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गुरुवार, 31 जनवरी 2019

प्रथम परमवीर चक्र से सम्मानित वीर को नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 31 जनवरी पहले परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्मदिन है. वे भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कमांडर थे. सन 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये थे. इसके लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया था. उनका जन्म 31 जनवरी 1923 को जम्मू में हुआ था. इनके पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भी सेना में डॉक्टर थे. इसके साथ-साथ उनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे तथा 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हुए थे. अपने पिता और मामा के प्रभाववश वे भी सेना में भरती हुए. 


मेजर सोमनाथ ने अपना सैनिक जीवन 22 फरवरी 1942 से शुरू किया. तब उन्हें चौथी कुमायूं रेजिमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर प्रवेश मिला. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया जहाँ इन्होंने अपने पराक्रम के तेवर दिखाए. इसके चलते वे एक विशिष्ट सैनिक के रूप में पहचाने जाने लगे. सन 1947 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगाम मोर्चे पर जाने का हुकुम मिला. 3 नवम्बर को मेजर सोमनाथ बदगाम जा पहुँचे और उत्तरी दिशा में उन्होंने अपनी टुकड़ी तैनात कर दी. तभी दुश्मन की सेना ने उनकी टुकड़ी को तीन तरफ से घेरकर हमला किया. भारी गोलाबारी में उनके सैनिक हताहत होने लगे. अपनी दक्षता का परिचय देते हुए मेजर सोमनाथ ने अपने सैनिकों के साथ गोलियां बरसाते हुए दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा. 

इस दौरान बहुत से भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे. सैनिकों की कमी को मेजर महसूस कर रहे थे. ऐसे समय में एक मोर्टार का निशाना ठीक वहीं पर लगा जहाँ वे खुद मौजूद थे. दुश्मन सेना की तरफ से किये गए इस विस्फोट में मेजर सोमनाथ शहीद हो गये. उन्होंने प्राण त्यागने से ठीक पहले अपने वीर सैनिकों को प्रोत्साहित करते हुए कहा था कि, दुश्मन हमसे केवल पचास गज की दूरी पर है. हमारी गिनती बहुत कम रह गई है. हम भयंकर गोली बारी का सामना कर रहे हैं फिर भी मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक डटा रहूँगा.

उनकी वीरता और भारतीय सैनिकों के जोश के चलते श्रीनगर विमानक्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को बेदख़ल करते हुए मेजर 3 नवम्बर 1947 को वीरगति को प्राप्त हुए. इसके लिए उन्हें पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि परमवीर चक्र का डिजाइन मेजर शर्मा के भाई की पत्नी सावित्री बाई खानोलकर ने तैयार किया था.

आज उनकी जन्मतिथि पर बुलेटिन परिवार की तरफ से उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं.

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बुधवार, 30 जनवरी 2019

भारत में "हरित क्रांति के पिता" - चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
सी. सुब्रह्मण्यम
चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम (अंग्रेज़ी: Chidambaram Subramaniam, जन्म- 30 जनवरी, 1910, कोयम्बटूर; मृत्यु- 7 नवम्बर, 2000) भारत में "हरित क्रांति के पिता" कहे जाते हैं। जब भारत को आज़ादी प्राप्त हुई, उस समय देश में खाद्यान्न उत्पादन की स्थिति बड़ी शोचनीय थी। कई स्थानों पर अकाल पड़े। बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अनेक लोग भुखमरी के शिकार हुए और काल का ग्रास बन गये। जब सी. सुब्रह्मण्यम को केन्द्र में कृषि मंत्री बनाया गया, तब उन्होंने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनेक योजनाएँ क्रियान्वित कीं। उनकी बेहतर कृषि नीतियों के कारण ही 1972 में देश में रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन हुआ। सी. सुब्रह्मण्यम की नीतियों और कुशल प्रयासों से ही आज देश खाद्यान्न उत्पादन में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो चुका है।

जन्म तथा शिक्षा 

सुब्रह्मण्यम का जन्म जनवरी, 1910 को कोयम्बटूर ज़िले के 'पोलाची' नामक स्थान पर हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद मद्रास में उनकी उच्च शिक्षा हुई। उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज, मद्रास से बी.एस.सी की डिग्री प्राप्त की और बाद में मद्रास विश्वविद्यालय से 1932 में क़ानून कि डिग्री प्राप्त की, परंतु 1936 तक वे वकालत प्रारम्भ नहीं कर सके। जब उन्होंने वकालत प्रारंभ की, तब तक उनका सम्बन्ध स्वतंत्रता आंदोलन से हो चुका था।

देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए की जा रही उनकी गतिविधियों के कारण ही वे गिरफ्तार भी हो चुके थे। इस प्रकार उनकी रुचि स्वतंत्रता आंदोलन की तरफ़ बढ़ती गई और अब वह पूरी तरह आज़ादी के सिपाही बन गये। 1942 का 'भारत छोड़ो आंदोलन' एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पड़ाव था, जब सम्भवत: कांग्रेस का कोई भी महत्त्वपूर्ण नेता जेल से बाहर नहीं रहा। सी. सुब्रह्मण्यम भी गिरफ्तारी से न बच सके। इस प्रकार कोयम्बटूर ज़िले में महत्त्वपूर्ण कांग्रेस नेता के रूप में इनका प्रभाव बढ़ता गया। कोयम्बटूर कांग्रेस समिति के वे अध्यक्ष चुने गये और इसके साथ ही तमिलनाडु में कांग्रेस की कार्य समिति में भी उन्हें महत्त्वपूर्ण स्थान मिला।

कृषि मंत्री 

जिस समय देश स्वतंत्र हुआ था, खाद्यान्न उत्पादन की स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी, परन्तु आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में पूरी तरह से आत्मनिर्भर है। देश की स्वतंत्रता से पूर्व भारत के अनेक स्थानों पर अनेक बार अकाल पड़े और बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अनेक लोग भुखमरी के शिकार हुए, परन्तु स्वतंत्रता के बाद ऐसा कोई अवसर नहीं आया, जब देश में अकाल की स्थिति पैदा हुई हो। जब सी. सुब्रह्मण्यम केन्द्र सरकार के कृषि मंत्री बने तो उन्होंने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक ऐसी योजना का विकास किया, जिसके कारण देश के किसानों में ऐसी जागृति आई कि वे अच्छे बीज और खाद का बेहतर ढंग से उपयोग करने लगे। उनके मंत्रित्व काल में ही खाद्यान्न की नई किस्मों का विकास किया गया। इस काल में ही विभिन्न प्रकार के उर्वरकों का किसानों ने उपयोग करना शुरू किया। इस कार्य की प्रशंसा नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नार्मन बोरलाग ने भी मुक्त कण्ठ से की है।

सी. सुब्रह्मण्यम की कृषि नीतियों के कारण 1972 में खाद्यान्न का जो रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, इस घटना को 'हरित क्रांति' की संज्ञा दी गई। कृषि नीति में आपके योगदान के लिए डॉ. बोरलाग का कहना है कि "सी. सुब्रह्मण्यम की दूर-दृष्टि और प्रभाव के कारण कृषि सम्बन्धी यह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। किसी भी कार्य के लिए जो राजनीतिक निर्णय लिए जाते हैं, उनको लागू करने के लिए पूर्ण प्रयत्न 1964-1967 के उस काल में हुआ, जब सी. सुब्रह्मण्यम राजनीतिक परिदृश्य को बदलने के प्रयत्न कर रहे थे।

कैबिनेट मंत्री

1962 में लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद सी. सुब्रह्मण्यम केबिनेट स्तर के मंत्री बनाये गए। इनके अधीन इस्पात मंत्रालय था। 1963-1964 तक इस्पात के साथ-साथ खान और भारी इंजीनियरिंग मंत्री भी रहे। फिर 1964 से 1965 तक वे खाद्य और कृषि मंत्री रहे। 1966-1967 में उनके मंत्रालय के साथ समुदाय विकास और सहयोगिता विभाग भी जोड़ दिया गया। उनका यह कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने जहाँ अच्छे बीजों की बढ़िया किस्मों का उपयोग करने पर बल दिया, वहाँ किसानों को इस ओर भी प्रेरित किया कि वे खाद का भी और अधिक प्रयोग करें। इसका परिणाम यह हुआ कि 1960 के दशक में देश खाद्य उत्पादन में आत्म निर्भर हो गया।

1946 में वे संविधान सभा के सदस्य चुने गए और 1952 तक सदस्य रहे। इस प्रकार धीरे-धीरे सी. सुब्रह्मण्यम जी का सामाजिक और राजनीतिक जीवन अधिक व्यस्त होता गया। 1952 में वे तमिलनाडु विधानसभा के सदस्य चुने गए। सदस्य होने के साथ ही उन्हें प्रदेश मंत्रिमंडल में सम्मिलित किया गया। 1952 से 1962 तक अर्थात् दस वर्ष तक वे निरन्तर राज्य सरकार में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे। वे राज्य के वित्तमंत्री, शिक्षामंत्री और विधिमंत्री रहे। उन्होंने इस दस वर्ष की अवधि में राज्य की शिक्षा के विस्तार तथा विकास के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए। तमिलनाडु की गिनती कुछ ऐसे राज्यों में की जाती है, जहाँ सबसे पहले प्रारम्भिक प्राइमरी शिक्षा बच्चों के लिए नि:शुल्क आरम्भ हो गई।

अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति

इस प्रकार सरकार में और सरकार से अवकाश प्राप्त करने के बाद जो कार्य सी. सुब्रह्मण्यम जी ने किए, उनके कारण उनका नाम अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी फैला। श्री सुब्रह्मण्यम प्रचार माध्यम से दूर रहने के बावजूद अधिकाधिक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करते गए। फ़रवरी, 1990 में उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया। तीन वर्ष तक इस पद पर रहने के बाद वे 'भारतीय विद्या भवन' नामक संस्था के अध्यक्ष बने। इस पद पर रहते हुए उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की।

पुरस्कार 

सी. सुब्रह्मण्यम को तुलसी फाउण्डेशन के अतिरिक्त 'ऊ थांट' शांति पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करने के कारण उन्हें 'वाइ.एस. चौहान' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिर उन्हें सर्वोच्च भारतीय सम्मान 'भारत रत्न' से 1988 में सम्मानित किया गया।

निधन

7 नवम्बर, 2000 में सुब्रह्मण्यम जी का निधन हुआ। वे इस शताब्दी के ऐसे महान् व्यक्तियों में से थे, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन किसी आडम्बर और प्रचार के बिना बिताने का निश्चय किया था। देश को आज़ादी मिलने के बाद भारत के विकास और औद्योगिक प्रगति के लिए बहुत सी योजनाएँ बनीं तथा उनका जोर-शोर से प्रचार भी किया गया, किन्तु एक योजना ऐसी भी थी, जिसके सम्बन्ध में न तो अधिक लोगों ने विचार किया था और न उसके सम्बन्ध में प्रचार। यह योजना बहुत ही शान्तिपूर्ण ढंग से इस प्रकार आगे बढ़ी कि जनता उसके परिणामों से स्तब्ध रह गई थी। यह एक ऐसी महान् क्रांतिकारी योजना थी, जिसे 'हरित क्रांति' के नाम से जाना जाता है और जिसका पूरा श्रेय सी. सुब्रह्मण्यम को जाता है।


आज भारत में "हरित क्रांति के पितामह" चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम जी की 119वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~









आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

मजदूरों की आवाज़ को सादर नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
एक भारतीय राजनेता होने के साथ-साथ श्रमिक संगठन के नेता, पत्रकार रह चुके जॉर्ज फर्नांडिस का आज, 29 जनवरी 2019 को लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया. उनका जन्म 03 जून 1930 को कर्नाटक के मंगलुरु में हुआ था. उनके पिता जॉन जोसफ फर्नांडिस और माता एलीस मार्था फर्नांडिस थे. 16 वर्ष की उम्र में उनको क्रिश्चियन मिशनरी में पादरी बनने की शिक्षा लेने भेजा गया. वहां उनका मन नहीं लगा. विद्यालय में हो रहा भेदभाव उनको पसंद नहीं आ रहा था. स्कूल में फादर्स ऊंची कुर्सी-मेज पर बैठकर अच्छा भोजन करते थे, जबकि प्रशिक्षणार्थियों को ऐसी सुविधा नहीं मिलती थी. उन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और बाद में स्कूल छोड़ दिया. इसके बाद वह सन 1949 में वे रोजगार की तलाश में बंबई चले आए. 

सन 1967 से सन 2004 तक वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए. केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में वे रक्षा मंत्री, संचारमंत्री, उद्योगमंत्री, रेलमंत्री आदि के रूप में देश को अपनी सेवाएँ देते रहे हैं. रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने रिकॉर्ड 30 से ज्यादा बार सियाचिन ग्लेशियर का दौरा किया. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में वे रक्षा मंत्री रहे और उन्हीं के रक्षा मंत्री रहते हुए भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था. केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान निवेश के उल्लंघन के कारण अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों आईबीएम और कोका-कोला को देश छोड़ने का आदेश दिया. कोंकण रेलवे परियोजना के पीछे वे एक प्रेरणा शक्ति के रूप में रहे जबकि वे 1989-90 में रेल मंत्री रहे. 


उनके नेतृत्व में देश की सबसे बड़ी हड़ताल सन 1974 में हुई थी जबकि उन्होंने देशव्यापी रेल हड़ताल का आह्वान किया था. दरअसल सन 1973 में उनको ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन का चेयरमैन चुना गया. भारतीय रेलवे में उस समय लगभग 14 लाख लोग काम किया करते थे. रेलवे कामगार कई सालों से सरकार से कुछ जरूरी मांगें कर रहे थे लेकिन सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही थी. ऐसे में उनके आह्वान के बाद रेल का चक्का जाम हो गया. कई दिनों तक रेलवे का सारा काम ठप्प रहा. न तो कोई आदमी कहीं जा पा रहा था और न ही सामान. तीन हफ्ते से अधिक समय तक चली इस हड़ताल को सरकार ने सेना की सहायता से बड़ी निर्ममता से ख़तम करवाया. सरकार ने सख्ती के साथ इस आंदोलन को कुचलते हुए लगभग 30 हजार लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें जॉर्ज फर्नांडिस भी शामिल थे.


आपातकाल के दौरान वे सिखों की वेशभूषा में घूमते थे. गिरफ्तारी से बचने के लिए वे खुद को लेखक खुशवंत सिंह बताया करते थे. जब इस दौरान बड़ौदा डाइनामाइट केस में उनको गिरफ्तार किया गया तो जेल में रहने के दौरान वह कैदियों को श्रीमद्भागवतगीता पढ़कर सुनाया करते थे. संघर्षशील, बेबाक वक्ता, मजदूरों के हितैषी जॉर्ज फर्नांडिस विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. वे हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, मलयाली, कोंकणी सहित दस भाषाओं के जानकार थे.

बुलेटिन परिवार की ओर से उनको विनम्र श्रद्धांजलि





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सोमवार, 28 जनवरी 2019

१२० वीं जयंती पर फ़ील्ड मार्शल करिअप्पा को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (अंग्रेज़ी: Kodandera Madappa Cariappa, जन्म: 28 जनवरी, 1899 - मृत्यु: 15 मई, 1993) भारत के पहले नागरिक थे, जिन्हें 'प्रथम कमाण्डर इन चीफ़' बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। करिअप्पा ने जनरल के रूप में 15 जनवरी, 1949 ई. को पद ग्रहण किया था। इसके बाद से ही 15 जनवरी को 'सेना दिवस' के रूप में मनाया जाने लगा। करिअप्पा भारत की राजपूत रेजीमेन्ट से सम्बद्ध थे। 1953 ई. में करिअप्पा सेवानिवृत्त हो गये थे, लेकिन फिर भी किसी न किसी रूप में उनका सहयोग भारतीय सेना को सदा प्राप्त होता रहा।


जन्म तथा शिक्षा



स्वतंत्र भारत की सेना के 'प्रथम कमाण्डर इन चीफ़', फ़ील्ड मार्शल करिअप्पा का जन्म 1899 ई. में दक्षिण में कुर्ग के पास हुआ था। करिअप्पा को उनके क़रीबी लोग 'चिम्मा' नाम से भी पुकारते थे। इन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा 'सेंट्रल हाई स्कूल, मडिकेरी' से प्राप्त की थी। आगे की शिक्षा मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से पूरी की। अपने छात्र जीवन में करिअप्पा एक अच्छे खिलाड़ी के रूप में भी जाने जाते थे। वे हॉकी और टेनिस के माने हुए खिलाड़ी थे। संगीत सुनना भी इन्हें पसन्द था। शिक्षा पूरी करने के बाद ही प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918 ई.) में उनका चयन सेना में हो गया।


उपलब्धियाँ

अपनी अभूतपूर्व योग्यता और नेतृत्व के गुणों के कारण करिअप्पा बराबर प्रगति करते गए और अनेक उपलब्धियों को प्राप्त किया। सेना में कमीशन पाने वाले प्रथम भारतीयों में वे भी शामिल थे। अनेक मोर्चों पर उन्होंने भारतीय सेना का पूरी तरह से सफल नेतृत्व किया था। स्वतंत्रता से पहले ही ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सेना में 'डिप्टी चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़' के पद पर नियुक्त कर दिया था। किसी भी भारतीय व्यक्ति के लिए यह एक बहुत बड़ा सम्मान था। भारत के स्वतंत्र होने पर 1949 में करिअप्पा को 'कमाण्डर इन चीफ़' बनाया गया था। इस पद पर वे 1953 तक रहे।
सार्वजनिक जीवन

सेना से सेवानिवृत्त होने पर उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में भारत के 'हाई-कमिश्नर' के पद पर भी काम किया। इस पद से सेवानिवृत्त होने पर भी करिअप्पा सार्वजनिक जीवन में सदा सक्रिय रहते थे। करिअप्पा की शिक्षा, खेलकूद व अन्य कार्यों में बहुत रुचि थी। सेवानिवृत्त सैनिकों की समस्याओं का पता लगाकर उनके निवारण के लिए वे सदा प्रयत्नशील रहते थे।
निधन

करिअप्पा के सेवा के क्षेत्र में स्मरणीय योगदान के लिए 1979 में भारत सरकार ने उन्हें 'फ़ील्ड मार्शल' की मानद उपाधि देकर सम्मानित किया था। 15 मई, 1993 ई. में करिअप्पा का निधन 94 वर्ष की आयु में बैंगलौर (कर्नाटक) में हो गया।
आज फ़ील्ड मार्शल करिअप्पा की १२० वीं जयंती के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम सब उनको शत शत नमन करते हैं |  
सादर आपका

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साँझ

ग्रेनाईट की स्लैब

एयर चाइना की एयर होस्टेस -- एक मुक्तक --

तुम तक...

वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया ...

टुकड़ा मैं तेरे दिल का....

रूचि भल्ला की कहानी ‘आई डोंट हैव ए नेम’।

शिकायत क्यों ?

संस्‍कृति-संसद में मुस्‍लिम चिंतकों ने दिया देश के लिए एक सुखद संकेत

झूठ और सच का महा-मुक़ाबला

शेर ए पंजाब स्व॰ लाला लाजपत राय जी की १५४ वीं जयंती

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

रविवार, 27 जनवरी 2019

पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
पूर्वाग्रह में ग्रसित होकर हम सब कैसे मशीन बनते जा रहे हैं, इसका उदाहरण हमें खुद अभी मिला, जबकि हम एक एक कार्यक्रम में सहभागिता करके वाराणसी से वापस उरई आ रहे थे. वातानुकूलित कोच होने के कारण कागज के लिफाफे में चादर, तौलिया आदि यथास्थान रखे हुए थे. चादर, तौलिया निकाल लेने के बाद यह कागज़ का लिफाफा हमारे बहुत काम आता है. ट्रेन में यह कागज़ हमारी रचनाशीलता का गवाह बनता है, हमारी सक्रियता का साथी बनता है. इसके अलावा ऐसा कोई कागज़ जिसमें किसी भी तरफ लिखा जा सकता है, सदैव हमारे काम का रहता है. 


उस दिन दोपहर बाद चली ट्रेन आधी रात के आसपास लखनऊ पहुँची. लखनऊ में आने वाले लोग एकसाथ आये. वे लोग अपने-अपने लेटने की सुविधा का दोहन करने का विचार बनाकर चादर वगैरह लिफाफों से निकालकर उन्हें कोच की धरती की भेंट चढ़ा चुके थे. कई हिस्सों में फटे लिफाफे गंदगी सी फैलाये हुए दरवाजे के पास ही पड़े थे. बजाय उन लोगों से कुछ कहने के हमने उन लिफाफों को ये सोचकर उठाया कि एक तो गन्दगी साफ़ हो जाएगी और यदि ज्यादा बुरी हालत में नहीं होने तो हमारे काम आ जायेंगे.

लिफाफों के उठाते ही एक ज्यादा स्मार्ट से सज्जन ने टोका, क्यों भाईसाहब आप भाजपा से जुड़े हैं? लिफाफे जिस मुद्रा में हाथ में थे सोचा कि उनके मुँह पर मारते हुए जवाब दे ही दें मगर उनकी उम्र का ख्याल कर हँस दिए. उन लिफाफों को तह बनाते हुए हमने देखा वे सज्जन मंद-मंद मुस्कुराते हुए कभी हमें, कभी उन लिफाफों की तरफ देखे जा रहे थे. उनकी मानसिकता समझ आ ही चुकी थी, सोचा कि कुछ झटकेदार इनकी खोपड़ी में घुसा ही दें. काम आ सकने वाले लिफाफों की तह बनाकर उन्हें अपने बैग के हवाले किये तो उनकी आँखें कुछ चौड़ी हुईं. उनके हावभाव में प्रश्नवाचक देखकर उनकी तरफ जवाब फेंका, आपको पता नहीं मोदी जी की योजना? उनके प्रश्नवाचक चिन्ह को और बड़ा होते देखा और उसे अपनी तरफ से और बड़ा कर दिया यह कहते हुए कि उपयोग किये गए ये कागज़ के लिफाफे सही से तह करके किसी स्टेशन पर जमा कर दो तो प्रति लिफाफे बीस रुपये मिलते हैं. अबकी वे महाशय कुछ सन्नाटा सा खींचते समझ आये और हमने भी बैग पर ऐसे कब्ज़ा जमाया जैसे उसमें कोई बड़ा खजाना रखा हुआ हो.

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शनिवार, 26 जनवरी 2019

७० वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम |


ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सभी को ७० वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएँ |
 
जय हिन्द ... जय हिन्द की सेना ||
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देश सेवा भूख मेरी ...

#गणतंत्र_दिवस

वंदे मातरम्

देश गान - हामिद अल्लाह "अफसर" मेरठी

तिरंगे का पाँचवां रंग

भारतीय गणतंत्र की विडंबनाएं

श्रद्धांजलि

गणतंत्र का अपहरण

स्वामी नारायण अक्षरधाम मंदिर , न्यू जर्सी

कहां है भारतीयता ?

द 'अनकॉमन' कॉमन मैन - आर॰के॰ लक्ष्मण जी की चौथी पुण्यतिथि

बसंत

बाई पुराण

अवसाद और प्रसन्नता

कृष्णा सोबती : मृत्युलोक के नश्वर

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अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिंद !!! 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

राष्ट्रीय मतदाता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार
भारत में राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters Day) प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को मनाया जाता है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाने का प्रारंभ वर्ष 2011 से शुरू हुआ। क्योंकि भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को हुई थी जिसकी 61वीं वर्षगांठ पर भारत सरकार ने इस खास दिन को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' मनाने की शुरुआत की। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य आज की युवा पीढ़ी और महिलाओं को मतदान के प्रति जागरूक और उसका मूल्य क्या है इसे ज्ञात करने के लिए मनाया जाता है। क्योंकि एक जागरूक मतदाता ही देश का वर्तमान और भविष्य का निर्माण करता है।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि . सादर अभिनन्दन..

गुरुवार, 24 जनवरी 2019

24 जनवरी 2019 - राष्ट्रीय बालिका दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

राष्ट्रीय बालिका दिवस (अंग्रेज़ी:National Girl Child Day) 24 जनवरी को मनाया जाता है। 24 जनवरी के दिन इंदिरा गांधी को नारी शक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस दिन इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठी थी इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर लिया गया है। आज की बालिका जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रही है चाहे वो क्षेत्र खेल हो या राजनीति, घर हो या उद्योग। राष्ट्रमण्डल खेलों के गोल्ड मैडल हो या मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति के पद पर आसीन होकर देश सेवा करने का काम हो सभी क्षेत्रों में लड़कियाँ समान रूप से भागीदारी ले रही है।


"हर क्षेत्र में लड़की आगे, फिर क्यों हम लड़की से भागें।"

(साभार : http://bharatdiscovery.org/india/राष्ट्रीय_बालिका_दिवस)

ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आपको राष्ट्रीय बालिका दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं |

सादर आपका
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बुधवार, 23 जनवरी 2019

122वीं जयंती - नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
सुभाष चंद्र बोस (अंग्रेज़ी: Subhash Chandra Bose, जन्म - 23 जनवरी, 1897 ई., कटक, उड़ीसा; मृत्यु (विवादित) - 18 अगस्त, 1945 ई., जापान) के अतिरिक्त भारत के इतिहास में ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ, जो एक साथ महान् सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाड़ी और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरुषों, नेताओं के समकक्ष साधिकार बैठकर कूटनीति तथा चर्चा करने वाला हो। भारत की स्वतंत्रता के लिए सुभाष चंद्र बोस ने क़रीब-क़रीब पूरे यूरोप में अलख जगाया। बोस प्रकृति से साधु, ईश्वर भक्त तथा तन एवं मन से देशभक्त थे। महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह को 'नेपोलियन की पेरिस यात्रा' की संज्ञा देने वाले सुभाष चंद्र बोस का एक ऐसा व्यक्तित्व था, जिसका मार्ग कभी भी स्वार्थों ने नहीं रोका। जिसके पाँव लक्ष्य से कभी पीछे नहीं हटे, जिसने जो भी स्वप्न देखे, उन्हें साधा। नेताजी में सच्चाई के सामने खड़े होने की अद्भुत क्षमता थी।

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, सन 1897 ई. में उड़ीसा के कटक नामक स्थान पर हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी शक्तियों के विरुद्ध 'आज़ाद हिंद फ़ौज' का नेतृत्व करने वाले बोस एक भारतीय क्रांतिकारी थे, जिनको ससम्मान 'नेताजी' भी कहते हैं। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। पहले वे सरकारी वक़ील थे, लेकिन बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधान सभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें 'रायबहादुर का ख़िताब' दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र बोस उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थे। सुभाष उन्हें 'मेजदा' कहते थे। शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था।

भारतीयों के साथ अल्पावस्था में अंग्रेज़ों का व्यवहार देखकर सुभाष चंद्र बोस ने अपने भाई से पूछा- "दादा कक्षा में आगे की सीटों पर हमें क्यों बैठने नहीं दिया जाता है?" बोस जो भी करते, आत्मविश्वास से करते थे। अंग्रेज़ अध्यापक बोस जी के अंक देखकर हैरान रह जाते थे। बोस जी के कक्षा में सबसे अधिक अंक लाने पर भी जब छात्रवृत्ति अंग्रेज़ बालक को मिली तो वह उखड़ गए। बोस ने मिशनरी स्कूल को छोड़ दिया। उसी समय अरविन्द ने बोस जी से कहा- "हम में से प्रत्येक भारतीय को डायनमो बनना चाहिए, जिससे कि हममें से यदि एक भी खड़ा हो जाए तो हमारे आस-पास हज़ारों व्यक्ति प्रकाशवान हो जाएँ। अरविन्द के शब्द बोस के मस्तिष्क में गूँजते थे। सुभाष सोचते- 'हम अनुगमन किसका करें?' भारतीय जब चुपचाप कष्ट सहते तो वे सोचते- 'धन्य हैं ये वीर प्रसूत। ऐसे लोगों से क्या आशा की जा सकती है?'

एक संपन्न व प्रतिष्ठित बंगाली वक़ील के पुत्र सुभाष चंद्र बोस की शिक्षा कलकत्ता के 'प्रेज़िडेंसी कॉलेज'[1]और 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' से हुई, और उसके बाद 'भारतीय प्रशासनिक सेवा' (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के 'कॅम्ब्रिज विश्वविद्यालय' भेज दिया। सन 1920 ई. में बोस ने 'इंडियन सिविल सर्विस' की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन अप्रैल सन 1921 ई. में भारत में बढ़ती राजनीतिक सरगर्मी की ख़बर सुनकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। अपने पूरे कार्यकाल में, ख़ासकर प्रारंभिक चरण में, बोस को अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस (1889-1950 ई.) का भरपूर समर्थन मिला, जो कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के एक धनाढ्य वक़ील होने के साथ-साथ प्रमुख कांग्रेसी राजनीतिज्ञ भी थे।

आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज के सदस्य
सुभाष चंद्र बोस ने पाँच वर्ष की आयु में अंग्रेज़ी का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया था। युवावस्था इन्हें राष्ट्रसेवा में खींच लाई। गाँधी जी से मतभेद होने के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गए और ब्रिटिश जेल से भागकर जापान पहुँच गए। बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू कर दिया।

'नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था।

क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा-इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे।

और जापानी सैनिकों के साथ उनकी तथाकथित आज़ाद हिंद फ़ौज रंगून (अब यांगून) से होती हुई थल मार्ग से भारत की ओर बढ़ती, 18 मार्च सन् 1944 ई. की कोहिमा और इम्फ़ाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुँच गई। जापानी वायुसेना से सहायता न मिलने के कारण एक भीषण लड़ाई में भारतीयों और जापानियों की मिली-जुली सेना हार गई और उसे पीछे हटना पड़ा। लेकिन आज़ाद हिंद फ़ौज कुछ अर्से तक बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और बाद में हिंद-चीन में अड्डों वाली मुक्तिवाहिनी सेना के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेज़ों से युद्ध किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने के लिए मजबूर किया था। सन् 1943 से 1945 तक 'आज़ाद हिन्द सेना' अंग्रेज़ों से युद्ध करती रही। अन्ततः ब्रिटिश शासन को उन्होंने महसूस करा दिया कि भारत को स्वतंत्रता देनी ही पड़ेगी।

नेताजी बोस का ऐतिहासिक भाषण

रंगून के 'जुबली हॉल' में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया भाषण सदैव के लिए इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, जिसमें उन्होंने कहा था -

"स्वतंत्रता संग्राम के मेरे साथियो! स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल की तरह चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सकें। 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।' खून भी एक दो बूँद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमें में ब्रिटिश साम्राज्य को डूबो दूँ।"

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा"

जब भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था और नेताजी आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए सक्रिय थे। तब आज़ाद हिंद फ़ौज में भरती होने आए सभी युवक-युवतियों को संबोधित करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा- "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।"

'हम अपना खून देने को तैयार हैं', सभा में बैठे हज़ारों लोग हामी भरते हुए प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने उमड़ पड़े। नेताजी ने उन्हें रोकते हुए कहा- "इस प्रतिज्ञा-पत्र पर साधारण स्याही से हस्ताक्षर नहीं करने हैं। वही आगे बढ़े, जिसकी रगों में सच्चा भारतीय खून बहता हो, जिन्हें अपने प्राणों का मोह न हो, और जो आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार हों।"

नेताजी की बात सुनकर सबसे पहले सत्रह भारतीय युवतियाँ आगे आईं और अपनी कमर पर लटकी छुरियाँ निकाल कर, झट से अपनी उंगलियों पर छुरियाँ चलाकर अपने रक्त से प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने लगीं। महिलाओं के लिए 'रानी झांसी रेजिमेंट' का गठन किया गया, जिसकी कैप्टन बनीं लक्ष्मी सहगल।

नेताजी का राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम
युवा सुभाष चन्द्र बोस 
सुभाष बाबू हिन्दी पढ़ लिख सकते थे, बोल सकते थे, पर वह इसमें बराबर हिचकते और कमी महसूस करते थे। वह चाहते थे कि हिन्दी में वह हिन्दी भाषी लोगों की तरह ही सब काम कर सकें। एक दिन उन्होंने अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा- "यदि देश में जनता के साथ राजनीति करनी है, तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है। बंगाल के बाहर मैं जनता में जाऊं तो किस भाषा में बोलूं। इसलिए काँग्रेस का सभापति बनकर मैं हिन्दी खूब अच्छी तरह न जानूं तो काम नहीं चलेगा। मुझे एक मास्टर दीजिए, जो मेरे साथ रहे और मेरा हिन्दी का सारा काम कर दे। इसके साथ ही जब मैं चाहूं और मुझे समय मिले, तब मैं उससे हिन्दी सीखता रहूँ।"

श्री जगदीश नारायण तिवारी को, जो मूक काँग्रेस कर्मी थे और हिन्दी के अच्छे शिक्षक थे, सुभाष बाबू के साथ रखा गया। हरिपुरा काँग्रेस में तथा सभापति के दौरे के समय वह बराबर सुभाष बाबू के साथ रहे। सुभाष बाबू ने बड़ी लगन से हिन्दी सीखी और वह सचमुच बहुत अच्छी हिन्दी लिखने, पढ़ने और बोलने लगे। 'आज़ाद हिंद फ़ौज' का काम और सुभाष बाबू के वक्तव्य प्राय: हिन्दी में होते थे। सुभाष बाबू भविष्यदृष्टा थे, जानते थे कि जिस देश की अपनी राष्ट्रभाषा नहीं होती, वह खड़ा नहीं रह सकता।'

एक रहस्य - नेताजी की मृत्यु
'इंडियन नेशनल आर्मी' के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी रहस्य छाया हुआ है। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में मानी जाती है। समय गुजरने के साथ ही भारत में भी अधिकांश लोग ये मानते है कि नेताजी की मौत ताईपे में विमान हादसे में हुई। इसके अलावा एक वर्ग ऐसा भी है, जो विमान हादसे की बात को स्वीकार नहीं करता। ताईपे सरकार ने भी कहा था कि 1944 में उसके देश में कोई विमान हादसा नहीं हुआ। माना जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण के कुछ दिन बाद दक्षिण पूर्वी एशिया से भागते हुए एक हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त, 1945 को बोस की मृत्यु हो गई। एक मान्यता यह भी है कि बोस की मौत 1945 में नहीं हुई, वह उसके बाद रूस में नजरबंद थे। उनके गुमशुदा होने और दुर्घटना में मारे जाने के बारे में कई विवाद छिड़े, लेकिन सच कभी सामने नहीं आया। हालांकि एक समाचार चैनल से ख़ास साक्षात्कार में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस ने कहा था कि उन्हें भी इस बात पर पूरा यकीन है कि उनके पिता की मौत दुर्भाग्यपूर्ण विमान हादसे में हो गई। उन्होंने कहा था कि नेताजी की मौत का सबसे बड़ा कारण विमान हादसा ही है। कमोबेश उनकी मौत विमान हादसे की वजह से मानी जाती है। इससे इतर जो बातें हैं महज अटकलबाजी हो सकती हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई। अनिता ने इस इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अगर नेताजी विमान हादसे के बाद कहीं छिपे होते तो उन्होंने अपने परिवार से संपर्क करने की कोशिश की होती और नहीं तो जब देश आजाद हुआ तो वे भारत अवश्य ही वापस लौट आते।[4] अधिकांश लोगों का यही मानना है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया से भागते हुए हवाई दुर्घटना में जल जाने से हुए घावों के कारण ताइवान के एक जापानी अस्पताल में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु पर किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। लोगों को लगा कि किसी दिन वे फिर सामने आ खड़े होंगे। आज इतने वर्षों बाद भी जनमानस उनकी राह देखता है। वे रहस्य थे ना, और रहस्य को भी कभी किसी ने जाना है?

भारत के सर्वकालिक नेता - नेताजी बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, माँ भारती के सच्चे सपूत थे। नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे, जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे, जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी। नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी वाक्‌-‌शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर 'स्वतंत्रता आंदोलन' चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।





आज भारत के महान नेता, आधुनिक भारत के निर्माता और स्वतंत्रता संग्रामी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 122वीं जयंती पर हम सब देश के लिए उनके अतुल्य योगदान का स्मरण करते हुए नेताजी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जय हिन्द। जय भारत



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई - 2300 वीं ब्लॉग बुलेटिन

साल का सुरुआत अभी होबे किया है त आज हमको भी बहुत सा पुराना-नया बात याद आ रहा है. ऊ ब्लॉग का स्वर्न काल थाजब नया नया दाखिल हुये थे. बहुत सा लोग तबतक स्थापित हो चुका था अऊर जिनका लेखन हमको बहुत परभावित करता था. सच पूछिये त जेतना सिर्सस्थ लोग आज भी देखाई देता है उनमें हम सबसे जुनियर हैं. मगर धीरे-धीरे हमरा भी पहचान बनता चला गया अऊर कुछ लोग बिहारी होने के बावजूद भी इज्जत देने लगा. इसका सबसे बड़ा कारन जानते हैं का थाहमरा ईमानदारी.

दरसल ब्लॉग-जगत में बहुत बे-ईमानी चलता था. ऊ जमाना था जब बहुत सा “बड़ा लेखक” लोग भी बिना ब्लॉग पढे हुये कमेण्ट में बहुत अच्छाकमाल का लिखा है आपनेबहुत प्रेरक रचना है... ई सब बात लिख देता था. बहुत सा लोग पिछला कमेण्ट पढकर हेर-फेर करके नया टिप्पणी चेप देता था. असल में ऊ लोग का भी मजबूरी थाकाहे कि उनको एक रोज में सैकड़ों पोस्ट पर कमेण्ट जो करना पड़ता थाताकि उनके पोस्ट पर भी ऊ लोग आकर हाजिरी लगाए. अब एतना पोस्ट पढकर कमेण्ट करने में त हालत खराब हो जाएगाओही से एक झटका में सबको निपटा देते थे.

हमरा खराबी एही था कि हम बहुत कम पोस्ट पढते थेमगर पढला के बाद कमेण्ट करते थे. अ आप लोग को भरोसा दिलाते हैं कि आज भी हम बिना पढे कम से कम टिप्पणी त नहिंये करते हैं. एही हाल हमरा फेसबुक पर भी है. बहुत कम पोस्ट लिखते हैंगिना चुना लोग को पढते हैं अऊर टिप्पणी का ओही स्टैंडर्ड बनाकर चलते हैं.

एही चक्कर में केतेना बार अइसा हुआ कि टिप्पणी में कोई कबिता हम लिख दियेत उसको ओहीं पोस्ट करके हम भुला जाते थे. कभी कभी बाद में खोजने से भी नहीं मिलता था. दरसल हम जेतना अपना कबिता को नेग्लेक्ट किये हैं कि अगर हमरा कबिता हमसे बदला लेना चाहे त हमको सात जन्म तक कबिता से वंचित रख सकता है. मगर हमरा कबिता को भी मालूम है कि हम कबिता के बिना नहीं रह सकते हैं अऊर कबिता हमरे साँस साँस में बसता है.


बस गुअजरा हुआ साल में हम कबिता के साथ एगो परयोग किये. सुबह-सुबह व्हाट्स ऐप्प पर लोग एन्ने-ओन्ने का फॉरवर्ड किया हुआ मेसेज भेजता रहता हैहम कभी उसको फ़ॉरवर्ड नहीं करते हैं. हम अंगरेजी का बहुत सा सूक्ति का हिन्दी में भाव अनुवाद करके अऊर उसको एकेदम अपना बनाकर कबिता के रूप में ढाल दिये. फिर उसको अपने पसंद का संदेस से मिलता जुलता फोटो (अऊर कभी कभी अपना फ़ोटो) के साथ अपना करीबी लोग को भेजना सुरू कर दिये. हमरा भी सर्त एही था कि उसको कभी भी फेसबुक पर सेयर नहीं किये. कुछ चाहने वाले लोग शेयर कर दिये त हमको कोनो आपत्ति भी नहीं हुआ.

बस एही सिलसिला अभी तक चल रहा है. इसी बहाने हम अपने अंदर लुकाया हुआ कबि को बाहर निकालने का कोसिस भी किये अऊर कबिता के प्रति जो हमरा करजा था ऊ हो धीरे धीरे चुका दिये. आज लगभग 200 कबिता हम लिख चुके हैं अऊर आप लोग के आसीर्बाद से अभी भी चल रहा है. कबिता अच्छा है या बुरा है मालूम नहींलेकिन बहुत से परसिद्ध लोग से अच्छा कबिता है ई बात त हम अपना खुद का आलोचक होने के नाते भी कह सकते हैं.

कभी मौका मिला त अगिला बार हम अपना कबिता के साथ ब्लॉग-बुलेटिन पेस करेंगे. फिलहाल त देखते देखते 2300 वाँ बुलेटिन आपके सामने आ गया. बधाई आप सब लोगों कोकाहे कि बहुत मोस्किल से हमलोग ई बुलेटिन को आगे बढा पा रहे हैं. सबके साथ बेक्तिगत समस्या हैमगर ऊ का कहते हैं कि आदत हो त छूटियो जाता हैलत कहाँ छूटता है- छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई!
                                                          - सलिल वर्मा 
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गीत नया मत लिखना तब तक

शिकारी माता और कमरुनाग यात्रा- हिमाचल

नये साल में क्या बदलेगा

हे कृष्ण

♥♥♥♥♥अपने औचित्य... ♥♥♥♥♥♥

इस दिन का नेग

“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी १: ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हट के जरा बच के ये है बम्बे मॅरेथॉन!!

अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह जी की १२७ वीं जयंती

एलोवेरा का जूस

दीदी के भाई जी

खंडहर-सी जिंदगी

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लेखागार