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शनिवार, 15 मार्च 2014

संदीप उन्नीकृष्णन अमर रहे - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

संदीप उन्नीकृष्णन  (15 मार्च 1977 -28 नवम्बर 2008) भारतीय सेना में एक मेजर थे, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स (एनएसजी) के कुलीन विशेष कार्य समूह में काम किया. वे नवम्बर 2008 में मुंबई के हमलों में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें 26 जनवरी 2009 को भारत के सर्वोच्च शांति समय बहादुरी पुरस्कार, अशोक चक्र से सम्मानित किया गया.

"उपर मत आना, मैं उन्हें संभाल लूंगा", ये संभवतया उनके द्वारा अपने साथियों को कहे गए अंतिम शब्द थे, ऐसा कहते कहते ही वे ऑपरेशन ब्लैक टोरनेडो के दौरान मुंबई के ताज होटल के अन्दर सशस्त्र आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गए.

बाद में, एनएसजी के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि जब ऑपरेशन के दौरान एक कमांडो घायल हो गया, मेजर उन्नीकृष्णन ने उसे बाहर निकालने की व्यवस्था की और खुद ही आतंकवादियों से निपटना शुरू कर दिया. आतंकवादी भाग कर होटल की किसी और मंजिल पर चले गए और उनका सामना करते करते मेजर उन्नीकृष्णन गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए।

परिवार

संदीप उन्नीकृष्णन बैंगलोर में स्थित एक नायर परिवार से थे, यह परिवार मूल रूप से चेरुवनूर, कोजिकोडे जिला, केरल से आकर बैंगलोर में बस गया था. वे सेवानिवृत्त आईएसआरओ अधिकारी के. उन्नीकृष्णन और धनलक्ष्मी उन्नीकृष्णन के इकलौते पुत्र थे.

बचपन

मेजर उन्नीकृष्णन ने अपने 14 साल फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल, बैंगलोर में बिताये, 1995 में आईएससी विज्ञान विषय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. वे अपने सहपाठियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे, वे सेना में जाना चाहते थे, यहां तक कि क्र्यू कट में भी स्कूल जरूर जाते थे. एक अच्छे एथलीट (खिलाडी) होने के कारण, वे स्कूल की गतिविधियों और खेल के आयोजनों में बहुत सक्रिय रूप से हिस्सा लेते थे. उनके अधिकांश एथलेटिक रिकॉर्ड, उनके स्कूल छोड़ने के कई साल बाद तक भी टूट नहीं पाए.  अपनी ऑरकुट प्रोफाइल में उन्होंने अपने आप को फिल्मों के लिए पागल बताया.

कम उम्र से ही साहस के प्रदर्शन के अलावा उनका एक नर्म पक्ष भी था, वे अपने स्कूल के संगीत समूह के सदस्य भी थे.

सेना कैरियर

संदीप 1995 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (National Defence Academy) (एनडीए) में शामिल हो गए. वे एक कैडेट थे, ओस्कर स्क्वाड्रन (नंबर 4 बटालियन) का हिस्सा थे और एनडीए के 94 वें कोर्स के स्नातक थे. उन्होंने कला (सामाजिक विज्ञान विषय) में स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी.

उनके एनडीए के मित्र उन्हें एक "निः स्वार्थ", "उदार" और "शांत व सुगठित" व्यक्ति के रूप में याद करते हैं.

उनके खुश मिजाज़ चेहरे पर एक दृढ और सख्त सैनिक का मुखौटा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था, इसी तरह से उनके पतली काया के पीछे एक सुदृढ़, कभी भी हार ना मानने वाली एक भावना छिपी थी, इन गुणों को एनडीए में आयोजित कई प्रशिक्षण शिविरों और देश के बाहर होने वाली प्रतिस्पर्धाओं में देखा गया, जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया था.

उन्हें 12 जुलाई 1999 को बिहार रेजिमेंट (इन्फेंट्री) की सातवीं बटालियन का लेफ्टिनेंट आयुक्त किया गया. हमलों और चुनौतियों का सामना करने के लिए दो बार उन्हें जम्मू और कश्मीर तथा राजस्थान में कई स्थानों पर भारतीय सेना में नियुक्त किया, इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स में शामिल होने के लिए चयनित किया गया. प्रशिक्षण के पूरा होने पर, उन्हें जनवरी 2007 में एनएसजी का विशेष कार्य समूह (एसएजी) सौंपा गया और उन्होंने एनएसजी के कई ऑपरेशन्स में भाग लिया.

वे एक लोकप्रिय अधिकारी थे, जिन्हें उनके वरिष्ठ और कनिष्ठ दोनों ही पसंद करते थे. सेना के सबसे कठिन कोर्स, 'घातक कोर्स' (कमांडो विंग (इन्फैंट्री स्कूल), बेलगाम में) के दौरान वे शीर्ष स्थान पर रहे, उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारीयों से "प्रशिक्षक ग्रेडिंग" और प्रशस्ति अर्जित की. संभवतया यही कारण था या बहादुरी के लिए उनका जुनून था कि उन्होंने एनएसजी कमांडो सेवा को चुना, जिसमें वे 2006 में प्रतिनियुक्ति पर शामिल हुए थे.

जुलाई 1999 में ऑपरेशन विजय के दौरान पाकिस्तानी सैन्य दलों के द्वारा भारी तोपों के हमलों और छोटी बमबारी के जवाब में उन्होंने आगे की पोस्ट्स में तैनात रहते हुए धैर्य और दृढ संकल्प का प्रदर्शन किया.
31 दिसंबर 1999 की शाम को, मेजर संदीप ने छह सैनिकों एक टीम का नेतृत्व किया और शत्रु से 200 मीटर की दूरी पर एक पोस्ट बना ली. इस दौरान वे शत्रु के प्रत्यक्ष प्रेक्षण और आग के चलते काम कर रहे थे.

ऑपरेशन ब्लैक टोरनेडो

26 नवम्बर 2008 की रात, दक्षिणी मुंबई की कई प्रतिष्ठित इमारतों पर आतंकवादियों ने हमला किया. इनमें से एक इमारत जहां आतंकवादियों ने लोगों को बंधक बना लिया, वह 100 साल पुराना ताज महल पेलेस होटल था.

ताज महल होटल के इस ऑपरेशन में मेजर उन्नीकृष्णन को 51 तैनात एसएजी का टीम कमांडर नियुक्त किया गया, ताकि इमारत को आतंकवादियों से छुड़ाया जा सके और बंधकों को बचाया जा सके. उन्होंने 10 कमांडो के एक समूह में होटल में प्रवेश किया और सीढियों से होते हुए छठी मंजिल पर पहुंच गए. सीढियों से होकर निकलते समय, उन्होंने पाया कि तीसरी मंजिल पर आतंकवादी हैं. आतंकवादियों ने कुछ महिलाओं को एक कमरे में बंधक बना लिया था और इस कमरे को अन्दर से बंद कर लिया था. दरवाजे को तोड़ कर खोला गया, इसके बाद आतंकवादियों ने एक राउंड गोलीबारी की जिसमें कमांडो सुनील यादव घायल हो गए. वे मेजर उन्नीकृष्णन के प्रमुख सहयोगी थे.

मेजर उन्नीकृष्णन ने सामने से टीम का नेतृत्व किया और आतंकवादियों के साथ उनकी भयंकर मुठभेड़ हुई. उन्होंने सुनील यादव को बाहर निकालने की व्यवस्था की और अपनी सुरक्षा को ताक पर रखकर आतंकवादियों का पीछा किया, इसी दौरान आतंकवादी होटल की किसी और मंजिल पर चले गए, और इस दौरान संदीप निरंतर उनका पीछा करते रहे. इसके बाद हुई मुठभेड़ में उन्हें पीछे से गोली लगी, वे गंभीर रूप से घायल हो गए और अंत में चोटों के सामने झुक गए. 

अंतिम संस्कार

उन्नीकृष्णन के अंतिम संस्कार में, शोक में लिप्त लोगों ने जोर जोर से चिल्ला कर कहा "लॉन्ग लाइव् मेजर उन्नीकृष्णन", "संदीप उन्नीकृष्णन अमर रहे".  हजारों लोग एनएसजी कमांडो मेजर उन्नीकृष्णन के बैंगलोर के घर के बाहर खड़े होकर उन्हें श्रद्धांजली दे रहे थे. मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का अंतिम संस्कार पूरे सैनिक सम्मान के साथ किया गया.

आज अमर शहीद संदीप उन्नीकृष्णन की ३७ वीं जयंती के अवसर पर पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम उनको शत शत नमन करते है |

सादर आपका 

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नए नए अवतार

अरुण चन्द्र रॉय at सरोकार

हनुमान मन्दिर


पी. एच. डी. {हिंदी कहानी}


राज व्‍यवस्‍था या नक्‍सली, दोषी कौन?


होली ,होली नहीं है


मी​डिया को लेकर, जो AAP ने कहा, क्या झूठ है जरा बताएं ?


होली की कुण्डलियाँ - संजीव

divyanarmada.blogspot.in at hindi sahitya salila

होली


होली की गूँज

त्रिवेणी at त्रिवेणी

होली के रंग कुछ कहते हैं

Akanksha Yadav at शब्द-शिखर

दुरी

Rewa tibrewal at Love

होली विशेष


सुराज आ रहा है,कुछ तो गड़बड़ है !

संतोष त्रिवेदी at टेढ़ी उँगली

बुझती आँखों के वास्ते........


नीम के पत्ते यहाँ ........

mridula pradhan at mridula's blog

ओ मेरे रंगों ...

Dr (Miss) Sharad Singh at Sharad Singh

निमित्त और नियंता


होली की हार्दिक शुभकामनायें

महेश कुशवंश at अनुभूतियों का आकाश

........ धूम मची है चारो ओर:))

संजय भास्‍कर at शब्दों की मुस्कुराहट 

अब न खेलूंगी श्याम संग होरी

Kailash Sharma at Kashish - My Poetry

प्रेम रंग

सु..मन(Suman Kapoor) at बावरा मन

होरी में विरह ; कुछ दोहे

Anand Kumar Dwivedi at आनंद

आइए, एक उपयोगी एप्‍प के बारे में जानें


होली को होना होता है बस एक दिन का सनीमा होता है

सुशील कुमार जोशी at उलूक टाइम्स

ऋतुचर्या

प्रवीण पाण्डेय at न दैन्यं न पलायनम्
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं (18)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -


अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १८ वाँ भाग ...



पन्ने,प्रकृति,आकाश,  …… कलम के बगैर भी प्रतिभायें अपनी दिशा बना लेती हैं  . शब्द तो निश्चेष्ट आँखों से,सीले होठों से,घुटी घुटी आवाज़ों से,खो गई आवाज़ से भी निकलते हैं - एक स्पर्श महसूस कर लो,तो कई ग्रन्थ लिख जाते हैं - 
बस उन्हें ढूंढते जाओ,बहुत बड़ा है ये दुनिया का मेला  ....... कोई है,जो खींच लेता है अपनी तरफ !


किशोर कुमार खोरेन्द्र  
http://facebook.com/kishor.khorendra
"मन की किताब"

पुल से तुम्हारे घर तक
पहुंची ..सड़क पर मैं 
कभी नही चला हूँ 
पुल तक आकर ...
लौटते हुए मै ...
तुम्हें देखे बिना ....ही ...
यह मान लिया करता हूँ 
कि -
मैंने तुम्हें देख लिया है

मुझे लेकिन हर बार -
यही लगता है की -
बंद खिडकियों के पीछे ...
खड़ी हुई तुम -
हर प्रात:
हर शाम
उगते और डूबते हुए .....सूरज की तरह ..मुझे
जरूर देखती रही हो

सड़क के किनारे खड़े वृक्ष भी
अब
मुझे पहचानने लगे है
पत्तियाँ मेरे मन की किताब मे लिखी जा रही
कविताओ कों पढ़ ही लेती है

पुल पर बिछी सड़क कों
मेरी सादगी और भोलेपन से प्यार हो गया है
मेरे घर की मेज पर -जलता हुआ लैम्प
मुझसे पूछता है ..
क्या तुम्हारी कविता कभी समाप्त नही होगी ...?

मेरा चश्मा ...मेरी आँखों मे भर आये आंसूओ कों
छूना चाहता है
पर उसके पास भी हाथ नही है
काश तुम्हारी आँखों की रोशनी के हाथ लम्बे होते
और तुम मुझे छू पाती ......



अमरेन्द्र शुक्ला  

आज ,
बहुत दिनों के बाद ,
तुमसे बात करने को जी चाहा
तो सोचा पूछ लू तुमसे, की ,
तुम कैसे हो, 
कुछ याद भी है तुम्हे 
या सब भूल गए -----
वैसे, 
तुम्हारी बातें मुझे
भूलती नहीं, 
नहीं भूलते मुझे तुम्हारे वो अहसास 
जो कभी सिर्फ मेरे लिये थे 
नहीं भूलते तुम्हारे "वो शब्द" 
जो कभी तुमने मेरे लिए गढ़े थे ----

तुम्हे जानकार आश्चर्य होगा 
पर ये भी उतना ही सत्य है 
जितना की तुम्हारा प्रेम, 
की , 
"अब शब्द भी बूढ़े होने लगे है" 
उनमे भी अब अहम आ गया है 
तभी तो, 
इस सांझ की बेला में,
जब मुझे तुम्हारी रौशनी चाहिए 
वो भी निस्तेज से हो गए है 
मैं कितनी भी कोशिश करू
तुम्हारे साथ की वो चांदनी रातें, वो जुम्बिश, वो मुलाकातें 
जिनमे सिर्फ और सिर्फ हम तुम थे 
उन पलो को महसूस करने की 
पर इनमे अब वो बात नहो होती,

कही ये इन शब्दों की कोई चाल तो नहीं, 
या 
ये इन्हें ये अहसास हो चला है 
की इनके न होने से,हमारे बीच
एक मौन धारण हो जायेगा 
और हम रह जायेंगे एक भित्त मात्र,
क्यूंकि अक्सर खामोशियाँ मजबूत से मजबूत रिश्तों में भी, 
दरारे दाल देती है .....

तो मैं तुम्हे और तुम इन्हें (शब्दों को) बता दो 
मैं कभी भी तुम्हारी या तुम्हारे शब्दों की मोहताज न रही 
हमेशा से ही मेरी खामोशियाँ गुनगुनाती रही 
चाहे वो तुम्हारे साथ हो या तुम्हारे बगैर 
जानते हो क्यूँ , क्यूंकि , 
"शब्दहीन संवाद, शब्दीय संवाद से हमेशा ही मुखर रहा है"


विभा श्रीवास्तव  http://facebook.com/vrani.shrivastava

काश !
मैं एक विशाल वृक्ष और 
छोटे-छोटे पौधे ही होती ....

एक विशाल वृक्ष ही होती जो मैं ....
मेरी शाखाओं-टहनियों पर 
पक्षियों का बैठना - फुदकना 
मेरे पत्तों में छिपकर
उनका आपस में चोंच लड़ाना ,
उनकी चह-चहाहट - कलरव को सुनना , 
उनका ,शाखाओं-टहनियों पर ,पत्तों में घर बनाना ,
गिलहरी का पूछ उठाकर दौड़ना-उछलना मटकना , 
मेरी छाया में थके मनुष्य ,
बड़े जीव जंतुओं का आकर बैठना 
उनको सुकून मिलना , 
सबको सुकून में और खुश देख कर 
मेरी खुशी को भी पंख लग जाते ....
मेरे शरीर से निकली आक्सीजन की 
स्वच्छ वायु जीवन को सुकून देते , 

छोटे-छोटे पौधे ही होती जो मैं ....
मेरे फूलो से निकले खुसबु , 
वातावरण को सुगन्धमय बनाती ....
मेरे पत्तों-बीजों से 
औषधि बनते
सबको नवजीवन मिलते 
कितनी खुश होती मैं ...........
मुझे बयाँ करना मुश्किल है ......

लेकिन एक नारी औरत स्त्री हूँ मैं
जुझारू और जीवट
जोश और संकल्पों से लैस मैं
सामाजिक-राजनीतिक चादर की गठरी में कैद मैं

सामाजिक ढाँचे में छटपटातीं-कसमसातीं मैं 
नए रिश्तों की जकड़न-उलझन में पड़ कर 
पर पुराने रिश्तों को भी निभाकर 
हरदम जीती-चलती-मरती हूँ मैं
रिश्तों में जीना और मरना काम है मेरा ....
ऐसे ही रहती आई हूँ मैं 
ऐसे ही रहना है मुझे ?

उलझी रहती हूँ उनसुलझे सवालों में मैं
जकड़ी रहती हूँ मर्यादा की बेड़ियों में मैं
जीतने हो सकते हैं बदनामी का ठिकरा 
हमेशा लगातार फोड़ा जाता है मुझ पर
उलझी रहती हूँ मैं
लेकिन 
हँसते-हँसते सब बुझते -सहते 
हो जाती हूँ कुर्बान मैं 

कब-कब , क्यूँ-क्यूँ , कहाँ-कहाँ , कैसे-कैसे
छली , कुचली , मसली और तली गई हूँ मैं 
मन की अथाह गहराइयों में 
दर्द के समुद्री शैवाल छुपाए मैं 
शोषित, पीड़ित और व्यथित मैं 
मन, कर्म और वचन से प्रताड़ित मैं

मानसिक-भावनात्मक और 
सामाजिक-असामाजिक 
कुरीतियों-विकृतियों की शिकार मैं
लड़ती हूँ पुराने रीति-रिवाजों से मैं 
करती हूँ अपने बच्चों को सुरक्षित मैं
अंधविश्वासों की आँधी से 
खुद रहती हूँ हरदम अभावों में मैं
पर देती हूँ सबको अभयदान मैं 

अभाव ? शब्दों अमीरी,दुआओं की अमीरी - अभाव कैसा !!!

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  ५ साल पहले आज ही के दिन मुंबई घायल हुई थी ... वो घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे है ... 



केवल सैनिक ही नहीं ... हर एक इंसान जिस ने उस दिन ... 'शैतान' का सामना किया था ... नमन उन सब को !
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जाते जाते एक वीडियो आप सब की नज़र है ...

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जय हिन्द !! 

सोमवार, 26 नवंबर 2012

एक लौ इस तरह क्यूँ बुझी ... मेरे मौला - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

४ साल पहले आज ही के दिन मुंबई घायल हुई थी ... वो घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे है ... 



केवल सैनिक ही नहीं ... हर एक इंसान जिस ने उस दिन ... 'शैतान' का सामना किया था ... नमन उन सब को !
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घर के कुछ काम तो ऑफिस में करने दीजिये ---

बस मूक हूँ .............पीड़ा का दिग्दर्शन करके

रूह से रूह का रिश्‍ता ...!!!

मुझे गणित नहीं आती

किताबों की दुनिया-76

टेंशन ...

"सक़ीना"

26/11/2008 के हुतात्माओं को श्रद्धांजलि

माँ - बेटी

मधुशाला ...भाग --- 8

{ २१६ } कहाँ खो गया मेरा आशियाँ

26/11 की चौथी बरसी पर शहीदों को नमन

एक सम्मन नक्षत्रों का .....

आम आदमी को टोपी पहना दी

अरुंधती राय : केजरीवाल के खुलासे

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 जाते जाते एक वीडियो आप सब की नज़र है ...

एक लौ इस तरह क्यूँ बुझी ... मेरे मौला ...

जय हिन्द !!!

लेखागार