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शनिवार, 30 जुलाई 2016

ऑल द बेस्ट - १४००वीं ब्लॉग बुलेटिन

दिल्ली आए हुए एक महीना से बेसी हो गया है. अऊर महानगर के जिन्नगी जइसा हम भी जुट गए हैं, चाहे कहीए जुत गए हैं. नया जगह भी नहीं है, नया ऑफिस भी नहीं है, नया काम भी नहीं है... लेकिन जब एतना साल बीत जाता है, त अपना घरवो अनजान बुझाता है. काहे कि सुबह का भुलायल अदमी को साँझ तक लौट आने का छूट है. हम त चार साल बाद लौटे थे अऊर ई ऑफिस में सात साल बाद. बहुत बदलाव आ गया था. बाकी नहीं बदला था त ऊ रास्ता, जहाँ चारों तरफ हरियाली है, मोर अऊर कोयल का आवाज़ सुनाई देता है, साफ़ सुथरा रोड अऊर खूब सुन्दर बाताबरन.

ऑफिस से निकलकर मेट्रो इस्टेसन तक जाना बहुत सीतल अनुभव होता है. बाकी मेट्रो में पहुँच जाने के बाद बुझाता है कि परधान मंत्री जी का स्वच्छता अभियान एकदम्मे फेल है. एतना गन्दगी कि केतना बार त आँख मूँद लेने का मन करता है. इंसान सुतुरमुर्ग हो गया है अऊर महानगर का इंसान त... आप समझिए सकते हैं. इस्टेसन पर, प्लेटफारम पर, गाड़ी के अंदर... माने कुल मिलाकर स्वच्छता अभियान भी सुसाइड कर ले.
ओफ्फोह... सॉरी... सॉरी!! एगो बात त भुलाइये गए बताना. ई गन्दगी माने चिप्स का खाली पैकेट, गुटखा का पुडिया, कोल्ड-ड्रिंक का खाली डिब्बा, लेमनचूस अऊर चौकलेट का छिलका, सिंघाड़ा (समोसा) का ठोंगा, पानी का बोतल नहीं. ऊ सब पर कंट्रोल है तनी-मनी, लेकिन अदमी पर कोनो कंट्रोल नहीं, खासकर नया जुग का लड़का-लड़की. मॉडर्न होने के नाम पर आपस में बात करते हुए एतना गंदा भासा का परयोग करना कि घर जाकर कान गंगाजल से धोना पड़े. अऊर बेवहार एतना खराब कि सरम को भी सरम आ जाए. अब जो देखने को मिलता है उसको गन्दगी के कैटेगरी में रखें कि अश्लीलता के... बिचार करना होगा. जइसे न्यूड अऊर नेकेड में अंतर होता है, ओइसहीं आधुनिकता अऊर अश्लीलता के बीच भी होता होगा. सायद हमको नहीं बुझाएगा, काहे कि अब त हमरे लिये बरिस्ठ नागरिक वाला सीट भी छोडकर उठ जाता है लोग-बाग.

मगर ऊ का कहते हैं कि गन्दगी देखने वाला के आँख में होता है (कहावत त सुंदरता के लिये है) त हम काहे अपना आँख गंदा करें. ई सब गन्दगी हमरे आँख से परे का चीज है, एही से नहीं देखाई देता है.

अब ओही रोज हम कोई काम से तीस हजारी गए थे. लौटते समय कश्मीरी गेट से राजीव चौक आना था. एगो लड़की हमरे साथ-साथ एस्केलेटर पर चल रही थी. कुछ देर बाद लापता. जब हम मेट्रो में दाखिल हुए तब ओही बचिया फिर से हमरे बगल में आकर खड़ी हो गयी. एकदम उसका कद, नाक नक्सा अऊर बोली हमरी झूमा जइसा था. जैसहीं मेट्रो चलने लगा, ऊ तुरत अपना मोबाइल निकाली अऊर फोन पर चालू हो गयी. मगर जब कान में आवाज गया त सुने कि ऊ बोली, “भैया! हुडा सिटी सेण्टर पर उतरना है न? उसके बाद रिक्शा ले लूँगी!” मन में तनी इत्मिनान हुआ कि ओही सब फालतू बात नहीं सुनाई देगा. बाद में जो बात सुनाई दिया उसमें पहिला बाक्य एही था कि भैया आप मुझसे कुछ सवाल पूछिए ना? पता नहीं वो लोग क्या पूछेंगे.

फिर बातचीत में ब्लड प्रेशर, हेमोग्लोबिन, प्लैटेलेट्स, ब्लड शुगर के बारे में बहुत सा बात फोन पर हुआ. हमरा दिमाग पजल का टुकड़ा जोडने में लगा हुआ था. लडकी कोनो पैरा- मेडिकल सर्विस के लिये इंटरभ्यू देने जा रही थी. बीच में सैलरी के बारे में भी कुछ पूछी, लेकिन उधर का जवाब हमको सुनाई नहीं दिया. हमको भी लगा कि हमरी बेटी एतना बड़ा हो गयी है.

खैर, हमरा इस्टेसन त जल्दिये आने वाला था. उतरने के पहले हम ऊ लड़की के माथा पर हाथ रखे त ऊ चौंक कर हमरे तरफ देखी. उसके आँख में सवाल था अऊर हमरे आँख में चमक. हम बोले, “ऑल द वेरी बेस्ट!”
उसके आँख का का सवाल चमक में बदल गया अऊर चेहरा का तनाव कान से लेकर कान तक के मुस्कराहट में गायब हो गया.
“थैंक्स, अंकल!”
अऊर तब तक हमरे पीछे का भीड़ हमको धकियाकर प्लेटफारम पर पटक दिया.

समय के नदी में का पता किधर से कउन सा बूँद भिगाकर चला जाता है. हमरा त एही जोगदान रहा परधान मंत्री जी के स्वच्छता अभियान में. अऊर अपना एगो हाल में लिखा हुआ नज्म याद आ गया

वक्त से टूटा 
कोई लावारिस सा लम्हा
डर के मारे
सड़क किनारे सुबक रहा था
उसकी उंगली थामी
प्यार से चूमा उसको
जब वो प्यार से पलट के 
मेरे गले लग गया
मैंने समझा मेरी नज़्म मुकम्मल हो गयी
और सूना सा दिन
कोई गुलज़ार कर गया!!

जिन्नगी जीने का सबसे मजेदार फंडा एही है कि एगो बड़ा सा खुसी का इंतज़ार करने से अच्छा, छोटा-छोटा खुसी को जिया जाए. अब अगर एही छोटा-छोटा ब्लॉग-बुलेटिन हमलोज एन्जॉय नहीं करते, त आज कइसे ई १४००वाँ ब्लॉग बुलेटिन आपके सामने होता!


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