविन्द्रन, रामू दामोदरन, रिनी साइमन खन्ना और शम्मी नारंग. ई आखिर वाला दुन्नो लोग का आवाज त दिल्ली मेट्रो में अभियो सुनाई देता है. केतना एतमिनान से ऊ लोग नियूज पढते थे. 

आज भी दूरदर्सन के समाचार पर बहुत सांति मिलता है. बाकी चैनेल पर लोग जहाँ परिचर्चा में एक दूसरा का मूड़ी काट लेने पर उतारू रहता है, ऐंकर चिल्ला-चिल्लाकर मजमा लगाता रहता है अऊर समाचार चैनेल भी राजनैतिक पार्टी का ऑफिस बन गया बुझाता है, दूरदर्सन में एतना सांति से बिमर्स होता है कि लगता है सच्चो कोनो समस्या के बारे में लोग सीरियसली बिचार  कर रहा है.

समाचार अऊर सीरियल को भुलाइयो जाएँ त भला ऊ भारत दर्सन कऊन भुला सकता है. हमारे भारत देस के अलग-अलग प्रदेस का सेलेब्रिटी लोग जब मिलकर गाता था - मिले सुर मेरा तुम्हारा - त अपना देस का बिसालता के साथ-साथ बिबिधता का भी अलगे आनन्द आता था. भासा का कोनो बैरियर लगबे नहीं करता था. अभी भी कोई सुने तो मन पुलकित हो उठता है.
  
आप ताजा लिंक देखिये अऊर हम तनी गुनगुना लेते हैं...

"आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम,
गुज़रा ज़माना बचपन का!"

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मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - १

मैं भूंखा हू

सत्ता आने के साथ समाज की समझ घटती जाती है

गजल

एक चतुष्पदी

सेंसेक्स और मानसून

एक दिन की Prayer उन बच्चियों के नाम करें जो ….

मैं हूँ कहां ....कहाँ नहीं हूँ

पता है के तू यूँ हर गाम मुझको आज़माएगा

धर्म का आदिम स्वरूप और साम्यवाद –

सितारों के बायोपिक का दौर

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गुरुवार, 3 मार्च 2016

बच्चों का नैसर्गिक विकास होने दें - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
देश में चल रही तमाम उथल-पुथल के बीच बच्चों की परीक्षाएँ भी आरम्भ हो चुकी हैं. मासूम बच्चों से लेकर जिम्मेवार युवा तक अपने-अपने स्तर की परीक्षाओं में तन्मयता से संलग्न हैं. उन सभी को शुभकामनायें देते हुए उनके सुखद, उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कुछ बातें बच्चों से सम्बंधित आपके सामने रखते हुए सहयोग की अपेक्षा आप सभी से रखते हैं.

=> बच्चों पर ज्यादा से ज्यादा अंक लाने का, अन्य दूसरे छात्रों से अधिक आने का दबाव बनने का काम न किया जाये.

=> बच्चों को किताबों, कंप्यूटर से बाहर निकाल कर कुछ समय के लिए खुले में, मैदानों में, पार्कों में खेलने को स्वतंत्र करें.

=> परीक्षा को उनके लिए हौवा न बनने दें बल्कि उनके साथ घुलते-मिलते हुए परीक्षा का भय उनके भीतर से निकालने का काम करें.

=> अपने-अपने व्यस्ततम समय में से कुछ समय निकाल कर अभिभावक अपने बच्चों के साथ बिताने का प्रयास करें.

=> अभिभावकगण अपने बच्चों के भीतर स्वस्थ प्रतियोगिता का भाव-बोध जगाने का काम करें न कि उनके अन्दर प्रतियोगिता का भय पैदा करें.

=> उनको समझाया जाये कि परीक्षा उनके व्यक्तित्व को, प्रतिभा को, अध्ययन को आँकने का पैमाना नहीं है वरन अगले चरण को पाने का एक माध्यम है.

सुझाव, उपाय बहुत से हो सकते हैं मगर मूल बिंदु ये है कि बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा का हनन नहीं होना चाहिए, बचपन को अवसाद की चपेट में नहीं आने देना चाहिए. हम सभी को मिलकर इस बारे में सकारात्मक विचार करना होगा और देश के भविष्य की सशक्त नींव तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए. 

आइये बच्चों को नैसर्गिक रूप से आगे बढ़ने दें, स्वच्छंद रूप से खेलने दें और हम सभी आनंद लें आज की बुलेटिन का.

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लेखागार