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मंगलवार, 31 जुलाई 2018

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की १३८ वीं जयंती

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

प्रेमचंद (३१ जुलाई १८८० – ८ अक्टूबर १९३६) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है।उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी (विद्वान) संपादक थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में, जब हिन्दी में तकनीकी सुविधाओं का अभाव था, उनका योगदान अतुलनीय है। प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्‍य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्‍यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं। 

जीवन परिचय

प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे। उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी से हुआ और जीवनयापन का अध्यापन से पढ़ने का शौक उन्‍हें बचपन से ही लग गया। 13 साल की उम्र में ही उन्‍होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्‍यासों से परिचय प्राप्‍त कर लिया। १८९८ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।१९१० में उन्‍होंने अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास लेकर इंटर पास किया और १९१९ में बी.ए. पास करने के बाद शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए।

सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो जाने के कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। उनका पहला विवाह उन दिनों की परंपरा के अनुसार पंद्रह साल की उम्र में हुआ जो सफल नहीं रहा। वे आर्य समाज से प्रभावित रहे, जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और १९०६ में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। उनकी तीन संताने हुईं- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव। १९१० में उनकी रचना सोजे-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर नष्ट कर दी गईं। कलेक्टर ने नवाबराय को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। इस समय तक प्रेमचंद, धनपत राय नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे। उन्‍होंने आरंभिक लेखन ज़माना पत्रिका में ही किया। जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े। उनका उपन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका और लम्बी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया। उनका अंतिम उपन्यास मंगल सूत्र उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया। 
 
मुंशी प्रेमचंद जी के बारे में और विस्तार से जानने के लिए यहाँ पढ़ें |
 
 
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की १३८ वीं जयंती पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से उनको सादर नमन | 
 
सादर आपका 
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दोहे "मुंशी प्रेमचन्द जयन्ती पर विशेष" 

अमिताभ, जिन्होंने सबसे ज्यादा रोग-ग्रस्त पात्रों को अभिनीत किया !

भरे-पूरे परिवारों का टूटता मनोबल

प्रेमचंद के साहित्य में विद्रोहिणी नारी

ऑडियो: कुत्सा (मुंशी प्रेमचंद)

५४............एक अमर गाथा ( ३१ जुलाई )

" मिड नाईट इंक ...."

अमर शहीद ऊधम सिंह जी की ७८ वीं पुण्यतिथि

पत्र लिखियें और पाईये 50,000/- रूपये इनाम।

सीला सावन

फिल्म 'संजू' : एक आतंकी का महिमामंडन

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

सोमवार, 30 जुलाई 2018

गोविन्द चन्द्र पाण्डे और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
गोविन्द चन्द्र पाण्डे
गोविन्द चन्द्र पाण्डे (अंग्रेज़ी: Govind Chandra Pandey, जन्म- 30 जुलाई, 1923, इलाहाबाद; मृत्यु- 22 मई, 2011, दिल्ली) 20वीं सदी के जाने माने चिंतक, इतिहासवेत्ता, संस्कृतज्ञ तथा सौंदर्यशास्त्री थे। वे संस्कृत, हिब्रू तथा लेटिन आदि अनेक भाषाओं के असाधारण विद्वान, कई पुस्तकों के प्रसिद्ध लेखक तथा हिन्दी कवि भी थे। प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति, बौद्ध दर्शन, साहित्य, इतिहास लेखन तथा दर्शन आदि में गोविन्द चन्द्र पाण्डे को विशेषज्ञता प्राप्त थी। अनेक चर्चित किताबों तथा सैंकड़ों शोध पत्रों के वे लेखक थे। वर्ष 2010 में उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया था।


आज जाने माने चिंतक, इतिहासवेत्ता, संस्कृतज्ञ तथा सौंदर्यशास्त्री गोविन्द चन्द्र पाण्डे जी के 95वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~





आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 29 जुलाई 2018

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी की १२७ वीं पुण्यतिथि

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर (बांग्ला में, ঈশ্বর চন্দ্র বিদ্যাসাগর), के बचपन का नाम ईश्वर चन्द्र बन्दोपाध्याय था। वे बंगाल के पुनर्जागरण के स्तम्भों में से एक थे। इनका जन्म बंगाली ब्राह्मण परिवार में २६ सितम्बर १८२० और इनका निधन २९ जुलाई १८९१ को हुआ। इनका जन्म पश्चीम बंगाल में हुआ था, करमाटांड़ इनकी कर्मभूमी थी। वे उच्चकोटि के विद्वान थे। उनकी विद्वता के कारण ही उन्हें विद्दासागर की उपाधि दी गई थी।

इन्हें सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता है। इन्होंने विधवा पुनर्विवाह के लिए आंदोलन किया और सन 1856 में इस आशय का अधिनियम पारित कराया। 1856-60 के मध्य इन्होने 25 विधवाओ का पुनर्विवाह कराया। इन्होने नारी शिक्षा के लिए भी प्रयास किए और इसी क्रम में Baithun स्कूल की स्थापना की तथा कुल 35 स्कूल खुलवाए। वे नारी शिक्षा के समर्थक थे। उनके प्रयास से ही कलकत्ता में एवं अन्य स्थानों में बहुत अधिक बालिका विद्दालयों की स्थापना हुई। 

उस समय हिन्दु समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत ही सोचनीय थी। उन्होनें विधवा पुनर्विवाह के लिए लोगमत तैयार किया। उन्हीं के प्रयासों से 1856 ई. में विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ। उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से ही किया। उन्होंने बाल विवाह का भी विरोध किया। 

विद्यासागर शैक्षणीक जीवन में बहूत ही बुध्दीमान विद्यार्थी थे। वे एक दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री, लेखक, अनुवादक, मुद्रक, प्रकाशक, उद्यमी, सुधारक एवं मानवतावादी व्यक्ति थे। उन्होने बांग्ला भाषा के गद्य को सरल एवं आधुनिक बनाने का उनका कार्य सदा याद किया जायेगा। उन्होने बांग्ला लिपि के वर्णमाला को भी सरल एवं तर्कसम्मत बनाया। बँगला पढ़ाने के लिए उन्होंने सैकड़ों विद्दालय स्थापित किए तथा रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की। उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास किया। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन भी आरंभ किया। 

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी की १२७ वीं पुण्यतिथि पर उनको शत शत नमन |

सादर आपका

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सीमाओं में कहाँ बँधा है

असफल प्रेमिकाएं- असीमा भट्ट

ब्लॉगर की बात...

बकवास करेगा ‘उलूक’ मकसद क्या है किसी दीवार में खुदवा क्यों नहीं देता है

इतवारनामा: बच्चे बड़े होते हैं, माएं नहीं

२९ जुलाई - भारत की २ महान विभूतियों को समर्पित

‘हॉर्स-ट्रेडिंग’ मुहावरा क्यों बना?

काश नगर में बगुले ना होते

ग़ज़ल

" एक मुट्ठी बारिश ......"

निजाम का स्वर्ण दान ! विवशता या डर ?

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 अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 28 जुलाई 2018

मिट्टी का घर, सोंधे से सपने


घर जब घर हुआ करता था,
मौसम कोई हो,
रिश्ते बड़े कुरकुरे,
मीठे हुआ करते थे ।
जान पहचानवाले चाचा जी, चाची जी भी
कायदे से रहना सीखा सकते थे,
मज़ाल थी किसी की,
जो उनकी अवहेलना कर दे !
बच्चे - बच्चे,
बड़े - बड़े हुआ करते थे ।
सम्मान और लिहाज की रेखा
बहुत मजबूत थी ।
अब तो न कोई घर है ,
ना ही रिश्ते ,
बस "हम अफलातून हैं" जैसे नेमप्लेट हैं
नाम से ज़्यादा गेट की कीमत है ।
भीतर से रिश्ते नहीं,
रोबोट निकलते हैं ,
सारे सम्बोधन ही बदल गए हैं,
...
आलम ये है कि 
रात सोना चाहती है,
उसे एक घर की तलाश है,
और गले लग जानेवाले रिश्तों की  ... 


रवींद्र शर्मा की कलम से 

निर्वासित पेड़ से 
---------------------
इन्हें तुम नहीं समझा पाओगे पेड़
कि गाँव के मिट्टी गारे से बने पुश्तैनी घर
अब तक कैसे खड़े हैं ज्यों के त्यों
और हर बरसात में उनके बूढ़े शरीरों से
सोंधी महक क्यों आती है 
और यहाँ
गारंटीशुदा सीमेंट से बन रही खूबसूरत इमारत
बनने से पहले 
क्यों गिर जाती है ...
इन्हें तुम नहीं समझा पाओगे पेड़
कि मकान के खड़े रहने का संबंध
मन से है
धन से नहीं
और महकने के लिए 
मिट्टी से जुड़ा होना बहुत आवश्यक है.......

रमाकांत सिंह

मानो न मानो 

महल बना लो, संगमरमर बिछवा लीजिये ...

लेकिन माटी की सौंधी महक नहीं तो घर क्या?

मिट्टी का घर म्यार, मुड़का, कड़ी और कडेरी
छत पर बांस का गथना और खपरा हो चाक का

जमीन मिट्टी की हो , बिछा दो छीन की बनी सरकी
जमीन गोबर से लिपी हो, छुही की दीवार पुती

पटाव नीम का पल्ला लगा हो
नीचे हाथ मे बांस का पंखा झलने वाला कोई मिल जाये

दही-बासी और गोंदली संग नूनचरा
पेट मे समय से तालाब नहाकर पड़ जाये
फिर मौत सिरहाने खड़ी हो परवाह नहीं
नींद पत्थर के तकिया में निरभुल आएगी ।

---- दिव्या शुक्ला !! 


बुझ गये सांझे चूल्हे 
------------------------
कहाँ खो गया वो मिटटी का घर 
गोबर से लीपा हुआ अंगना / दलान और दुआर ओसार 
रातों में गमकती महुआ की मादक सुगंध 
नीम की ठंडी छाँव निम्बौली की महक 
आम और जामुन के पेड़ --
चूल्हे में सेंकी रोटी बटुली की खटाई वाली दाल 
आंचल से मुंह ढंके गाँव की नई नवेली भौजाइंया
तर्जनी और मध्यमा ऊँगली से पल्ला थाम 
आँखों से इशारे करती अपने उन को -
और झुक जाती शर्म से पलकें देवरों से नजर मिलते ही 
ननद भाभी की चुहलबाजी देवरों की ठिठोली से गूंजता आंगन 
बीच बीच में अम्मा बाबू की मीठी झिडकी से 
कुछ पल को ठहर जाता सन्नाटा -कहाँ गया यह सब ?
शायेद ईंट के मकान निगल गये मिटटी का सोंधापन
गोबर मिटटी से लीपा आंगन कही खो गया ढह गया दालान 
फिनायल और फ्लोर क्लीनर से पोछा लगी लाबी में बदल गया ओसारा 
भाँय भाँय करने लगा अब बड़ा आंगन अब तो पिछवारे वाली 
गाय भैंस की सरिया भी ढह गई अब कोई नहीं यहाँ -
भाइयों के चूल्हे बंट गए और देवर भाभी के रिश्ते की सहज मिठास में 
गुड़ चीनी की जगह ले ली शुगर फ्री ने / ननद का मायका औपचारिक हुआ 
चुहलबाजी और अधिकार नहीं एक मुस्कान भर बची रहे यही काफी है 
अम्मा बाबू जी अब नहीं डांटते कमाता बेटा है बहू मालकिन 
अब पद परिवर्तन जो हो गया वो बस पीछे वाले कमरे तक सिमट कर रह गए 
उनका भी बंटवारा साल में महीनो के हिसाब से हो गया 
छह बच्चों को आंचल में समेटने वाली माँ भारु हो गई 
जिंदगी भर खट कर हर मांग पूरी करने वाले बाबू जी आउटडेटेड 
अम्मा का कड़क कंठ अब मिमियाने लगा और बाबू जी का दहाड़ता स्वर मौन -
आखिर बुढापा अब इनके भरोसे है अशक्त शरीर कब तक खुद से ढो पायेंगे 
दोनों में से एक तो कभी पहले जाएगा /अम्मा देर तक हाथ थामे रहती है बाबू का ----
और भारी मन से कहती है तुम्ही चले जाओ पहले नहीं तो तुम्हे कौन देखेगा 
हम तो चार बोल सुन लेंगे फिर भी तुम्हारे बिना कहाँ जी पायेंगे -
आ ही जायेंगे जल्दी ही तुम्हारे पीछे पीछे -भर्रा गया गला भीग गई आँखें 
फिर मुंह घुमा कर आंचल से पोंछ लिया हर बरगदाही अमावस पूजते समय 
भर मांग सिंदूर और ऐड़ी भर महावर चाव से लगाती ,चूड़ियों को सहेज कर पहनती सुहागन मरने का असीस मांगती अम्मा आज अपना वैधव्य खुद चुन रहीं हैं -
कैसे छाती पर जांत का पत्थर रख कर बोली होंगी सोच कर कलेजा दरक जाता है -
उधर दूर खड़ी बड़ी बहू देख रही थी अम्मा बाबू का हाथ पकड़ सहला रही थी 
शाम की चाय पर बड़े बेटे से बहू व्यंगात्मक स्वर में कह रही थी
तुम्हारे माँ बाप को बुढौती में रोमांस सूझता है अभी भी ..और बेटा मुस्करा दिया 
पानी लेने जाती अम्मा के कान में यह बोल गर्म तेल से पड़े और वह तो पानी पानी हो गई 
उनकी औलाद की आँख का पानी जो मर गया था ---
क्या ये नहीं जानते माँ बाप बीमारी से नहीं संतान की उपेक्षा से आहत हो
धीमे धीमे घुट कर मर जाते हैं फिर भी उन्हें बुरा भला नहीं कहते
सत्य तो यही है मिटटी जब दरकती है जड़ें हिल जाती है तब भूचाल आता है -
एक कसक सी उठती है मन में क्या अब भी बदलेगा यह सब 
हमारी नई पीढ़ी सहेज पाएगी अपने संस्कार वापस आ पायेंगे क्या साँझा चूल्हे ?


कुछ अन्य लिंक्स 

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

तस्मै श्री गुरुवे नमः - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मैं अपने सभी गुरुओं को सादर नमन करता हूँ।

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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गुरु नमन

गुरु की पूर्णिमा को सुना है आज ग्रहण लगने जा रहा है चाँद भी पीले से लाल होना चाह रहा है

बाला-बाली और समोसापुर (बाल कहानी)

जलो मत बराबरी करो

सोनम वांगचुक, थ्री इडियट्स से मैगसेसे तक

बड़भागिनी नारी

एक थे फूफा

अपराजिता ही रहूँगी !

उगता हुआ सूरज !!!!

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१७)

पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम की तीसरी पुण्यतिथि

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

विजय दिवस और ब्लॉग बुलेटिन


जयहिन्द दोस्तो,
हम, आप सभी कारगिल से भली-भांति परिचित हैं और कारगिल युद्ध से सम्बंधित आज के दिन से भी. जी हाँ, आज, 26 जुलाई को विजय दिवस है. विजय दिवस प्रत्येक वर्ष आज ही के दिन मनाया जाता है. भारतीय सेना ने 26 जुलाई 1999 को नियंत्रण रेखा से लगी कारगिल की पहाड़ियों पर कब्ज़ा जमाए आतंकियों और उनके वेश में घुस आए पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ यह पूरा युद्ध ही था, जिसमें पांच सौ से ज़्यादा भारतीय जवान शहीद हुए थे. पूरा देश 26 जुलाई को विजय दिवस के रूप में मना कर सभी वीर, जांबाज़ जवानों को याद करते हुए श्रद्धापूर्वक नमन करता है. 






कारगिल युद्ध के सभी जांबाज़ सैनिकों को बुलेटिन परिवार की ओर से नमन.
भारत माता की जय.
















बुधवार, 25 जुलाई 2018

आचार्य परशुराम चतुर्वेदी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी (अंग्रेज़ी: Parshuram Chaturvedi, जन्म: 25 जुलाई, 1894; मृत्यु: 3 जनवरी, 1979) परिश्रमशील विद्वान् शोधकर्मी समीक्षक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया में हुआ था। उनकी शिक्षा इलाहाबाद तथा वाराणसी विश्वविद्यालय में हुई। वे पेशे से वकील थे, किंतु आध्यात्मिक साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। संस्कृत तथा हिन्दी की अनेक उपभाषाओं के वे पंडित थे।

परशुराम चतुर्वेदी का व्यक्तित्व सहज था। वे सरल स्वभाव के थे। स्नेह और सौहार्द के प्रतिमूर्ति थे। इकहरा शरीर, गौरवर्ण, मध्यम कद काठी और सघन सफेद मूंछें उनके बड़प्पन को प्रकाशित करने के लिये पर्याप्त थीं। उनके मुख मंडल पर परंपरागत साहित्य की कोई विकृति की रेखा नहीं देखी गयी बल्कि एक निश्चित दीप्ति सदा थिरकती रही, जिससे बंधुता एवं मैत्री भाव विकीर्ण होता रहता था। चतुर्वदी जी महान् अन्नवेषक थे। मनुष्य की चिंतन परंपरा की खोज में उन्होंने संत साहित्य का गहन अध्ययन किया। वे मुक्त चिंतन के समर्थक थे, इसलिये किसी सम्प्रदाय या झंडे के नीचे बंधकर रहना पसंद नहीं किया। साहित्य में विकासवादी सिद्धांत के वे पक्षधर थे। उनकी विद्वता के आगे बड़े-बड़ों को हमेशा झुकते देखा गया। उनका जीवन मानवता के कल्याण के प्रति समर्पित था।

बहुत कम लोग जानते हैं कि कबीर को जाहिलों की कोह में से निकाल कर विद्वानों की पांत में बैठाने का काम आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने ही किया था। कबीर के काव्य रूपों, पदावली, साखी और रमैनी का जो ब्यौरा, विस्तार और विश्लेषण आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने परोसा है, और ढूंढ ढूंढ कर परोसा है, वह आसान नहीं था। फिर बाद में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सरीखों ने कबीर को जो प्रतिष्ठा दिलाई, कबीर को कबीर बनाया, वह आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के किए का ही सुफल और विस्तार था, कुछ और नहीं। दादू, दुखहरन, धरनीदास, भीखराम, टेराम, पलटू जैसे तमाम विलुप्त हो चुके संत कवियों को उन्होंने जाने कहां-कहां से खोजा, निकाला और उन्हें प्रतिष्ठापित किया। संत साहित्य के पुरोधा जैसे विशेषण उन्हें यूं ही नहीं दिया जाता। मीरा पर भी आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने जो काम किये वे अविरल हैं। गांव-गांव, मंदिर-मंदिर जो घूमे, यहां तक कि मीरा के परिवार के महाराजा अनूप सिंह से भी मिले तो यह आसान नहीं था। कुछ लोग तो उन्हें गड़े मुर्दे उखाड़ने वाला बताने लगे थे, पर जब उन की किताबें छप-छप कर डंका बजा गईं तो यह ‘गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले’ की जबान पर ताले लग गए।

'उत्तरी भारत की संत साहित्य की परख', 'संत साहित्य के प्रेरणा स्रोत', 'हिंदी काव्य धारा में प्रेम प्रवाह', 'मध्य कालीन प्रेम साधना', 'सूफी काव्य संग्रह', 'मध्य कालीन श्रृंगारिक प्रवृत्तियां', 'बौद्ध साहित्य की सांस्कृतिक झलक', 'दादू दयाल ग्रंथावली', 'मीराबाई की पदावली', 'संक्षिप्त राम चरित मानस' और 'कबीर साहित्य की परख' जैसी उन की किताबों की फेहरिस्त बहुत लंबी नहीं तो छोटी भी नहीं है। ‘शांत रस एक विवेचन’ में शांत रस का जो छोटा-छोटा ब्यौरा वह परोसते हैं, वह दुर्लभ है। अजीब संयोग है कि बलिया में गंगा के किनारे के गांव में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जन्मे और दूसरे किनारे के गांव जवहीं में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जन्मे। दोनों ही प्रकांड पंडित हुए। पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रसिद्धि का शिखर छू गए। और आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने विद्वता का शिखर छुआ। पर प्रसिद्धि जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी उतनी नहीं मिली। तो यह हिंदी वालों का ही दुर्भाग्य है, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का नहीं।


आज स्वर्गीय आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी की 122वीं जयंती पर हिन्दी ब्लॉग जगत और ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की प्रथम पुण्यतिथि : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
आज देश के मशहूर वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की प्रथम पुण्यतिथि है. देश की वैज्ञानिक प्रतिभाओं को निखारने में उनका विशेष योगदान माना जाता है. उनका जन्म 26 नवम्बर 1926 को झांग, वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का एक शहर, नामक स्थान पर हुआ था. उन्होंने 1949 में पंजाब विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान से अपना स्नातक पूर्ण किया था। इसके बाद उन्होंने 1958 में मैसेचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेकनोलॉजी से भौतिक विज्ञान में ही पीएचडी की. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च से जुड़कर उन्होंने अपने कैरियर का आरम्भ किया. वे कॉस्मिक रे समूह के सदस्य के रूप में इस संस्था से जुड़े थे.


सन 1973 में भारत सरकार ने उन्हें स्पेस एप्लीकेशन सेंटर का पहला डॉयरेक्टर नियुक्त किया. 1983-1984 में वे योजना आयोग के मुख्य सलाहकार रहे. सन 1986 से सन 1991 तक वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्यक्ष तथा सन 2007 से सन 2012 तक जेएनयू के कुलपति रहे. इसके अलावा वे विज्ञान व तकनीकी विभाग में सचिव पद पर भी कार्यरत रहे. इन कार्यों के अतिरिक्त उन्होंने दूरदर्शन पर टर्निंग पॉइंट नामक एक वैज्ञानिक कार्यक्रम का सञ्चालन भी किया था.

शिक्षा के क्षेत्र में उनका विशेष योगदान रहा. वर्ष 1992 में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक राष्‍ट्रीय सलाहकार समिति बनाई. इसमें देश भर के आठ शिक्षाविदों को शामिल किया गया. प्रोफेसर यशपाल को इस समिति का अध्‍यक्ष बनाया गया. इस समिति को इस पर विचार करना था कि शिक्षा के सभी स्‍तरों पर विद्यार्थियों, विशेषकर छोटी कक्षा के विद्यार्थियों, पर पढ़ाई के दौरान पड़ने वाले बोझ को कैसे कम किया जाए, साथ ही शिक्षा की गुणवत्‍ता में कैसे सुधार लाया जाए. समिति ने अपने स्तर से अभिभावकों, शिक्षकों, विद्यार्थियों तथा शिक्षा में रुचि रखने वाले अन्‍य व्‍यक्तियों से विभिन्‍न माध्‍यमों से संपर्क किया गया. इन सभी से प्राप्‍त मतों, विचारों, सुझावों आदि के आधार पर समिति ने जुलाई 1993 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी. समिति ने शिक्षा की तमाम मुश्किलों की जाँचते-परखते हुए लिखा कि बच्‍चों के लिए स्‍कूली बस्‍ते के बोझ से ज्‍यादा बुरा है न समझ पाने का बोझ. स्‍कूलों के उस समय के माहौल और मुश्किलों का बड़े पैमाने पर विश्‍लेषण करते हुए यशपाल समिति ने महत्‍वपूर्ण सिफारिशें दी थीं, जिन्हें स्वीकारने का विश्वास सरकार ने दिखाया था. बाद में सन 2005 में प्रोफेसर यशपाल की अध्‍यक्षता में ही राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा बनाने के लिए एक राष्‍ट्रीय संचालन समिति का गठन किया गया. इस समिति में 38 सदस्‍य थे. इस समिति ने पाठ्यचर्या की रूपरेखा बनाते समय प्रोफेसर यशपाल की सिफारिशों को ध्‍यान में रखा.

उनकी उपलब्धियों का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया. उन्हें सन 1976 में पद्म भूषण तथा सन 2013 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. वर्ष 2009 में यूनेस्को ने उन्हें विज्ञान को बढ़ावा देने और उसे लोकप्रिय बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने के कारण कलिंग सम्मान से सम्मानित किया. शिक्षा क्षेत्र में व्यापक धरातलीय कार्य करने वाले प्रोफ़ेसर यशपाल जी की मृत्यु 24 जुलाई 2017 को नोएडा उत्तर प्रदेश में हुई.

बुलेटिन परिवार की तरफ से उन्हें सादर नमन.

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सोमवार, 23 जुलाई 2018

तेरे रंग में यूँ रंगा है - नीरज जी को श्रद्धांजलि - ब्लॉग बुलेटिन

एक बच्चा स्कूल की परीक्षा में केवल एक नम्बर से फ़ेल हो गया. उसके लिये फ़ेल होने का अर्थ केवल इतना नहीं था कि उसे पूरे साल उसी कक्षा में पढाई करनी होगी, बल्कि ये था कि निर्धन परिवार को उसके पूरे वर्ष की फ़ीस दुबारा भरनी होगी.  एक निर्धन परिवार के लिये यह किसी बोझ से कम नहीं था. बच्चे ने निर्णय लिया कि वह शिक्षक के पास जाकर एक नम्बर की गुहार लगाएगा और अपने अन्य विषयों के अच्छे नम्बर का हवाला देगा.  वह कहेगा कि उसके लिये पास होना कितना अनिवार्य है, क्योंकि उसका फ़ेल होना पूरे परिवार पर बोझ होगा.

शिक्षक ने उसकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि वो चाहें तो उसे एक नम्बर देकर पास कर सकते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे. रही बात पूरे वर्ष की फ़ीस दुबारा भरने की, तो शिक्षक ने आधी फ़ीस स्वयम भरने का वादा किया.  बच्चा इस बात को नहीं समझ पाया और उसने कारण जानने की जिज्ञासा प्रकट की. शिक्षक ने कहा – तुम अओनी सिफ़ारिश की बदौलत पास भी हो गये तो एक साधारण विद्यार्थी की तरह पास हो पाओगे, जबकि तुम्हारी प्रतिभा साधारण छात्र की नहीं. मैं चाहता हूँ कि तुम जीवन में जो भी बनो, सदा शिखर पर रहो. इस घटना को याद करते हुये बरसों बाद उस छात्र के चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी और उसने कहा कि मैं हमेशा सर्वोत्तम बनना चाहता था और अगर मैं चोर भी बनता तो अव्वल दर्ज़े का चोर होता.

बचपन से अभावों के दुर्भाग्य में जीने वाला वह बालक वास्तव में ब्रह्मा द्वारा एक अद्वितीय सौभाग्य का स्वामी था, जिसे उसने इन पंक्तियों में व्यक्त किया:
आत्मा के सौन्दर्य का शब्द रूप है काव्य,
मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य!

वह बालक, जिसने यौवन में प्रवेश करते ही कविताएँ लिखना प्रारम्भ कर दिया और कोई नहीं गोपाल दास “नीरज” थे.  वे स्वयम बताते हैं कि एक कवि सम्मेलन में भाग लेने जाते हुये जिस वाहन की व्यवस्था की गई थी, उसमें इनके बैठने की जगह नहीं बची. ऐसे में बच्चन जी ने उनसे कहा कि तुम मेरी गोद में बैठ जाओ. इन्होंने कहा कि याद रखियेगा आज से मैं आपका गोद लिया पुत्र हो गया.  यही बात उन्होंने अमिताभ बच्चन को भी कही कि तुमसे पहले मैं तुम्हारे पिता का पुत्र हूँ.

मुझे तो फ़िल्मों के अलावा कोई बात ही नहीं समझ आती. इसलिये नीरज जी के फ़िल्मी गीतों का ज़िक्र ही करूँगा. जबकि इन्होंने फ़िल्मी गीत और अपनी कविताओं के लिये कभी दोहरे या अलग-अलग मांदण्ड नहीं अपनाए.  फ़िल्मों में साहित्यिक शायरों की पैठ तो हमेशा से रही, जैसे – क़ैफ़ी, साहिर, शकील, मजरूह, हसरत आदि. लेकिन कवियों का नाम गिना चुना ही रहा. जैसे – गोपाल सिंह नेपाली, पण्डित भरत व्यास, इंदीवर आदि.

जब 1960 में एक कवि सम्मेलन के बाद उनसे एक निर्माणाधीन फ़िल्म के लिये गीत लिखने को कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया क्योंकि वो नौकरी छोड़कर बम्बई नहीं रह सकते थे. पर निदेशक की ज़िद में उन्होंने फ़िल्म के लिये अप्नी कुछ कविताएँ दे दीं और कहा कि उन्हें लौट जाना है. फ़िल्म थी “नई उमर की नई फ़सल”, जो बिल्कुल नहीं चली पर उसके गाने आज भी पॉपुलर हैं... कारवाँ गुज़र गया, देखती ही रहो, आज की रात बड़ी शोख...! फिर चंद्रशेखर (चरित्र अभिनेता) के आग्रह पर उन्होंने गीत लिखे फ़िल्म “चा चा चा” के लिये और वो भी आज  तक बजता है – सुबह न आई, शाम न आई! 

देवानंद साहब के साथ वे जुड़े फ़िल्म प्रेम पुजारी से, जब सचिन दा की इस ज़िद पर कि फ़िल्म का सिक्वेंस शराब का है, लेकिन गाने में शराब, शबाब, जाम, साक़ी, गुल, बुलबुल कुछ नहीं होना चाहिये और गाने की शुरुआत रंगीला रेसे होनी चाहिये. रात भर में जो गीत बना वो इतिहास है – तेरे रंग में यूँ रंगा है मेरा मन, न बुझे है किसी जल से ये जलन”. देवानंद साहब के साथ इन्होंने जितने भी गीत लिखे सब अमर हो गये. इनके गीतों की विशेषता यह रही कि जिन शब्दों का प्रयोग इन्होंने किया, वो फ़िल्मों में कभी प्रयोग नहीं किये गये. साँस तेरी मदिर मदिर जैसे रजनीगंधा, प्यार है मेरा चूड़ी जैसा, जिसका ओर न छोर और न जाने कितने गाने.

कवि सम्मेलनों में इनका कविता पाठ का अंदाज़ अनोखा था. फ़िल्म मेरा नाम जोकर के लिये उनका एक गीत “ए भाई ज़रा देखके चलो”  एक ऐसा गीत था जिसमें न न मुखड़ा था न अंतरा. शंकर जयकिशन इसे स्वरबद्ध करने की मशक्कत में लगे थे. अंत में यह निर्णय हुआ कि जिस लय में नीरज इस गीत को गाते हैं, उसी धुन पर इस गीत को उतारा जाए.  और परिणाम यह हुआ कि वह गीत वर्ष की सर्वश्रेष्ठ गीत घोषित हुआ. 

इस छोटे से स्पेस में कितना कहा जाए उस शख्स के बारे में. जितना विस्तार है उनके व्यक्तित्व का और उनकी कविताओं का उसे इस छोटे से दायरे में समेटना बहुत मुश्किल है. इनके गीतों में प्रेम रस की वर्षा है और एक गहन दर्शन है.  उनका एक दोहा जो अभी मुझे याद नहीं, एक गम्भीर दार्शनिक बात कहता है. वे कहते हैं कि हम सभी अपने वज़न को लेकर बहुत सचेत रहते हैं, लेकिन वास्तव में यह वज़न होता किस चीज़ का है. नीरज जी कहते हैं कि यह वज़न अस्थि, रक्त, माँस या मजा का नहीं, केवल साँसों का है, क्योंकि जब तक साँस रहती है इंसान नदी में डूब जाता है, लेकिन जब साँसें शरीर को त्याग देती हैं तो वही व्यक्ति सतह पर तैरने लगता है. विगत 19 जुलाई को यह महान कवि और गीतकार इन साँसों को त्यागकर भारहीन हो गया, लेकिन छोड़ गया अनेक प्रेमियों के हृदय में कई मधुर प्रेम गीत.
                                                                              - सलिल वर्मा 
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आपके साथ बीडी पीना तो रह ही गया नीरज जी

जैसे एक युग बीत गया है , गीतों का

स्मृति : गोपाल दास नीरज : संतोष अर्श

"गीतकार नीरज तुम्हें, नमन हजारों बार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नीरज

दिमाग से नहीं दिल से लिखते थे नीरज

शत शत नमन नीरज जी को

नीरज जी को नमन

उसके हृदय में पीर है सारे जहान की

अंक ज्योतिषी भी थे नीरजजी

अब तो कोई मज़हब ( गोपालदास नीरज के नाम ) डॉ लोक सेतिया

रविवार, 22 जुलाई 2018

राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
तिरंगा
राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस हर वर्ष 22 जुलाई को मनाया जाता है। इस दिन अर्थात 22 जुलाई, 1947 को राष्‍ट्रीय ध्‍वज तिरंगे को भारत के संविधान द्वारा अपनाया (अंगीकृत) गया था। 'तिरंगा' भारत का राष्ट्रीय ध्वज है जो तीन रंगों से बना है इसलिए हम इसे तिरंगा कहते हैं। तिरंगे में सबसे ऊपर गहरा केसरिया, बीच में सफ़ेद और सबसे नीचे गहरा हरा रंग बराबर अनुपात में है। ध्‍वज को साधारण भाषा में 'झंडा' भी कहा जाता है। झंडे की चौड़ाई और लम्‍बाई का अनुपात 2:3 है। सफ़ेद पट्टी के केंद्र में गहरा नीले रंग का चक्र है, जिसका प्रारूप अशोक की राजधानी सारनाथ में स्थापित सिंह के शीर्षफलक के चक्र में दिखने वाले चक्र की भांति है। चक्र की परिधि लगभग सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर है। चक्र में 24 तीलियाँ हैं।



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

शनिवार, 21 जुलाई 2018

यह इश्क़ नहीं आसान - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

फ़ेसबुक पर लड़के को अचानक एक ख़ूबसूरत लड़की की फ़ोटो दिखायी दी, लड़के ने तुरंत मेसेज किया।

लड़का: आइ लव यू

लड़की: कौन हो तुम?

लड़का: मेरा नाम आशिक़ कुमार है।

लड़की: अच्छा क्या करते हो?

लड़का: मैं तुमसे प्यार करता हूँ।

लड़की: कहाँ रहते हो, पता क्या है तुम्हारा?

लड़का: मैं आपके दिल में रहता हूँ, मेरा पता है प्यार के बाज़ार के पास, इश्क़ वाली गली, प्रेमपुर, और तुम कहाँ रहती हो, क्या करती हो?

लड़की: मैं गोरखपूर में योगी आदित्यनाथ के घर के पास रहती हूँ, मेरे भैया बजरंग दल के अध्यक्ष और शिवसेना के महा सचिव हैं। उन्ही के अकाउंट का काम मैं देखती हूँ।

लड़का: माफ़ करना बहन, मेरी बात का बुरा मत मानना, मैं तो मज़ाक़ कर रहा था।

और उसके बाद लड़के ने फेसबुक से अकाउंट ही डिलीट कर दिया।

सादर आपका
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बनारस में मैकबेथ

रामानुजन् पर किताब

भीड़तंत्र की विरोधाभासी व्याख्या

हिन्दी, रोजगार और छत्तीसगढ़

कितना कुछ दिया उस देश ने

स्वाद!

मातृभूमि ! क्यों कहा जाता है ?

अमर क्रांतिकारी स्व॰ श्री बटुकेश्वर दत्त जी की 53 वीं पुण्यतिथि

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 )

" चामुण्डा देवी मंदिर “(काँगड़ा )

नयी-सी लगे

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

लेखागार