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शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

पृथ्वीराज कपूर और सोमनाथ शर्मा - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा नमस्कार।
पृथ्वीराज कपूर
पृथ्वीराज कपूर (अंग्रेज़ी: Prithviraj Kapoor, जन्म: 3 नवंबर, 1906 पंजाब, पाकिस्तान; मृत्यु: 29 मई, 1972 बंबई, महाराष्ट्र) हिंदी फ़िल्म और रंगमंच अभिनय के इतिहास पुरुष, जिन्होंने बंबई में पृथ्वी थिएटर स्थापित किया। 'भारतीय सिनेमा जगत् के युगपुरुष' पृथ्वीराज कपूर का नाम एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रोबदार भाव भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों पर राज किया।


मेजर सोमनाथ शर्मा
मेजर सोमनाथ शर्मा (अंग्रेज़ी: Major Somnath Sharma, जन्म: 31 जनवरी, 1923; शहादत: 3 नवम्बर, 1947) भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी-कमांडर थे जिन्होंने अक्टूबर-नवम्बर, 1947 के भारत-पाक संघर्ष में अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये। उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया। परमवीर चक्र पाने वाले ये प्रथम व्यक्ति हैं।



आज पृथ्वीराज कपूर और सोमनाथ शर्मा जी को हम सब शत शत नमन करते हैं। सादर।। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।।

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

रंगमंच के मुगलेआज़म को याद करते हुए - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
भारतीय राजनीति को देखने पर अजब से रंगमच जैसी अनुभूति हो रही है. देशहित, देश-विकास के मुद्दों से एकदम उलट सिर्फ और सिर्फ स्वार्थपरक राजनीति की जा रही है. क्या सही है, क्या गलत है इसे समय तय करेगा किन्तु प्रथम दृष्टया कहा जा सकता है कि जिस तरह से महज विरोध करने का नाम पर विरोध की निम्न स्तरीय राजनीति की जा रही है वह इसके गिरते स्तर को दर्शाती है. बहरहाल, राजनैतिक मंच पर चल रही नौटंकी से इतर वास्तविक रंगमंच के वास्तविक कलाकार से आपका परिचय करवाते हैं. यह ऐतिहासिक व्यक्तित्व है पृथ्वीराज कपूर


 आज, 3 नवम्बर को हिन्दी फिल्म और रंगमंच के इतिहासपुरुष पृथ्वीराज कपूर का जन्मदिन है. उनका जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब में हुआ था. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लायलपुर और लाहौर (पाकिस्तान) में रहकर पूरी की. 18 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हो गया और वे सन 1928 में अपनी चाची से आर्थिक सहायता लेकर अपने सपनों के शहर मुंबई आ गए. यहाँ आकर वे इंपीरियल फ़िल्म कंपनी से जुड़ गए. थियेटर के प्रति अप्रतिम लगाव के चलते सन 1944 में उन्होंने खुद की थियेटर कंपनी पृथ्वी थिएटर शुरू की. इसमें उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा का इस्तेमाल किया, जो तत्कालीन फारसी और परंपरागत थिएटरों से बहुत अलग था. पृथ्वी थिएटर के प्रति वे इस क़दर समर्पित थे कि तबीयत ख़राब होने के बावजूद हर शो में हिस्सा लिया करते थे. कहा जाता है कि एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनसे विदेश में जा रहे सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का प्रतिनिधित्व करने की पेशकश की. लेकिन उन्होंने नेहरू जी की पेशकश यह कहते हुए नामंजूर कर दी कि थिएटर के काम को छोड़कर वह विदेश नहीं जा सकते. सोलह वर्षों में पृथ्वी थिएटर के 2662 शो हुए जिनमें पृथ्वीराज ने लगभग सभी शो में मुख्य किरदार निभाया. पृथ्वीराज कपूर को देश के सर्वोच्च फ़िल्म सम्मान दादा साहब फाल्के  और पद्म भूषण  से सम्मानित करने के साथ-साथ राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था. 

29 मई 1972 को इस महान कलाकार का देहांत बंबई में हो गया. भारतीय सिने जगत के युगपुरुष पृथ्वीराज कपूर का नाम एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रोबदार भाव भंगिमा और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों पर राज किया.

उनके जन्मदिन पर बुलेटिन परिवार की तरफ से उनको विनम्र श्रद्धांजलि 


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शनिवार, 3 नवंबर 2012

पृथ्वीराज कपूर - आवाज अलग, अंदाज अलग... - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

3 November 1906 – 29 May 1972
पृथ्वीराज कपूर की संवाद अदायगी की आज भी लोग दाद देते हैं, हालांकि कई बार उन्हें अलग आवाज की वजह से परेशान भी होना पड़ा..
जब 1931 में फिल्मों ने बोलना शुरू किया, तो फिल्म 'आलम आरा' में पृथ्वीराज कपूर की आवाज को लोगों ने दोष-युक्त बताया। बाद में वे लोग ही उनकी संवाद अदायगी के कायल हो गये। पृथ्वीराज कपूर ने जब फिल्मों में प्रवेश किया, तब फिल्में मूक होती थीं। मूक फिल्मों के इस दौर में कलाकार की आवाज के बजाय इस बात को महत्व दिया जाता था कि वह दिखने में कैसा है और उसकी भाव-भंगिमा कैसी है? तब सिर्फ सुंदरता पर ही नहीं, इस बात पर भी ध्यान दिया जाता था कि उसके शरीर की बनावट कैसी है और यदि वह ठीक डीलडौल का है, तो उसे प्रभावशाली माना जाता था।
पृथ्वीराज कपूर का जन्म अविभाजित भारत के पेशावर में 3 नवंबर 1906 को हुआ था। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। हां, एक दुख उन्हें तीन साल की उम्र में जरूर मिला और वह यह कि उनकी मां दुनिया से चल बसीं। पेशावर से ही उन्होंने ग्रेजुएशन किया। स्कूल और कॉलेज के समय से ही उनका नाटकों में मन लगने लगा था। स्कूल में आठ साल की उम्र में अभिनय किया और कॉलेज में नाटक 'राइडर्स टू द सी' में मुख्य महिला चरित्र निभाया। रंगमंच को उन्होंने अपनाया लाहौर में रहते हुए, लेकिन पढ़े-लिखे होने के कारण उन्हें नाटक मंडली में काम नहीं मिला।
पृथ्वीराज कपूर अच्छे और संस्कारी खानदान से थे न कि अखाड़े से, लेकिन डीलडौल में किसी पहलवान से कम नहीं थे। शारीरिक डीलडौल और खूबसूरती की बदौलत 1929 में इंपीरियल कंपनी ने उन्हें अपनी मूक फिल्म 'चैलेंज' में काम दिया। इसके कुछ समय बाद ही बोलती फिल्मों का दौर शुरू हो गया। मूक फिल्मों में काम करने वाले कई कलाकारों के पास संवाद अदायगी के हुनर और अच्छी आवाज का अभाव था। पृथ्वीराज कपूर भी अपवाद नहीं थे। 'आलम आरा' में पृथ्वीराज कपूर की आवाज को आलोचकों ने दोष-युक्त बताया, लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस दोष को सुधारा और अपनी दमदार आवाज के बल पर लगभग चालीस साल इंडस्ट्री में टिके रहे। बीच में खुद की नाटक कंपनी बनाई और लगे पूरी दुनिया घूमने।

पृथ्वीराज कपूर की सफलता की एक खास वजह थी उनका राजसी व्यक्तित्व। कई भूमिकाओं में तो उनके राजसी व्यक्तित्व के सामने उनकी आवाज गौण हो गई। 'विद्यापति', 'सिकंदर', 'महारथी कर्ण, 'विक्रमादित्य' जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं। 
अकबर के रूप में
अकबर की भूमिका अनेक कलाकारों ने की है, लेकिन उनकी कभी चर्चा नहीं हुई। अकबर का नाम आते ही सिनेमा प्रेमियों की नजर के सामने आ जाते हैं 'मुगल-ए-आजम' के पृथ्वीराज कपूर। यही आलम उनके द्वारा निभाई गई सिकंदर की भूमिका का भी है।
सिकंदर के रूप में
1968 में पृथ्वीराज कपूर अभिनीत फिल्म 'तीन बहूरानियां' रिलीज हुई। एस. एस. वासन इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक थे। उनकी भूमिका एक परिवार के सर्वेसर्वा की थी, इसीलिए वासन ने पृथ्वीराज कपूर का चुनाव किया। इस भूमिका में उनकी आवाज से कोई परेशानी न हो, इसलिए उनके संवाद अभिनेता विपिन गुप्ता की आवाज में डब करवाए गए।
1957 में आई फिल्म 'पैसा' का निर्देशन करने वाले पृथ्वीराज कपूर ने तमाम चर्चित नाटकों में अभिनय किया। उन्होंने कुल 82 फिल्मों में अभिनय किया। अपने कॅरियर के दौरान ही उन्होंने मुंबई में 1944 में पृथ्वी थियेटर की स्थापना की। उन्हें राज्यसभा का सदस्य भी बनाया गया। 1972 में उन्हें सिनेमा के क्षेत्र में योगदान के लिए दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया। आज पृथ्वीराज कपूर को गुजरे हुए 38 साल से अधिक वक्त हो चुके हैं। वह 29 मई 1972 को इस दुनिया से चले गए, लेकिन आज भी जब हम उनकी फिल्में देखते हैं, तो यह नहीं लगता कि पृथ्वीराज कपूर हमसे दूर चले गए हैं। 
 
 
सादर आपका 
 
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जिंदगी के सफ़र में डगर वही जो मंजिल तक पहुंचाए --

सही बात 

 

शुभ - दीपावली

अरे अभी से 

 

जादू-उवाच

के जादू से बचो तो जाने 

 

एक ग़ज़ल 

सुनाइए 

 

मेरी सीमाएं हैं....

हर एक की है 

 

स्टेटस अपडेट्स के दौर में पारिवारिक संवादहीनता

गलत बात है 

 

चलो अपनी कुटिया जगमगायें

चलिये 

 

औसत लोग

किसी औसत मे नहीं आते 

 

अपने होने का पता...

जब चले तब भला

 

बाल-लीला

जय हो 

 

फैशन में बदलता करवा चौथ

यह तो होना ही था 

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

लेखागार