Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

श्रद्धांजलि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
श्रद्धांजलि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 7 अगस्त 2019

अश्रुपूरित श्रद्धांजलि - सुषमा स्वराज जी - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 

बेटी बांसुरी स्वराज 
पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) अब इस दुनिया में नहीं रहीं। अचानक दिल का दौरा पड़ने की वजह से मंगलवार की देर रात वह इस दुनिया को छोड़कर चली गईं। 67 साल की बीजेपी नेता सुषमा स्वराज का पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। सुषमा स्वराज के अंतिम संस्कार की रस्म बेटी बांसुरी स्वराज ने पूरा किया। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी ने अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया को पूरा किया। हालांकि, इस दौरान उनके साथ सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल भी मौजूद थे।

पंचतत्व में विलीन होने से पहले सुषमा स्वराज को श्रद्धांजलि देने के लिए बड़ी भीड़ देखने को मिली। सरकार से लेकर विपक्षी पार्टिोयों के नेताओं की लंबी कतारें दिखीं। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने भी सुषमा स्वराज को अंतिम श्रद्धांजलि दी। इतना ही नहीं, सुषमा को श्रद्धांजलि देते वक्त वेंकैया नायडू फफक-फफक कर रो पड़े।

इसके अलावा, लालकृष्ण आडवाणी, मनीष सिसोदिया, शरद यादव, अशोक गहलोत, बिप्लब देव, अरविंद केजरीवाल समेत कई बड़े नेताओं ने सुषमा स्वराज को अंतिम श्रद्धांजलि दी।

बता दें कि सुषमा स्वराज का मंगलवार रात यहां दिल का दौरा पड़ने से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया था। वहां से उनका पार्थिव शरीर रात में ही उनके आवास पर लाकर लोगों के दर्शनार्थ रखा गया है। कई केन्द्रीय मंत्री, भाजपा के नेता तथा कार्यकर्ता और कई अन्य लोग रात में ही उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे गए थे। बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक और समर्थक सुबह से ही अपनी प्रिय नेता को श्रद्धांजलि देने पहुंच थे।

उनके पार्थिव शरीर को आज दोपहर 12 बजे से भाजपा मुख्यालय में रखा गया, जहां पार्टी के नेता एवं कार्यकर्ता उनके अंतिम दर्शन कर सकें। भाजपा मुख्यालय पर भी सैकड़ों की भीड़ थी। इसके बाद उनका पार्थिव शरीर अपराह्न तीन बजे लोदी रोड स्थित विद्युत शवदाह गृह ले जाया गया, जहां उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।



आज हम सब अपनी प्रिय नेता सुषमा स्वराज जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जय हिन्द। जय भारत।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

मंगलवार, 18 जून 2019

वीरांगना रानी झाँसी को नमन : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज, 18 जून को रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि है. उनका जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था. उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु पुकारा जाता था. झाँसी के राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हुआ. सन 1851 में उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन चार माह पश्चात उसका निधन हो गया. राजा गंगाधर राव को इस घटना से गहरा धक्का पहुंचा. वे लगातार अस्वस्थ रहने लगे और 21 नवंबर 1853 को उनका स्वर्गवास हो गया. इससे पहले उन्होंने अपने चचेरे भाई के पुत्र को गोद लेने सम्बन्धी प्रस्ताव अंग्रेजों के पास भेजा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था. 


राजा के निधन पश्चात् 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत करके झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी. एक वार्ता के क्रम में रानी के घोष मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी के साथ ही विद्रोह का बिगुल बज उठा. अंग्रेजों की राज्य लिप्सा की नीति से उत्तरी भारत के नवाब और राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में विद्रोह की आग भभक उठी. नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तांत्या तोपे आदि रानी के इस कार्य में सहयोग देने आगे आये.

23 मार्च 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ. रानी ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया. वे अपनी पीठ पर दामोदर राव को बाँध घोड़े पर सवार हो अंग्रेजों से युद्ध करती रहीं. युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई झाँसी से कालपी होते हुए ग्वालियर जा पहुँचीं. ग्वालियर पर आक्रमण कर वहां के किले पर अधिकार कर लिया गया. अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता हुआ ग्वालियर पहुँच गया. यहाँ हुए युद्ध में रानी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं. 18 जून 1858 को ग्वालियर का युद्ध उनके लिए अंतिम अंतिम युद्ध सिद्ध हुआ. वे घायल हो गईं और अंततः वीरगति प्राप्त की.


रानी लक्ष्मी बाई के जीवन से दो बातें सीखने योग्य हैं. एक तो उन्होंने उस कालखंड में जबकि पर्दा-प्रथा प्रभावी था किन्तु स्त्री-शिक्षा प्रभावी रूप में नहीं थी, रानी ने महिलाओं की सेना बनाई, उनको प्रशिक्षित किया. दूसरे, बिना किसी स्त्री-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण सम्बन्धी आन्दोलनों के उन्होंने बुन्देलखण्ड और आसपास के अनेक पुरुष राजाओं को अपने झंडे तले लाकर स्त्री-शक्ति का परिचय दिया था.

वीरांगना को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.

++++++++++











गुरुवार, 13 जून 2019

जाँबाज मनोज तलवार को सादर नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
भारतीय सेना हमेशा अपने जांबाजों से सुशोभित रही है. ऐसे ही एक जांबाज मेजर मनोज तलवार की आज, 13 जून को पुण्यतिथि है. उनका जन्म 29 अगस्त 1969 को मुज़फ़्फ़रनगर में हुआ था. मूल रूप से पंजाब के निवासी कैप्टन पी०एल० तलवार उनके पिता हैं. कानपुर में अपने पिता की नियुक्ति के समय उनकी उम्र महज दस साल थी. उस समय वे पिता की वर्दी पहनकर जवानों की तरह जंग करने के सीन बनाते थे. वे जवानों को देखकर कहते भी थे कि मैं बड़ा होकर सेना में जाऊंगा.  

मनोज तलवार एनडीए में चयन पश्चात् वर्ष 1992 में कमीशन प्राप्त कर महार रेजीमेंट में लेफ्टीनेंट पद पर नियुक्त हुए. उनकी पहली तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई. बचपन से ही वीरतापूर्ण स्वभाव के चलते वे कुछ अलग करना चाहते थे. इसी कारण वे कमांडो की विशेष ट्रेनिंग लेकर असम में उल्फा उग्रवादियों का सफाया करने के लिए निकल गए. वर्ष 1999 में उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति की मांग की. सियाचिन जाने से पहले वे घर आए जहाँ उन्होंने अपने विवाह सम्बन्धी प्रस्ताव को यह कहकर नकार दिया कि मेरा समर्पण तो देश के साथ जुड़ चुका है. अभी तो उसकी हिफाजत के लिए वचनबद्ध हूँ. पता नहीं क्या हो, मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करूंगा. इसके बाद वे कारगिल चले गए.


कारगिल में घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए मेजर मनोज तलवार कारगिल के टुरटक सेंटर की शून्य से 60 डिग्री नीचे तापमान की 19 हजार फीट ऊंची खड़ी चोटी पर अपनी टुकड़ी लेकर बढ़ चले. 13 जून 1999 की शाम उन्होंने ऊंची चोटी पर तिरंगा फहरा दिया. लेकिन तभी दुश्मनों की तोप के गोले का शिकार होकर वे शहीद हो गए. मेजर मनोज तलवार को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया. देश के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले 9 महार के शहीद मेजर मनोज तलवार के नाम पर सियाचिन में ग्लेशियर नंबर-3 पर सैन्य पोस्ट का नाम रखा गया है जो कि महार की वीरता का प्रतीक है.

बुलेटिन परिवार की ओर से मेजर मनोज तलवार को विनम्र श्रद्धांजलि.

++++++++++













मंगलवार, 28 मई 2019

नमन आज़ादी के दीवाने वीर सावरकर को : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भगूर गाँव में हुआ था. वे बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दूवादी थे. उन्हें हिन्दू शब्द से बेहद लगाव था. वे कहते थे कि उन्हें स्वातन्त्रय वीर की जगह हिन्दू संगठक कहा जाए. उन्होंने जीवन भर हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान के लिए कार्य किया. उनको अखिल भारत हिन्दू महासभा का छह बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया.
उन्हें आजीवन काला पानी की दोहरी सज़ा मिली थी. वे सन 1911 से सन 1921 तक अंडमान की सेल्यूलर जेल में रहे. सन 1921 में स्वदेश लौटने के बाद उन्हें फिर कला पानी की सजा सुनाई गई. सन 1937 में उन्हें मुक्त कर दिया गया था. उन्होंने सन 1947 में भारत विभाजन का विरोध किया. बाद में सन 1948 में महात्मा गांधी की हत्या में उनका हाथ होने का संदेह किया गया. अपने देशप्रेम के ज़ज्बे के चलते वे किसी आरोप से घबराये नहीं और कालांतर में अदालत ने उन्हें तमाम आरोपों से बरी किया. 

उनकी मृत्यु 26 फ़रवरी 1966 में मुम्बई में हुई. उनके निधन पर तत्कालीन भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया. उनके ही सम्मान में पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे का नाम वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा गया.


आइये इसके साथ-साथ वीर सावरकर के बारे में कुछ तथ्य जान लें, शायद आपको भी जानकारी हो.

> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लंदन में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया था.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1905 के बंग-भंग के बाद सन् 1906 में 'स्वदेशी' का नारा देकर विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्हें अपने विचारों और अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति शपथ ने लेने के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोई.
> वे पहले भारतीय थे जिन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की.
> वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का स्वाधीनता संग्राम बताया और लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास लिखा.
> वे दुनिया के एकमात्र लेखक हैं जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया था.
> वे दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे, जिनका मामला हेग के अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चला था.
> वे पहले भारतीय राजनीतिक कैदी थे, जिन्होंने एक अछूत को मंदिर का पुजारी बनाया था.
> उन्होंने ही पहला भारतीय झंडा बनाया था, जिसे जर्मनी में 1907 की अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने फहराया था.
> वे एकमात्र व्यक्ति रहे जिन्हें दो बार कालापानी की सजा हुई.
> वे पहले कवि थे, जिन्होंने काग़ज़-कलम के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं. कहा जाता है उन्होंने अपनी रची दस हज़ार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षों स्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वे देशवासियों तक नहीं पहुँची.
> वे प्रथम क्रान्तिकारी थे, जिन पर स्वतंत्र भारत की सरकार ने झूठा मुकदमा चलाया और बाद में निर्दोष साबित होने पर माफी मांगी.


वीर सावरकर को उनकी जन्म जयंती पर सादर नमन करते हुए आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

++++++++++












गुरुवार, 9 मई 2019

राष्ट्रगौरव महाराणा प्रताप को सादर नमन और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
दृढप्रतिज्ञ और विलक्षण व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप का जन्म वि०स० 1597 ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया यानि कि 9 मई 1540 को कुम्भलगढ, राजस्थान में सिसोदिया राजपूत राजवंश में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर की संतान के रूप में हुआ था. पिता के निधन बाद उनका राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को हुआ. विरासत में उन्हें मेवाड की प्रतिष्ठा और स्वाधीनता की रक्षा का दायित्व मिला. अपने यशस्वी पूर्वज महाराणा कुम्भा तथा राणा सांगा की शौर्य कथाओं को तथा देश, धर्म और आन-बान-शान, मान-मर्यादा पर मरने का पाठ बचपन में ही पढ़ने के कारण उन्होंने बिना घबराये, बिना भयभीत हुए लगातार संघर्ष किया. 


उनके नाम के साथ वीरता के किस्से जुड़े होने के साथ-साथ हल्दीघाटी का युद्ध और उनका घोड़ा चेतक सर्वाधिक चर्चा में रहते हैं. कहते हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक बाज की तरह उछल कर अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊँचाई तक पहुँच गया था. इस कारण ही महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया था. इसी युद्ध में घायल होने के बाद चेतक को वीरगति प्राप्त हुई थी.

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को मेवाड़ की राजपूत सेना तथा मुगलों के मध्य हुआ था. मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया जबकि मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था. हल्दीघाटी के इस युद्ध में बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सेना के अस्सी हजार सैनिकों का सामना किया था. यह युद्ध चला तो केवल एक दिन परन्तु इसमें सत्रह हजार लोग मारे गए. इतिहासकारों के अनुसार युद्ध में किसी के विजयी न होने के बाद भी महाराणा प्रताप विजयी रहे. आमने-सामने चले इस युद्ध में उन्होंने अकबर की विशाल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था, यह उनकी जीत कही जाएगी.  

इसके बाद 1579 से 1585 तक की स्थिति ऐसी बनी कि महाराणा प्रताप एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे. उधर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे. इसका लाभ उठाकर महाराणा प्रताप ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और जल्द ही उदयपुर समेत कई महत्वपूर्ण स्थान महाराणा के अधिकार में आ गए. महाराणा प्रताप के सिंहासन पर बैठते समय मेवाड़ की जितनी भूमि पर उनका कब्ज़ा था, उतने पर पुनः उनका शासन स्थापित हो गया. इस स्थिति में बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर कोई परिवर्तन न कर सका. महाराणा प्रताप लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और यह मेवाड़ के लिए स्वर्ण युग साबित हुआ. मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण सन 1585 में समाप्त हुआ.

इसके बाद महाराणा प्रताप राज्य के विकास में जुट गए. यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 19 जनवरी 1597 को अपनी नई राजधानी चावंड में महाराणा प्रताप का निधन हो गया. महाराणा प्रताप से भयभीत होने का उदाहरण अकबर के इसी कदम से मिलता है कि वह डर के मारे अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया था और महाराणा के निधन के बाद पुनः आगरा लौट आया.

महाराणा प्रताप का नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी ही नहीं अपितु मंत्रदाता भी कहे जा सकते हैं. वे स्वतंत्रता, स्वाभिमान, सहिष्णुता, पराक्रम और शौर्य के परिचायक कहे जाते हैं. मातृभूमि के गौरव के लिए वे कभी कितनी ही बड़ी मुसीबत से विचलित नहीं हुए, न ही कभी किसी के आगे झुके. यही कारण है कि महाराणा प्रताप आज भी हिंदुस्तान के जन-जन के हृदय में बसे हुए हैं.

आज उनकी जन्मजयन्ती पर बुलेटिन परिवार की ओर से सादर नमन सहित आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

++++++++++














मंगलवार, 26 मार्च 2019

विद्यार्थी जी को याद करते हुए ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार,
मार्च 1931 में कानपुर में भयंकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए जिसमें हजारों लोग मारे गए. गणेश शंकर विद्यार्थी ने आतंकियों के बीच जाकर हजारों लोगों को बचाया. इसी प्रयास में वे खुद एक हिंसक भीड़ में फंस गए, जिसने उनकी बेरहमी से हत्या कर दी. इसे महज इत्तेफाक कहा जाये या फिर कोई साजिश कि उनकी हत्या सरदार भगत सिंह को फाँसी दिए जाने के ठीक दूसरे दिन हुई. जी हाँ, भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से घबराकर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें निर्धारित तिथि से एक दिन पहले, 23 मार्च को फांसी दे दी इसी के ठीक दूसरे दिन, 25 मार्च को विद्यार्थी जी की हत्या हो जाती है. विद्यार्थी जी भी अपने विचारों और निडर स्वभाव के कारण अंग्रेजों की आँख में खटक रहे थे. विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़े या फिर अंग्रेजी शासन की साजिश का शिकार हो गए, ये अंधकार में है. जो सत्य है वह यह कि उनका शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला था. वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था. उनकी पहचान होने के बाद 29 मार्च को उनका अंतिम संस्कार किया गया. 


विद्यार्थी जी ने सन 1917-18 में होम रूल आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और कानपुर में कपड़ा मिल मजदूरों की पहली हड़ताल का नेतृत्व किया था. सन 1920 में उन्होंने प्रताप का दैनिक संस्करण आरम्भ किया और उसी साल उन्हें रायबरेली के किसानों के हितों की लड़ाई करने के लिए दो साल कठोर कारावास की सजा हुई. सन 1922 में विद्यार्थी जी जेल से रिहा हुए पर सरकार ने उन्हें भड़काऊ भाषण देने के आरोप में फिर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इसके बाद उन्हें सन 1924 में रिहा किया गया.

26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल प्रयाग में जन्मे विद्यार्थी जी अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण एण्ट्रेंस तक ही पढ़ सके किन्तु उनका स्वतंत्र अध्ययन अनवरत चलता ही रहा. आरम्भ में उन्होंने एक नौकरी भी की मगर अपने अंग्रेज़ अधिकारियों से न पटने के कारण उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी. इसके बाद कानपुर में भी उन्होंने नौकरी की. इसी तरह की स्थिति के बाद नौकरी छोड़कर वह अध्यापक हो गए. प्रसिद्द साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता देखकर प्रभावित हुए और उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास सरस्वती में बुला लिया. यहाँ से एक ही वर्ष के बाद अभ्युदय नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे. इन्होंने कुछ दिनों तक प्रभा का भी सम्पादन किया था. बाद में सन 1913 में उन्होंने प्रताप (साप्ताहिक) का सम्पादन किया.

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं पर विद्यार्थी जी के विचार बड़े ही निर्भीक होते थे. वे कानपुर के लोकप्रिय नेता, पत्रकार, शैलीकार एवं निबन्ध लेखक रहे. पत्रकारिता के साथ-साथ विद्यार्थी जी की साहित्यिक अभिरुचियाँ भी निखरती रही. उनकी रचनायें सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य, हितवार्ता आदि में छपती रहीं. हिन्दी में शेखचिल्ली की कहानियाँ आपकी ही देन हैं. विद्यार्थी जी ने अंततोगत्वा कानपुर लौटकर प्रताप अखबार की शुरूआत की जो आज़ादी की लड़ाई का मुख-पत्र साबित हुआ. उन्होंने सरदार भगत सिंह को प्रताप से जोड़ा था. रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा प्रताप में उन्होंने ही प्रकाशित की.  

गणेश शंकर विद्यार्थी जी को उनकी पुण्यतिथि पर बुलेटिन परिवार की ओर से सादर श्रद्धांजलि.

++++++++++











सोमवार, 18 मार्च 2019

श्रद्धांजलि - मनोहर पर्रिकर और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।

सच्चे और सादगी पसंद व्यक्तित्व, आईआईटीएन, ईमानदार आदर्श नेता, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री, देश के पूर्व रक्षामंत्री श्री मनोहर पर्रिकर जी को समस्त भारतवासी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

वीनस गर्ल की सौन्दर्य-आभा : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
समय ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से रंगीन राह से गुजरता हुआ बहुरंगी होता चला गया. विकास इतना हुआ कि अब हर हाथ में मोबाइल के सहारे चौबीस घंटे का नियमित वीडियो उपलब्ध हो गया. सेल्युलाइड की दुनिया वीनस गर्ल से निकल कर धक-धक गर्ल, मिर्ची गर्ल, कांटा गर्ल, चोली गर्ल की राह से गुजरती हुई नग्न-अर्धनग्न कमनीय बालाओं के साथ लगातार आगे बढ़ती रही. इस बदलाव के दौर में यदि कुछ बदलता न दिखा तो वो है प्रसिद्द अभिनेत्री मधुबाला के प्रति लोगों का आकर्षण. अपने समय में वीनस गर्ल के रूप में मशहूर मधुबाला के प्रशंसक आज भी उतने ही मिल जाते हैं, जितने कि उनके दौर में मिलते होंगे. उम्र, व्यवसाय, जाति, धर्म, कार्य, क्षेत्र से इतर आज भी मधुबाला के प्रशंसकों में कमी नहीं आई है. और ऐसा तब है जबकि उनको इस दुनिया को हमेशा-हमेशा को अलविदा कहे हुए आधी सदी होने को आई है. 


हमारे समय की और उसके बाद जन्मने वाली पीढ़ी ने मधुबाला को सिर्फ परदे पर ही देखा है, टीवी पर देखा है और अब इंटरनेट के माध्यम से देख रही है. इस पीढ़ी ने कभी भी उनको लाइव रूप में नहीं देखा है, किसी कार्यक्रम में उनसे परिचय नहीं हुआ है, किसी समारोह में उनके साथ फोटो खिंचवाने का अवसर नहीं मिला है, किसी आयोजन में उनके ऑटोग्राफ लेने का मौका भी नहीं मिला है इसके बाद भी मधुबाला की मनमोहक छवि इस पीढ़ी के बीच जीवित है. उनके हँसने का अंदाज, आँखों की शरारत और उनकी अदाकारी ने उनके प्रति अजब सी दीवानगी पैदा की है. संभव है कि आज की एकदम नवोन्मेषी पीढ़ी ने सौन्दर्य के प्रतिमान बदल दिए हों. उसके लिए सौन्दर्य का सम्बन्ध कम वस्त्रों से, कामुक मुद्राओं से, अर्धनग्न प्रदर्शन से, आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता से होने लगा हो किन्तु इसके बाद भी बहुतायत में ऐसे युवा आज भी मिलते हैं जो मधुबाला के प्रशंसक हैं. 

आज 14 फरवरी को मधुबाला का जन्मदिन है. इस अवसर पर गूगल ने भी उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए डूडल बनाया है. उनको श्रद्धा-सुमन इस आकांक्षा के साथ कि उनका अप्रतिम मनमोहक रूप-सौन्दर्य सदैव समाज में अंकित रहे. वीनस गर्ल के रूप में उनकी छवि और भी चमकती रहे.


++++++++++











गुरुवार, 31 जनवरी 2019

प्रथम परमवीर चक्र से सम्मानित वीर को नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 31 जनवरी पहले परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्मदिन है. वे भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कमांडर थे. सन 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये थे. इसके लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया था. उनका जन्म 31 जनवरी 1923 को जम्मू में हुआ था. इनके पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भी सेना में डॉक्टर थे. इसके साथ-साथ उनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे तथा 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हुए थे. अपने पिता और मामा के प्रभाववश वे भी सेना में भरती हुए. 


मेजर सोमनाथ ने अपना सैनिक जीवन 22 फरवरी 1942 से शुरू किया. तब उन्हें चौथी कुमायूं रेजिमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर प्रवेश मिला. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया जहाँ इन्होंने अपने पराक्रम के तेवर दिखाए. इसके चलते वे एक विशिष्ट सैनिक के रूप में पहचाने जाने लगे. सन 1947 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगाम मोर्चे पर जाने का हुकुम मिला. 3 नवम्बर को मेजर सोमनाथ बदगाम जा पहुँचे और उत्तरी दिशा में उन्होंने अपनी टुकड़ी तैनात कर दी. तभी दुश्मन की सेना ने उनकी टुकड़ी को तीन तरफ से घेरकर हमला किया. भारी गोलाबारी में उनके सैनिक हताहत होने लगे. अपनी दक्षता का परिचय देते हुए मेजर सोमनाथ ने अपने सैनिकों के साथ गोलियां बरसाते हुए दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा. 

इस दौरान बहुत से भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे. सैनिकों की कमी को मेजर महसूस कर रहे थे. ऐसे समय में एक मोर्टार का निशाना ठीक वहीं पर लगा जहाँ वे खुद मौजूद थे. दुश्मन सेना की तरफ से किये गए इस विस्फोट में मेजर सोमनाथ शहीद हो गये. उन्होंने प्राण त्यागने से ठीक पहले अपने वीर सैनिकों को प्रोत्साहित करते हुए कहा था कि, दुश्मन हमसे केवल पचास गज की दूरी पर है. हमारी गिनती बहुत कम रह गई है. हम भयंकर गोली बारी का सामना कर रहे हैं फिर भी मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपनी आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक डटा रहूँगा.

उनकी वीरता और भारतीय सैनिकों के जोश के चलते श्रीनगर विमानक्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को बेदख़ल करते हुए मेजर 3 नवम्बर 1947 को वीरगति को प्राप्त हुए. इसके लिए उन्हें पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि परमवीर चक्र का डिजाइन मेजर शर्मा के भाई की पत्नी सावित्री बाई खानोलकर ने तैयार किया था.

आज उनकी जन्मतिथि पर बुलेटिन परिवार की तरफ से उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं.

++++++++++









मंगलवार, 29 जनवरी 2019

मजदूरों की आवाज़ को सादर नमन : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
एक भारतीय राजनेता होने के साथ-साथ श्रमिक संगठन के नेता, पत्रकार रह चुके जॉर्ज फर्नांडिस का आज, 29 जनवरी 2019 को लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया. उनका जन्म 03 जून 1930 को कर्नाटक के मंगलुरु में हुआ था. उनके पिता जॉन जोसफ फर्नांडिस और माता एलीस मार्था फर्नांडिस थे. 16 वर्ष की उम्र में उनको क्रिश्चियन मिशनरी में पादरी बनने की शिक्षा लेने भेजा गया. वहां उनका मन नहीं लगा. विद्यालय में हो रहा भेदभाव उनको पसंद नहीं आ रहा था. स्कूल में फादर्स ऊंची कुर्सी-मेज पर बैठकर अच्छा भोजन करते थे, जबकि प्रशिक्षणार्थियों को ऐसी सुविधा नहीं मिलती थी. उन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और बाद में स्कूल छोड़ दिया. इसके बाद वह सन 1949 में वे रोजगार की तलाश में बंबई चले आए. 

सन 1967 से सन 2004 तक वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए. केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में वे रक्षा मंत्री, संचारमंत्री, उद्योगमंत्री, रेलमंत्री आदि के रूप में देश को अपनी सेवाएँ देते रहे हैं. रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने रिकॉर्ड 30 से ज्यादा बार सियाचिन ग्लेशियर का दौरा किया. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में वे रक्षा मंत्री रहे और उन्हीं के रक्षा मंत्री रहते हुए भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था. केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान निवेश के उल्लंघन के कारण अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों आईबीएम और कोका-कोला को देश छोड़ने का आदेश दिया. कोंकण रेलवे परियोजना के पीछे वे एक प्रेरणा शक्ति के रूप में रहे जबकि वे 1989-90 में रेल मंत्री रहे. 


उनके नेतृत्व में देश की सबसे बड़ी हड़ताल सन 1974 में हुई थी जबकि उन्होंने देशव्यापी रेल हड़ताल का आह्वान किया था. दरअसल सन 1973 में उनको ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन का चेयरमैन चुना गया. भारतीय रेलवे में उस समय लगभग 14 लाख लोग काम किया करते थे. रेलवे कामगार कई सालों से सरकार से कुछ जरूरी मांगें कर रहे थे लेकिन सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही थी. ऐसे में उनके आह्वान के बाद रेल का चक्का जाम हो गया. कई दिनों तक रेलवे का सारा काम ठप्प रहा. न तो कोई आदमी कहीं जा पा रहा था और न ही सामान. तीन हफ्ते से अधिक समय तक चली इस हड़ताल को सरकार ने सेना की सहायता से बड़ी निर्ममता से ख़तम करवाया. सरकार ने सख्ती के साथ इस आंदोलन को कुचलते हुए लगभग 30 हजार लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें जॉर्ज फर्नांडिस भी शामिल थे.


आपातकाल के दौरान वे सिखों की वेशभूषा में घूमते थे. गिरफ्तारी से बचने के लिए वे खुद को लेखक खुशवंत सिंह बताया करते थे. जब इस दौरान बड़ौदा डाइनामाइट केस में उनको गिरफ्तार किया गया तो जेल में रहने के दौरान वह कैदियों को श्रीमद्भागवतगीता पढ़कर सुनाया करते थे. संघर्षशील, बेबाक वक्ता, मजदूरों के हितैषी जॉर्ज फर्नांडिस विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. वे हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, मलयाली, कोंकणी सहित दस भाषाओं के जानकार थे.

बुलेटिन परिवार की ओर से उनको विनम्र श्रद्धांजलि





++++++++++










मंगलवार, 27 नवंबर 2018

हिन्दी में हालावाद के प्रणेता को श्रद्धांजलि अर्पित करती ब्लॉग बुलेटिन


बैर कराते मंदिर-मस्जिद मेल कराती मधुशाला, जैसा अंदाज मधुशाला के माध्यम से देने वाले हरिवंश राय बच्चन का आज, 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद में जन्म हुआ था. इनको बचपन में बच्चन अर्थात बच्चा या संतान कहकर पुकारा जाता था, बाद में वे इसी बच्चन नाम से प्रसिद्द हुए. सन 1926 में वे जब 19 वर्ष के थे तब उनका 14 वर्षीय श्यामा से हुआ. दुर्भाग्य से सन 1936 में श्यामा का निधन टी०बी० के कारण हो गया. इसके पाँच साल बाद बच्चन का विवाह पंजाब की तेजी सूरी से हुआ जो स्वयं में रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं. अमिताभ और अजिताभ इन्हीं के पुत्र हैं. 


हरिवंश राय बच्चन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम०ए० और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की. अंग्रेज़ी कवि यीट्स पर लिखा उनका शोध प्रबन्ध काफ़ी प्रशंसित हुआ.  वे अनेक वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में प्राध्यापक रहे. बाद में सन 1955 में वह विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ होकर दिल्ली चले गये. उनका पहला काव्य संग्रह सन 1935 में प्रकाशित मधुशाला को भले माना जाता हो किन्तु इससे पहले उनका तेरा हार प्रकाशित हो चुका था. मधुशाला के प्रकाशन से बच्चन नाम साहित्य जगत पर छा गया. मधुशाला के बाद मधुबाला और मधुकलश के लगभग एकसाथ शीघ्र ही सामने आने पर इसे हिन्दी का हालावाद कहा गया. उनकी कृति दो चट्टानें को सन 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. बिड़ला फाउन्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिये उन्हें सरस्वती सम्मान प्रदान किया था. उनको भारत सरकार द्वारा सन 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. उनका निधन 18 जनवरी 2003 को हुआ.

आज उनके जन्मदिन पर बुलेटिन परिवार की ओर से सादर श्रद्धांजलि अर्पित है.

++++++++++










गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

विसंगतियों के फ्लॉप शो को उल्टा-पुल्टा करके चले गए जसपाल भट्टी


नमस्कार साथियो,
आपाधापी के उस दौर में जबकि इन्सान हँसना भूल सा गया है, हास्य के नाम पर फूहड़ता दिखाई जा रही है, व्यंग्य के नाम पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाये जा रहे हैं ऐसे समय में स्वस्थ, स्वच्छ कार्यक्रमों द्वारा हंसाने का काम जसपाल भट्टी द्वारा किया गया. उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों से ही अपने नुक्कड़ नाटक नॉनसेंस क्लब से भ्रष्टाचार और नेताओं का बहुत ही मनोरम अंदाज़ में मज़ाक बनाना शुरू किया था. वे सिर्फ हास्य कलाकार नहीं थे बल्कि जीवन की विसंगतियों पर चुटीली टिप्पणियां करने वाले गंभीर व्यंग्यकार थे. उन्होंने महंगाई, भ्रष्टाचार, नेताओं के पाखंड सहित अनेक मामलों पर कार्यक्रमों का निर्माण किया. उनके लोकप्रिय होने की वजह थी वे मध्यम वर्ग के मुद्दों को बहुत ही दिलचस्प अंदाज़ में उठाते थे. दूरदर्शन पर उनके कार्यक्रम फ़्लॉप शो और उल्टा−पुल्टा तो बेहद चर्चित हुए थे. बाद में उन्होंने और उनकी पत्नी सविता ने टीवी के रियलिटी शो नच बलिये में भी भाग लिया था. यहाँ भी उन्होंने अपने नृत्य एवं हास्य के ज़रिये दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन किया था. 


3 मार्च 1955 को अमृतसर में जन्मे जसपाल भट्टी ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की उपाधि प्राप्त की. टेलीविजन में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करने से पूर्व वह चंडीगढ़ से प्रकाशित द ट्रिब्यून में कार्टूनिस्ट थे. उन्होंने पंजाब पुलिस पर करारा व्यंग्य करते हुए माहौल ठीक है का निर्देशन किया था. उनका यह पहला निर्देशन बहुत चर्चित रहा. छोटे परदे पर लगातार सक्रिय रहने वाले जसपाल भट्टी ने कई फिल्मों में भी अभिनय किया. उनकी अंतिम फ़िल्म पॉवर कट है जो पंजाब में लगातार की जाने वाली बिजली कटौती पर आधारित है. वे अपनी इसी फ़िल्म के प्रमोशन के लिए भठिंडा से जालंधर अपनी टीम के साथ जा रहे थे. रास्ते में शाहकोट के पास 25 अक्टूबर 2012 को तड़के लगभग तीन बजे एक सड़क हादसे में 57 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया.

आज उनकी पुण्यतिथि पर बुलेटिन परिवार की तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि सहित आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

++++++++++













लेखागार