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बुधवार, 2 मार्च 2016

ब्लॉग बचाओ - ब्लॉग पढाओ: साढे बारह सौवीं ब्लॉग बुलेटिन

आज अपना ऑफिस में एगो एस्मार्ट नौजबान लड़का को जब उंगली पर हिसाब जोड़ते देखे, तब जाकर हमको अपना पुराना जमाना का पढाई याद आया अऊर अपना सिच्छक लोग याद आये, जिनका पढ़ाया हुआ अभियो तक हमरे दिमाग में बैठा हुआ है. अब बताइये भला अठारह अऊर बारह तीस होता है, इसके लिये आपको कागज-पिंसिल चाहिये, कि अंगुली के पोर पर हिसाब करने का जरूरत है! अगर एतना छोटा हिसाब उंगली पर जोड़ना पड़े, तब तो महाखलनायक गब्बर सिंह के सब्दों में – “अपने सिच्छक लोग का नाम पूरा मिट्टी में मिलाय दियो!” सोचिये ई लोग का हाल होगा जब मामला आधा पर आएगा... नहीं समझे? अरे जब 18 अऊर 12 के लिये कागज पिंसिल चाहिये, त पौने बारह अऊर सवा पाँच जोड़ने में त पसीना छूट जाएगा. पहिले त ई बताना पड़ेगा कि पौने अऊर सवा का होता है.

पटना में हमरे ऑफिस में एगो मद्रासी अफसर का पोस्टिंग हो गया. सुरू सुरू में बहुत दिक्कत होता था उसको, खान-पान से लेकर बोली-भासा के कारन. ऑफिस का अस्टाफ लोग उसको एगो गनित सिखा दिया था कि उसके घर से ऑफिस तक का रेक्सा भाड़ा अढ़ाई रुपया (बिहार ढ़ाई नहीं बोलते हैं, इससे वजन कम हो जाता है) होता है अऊर अढ़ाई माने दू रुपिया आठ आना. कुछ रोज के बाद, चाय के दोकान पर जब ऊ चाय का पैसा देने लगा त दुकानदार बोला, “डेढ़ रुपिया हुआ”. ऊ रोज उसके गनित में एगो नया आँकड़ा जोड़ा गया. ऊ पूछा कि डेढ़ माने का होता है. अऊर जब उसको पता चला कि डेढ माने एक रुपिया पचास पैसा, तब उसके गोड़ के नीचे से धरतीये घसक गया.

पूछने पर बताया कि एक रोज ऊ रोज के तरह ऑफिस से घर जा रहा था, मगर रेक्सा नहीं मिला. त ऊ बेचारा धीरे-धीरे पैदल बढ़ने लगा. थोड़ा दूर पर एगो रेक्सा देखाई दिया. भाड़ा पूछने पर ऊ बोला, “डेढ़ रुपिया.” हमरे ई मद्रासी बाबू बोले कि देखो भाई, हम रोज आते-जाते हैं, अढ़ाई रुपिया देंगे. चलना है त चलो! रेक्सा वाला इस्टेसन वाला हनुमान जी को परनाम किया अऊर उनको ले गया. एही नहीं, ई सिलसिला अऊर केतना बार हुआ. ऊ तो बेचारे को जब डेढ़ माने समझ में आया त माथा पीट लिया.
ई हिसाब किताब पहिला जमाना में केतना अच्छा था. हमरे स्वर्गीय दादा जी सवा, अढाई, डेढ़ का पहाड़ा तक याद रखते थे. बड़ा से बड़ा हिसाब जुबानी हल कर देते थे. अब कहाँ गया ऊ पहाड़ा अऊर कहाँ गया ऊ सवैया. उनका सवाल होता था – कै नवाँ दू तीन चार. अऊर हम कहते थे छब्बीस. ऊ पूछते थे सोल सोल (16X16) और हम कहते थे दू छप्पन (256). आज अगर कोई ई सब गनित का हल जुबानी कर देता है त समझिये कि बैंक कलर्क का परिच्छा का तैयारी कर रहा है.

मोहावरा अऊर कहावत में बहुत सा ऐसा आँकड़ा मिलता था. नौ दिन चले अढाई कोस को अगर छोड़ भी दीजिये त सन्नी देओल का ढाई किलो का हाथ जिसपर पड़ता है वो उठता नहीं उठ जाता है, अपना आप में ऐतिहासिक डायलाग है.

हमरे पटना में एगो इस्कूल है – टी.के. घोष अकैडमी. इतिहास के नाम पर एही समझिये कि बाबू राजेन्द्र प्रसाद अऊर बिधान चन्द्र राय ओहीं से पढ़े हैं. हमरे पिता जी भी ओहीं के होनहार छात्र रहे, लेकिन समय के साथ नाम एतना खराब हो गया कि एगो कहावत चल पड़ा पटना में कि पढना-लिखना साढे बाइस, टिकिया घोस में नाम लिखाइस. अब एहाँ साढे बाइस मतलब ऊ बिद्यार्थी जिसका भगवाने मालिक है अऊर टिकिया घोस का मतलब बताने का जरूरते नहीं है.

त आज आपलोग अपना भरा पूरा जिन्नगी से आधा, चउथाई अऊर पौना घण्टा का टाइम निकालें अऊर ई पोस्ट को आसीर्बाद दें अऊर बाकी का लिंक देखिये अऊर सराहिये काहे कि ई हमरा पोस्ट है ब्लॉग-बुलेटिन का साढ़े बारह सौवाँ पोस्ट. अऊर हमारा नारा है –


ब्लॉग बचाओ – ब्लॉग पढ़ाओ !!

  
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