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रविवार, 9 जून 2019

ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019



ब्लॉग बुलेटिन, इसकी नींव डाली थी जाने-माने ब्लॉगर अजय कुमार झा जी शिवम मिश्रा जी और देव कुमार झा जी ने, और मील के पत्थर बने इनके साथ 

सलिल वर्मा जी
वाणी गीत जी
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी
हर्षवर्धन श्रीवास्तव जी
और 
रश्मि प्रभा यानी मैं। 

इस टीम की हमेशा कोशिश रही है, कुछ नया करने की, जिससे अधिक से अधिक ब्लॉग,ब्लॉगर को जोड़ा जा सके, उन्हें एक साहित्यिक सम्मान दिया जा सके, जैसे -

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक वार्षिक अवलोकन। 

शुरू में इन प्रतिभाओं की पुस्तक भी निकली थी, लेकिन जीवन की आपाधापी में बहुत लोग इससे रूबरू नहीं हो पाए, और हमें ऑनलाइन ही खुद को समेटना पड़ा। 

हम ब्लॉग के दिनों को न भूले हैं, न भूलेंगे, न भूलने देंगे।  यह हम सबका पहला साहित्यिक प्लेटफॉर्म है।  हम सब हनुमान बन संजीवनी बूटी लाते रहें, तो तय है कि यह प्लेटफॉर्म कभी सूना नहीं होगा। 
अर्धवार्षिक समय में हमने तय किया है कि हम कहानी,कविता की एक स्वस्थ प्रतियोगिता आयोजित करेंगे।  

कहानी वर्ग में कहानी और लघुकथा
काव्य विधा में कविता और ग़ज़ल
उभरते ब्लॉगर में महिला व पुरूष
और 
एक ब्लॉगर ऑफ दा ईयर

आप अपनी जो भी रचना शामिल करना चाहें, उसका ब्लॉग लिंक हमें भेजें, नीचे दिये ईमेल पर ...

लाइक्स, कमेंट्स का बंधन नहीं, बुलेटिन टीम चयन करेगी।   
हम उसे 24 जून से 24 जुलाई तक शामिल करेंगे। अर्थात प्रतियोगिता 24 जून से 24 जुलाई तक चलेगी। 
सिर्फ एक रचना अपनी या अपने परिचित की भेजें यानी ब्लॉग लिंक। पुरस्कार ब्लॉग बुलेटिन की तरफ से दिसम्बर माह में आयोजित होने वाले वार्षिक अवलोकन के समय दिए जायेंगे। 

अंतिम निर्णय निर्णायक मंडल का होगा। 
तो, अविलम्ब इस प्रतियोगिता में शरीक हों  

~~~~~~~~~~~~~~~~~

अपना फैसला खुद करो !!

गठबंधन की गाँठ !

१० वीं बरसी पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

साहिर और अमृता

शिक्षा एक अंजूरी दे दो

हार या जीत

फिर इक बार तुम्हे लिखती हूँ मैं..!!!

धरती की सीने की दरारें फिर भरने वाली हैं

नहीं चाहिए कोई न्याय

क्या किसी को हालात बदलने हैं -------mangopeople

*गुड़िया का दर्द*

रविवार, 8 जुलाई 2018

सेठजी, मनिहारिन और राधा रानी

बरसाने में एक सेठजी रहते थे। उनके कई कारोबार थे, तीन बेटे तीन बहुएँ थी,

सब के सब आज्ञाकारी थे, लेकिन सेठजी के बेटी नहीं थी, यही अभाव उन्हें खलता था। यह चिंता संतों के दर्शन से कम हुई।

संत बोले मन में जो अभाव हो उस पर भगवान का भाव स्थापित कर लो।

    

 सुनो सेठ तुमकू मिल्यो बरसाने का वास,
         यदि मानो राधे सुता काहे रहो उदास।

सेठ जी ने राधा रानी का एक चित्र मँगवाया और अपने घर में लगा कर पुत्री भाव से रखते।

रोज सुबह उठ कर राधे राधे कहते भोग लगाते और दुकान से लौटकर राधे राधे कहकर सोते

तीन बहू बेटे हैं घर में, सुख सुविधा है पूरी,
संपति भरी भवन में रहती, नहीं कोई मजबूरी,
कृष्ण कृपा से जीवन पथ पे आती न कोई बाधा,
मैं हूँ पिता बहुत बड़भागी, बेटी है मेरी राधा।

एक दिन एक मनिहारी चूड़ी पहनाने सेठ के अहाते में आई और चूड़ी पहनने की गुहार लगाई। तीनों बहुएँ बारी बारी से चूड़ी पहन कर चली गयीं।

फिर एक हाथ और बढ़ा तो मनिहारिन ने सोचा कि कोई रिश्तेदार आया होगा उसने चूड़ी पहनाई और चली गयी।

सेठजी की दुकान पर पहुँच कर पैसे माँगे और कहा कि इस बार पैसे पहले से ज्यादा चाहिए। सेठजी बोले कि क्या चूड़ी मँहगी हो गयी है?

मनिहारिन बोली, नहीं सेठजी आज मैं चार लोगो को चूड़ी पहना कर आ रही हूँ।
सेठ जी ने कहा कि तीन बहुओं के अलावा चौथा कौन है? झूठ मत बोल, यह ले तीन का पैसा। मनिहारिन बेचारी तीन का पैसा ले कर चली गयी।

 सेठजी ने घर पर पूछा कि चौथा कौन था जिसने चूड़ी  पहनी हैं? बहुएँ बोली कि हम तीन के अलावा तो  कोई भी  नही था।

रात को सोने से पहले सेठजी पुत्री राधारानी को स्मरण करके सो गये। नींद में राधा जी प्रगट हुईं, सेठजी  बोले

"बेटी बहुत उदास हो, क्या बात है?"

  बृषभानु दुलारी बोलीं,
   "तनया बनायो तात, नात ना निभायो है..
   चूड़ी पहनि लीनी मैं, जानि पितु गेह किंतु,
   आप मनिहारिन को मोल ना चुकायो है।
   तीन बहू याद किन्तु बेटी नही याद रही,
    नैनन श्रीराधिका के नीर भरि आयो है।
    कैसी भई दूरी कहो कौन मजबूरी हाय,
   आज चार चूड़ी काज मोहि बिसरायो है???

 सेठजी की नींद टूट गयी पर नीर नही टूटा, रोते रहे, सबेरा हुआ, स्नान ध्यान करके मनिहारिन के घर पहुँच गये। मनिहारिन देखकर चकित हुई।

सेठ जी आंखों में आँसू लिये  बोले...
       धन धन भाग तेरो मनिहारी..
तोसे बड़भागी नही कोई, संत महंत पुजारी,
       धन धन भाग तेरो मनिहारी..
"मैने मानी सुता किन्तु निज नैनन नहीं निहारी,
चूड़ी पहन गयीं तेरे हाथन ते श्री बृषभानु दुलारी।
       धन धन भाग तेरो मनिहारी..
बेटी की चूड़ी पहिराई लेहु, जाऊँ तेरी बलिहारी,
हाथ जोड़ बिनती करूँ, क्षमियो चूक हमारी।
    "जुगल नयन जलते भरे मुख ते कहे न बोल,"
    "मनिहारिन के पाँय पड़ि लगे चुकावन मोल।"
मनिहारीन सोचने लगी,
   जब तोहि मिलो अमोल धन,
    अब काहे माँगत मोल,
ऐ मन मेरे प्रेम से श्री राधे राधे बोल।

|| राधे राधे जय श्री कृष्ण ||
~~~~~~~~~~~~~~~~

रविवार, 10 जून 2018

८ जून को मनाया गया समुद्र दिवस

 जून 8, 2018 को Ocean Day यानि समुद्र दिवस मनाया गया |
समुद्र में बहुत कचरा जमा हो चुका है और मनुष्य ने अपने फायदे के लिए प्राकृतिक संसाधनों का इस हद तक दोहन कर लिया है कि अब स्थिति खराब होने को हैं। आप सोच सकते हैं कि अब स्थिति ऐसी है जहाँ मॉरीशस, मालदीव जैसे देश आने वाली शताब्दी शायद न देख पाएं... समुद्र में गंदगी, ग्लोबल वार्मिंग, उत्तरी ध्रुव पर जमे ग्लेसियर का अजीब तरीके से पिघलने का क्रम और नदियों में समाप्त होता पानी.. जल स्तर का लगातार नीचे चले जाना... इस मामले में हम भारतीयों का हाल तो खैर बहुत ही खराब है... हम तो खैर विश्व की सबसे अनुशासनहीन जनता हैं सो हमको अब भी कोई फर्क नहीं पड़ता|
 
रामायण में जब प्रभु श्री राम ने समुद्र से लंका जाने के लिए मार्ग मांगा तो समुद्र देव ने गर्जना ही की... इस घनघोर गर्जना के बाद जब राम ने अपने बाण से समुद्र सुखा देने की चेतावनी दी और तब ही समुद्र प्रकट हुए... वह तो खैर भगवान थे सो समुद्र स्वयं प्रकट हुआ लेकिन अब शायद राम स्वयं ही पुकारें तो भी समुद्र के प्रकट होने की स्थिति कभी नहीं आएगी क्योंकि समुद्र बचेगा ही नहीं... एकदम साफ दिख रहे समुद्र में भी महज़ पन्द्रह मिनट की सफाई के बाद कुछ यह निकला सो कल्पना कीजिये यदि पूरे समुद्र की सफाई हो तो पृथ्वी में मनुष्य के रहने की जगह बचेगी? 

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सोनम की समझदारी

एक किला जहाँ पूरी बारात ही गायब हो गयी

खुशफ़हम जिंदगी

कविता : दुनियाँ

दर्द.........विजय कुमार सप्पत्ति

तू चन्दा मैं चाँदनी - 1

इस अभेद में भेद को जान लेना तुम, पहाड़ों पर बारिशों के बाद जब कांस के फूल खिलेंगे तुम खुश होना-

मधुपुर मेरा मालगुडी है

थि‍कसे मठ - लद्दाख

घर की दहलीज़ !!!!

क्या जल रहा है...?

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

हम भारतियों की अंध श्रद्धा

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
हमारे देश की सबसे बड़ी अंध श्रद्धा... शादी कर दो लड़का सुधर जायगा। और दूसरी अंध श्रद्धा... लड़का शादी के पहले बहुत अच्छा था, शादी के बाद ही बिगड़ा है। और तीसरी अंध श्रद्धा... जिसे सुनकर लड़के के नीचे धरती और आसमान फट जाता है ...
"हमारी बेटी तो गाय है।"
😮😯😲😮😯😲


सादर आपका 
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गुरुवार, 9 नवंबर 2017

जोकर

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज का ज्ञान :-

एक जोकर को उसके दर्शक सिर्फ एक जोकर के रूप में देखते है ... पर वो खुद को हमेशा एक कलाकार के रूप में देखता है |

सबक :- भले ही लोग आपके बारे में जो भी सोचे ... फर्क इस से पड़ता है कि आप अपने बारे में क्या सोचते है !

सादर आपका

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रथ और सेनासहित भरत की यात्रा

प्रबल और वरिष्ठ समाजसेवियों का चुनाव

अँधेरा का निर्जन द्वीप

दो भाइयों का निर्मल और निस्वार्थ प्रेम

तुम मेरे हो..............

सुबह .... हमेशा एक सी नहीं होती

"यहाँ हमारा सिक्का खोटा"

चुपचाप

उस्ताद शाहिद परवेज जी "सांस्कृतिक सफ़र मानोशी के साथ में"

पुस्तक-चर्चा: बादलों में बारूद

दस ग्राम हींग सफेद रही, करोड़ों रुपये काले हो गए

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

स्व॰ हबीब तनवीर साहब और ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


हबीब तनवीर (जन्म: 1 सितंबर 1923) भारत के मशहूर पटकथा लेखक, नाट्य निर्देशक, कवि और अभिनेता थे। हबीब तनवीर का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था, और निधन 8 जून,2009 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुआ। उनकी प्रमुख कृतियों में आगरा बाजार (1954) चरणदास चोर (1975) शामिल है। उन्होंने 1959 में दिल्ली में नया थियेटर कंपनी स्थापित किया था।

जीवनवृत

हबीब तनवीर का जन्म 1 सितम्बर,1932 को रायपुर में हुआ था। जो अब छत्तीसगढ़ की राजधानी है। उनके बचपन का नाम हबीब अहमद खान था। उन्होंने लॉरी म्युनिसिपल हाईस्कूल से मैट्रीक पास की, म़ॉरीस कॉलेज, नागपुर से स्नातक किया (1944) और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एमए की। बचपन से हीं कविता लिखने का शौक चढ़ा। पहले तनवीर के छद्मनाम नाम से लिखना शुरू किया जो बाद में उनका पुकार नाम बन गया।

करियर

सन् 1945 में वे मुम्बई चले गये और प्रोड्यूसर के तौर पर आकाशवाणी में नौकरी शुरू की। वहां रहते हुए उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिए गाने लिखा। कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गये और कलांतर में इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन के अंग बन गये। जब ब्रिटीश शासन के खिलाफ इप्टा से जुड़े कई लोग जेल चले गये तब हबीब तनवीर को संगठन की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। 1954 वे दिल्ली आ गये और हिन्दुस्तानी थियेटर से जुड़ गये। उन्होंने बाल थियेटर के लिए भी काम किया। कई नाटकों की रचना की। यहीं रहते हुए उनकी मुलाकात अभिनेता-निर्देशक मोनिका मिश्रा से हुई जिनसे उन्होंने आगे चलकर शादी कर ली। उसी साल उन्होंने अपना चर्चित नाटक आगरा बाजार लिखा।

पुरस्कार और सम्मान

हबीब तनवीर को संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड (1969), पद्मश्री अवार्ड (1983) संगीत नाटक एकादमी फेलोशीप (1996), पद्म विभूषण(2002) जैसे सम्मान मिले। वे 1972 से 1978 तक संसद के उच्च सदन यानि राज्यसभा में भी रहे। उनका नाटक चरणदास चोर एडिनवर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टीवल (1982) में पुरस्कृत होने वाला पहला भारतीय नाटक रहा ।

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से स्व॰ हबीब तनवीर साहब की ९४ वीं जयंती पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं |
सादर आपका
शिवम् मिश्रा 

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तत्रभवान् राजा रामपाल सिंह

ताप, बारिश, इश्क शहर

अरे ओ बेरंग ज़रा देख रंगों का कारबार क्या है

स्माल वंडर 

रियलिटी शो (!) और बाबा रामदेव जी

रेल हादसा

गुरूदीक्षा लेने के कुचक्र के आफ्टरइफेक्‍ट हैं ये सब...

मानव होने के अधिकार से वंचित किन्नर

भूलना सबसे बुरी आदत

एक साल के हुए हमारे पेड़

वैवाहिक बलात्कार :

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

जैसी करनी ... वैसी भरनी - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक महिला अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहां से ...गुजरने वाले
किसी भी भूखे के लिए पकाती थी ,वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे कोई भी ले सकता था ... 

एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और बजाए धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बडबडाता ...

 "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "

दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा ,वो कुबड़ा रोज रोटी ले के जाता रहा और इन्ही शब्दों को बडबडाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा " 
वह महिला उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि 
"कितना अजीब व्यक्ति है ,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने क्या क्या बडबडाता रहता है ,
मतलब क्या है इसका ".
 
एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी ".
और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर मिला दिया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे
ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने लगी कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह
बोली "हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी ?" 
और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे की आँच में जला दिया ... एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी , हर रोज की तरह वह कुबड़ा आया और रोटी ले कर "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा " बडबडाता हुआ चला गया इस बात से बिलकुल बेखबर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है|

हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ
था और महीनों से उसकी कोई खबर नहीं थी| 

शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है ,वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है , अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है.वह कमजोर और दुबला हो गया था, उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था ,भूख से वह कमजोर हो गया था|

जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ. जब मैं एक मील दूर है, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर गया मैं मर गया होता, लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था ,उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया ,भूख के मारे मेरे प्राण निकल रहे थे , मैंने उससे खाने को कुछ माँगा ,उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि "मैं हर रोज यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो " .
 
जैसे ही माँ ने सुनी माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लिया , उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत
और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था ...
 
"जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।"

-सादर आपका 
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फूल मठरी...

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागिन डांस

हुसैनीवाला बॉर्डर, फिरोज़पुर

क्यों है एग्जाम का हौव्वा?

बेटा चाँद पकड़ना चाहे

एक भाषा की चीख

रहें न रहें हम महका करेंगे

उड़ो कि सारा गगन तुम्हारा है ...

हांडी में पकते चावल के एक दाने का अंदाज

चने की दाल की कढ़ी

हैवलॉक में नैसर्गिक सौन्दर्यानुभूति : अंडमान-निकोबार यात्रा

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

फ़ाइल ट्रांसफर - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय  ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

पप्पू एक बार कुछ फाइल्स एक पीसी से दूसरे को ट्रांसपर करना चाहता था ... पप्पू ने उसकी प्रक्रिया कुछ इस प्रकार की ...

1. पप्पू ने राईट क्लीक उस फ़ाइल पर किया जिसे वह ट्रांसफर करना चाहता था और कट ऑप्शन पर क्लीक किया!

2. उसके बाद उस पीसी से मॉउस को डिस्कोनेक्ट किया!

3. उस मॉउस को बड़ी सावधानी से उस पीसी के साथ जोड़ दिया जिस पर फ़ाइल को कॉपी करना चाहता था!

4. फिर से मॉउस पर राईट क्लीक किया और पेस्ट ऑप्शन पर क्लीक किया ...

पर न जाने क्यूँ फ़ाइल ट्रांसफर नहीं हुई ... !!!???

क्या आप बता सकते हैं क्यूँ !!??

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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शिकवा

लंबे अंतराल के बाद - कहीं तुम वो तो नहीं

एक अलौकिक प्रेम कथा - सती से पार्वती तक !!!

शिव पार्वती विवाह

ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल में क्या फर्क है?

अफसाना

NASA opportunity: धरती के आकार वाले सात नए ग्रहों का पता लगा, इन सभी ग्रहों पर पानी मिलने की पूरी संभावना

एक लेखक का जाना

मालती जोशी जी की स्नेह भरी पाती

मधुबाला की ४८ वीं पुण्यतिथि

आज दिल मचल गया

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

१४ फरवरी, मधुबाला और ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम|

" कोई इश्क़ का नाम ले ... और अनारकली का जिक्र न हो ... यह मुमकिन नहीं "
और आज वैसे भी इश्क़ का दिन है ...
१४ फरवरी 
  
 
मधुबाला (जन्म: 14 फरवरी, 1933, दिल्ली - निधन: 23 फरवरी, 1969, बंबई) भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री थी। उनके अभिनय में एक आदर्श भारतीय नारी को देखा जा सकता है।चेहरे द्वारा भावाभियक्ति तथा नज़ाक़त उनकी प्रमुख विशेषता है। उनके अभिनय प्रतिभा,व्यक्तित्व और खूबसूरती को देख कर यही कहा जाता है कि वह भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे महान अभिनेत्री है। वास्तव मे हिन्दी फ़िल्मों के समीक्षक मधुबाला के अभिनय काल को स्वर्ण युग की संज्ञा से सम्मानित करते हैं।
 
प्रारम्भिक जीवन
मधुबाला का जन्म १४ फरवरी १९३३ को दिल्ली में एक पश्तून मुस्लिम परिवार मे हुआ था। मधुबाला अपने माता-पिता की ५ वीं सन्तान थी। उनके माता-पिता के कुल ११ बच्चे थे। मधुबाला का बचपन का नाम 'मुमताज़ बेग़म जहाँ देहलवी' था। ऐसा कहा जाता है कि एक भविष्यवक्ता ने उनके माता-पिता से ये कहा था कि मुमताज़ अत्यधिक ख्याति तथा सम्पत्ति अर्जित करेगी परन्तु उसका जीवन दुखःमय होगा। उनके पिता अयातुल्लाह खान ये भविष्यवाणी सुन कर दिल्ली से मुम्बई एक बेहतर जीवन की तलाश मे आ गये। मुम्बई मे उन्होने बेहतर जीवन के लिए काफ़ी संघर्ष किया।
 
बालीवुड में प्रवेश
बालीवुड में उनका प्रवेश 'बेबी मुमताज़' के नाम से हुआ। उनकी पहली फ़िल्म थी बसन्त (१९४२)। देविका रानी बसन्त मे उनके अभिनय से बहुत प्रभावित हुयीं, तथा उनका नाम मुमताज़ से बदल कर ' मधुबाला' रख दिया। उन्हे बालीवुड में अभिनय के साथ-साथ अन्य तरह के प्रशिक्षण भी दिये गये। (१२ वर्ष की आयु मे उन्हे वाहन चलाना आता था)।

आगे पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ 

आज उनकी ८४ वीं जयंती के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम सब उनको नमन करते हैं !!

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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प्रेम

राष्ट्रद्रोह

खस्ता दिल...

संवाद

छुपी है मुहब्बत भी इनकार में

आल्हा छंद

वेलेंटाइन दिवस पर वह कहानी, जो प्रेम की पराकाष्ठा है

मोहब्बत की मिसाल 'पाकीजा'

प्रेम-गीत

सरकारी योजनाओं का सच...!

इन दोहन पर न जाइए

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

तीन सवाल - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक बार एक लड़के ने एक बुजुर्ग से पूछा, "बाबा, जब एक दिन दुनिया से जाना है तो फिर लोग पैसे के पीछे क्यों भागते हैं?"

"जब जमीन जायदाद जेवर यहीं रह जाते हैं तो लोग इनको अपनी जिंदगी क्यों बनाते हैं?"

"जब रिश्ते निभाने की बारी आती है तो दोस्त ही दुश्मनी क्यों निभाते हैं?"

बुजुर्ग ने गौर से तीनों सवाल सुने। फिर उसने माचिस की डिब्बी से तीन तीलियां निकालीं। दो तीलियां उसने फेंक दीं और एक तीली को आधा तोड़कर उसका ऊपर वाला भाग फेंक दिया। उसके बाद नीचे वाले भाग को नुकीला बनाकर अपना दांत कुरेदते हुए बोला,

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"चल भाग यहाँ से, मुंझे नहीं पता।"
 
सादर आपका
 

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

निजहित, परहित और हम

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण पर निकले तो उन्होंने मार्ग में एक निर्धन ब्राहमण को भिक्षा मागते देखा....

अर्जुन को उस पर दया आ गयी और उन्होंने उस ब्राहमण को स्वर्ण मुद्राओ से भरी एक पोटली दे दी।

जिसे पाकर ब्राहमण प्रसन्नता पूर्वक अपने सुखद भविष्य के सुन्दर स्वप्न देखता हुआ घर लौट चला।

किन्तु उसका दुर्भाग्य उसके साथ चल रहा था, राह में एक लुटेरे ने उससे वो पोटली छीन ली।

ब्राहमण दुखी होकर फिर से भिक्षावृत्ति में लग गया।अगले दिन फिर अर्जुन की दृष्टि जब उस ब्राहमण पर पड़ी तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा।

ब्राहमण ने सारा विवरण अर्जुन को बता दिया, ब्राहमण की व्यथा सुनकर अर्जुन को फिर से उस पर दया आ गयी अर्जुन ने विचार किया और इस बार उन्होंने ब्राहमण को मूल्यवान एक माणिक दिया।

ब्राहमण उसे लेकर घर पंहुचा उसके घर में एक पुराना घड़ा था जो बहुत समय से प्रयोग नहीं किया गया था,ब्राह्मण ने चोरी होने के भय से माणिक उस घड़े में छुपा दिया।

किन्तु उसका दुर्भाग्य, दिन भर का थका मांदा होने के कारण उसे नींद आ गयी... इस बीच ब्राहमण की स्त्री नदी में जल लेने चली गयी किन्तु मार्ग में ही उसका घड़ा टूट गया, उसने सोंचा, घर में जो पुराना घड़ा पड़ा है उसे ले आती हूँ, ऐसा विचार कर वह घर लौटी और उस पुराने घड़े को ले कर चली गई और जैसे ही उसने घड़े को नदी में डुबोया वह माणिक भी जल की धारा के साथ बह गया।

ब्राहमण को जब यह बात पता चली तो अपने भाग्य को कोसता हुआ वह फिर भिक्षावृत्ति में लग गया।

अर्जुन और श्री कृष्ण ने जब फिर उसे इस दरिद्र अवस्था में देखा तो जाकर उसका कारण पूंछा।

सारा वृतांत सुनकर अर्जुन को बड़ी हताशा हुई और मन ही मन सोचने लगे इस अभागे ब्राहमण के जीवन में कभी सुख नहीं आ सकता।

अब यहाँ से प्रभु की लीला प्रारंभ हुई।उन्होंने उस ब्राहमण को दो पैसे दान में दिए।

तब अर्जुन ने उनसे पुछा “प्रभु मेरी दी मुद्राए और माणिक भी इस अभागे की दरिद्रता नहीं मिटा सके तो इन दो पैसो से इसका क्या होगा” ?

यह सुनकर प्रभु बस मुस्कुरा भर दिए और अर्जुन से उस ब्राहमण के पीछे जाने को कहा।

रास्ते में ब्राहमण सोचता हुआ जा रहा था कि "दो पैसो से तो एक व्यक्ति के लिए भी भोजन नहीं आएगा प्रभु ने उसे इतना तुच्छ दान क्यों दिया ? प्रभु की यह कैसी लीला है "?

ऐसा विचार करता हुआ वह चला जा रहा था उसकी दृष्टि एक मछुवारे पर पड़ी, उसने देखा कि मछुवारे के जाल में एक मछली फँसी है, और वह छूटने के लिए तड़प रही है ।

ब्राहमण को उस मछली पर दया आ गयी। उसने सोचा"इन दो पैसो से पेट की आग तो बुझेगी नहीं।क्यों? न इस मछली के प्राण ही बचा लिए जाये"।

यह सोचकर उसने दो पैसो में उस मछली का सौदा कर लिया और मछली को अपने कमंडल में डाल लिया। कमंडल में जल भरा और मछली को नदी में छोड़ने चल पड़ा।

तभी मछली के मुख से कुछ निकला।उस निर्धन ब्राह्मण ने देखा ,वह वही माणिक था जो उसने घड़े में छुपाया था।

ब्राहमण प्रसन्नता के मारे चिल्लाने लगा “मिल गया, मिल गया ”..!!!

तभी भाग्यवश वह लुटेरा भी वहाँ से गुजर रहा था जिसने ब्राहमण की मुद्राये लूटी थी।

उसने ब्राह्मण को चिल्लाते हुए सुना “ मिल गया मिल गया ” लुटेरा भयभीत हो गया। उसने सोंचा कि ब्राहमण उसे पहचान गया है और इसीलिए चिल्ला रहा है, अब जाकर राजदरबार में उसकी शिकायत करेगा।

इससे डरकर वह ब्राहमण से रोते हुए क्षमा मांगने लगा। और उससे लूटी हुई सारी मुद्राये भी उसे वापस कर दी।

यह देख अर्जुन प्रभु के आगे नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके।

अर्जुन बोले,प्रभु यह कैसी लीला है? जो कार्य थैली भर स्वर्ण मुद्राएँ और मूल्यवान माणिक नहीं कर सका वह आपके दो पैसो ने कर दिखाया।

श्री कृष्णा ने कहा “अर्जुन यह अपनी सोंच का अंतर है, जब तुमने उस निर्धन को थैली भर स्वर्ण मुद्राएँ और मूल्यवान माणिक दिया तब उसने मात्र अपने सुख के विषय में सोचा। किन्तु जब मैनें उसको दो पैसे दिए। तब उसने दूसरे के दुःख के विषय में सोचा। इसलिए हे अर्जुन-सत्य तो यह है कि, जब आप दूसरो के दुःख के विषय में सोंचते है, जब आप दूसरे का भला कर रहे होते हैं, तब आप ईश्वर का कार्य कर रहे होते हैं, और तब ईश्वर आपके साथ होते हैं।

सादर आपका 
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तुलसी तहाँ न जाइये…..

तुम्हारा गिफ्ट नहीं लूंगी मैं..

दोस्ती

केदारकांठा ट्रैक , दिल्ली से सांकरी तक

बातचीत करते समय इन बातों का ध्यान रखें

चंदे पर फंदा

स्वागत मधुमास का

सुण भई..ओ बसंत...

छोटे डर का डेरा

उत्तर प्रदेश मैं बोल रहा हूँ, प्रश्न चिन्ह बन खौल रहा हूँ।

इमर

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

लेखागार