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रविवार, 18 अगस्त 2019

विराट व्यक्तित्व नेता जी की रहस्यगाथा : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
कहते हैं कि जो आया है वो जायेगा ही मगर कोई आने वाला जाने के बजाय विलुप्त हो जाये तो? क्या ऐसा भी होता है कि आने वाला विलुप्त हो जाये? यदि ऐसा होता भी है तो वह विलुप्त क्यों हुआ? यदि खुद अपनी मर्जी से विलुप्त नहीं हुआ तो फिर किसने विलुप्त करवाया? उसके खुद विलुप्त होने में, किसी के द्वारा विलुप्त करवाए जाने में लाभ किसका? विश्व की तमाम रहस्यगाथाओं से ज्यादा बड़ी और रहस्यमयी गाथा नेता जी के विलुप्त होने की गाथा है. यह रहस्यमयी इसलिए भी है कि नेता जी का व्यक्तित्व जितना विराट और चुम्बकीय रहा है, उसी अनुपात में या कहें उससे भी अधिक जनमानस के बीच उनकी गाथा तैरती रही है, आज के दिन यानि 18 अगस्त 1945 को उनके गायब हो जाने की. कोई कुछ भी कहे मगर तमाम सारे घटनाक्रम, अनेक तथ्य इशारा इस तरफ करते हैं कि आज के दिन हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी.


उनकी मृत्यु को जिस विमान दुर्घटना में हुआ प्रचारित किया जाता है, कहा जाता है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना ताइवान में हुई ही नहीं. इसका ऐतिहासिक प्रमाण यह है कि 03 सितंबर 1945 को अमेरिकी सेना ने जापानी सेना को हराकर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद उसकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि ताइवान में पिछले छह महीने से कोई विमान हादसा नहीं हुआ था. यहां यह गौर करने वाली बात है कि अपनी कथित मौत से दो दिन पहले 16 अगस्त 1945 को नेताजी वियतनाम के साइगॉन शहर से भागकर मंचूरिया गए थो जो उस समय रूस के क़ब्ज़े में था. नेता जी की मौत के रहस्य पर क़िताबें लिखने वाले और मिशन नेताजी के संस्थापक पत्रकार-लेखक अनुज धर ने अपनी लिखी क़िताबों में ताइवान सरकार के हवाले से दावा किया है कि 15 अगस्त से 05 सितंबर 1945 के दौरान कोई विमान हादसा नहीं हुआ था.

ऐसी चर्चाएँ बराबर बनी रहीं कि नेता जी रूस चले गए जहाँ से बाद में उनको भारत आने का सुरक्षित रास्ता प्रदान किया गया. भारत में उनके प्रवास की सर्वाधिक चर्चा फ़ैजाबाद के गुमनामी बाबा के रूप में रही हैं. यद्यपि बहुत से लोगों का मानना है कि नेता जी का व्यक्तित्व जिस तरह का था वैसे में संभव नहीं कि वे गुमनामी में अपना जीवन व्यतीत कर देते. इसके बाद भी सम्बंधित व्यक्ति को लेकर लोगों में विश्वास बना हुआ है कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ही थे. गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके नेताजी होने की बातें फैलने लगीं तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं. वे गुमनामी बाबा के कमरे से बरामद सामान देखकर यह कहते हुए फफक पड़ी थीं कि यह सब कुछ उनके चाचा का ही है. इसके बाद स्थानीय लोगों ने आन्दोलन करना शुरू कर दिया. लम्बे समय तक चले सामाजिक और न्यायिक प्रयासों के बाद मामले की सुनवाई करते हुए 31 जनवरी 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि गुमनामी बाबा के सामान को संग्रहालय में रखा जाए ताकि आम लोग उन्हें देख सकें.

गुमनामी बाबा के सामान से मिली नेता जी की तस्वीर 

लखनऊ बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था-
ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की स्मृति या उनकी धरोहर आने वाली नस्लों के लिए प्रेरणादायक है. अगर फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा, जिनके बारे में लोगों का विश्वास था कि वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं और उनके पास आने-जाने वाले लोगों व उनके कमरे में मिली तमाम वस्तुओं से इस बात का तनिक भी आभास होता है कि लोग गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में मानते थे तो ऐसे व्यक्ति की धरोहर को राष्ट्र की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए.

नेता जी की मृत्यु की जांच से सम्बंधित बने आयोगों की अपनी-अपनी रिपोर्ट्स रही हैं. जिस तरह का रहस्य, जिस तरह की गोपनीयता नेता जी की मृत्यु को लेकर बनाई जाती रही है, वैसी ही गुमनामी बाबा के निधन और उनके अंतिम संस्कार को लेकर बनाई गई. यह सब इस रहस्य को और गहरा करता है. अंतिम सत्य क्या है यह तो उसी सत्य को भोगने वाला ही जानता है मगर एक सत्य यह है कि जनमानस को विश्वास है कि नेता जी की मृत्यु आज के दिन बताई जाने वाली तथाकथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी. उनकी मौत का रहस्य अभी भी रहस्य है. जब तक यह रहस्य उजागर नहीं होता तब तक उनकी मौत को स्वीकारना नेता जी के अस्तित्व को, उनकी विराटता को नकारना ही होगा. आज के दिन वे विलुप्त हुए हैं, मृत नहीं और यह भी अपने आपमें परम सत्य है कि विलुप्त होने वाले मरते नहीं वरन अमरत्व को प्राप्त कर जाते हैं. महाकाल बन जाते हैं.
जय हिन्द

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बुधवार, 23 जनवरी 2019

122वीं जयंती - नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
सुभाष चंद्र बोस (अंग्रेज़ी: Subhash Chandra Bose, जन्म - 23 जनवरी, 1897 ई., कटक, उड़ीसा; मृत्यु (विवादित) - 18 अगस्त, 1945 ई., जापान) के अतिरिक्त भारत के इतिहास में ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ, जो एक साथ महान् सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाड़ी और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरुषों, नेताओं के समकक्ष साधिकार बैठकर कूटनीति तथा चर्चा करने वाला हो। भारत की स्वतंत्रता के लिए सुभाष चंद्र बोस ने क़रीब-क़रीब पूरे यूरोप में अलख जगाया। बोस प्रकृति से साधु, ईश्वर भक्त तथा तन एवं मन से देशभक्त थे। महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह को 'नेपोलियन की पेरिस यात्रा' की संज्ञा देने वाले सुभाष चंद्र बोस का एक ऐसा व्यक्तित्व था, जिसका मार्ग कभी भी स्वार्थों ने नहीं रोका। जिसके पाँव लक्ष्य से कभी पीछे नहीं हटे, जिसने जो भी स्वप्न देखे, उन्हें साधा। नेताजी में सच्चाई के सामने खड़े होने की अद्भुत क्षमता थी।

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, सन 1897 ई. में उड़ीसा के कटक नामक स्थान पर हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी शक्तियों के विरुद्ध 'आज़ाद हिंद फ़ौज' का नेतृत्व करने वाले बोस एक भारतीय क्रांतिकारी थे, जिनको ससम्मान 'नेताजी' भी कहते हैं। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। पहले वे सरकारी वक़ील थे, लेकिन बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधान सभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें 'रायबहादुर का ख़िताब' दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र बोस उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थे। सुभाष उन्हें 'मेजदा' कहते थे। शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था।

भारतीयों के साथ अल्पावस्था में अंग्रेज़ों का व्यवहार देखकर सुभाष चंद्र बोस ने अपने भाई से पूछा- "दादा कक्षा में आगे की सीटों पर हमें क्यों बैठने नहीं दिया जाता है?" बोस जो भी करते, आत्मविश्वास से करते थे। अंग्रेज़ अध्यापक बोस जी के अंक देखकर हैरान रह जाते थे। बोस जी के कक्षा में सबसे अधिक अंक लाने पर भी जब छात्रवृत्ति अंग्रेज़ बालक को मिली तो वह उखड़ गए। बोस ने मिशनरी स्कूल को छोड़ दिया। उसी समय अरविन्द ने बोस जी से कहा- "हम में से प्रत्येक भारतीय को डायनमो बनना चाहिए, जिससे कि हममें से यदि एक भी खड़ा हो जाए तो हमारे आस-पास हज़ारों व्यक्ति प्रकाशवान हो जाएँ। अरविन्द के शब्द बोस के मस्तिष्क में गूँजते थे। सुभाष सोचते- 'हम अनुगमन किसका करें?' भारतीय जब चुपचाप कष्ट सहते तो वे सोचते- 'धन्य हैं ये वीर प्रसूत। ऐसे लोगों से क्या आशा की जा सकती है?'

एक संपन्न व प्रतिष्ठित बंगाली वक़ील के पुत्र सुभाष चंद्र बोस की शिक्षा कलकत्ता के 'प्रेज़िडेंसी कॉलेज'[1]और 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' से हुई, और उसके बाद 'भारतीय प्रशासनिक सेवा' (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के 'कॅम्ब्रिज विश्वविद्यालय' भेज दिया। सन 1920 ई. में बोस ने 'इंडियन सिविल सर्विस' की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन अप्रैल सन 1921 ई. में भारत में बढ़ती राजनीतिक सरगर्मी की ख़बर सुनकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। अपने पूरे कार्यकाल में, ख़ासकर प्रारंभिक चरण में, बोस को अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस (1889-1950 ई.) का भरपूर समर्थन मिला, जो कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के एक धनाढ्य वक़ील होने के साथ-साथ प्रमुख कांग्रेसी राजनीतिज्ञ भी थे।

आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज के सदस्य
सुभाष चंद्र बोस ने पाँच वर्ष की आयु में अंग्रेज़ी का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया था। युवावस्था इन्हें राष्ट्रसेवा में खींच लाई। गाँधी जी से मतभेद होने के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गए और ब्रिटिश जेल से भागकर जापान पहुँच गए। बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू कर दिया।

'नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था।

क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा-इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे।

और जापानी सैनिकों के साथ उनकी तथाकथित आज़ाद हिंद फ़ौज रंगून (अब यांगून) से होती हुई थल मार्ग से भारत की ओर बढ़ती, 18 मार्च सन् 1944 ई. की कोहिमा और इम्फ़ाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुँच गई। जापानी वायुसेना से सहायता न मिलने के कारण एक भीषण लड़ाई में भारतीयों और जापानियों की मिली-जुली सेना हार गई और उसे पीछे हटना पड़ा। लेकिन आज़ाद हिंद फ़ौज कुछ अर्से तक बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और बाद में हिंद-चीन में अड्डों वाली मुक्तिवाहिनी सेना के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेज़ों से युद्ध किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने के लिए मजबूर किया था। सन् 1943 से 1945 तक 'आज़ाद हिन्द सेना' अंग्रेज़ों से युद्ध करती रही। अन्ततः ब्रिटिश शासन को उन्होंने महसूस करा दिया कि भारत को स्वतंत्रता देनी ही पड़ेगी।

नेताजी बोस का ऐतिहासिक भाषण

रंगून के 'जुबली हॉल' में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया भाषण सदैव के लिए इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, जिसमें उन्होंने कहा था -

"स्वतंत्रता संग्राम के मेरे साथियो! स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल की तरह चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सकें। 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।' खून भी एक दो बूँद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमें में ब्रिटिश साम्राज्य को डूबो दूँ।"

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा"

जब भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था और नेताजी आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए सक्रिय थे। तब आज़ाद हिंद फ़ौज में भरती होने आए सभी युवक-युवतियों को संबोधित करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा- "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।"

'हम अपना खून देने को तैयार हैं', सभा में बैठे हज़ारों लोग हामी भरते हुए प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने उमड़ पड़े। नेताजी ने उन्हें रोकते हुए कहा- "इस प्रतिज्ञा-पत्र पर साधारण स्याही से हस्ताक्षर नहीं करने हैं। वही आगे बढ़े, जिसकी रगों में सच्चा भारतीय खून बहता हो, जिन्हें अपने प्राणों का मोह न हो, और जो आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार हों।"

नेताजी की बात सुनकर सबसे पहले सत्रह भारतीय युवतियाँ आगे आईं और अपनी कमर पर लटकी छुरियाँ निकाल कर, झट से अपनी उंगलियों पर छुरियाँ चलाकर अपने रक्त से प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने लगीं। महिलाओं के लिए 'रानी झांसी रेजिमेंट' का गठन किया गया, जिसकी कैप्टन बनीं लक्ष्मी सहगल।

नेताजी का राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम
युवा सुभाष चन्द्र बोस 
सुभाष बाबू हिन्दी पढ़ लिख सकते थे, बोल सकते थे, पर वह इसमें बराबर हिचकते और कमी महसूस करते थे। वह चाहते थे कि हिन्दी में वह हिन्दी भाषी लोगों की तरह ही सब काम कर सकें। एक दिन उन्होंने अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा- "यदि देश में जनता के साथ राजनीति करनी है, तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है। बंगाल के बाहर मैं जनता में जाऊं तो किस भाषा में बोलूं। इसलिए काँग्रेस का सभापति बनकर मैं हिन्दी खूब अच्छी तरह न जानूं तो काम नहीं चलेगा। मुझे एक मास्टर दीजिए, जो मेरे साथ रहे और मेरा हिन्दी का सारा काम कर दे। इसके साथ ही जब मैं चाहूं और मुझे समय मिले, तब मैं उससे हिन्दी सीखता रहूँ।"

श्री जगदीश नारायण तिवारी को, जो मूक काँग्रेस कर्मी थे और हिन्दी के अच्छे शिक्षक थे, सुभाष बाबू के साथ रखा गया। हरिपुरा काँग्रेस में तथा सभापति के दौरे के समय वह बराबर सुभाष बाबू के साथ रहे। सुभाष बाबू ने बड़ी लगन से हिन्दी सीखी और वह सचमुच बहुत अच्छी हिन्दी लिखने, पढ़ने और बोलने लगे। 'आज़ाद हिंद फ़ौज' का काम और सुभाष बाबू के वक्तव्य प्राय: हिन्दी में होते थे। सुभाष बाबू भविष्यदृष्टा थे, जानते थे कि जिस देश की अपनी राष्ट्रभाषा नहीं होती, वह खड़ा नहीं रह सकता।'

एक रहस्य - नेताजी की मृत्यु
'इंडियन नेशनल आर्मी' के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी रहस्य छाया हुआ है। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में मानी जाती है। समय गुजरने के साथ ही भारत में भी अधिकांश लोग ये मानते है कि नेताजी की मौत ताईपे में विमान हादसे में हुई। इसके अलावा एक वर्ग ऐसा भी है, जो विमान हादसे की बात को स्वीकार नहीं करता। ताईपे सरकार ने भी कहा था कि 1944 में उसके देश में कोई विमान हादसा नहीं हुआ। माना जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण के कुछ दिन बाद दक्षिण पूर्वी एशिया से भागते हुए एक हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त, 1945 को बोस की मृत्यु हो गई। एक मान्यता यह भी है कि बोस की मौत 1945 में नहीं हुई, वह उसके बाद रूस में नजरबंद थे। उनके गुमशुदा होने और दुर्घटना में मारे जाने के बारे में कई विवाद छिड़े, लेकिन सच कभी सामने नहीं आया। हालांकि एक समाचार चैनल से ख़ास साक्षात्कार में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस ने कहा था कि उन्हें भी इस बात पर पूरा यकीन है कि उनके पिता की मौत दुर्भाग्यपूर्ण विमान हादसे में हो गई। उन्होंने कहा था कि नेताजी की मौत का सबसे बड़ा कारण विमान हादसा ही है। कमोबेश उनकी मौत विमान हादसे की वजह से मानी जाती है। इससे इतर जो बातें हैं महज अटकलबाजी हो सकती हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई। अनिता ने इस इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अगर नेताजी विमान हादसे के बाद कहीं छिपे होते तो उन्होंने अपने परिवार से संपर्क करने की कोशिश की होती और नहीं तो जब देश आजाद हुआ तो वे भारत अवश्य ही वापस लौट आते।[4] अधिकांश लोगों का यही मानना है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया से भागते हुए हवाई दुर्घटना में जल जाने से हुए घावों के कारण ताइवान के एक जापानी अस्पताल में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु पर किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। लोगों को लगा कि किसी दिन वे फिर सामने आ खड़े होंगे। आज इतने वर्षों बाद भी जनमानस उनकी राह देखता है। वे रहस्य थे ना, और रहस्य को भी कभी किसी ने जाना है?

भारत के सर्वकालिक नेता - नेताजी बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, माँ भारती के सच्चे सपूत थे। नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे, जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे, जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी। नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी वाक्‌-‌शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर 'स्वतंत्रता आंदोलन' चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।





आज भारत के महान नेता, आधुनिक भारत के निर्माता और स्वतंत्रता संग्रामी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 122वीं जयंती पर हम सब देश के लिए उनके अतुल्य योगदान का स्मरण करते हुए नेताजी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जय हिन्द। जय भारत



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

सुभाष बाबू जिन्दाबाद का जयघोष और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
व्यावहारिक रूप से हमने भले ही आज़ादी सन 1947 में पाई हो मगर हम एक तरह से  30 दिसंबर 1943 को ही आजाद हो गए थे. इसी दिन देश के एक क्रांतिकारी बेटे ने स्वतंत्र भारत के रूप में राष्ट्र ध्वज फहराया था. देश के जन-जन में बसे महान स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने सबसे पहले अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्र ध्वज फहराया था. नेताजी देश की तत्कालीन पहली अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में राष्ट्रध्वज के वाहक बने थे. सभी देशवासी इस दिन को पूरी श्रद्धा और देशभक्ति के साथ मनाते हैं. इसके बाद भी नेता जी के योगदान को विस्मृत कर दिया जाता है. अंग्रेजों की कैद से निकल कर विदेश जाना और वहाँ पहुँच कर तमाम देशों के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन करना अपने आपमें अभूतपूर्व कार्य था. एक-दो नहीं वरन एशिया के अनेक देशों के सहयोग से नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन किया. 


सन 1942 में अंग्रेजों से लड़ते हुए जापानी सेना अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक आ पहुंची और 23 मार्च 1942 को जापानी सेना ने अंडमान के द्वीपों पर कब्जा कर वहां से अंग्रेजी सेना को खदेड़ दिया. 25 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने भी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी. नेताजी से प्रभावित होकर तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो ने 07 नवंबर 1943 को अंडमान-निकोबार द्वीपों को नेताजी की अंतरिम सरकार को सौंप दिया. इसके बाद नेताजी ने 30 दिसंबर 1943 को पहली बार अंडमान-निकोबार की धरती पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया. उन्होंने ने केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराया बल्कि इन द्वीपों का नाम शहीद और स्वराज रखा. आज भी पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान को अब नेताजी स्टेडियम के नाम से जाना जाता है, यहाँ पर तिरंगा फहराने के बाद नेताजी ने वहां के क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सिपाहियों तथा जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि हिंदुस्तान की आजादी की जो गाथा अंडमान की भूमि से शुरू हुई है वह दिल्ली में वायसराय के घर पर तिरंगा फहराने के बाद ही रुकेगी. 


वर्तमान में भारत सरकार द्वारा एक स्मारक का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहाँ कि नेताजी ने ध्वज फहराया था. इस स्थान पर प्रतिवर्ष 30 दिसंबर को स्थानीय प्रशासन द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पोर्ट ब्लेयर जैसे छोटे से शहर में इस मौके पर हजारों की भीड़ का जुटना इसका परिचायक है कि अंडमान-निकोबार के निवासी सारे नेताजी को बहुत आदर के साथ याद करते हैं. देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 30 दिसम्बर 2018 को पोर्ट ब्लेयर के उसी पटल पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर देश के स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों को पूरे राष्ट्र की तरफ से श्रद्धांजलि दी.


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मंगलवार, 23 जनवरी 2018

नमन उस नामधारी गुमनाम को : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की १२०वीं जयंती है. उनको बुलेटिन परिवार की तरफ से श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं.

इस देश में ही क्या, समूचे विश्व में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अतिरिक्त शायद ही कोई और होगा जिसकी मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है. इसको एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि नेता जी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है. नेताजी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेताजी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़ से पता चलता है कि १८ अगस्त १९४५ के दिन ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था. इसी तथ्य पर हिन्दुस्तान टाइम्स के भारतीय पत्रकार (मिशन नेताजी से जुड़े) अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि १४ अगस्त से २५ अक्तूबर १९४५ के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्ट था और अब इसका नाम ताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्ट है.) नेताजी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि जिस शव का अंतिम संस्कार किया गया वो शव नेताजी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. इसी कारण बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेताजी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया था, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.


नेताजी की कार्यशैली, उनकी प्रतिभा, कार्यक्षमता को जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेताजी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वयं से स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है. समय-समय पर गुमनामी बाबा के सामानों की जाँच के लिए भी आवाज़ उठी. अब फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.


फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवन अथवा गुमनामी बाबा के देहांत की खबर वर्ष १९८५ में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के २७६१ सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं. रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा १३ जनवरी २०१३ को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के २४ बड़े लोहे के डिब्बों और ८ छोटे डिब्बों अर्थात कुल ३२ डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया जाना है और ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही है किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है.


इस आशा और विश्वास के साथ कि इस रहस्य से पर्दा उठे, आज की बुलेटिन आप सबके समक्ष प्रस्तुत है.... जयहिन्द...

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गुरुवार, 31 मार्च 2016

अंतिम सत्य की तलाश में - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,

फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं. 





फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवनअथवा गुमनामी बाबाके देहांत की खबर वर्ष 1985 में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के 2761 सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं. रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा 13 जनवरी 2013 को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे.

हाल फिलहाल तो गुमनामी बाबा का सामान सूचीबद्ध करके पुनः डबल लॉक में है. यदि न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया गया तो ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही होगी किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है. इस आशा और विश्वास के साथ कि इस रहस्य से पर्दा उठे, आज की बुलेटिन का आप सब आनन्द उठायें. जयहिन्द...


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(सभी चित्र गूगल छवियों के द्वारा विभिन्न वेबसाइट से साभार ली गई हैं)

शनिवार, 23 जनवरी 2016

ब्लॉग बुलेटिन - नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयंती और रहस्य

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी से जुड़े रहस्य और मिथकों से आज से पर्दा उठना शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार में आज 12:47 पर नेताजी से जुड़े 100 गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर दिया। प्रधानमंत्री ने फाइलों का डिजिटल वर्जन जारी किया। जिसे हमारे सभी देशवासी इंटरनेट पर ऑनलाइन नेताजीपेपर्स.गॉव.इन | http://netajipapers.gov.in/ पोर्टल पर देख सकते हैं। भारत सरकार अब हर महीने लगभग 25 फाइल्स इस पोर्टल पर सार्वजनिक करती रहेगी। इससे जल्द ही नेताजी के अंतिम पलों और उनकी मौत से जुड़े रहस्यों से पर्दा उठ सकेगा।

कितनी दुःखद बात है कि देश के इतने अमर सपूत के 119वें जन्मदिवस पर हम सब उनके जीवन के अंतिम क्षणों और मौत आदि जैसे विषयों पर चिंतन कर रहे है। ये सब तो भारत की आजादी के बाद ही सुलझ जाना चाहिए था लेकिन एक परिवार के निजी स्वार्थ और देश को अपनी जागीर समझने वालों ने नेताजी जैसे अमर स्वतंत्रता सेनानी के त्याग, निश्चयशक्ति और बलिदान को सदैव ही दबाने की कोशिश की है।

आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी के 119वें जन्मदिवस पर हम सब उनके त्याग, निश्चयशक्ति तथा बलिदान को शत शत नमन करते हैं।



अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर..........








आज की बुलेटिन में बस इतना ही। आने वाला कल सुनहरा हो। जय हिन्द। जय भारत।।

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

नेताजी की ११७ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज २३ जनवरी है ... उम्मीद है आप जानते ही होंगे कि आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की ११७ वीं जयंती है | वैसे आज के दौर मे कोई यह कहे कि वो नेताजी को नहीं जानता या 'नेताजी' संबोधन सुन किसी और का नाम ले तो बिलकुल भी ताज्जुब नहीं होगा ... अगर इतिहास को थोड़ा कुरेद कर देखेंगे तो पता चलता है कि यह सब एक बहुत बड़ी साजिश के कारण हुआ है या हो रहा है ... इस बारे मे मैंने पहले भी कई बार आप लोगो को बताया है इस लिए बार बार वही नहीं दोहराना चाहता |

आज की बुलेटिन मे शामिल पोस्टों के लिंक्स जरूरी नहीं कि नेता जी से ही जुड़े हुये हो फिर भी कोशिश की है ज्यादा से ज्यादा उन से जुड़ी हुई पोस्टें ही शामिल हो | यहाँ दिये गए चित्रों मे ही आज के लिंक्स छिपे है ... चित्रों पर क्लिक करते ही पोस्ट खुल जाएगी | इस लुकाछिपा का भी एक कारण है ... नेताजी के बारे मे जो सब से बड़ा सच है वो भी लुकाछिपा ही तो है |

|http://swarnimpal.blogspot.in/2014/01/blog-post.html

http://mereephotoo.blogspot.in/2014/01/blog-post_23.html

http://vbadola.blogspot.in/2014/01/27.html
 
http://hindu0007.blogspot.in/2014/01/blog-post_1418.html

http://nazehindsubhash.blogspot.com/2014/01/blog-post.html

hariharsvp.blogspot.com/2014/01/blog-post_23.html

http://rajeshtripathi4u.blogspot.com/2014/01/normal-0-false-false-false.html

http://uchcharan.blogspot.com/2014/01/blog-post_23.html
 
http://harshprachar.blogspot.com/2014/01/Netaji-Subhash-Chandra-Bose-Hindi-Quotes-and-Thoughts-and-117-Birth-Anniversary.html
 
http://guzarish6688.blogspot.com/2014/01/blog-post_23.html
 
http://burabhala.blogspot.com/2014/01/blog-post_23.html
"मृतक ने तुमसे कुछ नहीं लिया | वह अपने लिए कुछ नहीं चाहता था | उसने अपने को देश को समर्पित कर दिया और स्वयं विलुप्तता मे चला गया |"
- महाकाल 
"महाकाल" को ११७ वीं जयंती पर पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत का सादर शत शत नमन ||

आज़ाद हिन्द ज़िंदाबाद ... 
नेता जी ज़िंदाबाद ||

जय हिन्द !!!

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

आज़ाद हिन्द फ़ौज को नमन

आदरणीय ब्लॉगर मित्र मंडली - सादर प्रणाम 














आज का दिन बहुत बड़ा दिन है | आज २१ अक्टूबर है | आज हमारे अपने दिवंगत आदरणीय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने २१ अक्टूबर १९४३ में आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की घोषणा की थी | किस्सा कुछ इस प्रकार से है : -

आज़ाद हिन्द फ़ौज सबसे पहले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने २९ अक्तूबर १९१५ को अफगानिस्तान में बनायी थी। मूलत: यह 'आजाद हिन्द सरकार' की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनायी गयी थी। किन्तु इस लेख में जिसे 'आजाद हिन्द फौज' कहा गया है उससे इस सेना का कोई सम्बन्ध नहीं है। हाँ, नाम और उद्देश्य दोनों के ही समान थे। रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब ४०,००० भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था और उसे भी यही नाम दिया अर्थात् 'आज़ाद हिन्द फ़ौज'। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आज़ाद हिन्द फौज़ का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी।

२१ अक्तूबर १९४३ के दिन सिंगापुर के कैथी सिनेमा हॉल में “आरज़ी हुकुमत-ए-आज़ाद हिन्द” की स्थापना की घोषणा की थी । स्वाभाविक रुप से नेताजी स्वतंत्र भारत की इस अन्तरिम सरकार (Provisional Government of Free India) के प्रधानमंत्री, युद्ध एवं विदेशी मामलों के मंत्री तथा सेना के सर्वोच्च सेनापति चुने गए । 

सरकार के प्रधान के रुप में नेताजी ने यह शपथ ग्रहण की थी -

“ईश्वर के नाम पर मैं यह पवित्र शपथ लेता हूँ कि मैं भारत को और अपने अड़तीस करोड़ देशवासियों को आजाद कराऊँगा। मैं सुभाष चन्द्र बोस, अपने जीवन की आखिरी साँस तक आजादी की इस पवित्र लड़ाई को जारी रखूँगा। मैं सदा भारत का सेवक बना रहूँगा और अपने अड़तीस करोड़ भारतीय भाई-बहनों की भलाई को अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझूँगा। आजादी प्राप्त करने के बाद भी, इस आजादी को बनाये रखने के लिए मैं अपने खून की आखिरी बूँद तक बहाने के लिए सदा तैयार रहूँगा।”

नेताजी ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपाइन, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। ३० दिसम्बर १९४३ को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। ४ फरवरी १९४४ को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।

६ जुलाई १९४४ को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से गान्धी जी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ठ की और आज़ाद हिन्द फौज़ द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिये उनकी शुभकामनाएँ माँगीं।

२२ सितम्बर १९४४ को शहीदी दिवस मनाते हुये सुभाष बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा - 

"हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।" 

किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया। जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े। ऐसे में सुभाष को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यद्यपि उनका सैनिक अभियान असफल हो गया, किन्तु इस असफलता में भी उनकी जीत छिपी थी। निस्सन्देह सुभाष उग्र राष्ट्रवादी थे। उनके मन में फासीवादी अधिनायकों के सबल तरीकों के प्रति भावनात्मक झुकाव भी था और वे भारत को शीघ्रातिशीघ्र स्वतन्त्रता दिलाने हेतु हिंसात्मक उपायों में आस्था भी रखते थे। इसीलिये उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया था।

यद्यपि आज़ाद हिन्द फौज के सेनानियों की संख्या के बारे में थोड़े बहुत मतभेद रहे हैं परन्तु ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि इस सेना में लगभग चालीस हजार सेनानी थे। इस संख्या का अनुमोदन ब्रिटिश इंटेलिजेंस में रहे कर्नल जीडी एण्डरसन ने भी किया है।

जब जापानियों ने सिंगापुर पर कब्जा किया था तो लगभग ४५ हजार भारतीय सेनानियों को पकड़ा गया था।

नेताजी की इस कुर्बानी और जज्बे के लिए उन्हें शत शत नमन | 

आज़ाद हिन्द फ़ौज से जुड़ी कुछ तसवीरें :



इस जानकारी के साथ आज से त्योहारों के अवसर पर एक के साथ एक फ्री की स्कीम शुरू कर रहा हूँ | तो हुज़ुरेवाला ज्ञानवर्धक पोस्ट के साथ कविता पाठ का आनंद भी संलग्न है | आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ मेरे द्वारा लिखी गई एक ताजातरीन नई कविता | उम्मीद करता हूँ आपका आशीर्वाद मिलेगा और आज की पोस्ट आप सभी को पसंद आएगी | कल करवाचौथ का त्यौहार है ब्लॉग बुलेटिन टीम की तरफ से सभी वैवाहिक मित्रों को इस त्यौहार की बहुत बहुत बधाई | इस दिन खूब खाएं पियें, मस्त रहे और मौज करें | जय हो |धोखेबाज़ दोस्त
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अब ऐतबार के लायक रहा नहीं जहाँ
दोस्त बन के देते हैं धोखा कहाँ कहाँ

दर्द-ए-दिल बताओ जो अपना जान के
दो मुंहे डसते हैं ये फन अपना तान के

ना करना भरोसा दुनिया पर तुम कभी
दुखेगा दिल तुम्हारा सोचो ये तुम अभी

छिपा कर दिल के घाव रखो सबसे जुदा
दुनिया में मिलेगा पगपग पर नया खुदा

बातों में उनकी आकर पछताओगे तुम
सीने में खंजर घोंप के हो जायेंगे ये गुम

गुज़ारिश 'निर्जन' करता तुमसे है यही
भरोसा न करना ऐसों पर रहेगा सदा सही

प्रस्तुत है आज की कड़ियाँ
आर्ज़ी हुक़ूमत-ए-आज़ाद हिन्द का ७० वां स्थापना दिवस - शिवम् मिश्रा  
अपने टीवी को कंप्यूटर की तरह इस्तेमाल करें - फैयाज़ अहमदकविता - अन्नपूर्ण बाजपाईपिंजरे की तीलियों से बाहर आती मैंना की कुहुक - सुधा अरोडाएंड्राइड फ़ोन को रिसेट और फॉर्मेट कैसे करें - अभिमन्यु भरद्वाजये सोना अगर मिल भी जाये तो क्या है - अखिलेश्वर पाण्डेयतैंतीस करोड़ देवताओं को क्यों गिनने जाता है - सुशिल कुमारकरवाचौथ पर पत्नी जी के प्रति - मदन मोहन बहेती 'घोटू 'माहिया - विभा रानी श्रीवास्तवइश्क गोदाम में सड़ गया - निखिल आनंद गिरीउन पटरियों के संग संग - शिखा वार्ष्णेयखोदो न उन्नाव का यह गाँव बन्धु - शेफाली पाण्डेयअब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार

लेखागार