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मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

ख़ुद को सुरक्षित करो



पूजा, अर्थात विश्वास,श्रद्धा ।
मात्र हाथ जोड़ने से,
बेबात की अफ़रातफ़री से,
शक्ति का उपहास होता है ।
मौन स्मित रखो,
हर क्षण संकल्प उठाओ,
जौहरी की तरह ख़ुद को तराशो,
फ़िर माँ की आंखों में काजल भरकर,
ख़ुद को सुरक्षित करो,
शंखनाद के साथ माँ के आगमन का उल्लास मनाओ ...


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एक कथा के अनुसार महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा पर एक गांव है जहाँ देवी येलम्मा का वास है । इस गाँव में एक परम्परा है कि गंदगी से ही सही बचपन में यदि किसी लड़की के बालों में जटा पड़ जाती है वह यल्लमा देवी को सौंप दी जाती है अर्थात वह देवदासी हो जाती है , वह गांव की संपत्ति होती है और उसे जीवन भर विवाह का अधिकार नही होता । ऐसे में यौन शोषण तो आम बात है । उसी तरह संक्रमण वश यदि किसी लड़के को पेशाब में खून आ जाता है तो उसे भी एलम्मा की संपत्ति माना जाता है । ऐसे पुरुष को जीवन भर स्त्री के वेश में रहना होता है । स्त्री तो देवदासी या जोगतिन के रूप में पूरे गांव की दासी होती है । जीवन भर भिक्षा से इनका निर्वाह होता है । यह कविता ऐसी ही एक जोगतिन की व्यथा कथा है : - शरद कोकास
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जोगतिन
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तेरे चरण स्पर्श करने वाले भक्तों ने
कल रात मेरे शरीर पर स्पर्श किया था माँ
जाने कितने बिच्छू
जाने कितने साँप
कितनी छिपकलियां
मेरे शरीर पर रेंग गए
मैं नींद में नहीं थी माँ
मैं चीखना चाहती थी
मैं सोई नहीं थी माँ
मेरे मुँह में भी जबान थी
लेकिन सामर्थ्य का हाथ
मेरे मुँह पर था
घंटिया नहीं बजी माँ तेरे मंदिर की
जयकारे नहीं सुनाई दिए
ढोल ताशे नगाड़े भी नहीं बजे
मेरे कानों में गूँजती रही
एक पुरुष की आवाज
चुपचाप पड़ी रह
तू माँ की सेवा में है
हम माँ के पुजारी हैं
और तू माँ की है
तो तू हमारी है
मेरी हर रात ऐसी ही होती है माँ
बस मेरी सुबह
तेरे भक्तों की सुबह से
अलग होती है
प्रभाती नहीं गाई जाती
मेरी देहरी पर
न बजता है कोई मंगलगान
हर सुबह
मैं रात में टूटी हुई अपनी हड्डियों को जोड़ती हूं
अपने आँसुओं से
कुएं पर लज्जा की हवाओं में
अर्धनग्न अपने जिस्म पर
पानी उंडेलते हुए
मैं धो डालना चाहती हूं
रात के वे तमाम लिजलिजे स्पर्श
जो मेरी देह पर नहीं बल्कि मेरी आत्मा पर
दरिंदों के नाखूनों के निशान छोड़ गए थे
मैं धोना चाहती हूँ वे घाव
जिनमें समाज की इन सड़ी गली परंपराओं का मवाद दिखाई देता है
मैं नोच कर फेंक देना चाहती हूं
देवी की भक्ति के नाम पर
पैदा की गई
नियमों की उन बजबजाती इल्लियों को
जो मेरा ही नही इस समाज का जिस्म धीरे धीरे खा रही हैं
बहुत कोशिश करती हूँ माँ
कि मैं तेरे भक्तों द्वारा दिया गया
पवित्रता का विशेषण
धारण कर सकूँ
हर सुबह जैविक विवशताएँ मुझे थमा देती हैं एक कटोरा
जिसमें दिन भर
अपने पेट के गड्ढे को भरने के लिए
मैं अन्न जमा करती हूं
रात के अंधेरे में ही नहीं
दिन के उजाले में भी
वस्त्रों से ढके हुए मेरे निजी अंग
जाने कितनी बदतमीज़ियाँ बर्दाश्त करते हैं
विवशताएँ मेरे कानों में उंडेलती हैं
पिघले सीसे की तरह कुछ बोल
दिन में पुरुषों की छेड़खानी से
और रात में हवस से बचते हुए
माँ मैं तेरी पुजारन कहाती हूँ
माँ तू तो सब देखती होगी ना
शायद सोचती भी होगी
मुझे तो तेरी सेवा के लिए रखा गया था
मुझे कहाँ पता था माँ
कि तेरी सेवा तेरे भक्तों की सेवा है
मुझे नहीं पता था माँ
बचपन में सर पर धूल मिट्टी उठाते हुए
जाने कब मेरे बालों में
वह गंदगी समा गई
और उन से जटा बनने लगी
मुझे नहीं पता था माँ यह नियम किसने बनाए हैं
मुझे नहीं पता था माँ
सचमुच मुझे कुछ नहीं पता था
मगर तू तो सब जानती है माँ
तू रेणुका तू एलम्मा
तू जगत जननी
तू पाप हारिणी
तू दुख विनाशिनी
तू तो देवी है माँ ।
तू जानती है
एक दिन मेरी कमर धरती की ओर झुक जाएगी
और तेरे मंदिर के कलश
आसमान की ओर बढ़ जायेंगे
सूख जाएगा मेरी जांघों पर बहता रक्त
बस इतना बता दे
क्या कभी तेरे खप्पर में
इकठ्ठा होगा
इन भक्त आततायियों का रक्त ?

 

सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

कात्यायनी माँ




हर वर्ष माँ आती हैं,
निरुद्देश्य कभी नहीं,
हमेशा उदेश्य की ऊर्जा से परिपूर्ण। 
घट में रखे जल से वह अपनी प्यास बुझाती हैं,
मायके की दहलीज़ से,
अपना श्रृंगार करती हैं,
सार्थक संकल्पों को आशीष देती हैं,
क्षत विक्षत स्वाभिमान को एकत्रित कर,
फिर एक मूरत गढ़ती हैं,
हवन के धुंधलके में,
प्राण संचार करती हैं,
विदाई के खोइंछे से एक एक दाना पीछे लौटाती हैं 
देती हैं विश्वास,
फिर से मायके आने का  ... 


यूँ ही बैठे बैठे खयाल आया....
रावण के दस सिरों ने ही,
उसका बेडा गर्क करवाया।
'गर एक ही सिर की मानता सलाह,
तो बुराई का न बनाया जाता उसे ,
क्लास वन ठेकेदार इस तरह।
एक एक काम के लिए,
दस जनो की सलाह लेने की
भारी कीमत चुकानी पड़ी बेचारे को।
ले लो भैया।..अब तो,
शिक्षा रावण से ही ले लो।
एक काम करने के लिए ...
दस लोगों की सलाह लेने,
कभी घर से मत निकलो।

हमारे पास बेशक हाथ में हाथ थामने की,
साथ- संग बिताने की धरोहर न थी
पर लम्हे जो पीछे
बीत गए ऊँची हंसी में,
वहीँ तो हमारी खिली खिली चाहत रखी थी.
एकाकीपन की तान साधे हैं वे ही लम्हे
जिनमे हमारी हंसी के स्वर
खो गए कहीं
अब दर्दीला सन्नाटा गूंजता है वहाँ
एकाकी... अपनी ही ध्वनि सुनने जैसा
लापता हुई 'हम' वाली सरगम
निरर्थक शब्द बचे
'मैं' और 'तुम'
आपस में झगड़ लेना था इस से बेहतर कि
मैं ही करूँ सवाल, मैं ही तलाशूँ जवाब
सुनो,
मैं उठाऊं इस अनचाही पीड़ा को या
तुम सहेजो चाहत के बेअन्त दर्द,
इस अनंत पीड़ा के रिसते रक्त दोष से
न तुम बचोगे, न शुद्ध रह पाएंगे हम
चाहो तो कर लेना मेरे नाम की
एक परिक्रमा, रोज ढलती हुई संध्या में
मेरी तरह,
इसी से खोज पाओगे
तुम प्रीत के वे भूले और अबूझ स्वर
हाँ, तब तुम बेदाग़ नया प्रेम संगीत रचना। 

कुछ नाम रेत पर भी लिखे जाते हैं
पर नही होती मयस्सर उन्हें उम्र कोई
फिर भी उनकी छाप एक बारगी
छू जाती हैं रूह की पाकीजगी सी
फलक पर सबका नाम हो मुमकिन नही हैं ........

ईश्वर अपने क़लम से
कभी किसी की तक़दीर
अच्छी या बुरी नहीं लिखते
वो बनाना हमारे हाथ में है

हमारी किताबें रद्दी में बेचीं गई तब हम खुरदुरा आँगन बुहार रहे थे .....
जब हमने अपनी जिन्दगी का पहला सपना देखा
हम अबोध लडकियाँ थे
हम पूरे छत को अपने फ्रोक के साथ गोल गोल घुमा देते 
छत धुंधलाता फिर धम्म से गिर पड़ता
हमारी खिलखिलाहटें कोयले की चूल्हे की चिंगारी सी
हमारे सपने जरा फ़िल्मी होते पर हम सपने में भी अपनी छातियों पर दुपट्टा कसी लडकियाँ ही होते
हम पन्द्रह साल के थे और दबी जुबान से बातें करते
हम बड़ी बहनों से बड़े होने का गूढ़ अर्थ आँखे झपकाकर समझते
जो न समझ पाते उसके चिपक कर सो जाते उसका बड़ा होना हमारी धमनियों में बहता
हम आसान सी दिखने वाली लडकियाँ थे
जो कॉपियों में दिन रात देखे सपनों को उकेरती और सिरहाने छुपा लेती
हमारे कंधो पर चमकीले गोटे का पल्लू था ठीक तब जब हमनें "सुरंगमा 'तुम्हारे लिए 'गुनाहों का देवता 'जैसे उपन्यास की नाइकाए हमारे आँख के डोरे लाल कर गई
जब आलिंगन शब्द पढ़ते ही हमारी कनपटी तप गई थी
हम किसी और घर के दिवार पर अपने हाथ का छापा बना रहे थे
छ्मकने और छन से टूटने वाले सपने भी खालिस लड्किनुमा थे
टूटने जुड़ने बहकने दहकने भूलने बिसरने की सीढियाँ चढ़ते हमनें नाख़ून पर रंग सा बचाए रखा वो सपना
हम ढंग की औरत बनने की प्रक्रिया में आज भी
घुमा देना चाहते हैं छत को गोल गोल
हम तडप कर पढना चाहते हैं आलिंगन
हम और और गूढ़ अर्थ जानना चाहते है
बड़ी बहन सी उस करवट पीठ की जिन्दगी से
चिपक कर
कुछ लेना देना कुछ घुलना मिलना चाहते है
मीठे शरबत में निचुड़े निम्बू सा चुटकी भर खारे नमक का स्वाद भर सपना
हम जीना चाहते थे .....हम जीना चाहते हैं शायद...

रविवार, 14 अक्तूबर 2018

अमर शहीद सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेतरपाल जी को सादर नमन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज १४ अक्तूबर है ... आज ही के दिन सन १९५० में सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेतरपाल का जन्म हुआ था | आइये जानते है इन के बारे में ... 

सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेतरपाल परमवीर चक्र (14 अक्टूबर 1950 – 16 दिसम्बर 1971), भारतीय सेना के एक अधिकारी थे जिन्हें दुश्मन के सामने बहादुरी के लिए भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र मरणोपरान्त प्रदान किया गया था। खेतरपाल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए थे।

प्रारम्भिक जीवन

अरुण खेतपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) एम एल खेतरपाल भारतीय सेना में कोर ऑफ इंजीनियर्स अधिकारी थे। लॉरेंस स्कूल सनवार में जाने के बाद उन्होंने खुद को एक सक्षम छात्र और खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत किया था। खेतरपाल जून 1967 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में शामिल हुए। वह फॉक्सट्रॉट स्क्वाड्रन से संबंधित थे जहां वह 38वें पाठ्यक्रम के स्क्वाड्रन कैडेट कैप्टन थे। उनकी एनडीए संख्या 7498/एफ/38 थी वह बाद में भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल हो गए। 13 जून 1971 में खेतपाल को 17 पूना हार्स में नियुक्त किया गया था। 
 
सैन्य जीवन

खेतरपाल ने अपना सैन्य जीवन 13 जून 1971 को शुरू किया था और 16 दिसम्बर 1971 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 17 पूना हार्स को भारतीय सेना के 47वीं इन्फैन्ट्री ब्रिगेड की कमान के अंतर्गत नियुक्त किया गया था। संघर्ष की अवधि के दौरान 47वीं ब्रिगेड शकगढ़ सेक्टर में ही तैनात थी। 6 माह के अल्प सैन्य जीवन में ही इन्होने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। 
 
सम्मान

सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेतरपाल के अद्वितीय बलिदान व समर्पण के लिए इन्हें भारत सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस 1972 को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया जो 16 दिसम्बर 1971 से प्रभावी माना गया।


 ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से परमवीर चक्र विजेता अमर शहीद सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेतरपाल जी को सादर नमन |

सादर आपका

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केवल पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा।

विवशता

अस्मिता के योद्धाओं का सम्मान

गाए हमने गीत बहुत ....

नग्नता और यौनिकता का बोलबाला

दलित और गरीब को मीटू हैशटैग नहीं लगाना पड़ता

धृतराष्ट्र थे जन्मांध,

साईकिल पर कोंकण यात्रा भाग १: प्रस्तावना

३२८.जड़ें

सहारा दफ्तर में नक्सली

क्रांतिकारियों की शक्ति स्रोत - दुर्गा भाभी की १९ वीं पुण्यतिथि

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

शनिवार, 13 अक्तूबर 2018

सुबह होती है



देश, समाज,घर,व्यवहार,रीति-रिवाज ... पर अंधेरा मंडराता है, कोई विकल्प नज़र नहीं आता, तब यह विश्वास मन को चलाता है कि सुबह किसी अंधेरे की मुट्ठी में दम नहीं तोड़ती ।

 

वाणी मेरी दोष पूर्ण है
नहीं करूँगा स्तुति तेरी
बरसों पहले पढ़ी सरिता में छपी एक कविता की ये पंक्तियाँ आज अचानक याद आई तो मन जैसे थम सा गया ...हममे से ज्यादातर लोग किसी पर ना तो हाथ उठाते हैं ना ही किसी प्रकार का शारीरिक कष्ट देते हैं | हम सब एक दूसरे को अपनी वाणी द्वारा कष्ट पहुंचाते रहते हैं | कई बार कह्ने वाला बात कह कर भूल जता है या उसके पास ये तर्क होता है कि उसने तो बस कहा ही था , कौन सी हाथापाई करी थी , जबकि सुनने वाले के मन में ये एक कभी ना भरने वाला घाव बन जाता है | ये मानसिक घाव शारीरिक घाव से भी ज्यादा कष्ट देते हैं |इसीलिए धर्म में मौन की साधना सबसे श्रेष्ठ साधना मानी जाती है |मौन रहकर वाणी का संयम रखना सीख पाते हैं | हमें अहसास होता है कि हम दिन भर बिना जरूरत कितना अनावश्यक बोलते हैं , कितना ऐसा बोल जाते हैं जो दूसरों को अरुचिकर लगता है | “मौनी अमावस्या” एक ऐसा ही पर्व है जिसमें आम लोग भी मौन रहने का अभ्यास करते हैं | परन्तु मौन साधना केवल शब्दों को रोकना नहीं है, जैसे ही हम बोलना बंद करते हैं हमारे दिमाग में विचार बोलने लगते हैं ...बहुत जोर –जोर से , ये शोर शब्दों के शोर से कहीं ज्यादा होता है , क्योंकि ये शोर ज्यादातर नकारात्मक होता है , जैसे , “ उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, उसने ये क्यों कहा, या भगवान् उसको दंड क्यों नहीं दे रहे”| ये सारे शब्द भले ही हम अपने मन के अन्दर बोल रहे हों , हमें बहुत कष्ट पहुंचा रहे होते हैं | यहाँ हम अपने ही विचार शब्दों द्वारा अपने को कष्ट पहुंचा रहे होते हैं | ये वाणी का संयम नहीं है | वाणी का संयम है कि हम शब्द द्वारा किसी को चोट ना पहुंचाए ... न दूसरों को , ना ही खुद को | इसी लिए मौन साधना कठिन है, क्योंकि ये शब्दों को ही नहीं मन को भी थामना है जिसे निरंतर अभ्यास से ही प्राप्त किया जा सकता है |

चक्की में अनाज पीसने से पेट नही निकलता था / ओखली में कूटने के काम से हाथ सुडौल रहते थे/ ढेका चलाने से पैरों के सुडौल होने का ठहरा था / चुक्का मुक्का बैठ कर खाने से कम खाने में पेट भर जाता था / आग के आस पास बनी रहे तो रोएँ खत्म हो जाते थे / सील बट्टा के अपने फायदे
इसमें थकान परेशानी उलझन का जिक्र कभी आया ही नही / इज्जतदार औरतें इंसबके साथ रात पता नही कितने दबे पाँव पति की इक्षा पूरी कर आती
इससे ज्यादा काम इनका किसी घर में नही था । दीया का बत्ती पुरती पूजा का चौका लीपती रही
इनके पास कहने को कोई दर्द था ही नही
इनको सुनने वाले लोग भी नही थे
ये ही क्या कम था बड़े घर में खाने पीने की कभी कोई तकलीफ इन्हें न हुई
ऐसे घरों के आँगन सा एक मेरे घर का भी आँगन था जहाँ हाथ के छापा वाली औरतें दिवार पर जड़ी रह गईं.............

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

निन्यानबे का फेर - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक सम्राट का एक नौकर था, नाई था उसका। वह उसकी मालिश करता, हजामत बनाता। सम्राट बड़ा हैरान होता था कि वह हमेशा प्रसन्न, बड़ा आनंदित, बड़ा मस्त! उसको एक रुपया रोज मिलता था। बस, एक रुपया रोज में वह खूब खाता-पीता, मित्रों को भी खिलाता-पिलाता। सस्ते जमाने की बात होगी। रात जब सोता तो उसके पास एक पैसा न होता; वह निश्चिन्त सोता। सुबह एक रुपया फिर उसे मिल जाता मालिश करके। वह बड़ा खुश था! इतना खुश था कि सम्राट को उससे ईर्ष्या होने लगी। सम्राट भी इतना खुश नहीं था। खुशी कहां! उदासी और चिंताओं के बोझ और पहाड़ उसके सिर पर थे। उसने पूछा नाई से कि तेरी प्रसन्नता का राज क्या है? उसने कहा, मैं तो कुछ जानता नहीं, मैं कोई बड़ा बुद्धिमान नहीं। लेकिन, जैसे आप मुझे प्रसन्न देख कर चकित होते हो, मैं आपको देख कर चकित होता हूं कि आपके दुखी होने का कारण क्या है? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है और मैं सुखी हूँ; आपके पास सब है, और आप सुखी नहीं! आप मुझे ज्यादा हैरानी में डाल देते हैं। मैं तो प्रसन्न हूँ, क्योंकि प्रसन्न होना स्वाभाविक है, और होने को है ही क्या?

वजीर से पूछा सम्राट ने एक दिन कि इसका राज खोजना पड़ेगा। यह नाई इतना प्रसन्न है कि मेरे मन में ईर्ष्या की आग जलती है कि इससे तो बेहतर नाई ही होते। यह सम्राट हो कर क्यों फंस गए? न रात नींद आती, न दिन चैन है; और रोज चिंताएं बढ़ती ही चली जाती हैं। घटता तो दूर, एक समस्या हल करो, दस खड़ी हो जाती हैं। तो नाई ही हो जाते।

वजीर ने कहा, आप घबड़ाएं मत। मैं उस नाई को दुरुस्त किए देता हूँ।
वजीर तो गणित में कुशल था। सम्राट ने कहा, क्या करोगे? उसने कहा, कुछ नहीं। आप एक-दो-चार दिन में देखेंगे। वह एक निन्यानबे रुपये एक थैली में रख कर रात नाई के घर में फेंक आया। जब सुबह नाई उठा, तो उसने निन्यानबे गिने, बस वह चिंतित हो गया। उसने कहा, बस एक रुपया आज मिल जाए, तो आज उपवास ही रखेंगे, सौ पूरे कर लेंगे!
 
बस, उपद्रव शुरू हो गया। कभी उसने इकट्ठा करने का सोचा न था, इकट्ठा करने की सुविधा भी न थी। एक रुपया मिलता था, वह पर्याप्त था जरूरतों के लिए। कल की उसने कभी चिंता ही न की थी। ‘कल’ उसके मन में कभी छाया ही न डालता था; वह आज में ही जीया था। आज पहली दफा ‘कल’ उठा। निन्यानबे पास में थे, सौ करने में देर ही क्या थी! सिर्फ एक दिन तकलीफ उठानी थी कि सौ हो जाएंगे। उसने दूसरे दिन उपवास कर दिया। लेकिन, जब दूसरे दिन वह आया सम्राट के पैर दबाने, तो वह मस्ती न थी, उदास था, चिंता में पड़ा था, कोई गणित चल रहा था। सम्राट ने पूछा, आज बड़े चिंतित मालूम होते हो? मामला क्या है?
उसने कहा: नहीं हजूर, कुछ भी नहीं, कुछ नहीं सब ठीक है।

मगर आज बात में वह सुगंध न थी जो सदा होती थी। ‘सब ठीक है’--ऐसे कह रहा था जैसे सभी कहते हैं, सब ठीक है। जब पहले कहता था तो सब ठीक था ही। आज औपचारिक कह रहा था।
सम्राट ने कहा, नहीं मैं न मानूंगा। तुम उदास दिखते हो, तुम्हारी आंख में रौनक नहीं। तुम रात सोए ठीक से?
उसने कहा, अब आप पूछते हैं तो आपसे झूठ कैसे बोलूं! रात नहीं सो पाया। लेकिन सब ठीक हो जाएगा, एक दिन की बात है। आप घबड़ाएं मत।

लेकिन वह चिंता उसकी रोज बढ़ती गई। सौ पूरे हो गए, तो वह सोचने लगा कि अब सौ तो हो ही गए; अब धीरे-धीरे इकट्ठा कर लें, तो कभी दो सौ हो जाएंगे। अब एक-एक कदम उठने लगा। वह पंद्रह दिन में बिलकुल ही ढीला-ढाला हो गया, उसकी सब खुशी चली गई। सम्राट ने कहा, अब तू बता ही दे सच-सच, मामला क्या है? मेरे वजीर ने कुछ किया?

तब वह चैंका। नाई बोला, क्या मतलब? आपका वजीर...? अच्छा, तो अब मैं समझा। अचानक मेरे घर में एक थैली पड़ी मिली मुझे--निन्यानबे रुपए। बस, उसी दिन से मैं मुश्किल में पड़ गया हूं। पड़ गया मुझ पर भी  निन्यानबे का फेर|


सादर आपका

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मैं भी मैं भी मैं भी ( नंगा समाज ) डॉ लोक सेतिया

यदि पौराणिक काल में आज जैसी संस्थाएं होतीं तो ?

458.ख़्वाब मुक्तक

जन्मदिन मुबारक निदा साहब

असमंजस

घर से निकले हैं पढ़ने को....

'मी टू' की बहस के बीच 'मी टू'

नदियों और जीडी अग्रवाल जी के हत्यारे हम है ......

हद पार इश्क

अब दुर्गा माता नाराज नहीं होती...!!!

"माहिया" ( स्वीकारोक्ति )

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

गिरिधर मुरलीधर - 2200 वीं ब्लॉग-बुलेटिन

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है...  
आप जो समझ रहे हैं ऊ बात नहीं आता है... असल में बात ओही है, लेकिन कोनो बात को सीधा-सीधी कह दिये त आपको कइसे लगेगा कि ई हम कह रहे हैं. काहे कि हमरा सुरुए से ई आदत रहा है कि कान कहियो सीधा तरफ से नहीं धरते हैं. बिना घुमाकर कान धरे हमको संतोस नहीं होता है.

त हम का कह रहे थे... हाँ इयाद आया... कह रहे थे कि कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि ई अदमी का सोभाव होता है कि चकाचौंध का मोह आसानी से नहीं छोड़ पाता है. कभी कभी ई चकाचौंध बनाया हुआ भी होता है अऊर कभी-कभी सच्चो का भी होता है. अब देखिये अभी ई महीना के सुरुआत में गाँधी जी अऊर सास्त्री जी का जनमदिन बीता है. हर साल बीतता है... लेकिन गाँधी जी का चकाचौंध के आगे सास्त्री जी जइसा साधारन अदमी का जनमदिन किसको इयाद रहता है. मगर इससे सास्त्री जी का बड़प्पन तनिको कम नहीं होता है. ऊ रहीम कबि कहिये गये हैं कि गिरिधर को मुरलीधर कहने से कब ऊ बुरा मानते हैं. सास्त्री जी सुरुए से जमीन से जुड़ा अदमी थे जादा चकाचौंध से एम्बैरेस हो जाते.

ओइसहिं एगो अऊर अदमी थे. तब हम इस्कूल में पढ़ते थे. हमरे इस्कूल के सामने उनका घर था. उनके एक बार पुकारने पर देस भर से छात्र लोग कांग्रेस सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया. हमको इयाद आता है कि हम भी हाथ में काला पट्टी बाँधकर मीटिंग में जाते थे. उनके घर में बहुत गहमा गहमी रहता था. ऊ साधारन देखाई देने वाला अदमी देस को एगो नारा दिया – सम्पूर्ण क्रांति! अऊर जइसा कि अंग्रेजी का कहावत है – इसके बाद जो हुआ ऊ अपने आप में इतिहास है. पहिला बार कोनो एक अदमी के प्रयास से देस भर का पूरा कांग्रेस बिरोधी पार्टी एकजुट हो गया अऊर जो बात कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, ऊ सच होकर सामने आया. कांग्रेस सरकार का जड़ से सफाया.

ऊ साधारन अदमी का नाम था – जय प्रकास नारायन. प्यार से हमलोग जे.पी. कहते थे अऊर कोई भी सरकारी पद नहीं लेने वाला देस का मामूली नागरिक भारत रत्न जय प्रकास नारायन!

एगो दोसरा अदमी का खिस्सा भी सुनिये लीजिए. बहुत पढ़ा-लिखा परिवार से आने वाला अदमी. लम्बाई जरूरत से जादा, आवाज जरूरत से जादा सख्त, दुबला पतला एतना कि फूँक दे त, हवा में उड़ जाए. उसपर सौख ऐक्टिंग का सिनेमा में. सबलोग मजाक उड़ाकर भगा दिया. जो लोग रोल दिया ऊ लोग भी सोचा कि कोनो गलतिये किये हैं. फिर जिंदगी का इण्टर्भल के बाद भाग पलटा खाया अऊर एक के बाद एक सिनेमा हिट. देखते देखते ऊ सिनेमा-जगत का पहिला ऐंग्री यंग मैन बन गया अऊर सुपर स्टार भी. फिर ऐक्सिडेण्ट, इलेक्सन, आरोप, त्याग-पत्र, भयंकर कर्ज अऊर सब तरह का दुर्भाग्य. मगर ऊ अदमी के पिता जी कह गये थे कि बेटा मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती – अऊर मेहनत का चमत्कार कि ऊ फिर से सिखर तक पहुँच गया. जनमानस के दिल में जगह बनाया, बड़ा परदा से छोटा तक – जहाँ जहाँ उनका चरन पड़ा, बस सफलता उनके चरन में बिछता चला गया. अऊर जइसा कि अंग्रेजी का कहावत है – इसके बाद जो हुआ ऊ अपने आप में इतिहास है.

ऊ असाधारन अदमी का नाम है अमिताभ बच्चन... प्यार से हमलोग बिग बी कहते हैं अऊर सदी का महानाय्क कहलाने वाला पद्म विभूषण अमिताभ बच्चन!

दिल जीतने अऊर खासकर युवा वर्ग का दिल जीतने का करिस्मा करने वाला ई दुनो महान व्यक्ति का जनमदिन आज है. लेकिन ई अदमी चकाचौंध का मोह नहीं छोड़ पाता है. अमित जी के जनमदिन से त सबका फेसबुक, व्हाट्स ऐप्प भरा होगा, लेकिन जयप्रकास बाबू को केतना लोग इयाद करता है. मगर का फरक पड़ता है – गिरिधर को मुरलीधर कह देने से उनका महातम कम त नहींये होता है.

अब हम कभी-कभी प्रकट होते हैं आजकल. मगर साधारन बिहारी होते हुये भी (दू साल पहिले गुजरात से खदेड़े गये थे) जब आते हैं त कोनो चकाचौंध होता है ब्लॉग-बुलेटिन पर, जइसे आज ई दुनो महान हस्ती का जनमदिन के साथ हमरे ब्लॉग-बुलेटिन का ई  2200 वाँ पोस्ट है. आपलोग एंजॉय कीजिये अऊर कोनो बात का बुरा लगा होगा त नवरात्रि अऊर शरद ऋतु के त्यौहार के बीच हमरा सुभकामना पाकर हमको माफ कीजियेगा. बस जो मन में आया सो कह दिये, काहे कि खाली उन्हीं के नहीं – कभी-कभी मेरे दिल में भी ख्याल आता है!!


                                                                                         - सलिल वर्मा 

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ऐसे सुलझाएँ ‘की’ और ‘कि’ की उलझन

अंतर का दीया

गूगल महाराज की जय --

फिल्म लॉन्ड्री : #MeToo: मुंबई फिल्म उद्योग का खुला और घिनौना सच

डॉक्टर सर्वज्ञ सिंह कटियार का यूँ चले जाना

देवी -प्रर्थना - गीतिका

मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी

कौन होते हैं हम लोग ( जनहित की बात वाले ) डॉ लोक सेतिया

शक्ति जगाएं तन-मन में हम

नवरात्र के व्रत और बदलते मौसम के बीच सन्तुलन

बातें अभी अधूरी हैं

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बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल सम्राट स्व॰ जगजीत सिंह साहब की ७ वीं पुण्यतिथि

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


आज १० अक्तूबर है ... आज ग़ज़ल सम्राट स्व॰ जगजीत सिंह साहब की ७ वीं पुण्यतिथि है ... ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी किसी परिचय के मोहताज नहीं ... गुलजार साहब उनके बारे मे कुछ यूं बयां करते है ...
 
एक बौछार था वो -

एक बौछार था वो शख्स
बिना बरसे
किसी अब्र की सहमी सी नमी से
जो भिगो देता था

एक बौछार ही था वो
जो कभी धूप की अफ़शां भर के दूर तक
सुनते हुए चेहरों पे छिड़क देता था...
नीम तारीक से हॉल में आँखें चमक उठती थीं

सिर हिलाता था कभी झूम के टहनी की तरह
लगता था झोंका हवा का है
कोई छेड़ गया है..

गुनगुनाता था तो खुलते हुए बादल की तरह
मुस्कुराहट में कई तर्बों की झनकार छुपी थी

गली क़ासिम से चली एक ग़ज़ल की झनाकर था वो
एक अवाज़ की बौछार था वो 



ग़ज़ल सम्राट स्व ॰ जगजीत सिंह साहब को शत शत नमन !
 
सादर आपका 

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

डाकिया डाक लाया और लाया ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
आज के दिन यानि कि 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य जनमानस में बीच डाक विभाग के उत्पादों की जानकारी देना, उनको डाक विभाग की सेवाएँ लेने के लिए जागरूक करना तथा जनता और डाकघरों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है. इसका आयोजन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के द्वारा किया जाता है. 9 अक्टूबर 1874 को जनरल पोस्टल यूनियन के गठन के लिए बर्न स्विटजरलैंड में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किये. कालांतर में सन 1969 में जापान के टोकियो में इसी दिन को विश्व डाकघर दिवस घोषित किया गया. तबसे वैश्विक स्तर पर डाक सेवाओं के योगदान को रेखांकित करने के लिए प्रतिवर्ष विश्व डाकघर दिवस मनाया जाने लगा. 1 अप्रैल 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम बदलकर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन (Universal Postal Union सार्वभौमिक डाक संघ अथवा यूपीयू) कर दिया गया.


भारत यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य 1 जुलाई 1876 को बना. सदस्यता लेने वाला यह पहला एशियाई देश बना. भारत में एक विभाग के रूप में डाक विभाग की स्थापना 1 अक्तूबर 1854 को लार्ड डलहौजी के काल में हुई थी. वर्तमान में डाकघरों में बुनियादी डाक सेवाओं के अतिरिक्त बैंकिंग, वित्तीय व बीमा सेवाएं भी उपलब्ध हैं. इस वैश्विक दिवस के साथ-साथ भारतीय डाक विभाग 9 से 14 अक्टूबर के बीच डाक सप्ताह मनाता है. इसका उद्देश्य लोगों को डाक विभाग के योगदान से अवगत कराना है. सप्ताह के हर दिन अलग-अलग दिवस मनाये जाते हैं. 10 अक्टूबर को सेविंग बैंक दिवस, 11 अक्टूबर को मेल दिवस, 12 अक्टूबर को डाक टिकट संग्रह दिवस, 13 अक्टूबर को व्यापार दिवस तथा 14 अक्टूबर को बीमा दिवस मनाया जाता है.

आज मोबाइल, ई-मेल, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि के दौर में भले ही चिट्ठी का कोई महत्त्व नहीं रह गया हो मगर किसी समय लोगों की निगाहें और कान डाकिया की राह पर लगे रहते थे. वर्तमान में चिट्ठियों की प्रासंगिकता भले ही कम हो गई हो मगर डाक विभाग ने जिस तरह से अपनी सेवाओं, उत्पादों का दायरा विस्तृत किया है, उससे उसकी पहचान जनमानस में अभी भी स्थापित है.

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