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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (आखिरी कड़ी) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिला ! ऐसे वार्षिक अवलोकन आपको आगे भी पढने को मिलते रहेंगे !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ की २१ वी और आखिरी कड़ी ...
 

सुबह दोपहर , शाम, रात - पुकारा मैंने - कलम के , एहसासों के सहचरों को ,... किसी ने सुना , कुछ को एहसासों के समंदर से गोते लगा मैं ढूंढ लायी ... जो मेरा सामर्थ्य था , वह सामने है , पर इससे परे प्रतिभाएं और हैं . यह शुरुआत है , जब तक हूँ - वार्षिक अवलोकन करुँगी और अनगिनत प्रतिभाओं की ऊँगली थामकर मैं भी आपसबों से मिलती रहूंगी .
लम्बी उड़ान भरूँ
सपने सजाऊं
तिनके चुन चुन
घर मैं बनाऊं .... ब्लॉग जगत में इतने सशक्त लोग हैं कि यह साहित्यिक घर विस्तार ही पाता जायेगा ... आँगन, दीवारें, छत , दालान बचपन, यौवन , अनुभवी उम्र - सब है यहाँ .

घर की क्या अहमियत है , जानिए डॉ टी एस दराल से http://tsdaral.blogspot.com/2011/01/blog-post_10.html
"क्या आपने कभी किसी कुम्हार को चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते देखा है ? देखिये किस तरह वह मिट्टी को गूंधकर चाक पर घुमाकर मन चाही आकृति प्रदान कर मिट्टी के बर्तन बना देता है । पसंद न आने पर तोड़कर फिर एक नया बर्तन बना देता है ।फिर वह उसे अंगारों में दबाकर पका देता है । और बर्तन हो गए तैयार इस्तेमाल के लिए ।लेकिन अब यदि वह चाहे भी तो उन्हें तोड़कर दोबारा नए बर्तन नहीं बना सकता । " ऐसा ही होता है बच्चों के साथ ... उन्हें ऊँगली पकड़ चलना सिखाते हैं , संस्कारों के रंग देते हैं .... पर चूक गए तो फिर बदरंग रंग बदले नहीं जा सकते !!!

अपने अपने में गुम , बदलते चक्र में , सीख के अभाव में वह बहुत कुछ खो हो गया है , जिसकी अहमियत हर छोटे - बड़े घरों में थी ...

"याद है, एक शब्द हमारी भाषा में बहुत प्रचलित था " मनुहार " ! अक्सर हम इस शब्द का उपयोग अपने बड़ों को या उन्हें, जिन्हें देख हमारे चेहरे खिल जाते थे, को मनाने में उपयोग करते थे ! मान सम्मान के साथ, जब भी मनुहार की जाती थी, उस समय कठोर वज्र समान दिल को भी, पिघलते देर नहीं लगती थी !" पर अब अपने झूठे अहम् में रिश्तों की चिन्दियाँ उड़ रही हैं . प्राइवेट कम्पनी ने इतने पैसे दिए कि पैसे की होड़ में प्यार मर गया और पैसा रिश्ते नहीं बनाता , स्पर्धा बढ़ाता है ...

हर शाख गिरवी , परिंदे परकटे से .......... किस दोस्त , किस मेहरबां की बात हो इस आलम में !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ http://cbmghafil.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html
"वो तअन्नुद आपका हमसे हमेशा बेवजह,
याद आता है बहुत तुझको गंवा जाने के बाद।" जब सबकुछ पास होता है, हम उसकी अहमियत से दूर होते हैं , खो जाने के बाद याद करते हैं !

जीवन की सच्चाइयों के रंग अपने अपने होते हैं .... किसी को सागर की तलाश होती है , किसी को ख़ामोशी की -

पल्लवी सक्सेना http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_05.html
"कहते हैं हर दुख आने वाले सुख कि चिट्ठी होती है ,
जैसे हर रात की सुबह होती है," दुःख सुख का संदेशवाहक होता है , उसकी भाषा में उलझकर मन डूबने लगता है, तभी सुख दस्तक देता है .

अन्दर ही अन्दर जो पी लेते हैं गरल , उनके बिना बोले जो उन्हें समझ ले - प्यार की पराकाष्ठा उसे ही कहते हैं , आत्मा-परमात्मा का एकसार होना वहीँ दिखाई देता है ...

"एक बात बताओ ,उद्धव !
जब कृष्ण ने तुम्हे भेजा था 'हमें' समझाने के लिए,
ख़ास मुझ बावरी को ही समझाने के लिए
आने से पहले क्या तुमने देखी थी कान्हा की आँखें ?
जिव्हा से तो कुछ भी कह दिया होगा निर्मोही ने " प्रेम के इस रंग में उद्धव ने वह ज्ञान पाया , जो किताबी नहीं थे . ऊपर से कुछ कहना सच नहीं होता , पर इसकी समझ उसे ही होती है, जो उस मन से ही जुड़ा होता है .

समय कब रुकता है ... उसकी गति के आगे हमें विदा लेना होता है - चाहो न चाहो ... उत्तरदायित्व और भी हैं , जीवन के रंग और भी हैं . तो आइये हम एक साथ २०११ को विदा करें . गौर से देखिये उसके चेहरे पर प्रतिभाओं की गहरी चमक है और विश्वास कि आनेवाला साल भी इस चमक से परिपूर्ण होगा .

सबकी ओर से इस मंच से मेरी रचना नए वर्ष के स्वागत में -

"कई पुराने साल
मन में
प्रकृति की रगों में
इतिहास के पन्नों में
जीवंत मूल्यों के साथ जज़्ब अपनी गरिमा लिए -
घोंसले से झांकती मीठी लाल चोंच
डाली पर झूमती एक कोमल पत्ती
और घड़ी की सूई के संग
२०१२ के चेहरे से २०११ का घूँघट उठाते
नए संकल्प का आह्वान करते हैं ...
अपने प्रयासों का हिसाब
नए हाथों में रखते हुए
आशीर्वचनों के साथ
दुआ करते हैं -
" जो हम न कर सके वो तुम करना
ईश्वर की हर रचना का मान रखना
दुध्मुहें सपनों को ठोस जमीन देना
जिनकी उम्मीदें डांवाडोल हैं
उनका हौसला बनना ---
तुम्हारे कदम २०१३ के लिए अनुकरणीय रहें
ऐसे कुछ निशां ज़रूर बनाना ....
पूरी दुनिया की आँखें ख्वाब संजोये है
पलकें उठाओ
हमारे साथ ओ २०१२
तुम भी कहो
- नया वर्ष तुम्हारा हो , तुम्हारा हो ...."

रश्मि प्रभा

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (20) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का २० वां भाग ...
 

एक तरफ प्यार
दूसरी तरफ नफरत और भय ...
ज़रूरत
और खुद्दारी - अपनी पहचान की
दुविधा कैसी ?
प्यार से बढ़कर कोई खुद्दारी नहीं ! ......प्यार कहते ही सबकुछ ठीक हो जाता है , अस्त - व्यस्त घर भी व्यवस्थित हो जाता है - क्योंकि मन व्यवस्थित होता है . खुद्दारी के शर विषैले नहीं होते , स्थिर , अविचलित भाव से जीवन की ठोकरों में भी सार पाते हैं - सार , जो कभी गीत, कभी ग़ज़ल, कभी कहानी , कभी कविता बन बहते हैं ....

अविनाश चन्द्र http://penavinash.blogspot.com/2011/01/blog-post_27.html
"कविताएँ बुनी जा सकती हैं,
प्रशांत महासागर के,
सबसे गहरे तलौंछ पर,
जो सटकाए बैठा है,
भुवन जितने ही रहस्य।
आकाशगंगाओं , राहुओं, केतुओं,
राशियों-नक्षत्र दलों पर।
अगणित विधुर उत्कोच दबाये,
काल के प्रहरों पर।" बैठ शिला की शीतल छाँव ... मनु ने भी सृष्टि को जल प्लावित देख ऐसा सोचा होगा . सत्य की तलाश में भटकते एथेंस के सत्यार्थी ने भी कुछ ऐसा ही सोचा होगा , ..... रहस्यों की गुफा से सोच की कई किरणें निकलती हैं , हर किरण जीवन देती है . मृत्यु का वरन भी एक जीवन का आरम्भ है ...

कहते तो हैं कि ' सत्यम ब्रूयात .. न ब्रूयात सत्यम अप्रियम ' पर सत्य अधिकतर कड़वा ही होता है और यदि तुमने कड़वे को नहीं पचाया तो रक्त शुद्धि संभव नहीं !

श्याम कोरी उदय http://kaduvasach.blogspot.com/2011/12/blog-post_508.html
"संकट के समय
सभी जानवर एक हो जाते हैं
किन्तु ऐंसा नजारा
इंसानों में नजर नहीं आता !" इन्सान संकट में मज़े लेने लगता है , बड़ी तत्परता से पाप के फल गिनाने लगता है - अहमतुष्टि , स्वार्थ , उदासीनता का कटु जामा जब पहनता है तो सत्य तो कटु होगा ही . आह ! जानवर भी श्रेष्ठ ...

दोषारोपण , अपनी कचहरी , अपनी दलील , अपना फैसला - व्यक्ति की नियत यही तो नियति डगमगायेगी ही . गिरे को उठाना आसान नहीं , भार लेना ही होता है ... पर देखकर कतराके निकलना या एक पत्थर अपनी ओर से भी मारना आसान है -

"सहज है ना
थूक देना किसी पर
आक्षेप लगाना
अकर्मण्य होने पर
कहना तू व्यर्थ है
जीवन बोझ है तेरा
क्षणभर में
धूसरित करना
किसी का अस्तित्व " अस्तित्व को जो नाकारा सिद्ध करते हैं , वे नहीं देखते कि सभ्यता का लिबास उनके शरीर से किस तरह अलग होता जाता है . चंद मिनटों में पूरी ज़िन्दगी का हिसाब किताब संभव नहीं होता .

जीवन तो संघर्ष है, बिना संघर्ष जीवन नहीं -' पेड़ के नीचे लेटा मुरख आम आम चिल्लाये , लेकिन डाल तलक जो पहुँचे आम उसीने खाए '

"अनुकूल मौसम में तो हर कोई नाव चला सकते हैं
पर तूफां में कश्ती पार लगाने वाले विरले ही होते हैं
कठिन राह को जो आसाँ बना मंजिल तक पहुँचते हैं
वही धुन के पक्के इन्सां एक दिन चैंपियन बनते हैं " सौ टके की बात है - लहरों के साथ तो कोई भी तैर लेता है, असली इन्सान वही है जो लहरों को चीरकर आगे बढे ...

लहरों के साथ बहते बहते ज़रूरतें बदल गईं - रोटी ,कपड़ा और मकान के बदले टी.वी , मोबाइल और लैपटॉप की ज़रूरतें ऊपर हो गयीं -

"दो वक्त की रोटी भी जिसे नहीं मिलती,
उसकी संख्या सत्तर प्रतिशत के लगभग है,
पर अमूल वाले अपने विज्ञापन में समझाते हैं कि,
असली मक्खन के स्वाद पे सभी का हक है।" हैरां तो सब हैं, पर हैरानी में माँग यही है ,... बिना इसके कोई लाइफ स्टाइल नहीं है !

ज़िन्दगी को कई बार परिभाषित किया गया है, पर प्रश्न आज भी ज्वलंत है कि ज़िन्दगी क्या है ,

पी .सी. गोदियाल http://gurugodiyal.blogspot.com/2011/01/blog-post_27.html
"जिन्दगी आइसक्रीम है,
उसे तो वक्त के सांचे में
हर हाल में ढलना है,
तुम खाओ या न खाओ,
उसे तो पिघलना है।" सोचके देखो, गंभीरता के साथ तो ज़िन्दगी आइसक्रीम से अधिक कुछ नहीं ... इसलिए बेहतर है समय रहते अपनी पसंद के फ्लेवर में इसे खा लो ... पसंद की फ्लेवर ना हो तो इमैजिन कर लो ... उधेड़बुन में दिमागी करघे पर धागा चलाते रहे तो कब पिघल जाए, पता भी नहीं चलेगा .
मिट्टी अलग अलग किस्म की होती है - कुछ कुम्हार की ज़रूरत , कुछ मूर्तिकार , कुछ घर बनाने में , कुछ फूलों के लिए .... और कभी यूँ ही ,

"हर संभव चीज़ को इतना असंभव किये हुए हैं हम अपने लिए कि,
असंभव भी 'बस' संभव के समतुल्य ही असंभव है हमारे लिए." हमने कुर्सी को माथे पर रख लिया है , खुद ज़मीन पर - कुछ ऐसी ही स्थिति है सामान्य से असामान्य होने में , खोने से पाने और पाने से खोने में ....

अमां भागदौड़ इतनी है , इतनी समस्याएं , इतनी ज़रूरतें कि दिमाग सन्नाटे में है .... सन्नाटे से बाहर निकलो और खुश होने की वजहें पाओ -

"शुक्र मनाओ
सड़क पर पीछे से किसी 4 व्हीलर ने नहीं ठोका।
गड्ढो से सकुशल निकल गये।
किसी गड्ढे में नहीं गिरे,
गिरे भी तो
नहीं गिरा, तुम्हारे ही ऊपर, तुम्हारा टूव्हीलर
और तुम्हारा टूव्हीलर तुम्हारे ही ऊपर गिर भी पड़ा तो
पीछे से आती बस तुम्हें,
तुम्हारे टूव्हीलर सहित रौंदती नहीं चली गई।" जो रफ़्तार है ज़िन्दगी की कि रात में सही सलामत घर आना सुकून है , घर से निकलते समय भय साथ निकलता है , घर लौटकर आराम से दिल कहता है - शुक्र है, अच्छे भले घर लौटे ....

तो शुक्र मनाइए कि जैसे तैसे यह साल निकल चला , नया साल आने को है .... सुख है तो दुःख है , अँधेरा है तो उजाला है - है न ?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक http://uchcharan.blogspot.com/2011/12/blog-post_04.html
"जिसने मन पर कर लिया, स्वामी बन अधिकार।
मानवता का मिल गया, उसको ही उपहार।।" मन की चंचलता यदि वश में है तो जीने का मार्ग सरल है और यही प्राप्य है .

जाते साल ने हमें बहुत कुछ दिया है .... खोने को भूलकर पाने को याद करें तभी उल्लसित हो आगत का स्वागत कर पाएंगे . तैयारी शुरू कीजिये , मैं भी लेकर आती हूँ एक आखिरी तोहफा लेकर , जिसे पाकर आपकी उम्मीदें , आपकी कोशिशें २०१२ में और बढ़ जाएँ ...

रश्मि प्रभा

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (19) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १९ वां भाग ...



मैं ख्यालों की एक बूंद
सूरज की बाहों में कैद
आकाश तक जाती हूँ
बादलों के सीने में छुपकर
धरती की रगों तक बहती हूँ
कभी फूल, कभी वृक्ष में सौन्दर्य
कभी गेहूं - कभी धान में समाकर
गरीबों की थाली में सुकून बन
ईश्वर का मंत्र बन जाती हूँ ......... मैं ख्यालों की एक बूंद हूँ !

पुरानी संदूक में मैं तह दर तह होती हूँ , कभी खोलो तो धूप दिखानी ही होती है . बूंद बूंद नमी होती है संदूक में , जो कभी आँखों में छुप जाती है , कभी एहसासों में तैरती पन्नों पर उतर आती है -

"पर सुनो तो
मैंने फिर से उस संदुकची में
लगा दिया एक नया ताला
क्योंकि उन सहेजे यादों
को फिर से नहीं चाहता
अपने सामने देखना
क्योंकि मैंने और उसने
सीख लिया है
नए जीवन में सांस लेना ..." एक दर्द का सैलाब फिर से बहा ले जाए , तो होना क्या है ! अतीत से यादों के सिवा कुछ बाहर भी तो नहीं आता . डॉ ढूंढता रहे मर्ज़ की दवा , उससे पहले संदुकची में ताला लगा दो . आवाज़े दूर तक पीछा करेंगी , लेकिन अनसुना करना होगा आगे बढ़ने के लिए !

आगे बढ़ते हुए , पीछे के निशां अनुकरणीय ना बने तो जीने का कोई अर्थ नहीं ...

त्रिलोक सिंह ठकुरेला http://triloksinghthakurela3.blogspot.com/2011/11/blog-post_8230.html
"पक्षपात, अन्याय को देख रहे जो मौन।
‘ठकुरेला’ संसार मे उसे मान दे कौन।।" अन्याय सहना , अन्याय होते देखना व्यक्ति को दर्शाता है . सहते हुए अन्याय को बढ़ावा देना , देखकर आगे बढ़ जाना - दोनों सही नहीं है . तो इस बात का अर्थ समझिये और आगत को एक अर्थ दीजिये .
राजेंद्र तेला जी ने इसी को मायने दिए हैं http://www.nirantarajmer.com/2011/10/blog-post_168.html
"बुरे को बुरा ना कहूं
अच्छे को अच्छा
ना कहूं
ये मुमकिन ही नहीं
मेरी फितरत मुझे
झूंठ बोलने देती नहीं
आदत से मजबूर हूँ" सच बोलना चाहिए , ... अप्रिय हो तो भी , हाँ स्थान , वक़्त और लहजे का ख्याल रखना ही चाहिए .

गुजरे कल और आज के बीच यादों का , संघर्ष का , खोने और पाने का एक कारवां सा होता है -

मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी" http://naiqalam.blogspot.com/2011/06/blog-post.html
"तंगहाली की वो आइसक्रीम
चन्द रुपयों के वो तरबूज
किसी गली के नुक्कड़ की वो चाट
सुबह- सुबह
पूड़ी और जलेबी की तेरी फरमाइश
मुझे आज भी याद है
कैसे भूल जाऊं" इसे लिखते हुए देवदास की पारो के स्वर मुखर हो उठे - ' देवा ओ देवाआआआ..." कैसे कोई भूल जाए उन पलों को , जहाँ से ज़िन्दगी को पंख लगे या जहाँ ज़िन्दगी ने दूसरे को पंख दिए या जहाँ पंख टूट गए . यादों की सुनामी में कभी डूब जाता है मन , कभी नई ज़िन्दगी पा लेता है .

मन कभी स्थिर नहीं होता , एक जगह शरीर को रख संसार की परिक्रमा करता है - बिना टिकट , बिना मशक्कत , किसी को पता भी नहीं चलता ...

"तिमिर के उस पार
जाना चाहती हूँ
एक नया गीत
लिखना चाहती हूँ
मैं और मेरे गीत
खुद को पढूं और
खुद को लिखूं
मेरे बाद इसे
पढना हैं किसने
कागज़ और कलम
के ज़रिये ...
मैं और मेरे गीत " मन की उड़ान , मन की चाह - भला देर किस बात की . अपने सुकून को पाना है , खुद से खुद को जानना है !

कई बार खुद से परे वह नज़र आता है, जिससे कोई रिश्ता न होकर भी एक रिश्ता बन ही जाता है . कोई नाम नहीं , पहचान नहीं , पर अपरिचित भी नहीं !

राजेश उत्साही http://gullakapni.blogspot.com/2011_01_01_archive.html
"बैग में किताबें नहीं होतीं
पर असली ज्ञान होता है जीविका ..." इसे कहते हैं अपना अपना नज़रिया . कोई ऊपर ऊपर ही सबकुछ जीता है , कोई रद्दी की टोकरी में भी बहुत कुछ ढूंढ लेता है .

चलिए चर्चित गज़लकार प्राण शर्मा जी की पसंद की ग़ज़ल से मुखातिब होते हैं -
"सीने में ऐसा भी कोई अरमान होता है
जैसे कि बाँध तोड़ता तूफ़ान होता है
पलड़ा हमेशा उसका ही भारी है दोस्तो
यारों के बीच शख्स जो धनवान होता है
हर ठोर रौनकें हों ज़रूरी तो ये नहीं
फूलों भरा बगीचा भी सुनसान होता है
मौक़ा मिले तो आप कभी जाके देखिए
घर में फ़क़ीर के सभी का मान होता है
उड़ते हैं इक क़तार में वे किस कमाल से
दिल सारसों को देख के हैरान होता है
अपनी ही कहने वाला ये माने न माने पर
सच तो यही है वो बड़ा नादान होता है
ए `प्राण` नेक बन्दों की जग में कमी नहीं
इन्सान में भी देव या भगवान होता है".... इन्सान में इंसानियत हो तो देवता नज़र आता है , हैवानियत की चर्चा क्या !

अगली चर्चा के साथ मिलती हूँ .... तब तक के लिए आज्ञा दीजिये...

रश्मि प्रभा

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (18) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १८ वां भाग ...
 

बादलों की गर्जना में , रिमझिम बारिश में , सिहरती हवाओं में ढेर सारे शब्द होते हैं , चुम्बक बना मन उनको लेता है और पिरो देता है .....बारिश से भीगी मिट्टी की सोंधी गंध सोधे सोंधे शब्द दे जाती है , सोंधे शब्द तपते मन को राहत देते हैं , पर जाने क्यूँ कभी कभी ऐसा भी होता है-
अमित श्रीवास्तव http://amit-nivedit.blogspot.com/2011/04/blog-post_20.html
"मै शाहखर्च नहीं,
शब्दों को खर्चने में,
पर क्या रिश्तों की भी,
नीलामी होती है,
जो ज्यादा शब्दों की,
बोली लगाएगा,
वही जीतेगा |" शब्दों में जीत क्या हार क्या ... नाप तौलकर बोले गए शब्दों से कुछ नहीं मिलता . यह तो स्वतः बनता है और कभी बिगड़ भी जाता है . परीक्षक की दृष्टि हो तो सारे शब्दों पर स्याही गिर जाती है , ऐसा भी होता है !

पर तर्क को कुतर्क बनाकर जीतने में क्या मिलेगा ? मन से भाग लोगे क्या ?

निधि टंडन http://zindaginaamaa.blogspot.com/2011/04/blog-post_19.html में कुछ ऐसे ही सवालों के साथ हैं ,
"एक बात पूछूँ ,तुमसे..........
कि
तुम यह कैसे कर पाते हो कि ..
जब तुमसे गलती हो जाती है
तब इतनी ढिठाई से .....
तर्क पे तर्क करते रहते हो
बिना शर्मसार हुए .
तुम तब तक यह सब करते हो
जब तक मुझे एहसास नहीं करा देते
कि
जो गलती तुमने करी
उसका कारण भी मैं ही हूँ ." कुछ लोगों को इसीमें सुकून मिलता है , खुद को बेदाग़ दिखाने में वे अपनी शान समझते हैं ! उनसे प्रश्न भी व्यर्थ है - क्योंकि अपने सवालों के चक्रव्यूह में वे खुद चिडचिडे बने रहते हैं !

भिन्न भिन्न सांचे , भिन्न भिन्न खोज -
प्रकृति भी तो बदल गई , नीरज गोस्वामी आज में पहले की खुशबू ढूंढ रहे हैं , http://ngoswami.blogspot.com/2011/07/blog-post_25.html
"कोयल की कूक मोर का नर्तन कहाँ गया
पत्थर कहॉं से आये हैं गुलशन कहॉं गया
दड़बों में कैद हो गये,शहरों के आदमी
दहलीज़ खो गयी कहॉं , ऑंगन कहॉं गया।" जाने कहाँ ! पहले तो कोयल अपनी कूक से परेशान कर देती थी , अब इमारतों के बीच कूक खो गई है ... कभी मिले तो कोई इत्तला करना हमें भी .

तब तक बढ़ते हैं अमर प्रेम के जलते दीपक के निकट ...
"तू भावों की थाली सजा
आस दीप में
कम्पायमान अरमानों की
लौ को प्रखर कर
जिन्दगी को उजास देती है." ... अँधेरा कैसा भी हो , यह विश्वास ही प्रोज्ज्वलित होता है और प्रेरणा बनता है .
वरना एक गुमसुम ख़ामोशी के अँधेरे में कुछ नहीं दिखता -

"इस गुमसुम खामोशी में
ख्यालों की आंधियां लाते
अनसुलझे सवालों में
धूपिल छाँव तलाशते
कैसे हैं ये जज्बात !" किनारे की तलाश , आत्मिक सुकून की चाह से भरे होते हैं जज़्बात ... तूफानों को चीरकर निकलते हैं

जज़्बात के तारों पर उंगलियाँ रखिये , एक धुन तलाशिये ..... मैं जाकर आती हूँ...

रश्मि प्रभा

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (17) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १७ वां भाग ...
 

आँखों में एक नशा होता है , नशा ख्यालों का , नशा उसे जीने का .... कतरा कतरा उतरता जाता है सीने में , सुलगता जाता है ! यह आग ही ऐसी होती है कि इसकी तपिश से हर कोई गुजरना चाहता है ....... सर चढ़कर बोलता है ये नशा
"उठा है वो गुबार कि अपने वजूद के पांव उखड़ जाएं, चढ़ा है वो बुखार कि तेरे ही जिस्म को पिघला कर फिर अशर्फी में ढ़ल जाए। ऐ मलिका-ए-नील... खोल अपने आंचल कि प्यास का मारा मैं तेरी रूह तक पहुँच जां दे सकूं। हटा वो परदा कि मेरे अंदर का सन्नाटा तेरे रानाईयों में जज्ब हो जाए। " इश्क का बुखार चढ़ता है तो चढ़ता ही जाता है ...

कहीं इश्क कहीं ज़िन्दगी के दाव पेंच - शतरंज की बिसात और स्थिति !

"थक गया मैं पूरी ज़िन्दगी शतरंज खेलते ...
मेरे सारे सैनिक खोटे निकले" बचपन जब मासूमियत के बिस्तरे पर ख्वाब देखता है तो क्षणांश को भी यह ख्याल नहीं आता कि न सिकंदर रहेंगे न रहेगा अपने होने का सुकून , होगी सिर्फ थकान और हर खेल से विरक्त मन !

ख़्वाबों की उड़ान बड़ी ऊँची , बड़ी ज़बरदस्त होती है .... एक सूरज की कौन कहे , ख़्वाबों में उभरे कई सूरज हथेलियों में रहते हैं - इस उड़ान के आगे बुद्धि भी हैरां होती है -

"ख्वाब परिंदों की तरह होते हैं
छूना चाहो तो ये उड़ जाते हैं
और फिर हाथ नहीं आते हैं ..." एक तो ज़िन्दगी की रफ़्तार , उस पर ख्वाब - कई बार ठेस लगती है, जाने अनजाने - रिसता है खून या रिसता है मन , कौन जाने !

पर डरना क्या ... हौसला है ज़िन्दगी से हर हिसाब किताब करने का .
"आ जिंदगी तू आज मेरा कर हिसाब कर
या हर जबाब दे, या मुझे लाजबाब कर " प्रश्न ज़िन्दगी से भी है , उसके जवाब का भी इंतज़ार है ... इंतज़ार है वो कुछ ऐसा कह जाए कि अपना आप लाजवाब हो जाए ...

तो जीवन की तमाम राहों से आप रूबरू हों तब तक.... मैं आती हूँ कुछ नए एहसास लिए ...

रश्मि प्रभा

रविवार, 25 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (16) - ब्लॉग बुलेटिन

ब्लॉग बुलेटिन की पूरी टीम की ओर से आप सब को ... 



Merry Christmas!
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कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १६ वां भाग ...
 



पहला अनुभव माँ बनने का - शब्दों से परे है यह एहसास , जहाँ बचपन के गुडिया घर में कोई अपना आनेवाला होता है - एक पूरी ज़िन्दगी और माँ , एक अद्वैत रिश्ता ..... ईश्वर ने अपने निर्माण यज्ञ में माँ को बहुत उंचा स्थान दिया . ९ महीने किसी को अपने भीतर जीना , फिर एक एक बूंद दूध से उसे पालना , उसकी लोरी बन जाना - ..... सोचने से ही देवालय में होने सा लगता है . पर , एक बेटे की चाह में माँ के एहसासों की धज्जियां उड़ जाती हैं ....

"कूड़े के ढेर पर दो नवजात बच्चियां
बचा ली गईं ... " अखबार की यह सुर्खियाँ आँखों से बहती भी नहीं , न ही अन्दर कोई विस्फोट होता है , पर सोच के सारे स्रोत विस्मित होते हैं , क्या हैवानियत इससे अलग होती है . अपने खून को खून से रंगना इतना सरल होता है , स्वार्थ इतना बेरहम !!!

भीड़ में भीड़ से परे कई चेहरे ऐसे होते हैं , जो न कहकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं ....

ज्योति मिश्रा http://hindiscribbles.blogspot.com/2011/12/blog-post.html
"वो चेहरा, भीड़ में
सुबकता, अकेला एक कोने में |
कुछ तो गलत हुआ था, उसके साथ |
वो आंसू पोंछते, उसके आंसू भरे हाथ |
बहुत अजीब था, वो सब देखना
उससे भी ज्यादा अजीब था,
उसका यूँ इस तरह, इतना अकेला होना |" सबकी अपनी बेबसी , ... जीवन पर मृत्यु की छाया , क्या अर्थ है इन साँसों को , ये तो चलते हुए भी रुके होते हैं -

विचार थमते नहीं ... 20 , 40 , 80 की रफ़्तार से दौड़ते रहते हैं मन के रास्तों पर ... काबू में लाते हुए एक अजीब सी आवाज़ होती है , अँधेरे का भी खौफ होता है -
"मेरा मन एक धुआंधार ट्राफिक वाला रस्ता ।
विचारों के छोटे, बडे , मझोले वाहन, बेछूट दौडते हुए । बडे विचार, छोटे विचार खरे विचार, खोटे विचार बुरे विचार, अच्छे विचार झूटे विचार, सच्चे विचार निरंतर दौडते रहते हैं साइकिलों, तिपहियों, कारों, बसों और ट्रकों की तरह । मै चाह कर भी इन्हे रोक नही पाती रोक सकती नही ।" ऊपर से ऐसा कुछ कहाँ पता चलता है , पर अन्दर आकस्मिक तोड़फोड़ होती रहती है और कांच बिखरे होते हैं .... खुद ही हटाओ , खुद ही रास्ते साफ़ करो - अगली रफ़्तार के लिए !

पर ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुकाम , वो फिर नहीं आते -

"पर इस बार वो नहीं होगी
अपनी क्लास में केक काटने के लिए
और उसका चेहरा chocolate और Cream से
नहाया हुआ नहीं होगा" चलते चलते छूट जाता है जो चेहरा , वह यादों में होता है- नज़र नहीं आता . और हर साल किसी ख़ास दिन मन के दरवाज़े को जोर जोर से खटखटाता है ....
बन्द कर देने से दरवाज़े बन्द नहीं हो जाते ...
अपर्णा भटनागर http://manuparna.blogspot.com/2011/01/blog-post_24.html
"मैं उन्हें जानती हूँ
उनकी विधवा देह पर
कई रजनीगंधा सरसराते हैं
अपनी सुरभि से लिखती हैं वे
सफ़ेद फूल
और रातभर कोई धूमिल अँधेरा
ढरकता है
चौखट पर जलता रहता है
देह का स्यापा ." मौसम कितना भी बदल जाए , बसंत के एहसास मर तो नहीं जाते ! गंगा बाँध में कहाँ बंधती है ....

जो ना बंध पाए , उसपे चिंतन कैसा , बस समझना है ख़ामोशी से .... तो आप खामोश सोचिये , मैं कुछ और किनारों के हलचल लिए हाज़िर होती हूँ ...


रश्मि प्रभा

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (15) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १५ वां भाग ...

 



बड़ी बड़ी आँखों में बड़े बड़े सपने
हारना फितरत नहीं
और किसी के सपने मरते देखना
स्वीकार नहीं ...
कुछ नहीं था गुड़िया के पास
न हीरे जवाहरात , न महल
न ढेर सारे पैसे , न कोई जादुई छड़ी
उसके पास था हौसला ...
सपने दिखाने की
पूरे करने की निष्ठा
अपने सपनों की कीमत पर
सबके सपने पूरे करती .... शब्दों के उड़नखटोले पर बादलों से बातें करते वह कभी हँस बन गई , भावों के महारथियों के द्वार से शब्दों के दाने चुगे , कभी गौरैया बन किसी पेड़ पर घोंसला बनाया और सभी पक्षियों को बुला लिया . यह अवलोकन का मंच एक घोंसला ही है , कीमती दाने .... बस चुगते जाना है , जाने कब लम्बी उड़ान भरनी हो ! तो पंखों की मजबूती कायम रहे ..................

"सच को कहना सच को मनन करना
बहुत जरूरी होता है
तभी वह एक आवाज बनता है
जो टकरा सकता है
हर तूफान से जिसमें होती है
वह शक्ति
जो दस्‍तक देती है हर दरवाजे पर
जहां सोई हुई रूहें जाग जाती हैं
और हौसले बुलन्‍द हो
एक आवाज बनते हैं ..... !!! " एक एक झूठ क्षणिक मार्ग तो खोलता है, पर आत्मा पर बोझ होता है ! सच के रास्ते कठिन होते हैं , पर उसीमें सुकून होता है ... उस जीत को मनाओ न मनाओ , मन में ख़ुशी का जश्न होता है .

जीवन के सफ़र में सबको जाना है बारी बारी तो आते रहना भी है बारी बारी .... एहसासों का वही काफिला निकलता है - ये अलग बात है कि कभी उसने कहा कभी मैंने कभी वो कहेगा ... सूर्य की प्रथम रश्मि वही होगी , जिसे कवि पन्त ने देखा - उन्होंने विहंगिनी से प्रश्न किया , तुम कुछ और कहोगे पर भाव मिलते रहेंगे .

अविनाश वाचस्पति http://www.nukkadh.com/2011/11/blog-post_2539.html
"पिंजरे में सिर्फ
बुलबुलें ही कैद
नहीं की जातीं
तोते भी किए
जाते हैं बंद
तोते यूं तो
काटते नहीं है
बंद हों पिंजरे में
और दिखाओ ऊंगली
तो काट लेते हैं।" भावनाओं के प्रवाह थमते नहीं , सत्य की आड़ में सत्य कहते हुए पिजरे के अन्दर की घुटन, झुंझलाहट समझता है .

इक फौजी के दिल के एहसास और उनकी ख्वाहिशें हमसे अलग नहीं होतीं , वह फौलादी दिल लिए मुस्कुराता तो है ,'रंग दे बसंती चोला ' गाता तो है , सरफरोशी की तमन्ना लिए सीमा पर खड़ा रहता तो है ..... पर बासंती हवाएँ उनको भी सहलाती हैं , सोहणी उनको भी बुलाती हैं ..... कुछ इस तरह -


"जब तौलिये से कसमसाकर ज़ुल्फ उसकी खुल गयी
फिर बालकोनी में हमारे झूम कर बारिश गिरी " सच तो है घर से दूर सरहद के पास - पुरवा की शोख अदाएं झटक के बातों को ,इनके दिल में भी चुपके से सुगबुगाती है ...

प्यार के एहसास कितने महीन होते हैं , ख्वाब की उड़ान कितनी अनोखी होती है - दिल कुछ भी सोचता है , पर सच ही तो होता है ...

"तुम्हारे घर की बंद खिड़की के बाहर
मैंने अपने आँचल में बंधे
खूबसूरत यादों के सारे के सारे पुष्पहार
बहुत आहिस्ता से नीचे रख दिये थे !
सुबह उठ कर ताज़ी हवा के लिये
जब तुमने खिड़की खोली होगी
तो उनकी खुशबू से तुम्हारे
आस पास की फिजां
महक तो उठी थी ना ?" बस यही कहने का दिल करता है , रिश्तों की उम्र बड़ी छोटी है कोई एक पल के लिए कोई दो पल के लिए ,वक़्त खो जाये उससे पहले
- आओ एक अपना घर बना लें हम भी !

वरना जाने कब कोई नज़्म उदास हो जाए ...
" मैं लौट आती हूँ वहाँ , जहाँ
लहर ठहरी हुई थी .....
देखती हूँ वह मुहब्बत तमाम के शब्द
मिटाए जा रही थी .....
रेत से ...पानी से ...दरख्तों से ...पत्तों से
मुस्कुराहटों से ..हँसी से ...पलकों से
वह आईने के सामने खड़ी होकर
दुपट्टा ओढ़ती है .....
और फिर उसके टुकड़े टुकड़े कर
फेंक़ देती है समुंदर में .." सच कहते हैं लोग - कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिजाज़ !

ऐसे में दिगम्बर नासवा http://swapnmere.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html सही फरमाते हैं ,
"बाजुओं का दम अगर है तोलना
वक्त से पंजा लड़ा कर देखिये " समय हौसलों की परख रखता है , बदले मिजाज़ में नरमी लाता है ...
जब तक नरमी है मिजाज़ में पढ़ते जाइये , मैं अगली उड़ान भरती हूँ ....

रश्मि प्रभा

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (14) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १४ वां भाग ...
 

"हींग टिंग झट बोल चिंग चिंग पा
खुल जारे ताले झट से फटाक....
काबुलीवाले , चलो यहाँ से भाग निकलें .
ओहो काबुलीवाले ,
बन्द कमरे से निकलो ...
देखो बाहर निकलकर कितने ज्ञानी लोग हैं !
.............. अच्छा काबुलीवाले तेरी झोली में क्या है ?
जादू की कलम , जादू की कलम
इससे लिखें चलो एक कहानी हम !" रुको , रुको हम बाद में लिखेंगे , अभी देखें कि जादू की कलम से औरों ने क्या लिखा है ...
धर्मेन्द्र कुमार सिंह http://www.dkspoet.in/2011/11/blog-post_24.html
"कविता लिखना
जैसे चाय बनाना
कभी चायपत्ती ज्यादा हो जाती है
कभी चीनी, कभी पानी, कभी दूध
कभी तुलसी की पत्तियाँ डालना भूल जाता हूँ
कभी इलायची, कभी अदरक
मगर अच्छी बात ये है
कि ज्यादातर लोग भूल चुके हैं
कि चाय में तुलसी की पत्तियाँ
अदरक और इलायची भी पड़ते हैं " अपरोक्ष कुछ भी नहीं कहा है कवि ने ... कविता बिल्कुल चाय जैसी . अदरक , इलायची तो बाद में - पहले तो पत्तियाँ अलग अलग - गोल दानेदार , लम्बी हरी पत्ती... पानी, दूध , शक्कर का सही अनुपात ....... पर पसंद अपनी अपनी . है न ?

ए काबुलीवाले भरते जाओ अपनी झोली में ये कलम .... तुम आराम से बैठो , मैं ढूंढ कर चुपके से रखती हूँ ...
सुना काबुलीवाले , अमृता का मकान बिक गया ... मैं तो बड़ा रोई ... अंजू ने लिखा है इसमें http://anjuananya.blogspot.com/2011/11/blog-post_15.html
"साहित्य जगत में खलबली है ,सवालों की बारिशें हैं , हर नजर इमरोज़ की मोहब्बत पर सवाल करने को आतुर है..???????????.. पर इमरोज़ किससे साँझा करे..? और क्यूँ करे ?जब ये मकान घर बना ,सवाल तब भी उठे थे... दर्द तब भी मिला था,पर हौंसला था....आज मकान (घर नहीं)बिका तो फिर वही सवाल ...." सवाल उठाना बहुत आसान होता है , और जब कोई जवाब न दे तो अनुमान के घोड़े दौड़ाना इंसानी फितरत है . बचना चाहोगे तो चुप रहोगे , पर अनुमान से कोई नहीं बचा है .... लगाने दो अनुमान !

फिर भी एकांत में दिल घबराये तो प्रतिभा कटियार की सुनो http://pratibhakatiyar.blogspot.com/2011/10/blog-post.html
"चीखो दोस्त
जितनी तेजी से तुम चीख सकते हो
इतनी तेज की गले की नसें
फटकर बहार निकल आयें
और तुम्हारी आवाज
दुनिया का हर कोना हिला दे." ख़ामोशी इतनी भी अच्छी नहीं कि सामनेवाला तुम्हें गुनहगार ही सिद्ध कर दे और तुम घुटते रहो और दिमाग की नसें फट जाएँ . उदाहरण बनने के लिए कभी कभी चीखना भी होता है .........

पता है काबुलीवाले , आलस बुरी बला है ... पर आजकल तो ब्रह्ममुहूर्त का समय ही बदल गया . भले सूरज अपने समय से निकले , पर उठने का समय , सोने का समय - सब बदल गया है .
गुंज झाझारिया की सुनो http://lekhikagunj.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html
"आज सुबह मैंने पूछा आलस्य से,
" भाई, तुम क्यूँ मुझे इतना सताते हो?
हर समय बिन बुलाये मेहमान के जैसे आस-पास
मंडराते हो!
मुझे नहीं पसंद है यूँ तुम्हारा आना,
तुम्हारे आने से ही तो मेरे काम अधूरे रह जाते हैं!
मेरे नाम न कमाने की,
धन न पाने की एक-मात्र वजह तुम ही हो!" पर आलस्य भी ज़रूरी है , ऐसा आलस्य भी कहता है - !!!

जब तक हम होते हैं , हमें लगता है - हमारे बगैर ये काम नहीं हो सकता , पर जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है - हाँ चाहो न चाहो , चलना होता है, चलना आ जाता है .
" मेरी माँ
जीती रही इसी भरम मैं ;
कि उसके बिना ,
बच्चे रह न सकेंगे
अब वो नहीं है |
अब मैं जी रही हूँ
इसी भरम मैं |" सच पूछो तो माँ का यह भरम नहीं , माँ को खुद पर विश्वास होता है अपने बच्चों के सुख को लेकर ...

कम शब्दों में भी कोई कितना कुछ कह जाता है न काबुलीवाले , यह भी एक कला है -
विभा रानी श्रीवास्तव http://vranishrivastava.blogspot.com/2011/10/blog-post.html
"जिन्दगी में कई बार ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ता हैं जो बाद में मृगतृष्णा ही साबित होता हैं…. " सच , कई बार रास्ते गुमशुदा ही रह जाते हैं ...

काबुलीवाले अब सबकुछ समेटो और चलो - कुछ और कलम तलाशें...


रश्मि प्रभा   

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (13) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १३ वां भाग ...
 

प्रकृति एक अजूबा है ... टकटकी लगाए देखो तो हर तरफ एक जादू है , बरबस होंठों पर यह गीत मचलता है - ' ये कौन चित्रकार है !...' सच यह जादू कौन कर गया , कौन करता जाता है ... कुछ ज्ञात नहीं ... सूरज की किरणें , पंछियों का सुगबुगाना, मुर्गे की बांग .... चढ़ती दोपहरी , पश्चिम से ओझल होता सूरज , पानी की कलकल का साज बदलना , चाँद , चकोर , सितारे ... कितने नाम लिखूं , जादूगर ने तो सारी धरती , आकाश को भर दिया . उपमाएं भी इस जादू का ही ...प्रकृति ने तो बस दिया - पर ,

"पुष्प
जीते हैं उल्लास से
अपनी क्षणभंगुरता को
नहीं जानते जीना है कितना
फिर भी बांटते हैं
गंध के गौरव को रंग की उमंग को
क्यूँ नहीं जी पाते
हम भी
यूँ ही
क्षणजीवी होने का बोध " प्रकृति की सीख से परे हम - स्वार्थी होते जाते हैं !

फूलों का रथ ,प्रतिभा सक्सेना http://lambikavitayen5.blogspot.com/2011/10/blog-post.html
" हे सर्व-कलामयी ,तुम्हारी अभ्यर्थना की तैयारियाँ हैं ये . शीत की रुक्ष विवर्णा धरती पर तुम कैसे चरण धरोगी ? पहले पुलकित धरा पर हरियाली के पाँवड़े बिछें , विविध रंगों के पुष्प वातावरण को सुरभि- सौंदर्य से आपूर्ण करें,दिग्वधुएँ मंगल-घट धरे आगमन -पथ में ओस-बिन्दु छींटती अर्घ्य समर्पित करती चलें, पक्षियों के स्वागत-गान से मुखरित परिवेश हो ,निर्मल नभ शुभ्र आलोक बिखेर तुम्हारे स्वागत को प्रस्तुत हो तब तो तुम्हारा पदार्पण हो !" ऐसा स्वागत , चहुँ दिशा उल्लसित और कलम के पोर पोर में बासंती छटा.

परिंदों को कभी सुना है ? सुना होगा ... उनका वियोग , उनका मिलन एक अनोखा रिश्ता बनाते हैं हमारे साथ !
"उनकी आँखों में एक विश्वास था
मिलन की चाह थी
अब कभी जुदा न होने का
एक मौन संकल्प था
हमेशा एक ही रहने का
जूनून था ....

दूर ~~~से आवाज आ रही थी --
''हमे मिलना ही था हमदम ,किसी राह भी निकलते " जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि.... यदि तुम्हारे पास मन है तो तुम उस भाषा को भी समझ लोगे जिसे तुम बोल नहीं सकते . इसे समझना आसान नहीं तो कठिन भी नहीं ...

इस कमाल को सोचिये , जानिए और कुछ कहिये ---- मैं कुछ और खजाने लाती हूँ ...


रश्मि प्रभा  

लेखागार