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गुरुवार, 17 जनवरी 2019

प्रत्यक्ष गवाह - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एडमंड बर्क बहुत बड़ा इतिहासकार हुआ करता था । वह विश्व का इतिहास लिख—रहा था। उसने इतिहास लिखने में कोई बीस—बाईस वर्ष खर्च किये थे। और बाईसवें वर्ष यह घटना घटी कि उसके घर के पीछे हत्या हो गयी। वह भागा हुआ पहुंचा—शोरगुल सुना, लाश पड़ी थी, अभी आदमी ठंडा भी नहीं हुआ था, अभी खून गर्म था, हत्यारा पकड़ लिया गया था, उसके हाथ में रंगीन छुरा था खून से लहूलुहान, उसके शरीर पर भी खून के दाग थे, राह पर खून की धार बह रही थी और सैकडों लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। बर्क पूछने लगा लोगों से कि क्या हुआ? एक ने एक बात कही, दूसरे ने दूसरी बात कही, तीसरे ने तीसरी बात कही। जितने मुंह उतनी बातें। और वे सभी चश्मदीद गवाह थे। उन सबने अपनी आख के सामने यह घटना देखी थी।

बर्क बड़ी मुश्किल में पड़ गया। बर्क बड़ी चिंता में पड़ गया। वह घर के भीतर गया और उसने बाईस साल मेहनत करके जो इतिहास लिखा था उसमें आग लगा दी। उसने कहा, मेरे घर के पीछे हत्या हो, आख से देखनेवाले लोगों का समूह हो और एक आदमी दूसरे से राजी न हो कि हुआ क्या, कैसे हुआ, हर एक की अपनी कथा हो—और मैं इतिहास लिखने बैठा हूं सारी दुनिया का! प्रथम से, शुरुआत से! क्या मेरे इतिहास का अर्थ?

हम वही देख लेते हैं जो हम देखना चाहते हैं। उसमें कोई हत्यारे का मित्र था। उसे बात कुछ और दिखायी पड़ी। उसमें कोई जिसकी हत्या की गयी थी उसका मित्र था, उसे कुछ बात और दिखायी पड़ी। जो तटस्थ था, उसे कुछ बात और दिखायी पड़ी। सब प्रत्यक्ष गवाह थे। मगर क्या गवाही दे रहे थे!

ओशो : मेरा स्वर्णिम भारत

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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अब आज्ञा दीजिए ...     

जय हिन्द !!!

5 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति। यही इतिहास है सही उदाहरण पेश किया है शिवम जी।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

शिवम जी, बिल्कुल सही कहा आपने। एक ही बात को हर कोई अपने अपने हिसाब से देख कर बोलता हैं।
मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Asha Saxena ने कहा…

सुप्रभात |
मेरी रचना शामिल करने के लिये आभार शिवम् जी |

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप सब का बहुत बहुत आभार |

Kusum Kothari ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति सभी सामग्री पठनीय और आकर्षक।
सभी रचनाकारों को बधाई ।
मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय तल से आभार।

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