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बुधवार, 3 अप्रैल 2013

इंडिया बनाम भारत.. ब्लॉग बुलेटिन



इंडिया बनाम भारत.... बहुत दिनों से बहस चल निकली है की आखिर भारत और इंडिया में इतना अन्तर क्यों है। नज़र उठा भर के देखिए, एक वर्ग ऐसा है जिसके पास आजीविका के लिए भी गुजारा नहीं है और एक वर्ग ऐसा है जो चकाचौंध से भरी जीवन में असल भारत के दुःख और दर्द की कल्पना भी नहीं कर पाता। आखिर एक ही देश में इतना अन्तर कैसे? आज से आई पी एल शुरु हो गया, या फ़िर यूं कहिए की इंडिया में हलचल शुरु हो गई है... पैसा पानी की तरह बहानें और पार्टी के नाम पर सब कुछ लुटानें को बाज़ार तैयार हो गया.. और वहीं दूसरी तरफ़ कर्ज़ से मरता किसान और पानी न होनें से सूखती फ़सल और बंजर पडी ज़मीन को देखकर दुखी किसान। आखिर कैसे कहा जा सकता है कि यह स्थिति एक कॄषि प्रधान देश की हो सकती है। 

आईए एक नज़र डालते हैं हकीकत पर.. 



Poverty Index (Bad states in dark red)

यह क्षेत्रवार व्यौरा देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है की भारत की कितनी बुरी हालत है और हम कितने अनजान हैं असली तस्वीर से। महाराष्ट्र की बुरी हालत देखकर स्थिति और भी डरावनी लगती है क्योंकी मुम्बई को यदि निकाल दे तो फ़िर शेष महाराष्ट्र की हालत शायद बिहार और उडीसा से भी बदतर होगी।  विदर्भ के किसान जो आत्म-हत्या करनें पर मजबूर हो जा रहे हैं शायद वह किसी राजनीतिक दल के वोटर नहीं हैं सो उनकी सुधि लेनें वाला कोई न होगा। पिछले दिनों खबर आई की वानखेडे और सहारा स्टेडियम की घास को खेलनें योग्य बनाए रखनें के लिए पांच करोड का पानी बहा दिया जाएगा, सुन कर बडा दुख हुआ क्योंकी मैं स्वयं मुम्बई में पानी की किल्लत से परेशान हूं और हमारे यहां केवल एक ही समय पानी आ रहा है।  झुग्गी और झोपडे में रहनें वाले आम मुम्बईकर की दिक्कत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं होगा। आखिर पानी बहानें की क्या ज़रूरत है... आम आदमी की मूलभूत सुविधा को तो बनाए रखिए.... किसान के बारे में सोचिए कोई दूरगामी विचार योजना बनाईए और समस्या के समाधान तलाशिए। जब पूरा भारत त्राहि माम कर रहा है ऐसे में बरबादी को रोकना और इंडिया की जरूरत के लिए भारत का दोहन बन्द कीजिए।  

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चलिए अब आज के बुलेटिन की ओर चला जाए
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विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और India का अंतर: राजीव दीक्षित

वो जो सांवला सा रास्ता था

तेरे लिए रिदा हूँ मैं, और तेरी ही 'अदा' हूँ....

आईपीएल तो हैडर स्‍पेस खा गई

उम्र की शाख...

मूर्ख दिवस तो एक बहाना है ....

प्रेम का मौसम, इश्क का दरिया , मोहब्बत का जुनून !!!

वह मुस्कराती मुसहर बच्ची

फील्ड मार्शल सैम 'बहादुर' मानेकशॉ ज़िंदाबाद

होनहार बच्चे और उनके माता - पिता जरा ध्यान दीजिये . ... आपकी खुशियों का सवाल है ....>>> संजय कुमार

छत्तीसगढ यात्रा- विश्वामित्र आश्रम और कर्क ऋषि आश्रम


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आशा है आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा.. आप बुलेटिन का आनन्द लीजिए और हम कल फ़िर मिलेंगे एक नए विचार के साथ.... 

जय हिन्द
देव

मंगलवार, 8 मई 2012

क्या भारत वाकई में आर्थिक महाशक्ति है? ब्लॉग बुलेटिन

भाई हमको हमेशा यह बात कही जाती है की हम दुनिया की बडी अर्थव्यवस्था हैं, और हमारी गिनती दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के बीच होती है... क्या यह सही है....  शायद जीडीपी का राग अलापती हुई हिन्दुस्तानी सरकार अपनें आंकडों के हिसाब से यह बतानें में सफ़ल हो जाये की भारत की स्थिति अन्य पश्चिमी देशों की तुलना में कहीं बेहतर है। लेकिन यथार्थ के धरातल पर देखा जाए तो भारत की स्थिति में बडी असमंजस की स्थिति है... मूडीज़ कहता है भारत की सरकार भारत के विकास की सबसे बडी बाधा है, एस एंड पी पहले ही भारत को आऊटलुक निगेटिव श्रेणी में डाल चुका है । विदेशी निवेश में थोडी मंदी आई है, लेकिन स्थिति उतनी खराब नहीं हुई है.... और सरकार के हिसाब से अभी कुछ गडबड नहीं हुई है और हम इस स्थिति से उबर जाएंगे.... शायद तब तक देर हो चुकी होगी और स्थिति भयावह हो चुकी होगी....  क्या कहेंगे....

प्रणव मुखर्जी बोलते हैं सब्सिडी हम दे नहीं सकते और डीज़ल और गैस के सिलिन्डर को बाज़ार के हवाले करना होगा... मतलब पहले से ही मंहगाई की मार से अधमरी जनता को पूरी तरह मारनें का पूरा इंतज़ाम है। सरकार वोडाफ़ोन डील से हुए नुकसान की भरपाई के लिए कानूनी फ़ेरबदल का पूरा मन बना चुकी है और आज सरकार नें "ईंडिया इज़ नाट ए टैक्स हैवेन" जैसे शब्दों का प्रयोग करके कार्पोरेट जगत को सीधी चेतावनी दे दी है। एक तरीके से सही भी है लेकिन कार्पोरेट डील और विदेशी कम्पनियों से होनें वाले सौदों पर आघात भी है।

भारत विकासशील देश है, और हर सेक्टर को पैसा चाहिए... यह पैसा आयेगा कैसे, इसकी जुगाड में सरकार रोती रहती है। टैक्स से होनें वाली कमाई बे-हिसाब है... और आंकडों पर नज़र डालिए तो जानियेगा की भारत की अर्थव्यवस्था लगभग ५६८ अरब डॉलर के सकल घरेलू उत्पाद के साथ विश्व अर्थव्यवस्था में १२ वां स्थान रखती है, लेकिन केवल १.२५ डालर की प्रति व्यक्ति रोजाना आय (भारत की ४२ फ़ीसदी आबादी) इन आंकडों पर पानी फ़ेरनें के लिए काफ़ी है।  (इस लेख को पूरा पढनें के लिए देव बाबा के ब्लाग "राम भरोसे हिन्दुस्तान" पर आपका स्वागत है).. 

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आईए अब एक नज़र आज के बुलेटिन की ओर डाली जाए.....
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औद्योगिक उत्पादन में कमी गंभीर आर्थिक बीमारी का संकेत   मनोज कुमार at राजभाषा हिंदी 

वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट के दौड़ से गुजर रही है. विकसित देशों में विकास का डर लगातार नकारात्मक हो रहा है. दुनिया भर की निगाहें उन विकासशील और गरीब देशों पर टिकी हैं जहाँ दोहन संभव हो सके. कुछ वर्ष पूर्व भारत भी उन्हीं देशों में से एक था. विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण होता है खपत में कमी. मांग में संत्रिप्तता. ऐसे में उनकी कंपनियों को नए बाज़ार की तलाश होती है. कभी नई प्रोद्योगिकी के नाम पर, तो कभी विकास के नए सोपान को दिखा कर विकसित देश पहले उन देशों की अर्थव्यवस्था को बाज़ार ... more »

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बिहार बाल स्वास्थ्य मॉडल की प्रशंसा  Rajneesh K Jha at आर्यावर्त 

बिहार के बाल स्वास्थ्य मॉडल की प्रशंसा की गई है। गैर सरकारी संगठन 'सेव द चिल्ड्रेन' की रिपोर्ट में बाल स्वास्थ्य की दिशा में बिहार की ओर से उठाए गए कदमों की सराहना की गई है। इसमें कहा गया है, "बिहार देश के गरीब राज्यों में से एक है। यहां बच्चे विटामिन ए की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। देश के ग्रामीण इलाकों में विटामिन ए की कमी की समस्या से जूझ रहे बच्चों का 62 प्रतिशत बिहार में है।" विटामिन ए की कमी से जूझ रहे बच्चों को इससे निजात दिलाने के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2009 में एक योजना चलाई थी, जिससे एक करोड़ 34 लाख बच्चों को लाभ मिला। पांच वर्ष से कम उम्र के करीब 95 प्रतिशत बच्चों को... more » 
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क्रम जारी है ... रश्मि प्रभा... at मेरी भावनायें...

'तब तो बना दे तू भोले को हाथी ....' खेल से परे एक काल्पनिक काबुलीवाला हींग टिंग झट बोल में बस गया ... जब कोई नहीं होता था पास अपनी नन्हीं सी पोटली खोलती काबुलीवाले को मंतर पढके बाहर निकालती और पिस्ता बादाम मेरी झोली में सच्ची मेरी चाल बदल जाती ! फिर मेरे खेल में मेरे सपनों का साथी बना अलीबाबा और शून्य में देखती मैं 40 चोर 'खुल जा सिम सिम ' का गुरुमंत्र लेते बन जाती अलीबाबा और ..... कासिम सी दुनिया रानी की तरह मुझे देख रश्क करती ! कभी कभी आत्मा कहती - यह चोरी का माल है पर चोरों से हासिल करना हिम्मत की बात है आत्मा को गवाही दे निश्चिन्त हो जाती ... पर कासिम पीछा करता चोर मुझे ढ... more »
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लड़ाई जारी है  Randhir Singh Suman at लो क सं घ र्ष !

* * जारी है - जारी है अभी लड़ाई जारी है | यह जो छापा तिलक लगाए और जनेऊधारी है यह जो जात - पात पूजक है यह जो भ्रष्टाचारी है यह जो भूपति कहलाता है जिसकी साहूकारी है उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है | यह जो तिलक माँगता है , लड़के की धुस जमाता है कम दहेज पाकर लड़की का जीवन नर्क बनाता है पैसे के बल पर यह जो अनमेल व्याह रचाता है यह जो अन्यायी है सब कुछ ताकत से हथियाता है उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है | यह जो काला धन फैला है , यह जो चोरबाजारी है सत्ता पाँव चूमती जिसके , यह जो सरमायेदारी है यह जो यम - सा नेता है , मतदाता की लाचारी है उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है | जार... more » 
 
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वॉट्स विक्‍की डॉनर  Kulwant Happy "Unique Man" at युवा सोच युवा खयालात

*विक्‍की डॉनर *को लेकर तरह तरह की प्रक्रिया आई और आ भी रही हैं। फिल्‍म बॉक्‍स आफिस पर धमाल मचा रही है। फिल्‍म कमाल की है। फिल्‍म देखने लायक है। मैं फिल्‍म को लेकर उत्‍सुक था, लेकिन तब तक जब तक मुझे इसकी स्‍टोरी पता नहीं थी। मुझे पहले पोस्‍टर से लगा कि विक्‍की डॉनर, किसी दान पुण्‍य आधारित है। शायद एक रिस्‍की मामला लगा। जैसे सलमान की चिल्‍लर पार्टी। मगर धीरे धीरे रहस्‍य से पर्दा उठने लगा। हर तरफ आवाज आने लगी, विक्‍की डॉनर, सुपर्ब। बकमाल की मूवी। मैं पिछले दिनों सूरत गया। वहां मैंने पहली दफा इसका ट्रेलर देखा। ट्रेलर के अंदर गाली गालोच के अलावा कुछ नजर नहीं आया। दान पुण्‍य तो दूर की ... more » 
 
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किसी का जीवन भी व्यर्थ नहीं जाता  डा.राजेंद्र तेला"निरंतर "निरंतर" की कलम से.....

नन्हा चूजा एक दिन बोला अपनी माँ से चील हमारी जान की दुश्मन उसको क्यों बनाया भगवान् ने माँ को समझ नहीं आया कैसे शांत करे चूजे की जिज्ञासा माँ फुर्र से उड़ गयी पकड़ कर लायी एक नन्हे कीड़े को चोंच में चूजे से बोली लो अपना पेट भर लो चूजा बोला पेट बाद में भरूंगा पहले मेरी बात सुन लो मुझे समझ आ गया क्यों भगवान् ने चील को बनाया जिसे भी भगवान् ने बनाया किसी ने किसी के काम आता किसी का जीवन भी व्यर्थ नहीं जाता  
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कट रही है ये जिन्दगी जिन्दगी की तलाश मे  KK at " मेरे जज्बात "

कभी गम की तलाश में कभी ख़ुशी की तलाश में कट रही है ये जिन्दगी जिन्दगी की तलाश में मैंने पूछा, के "ऐ हवा तू भटकती है यूँ क्यूँ .." जवाब आया के "रहती हूँ मैं किसी की तलाश में " ना बहर सीखी कभी ना वज़न नापा लफ़्ज़ों का बस सफहे ही रंगे हमने शायरी की तलाश में हमने तो इश्क में उसको खुदा का दर्जा है दे दिया आप सर मारिये पत्थर पे हाँ, बंदगी की तलाश में 

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एक और अवतार तो बनता है Ghotoo at परिकल्पना 

*व्यंग्य * * * *जब धरा पर पाप का भार बढ़ता है ** बेईमानी और भ्रष्टाचार बढ़ता है राजा,सत्ता के मद में मस्त होता है आम आदमी परेशान और त्रस्त होता है ऋषियों के तप भंग किये जाते है दुखी हो सब त्राहि त्राहि चिल्लाते है भागवत और पुराण एसा कहते है ऐसे में भगवान अवतार लेते है चुभ रहे सबको मंहगाई के शूल है सारी परिस्तिथियाँ,आपके अवतार के अनुकूल है जनता दुखी है,मुसीबत ही मुसीबत है भगवान जी,अब तो बस आपके अवतार की जरूरत है कई बार आपके आने की आस जगी लेकिन हर बार ,निराशा ही हाथ लगी कंस की बहन देवकी ,कारावास गयी, मगर कृष्ण रूप धर तुम ना आये कई रानियाँ रोज सत्ता की खीर खा रही है, पर राम रूप धर तुम ना... more »
 
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आप ब्लॉगर हैं , लेखनी का इतना अपमान मत कीजिये. ZEAL at ZEAL 

बूढा शेर, शेरखोर लोमड़ी, असुर लोमड़ी, मृत शेरनी की खाल में लोमड़ी, जंगली कुत्ते, दीवाने लकड़बग्घे , बोटी पर लपकने वाला चम्चौड़ कुत्ता, बहादुर बाघ। खच्चर-प्रेस गर्दभ खिसियानी लोमड़ी। ऊदबिलाव आदि आदि... ------------------------------ जी हाँ ये है भाषा आजकल के प्रबुद्ध लेखकों की। जब कोई स्त्री अपने दम पर आगे बढती है, सामाजिक सरोकार से जुड़े विषयों पर लिखती है और अनायास किसी की जी- हुजूरी नहीं करती तो कुछ लोगों की आँख की किरकिरी बन जाती है। वे उस स्त्री को शेरनी की खाल में लोमड़ी कहते हैं। और जो उस स्त्री का साथ देगा उसे "चम्चौड़ कुत्ता" कहा जाएगा। गालियाँ देने के लिए सदियों से मूक और निर्... more »
 
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सच्चे का मुंह काला ... झूठे का बोलबाला  आज़ाद पुलिस at आज़ाद पुलिस 

आज़ाद पुलिस की वर्षों संघर्ष का कोई निष्कर्ष नहीं निकला.... हज़ारों चिट्ठियाँ राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और तमाम प्रशासनिक अधिकारियों को लिखने के बावजूद भी किसी समस्या पर आज तक सुनवाई नहीं की गयी... तिरंगा नाम के गुटखे के पाउच पर "तिरंगा" झंडे का निशान तिरंगे का सरासर अपमान है... आज़ाद पुलिस की ओर से यह मुद्दा कई वर्षों से उठाया जा रहा है परन्तु आज तक इस कंपनी पर किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं की गयी...आज भी तिरंगे के नाम पर गुटखा सरे बाज़ार बिक रहा है और लोग गुटखा खा कर तिरंगे पर थूक रहे हैं... इस सम्बंध मे सैकड़ों पत्र हर बड़े अधिकारी यहाँ तक कि मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति तक लिखे जा चुके ह... more »
 
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मेरे गीत - सतीश सक्सेना सतीश सक्सेना at मेरे गीत ! 

*सबसे पहला गीत सुनाया * *मुझे सुलाते , अम्मा ने ! * *थपकी दे दे कर बहलाते * *आंसू पोंछे , अम्मा ने !* *सुनते सुनते निंदिया आई,आँचल से निकले थे गीत !* *उन्हें आज तक **भुला* *न पाया **,बड़े मधुर थे मेरे गीत !* * * *आज तलक वह मद्धम स्वर * *कुछ याद दिलाये कानों में ** * *मीठी मीठी लोरी की धुन * *आज भी **आये, कानों में ! * *आज जब कभी ** नींद ना आये,कौन सुनाये मुझको गीत ! * *काश कहीं से मना के लायें , मेरी **माँ को , मेरे गीत !* * * *मुझे याद है , **थपकी देकर * * माँ अहसास दिलाती थी **! * *मधुर गुनगुनाहट सुनकर * *ही,आँख बंद हो जाती थी !* *आज वह लोरी उनके स्वर में, कैसे गायें मेरे गीत !*... more »
 
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 आशा है आपको अर्थव्यवस्था से गीत तक का सफ़र पसन्द आया होगा.... तो आज का बुलेटिन यहीं तक और मिलते हैं एक ब्रेक के बाद..... तब तक के लिए देव बाबा की राम राम
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मंगलवार, 1 मई 2012

आई आर सी टी सी... भारतीय रेलवे का सफ़ेद हाथी... ब्लॉग बुलेटिन

आई आर सी टी सी.... भारतीय रेलवे की वह सेवा जो इन्टरनेट के माध्यम से टिकट बुकिंग सुविधा देती है, यात्रियों को कैटरिंग की सुविधा भी इसी के ज़िम्मे है। लेकिन क्या यह सुविधा वाकई आम आदमी के लिए है? मैं अपना अनुभव आपके सामनें रखता हूँ ।

दिन-१:  सर्विस अनएवेलेबल









दिन-२: कम्यूनिकेशन फ़ेल


दिन-३: सर्विस अनएवेलेबल


दिन-४: आज सुबह भी जब सर्विस अन-एवेलेबल देखा तो समझ में नहीं आया की आखिर टिकट बुकिंग होगी कैसे।

फ़िर खबर मिली की एजेंट के ज़रिये हमारे एक मित्र नें मुम्बई से दिल्ली की टिकट कटा ली है, कैसे ? आखिर जब एजेन्ट लागिन बन्द है तो फ़िर कोई एजेन्ट तत्काल में कैसे बुकिंग करा सकता है। पता लगा काऊंटर पे जा कर.... मतलब यह एजेन्ट लोग आपसे पैसा ले के काऊंटर पर से टिकट ला सकते हैं.... यह गोरखधंधा है क्या...  रोजाना रेलवे के दस लाख से ज्यादा टिकट ओपन होते हैं और सिर्फ एक मिनट में ही दो से ढाई हजार टिकट बुक हो जाते हैं। साइट पर इतनी ज्यादा लोड होनें के कारण और कुछ रेलवे के दलालों की मिली भगत से होनें वाली गडबडियों के चलते आप अपनी बुकिंग नहीं कर पाते। 

अब खबर मिली है की रेलवे हर यात्री को एक नई सुविधा देने वाला है, इसके तहत आप अपने पैसे रेलवे के एकाऊंट में जमा कराईए और बुकिंग के टाईम पर उसी रिफ़्रेंस नम्बर के ज़रिये टिकट बुक कर लीजिए... यह भी रेलवे का राजस्व कमानें का एक नया तरीका है... इसके ज़रिये वह आराम से अपनी नकदी मे इज़ाफ़ा कर सकेगा... ज़रा सोचिये बैंक की साईट पर कितना डिले होता है? और आईआरसीटीसी पर कितना.... अजी जनाब यदि पे-मेंट गेटवे की जगह रेलवे के खाते से पैसे निकालनें होंगे तो उसमें होने वाला डिले बैंक गेटवे से होनें वाले डिले से कहीं अधिक होगा और रेलवे फ़िर ओवर-लोड का ड्रामा करेगा। 

आखिर रेलवे अपनें इस सिस्टम को रिपेयर क्यों नहीं करता, क्या आईआरसीटीसी का सर्वर इतनें ट्रांसैक्शन भी नहीं झेल सकता... आखिर इस गोरखधंधे की वजह से कब तक जनता त्रस्त रहेगी? 

रेलवे की चार महीने पहले आरक्षण सुविधा: यह केवल रेलवे का राजस्व बढानें की प्रक्रिया है, आखिर कितने लोगों को चार महीनें पहले पता है की उन्हे यात्रा करनी है? यह एक महिने से अधिक नहीं होना चाहिए... लेकिन रेलवे सुविधा के नाम पर अपनी नकदी बढा लेती है। 

रेलवे की तत्काल सेवा: एक दिन पहले मिलनें वाली इस सेवा का लाभ केवल दलाल ले जा रहे हैं क्योंकि सुबह आठ बजे साईट "सर्विस अन-एवेलेबल" कर देती है और जब साईट खुलती है तब तक सब टिकट बुक हो चुके होते हैं... आखिर टिकट ले कौन जाता है ? 

कुछ सुझाव:
  • आखिर रेलवे का निजीकरण क्यों न किया जाये, या फ़िर आई-आर-सी-टी-सी को किसी निजी कम्पनी को शत प्रतिशत दे दिया जाए... 
  • आरक्षण प्रणाली को कुछ अंगो में तोड दिया जाए.... जैसे रेलवे के मंडल हैं, वैसे ही रेलवे के मुख्यालयों में उस डिविजन के ट्रेनों की बुकिंग के सर्वर लगाएं जाए, यदि कोई ट्रेन मुम्बई से शुरु होती है, तो उसकी बुकिंग मुम्बई से ही हो न की दिल्ली के इकलौते सर्वर पर पूरे भारत का लोड डाला जाए...
  • रेलवे के सर्वर्स पर लोड-बैलेंसिग मेकेनिज़्म की जांच हो, ट्रांसैक्सन्स और पर-सेकेण्ड के लोड की किसी आई-टी औडिट फ़र्म से जांच हो, किसी प्रकार के सर्वर अप-ग्रेड की गुंजाईश को तलाशा जाए
  • रेलवे के थके हुए और एकदम सुस्त कर्मचारियों को बुकिंग काऊंटर से हटाया जाए, उनकी जगह थोडे चुस्त दुरुस्त कर्मचारियों की बहाली हो... 
यदि भारतीय रेलवे को वाकई जनता से कोई सरोकार है तो उसे कुछ न कुछ तो करना चाहिए, लेकिन रेलवे केवल सरकारी मंत्रियों के लिए एक लाभ का प्रक्रम है, और इसके ज़रिये होनें वाले बडे मुनाफ़े पर सभी घटक दलों की नज़र लगी रहती है।  आखिर ऐसा कौन सा व्यापार होगा जिसमें माल की डिलीवरी के चार महिनें पहले पूरे पैसे की वसूली हो जाए... सोचिए ज़रा.... 


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चलिए अब आज के बुलेटिन पर आपको लिए चलें..... 
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दगाबाज यह जीव, घूमता हर महफ़िल में-  रविकर फैजाबादी at "कुछ कहना है" 

कुंडली खिड़की झिडकी खा रही, काँच उभारे अक्स । परदे गरदे से भरे, नहीं रहे हैं बख्स । नहीं रहे हैं बख्स, बसाया कैसे दिल में ? दगाबाज यह जीव, घूमता हर महफ़िल में । घुसता धक्का-मार, खिड़कियाँ देखे भिड़की । जाए काँच बिखेर, थपेड़े खाए खिड़की ।। दोहा दिल-दर्पण के काँच को, लगी धाँस मन-जार । तन-खिड़की झिडकी गई, भंगुर छिटक अपार।। ~ dhanyavaad ~

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मई दिवस Randhir Singh Suman at लो क सं घ र्ष !

पहली मई की घटना और उसको अन्तराष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता मिले सौ वर्ष से उपर का समय बीत चुका है |1886 से लेकर आज तक के 126 सालो के इतहास में मजदूर दिवस ने मजदूर आंदोलनों के चढाव -उतार का इतिहास देखा है |मजदूर वर्ग को ,क्रांतिकारी मजदूर पार्टियों को समाज का क्रांतिकारी बदलाव करते हुए देखा है |मजदूर वर्ग को शासक वर्ग बनते ,फिर उससे सत्ताच्युत होते देखा है | अन्तराष्ट्रीय मजदूर -दिवस के प्रति विश्वव्यापी जोशो -खरोश देखा है |फिर उसके प्रति वर्तमान समय जैसी की जा रही फर्ज अदायगी का दौर भी देखा है और देख रहा है | अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों को गोलिया खाकर गिरते -मरते देखा है |मजद... more » 
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बैंक बैलेंस को छोड़िए, किरपा होए महान  अनुराग मुस्कान at चौथा बंदर

कुत्ते को रोटी खिलाते डरता हूं। कुत्ता रोटी खाकर दुम हिलाने की बजाए कहीं बदले में होने वाली किरपा का हवाला देकर किरपा की रॉयल्टी ना मांग बैठे। ये किरपा के महिमा मुंडन का, ‘द डर्टी पिक्चर’ के सुपरहिट होने जैसा टाइम चल रहा है। किरपा का खेल क्रिकेट से ज़्यादा लोकप्रिय हो गया है आजकल। पहले टीवी देखने से आंखें खराब होने का डर सताता था लेकिन अब टीवी देखने से भी किरपा आती है। पहले पहल तो मैं समझा की किरपा कोई कन्या है जो मुझे हरी चटनी के साथ समोसा, भल्ला, आलू टिक्की और गोलगप्पे खाता देखकर जीभ लपलपाती हुई चली आएगी। बाद में पता चला कि इस किरपा की जीभ तो कन्या प्रजाति से भी ज्यादा चटपटाल... more » 
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राष्ट्रपति चुनाव: तलाश है 24 कैरेट के मुसलमान की महेन्द्र श्रीवास्तव at आधा सच...

*आ*मतौर पर देश में राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर ज्यादा हो हल्ला होते नहीं देखा जाता था, लेकिन पिछले चुनाव यानि यूपीए वन के दौरान दस दिन तक जो ड्रामा चला, उसी से साफ हो गया कि आने वाले समय में राष्ट्रपति के चुनाव में भी वो सब चलने लगेगा जो आमतौर पर और चुनावों में चलता है। पूर्व राष्ट्रपति डा. ए पी जे अब्दुल कलाम साहब का कार्यकाल पूरा होने के पहले नए राष्ट्रपति के चुनाव की बात शुरू हुई तो उस समय भी एक बड़ा तपका इस पक्ष में था कि कलाम साहब को ही दोबारा राष्ट्रपति बना दिया जाना चाहिए। लेकिन कांग्रेस को ये बात मंजूर नहीं थी। यूपीए वन के सहयोगी रहे लालू यादव और राम विलास पासवान की भी इस सम... more » 

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एक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा मुझे... ZEAL at ZEAL 

एक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा मुझे। जब खुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा..... 
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तुम आ गये मोहन वन्दना at ज़ख्म…जो फूलों ने दिये

तुम आ गये मोहन दीन हीन की आर्त पुकार सुन तुम आ गये मोहन कैसे कैसे खेल खेलते हो कभी छुपते हो कभी दिखते हो मगर सुनो तो ज़रा हम हैं तुम्हारे तुम जानते हो फिर ये लुकाछिपी का खेल क्यों दिखाते हो देखो ना अब तुम्हें ही खुद आना पडा इतना कष्ट उठाना पडा जानती हूँ....... इसीलिये आये हो आखिर अस्तित्व पर प्रश्न जो उठ गया था या शायद भक्त तुम्हारा रूठ गया था या आस्था पर प्रश्नचिन्ह लग गया था और वचन के तुम पक्के हो मिथ्या भाषण नहीं दिया था योगक्षेम वहाम्यहम यूँ ही नहीं कहा था सिर्फ यही सिद्ध करने को आज कैसी दौड़ लगायी है मोहन मोहन तुम और तुम्हारी माधुरी लीला देखो ना सिर्... more » 
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वो मुझसे प्यार करता है तो फिर कहता क्यों नहीं है AlbelaKhatri.com at Albelakhatri.com

ख्याले यार में गुम वो जानेमन रहता क्यों नहीं है मेरी तरह मस्ती के दरिया में बहता क्यों नहीं है हया कैसी मोहब्बत में उसे, डर कैसा बदनामी का वो मुझसे प्यार करता है तो फिर कहता क्यों नहीं है
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हर फिकराकस की एक औक़ात होती है..... अदा at काव्य मंजूषा 

मसक जातीं हैं, अस्मतें, किसी के फ़िकरों की चुभन से, बसते हैं मुझमें भी हया में सिमटे आदम और हव्वा, जो झुकी नज़रों से देखते हैं, खुल्द के फल का असर | दिखाती हैं सही फ़ितरत,  इन्सानों की, उनकी तहज़ीब-ओ-बोलियाँ, वर्ना पैरहन के नीचे  सबका सच एक ही होता है , मानों...या न मानों फ़िकरों की भी, ज़ात होती है, और हर फिकराकस की  एक औक़ात होती है..... इतना तो याद है
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श्रमिक दिवस पर एक कविता मनोज कुमार at मनोज 

*श्रमकर पत्थर की शय्या पर* *---मनोज कुमार* दिन जीते जैसे सम्राट, चैन चाहिए कंगालों की। रहते मगन रंग महलों में, ख़बर नहीं भूचालों की। तरु के नीचे श्रमकर सोये, पत्थर की शय्या पर। दिन भर स्वेद बहाया, अब घर लौटे हैं थककर। शीतलता कुछ नहीं हवा में, मच्छर काट रहे हैं। दिन भर की झेली पीड़ाएं, कह-सुन बांट रहे हैं। अम्बर बन गया वितान, चिंता नहीं दुशालों की। जब से अर्ज़ा महल, तभी से तुमने नींद गंवाई। सुख-सुविधा के जीवन में, सब आया नींद न आई। कोमल सेज सुमन सी, करवट लेते रात ढ़लेगी। समिधा करो कलेवर की, तब यह जीवन अग्नि जलेगी। दुख शामिल रहता हर सुख में, ... more » 
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ना चाहो तो डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" at "निरंतर" की कलम से.....   
ना चाहो तो ख़त का जवाब ना दो ना कभी मिलो हमसे जानते हैं कुछ तो मजबूरी होगी तुम्हारी जो रूबरू नहीं होते हमसे तुम याद करते हो यही काफी हमारे लिए रिश्तों को तोड़ना हमारी फितरत नहीं किसी और सहारे की हमको ज़रुरत नहीं तुम खुश रहो यही काफी है जीने के लिए
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सुप्रीम कोर्ट का तिवारी को राहत देने से इनकार.   Kusum Thakur at आर्यावर्त
एन.डी. तिवारी को किसी तरह की राहत देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन्हें निर्देश दिया कि वह अपने खिलाफ चल रहे पितृत्व मामले में डीएनए नमूने के लिए ब्लड सैंपल दें। कोर्ट ने यह भी कहा कि 'बस अब बहुत हो गया।' जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस सी.के. प्रसाद की बेंच ने कहा, 'बस बहुत हो गया। आप पहले मौकों पर मौजूद नहीं थे। आपकी उम्र को देखते हुए हमने आपको सीलबंद नमूना देने के लिए कहा था। हमने आपको आर्टिकल-21 के तहत प्रोटेक्शन दिया था लेकिन अब बस बहुत हो गया।' रोहित शेखर नामक युवक द्वारा दाखिल पितृत्व मामले में कोर्ट ने यह निर्देश दिया। रोहित खुद को 86 वर्षीय तिवारी का बेटा... more »

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 " एक रोटी की कहानी "   शिवम् मिश्रा at बुरा भला
" एक रोटी की कहानी "
 डाइनिंग टेबल पर खाना देखकर बच्चा भड़का ... फिर वही सब्जी,रोटी और दाल में तड़का....? मैंने कहा था न कि मैं पिज्जा खाऊंगा रोटी को बिलकुल हाथ नहीं लगाउंगा बच्चे ने थाली उठाई और बाहर गिराई.......? ------- बाहर थे कुत्ता और आदमी दोनों रोटी की तरफ लपके .......? कुत्ता आदमी पर भोंका आदमी ने रोटी में खुद को झोंका और हाथों से दबाया कुत्ता कुछ भी नहीं समझ पाया उसने भी रोटी के दूसरी तरफ मुहं लगाया दोनों भिड़े जानवरों की तरह लड़े एक तो था ही जानवर, दूसरा भी बन गया था जानवर..... आदमी ज़मीन पर गिरा, कुत्ता उसके ऊपर चढ़ा कुत्ता गुर्रा रहा थ... more »

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 मित्रों, आज का बुलेटिन यहीं तक... कल फ़िर आयेंगे एक नये रंग में... तब तक के लिए जै राम जी की...
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बुधवार, 14 मार्च 2012

इधर रेल बजट आया और उधर मंत्री गया.... ब्लॉग बुलेटिन

लीजिए भाई.... आज आ गया रेल बजट....  इधर रेल बजट आया और उधर मंत्री गया....   दिन भर की आपाधापी के बाद घर आये और सोचा ज़रा रेल बजट पर नज़र डाली जाए.... कोई भी समाचार चैनल इस बज़ट दिखानें की जगह राजनीतिक नौटंकी दिखानें में ज्यादा रुचि ले रहे हैं।  इस नौटंकी को किनारे किया जाये और असल समस्या को देखा जाए..... बोले तो "किराया बढ गया".... वह भी अच्छा खासा....

एक नज़र:

उप-नगरीय एवं सामान्य दूसरे दर्जे के किराये में दो पैसे प्रति किलोमीटर की वृद्घि
मेल एक्सप्रेस सेकंड क्लास का किराया सिर्फ तीन पैसे प्रति किलोमीटर
स्लीपर क्लास के किराये में पांच पैसे प्रति किलोमीटर
वातानुकूलित चेयर कार, एसी3 टियर और फ़र्स्ट क्लास के किराये में केवल 10 पैसे प्रति किलोमीटर
एसी 2 टियर के किराये में 15 पैसे प्रति किलोमीटर
और एसी प्रथम श्रेणी का किराया 30 पैसे प्रति किलोमीटर 
प्लेटफ़ार्म टिकट: पांच रुपये

कहते हैं आर्थिक रूप से रेलवे को दीवालिए पन से निकालनें के लिए इस प्रकार का बहादुर बज़ट दिया गया। बहादुरी से भरे हुए रेल मंत्री शाम होते होते गठबंधन की राजनीति के सबसे तगडे शिकार हो गये.... अब चाहे ममता की दबंगई कहें या फ़िर मनमोहन की मजबूरी.... फ़िलहाल जो कुछ भी हो... जनता और सरकार दोनों के लिए कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा। 

वैसे उत्तर प्रदेश में चुनाव हो चुके हैं और उसके बाद एक घातक और खतरनाक बज़ट की उम्मीद तो थी, लेकिन इतना खतरनाक... इसकी उम्मीद कम थी। मेरी समझ में एक बात नहीं आती की आखिर ऐसा कौन सा व्यापार होगा जिसमें माल की डिलीवरी के १२० दिन पहले पूरा पैसा ज़ेब में आ जाये.... फ़िर भी घाटा... हमको तो नौटंकी लगती है....  सुबह आठ बजे आई-आर-सी-टी-सी की वेब साईट को देखिए, कैसे उसकी जान निकल जाती है, १२० दिन पहले सुबह आठ बजे ओपनिंग और आठ बजकर बाईस मिनट पर टिकट वेटिंग आ गई.... आखिर सारी टिकट कौन ले गया ? टिकट दलाली का बडा गोरखधंधा लगता है भाई.... 

वैसे इस खबर से इतर एक और बात पर ध्यान गया... अमेरिकी वेबसाइट इनसाइडर ने दावा किया है कि सोनिया गांधी के पास 2 से 19 अरब डॉ़लर (99अरब से 948 अरब रुपए) की संपत्ति है....  और सोनिया गांधी हिन्दुस्तान की सबसे अमीर राजनेता हैं....   

चलिए सोनिया जी को नोट गिनने दिया जाये.... ममता को गरजनें दिया जाये और मनमोहन जी को म्यूट मोड में ही छोड दिया जाये...... और अपनें बुलेटिन की ट्रेन को आगे बढाया जाये......

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देखें कब आस की पगडण्डी ख़त्म होती है ...............   वन्दना at ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र

सुनो ........ हाँ ........... क्यूँ इतनी उदास हो तुम आज? ....................... क्या आज फिर? ......................... कुछ तो कहो ना ........................ देखो तुम्हारा मौन मुझे झुलसाता है कुछ तो कहो ना क्या कहूं? कुछ नहीं है कहने को बस जीना है इसलिए जी रही हूँ किसके लिए ? ये भी पता नहीं फिर आज इतनी उदासी क्यूँ? आज फिर कौन सी शाख टूटी है सपनो की छोड़ो , क्या करोगे जानकर जब तक जान है इस लाश में इसे तो ढोना ही होगा ना लगता है आज कहीं फिर से आसमां रोया है कोई चक्रवात जरूर आया है तभी आशियाँ उजाड़ नज़र आता है ये बिखरे खामोश मंज़र अपनी कहानी खुद बयां कर रहे हैं अच्छा बताओ क्या मैं... more »
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मेरा कुत्ता  रवीन्द्र प्रभात at वटवृक्ष 

मेरा कुत्ता नेता हो गया है लोगों का चहेता हो गया है जहाँ भी जाये जुगत भिड़ा लेता है भाषण देने लगे तो जमा देता है कुत्ता मेरा है -- पर काम आपके भी आ सकता है मसलन मनचाही जगह आपकी ट्रांसफर करा सकता है या पड़ोसियों को झूठे मुकदमे में फँसा सकता है आप कहेंगे फाँक रहा है इसका कुत्ता है न इसीलिये हाँक रहा है मगर झूठी बात नहीं करता हूँ ऐसा इसीलिए कहता हूँ क्योंकि पहले मेरा कुत्ता खाना खाने के बाद पाँच घंटे के लिए गायब हो जाता था फिर वह पाँच पाँच हफ़्‍ते पर आने लगा और कुछ दिनों बाद तो पाँच महीने पर आकर खाने लगा और अब तो बिल्कुल गजब ढाता है खाना खाने के बाद पाँच साल के लिए गायब ह... more »
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डेरी मिल्क प्रोमिस माने सबसे पक्का प्रोमिस पूजा उपाध्याय at लहरें...

'डांस विथ मी?' 'क्यूँ' 'गाना बहुत अच्छा आ रहा है' 'और' 'धूप बड़ी खूबसूरत खिली है' 'तो' 'तुम्हारी आँखें बहुत सुन्दर लगेंगी' 'अच्छा' 'चलो, डेरी मिल्क पेपरमिंट वाला' 'प्रोमिस' 'हाँ...अब चलो भी...गाना ख़त्म हो जायेगा' 'तुम कहते हो मुझे डांस करना नहीं आता' 'अरे बाबा...आई विल लीड...तू बस ऐसे मेरे काँधे पर हाथ रख, नाउ होल्ड माय हैण्ड एंड मूव विद मी' 'ये गाना कितना पुराना है?' 'तब का है जब तुम पैदा भी नहीं हुयी थी' 'बस सोलह साल पुराना...लगता तो ऐसा है जैसे साठ साल पुराना हो...इसके साथ तो भूत भी घर के डांस करने लगे होंगे' 'वाल्त्ज़ कहते हैं इसे' 'ह्म्म्म' --- और लड़की हँसे जा रही थी...खुश थी बहुत.... more »



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"दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे..." - बोलती फ़िल्मों के ८१ वर्ष पूर्ती पर आज एक बार फिर से 'आलम आरा' की यादों को ताज़ा किया जाए! 

*आज १४ मार्च २०१२ है। ८१ वर्ष पहले आज ही के दिन बम्बई के 'मजेस्टिक सिनेमा' में रिलीज़ हुई थी पहली सवाक फ़िल्म 'आलम आरा'। आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की ग्यारहवीं कड़ी में इसी फ़िल्म के गीतों की चर्चा, सुजॉय चटर्जी के साथ, और साथ में सुनिए प्रथम फ़िल्मी गीत "दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे" का एक संस्करण गायक हरिहरण की आवाज़ में।* *एक गीत सौ कहानियाँ # 11* जैसा कि सर्वविदित है पहली भारतीय बोलती फ़िल्म ‘आलम-आरा’ के १४ मार्च १९३१ के दिन बम्बई में प्रदर्शित होने के साथ ही फ़िल्म-संगीत का युग भी शुरु हो गया था। इम्पीरियल फ़िल्म कंपनी के बैनर तले अरदशेर ईरानी और अब्दुल अली यूसुफ़ भाई ने मिलक... more » 
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* दोस्तोआपके दुःख को मैं समझ सकता हूँ. आपका कोई न कोई दोस्त आपको किसी ग्रुप में भर्तीकरवा देता है और आप उस ग्रुप में होने वाली प्रत्येक गतिविधि की खबर पाते रहते हैं औरआपका ई मेल खचाखच भर जाता है. नीचे उपाय बता रहा हूँ उसे अपनाइए और सभी ग्रुपोंमें मस्त होकर बैठे रहिए.*** * * *सबसे पहले दायीं ओर ऊपर स्थित नोटिफिकेशन पर क्लिक करे * * * *इसके बाद सेटिंग पर क्लिक करें * *अब आपको काले घेरे में कुछ दिख रहा है आपको? यदि नहीं दिख रहा है तो Ctrl के साथ + **की बटन **दबाएँ और तस्वीर को बड़ा करके देखें. दोबारा उसी स्थिति में आने के लिए **Ctrl के साथ - की बटन दबाएँ.* *इसी काले घेरे में... more »
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  * * *गीत गाते रहो-गुनगुनाते रहो,
*** *एक दिन प्रीत उपहार हो जाएगा।
*** *जगमगाते रहो-खिलखिलाते रहो,
*** *एक दिन मीत संसार हो जाएगा।।

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discrimination  कानपुर यूनिवर्सिटी टीचर्स ब्लॉग असोसिएसन(KANPUR UNIVERSITY TEACHERS BLOG ASSOCIATION)

हम भारत के लोग .........कहने को यह शब्द इतना सरल लगता है कि सभी आपको इस का मतलब समझा देंगे पर इतना सरल भी नही है क्यों कि सामान्य अर्थो में तो यह कहा जा सकता है कि जो भारत में रह रहे है पर जब इस शब्द के दर्शन में जायेंगे और भारत के संविधान के प्रस्तावना के आईने में इसे समझने की कोशिश करेंगे तब इस वाक्य के मतलब बदल जायेंगे क्योकि प्रस्तावना के साथ जब अनुच्छेद १५ , १६ और १७ को पढ़ा जायेगा तो तो स्वतः ही समझ में आ जायेगा कि भारत के लोगो की विविधता ने इस अर्थ को क्या रूप दिया है . .. more » 
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मोर्ट फोर्ट स्कुल में एडमिसन  माधव at माधव 

*माधव के साथ २२ फरवरी -१० मार्च तक आरा /बक्सर गया था . ११ मार्च को श्रमजीवी से दिल्ली लौटा . दिल्ली आते ही माधव के एडमिसन में लग गया . कुछ भले लोगो की कृपा से आज माधव का एडमिसन मोर्ट फोर्ट स्कुल में हो गया है . एडमिसन हो जाने से बहुत खुशी है .* *मोर्ट फोर्ट स्कुल बिल्डिंग * 
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बरसात का एक दिन   मनोज कुमार at विचार 

बरसात का एक दिन! कलकत्ता में वर्षा झट से आती है और जमके बरसती है। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। इन दिनों डेली यात्री के बांए कंधे पर बैग और दाएं हाथ में छाता का होना एक आवश्‍यक सामग्री है। धर्मतल्ला पर बस से उतरा ही था कि ज़ोर की वर्षा शुरू हो गई। जब तक छाता खोलता थोड़ा-बहुत भींग ही गया। इतनी मूसलाधार बारिश थी कि खुद को बचते-बचाते फुटपाथ पर आश्रय लेना पड़ा। वहां बहुत सारे लोग थे। क़रीब-क़रीब एक दूसरे से चिपके पानी की बूंदो से खुद को बचाते। कुछेक महिलाएं भी थी, पानी की बूंदे तो उन्‍हें परेशान कर ही रही थी, लोगों की नजरों एवं  more »
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कुछ हट के--अग्रोहा धाम की यात्रा के कुछ पल ......संजय भास्कर संजय भास्कर at आदत...मुस्कुराने की

**********जय बजरंग बली************* 
मेरी अग्रोहा धाम की सैर के कुछ पल ब्लॉग पर इस बार कुछ हट आप सभी मित्रो के लिए आप सभी ब्लॉगर साथियों को मेरा सादर नमस्कार काफी दिनों से ब्लॉगजगत को समय नहीं दे पा रहा हूँ पर अब आज अपने छोटे से यात्रा संस्मरण के साथ आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ घुमने तो अक्सर जाना हो ही जाता है पर पहले कभी इतना विशेष ध्यान नहीं दिया पर इस बार अग्रोहा धाम गया तो मंदिर को बारीकी से देखा व मंदिर के बारे में काफी जानकारी मिली जिसे आपके सामने चित्रों के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ ! ब्लॉग जगत दो घुमक्कड़ नीरज भाई ( *मुसाफिर हूँ यारों* )और संदीप भाई (* जाट देवता* )जी तस्... more »
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टॉमस ट्रांसट्रोमर : नीला मकान  मनोज पटेल at पढ़ते-पढ़ते

*आज पढ़ते हैं नोबेल पुरस्कार विजेता टॉमस ट्रांसट्रोमर को... * * * *नीला मकान : टॉमस ट्रांसट्रोमर * (अनुवाद : मनोज पटेल) * * चमकते सूरज वाली रात है. घने जंगलों में खड़ा मैं, दूर धुंधली-नीली दीवारों वाले अपने मकान की तरफ देखता हूँ. मानो अभी-अभी मेरी मृत्यु हुई हो और मैं एक नए कोण से अपने मकान को देख रहा होऊँ. इसने अस्सी से भी अधिक गर्मियां झेली हैं. इसकी लकड़ी चार बार सुख और तीन बार दुख से रची-बसी है. मकान में रहने वाले किसी व्यक्ति की मृत्यु पर इसकी फिर से पुताई होती है. मृत व्यक्ति स्वयं भी पुताई करता है, बिना ब्रश के और भीतर से. मकान से परे, खुला मैदान है. यहाँ कभी बगीचा हुआ ... more »
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आज का बुलेटिन यहीं तक... वैसे उम्मीद आम बजट से भी कोई खास नहीं है... फ़िर भी देखते जाईए क्या क्या नौटंकी होती है....  चाहे त्रिवेदी हों या फ़िर मुकुल राय.... क्या फ़र्क पडता है.... ये मुकुल राय वहीं हैं जो दुर्घटना स्थल पर इसलिए नहीं गये क्योंकि प्रधानमंत्री और ममता बनर्जी नें उनसे नहीं कहा..... भाई रिमोट से चलनें वाला प्रधानमंत्री है.... कुछ दिन के बाद रिमोट से चलनें वाला रेलमंत्री भी देख लीजिएगा.....  

जय हिन्द
देव बाबा

लेखागार