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बुधवार, 30 अगस्त 2017

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना…. - शैलेन्द्र और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
शैलेन्द्र
शंकरदास केसरीलाल 'शैलेन्द्र' (जन्म: 30 अगस्त, 1923 रावलपिंडी, (पाकिस्तान); मृत्यु: 14 दिसंबर, 1966 मुंबई) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार थे। ‘होठों पर सच्चाई रहती है, दिल में सफाई रहती है', 'मेरा जूता है जापानी,' ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ जैसे दर्जनों यादगार फ़िल्मी गीतों के जनक शैलेंद्र ने महान् अभिनेता और फ़िल्म निर्माता राज कपूर के साथ बहुत काम किया

अगस्त सन् 1947 में श्री राज कपूर एक कवि सम्मेलन में शैलेन्द्र जी को पढ़ते देखकर प्रभावित हुए। और फ़िल्म 'आग' में लिखने के लिए कहा किन्तु शैलेन्द्र जी को फ़िल्मी लोगों से घृणा थी। सन् 1948 में शादी के बाद कम आमदनी से घर चलाना मुश्किल हो गया।[1] इसलिए श्री राज कपूर के पास गये। उन दिनों राजकपूर बरसात फ़िल्म की तैयारी में जुटे थे। तय वक्त पर शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने घर से निकले तो घनघोर बारिश होने लगी। क़दम बढ़ाते और भीगते शैलेन्द्र के होंठों पर ‘बरसात में तुम से मिले हम सनम’ गीत ने अनायास ही जन्म ले लिया। अपने दस गीत सौंपने से पहले शैलेन्द्र ने इस नए गीत को राजकपूर को सुनाया। राजकपूर ने शैलेन्द्र को सीने से लगा लिया। दसों गीतों का पचास हज़ार रुपये पारिश्रमिक उन्होंने शैलेन्द्र को दिया। नया गीत बरसात का टाइटिल गीत बना[2]। गीत चले, फिर क्या था, उसके बाद शैलेन्द्र जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कम लोग ये जानते होंगे कि शैलेंद्र ने राजकपूर अभिनीत 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण किया था। दरअसल, शैलेन्द्र को फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' बहुत पसंद आई। उन्होंने गीतकार के साथ निर्माता बनने की ठानी। राजकपूर और वहीदा रहमान को लेकर 'तीसरी कसम' बना डाली। खुद की सारी दौलत और मित्रों से उधार की भारी रकम फ़िल्म पर झोंक दी। फ़िल्म डूब गई। कर्ज़ से लद गए शैलेन्द्र बीमार हो गए। यह 1966 की बात है। अस्पताल में भरती हुए। तब वे ‘जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में, नजरों को हम बिछायेंगे’ गीत की रचना में लगे थे। शैलेन्द्र ने राजकपूर से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की। वे बीमारी में भी आर. के. स्टूडियो की ओर चले। रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया। यह दिन 14 दिसंबर 1966 का था। मौके की बात है कि इसी दिन राजकपूर का जन्म हुआ था। शैलेन्द्र को नहीं मालूम था कि मौत के बाद उनकी फ़िल्म हिट होगी और उसे पुरस्कार मिलेगा।

14 दिसंबर, 1966 को बीमार शैलेन्द्र राजकपूर से मिलने आर.के. स्टूडियो की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया। काल के गाल में एक दिन जाना तो सभी को होता है पर शैलेन्द्र जैसे गीतकार के चले जाने से भारतीय सिनेमा में आया ख़ालीपन कभी भी न भर पायेगा। ये जानते हुये भी कि उनके लिखे इन शब्दों का सच होना असंभव है, चलिये एक बार दुहरा लेते हैं उनके उन असंभव शब्दों को -

“ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना…..”



आज महान गीतकार शैलेन्द्र जी के 94वें जन्मदिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।  सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 





शनिवार, 14 दिसंबर 2013

राज कपूर, शैलेन्द्र और ब्लॉग बुलेटिन

सभी चिट्ठाकार मित्रों को सादर नमस्कार।।



राज कपूर और शैलेन्द्र एक साथ 
आज हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेता, निर्माता - निर्देशक और अगर एक शब्द में कहे तो हिंदी सिनेमा के "शो मैन" राज कपूर (14 दिसंबर, 1924 - 2 जून, 1988)जी का जन्म दिवस है और आज ही हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र (30 अगस्त, 1923 - 14 दिसंबर, 1966) जी की पुण्यतिथि भी है। इन दोनों ही महान हस्तियों का भारतीय सिनेमा में निसंदेह ही महान योगदान रहा है। इन दोनों ने ही मिलकर हिंदी सिनेमा को कई बेहतरीन फ़िल्में और गीत दिए है। आवारा, श्री 420, अनाड़ी और संगम जैसी बेहतरीन फ़िल्में और इन फिल्मों के कई प्रसिद्ध गीतों में इन दोनों ने मिलकर काम किया है। 

आज इन दोनों महान हस्तियों को पूरा हिंदी ब्लॉगजगत और ब्लॉग बुलेटिन की टीम हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करती है। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर  ……














शुभरात्रि 

लेखागार