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सोमवार, 21 मार्च 2016

बंजारा

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज के दिन का आगाज़ करती हूँ सीमा दी के एक गीत के साथ जो सभी रचनाकारों को समर्पित है......
चूल्हा और किसी के घर का 
किसी और का है भंडारा 
और किसी का पत्तल-दोना
किसी और का है चटकारा
यहां वहां से मांग-तांग कर 
हल्ला-गुल्ला,गर्जन-तर्जन
बहरे कानो ने लिख डाले 
जाने कितने क्रंदन-कूजन
राम राम जप धरा जेब में 
माल पराया मीठा-खारा
फुटपाथों की भोर-निशाएं
'
पाँच सितारा' ने रच डाली 
भरे हुए पेटों ने परखी 
भूख-प्यास की रीती थाली
पनही गाये फटी बिवाई
ले सिसकारी का इकतारा
खुले व्योम ने लिखी कथाएं 
पिंजरे वालों के पाँखों की 
नदियों ने खींची तस्वीरें 
तृषा भरी जलती आँखों की
कुल-कुनबे के गीत रच रहा 
गलियों में फिरता बंजारा.......सीमा अग्रवाल
एक नज़र आज के बुलेटिन पर
आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।

सोमवार, 14 मार्च 2016

बाजीगर - ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज के दिन का आगाज़ करती हूँ मैं अमित आनंद की एक शानदार अभिव्यक्ति के साथ.........
बाजीगर
बुनो कोई शब्द जाल
महीन
कसा हुआ/मजबूत
कोई
ऐसा जाल
जिसके सिर्फ दो संकरे किनारे हों
जिसकी झोल मे समां सके समूचा आसमान,
बाजीगर
तुम्हे बुनना होगा
हर हाल मे
मेरी खातिर
श्वेताम्बरा की / बसंतरूपा / दाड़िम और उरमा की खातिर
नुक्कड़ के लल्लू पनवाड़ी की खातिर
उस भिखारिन के नन्हे बच्चे की खातिर
बुनना पड़ेगा
तुम्हे
तुम्हारी खुद की खातिर,
बाजीगर
बुनो एक जाल,
इस से पहले कि
कोई और हाथ मार जाए
हमें चाँद का शिकार कर लेना चाहिए अब!
*******अमित आनंद *************

एक नज़र आज के बुलेटिन पर

आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

औरत होती है बातूनी

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज महिला दिवस के अवसर पर करती हूँ सलाम हर उस महिला को जो विपरीत परिस्थितयों में भी 

मुस्कुराकर आगे बढ़ने का हौसला रखती है, जो अपनी कमजोरियों से उभर हरी दूब सी खड़ी होती है, और 

बनती है मिसाल हर एक दिल के लिए.......मुझे लगता है हर औरत एक बहती हुई नदियां होती है, जो 

अच्छा बुरा सब लेकर अपने साथ पत्थरों के बीच से अपने लिए मार्ग निकालती बहती है निरंतर........सो 

आज अपनी एक रचना के माध्यम से हर स्त्री का इस्तेकबाल करती हूँ .......

हां औरत होती ही है बातूनी 
खुद से ही बातें करती अक्सर 
वो बुनती है गुनती है 
टूटे से ख्व़ाब बिखरे से शब्द 
पहले बोलती थी उसकी आंखें 
अनकहा सब बह जाता था 
निर्झर बहते आसुओं संग 
फिर सूखने लगे आँखों के कोर 
और साथ ही मन के भाव भी.... 

अब वो बुनती है गुनती है 
मन की वेदना घुटी सी चीत्कार 
उसका खुद से 
बातें करने का सिलसिला 
तीव्र होने लगी है उसकी गति 
अब अक्सर खुद से बातें करती 
नज़र आती है वो.... 

वो बुनती है गुनती है 
चातक सी प्यास तन की सिलवटें 
देह की मृगतृष्णा भटकाती उसे 
क्षणिक चमक भरमाती उसे 
ढूंढती उसमें वो तृप्ति 
लेकिन तोड़ ये मकड़जाल संभलती वो..... 

वो बुनती है गुनती है 
मन का अंतर्द्वंद और आत्मचिंतन 
जो ले जाता उसे अनंत की ओर 
खींचता बरबस अपनी ओर 
कुछ निर्भय और आश्वस्त होती 
अपने बिखरे वजूद को बटोरती वो.... 

वो बुनती है गुनती है 
मन की रिक्तता मरु सी तपिश 
अब खटकते नहीं सपने 
उसकी आखों में हाँ आंखें उसकी 
जो स्व्प्नीली थी कभी 
फिर से जीवंत नज़र है आने लगी वो..... 

अब बुनती है गुनती है 
मन के गीत मीठा सा संगीत 
जो सुकून दे जाता है उसे 
खुद से बातें करने का सिलसिला 
अब हो गया है अनवरत सा 
हर पल बुदबुदाती गुनगुनाती वो 
लिखती कभी पीड़ा कभी जीवन के गीत ..... 

हाँ बुनती है गुनती है 
वो अब हरसिंगार की खुशबू 
मीठे से अहसास 
बातें करना खुद से रास आने लगा उसे 
अब क्योंकि मिल गया जरिया उसे 
अपनी पीड़ा रिक्तता ख़ुशी ग़म 
हर भाव को शब्दों में उकेरने का... 

अब वो बुनती है गुनती है 
कलकल सी हंसी मुस्कुराते भाव 
हाँ नारी होती है बातूनी 
खुद से करती है बातें हर पल .......

*******किरण आर्य*******

एक नज़र आज के बुलेटिन पर



आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

जय जय संतुलन

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज अपनी बात कहती हूँ आयुष झा आस्तिक के शब्दों के माध्यम से....

मेरी कमीज के बटन में 
शून्य चार!
चार आसमान,
पृथ्वी चार।
बटन रणभूमि,
चार घूड़सवार!
बटन तलवार,
बटन ढ़ाल।
पृथ्वी की
नकेल कसती एक सूई!
युद्ध पत्थर,
चार योद्धा छुई-मुई।
एक जोड़े आसमान के
कंधे पर पालो,
ऐ जोतते हुए हल बटोही,
पीठ पर एक पृथ्वी उठा लो।
तीन पृथ्वी,
तीन चंदा,
एक चूल्हा!
एक चूल्हा,चार योद्धा,एक थाली!
एक पंक्षी,एक वृक्ष और चार आरी।
दो आसमान जैसे
एक सिक्का के दो पहलू!
दो आसमान जैसे
एक तराजू का दो पलरा।
गर एक ऊपर,
एक नीचे!
गर एक आगे,
एक पीछे।
सात ढ़िबरी तेल सठा कर
संतुलन खोजो,
नदी/नाली से पइन उपछ कर
समंदर में बोझो।
उफ्फ संतुलन,
हाय संतुलन,
भाय-भाय संतुलन!
खोजकर्ताओं की
ऐसी-तैसी,
जय जय संतुलन...
-आयुष

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सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

डरो ... कि डरना जरूरी है ...

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज के परिवेश में विष्णु जी की ये कविता बहुत सार्थक प्रतीत होती है.........
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो
सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था
देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे
सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें
पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो
लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी
डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर!
- विष्णु खरे

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