नमस्कार मित्रो,
नित नए सजाये जाते विवादों के बीच
लिखने-कहने से मन लगातार उचटता जा रहा है.... सो अपनी एक कविता के साथ आज की
बुलेटिन...
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सालों पहले देखा
सपना एक
भारत महान का।
आलम था बस
इन्सानियत,
मानवता का,
सपने के बाहर
मंजर कुछ अलग था,
बिखरा पड़ा था...
टूटा पड़ा था...
सपना...
भारत महान का।
चल रही थी आँधी एक
आतंक भरी,
हर नदी दिखती थी
खून से भीगी-भरी,
न था पीने को पानी
हर तरफ था बस
खून ही खून।
लाशों के ढ़ेर पर
पड़ा लहुलुहान...
कब सँभलेगा
मेरा भारत महान!
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शेष अगली बुलेटिन के साथ, अगले
हफ्ते..... नमस्कार!!


