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शनिवार, 13 अक्तूबर 2018

सुबह होती है



देश, समाज,घर,व्यवहार,रीति-रिवाज ... पर अंधेरा मंडराता है, कोई विकल्प नज़र नहीं आता, तब यह विश्वास मन को चलाता है कि सुबह किसी अंधेरे की मुट्ठी में दम नहीं तोड़ती ।

 

वाणी मेरी दोष पूर्ण है
नहीं करूँगा स्तुति तेरी
बरसों पहले पढ़ी सरिता में छपी एक कविता की ये पंक्तियाँ आज अचानक याद आई तो मन जैसे थम सा गया ...हममे से ज्यादातर लोग किसी पर ना तो हाथ उठाते हैं ना ही किसी प्रकार का शारीरिक कष्ट देते हैं | हम सब एक दूसरे को अपनी वाणी द्वारा कष्ट पहुंचाते रहते हैं | कई बार कह्ने वाला बात कह कर भूल जता है या उसके पास ये तर्क होता है कि उसने तो बस कहा ही था , कौन सी हाथापाई करी थी , जबकि सुनने वाले के मन में ये एक कभी ना भरने वाला घाव बन जाता है | ये मानसिक घाव शारीरिक घाव से भी ज्यादा कष्ट देते हैं |इसीलिए धर्म में मौन की साधना सबसे श्रेष्ठ साधना मानी जाती है |मौन रहकर वाणी का संयम रखना सीख पाते हैं | हमें अहसास होता है कि हम दिन भर बिना जरूरत कितना अनावश्यक बोलते हैं , कितना ऐसा बोल जाते हैं जो दूसरों को अरुचिकर लगता है | “मौनी अमावस्या” एक ऐसा ही पर्व है जिसमें आम लोग भी मौन रहने का अभ्यास करते हैं | परन्तु मौन साधना केवल शब्दों को रोकना नहीं है, जैसे ही हम बोलना बंद करते हैं हमारे दिमाग में विचार बोलने लगते हैं ...बहुत जोर –जोर से , ये शोर शब्दों के शोर से कहीं ज्यादा होता है , क्योंकि ये शोर ज्यादातर नकारात्मक होता है , जैसे , “ उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, उसने ये क्यों कहा, या भगवान् उसको दंड क्यों नहीं दे रहे”| ये सारे शब्द भले ही हम अपने मन के अन्दर बोल रहे हों , हमें बहुत कष्ट पहुंचा रहे होते हैं | यहाँ हम अपने ही विचार शब्दों द्वारा अपने को कष्ट पहुंचा रहे होते हैं | ये वाणी का संयम नहीं है | वाणी का संयम है कि हम शब्द द्वारा किसी को चोट ना पहुंचाए ... न दूसरों को , ना ही खुद को | इसी लिए मौन साधना कठिन है, क्योंकि ये शब्दों को ही नहीं मन को भी थामना है जिसे निरंतर अभ्यास से ही प्राप्त किया जा सकता है |

चक्की में अनाज पीसने से पेट नही निकलता था / ओखली में कूटने के काम से हाथ सुडौल रहते थे/ ढेका चलाने से पैरों के सुडौल होने का ठहरा था / चुक्का मुक्का बैठ कर खाने से कम खाने में पेट भर जाता था / आग के आस पास बनी रहे तो रोएँ खत्म हो जाते थे / सील बट्टा के अपने फायदे
इसमें थकान परेशानी उलझन का जिक्र कभी आया ही नही / इज्जतदार औरतें इंसबके साथ रात पता नही कितने दबे पाँव पति की इक्षा पूरी कर आती
इससे ज्यादा काम इनका किसी घर में नही था । दीया का बत्ती पुरती पूजा का चौका लीपती रही
इनके पास कहने को कोई दर्द था ही नही
इनको सुनने वाले लोग भी नही थे
ये ही क्या कम था बड़े घर में खाने पीने की कभी कोई तकलीफ इन्हें न हुई
ऐसे घरों के आँगन सा एक मेरे घर का भी आँगन था जहाँ हाथ के छापा वाली औरतें दिवार पर जड़ी रह गईं.............

4 टिप्पणियाँ:

yashoda Agrawal ने कहा…

शुभ प्रभात दीदी
सादर नमन
आभार
सादर

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर शनिवारीय बुलेटिन। आभार रश्मि प्रभा जी 'उलूक' के शोर को जगह देने के लिये सुन्दर सूत्रों के बीच।

anuradha chauhan ने कहा…

सुंदर बुलेटिन प्रस्तुति रश्मि प्रभा जी

Anita ने कहा…

शुभ प्रभात, देर से आने के लिए खेद है, विचारणीय सूत्रों की खबर देता सार्थक बुलेटिन आभार !

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