हम धार्मिक अदमी नहीं
हैं, लेकिन इतिहास पुरान पर बहुत बिसबास करते हैं. बिसबास का, एतना सरधा करते हैं
कि पुरान के साथ कोनो खेलवाड़ करने का हिम्मत भी नहीं होता है. एतना धरम-सास्त्र का
पढाई किये रहते त बहुत सा सवाल का जवाब माँगते. बाकी अदमिये हैं अऊर भगवान माथा
में दिमाग दिया है, त कभी-कभी कुछ-कुछ सोचने लगते हैं.
आप लोग को इयाद
होगा, जेल का काल-कोठरी में एगो माय आधा रात में एगो बच्चा को जनम देती है अऊर अपना
पापी-दुस्ट भाई से उसका जान बचाने के लिये उसको राते-रात बहुत दूर एगो अपना परिचित
के इहाँ छोड़वा देती है. ऊ औरत का नाम था देवकी अऊर जहाँ ऊ बचवा को छोड़ देती है ऊ
जसोदा. सारा जिन्नगी ऊ जसोदा के बच्चा के नाम से जाना जाता है. अऊर बचवा होता है
भगवान कृष्ण.
अइसहीं एगो माय,
एगो बच्चा को जनम देती है अऊर लोक-लाज के डर से उसको एगो छोटा सा पेटी में बंद करके
पानी में बहा देती है. करना पड़ता है, बेचारी कुमारी माय जो ठहरी अऊर कुमारी माय को
समाज कभी भी सम्मान नहीं देता था/है. ऊ बचवा बहते-बहते एगो राधा नाम के औरत को मिलता
है. बस ऊ बच्चा को पाल लेती है अऊर सारा जिन्नगी ऊ बच्चा राधा के बच्चा के रूप में
परसिद्ध होता है. जो माय बहा दी मजबूरी में, ऊ थी कुंती अऊर बचवा होता है महारथी
कर्ण.
खुद गंगा अपना आठ
नबजात बच्चा को बहा देती है. इतिहास कहाँ बदला है द्वापर से लेकर आज कलजुग में. आज
भी रोड के किनारे कचरा के डिब्बा में केतना माय अपना जिगर का टुकड़ा को कपड़ा में
लपेटकर फेंक जाती है- लोक लाज के डर से. हर सहर में अनाथालय चल रहा है, जिसमें
रहने वाला बच्चा लोग कोनो न कोनो माय का संतान होगा, लेकिन मजबूरी जब ममता से बड़ा
हो जाता है, त अइसने कूड़ादान अऊर अनाथालय ऊ बच्चा का माय-बाप बनता है.
बिज्ञान का
तरक्की एतना हुआ है कि ऊ भगवान से टक्कर लेने लगा है. लोग सरोगेट बाप-माय बनने लगे
हैं अऊर गर्व से माथा ऊंचा करके समाज में घूमने लगे हैं. हमलोग जइसा अदमी फेसबुक
पर कुछ दिन चुटकुला बनाकर, गाली बककर अपना भड़ास निकाल लेते हैं. लेकिन ऊ कहावत है
न – समरथ को नहीं दोस गुसाईं.
खैर, हम भटक गए
बुझाते हैं. त हम बात कर रहे थे कृष्ण अऊर कर्ण का. ई दुन्नो हमारे सबसे प्रिय
पौराणिक चरित्र हैं. दुन्नों अढाई अक्छर के नाम वाला महान मगर एकदम उलटा भाग्य
वाला बेक्ति. किसन महाराज में सब गुण, अऊर कर्ण बेचारा एकदम उपेक्छित. पढ़े-लिखे
होते त इसका ब्याख्या करते, काहे से कि पढ़ा लिखा लोग कर्ण को हीरो अऊर कृष्ण को
एकदम भिलेन बनाकर पेस करते रहे हैं.
ऊ सब बात अऊर
बिस्लेसन करने का सामर्थ हमरे अंदर नहीं है. हम त आज ऊ दुन्नों महापुरुषों को मन
से याद कर रहे हैं, साथ ही याद कर रहे हैं ऊ दुन्नों की माता को. हम याद करते हैं
देस के कोना-कोना में अनाथालय में पलने वाला बच्चा अऊर उसकी माता को, हम याद करते
हैं गर्भ में पैदा होने के पहले ही मार दिए जाने वाली संतान अऊर उसकी माता को, हम
याद करते हैं ऊ संतान को जिसको पैदा होते ही कूड़ा के डब्बा में फेंक दिया गया अऊर
उसकी माता को अऊर याद करते हैं उन तमाम बच्चा को, जिनको समाज में कोनो न कोनो
परिवार गोद लिया अऊर उनको जसोदा अऊर राधा जैसी माय मिली.
हर माय का
कोनो मजबूरी होता है अऊर एतना बिकराल होता
होगा कि ऊ ममता को भी लील जाता है, लेकिन साथ ही हमरा ई भी मानना है कि पूत कपूत
भले हो जाए, लेकिन माता कुमाता नहीं होती.
उन तमाम माताओं
के चरणों में सीस झुकाकर आप सब लोगों को “मातृ-दिवस” की शुभकामनाएँ!
पुनश्च: मैंने अपने विषय
में कहा है कि मैं तीन माँओं का बेटा हूँ और ऐसे में किसी एक दिन माँ को याद करके
कोई एक दिवस निर्धारित करने में विश्वास नहीं रखता. मेरे लिये तो हर दिन माँ का
दिन है. क्योंकि माता कभी कुमाता नहीं होती.
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कस्तूरी मृग है - माँ
बेसन की सोंधी रोटी... के बाद की यात्रा
अम्मा - आलोक श्रीवास्तव
अम्मा ... हैप्पी मदर्स डे .....
जानती हूँ ...मेरी माँ....अलका गुप्ता
रचना हूँ मैं तेरी माँ
माँ ... हैप्पी मदर्स डे
मेरी माँ
माँ ममता का भण्डार
माँ का वंदन..डा श्याम गुप्त ...
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