प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम !
आज ट्विटर पर मशहूर कार्टूनिस्ट श्री सुधीर तैलंग जी के ट्वीट से पता चला कि मशहूर अभिनेता श्रीवल्लभ व्यास जी पिछले कुछ सालों से लकवाग्रस्त हो बीमार चल रहे है और फिलहाल जयपुर मे एसएमएस हॉस्पिटल के आईसीयू मे है !
हम सब ने व्यास जी का शानदार अभिनय काफी सारी फिल्मों मे देखा है ... वो नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के पास आउट है !
बॉलीवुड से अमीर खान समेत काफी लोगो ने उनकी और उनके परिवार की समय समय पर मदद की है पर वो पर्याप्त नहीं है ... आज व्यास जी का परिवार जयपुर मे किराए के मकान मे रहता है ... कोई भी एक बीमार किरायेदार नहीं चाहता इस लिए समय समय पर उनको मकान बदलना पड़ता है !
ब्लॉग बुलेटिन के माध्यम से मेरी आप सब से विनती है कि अगर आप मे से कोई ऐसे मुश्किल समय पर इस शानदार कलाकार और उसके परिवार की मदद कर सकता है तो जरूर करें ! साथ साथ अगर किसी की राजस्थान सरकार मे कोई जान पहचान हो तो अवश्य आगे आए ! राजस्थान सरकार को भी चाहिए कि वो खुद आगे आए और श्री व्यास जी के इलाज और रहने का उचित प्रबंध करे !
पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से हम यही दुआ करते है कि श्रीवल्लभ व्यास जी जल्द स्वस्थ हो और दोबारा हम उनको अभिनय करते देखें !
सादर आपका
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माया आजकल बहुत ख़ुश है। मैं मायावती या किसी अन्य माया की नहीं बल्कि उस माया
की बात कर रहा हूँ जो संसार के ऊपर अपना भ्रम का जाल डाले … Read more
एक दिन उसने कहा कि
नहीं लिखी जाती अब कविता
लिखी जाये भी तो कैसे
कविता कोई लिखने की चीज़ नहीं
वो तो उपजती है खुद ही
फिर बेशक उगे कुकुरमुत्तों सी,
या फिर आर्किड की तरह
हर हाल में मालकिन है
वो अपनी ही मर्जी की।
कहाँ वश चलता है किसी का,
जो रोक ले उसे उपजने से।
हाँ कुछ भूमि बनाकर
उसे बोया जरूर जा सकता है।
बढाया भी जा सकता है,
कुछ दिमागी खाद पानी डाल कर .
संवारा भी जा सकता है,
कुछ कृत्रिम संसाधनों से।
फिर वो कविता जैसी तो होती है,
पर कविता नहीं होती।
कविता तो उगेगी खुद ही,
कभी भी, कहीं भी ..
वैसे तो इन्टरनेट पर ढेरो ऐसी वेबसाइट है जो आपको मुफ्त में सॉफ्टवेयर
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इस वेबसाइट के विषय में पहले भी एक लेख में चर्चा की जा चुकी है, ये
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वक्तका आकार देखा कल ,
बिलकुल चाँद की तरह ,
गोल एक दम गोल ...माँ की रोटी की तरह ,
पर आकाशमे परदे के पीछे खेले लुकाछिपी ....
कभी समीज नजर आये कभी उसे बाल ,
कभी पैर की आहट या फिर पूरा दिख जाए .....
कभी लगता है जहाँसे सफ़र शुरू हुआ था
फिर वही मुकाम पर पहुँच गए हम ...
कभी लगता है मंजिल की तलाश है ,
और ये रस्ते ही ख़त्म नहीं होते ....
कभी हमारे पीछे पीछे चलता है ,
और कोई घने पेड़के तने के पीछे छुपता ,
कभी आगे दौड़ता हुआ हमसे दूर निकलता हुआ ....
बस एक तुम ही हो मेरी उंगली थाम कर चलते रहे ,
बस चलते रहे ताउम्र ......
न सफ़र थका न तन्हाई ख़त्म हुई ,
खुशबु वो तुम्हारे साथ होने की और ...बस
ये और के ... more »
आखिर क्या है यह "वैल्यू ऑफ लाइफ" इस विषय को लेकर हर एक इंसान की नज़र में
उसके अपने मत अनुसार अलग-अलग अर्थ है या हो सकते है। जैसे किसी की नज़र में
वैल्यू ऑफ लाइफ का अर्थ है असमानता में समानता का होना जैसे यहाँ हर काम को
सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है यहाँ काम के नज़रिये से कोई छोटा या बड़ा
नहीं है या फिर कुछ लोग इस विषय को निजी जरूरत के आधार पर भी देखते हैं। जैसे
यहाँ बिजली, पानी,सड़क यातायात व्यवस्था इत्यादि की कोई समस्या नहीं है ऐसे
में बहुतों की नज़र में यह वैल्यू ऑफ लाइफ से जुड़े हुए मुद्दे का एक बड़ा
कारण हो सकता है। लेकिन यदि मैं अपने नज़रिये और अपने अनुभव की बात करूँ तो
मेरे... more »
उसने मुझसे इक दिन
भीगी आँखों से कहा
ये मुहब्बत भी
बहुत बुरी शय होती है
किसी और की खबर
रखते-रखते
खुद से बेखबर हो जाती है
...
कुछ टूटने से पहले
आवाज हो
ये जरूरी तो नहीं
तुमने देखा तो होगा
फूलों का खिलना
और बिखर जाना चुपके से!!!
....
नई दिल्ली: दिल्ली रेप कांड पीड़िता को श्रद्धांजलि देने हेतु सुमित प्रताप
सिंह द्वारा बनाये गये दामिनी एंथम को दिल्ली की गैरसरकारी संस्था सक्षम
संकल्प सेवा सोसाइटी द्वारा रविवार दिनांक 31.03.13 को झलकारी बाई सम्मान
-2012 से सम्मानित किया गया. दिल्ली में स्थित सांवल नगर में सोसाइटी ने एक
विचार गोष्ठी का आयोजन किया था, जिसका विषय था, "कन्या भ्रूण हत्या व महिलाओं
के विरुद्ध अपराध". इस कार्यक्रम में स्थानीय विधायक, स्थानीय निगम पार्षद,
दिल्ली पुलिस महिला अपराध शाखा से इंस्पेक्टर शशि कौशिक, सोसाइटी के संरक्षक
मोहसिन किदवई, अध्यक्ष कृष्ण कोली, उपाध्यक्ष पद्मा रानी इत्यादि गणमान्य
व्यक्ति... more »
'सृजक' के पिछले अंक में प्रकाशित मेरी कहानी 'इंतज़ार' का आस्वादन करते हुए
आगामी अंक के घर पहुँचने का इंतज़ार करें और जिन सुधी पाठकों को अच्छी पत्रिका
पढने का इंतज़ार रहता है वह विलम्ब ना करें शीघ्र ही अपनी पत्रिका की प्रति
सुरक्षित करवाएं .........
*आज सुबह से ही गीत बेचैनी से इधर-उधर कर रही थी. कैलेंडर में देखा ...एक
अक्टूबर ..आँखों से उतरकर दिल में पहुँच गयी...एक अक्टूबर. बिताये नहीं बीतता
उससे ये दिन. जाने किसका इंतज़ार रहता है उसे? और क्यों ?...वह तो ये भी
नहीं जानती. दिमाग अनवरत अतीत में गोते लगा रहा है ....जब वो राज से
मिलने उसके पास गयी थी .हाँ! राज ही तो था वो.समझ ही न... more »
क्या हर चीज़ का रंग होता है ?
अगर होता है तो कैसा होता ,
तुम्हारी याद का ,
बात का ,
मुलाक़ात का ,
हंसी का ,
गुलाबी ,पीला , नीला , हरा, नारंगी
चितकबरा या सफ़ेद ?
कौन सा रंग चुनती ,
उस बिन छुई छुअन का ,
बिन कही दास्तां का ,
मौन के महाकाव्य का ,
कौन सा ? कौन सा ?
हुई आहट या हल्का सा खटका ,
यह तुम हो या कहीं कोई आँसू टपका ,
खिड़की पर हिला वो जो हल्के से पर्दा ,
सुनो फ़ैली हवा मे यह तेरी महक ,
यह तुम हो या मन का वहम,
हर खट- खट - पदचाप अनजानी सी ,
नहीं तू कहीं फिर भी क्यों हर बात पहचानी सी ...
कहा तुमने कि रंग है सफेद प्यार का ,
तो क्यों दिखता है पीला धब्बा वक़्त का ?
कोने पे वो छींटे लाल याद क... more »
निम्न पंक्तियाँ, एक कमेन्ट के रूप में श्री गिरधारी खंकरियाल की " ये
बेचारे -रिक्शे वाले " शीर्षक वाली
रचना पर लिखी गयी हैं ! शीर्षक के शब्द उन्ही के हैं , आभार सहित वही कमेन्ट
/ रचना आपकी नज़र है ...
*कौन समझना, चाहे इनको*
*काम बहुत,क्या देखें इनको*
*वजन खींचते, बोझा ढोते*
*दर्द न जाने दुनिया वाले*
*ये बेचारे रिक्शे वाले*
*
**माँ की दवा,बहन की शादी*
*जाड़ा गर्मी हो या पानी *
*इक अनजानी चिंता इनको*
*खाए जाती हौले हौले !*
*ये बेचारे रिक्शे वाले*
प्रस्तुत
आलेख यहाँ से लिया गया है :
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की एक दुर्लभ तस्वीर
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बलिदान को शायद ही कोई भुला सकता है। आज भी देश का
बच्चा-बच्चा उनका नाम इज्जत और फख्र के साथ लेता है, लेकिन दिल्ली सरकार
उन के खिलाफ गवाही देने वाले एक भारतीय को मरणोपरांत ऐसा सम्मान देने की
तैयारी में है जिससे उसे सदियों नहीं भुलाया जा सकेगा। यह शख्स कोई और
नहीं, बल्कि लेखन कर शोहरत हासिल
जासूस ने जब बताया था कि सामने वाली फ़ौज गिनती में अपनी फ़ौज से कम से कम
पांच गुना ज्यादा है, तबसे दिमाग में उधेड़बुन चल रही थी। ऐसा न हो कि
सैकड़ों मील घोड़ों की पीठ पर सफ़र करके यहाँ तक आना, रास्ते की मुश्किलें,
जीती हुई छोटी बड़ी लड़ाईयाँ सब बेकार चली जायें। सिर झटककर वो अपने खेमे
से बाहर निकला और मुकाम का मुआयना
*१.*
*रिश्तों के गहरे मंथन में*
*उलझी जब भी मैं धारों में ...*
*घुट-घुट गयीं साँसें मेरी,*
*छलकीं.... अश्कों की कुछ बूँदें..*
*और नीलकंठ बन गयी मैं ...*
*अपनों की दुनिया में .... अक्सर .....*
*
*
*२.*
*जीवन के गहरे अंधेरों को..*
*ना मिटा सके जब... चँदा-तारे भी...*
*बनकर मशाल खुद जली मैं...*
*और राहें अपनी ढूंढीं मैनें... अक्सर.....*
*
*
*३.*
*कई बार...अपने आँगन में...*
*जब दीया जलाया है मैनें,*
*संग उसके....खुद को **भी **जलाया है मैनें...*
*और खुद ही... अपनी राख बटोरी मैनें....अक्सर...*
*
*
*४.*
*तमन्नाओं के सेहरा में भटकते हुए...*
*ऐसा भी हुआ कई बार....*
*थक कर जब भी बैठे हम.....,*
*खुद ... more »
हमारे गाँव की होली पूरे इलाके में सबसे अलग होती थी । मेरे ननिहाल और दूसरे
गाँवों में जहाँ लोग होली में रंग-गुलाल कम और धूल ,कीचड, गोबर, मल-मूत्र ,का
ज्यादा इस्तेमाल करते थे वहीं मेरे पैतृक गाँव मामचौन (मुरैना) में रंग और
गुलाल की वर्षा के अलावा कुछ होता तो वह था गाना-बजाना और अभिनय...नकल । आज
मैं सोच-सोच कर अभिभूत हूँ कि उस समय गाँव में कैसे-कैसे कलाकार थे । 'कंजूस
सेठ', 'चालाक मुनीम' ,'पत्नी-पीडित व्यक्ति', 'शरीर' कर्जदार , 'दुकानदार को
चूना लगाने वाला धूर्त ग्राहक' , 'मास्टर जी के पास पढने आया मूर्ख व्यक्ति
'जैसे हास्यप्रद चरित्रों को कितनी जीवंतता से अभिनीत करते थे वे लोग ।
पूर्... more »
बड़ी बड़ी इमारतों से गुज़रते हुए ...गमलों में मुहं उठाये नन्हे पौधे अक्सर
रास्ता रोक लेते है ..मनो कह रहे हो पनपने के लिए पूरी ज़मीन नहीं थोड़ी मिटटी
की दरकार है ...हां अगर और बढ़ना है तो अपनी ज़मीन खुद पानी होगी ....
हाइवे पर तेज रफ़्तार गाडी दौडाते हुए ....डिवाइडर पर डटे गुलाबी फूलों से लदे
मंझोले कद के शूरवीर जो गर्म काले धुंए के थपेड़े खाकर भी लहलहाते हुए से लगते
है,हर लम्हा बिना रुके रात दिन अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए,अपने इस युद्ध
के बीच एक नज़र मुझपर भी डालते है "हमसे भी कमज़ोर हो क्या ".. ....
पार्किंग के कोने में .... सबकी नज़र बचाकर कोई ऊपर आ रहा है पहले बाहें निकली
है हरी ... more »
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अब आज्ञा दीजिये ...
जय हिन्द !!!