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शनिवार, 3 अगस्त 2019

जन्मदिवस - मैथिलीशरण गुप्त और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
Maithilisharan-Gupt.jpg
मैथिलीशरण गुप्त (अंग्रेज़ी: Maithili Sharan Gupt, जन्म- 3 अगस्त, 1886, झाँसी; मृत्यु- 12 दिसंबर, 1964, झाँसी) खड़ी बोली के प्रथम महत्वपूर्ण कवि थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से आपने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और अपनी कविता के द्वारा खड़ी बोली को एक काव्य-भाषा के रूप में निर्मित करने में अथक प्रयास किया। इस तरह ब्रजभाषा जैसी समृद्ध काव्य भाषा को छोड़कर समय और संदर्भों के अनुकूल होने के कारण नये कवियों ने इसे ही अपनी काव्य-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हिन्दी कविता के इतिहास में गुप्त जी का यह सबसे बड़ा योगदान है।



आज मैथिलीशरण गुप्त जी के 133वें जन्म दिवस पर हम सब उनका स्मरण करते हुए उन्हें शत शत नमन करते हैं। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

मंगलवार, 28 मई 2019

नमन आज़ादी के दीवाने वीर सावरकर को : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भगूर गाँव में हुआ था. वे बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दूवादी थे. उन्हें हिन्दू शब्द से बेहद लगाव था. वे कहते थे कि उन्हें स्वातन्त्रय वीर की जगह हिन्दू संगठक कहा जाए. उन्होंने जीवन भर हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान के लिए कार्य किया. उनको अखिल भारत हिन्दू महासभा का छह बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया.
उन्हें आजीवन काला पानी की दोहरी सज़ा मिली थी. वे सन 1911 से सन 1921 तक अंडमान की सेल्यूलर जेल में रहे. सन 1921 में स्वदेश लौटने के बाद उन्हें फिर कला पानी की सजा सुनाई गई. सन 1937 में उन्हें मुक्त कर दिया गया था. उन्होंने सन 1947 में भारत विभाजन का विरोध किया. बाद में सन 1948 में महात्मा गांधी की हत्या में उनका हाथ होने का संदेह किया गया. अपने देशप्रेम के ज़ज्बे के चलते वे किसी आरोप से घबराये नहीं और कालांतर में अदालत ने उन्हें तमाम आरोपों से बरी किया. 

उनकी मृत्यु 26 फ़रवरी 1966 में मुम्बई में हुई. उनके निधन पर तत्कालीन भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया. उनके ही सम्मान में पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे का नाम वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा गया.


आइये इसके साथ-साथ वीर सावरकर के बारे में कुछ तथ्य जान लें, शायद आपको भी जानकारी हो.

> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लंदन में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया था.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1905 के बंग-भंग के बाद सन् 1906 में 'स्वदेशी' का नारा देकर विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्हें अपने विचारों और अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति शपथ ने लेने के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोई.
> वे पहले भारतीय थे जिन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का स्वाधीनता संग्राम बताया और लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास लिखा.
> वे दुनिया के एकमात्र लेखक हैं जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया था.
> वे दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे, जिनका मामला हेग के अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चला था.
> वे पहले भारतीय राजनीतिक कैदी थे, जिन्होंने एक अछूत को मंदिर का पुजारी बनाया था.
> उन्होंने ही पहला भारतीय झंडा बनाया था, जिसे जर्मनी में 1907 की अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने फहराया था.
> वे एकमात्र व्यक्ति रहे जिन्हें दो बार कालापानी की सजा हुई.
> वे पहले कवि थे, जिन्होंने काग़ज़-कलम के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं. कहा जाता है उन्होंने अपनी रची दस हज़ार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षों स्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वे देशवासियों तक नहीं पहुँची.
> वे प्रथम क्रान्तिकारी थे, जिन पर स्वतंत्र भारत की सरकार ने झूठा मुकदमा चलाया और बाद में निर्दोष साबित होने पर माफी मांगी.


वीर सावरकर को उनकी जन्म जयंती पर सादर नमन करते हुए आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

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सोमवार, 20 मई 2019

119वां जन्मदिवस - सुमित्रानंदन पंत जी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
Sumitranandan-Pant.jpg
सुमित्रानंदन पंत (अंग्रेज़ी: Sumitranandan Pant, जन्म: 20 मई 1900; मृत्यु: 28 दिसंबर, 1977) हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक हैं। सुमित्रानंदन पंत नये युग के प्रवर्तक के रूप में आधुनिक हिन्दी साहित्य में उदित हुए। सुमित्रानंदन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी सुमित्रानंदन पंत के बारे में साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं कि 'पंत अंग्रेज़ी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।' जन्म के महज छह घंटे के भीतर उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। पंत ने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्‍स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएँ लिख डालीं। हिंदी साहित्य के विलियम वर्ड्सवर्थ कहे जाने वाले इस कवि ने महानायक अमिताभ बच्चन को ‘अमिताभ’ नाम दिया था। पद्मभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था। हरिवंश राय ‘बच्चन’ और श्री अरविंदो के साथ उनकी ज़िंदगी के अच्छे दिन गुजरे। आधी सदी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकाल में आधुनिक हिंदी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है।


आज सुमित्रानंदन पंत जी के 119वें जन्मदिवस पर हम सभी उनको शत शत नमन करते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

देश की दूसरी महिला प्रशासनिक अधिकारी को नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज भारतीय प्रशासनिक सेवा में भारत की दूसरी महिला अधिकारी सरला ग्रेवाल का जन्मदिन है. उनका जन्म 4 अक्टूबर 1927 को हुआ था. उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि पंजाब विश्वविद्यालय से सर्वोच्च स्थान के साथ प्राप्त की. इसके बाद वे प्रशासनिक सेवा की तैयारी में जुट गईं और सन 1952 में उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया. वे उस समय इस सेवा में आने वाली भारत की दूसरी महिला अधिकारी थीं. उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्य किया.


सन 1956 में वे शिमला की डिप्टी कमिश्नर बनाई गईं. देश में इस पद का दायित्व निभाने वाली वे पहली महिला अधिकारी बनीं. सन 1962 में शिक्षा संचालक बनने वाली पहली आई०ए०एस० अधिकारी बनी. सन 1963 में उन्हें पंजाब सरकार के स्वास्थ्य विभाग का सचिव नियुक्त किया गया. इस कार्यकाल में पंजाब प्रदेश को राष्ट्रीय परिवार कल्याण कार्यक्रम के अन्तर्गत श्रेष्ठ उपलब्धियों के लिये चार सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए. 25 सितम्बर 1985 को उन्हें प्रधानमंत्री का सचिव नियुक्त किया गया. इसके बाद वे 31 मार्च 1989 से 5 फ़रवरी 1990 तक मध्य प्रदेश की राज्यपाल भी रहीं.

उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया. वे रॉयल कॉलेज ऑफ आब्सट्रेकट्रिशियन और गायनोकालाजिस्ट्स लंदन में सन 1979 में अतिथि वक्ता के रूप में उपथित हुईं. उन्होंने 1977, 1979 और जनवरी 1981 में न्यूयार्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या आयोग के क्रमश: 19वें, 20वें और 21वें सत्र में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपने दायित्व का कुशल निर्वाह किया. जिनेवा में इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ़ एजूकेशन द्वारा आयोजित सम्मेलन में वे भारतीय प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुई. वे 1982-1983 सत्र में यूनीसेफ़ एक्जीक्यूटिव बोर्ड की कार्यक्रम समिति की अध्यक्ष चुनी गयीं. विलक्षण प्रतिभा की धनी और अनगिनत उच्च पदों पर कार्य करने वाली सरला ग्रेवाल का निधन 29 जनवरी, 2002 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ.

आज उनके जन्मदिवस पर उनको बुलेटिन परिवार की तरफ से सादर नमन करते हुए आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

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मंगलवार, 25 सितंबर 2018

एकात्म मानववाद के प्रणेता को सादर नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
दीनदयाल उपाध्याय, जिनका आज जन्मदिवस है, एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता तथा ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवनपर्यंन्त व्यक्तिगत ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को महत्त्व दिया. वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत हैं. उनकी पुस्तक एकात्म मानववाद (इंटीगरल ह्यूमेनिज्म) है, जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद की समालोचना की गई है. 


उनका जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा के गाँव नगला चंद्रभान में हुआ था. उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा माता का नाम रामप्यारी था. रेलवे की नौकरी में व्यस्तता के कारण उनके पिता ने उनको और उनकी माता जी को ननिहाल भेज दिया. तीन वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया. विपत्ति ने यहाँ ही पीछा न छोड़ा. सात वर्ष की उम्र में उनकी माँ का भी निधन हो गया. कुछ समय बाद बीमारी के कारण उनके भाई का भी देहान्त हो गया. अपने मामा के सहयोग से उनकी शिक्षा होती रही. सन 1937 में इण्टरमीडिएट की परीक्षा में उन्होंने सर्वाधिक अंक प्राप्त कर कीर्तिमान स्थापित किया. बिड़ला कॉलेज में इससे पूर्व किसी भी छात्र के इतने अंक नहीं आए थे. दीनदयाल जी को स्वर्ण पदक प्रदान करते हुए बिड़ला जी ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की. इसके बाद दीनदयाल जी बी०ए० करने के लिए कानपुर आ गए. यहाँ उनमें राष्ट्रसेवा का बीज अंकुरित हुआ. दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे. सन 1939 में प्रथम श्रेणी में बी०ए० उत्तीर्ण करने के बाद वे एम०ए० करने के लिए आगरा चले गये. यहाँ नानाजी देशमुख और भाऊ जुगाडे के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे. इसी बीच उनकी चचेरी बहन का बीमारी से निधन हो गया. इस घटना से वे बहुत उदास रहने लगे और एम०ए० की परीक्षा नहीं दे सके.

आगरा से वे लखनऊ आये और यहाँ से राष्ट्रधर्म प्रकाशन संस्थान की स्थापना की. यहीं से एक मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म सहित पांचजन्य (साप्ताहिक) तथा स्वदेश (दैनिक) का प्रकाशन शुरु किया. दीनदयाल जी ने 21 सितम्बर 1951 को उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित करके भारतीय जनसंघ की नींव डाली. सन 1968 में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया. दीनदयाल उपाध्याय जी ने राजनीति के साथ-साथ विचारात्मक योगदान भी दिया. उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे. जिनमें एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति, जीवन का ध्येय राष्ट्र जीवन की समस्यायें, राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्रधारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आज़ादी चाहिए, अमेरिकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात, द ट्रू प्लान्स, डिवैलुएशन ए, ग्रेटकाल आदि प्रमुख हैं. उनके लेखन का एकमात्र लक्ष्य भारत की विश्व पटल पर पुनर्प्रतिष्ठा और विश्व विजय स्थापित करना था. विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों से संपन्न दीनदयाल उपाध्याय जी की मृत्यु मात्र 52 वर्ष की उम्र में 11 फ़रवरी 1968 को मुग़लसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. उनका पार्थिव शरीर मुग़लसराय स्टेशन के वार्ड में मिला था.

भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य को, जिसने सभ्यतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित किया, उनके जन्मदिवस पर बुलेटिन परिवार की ओर से सादर नमन.

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शुक्रवार, 15 जून 2018

जन्म दिवस - अभिनेत्री सुरैया और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
सुरैया (जन्म: 15 जून, 1929 - मृत्यु: 31 जनवरी, 2004) पूरा नाम सुरैया जमाल शेख़, हिन्दी फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और गायिका थीं। 40वें और 50वें दशक में इन्होंने हिन्दी सिनेमा में अपना योगदान दिया। अदाओं में नज़ाकत, गायकी में नफ़ासत की मलिका सुरैया जमाल शेख़ ने अपने हुस्न और हुनर से हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक नई इबारत लिखी। वो पास रहें या दूर रहें, नुक़्ताचीं है ग़मे दिल, और दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है जैसे गीत सुनकर आज भी जहन में सुरैया की तस्वीर उभर आती है।

15 जून, 1929 को गुजरांवाला, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी सुरैया अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। नाज़ों से पली सुरैया ने हालांकि संगीत की शिक्षा नहीं ली थी लेकिन आगे चलकर उनकी पहचान एक बेहतरीन अदाकारा के साथ एक अच्छी गायिका के रूप में भी बनी। सुरैया ने अपने अभिनय और गायकी से हर कदम पर खुद को साबित किया है।

सुरैया के फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बड़े रोचक तरीक़े से हुई। गुजरे ज़माने के मशहूर खलनायक जहूर सुरैया के चाचा थे और उनकी वजह से 1937 में उन्हें फ़िल्म 'उसने क्या सोचा' में पहली बार बाल कलाकार के रूप में भूमिका मिली।1941 में स्कूल की छुट्टियों के दौरान वह मोहन स्टूडियो में फ़िल्म 'ताजमहल' की शूटिंग देखने गईं तो निर्देशक नानूभाई वकील की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने सुरैया को एक ही नज़र में मुमताज़ महल के बचपन के रोल के लिए चुन लिया। इसी तरह संगीतकार नौशाद ने भी जब पहली बार ऑल इंडिया रेडियो पर सुरैया की आवाज़ सुनी और उन्हें फ़िल्म 'शारदा' में गवाया। 1947 में भारत की आज़ादी के बादनूरजहाँ और खुर्शीद बानो ने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली, लेकिन सुरैया यहीं रहीं।

देवानंद और सुरैया
एक वक़्त था, जब रोमांटिक हीरो देव आनंद सुरैया के दीवाने हुआ करते थे। लेकिन अंतत: यह जोड़ी वास्तविक जीवन में जोड़ी नहीं पाई। वजह थी सुरैया की दादी, जिन्हें देव साहब पसंद नहीं थे। मगर सुरैया ने भी अपने जीवन में देव साहब की जगह किसी और को नहीं आने दिया। ताउम्र उन्होंने शादी नहीं की और मुंबई के मरीनलाइन में स्थित अपने फ्लैट में अकेले ही ज़िंदगी जीती रहीं। देव आनंद के साथ उनकी फ़िल्में 'जीत' (1949) और 'दो सितारे' (1951) ख़ास रहीं। ये फ़िल्में इसलिए भी यादगार रहीं क्योंकि फ़िल्म 'जीत' के सेट पर ही देव आनंद ने सुरैया से अपने प्रेम का इजहार किया था, और 'दो सितारे' इस जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म थी। खुद देव आनंद ने अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में सुरैया के साथ अपने रिश्ते की बात कबूली है। वह लिखते हैं कि सुरैया की आंखें बहुत ख़ूबसूरत थीं। वह बड़ी गायिका भी थीं। हां, मैंने उनसे प्यार किया था। इसे मैं अपने जीवन का पहला मासूम प्यार कहना चाहूंगा।

अभिनय के अलावा सुरैया ने कई यादगार गीत गाए, जो अब भी काफ़ी लोकप्रिय है। इन गीतों में, सोचा था क्या मैं दिल में दर्द बसा लाई, तेरे नैनों ने चोरी किया, ओ दूर जाने वाले, वो पास रहे या दूर रहे, तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी, मुरली वाले मुरली बजा आदि शामिल हैं।

31 जनवरी, 2004 को सुरैया दुनिया को अलविदा कह गईं। संगीत का महत्व तो हमारे जीवन में हर पल रहेगा लेकिन सार्थक और मधुर गीतों की अगर बात आएगी तो सुरैया का नाम जरूर आएगा।

[ जानकारी स्त्रोत - भारतकोश ~ सुरैया ]

आज महान कलाकार सुरैया जी के 89वें जन्मदिवस के अवसर पर हिंदी ब्लॉगजगत और ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 
















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

108वां जन्मदिवस : डॉ. होमी जहाँगीर भाभा - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को मेरा नमस्कार।
डॉ. होमी जहाँगीर भाभा (अंग्रेज़ी: Homi Jehangir Bhabha, जन्म: 30 अक्तूबर, 1909, मुंबई, - मृत्यु: 24 जनवरी, 1966) भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक थे जिन्होंने भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। जब होमी जहाँगीर भाभा 29 वर्ष के थे और उपलब्धियों से भरे 13 वर्ष इंग्लैंड में बिता चुके थे। उस समय 'कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय' भौतिक शास्त्र के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता था। वहाँ पर श्री भाभा केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि कार्य भी करने लगे थे। जब अनुसंधान के क्षेत्र में श्री भाभा के उपलब्धियों भरे वर्ष थे तभी स्वदेश लौटने का अवसर उन्हें मिला। श्री भाभा ने अपने वतन भारत में रहकर ही कार्य करने का निर्णय लिया। उनके मन में अपने देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांति लाने का जुनून था। यह डॉ. भाभा के प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज विश्व के सभी विकसित देशों भारत के नाभिकीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा एवं क्षमता का लोहा माना जाता है।




आज डॉ. होमी जहाँगीर भाभा जी के 108वें जन्मदिवस पर हम सब उनके अभूतपूर्व योगदान को याद करते हुए उन्हें शत शत नमन करते हैं। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~










उम्मीद की हथेली !!!


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

1850वीं ब्लॉग बुलेटिन - आर. के. लक्ष्मण

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
आर. के. लक्ष्मण
रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण (अंग्रेज़ी: R. K. Laxman, जन्म- 24 अक्टूबर, 1921; मृत्यु: 26 जनवरी, 2015) को भारत के एक प्रमुख व्यंग-चित्रकार के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। अपने कार्टूनों के ज़रिए आर. के. लक्ष्मण ने एक आम आदमी को एक व्यापक स्थान दिया और उसके जीवन की मायूसी, अँधेरे, उजाले, ख़ुशी और ग़म को शब्दों और रेखाओं की मदद से समाज के सामने रखा। असाधारण व्यक्तित्व के धनी आर. के. लक्ष्मण ने वक़्त की नब्ज को पहचान कर देश, समाज और स्थितियों की अक्कासी की। लक्ष्मण के कार्टूनों की दुनिया व्यापक है और इसमें समाज का चेहरा तो दिखता ही है, साथ ही भारतीय राजनीति में होने वाले बदलाव भी दिखाई देते हैं।

जन्म तथा शिक्षा

आर. के. लक्ष्मण का जन्म 24 अक्टूबर, 1921 को मैसूर, कर्नाटक में हुआ था। उनके पिता स्कूल में प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्त थे। पिता की छ: संतान थीं, जिनमें लक्ष्मण सबसे कम उम्र के थे। उनके एक बड़े भाई प्रसिद्ध साहित्यकार आर. के. नारायण का इन्हें पूरा सहयोग प्राप्त था। आर. के. लक्ष्मण ने हाईस्कूल पास करने के बाद ही यह तय कर लिया था कि वह कार्टूनिस्ट के रूप में अपना कैरियर बनाएँगे। बी.ए. के बाद उन्होंने 'मैसूर विश्वविद्यालय' में पढ़ते हुए फ्रीलांस कलाकार के रूप में 'स्वराज अख़बार' के लिए कार्टून बनाने शुरू किए, जिससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। साथ ही एनिमेटेड फ़िल्मों में भी लक्ष्मण ने मिथकीय पात्र 'नारद' का चित्रांकन किया।

निर्भीक पत्रकार

लक्ष्मण के बड़े भाई आर. के. नारायण एक कथाकार तथा उपन्यासकार थे, जिनकी रचनाएँ 'गाइड' तथा 'मालगुडी डेज़' ने प्रसिद्धि की ऊँचाइयों को छुआ था। आर. के. लक्ष्मण ने उनके लिए भी चित्र बनाए, जो 'हिंदू' समाचार पत्र में छपे। उसके बाद लक्ष्मण राजनीतिक स्थितियों पर कार्टून बनाते हुए निर्भीक तथा बेबाक पत्रकार माने जाने लगे। 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' में 'यू सेड इट' आज भी लक्ष्मण के कार्टून सम्मानपूर्वक प्रकाशित करता है।

विशेषता

एक कार्टूनिस्ट के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ ही लक्ष्मण ने महत्त्वपूर्ण लेखन भी किया। उनकी आत्मकथा 'टनल टु टाइम' उनकी लेखन क्षमता का प्रमाण सामने लाती है। आर. के. लक्ष्मण के कार्टूनों में एक आम आदमी को प्रस्तुत करती एक छवि जितनी सादगी भरी है, उतनी ही पैनी भी होती है। लक्ष्मण ने जिस आम आदमी को केंद्र में रख कर सृजन किया, उस आदमी की पीड़ा को उन्होंने न सिर्फ़ महसूस किया, बल्कि उसे रेखाओं की मदद से व्यापक सरोकारों से जोड़ा। अपने समय और समाज से मुठभेड़ करते हुए लक्ष्मण ने हमेशा ही बहुत ही सलीक़े से अपनी बात हमारे सामने रखी। लक्ष्मण के कार्टूनों की एक बड़ी ख़ूबी यह भी है कि उन्होंने हर उस व्यक्ति को अपने सृजन का विषय बनाया, जो उन्हें मुनासिब लगा। व्यक्ति के पद और प्रभाव की वजह से उन्होंने कभी भी किसी तरह का समझौता नहीं किया। दरअसल यह उस आम आदमी का ही जीवट है, जो वक़्त पड़ने पर बड़े से बड़े आदमी की आँखों में आँखें डालकर तन कर बात करता है। लक्ष्मण का यह आदमी जीवन के सुख-दुख को एक-दूसरे से बाँटता हुआ जीवन में नए रंग भी भरता है और जीने का अंदाज़ भी सिखाता है।

प्रमुख पुस्तकें


  1. टनल टु टाइम (आत्मकथा)
  2. द बेस्ट ऑफ़ लक्षमण सीरीज
  3. दि एलोक्वोयेन्ट ब्रश 
  4. द मेसेंजर 
  5. होटल रिवीयेरा 
  6. सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया

'कॉमन मैन' कार्टून के निर्माता

अपने कार्टूनों के जरिए आर.के. लक्ष्मण ने एक आम आदमी को एक ख़ास जगह दी। हाशिये पर पड़े आम आदमी के जीवन की मायूसी, अंधेरे, उजाले, खुशी और गम को शब्द चित्रों के सहारे दुनिया के सामने रखा। लक्ष्मण के कार्टूनों की दुनिया काफ़ी व्यापक है और इसमें समाज का चेहरा तो दिखता ही है, साथ ही भारतीय राजनीति में होने वाले बदलाव भी दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचार, अपराध, अशिक्षा, राजनीतिक पार्टियों के छलावों से जो तस्वीर निकल कर आती है वो है आर. के लक्ष्मण का आम आदमी की। आम आदमी सिर्फ जिंदगी की मुश्किलों से लड़ता है, उसे चुपचाप झेलता है, सुनता है, देखता है, पर बोलता नहीं, यही वजह है कि आर. के. लक्ष्मण का आम आदमी ताउम्र खामोश रहा। आर. के. लक्ष्मण का आम आदमी शुरू-शुरू में बंगाली, तमिल, पंजाबी या फिर किसी और प्रांत का हुआ करता था लेकिन काफ़ी कम समय में आम आदमी की पहचान बन गया ये कार्टून टेढा चश्मा, मुड़ी-चुड़ी धोती, चारखाना कोट, सिर पर बचे चंद बाल। लक्ष्मण का आम आदमी पूरी दुनिया में ख़ास बन गया था। 1985 में लक्ष्मण ऐसे पहले भारतीय कार्टूनिस्ट बन गए जिनके कार्टून की लंदन में एकल प्रदर्शनी लगाई गई। लंदन की उसी यात्रा के दौरान वो दुनिया के जाने-माने कार्टूनिस्ट डेविड लो और इलिंगवॉर्थ से मिले- ये वो शख्स थे जिनके कार्टून को देखकर लक्ष्मण को कार्टूनिस्ट बनने की प्रेरणा मिली थी। लक्ष्मण की काबीलीयत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लंदन का अखबार 'दि इवनिंग स्टैंडर्ड' ने उन्हें एक समय डेविड लो की कुर्सी संभालने का ऑफर दिया था। लक्ष्मण के कार्टून फिल्मों में भी इस्तेमाल हुए। फ़िल्म 'मिस्टर एंड मिसेज' और तमिल फ़िल्म 'कामराज' के लिए लक्ष्मण ने कार्टून बनाए। लक्ष्मण के बड़े भाई आर. के. नारायण की कृति "मालगुडी डेज" को जब टेलीविज़न पर दिखाया गया तो उसके लिए भी लक्ष्मण ने स्केच तैयार किये। लक्ष्मण का आम आदमी उस वक़्त फिर ख़ास हो उठा जब डेक्कन एयरलाइंस की सस्ती विमान सेवा शुरू हुई। एयरलाइंस के संस्थापक कैप्टन गोपीनाथ अपने सस्ते विमान के लिए प्रतीक चिह्न की तलाश में थे, और इसके लिए उन्हें लक्ष्मण के आम आदमी से बेहतर कुछ और नही मिल सकता था।[1]

सम्मान एवं पुरस्कार

आर. के. लक्ष्मण को उनके महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए कई सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं-
  1. पद्म भूषण 
  2. पद्म विभूषण 
  3. रेमन मेग्सेसे पुरस्कार (1984) 
  4. बी. डी. गोयनका पुरस्कार 
  5. दुर्गा रतन स्वर्ण पदक

भारत के मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण का 26 जनवरी, 2015 को 94 वर्ष की उम्र में पुणे में निधन हो गया। वे हफ़्ते भर से भी ज्यादा समय से दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में भर्ती थे। अस्पताल के अधिकारियों ने उनके निधन की पुष्टि की। लक्ष्मण को संक्रमण के बाद इंटेसिव केअर यूनिट में भर्ती कराया गया था। दिल के मरीज़ लक्ष्मण के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। लक्ष्मण अपने कार्टून चरित्र "कॉमन मैन" यानी आम आदमी के लिए मशहूर थे। यह कार्टून आम आदमी की आकांक्षाओं और उसकी सोच को तो दर्शाता है ही, राजनीतिक हस्तियों पर कटाक्ष भी करता है। यह कार्टून वर्ष 1951 से ही भारत के जाने-माने अंग्रेज़ी अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के पहले पेज पर 'यू सेड इट' शीर्षक के साथ छपता आया है। भारत सरकार ने आरके लक्ष्मण को 2005 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। डाक विभाग ने "कॉमन मैन" पर 1988 में एक डाक टिकट भी जारी किया था। पुणे में 2001 में "कॉमन मैन" की आठ फ़ीट की एक प्रतिमा लगाई गई थी। आरके लक्ष्मण क़रीब 60 साल तक कॉमन मैन, कॉमन सेंस और कॉमन प्रॉब्लम्स की आवाज़ बने रहे।




आज आर. के. लक्ष्मण जी के 96वें जन्मदिवस पर हम सब उनको याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~












मेरे गूगल जी महाराज!


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

जन्मदिवस : भीष्म साहनी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
भीष्म साहनी ( Bhisham Sahni; जन्म- 8 अगस्त, 1915, रावलपिण्डी, अविभाजित भारत; मृत्यु- 11 जुलाई, 2003, दिल्ली ) प्रसिद्ध भारतीय लेखक थे। उन्हेंहिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है। वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। भीष्म साहनी मानवीय मूल्यों के सदैव हिमायती रहे। वामपंथी विचारधारा से जुड़े होने के साथ-साथ वे मानवीय मूल्यों को कभी आंखों से ओझल नहीं करते थे। आपाधापी और उठापटक के युग में भीष्म साहनी का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। उन्हें उनके लेखन के लिए तो स्मरण किया ही जाता है, लेकिन अपनी सहृदयता के लिए भी वे चिरस्मरणीय हैं। भीष्म साहनी ने कई प्रसिद्ध रचनाएँ की थीं, जिनमें से उनके उपन्यास 'तमस' पर वर्ष 1986 में एक फ़िल्म का निर्माण भी किया गया था। उन्हें कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए थे। 1998 में भारत सरकार के 'पद्म भूषण' अलंकरण से भी वे विभूषित किये गए थे।

( साभार - http://bharatdiscovery.org/india/भीष्म_साहनी )


आज स्वर्गीय भीष्म साहनी जी के 102वें जन्मदिवस पर पूरा हिन्दी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 29 मई 2017

कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'
कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' (अंग्रेज़ी: Kanhaiyalal Mishra Prabhakar, जन्म: 29 मई, 1906 - मृत्यु: 9 मई 1995) हिन्दी के जाने-माने निबंधकार हैं जिन्होंने राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संबंध रखने वाले अनेक निबंध लिखे हैं। 'ज्ञानोदय' पत्रिका का सम्पादन भी कन्हैयालाल कर चुके हैं। आपने अपने लेखन के अतिरिक्त अपने नये लेखकों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया है।

प्रभाकर हिन्दी के श्रेष्ठ रेखाचित्रों, संस्मरण एवं ललित निबन्ध लेखकों में हैं। यह दृष्टव्य है कि उनकी इन रचनाओं में कलागत आत्मपरकता होते हुए भी एक ऐसी तटस्थता बनी रहती है कि उनमें चित्रणीय या संस्मरणीय ही प्रमुख हुआ है- स्वयं लेखक ने उन लोगों के माध्यम से अपने व्यक्ति को स्फीत नहीं करना चाहा है। उनकी शैली की आत्मीयता एवं सहजता पाठक के लिए प्रीतिकर एवं हृदयग्राहिणी होती है। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की सृजनशीलता ने भी हिन्दी साहित्य को व्यापक आभा प्रदान की। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने उन्हें 'शैलियों का शैलीकार' कहा था। कन्हैयालाल जी ने हिन्दी साहित्य के साथ पत्रकारिता को भी व्यापक रूप से समृद्ध किया।




आज कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' जी के 111वें जन्मदिवस पर समस्त हिन्दी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें याद करते हुए शत शत नमन करती है। सादर।। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन और ओपी नैय्यर

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
ओंकार प्रसाद नैय्यर (अंग्रेज़ी: Omkar Prasad Nayyar, जन्म: 16 जनवरी, 1926 - मृत्यु: 28 जनवरी, 2007) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। अपने सुरों के जादू से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जैसे कई पार्श्वगायक और पार्श्वगायिकाओं को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले महान संगीतकार ओ. पी. नैय्यर के संगीतबद्ध गीत आज भी लोकप्रिय है।

जीवन परिचय

16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे ओंकार प्रसाद नैय्यर उर्फ ओ.पी. नैय्यर का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था। वह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। भारत विभाजन के पश्चात उनका पूरा परिवार लाहौर छोड़कर अमृतसर चला आया। ओंकार प्रसाद ने संगीत की सेवा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अपने संगीत के सफ़र की शुरूआत इन्होंने आल इंडिया रेडियो से की।

फ़िल्मी सफर

बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिये ओ. पी. नैय्यर वर्ष 1949 में मुंबई आ गये। मुंबई मे उनकी मुलाकात जाने माने निर्माता निर्देशक कृष्ण केवल से हुई जो उन दिनों फ़िल्म 'कनीज़' का निर्माण कर रहे थे। कृष्ण केवल उनके संगीत बनाने के अंदाज से काफ़ी प्रभावित हुये और उन्होंने फ़िल्म के बैक ग्राउंड संगीत देने की पेशकश की। इस फ़िल्म के असफल होने से ओ. पी. नैय्यर बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे भले ही सफल न हो सके लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री मे उनका कैरियर अवश्य ही शुरू हो गया।

( साभार : http://bharatdiscovery.org/india/ओ._पी._नैय्यर )


आज ओपी नैय्यर जी के 91वें जन्मदिवस पर हिन्दी ब्लॉगजगत और पूरा भारत उनके मधुर संगीत को सुनते हुये  उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...


ऑनलाइन मतदान की ओर कदम बढ़ाने का सही वक्त!

सही वक़्त पर सही फ़ैसले का नाम धोनी

अमित जी, सिर्फ मसालों से ही भोजन स्वादिष्ट नहीं बन जाता

इमेज बिल्डिंग! (प्रसंग - नितीश कुमार)

बाकी बहुत कुछ रहता है !!!

ओरछा क्यों जाना चाहिये ?

वाईकॉम का महादेव मंदि‍र और दीपमाला

संसद के कितने सत्र होते हैं?

बुरा वक़्त अच्छे लोग

सोमवार की आत्मकथा


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

मौलाना अबुल कलाम आजाद और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
मौलाना अबुल कलाम आजाद ( Abul Kalam Azad जन्म-11 नवम्बर, 1888 - मृत्यु- 22 फ़रवरी, 1958 ) एक मुस्लिम विद्वान थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वह वरिष्ठ राजनीतिक नेता थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया और सांप्रदायिकता पर आधारित देश के विभाजन का विरोध किया। स्वतंत्र भारत में वह भारत सरकार के पहले शिक्षा मंत्री थे। उन्हें 'मौलाना आज़ाद' के नाम से जाना जाता है। 'आज़ाद' उनका उपनाम है।

अबुल के पिता 'मौलाना खैरूद्दीन' एक विख्यात विद्वान थे, जो बंगाल में रहते थे। उनकी माँ 'आलिया' एक अरब थी और मदीन के शेख़ मोहम्मद ज़ाहिर वत्री की भतीजी थी। अरब देश के पवित्र मक्का में रहने वाले एक भारतीय पिता और अरबी माता के घर में उनका जन्म हुआ। पिता मौलाना खैरूद्दीन ने उनका नाम मोहिउद्दीन अहमद या फ़िरोज़ बख़्त (खुश-क़िस्मत) रक्खा। आगे चलकर वे 'मौलाना अबुलकलाम आज़ाद' या 'मौलाना साहब' के नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन से ही उनमें कुछ ख़ास बातें नज़र आने लगी थीं, जो जीवन भर उनके साथ रहीं। मौलाना आज़ाद को एक 'राष्ट्रीय नेता' के रूप में जाना जाता हैं। वास्तव में राष्टीय नेता तो वह थे, लेकिन वह नेता बनना चाहते ही नहीं थे।

( साभार - http://bharatdiscovery.org/india/अबुलकलाम_आज़ाद )


आज मौलाना अबुल कलाम आजाद जी की 128वें जन्मदिवस पर हम सब उन्हें स्मरण करते हुए नमन करते हैं।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...

जीवनशैली बदलने से रुकेगा प्रदूषण

बैंक की लाइन में खड़े हुए राहुल गांधी

अपने कर्म एवं विचारों से वह पूरी तरह बौद्धिक श्रमिक थे

जीएसटी लागू करने में दुनिया की मुश्किलों से भारत के लिए सबक

सहीं मायने में पढ़ा-लिख़ा कौन ???

सोशल मीडिया -- एक नया मंच

सिमी क्या है?

500-1000 के नोट की उलझन

मेजबानी जुकाम की

आज के सन्दर्भ में दोहे -


आज की ब्लॉग बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

जन्मदिवस : भीष्म साहनी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
भीष्म साहनी ( Bhisham Sahni; जन्म- 8 अगस्त, 1915, रावलपिण्डी, अविभाजित भारत; मृत्यु- 11 जुलाई, 2003, दिल्ली ) प्रसिद्ध भारतीय लेखक थे। उन्हेंहिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है। वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। भीष्म साहनी मानवीय मूल्यों के सदैव हिमायती रहे। वामपंथी विचारधारा से जुड़े होने के साथ-साथ वे मानवीय मूल्यों को कभी आंखों से ओझल नहीं करते थे। आपाधापी और उठापटक के युग में भीष्म साहनी का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। उन्हें उनके लेखन के लिए तो स्मरण किया ही जाता है, लेकिन अपनी सहृदयता के लिए भी वे चिरस्मरणीय हैं। भीष्म साहनी ने कई प्रसिद्ध रचनाएँ की थीं, जिनमें से उनके उपन्यास 'तमस' पर वर्ष 1986 में एक फ़िल्म का निर्माण भी किया गया था। उन्हें कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए थे। 1998 में भारत सरकार के 'पद्म भूषण' अलंकरण से भी वे विभूषित किये गए थे।

( साभार - http://bharatdiscovery.org/india/भीष्म_साहनी )

आज स्वर्गीय भीष्म साहनी जी के 101वें जन्मदिवस पर पूरा हिन्दी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर।।

अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...

मनोहरा देवी प्रेरक थीं निराला की

गाय, कांवड़ और मोदी सरकार

हमें अपनी संस्कृति को बचाना है ....!!

गौहिंसा पर मोदी का कहा टू लेट, एंड टू लिटिल...

गाय पर चर्चा

नचिकेता ताल

रामधारी सिंह दिनकर

रस्मी बादल

हरेक वृक्ष नहीं फलवाला वृक्ष ही झुकता है

सुदामा के कृष्ण


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 1 अगस्त 2016

जन्मदिन : मीना कुमारी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों मेरा सादर नमस्कार।
मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933 - 31 मार्च, 1972) भारतकी एक मशहूर अभिनेत्री थीं। इन्हें खासकर दुखांत फ़िल्म में उनकी यादगार भूमिकाओं के लिये याद किया जाता है।1952 में प्रदर्शित हुई फिल्म बैजू बावरा से वे काफी वे काफी मशहूर हुईं।

मीना कुमारी का असली नाम माहजबीं बानो था और ये बंबई में पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक मँजे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था। माहजबीं ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था। उनका नाम मीना कुमारीविजय भट्ट की खासी लोकप्रिय फिल्म बैजू बावरा पड़ा। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे। मीना कुमारी के आने के साथभारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं।

1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं।परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाले की होकर सीमित हो गयी। लेकिन ऐसा होने के बावज़ूद उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा।

मीना कुमारी की शादी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ हुई जिन्होंने मीना कुमारी की कुछ मशहूर फिल्मों का निर्देशन किया था। लेकिन स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है। शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी।

आज स्वर्गीय मीना कुमारी जी के 83वें जन्मदिवस पर हम सब उनकी शख्सियत और अभिनय को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं सादर।।


अब चलते हैं आज कि बुलेटिन की ओर  ....














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

सोमवार, 25 जुलाई 2016

आचार्य परशुराम चतुर्वेदी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ( Parshuram Chaturvedi ) जन्म: 25 जुलाई, 1894 - मृत्यु: 3 जनवरी, 1979  परिश्रमशील विद्वान शोधकर्मी समीक्षक थे। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया में हुआ। इनकी शिक्षा इलाहाबादतथा वाराणसी विश्वविद्यालय में हुई। वे पेशे से वकील थे, किंतु आध्यात्मिक साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। संस्कृततथा हिन्दी की अनेक उपभाषाओं के वे पंडित थे।

परशुराम चतुर्वेदी का व्यक्तित्व सहज था। वे सरल स्वभाव के थे। स्नेह और सौहार्द के प्रतिमूर्ति थे। इकहरा शरीर, गौरवर्ण, मध्यम कद काठी और सघन सफेद मूंछें उनके बड़प्पन को प्रकाशित करने के लिये पर्याप्त थीं। उनके मुख मंडल पर परंपरागत साहित्य की कोई विकृति की रेखा नहीं देखी गयी बल्कि एक निश्चित दीप्ति सदा थिरकती रही जिससे बंधुता एवं मैत्री भाव विकीर्ण होता रहता था। चतुर्वदी जी महान अन्नवेषक थे। मनुष्य की चिंतन परंपरा की खोज में उन्होंने संत साहित्य का गहन अध्ययन किया। वे मुक्त चिंतन के समर्थक थे इसलिये किसी सम्प्रदाय या झंडे के नीचे बंधकर रहना पसंद नहीं किया। साहित्य में विकासवादी सिद्धांत के पक्षधर थे। उनकी विद्वता के आगे बड़े-बड़ों को हमेशा झुकते देखा गया। उनका जीवन मानवता के कल्याण के प्रति समर्पित था।

बहुत कम लोग जानते हैं कि कबीर को जाहिलों की कोह में से निकाल कर विद्वानों की पांत में बैठाने का काम आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने ही किया था। कबीर के काव्य रूपों,पदावली, साखी और रमैनी का जो ब्यौरा, विस्तार और विश्लेषण आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने परोसा है, और ढूंढ ढूंढ कर परोसा है, वह आसान नहीं था। फिर बाद में आचार्यहजारी प्रसाद द्विवेदी सरीखों ने कबीर को जो प्रतिष्ठा दिलाई, कबीर को कबीर बनाया, वह आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के किए का ही सुफल और विस्तार था, कुछ और नहीं। दादू, दुखहरन, धरनीदास, भीखराम, टेराम, पलटू जैसे तमाम विलुप्त हो चुके संत कवियों को उन्होंने जाने कहां-कहां से खोजा, निकाला और उन्हें प्रतिष्ठापित किया। संत साहित्य के पुरोधा जैसे विशेषण उन्हें यूं ही नहीं दिया जाता। मीरा पर भी आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने जो काम किये वे अविरल हैं। गांव-गांव, मंदिर-मंदिर जो घूमे, यहां तक कि मीरा के परिवारके महाराजा अनूप सिंह से भी मिले तो यह आसान नहीं था। कुछ लोग तो उन्हें गड़े मुर्दे उखाड़ने वाला बताने लगे थे पर जब उन की किताबें छप-छप कर डंका बजा गईं तो यह ‘गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले’ की जबान पर ताले लग गए। उत्तरी भारतकी संत साहित्य की परख, संत साहित्य के प्रेरणा स्रोत, हिंदी काव्य धारा में प्रेम प्रवाह, मध्य कालीन प्रेम साधना, सूफी काव्य संग्रह, मध्य कालीन श्रृंगारिक प्रवृत्तियां, बौद्ध साहित्य की सांस्कृतिक झलक, दादू दयाल ग्रंथावली, मीराबाई की पदावली, संक्षिप्त राम चरित मानस और कबीर साहित्य की परख जैसी उन की किताबों की फेहरिस्त बहुत लंबी नहीं तो छोटी भी नहीं है। ‘शांत रस एक विवेचन’ में शांत रस का जो छोटा-छोटा ब्यौरा वह परोसते हैं, वह दुर्लभ है। अजीब संयोग है कि बलिया में गंगा के किनारे के गांव में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जन्मे और दूसरे किनारे के गांव जवहीं में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जन्मे। दोनों ही प्रकांड पंडित हुए। पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रसिद्धि का शिखर छू गए। और आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने विद्वता का शिखर छुआ। पर प्रसिद्धि जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी उतनी नहीं मिली। तो यह हिंदी वालों का ही दुर्भाग्य है, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का नहीं।

[ जानकारी स्त्रोत - http://bharatdiscovery.org/india/परशुराम_चतुर्वेदी ]


आज स्वर्गीय आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी की 122वीं जयंती पर हिन्दी ब्लॉग जगत और ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।

अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

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