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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (19) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १९ वां भाग ...



मैं ख्यालों की एक बूंद
सूरज की बाहों में कैद
आकाश तक जाती हूँ
बादलों के सीने में छुपकर
धरती की रगों तक बहती हूँ
कभी फूल, कभी वृक्ष में सौन्दर्य
कभी गेहूं - कभी धान में समाकर
गरीबों की थाली में सुकून बन
ईश्वर का मंत्र बन जाती हूँ ......... मैं ख्यालों की एक बूंद हूँ !

पुरानी संदूक में मैं तह दर तह होती हूँ , कभी खोलो तो धूप दिखानी ही होती है . बूंद बूंद नमी होती है संदूक में , जो कभी आँखों में छुप जाती है , कभी एहसासों में तैरती पन्नों पर उतर आती है -

"पर सुनो तो
मैंने फिर से उस संदुकची में
लगा दिया एक नया ताला
क्योंकि उन सहेजे यादों
को फिर से नहीं चाहता
अपने सामने देखना
क्योंकि मैंने और उसने
सीख लिया है
नए जीवन में सांस लेना ..." एक दर्द का सैलाब फिर से बहा ले जाए , तो होना क्या है ! अतीत से यादों के सिवा कुछ बाहर भी तो नहीं आता . डॉ ढूंढता रहे मर्ज़ की दवा , उससे पहले संदुकची में ताला लगा दो . आवाज़े दूर तक पीछा करेंगी , लेकिन अनसुना करना होगा आगे बढ़ने के लिए !

आगे बढ़ते हुए , पीछे के निशां अनुकरणीय ना बने तो जीने का कोई अर्थ नहीं ...

त्रिलोक सिंह ठकुरेला http://triloksinghthakurela3.blogspot.com/2011/11/blog-post_8230.html
"पक्षपात, अन्याय को देख रहे जो मौन।
‘ठकुरेला’ संसार मे उसे मान दे कौन।।" अन्याय सहना , अन्याय होते देखना व्यक्ति को दर्शाता है . सहते हुए अन्याय को बढ़ावा देना , देखकर आगे बढ़ जाना - दोनों सही नहीं है . तो इस बात का अर्थ समझिये और आगत को एक अर्थ दीजिये .
राजेंद्र तेला जी ने इसी को मायने दिए हैं http://www.nirantarajmer.com/2011/10/blog-post_168.html
"बुरे को बुरा ना कहूं
अच्छे को अच्छा
ना कहूं
ये मुमकिन ही नहीं
मेरी फितरत मुझे
झूंठ बोलने देती नहीं
आदत से मजबूर हूँ" सच बोलना चाहिए , ... अप्रिय हो तो भी , हाँ स्थान , वक़्त और लहजे का ख्याल रखना ही चाहिए .

गुजरे कल और आज के बीच यादों का , संघर्ष का , खोने और पाने का एक कारवां सा होता है -

मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी" http://naiqalam.blogspot.com/2011/06/blog-post.html
"तंगहाली की वो आइसक्रीम
चन्द रुपयों के वो तरबूज
किसी गली के नुक्कड़ की वो चाट
सुबह- सुबह
पूड़ी और जलेबी की तेरी फरमाइश
मुझे आज भी याद है
कैसे भूल जाऊं" इसे लिखते हुए देवदास की पारो के स्वर मुखर हो उठे - ' देवा ओ देवाआआआ..." कैसे कोई भूल जाए उन पलों को , जहाँ से ज़िन्दगी को पंख लगे या जहाँ ज़िन्दगी ने दूसरे को पंख दिए या जहाँ पंख टूट गए . यादों की सुनामी में कभी डूब जाता है मन , कभी नई ज़िन्दगी पा लेता है .

मन कभी स्थिर नहीं होता , एक जगह शरीर को रख संसार की परिक्रमा करता है - बिना टिकट , बिना मशक्कत , किसी को पता भी नहीं चलता ...

"तिमिर के उस पार
जाना चाहती हूँ
एक नया गीत
लिखना चाहती हूँ
मैं और मेरे गीत
खुद को पढूं और
खुद को लिखूं
मेरे बाद इसे
पढना हैं किसने
कागज़ और कलम
के ज़रिये ...
मैं और मेरे गीत " मन की उड़ान , मन की चाह - भला देर किस बात की . अपने सुकून को पाना है , खुद से खुद को जानना है !

कई बार खुद से परे वह नज़र आता है, जिससे कोई रिश्ता न होकर भी एक रिश्ता बन ही जाता है . कोई नाम नहीं , पहचान नहीं , पर अपरिचित भी नहीं !

राजेश उत्साही http://gullakapni.blogspot.com/2011_01_01_archive.html
"बैग में किताबें नहीं होतीं
पर असली ज्ञान होता है जीविका ..." इसे कहते हैं अपना अपना नज़रिया . कोई ऊपर ऊपर ही सबकुछ जीता है , कोई रद्दी की टोकरी में भी बहुत कुछ ढूंढ लेता है .

चलिए चर्चित गज़लकार प्राण शर्मा जी की पसंद की ग़ज़ल से मुखातिब होते हैं -
"सीने में ऐसा भी कोई अरमान होता है
जैसे कि बाँध तोड़ता तूफ़ान होता है
पलड़ा हमेशा उसका ही भारी है दोस्तो
यारों के बीच शख्स जो धनवान होता है
हर ठोर रौनकें हों ज़रूरी तो ये नहीं
फूलों भरा बगीचा भी सुनसान होता है
मौक़ा मिले तो आप कभी जाके देखिए
घर में फ़क़ीर के सभी का मान होता है
उड़ते हैं इक क़तार में वे किस कमाल से
दिल सारसों को देख के हैरान होता है
अपनी ही कहने वाला ये माने न माने पर
सच तो यही है वो बड़ा नादान होता है
ए `प्राण` नेक बन्दों की जग में कमी नहीं
इन्सान में भी देव या भगवान होता है".... इन्सान में इंसानियत हो तो देवता नज़र आता है , हैवानियत की चर्चा क्या !

अगली चर्चा के साथ मिलती हूँ .... तब तक के लिए आज्ञा दीजिये...

रश्मि प्रभा

32 टिप्पणियाँ:

sonal ने कहा…

badhiyaa

राजेश उत्‍साही ने कहा…

शुक्रिया रश्मि जी।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

पूरे वर्ष की धरोहर है यह श्रृंखला

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

नए ब्लोगोन से परिचित होना अच्छा लगा।


सादर

vandan gupta ने कहा…

आज तो कमाल के मोती संजोये हैं सभी एक से बढकर एक हैं…………यात्रा बहुत बढिया चल रही है।

अनुपमा पाठक ने कहा…

इस श्रृंखला को याद रखा जाएगा हमेशा!
आपको इस महत कार्य के लिए बधाई!

Amrita Tanmay ने कहा…

बहुत बढिया श्रृंखला..

Anupama Tripathi ने कहा…

आभार रश्मि दी इस शुभ कार्य के लिए ....बहुत बढ़िया श्रंखला ....!!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत ही नायाब हीरा ढ़ूंढ़ कर आपने पेश किय है।

सुज्ञ ने कहा…

अविरल प्रस्तुति

JAINA ने कहा…

bhut hi umda

Rakesh ने कहा…

हर बात जुबान से कह दू ये जरूरी तो नहीं, उम्र गुजारी है आधी पूरी तो नहीं, दूर जरूर है आपकी निगाहों से, पर दिल की दिल से दूरी तो नहीं.

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

:)))) .... achchha lagta hai, jab bade bloggers ke saath main khud ko pata hoon!!
Rashmi di ne mujhe jo ahmiyat di hai... uska shukriya kya kahna... par khushi milti hai:)

Gunjan ने कहा…

कविताओं की तारीफ करूँ ... या आपके लिखे का रश्मि दी
जितनी खुबसूरत आप रचनायें छांट कर लती हैं .. अपने पाठकों के लिए
उससे भी सुंदर होता है आपका लेखन .. अहा मन को जुड़ा देता है
सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई इतनी बढ़िया रचनाओं के लिए
n hands down to U ..... दी

सदा ने कहा…

सभी को पढ़ना बहुत अच्‍छा लगा आपकी कलम से ... सभी रचनाकारों को बधाई आपका बहुत-बहुत आभार ।

नीलिमा शर्मा ने कहा…

karwa banta gya jab ek ne dooze ko mana ........... sabko bahut bahut naman ..........pls aap sab aise hi likhte rahiye taki ham jaise ko bhi inspirations mile

shikha varshney ने कहा…

इस साल में संग्रहणीय है यह श्रृंखला.

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

अवलोकन-२०११ के माध्यम से ब्लॉगरों की सृजनात्मक सोच और नई-नई अवधारणाओं से आप लगातार अवगत करा रही है, इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी....व्यस्तता के कारण सारे पोस्ट तो नहीं पढ़ पाया, किन्तु जितना ही पढ़ा उसमें समग्रता का विस्तार पाया ....आपकी मेहनत सार्थक रही है रश्मि जी !

Nirantar ने कहा…

Selections of poems much beyond my expectations
I shall have to speak the truth and confess honestly.No praise enough for such hard work done with honesty,commitment and integerity
मेरी फितरत मुझे
झूंठ बोलने देती नहीं
आदत से मजबूर हूँ"

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आज अवलोकन का १९ वां भाग आया है ... सिर्फ़ २ और भाग आने बाकी है ... इस पूरी यात्रा को आपने अपने लेखन के अनूठेपन से और भी रोचक बना दिया ... आभार और नमन आपको !

कविता रावत ने कहा…

bahut badiya bulletin prastuti... aabhar!

वाणी गीत ने कहा…

मन कभी स्थिर नहीं होता ...
मिले जुले इन्द्रधनुषी रंग है रचनाओं के !

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

शुक्रिया ...आभार

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

बहुत अच्छी श्रृंखला!!

Neelam ने कहा…

सभी को पढ़ना बहुत अच्‍छा लगा आपकी कलम से ... सभी रचनाकारों को बधाई आपका बहुत-बहुत आभार ।

अजय कुमार झा ने कहा…

वर्ष २०११ के लिए एक संदर्भ श्रंखला तैयार की रश्मि जी ने । इससे बेहतर अंत इस वर्ष का कोई और हो भी नहीं सकता । रश्मि जी का बहुत बहुत आभार

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bahut acchhe links mile. aabhar.

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

कविताओं की तारीफ करूँ ..या आपके लिखे हुए अंदाज का..... ;)
जितनी खुबसूरत आप रचनायें , छांट कर लेती हैं..... ,
उससे भी सुंदर होता है , आपका लेखन...... मन प्रसन्न हो जाता है.... :):)

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

bahut badhiya .....

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

mukesh ko padhna hmesha achha lagta hei ..der se likhte hei ..par satik likhte hei ..

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

:))) thanx Darshan jee, aapne mere liye specially likha

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

लग रहा है कि वर्ष का उत्कृष्ट अध्याय पढ़ रहे हैं।

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