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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 14

साधना वैद जी के सधे शब्दों को वर्षों से पढ़ती आ रही हूँ  

Sudhinama

    पर, फेसबुक पर,  ... इसके अतिरिक्त शब्दों और उनकी आवाज़ के माध्यम से उनके साथ संवेदना जैसा रिश्ता है। कुछ रिश्तों को हम नाम नहीं दे सकते, देना भी नहीं चाहिए, वर्ना उसके अर्थ सम्भवतः बदल जाते हैं या कम हो जाते हैं !
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उनके शब्दों में, "मैं एक भावुक, संवेदनशील एवं न्यायप्रिय महिला हूँ और यथासंभव खुशियाँ बाँटना मुझे अच्छा लगता है !"

Sudhinama: प्रश्न और रिश्ते

 

यह प्रश्नों का संसार भी 
कितना निराला है !
विश्व के हर कोने में
कोने में बसे हर घर में
घर में रहने वाले 
हर इंसान के मन में
उमड़ते घुमड़ते रहते हैं 
ना जाने कितने प्रश्न,
बस प्रश्न ही प्रश्न !

अचरज होता है
ये छोटे-छोटे प्रश्न भी 
कितनी पाबंदी से
रिश्तों को परिभाषित कर जाते हैं
और मन के हर भाव को
कितनी दक्षता से बतला जाते हैं
कहीं रिश्तों को प्रगाढ़ बनाते हैं
तो कहीं पुर्जा-पुर्ज़ा बिखेर कर
उनकी बलि चढ़ा देते हैं !

प्रश्नों की भाषा
स्वरों के आरोह अवरोह
उछाले गए प्रश्नों की शैली और अंदाज़
वाणी की मृदुता या तीव्रता
रिश्तों के स्वास्थ्य को बनाने
या बिगाड़ने में बड़ी अहम्
भूमिका निभाते हैं !

किसने पूछा, किससे पूछा,
क्यों पूछा, कब पूछा,
किस तरह पूछा, क्या पूछा
सब कुछ बहुत मायने रखता है  
ज़रा सा भी प्रश्नों का मिजाज़ बदला
कि रिश्तों के समीकरण बदलने में
देर नहीं लगती !

छोटा सा प्रश्न कितने भावों को
सरलता से उछाल देता है
जिज्ञासा, कौतुहल, लगन, ललक,
प्यार, हितचिंता, अकुलाहट, घबराहट
चेतावनी, अनुशासन, सीख, फटकार,
व्यंग, विद्रूप, उपहास, कटाक्ष,  
चिढ़, खीझ, झुंझलाहट, आक्रोश,
संदेह, शक, शंका, अविश्वास,
धमकी, चुनौती, आघात, प्रत्याघात
सारे मनोभाव कितनी आसानी से
छोटे से प्रश्न में
समाहित हो जाते हैं और
इनसे नि:सृत होते अमृत या गरल
शहद या कड़वे आसव
कभी रिश्तों की नींव को
सींच जाते हैं तो कभी
जला जाते हैं,
कही रिश्तों के सुदृढ़ महल बना जाते हैं
तो कहीं मजबूत किले ढहा कर
खंडहर में तब्दील कर जाते हैं !

तो मान्यवर अगर जीवन में
रिश्तों की कोई अहमियत है तो
प्रश्नों के इस तिलिस्म को समझना
बहुत ज़रूरी है !
 

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 13

धीरज झा की कलम से 
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उनके शब्दों में, 
सब कुछ छोड़ आया मैं वक़्त की उन बेज़ार गलियों से गुजरते हुए...साथ कुछ लाया हूँ तो ज़ख़्म दिल के जिनमे से रिसते हुए लहू के कतरों को शब्दों में ढाल कर नए नए क़िस्सों से अपने दिल के बेजान से हिस्से को सजाने की कोशिश करता हूँ ...."


आपको क्या लगता है, अंधे कौन होते हैं ? क्या जिनकी आँखें नहीं होतीं ? नहीं आप गलत हैं या यूँ कहूँ कि मेरी सोच आपसे अलग है । मैं मानता हूँ नेत्रहीन केवल संसारिक सौंदर्य को देखने में असक्षम होता है किंतु जिस मानस के मन मस्तिष्क पर क्रोध ईर्षा अथवा घृणा काले घने मेघ के समान छाई हो वो ना ही किसी के शारीरिक सौंदर्य को देख सकता है और ना ही आंतरिक सौंदर्य को । उसके लिए सामने वाले की हर बात, हर तरीका, हर लहज़ा, हर गुण बेकार है । ऐसे इंसान के जीवन में किसी भी नेत्रहीन से अधिक अंधेर होता है ।

"निलिमा, भई कहाँ हो तुम ? मल्कि (मतलब कि) हम घर से निकले नहीं कि ये भी निकल लेती हैं शोभा के आँगन में मोहल्ले भर की बिखरी बातें बटोरने ?" दो तीन आवाज़ें लगाने के बाद भी जब निलिमा का कोई जवाब ना आया तब किशोर समझ गया कि वो शोभा के यहाँ गयी होगी ।

"हाँ तुम्हें तो सबसे बड़ी नकारा और कामचोर मैं ही दिखती हूँ । एक बंदर पाल लिया है तुमने उसके साथ मदारी बने घूमते रहते हो । तुम्हें क्या मतलब कि घर में कौन है और उसकी ज़रूरतें क्या हैं ?" एकाएक निलिमा की चाबुक जैसी आवाज़ से कुछ क्षण के लिए ऐसा लगा जैसे घर में आराम से पसरी हुई शांति चाबुक की मार से तिलमिला उठी हो ।
"मल्कि, कोई चाय पानी नहीं पूछना बनता, आते ही सीधा हमला ही बोल दोगी । भई पति हैं तुम्हारे, सरहद पर घुसपैठ कर रहे आतंकी सा व्यवहार ना किया करो सूबेदार साहिबा ।" निलिमा के पिता जी फौज में सूबेदार के पद पर कार्यरत हुआ करते थे इसीलिए किशोर कभी कभी उसे सूबेदार साहिबा कह कर बुलाता था । कई बार तो किशोर का इस तरह प्यार से बुलाने का पैंतरा काम कर जाता लेकिन दुर्भाग्य से आज कई बार वाला दिन नहीं था ।

"मुझे बहलाने की कोशिश मत करो, आज पूरे सात महीने हो गये हैं और ये अभी तक यहीं पड़ा है । नहीं मिलता इसका कोई तो थाने में छोड़ आओ, शहर में इतने अनाथ आश्रम हैं वहाँ दे आओ । अरे हमारी भी कोई गृहस्थी है, उसके बारे में तो सोचो कुछ । कब तक यूं ही लोगों के बीमे करवा कर अपने भूख लायक रोटी कमाते रहोगे । शादी को पाँच साल हो चले हैं मगर अभी तक हमारा कोई बच्चा नहीं है । कितनी बार कहा है कि डाॅक्टर मनसा के पास चलते हैं वो जानी मानी डाॅक्टर हैं, इस विषय में हमारी मदद ज़रूर करेंगी । मगर तुमको तो सारे जहान में सिर्फ इसकी फिक्र है ।" निलिमा रसोई में खड़ी बर्तन धोते हुए हमेशा की तरह अपनी सारी शिकायतें किशोर को सुना रही थी । नीलिमा की ऊंची आवाज़ और बर्तनों के शोर ने घर के महौल को सरहद पर छिड़े जंग का मैदान बना दिया था । मगर यहाँ जंग के मैदान से एक बात अलग ज़रूर थी, विरोधी सेना की तरफ से कोई जवाबी हमला नहीं हो रहा था । किशोर एकदम शांत बैठा था । उसे अब नीलिमा के बोलने से फर्क नहीं पड़ता था । नीलिमा इधर अपना दुखड़ा गा रही थी और उधर किशोर के दिमाग में बस ये चल रहा था कि वो इस मासूम को ऐसी कौन सी जगह छोड़ आए जहाँ ये चैन से रह सके ।

ये जो किशोर के बगल में गेंहूए रंग का बच्चा बैठा था यही था नीलिमा के बौखलाहट की वजह । बेचारी बौखलाए भी कैसे ना नैतिकता अपनी जगह होती है और घर परिवार की ज़िम्मेदारी अपनी जगह । जिस रात किशोर अपने साथ इस बच्चे को लगभग अधमरे हाल में घर ले कर आया था उस रात नीलिमा ने ही इसके लिए बिस्तर लगाया, गर्म दूध में हल्दी डाल कर दिया, उसके सर पर अधसूखे घाव को गर्म पानी में रूई भिगो कर साफ़ किया फिर उसे खाना भी खिलाया । दस बारह दिन तक नीलिमा ने ही उसकी सारी देखभाल की । सब अच्छा चल रहा था, नीलिमा चाहती थी कि जब तक इस बेसहारा बच्चे को संभालने के लिए कोई दूसरा हाथ ना मिल जाए तब तक वो इसकी देखभाल करे मगर अब इस मासूम की बुरी किस्मत कहें या समय का चक्र जो इसी बीच किशोर की सास का उनके यहाँ आना हुआ । जब उन्हें इस बच्चे के बारे में पता लगा तब वो उस समय चुप रहीं मगर बाद में नीलिमा से एक ही बात कही जो उसके मन में उस बच्चे के प्रति नफ़रत भरने के लिए काफ़ी थी । नीलिमा को उस बच्चे की देखभाल करता देख उन्होंने अपनी बूढ़ी मुस्कान में कुटिलता मिश्रित करते हुए कहा था "देखना कहीं ऐसा ना हो कि जिसे अपना समझ कर दूध पिला रही हो वही कल को फन फैला कर तुम्हारी कोख डस ले । एक तो इतने साल हो गये ऐसे ही तुम्हारे आँगन में किलकारियाँ नहीं गूंजी ऊपर से कहीं ऐसा ना हो कि इसके लालन पालन के चक्कर में पहुना बच्चा पैदा करने की बची खुची इच्छा भी त्याग दें । हम तो बस बेटी को खुशहाल देखना चाहते हैं बाक़ी तुम्हारा घर गृहस्थी है, तुम्हारी अपनी सोच है ।" माँ के ये शब्द नीलिमा के मन मस्तिष्क में घूमने लगे थे ।

वही दिन था जब से नीलिमा के मन में उस बच्चे के प्रति खटास पड़ने लगी । मगर इस खटास का असर ना किशोर पर था और ना ही उस नन्हें से बच्चे पर । किशोर नीलिमा के तानों और शिकायतों का आदी हो गया था तो वहीं वो बच्चा चाह कर भी ना तो नीलिमा की बातें सुन सकता था और ना ही उसके जवाब में कुछ बोल सकता था । अभी भी जब नीलिमा की कर्कश आवाज़ और उसके द्वारा पटके जारे बर्तनों का शोर पूरे महल्ले को उनके घर का हाल सुना रहा था वहीं ये बच्चा किशोर को कुछ बताने के लिए अपने नन्हें हाथों से उसकी कमीज़ पकड़ कर खीच रहा था । उसके द्वारा किशोर की कमीज़ खींचे जाने पर वो अचानक अपने ख्यालों से बाहर आगया । अब नीलिमा भी बोल कर थक चुकी थी इसीलिए उजाड़ सी शांति का माहौल बना हुआ था । किशोर ने अपनी गर्दन उस बच्चे की तरफ घुमा कर अपनी दोनों पलकें उचका कर उससे इशारे में पूछा “क्या चाहिए ?”

बच्चे ने अपनी पांचों उँगलियों को जोड़ कर मुंह के ले जाते हुए कुछ इशारा किया । किशोर समझ गया कि उसे भूख लगी है । किशोर ने उससे धीमी सी आवाज़ में कहा “मल्कि, इधर जंग छिड़ी है और तुम हो कि रोटियां सेकने की बात कर रहे हो । पिछले जन्म में कहीं नेता वेता तो नहीं थे ?” हालाँकि बच्चे ने उसका कहा सुना नहीं मगर उसकी बात से ये भांप गया कि वो थोडा इंतज़ार करने के लिए कह रहा है । बच्चे ने भी मायूस सी सूरत बना कर अपनी गर्दन हिला दी ।

“अरे मियां, तुम तो उदास होगए । जब हम हैं तो फिर उदास काहे होना प्यारे (ना किशोर को उसका नाम पता था ना वो बच्चा अपना नाम बता सकता था इसीलिए किशोर ने उसका नाम ही प्यारे रख दिया था) । वैसे एक बात है ससुर बैहरे होने का एक फायदा तो ज़रूर है कि तुम दुनिया की बेफालतू बातें सुनने से बच जाते हो । कसम से कह रहे हैं प्यारे, अगर हमको पहले पता होता ना कि हमारे संजोग में ऐसी नॉनइस्टोप बीवी है तो भगवन जी से कह कर बिना पर्दे का कान फिट करवाते । खैर तुम रुको हम खाने का जुगाड़ लगते हैं ।” इतना कह कर किशोर रसोई घर की तरफ बढ़ चला ।

“सही कह रही हो प्राणप्रिय, अब बहुत हो गया है । हम बात किए हैं एक अनाथालय में । वो लोग इसे रखने के लिए तैयार हैं । अगले ही सप्ताह उनके यहाँ से एक बच्चा गोद लिया जा रहा है । जगह खाली होते ही वो फोन करेंगे । और हम कल परसों ही वो डॉक्टर मनसा के यहाँ चलेंगे ।” किशोर ने परिस्थिति की मांग के मुताबिक़ नीलिमा को भरपूर मात्रा में मक्खन लगाने की कोशिश की ।

“हूँ । । ।” मगर अफ़सोस नीलिमा पर उसके लगाये मक्खन का कोई असर ना हुआ और आगे से बस ‘हूँ’ ही सामने उछल कर आया ।

“अच्छा, अब थोडा खाना हो तो हमें दे दो, एक दो लोगों से मिलने जाना है । इस बार उमीद है कि 5 10 बीमे करा कर ही लौटेंगे । और फिर नट्टू चाट वाले के यहाँ जैम कर पार्टी किया जाएगा । और सुनो उस प्यारे को खाना मत देना । उसे भी तो पता लगना चाहिए कि हम कितने ज़ालिम हैं, पता लगेगा तभी यहाँ से भागेगा ।” किशोर बाबू जिस तरह से नीलिमा पर मक्खन उड़ेले जा रहे थे उसे अगर मोहल्ले का कोई कुंवारा लड़का देख लेता तो आज ही बोरिया बिस्तर बांध कर हिमालय की ओर निकल जाता ।

“सुनों, तुम ना अपने ये ड्रामे बंद करो । खूब जानती हूँ तुम्हें । अपने में से उसे खिला दोगे और फिर खुद आधा पेट खा कर उठ जाओगे । और वैसे भी इतनी भी ज़ालिम नहीं हूँ कि किसी बच्चे को भूखा मार दूँ ।”

“चलो तुम्हे आखिरकार पता तो लगा कि तुम ज़ालिम हो भले ही इतनी ना सही ।” किशोर मुंह में बुदबुदाया ।

“क्या कहा तुमने ?” नीलिमा ने अपनी ऑंखें तरेरते हुए कहा ।

“मैंने क्या कहा ? मैंने तो इतना ही कहा कि तुम सच में बहुत दयालु हो ।” किशोर जान बचा कर रसोई से बाहर आगया ।

खाना खाने के कुछ देर बाद किशोर किसी काम से बाहर चला गया । प्यारे बाहर बरामदे में ही खाट पर लेटा छत पर टंगे मकड़ी के जालों और उन में उलझी सभी मकड़ियों की गिनती करने में व्यस्त था । और नीलिमा कमरे में बैठी राशन कोटे से मिले चावल में से कंकर बिनते हुए अपनी किस्मत से समस्याओं की शिकायत कर रही थी । तभी बाहर से कुछ लोगों के क़दमों की आहट नीलिमा के कानों में पड़ी । नीलिमा ने चावल वाली थाली एक तरफ राखी और दरवाज़े की तरफ बढ़ी । उसने देखा सामने दो आदमी खड़े थे ।

शाम के समय

घर में कदम रखते ही किशोर का रोम रोम खिल गया । आज कई महीनों बाद उसकी पसंदीदा सब्जी की खुश्बू बिखरी थी पूरे घर में । वो समझ गया कि आज नीलिमा बहुत खुश है लेकिन उसे ये समझ ना आया कि आखिर वो खुश क्यों है । अपनी इसी कौतुहल को मिटने के लिए वो रसोई की तरफ बढ़ा । नीलिमा ने बिना पीछे मुड़े ही कहा “आगये आप, बैठिए मैं खाना लगाती हूँ, आज आपके पसंद की सब्जी बनाई है ।” किशोर आश्चर्य के का ठिकाना नहीं था । आज इतने दिनों बाद नीलिमा को ऐसे खुश देख कर उसके मुंह से एक भी शब्द नहीं फूटा । वो चुपचाप जा कर कुर्सी पर बैठ गया । किशोर इस चमत्कार को देख कर अकेला ही बैठा मुस्कुरा रहा था ।

लेकिन एकाएक ही उसके चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गयी जब उसे प्यारे कहीं नहीं दिखा । उसे पता था कि वो इसी हद में रहता है है यहाँ से बहार कभी नहीं जाता, और किशोर बाबू की आहट पा कर तो अब तक वो उनके बगल में आकर उनसे लिपट गया होता । लेकिन आज कहाँ है वो ? अपने मन की अशांति मिटने के लिए किशोर ने नीलिमा से पूछा “प्यारे कहाँ है नीलिमा ?” तब तक नीलिमा भी खाना ले कर आगयी थी । नीलिमा के चेहरे पर हल्की मुस्कान सजी हुई थी किन्तु गौर से देखने पर ये स्पष्ट लग रहा था वो अपने किसी डर को उस मुस्कराहट में छुपा रही है ।

“आज यहीं गली में ही कटहल मिल गया तो मैंने ले लिया । कितने दिनों से कटहल नहीं बनाया था ना । आपको कितना पसंद है ये ।” नीलिमा ने बात पलटनी चाही किन्तु किशोर बात बदलने की स्थिति में बिलकुल नहीं था ।

“कटहल की छोडो ये बताओ प्यारे कहाँ है ?” नीलिमा की मुस्कान धीरे धीरे अलोप हो गयी ।

“मैं कुछ पूछ रहा हूँ नीलिमा, प्यारे कहाँ है ?” सहसा ही किशोर की आवाज़ में आक्रोश झलकने लगा जो उसके स्वभाव से एकदम विपरीत था ।

“उस अनाथ के लिए मुझसे इस तरह बात ना करो । उसका ठेका तुमने लिया होगा मैंने नहीं । वैसे भी वो जिनका था वो उसे ले गए ।” किशोर द्वारा इस तरह आक्रोशित स्वर में बात किए जाने की विपरीत प्रक्रिया हुई तथा नीलिमा भी अपने चंडिका रूप में आगयी ।

“ले गए ? कौन ले गए ? अरे उसका तो हमारे सिवा इस दुनिया में कोई है भी नहीं, फिर कौन ले गए उसे ? तुमने ऐसे कैसे किसी को भी उसे ले जाने दिया । मुझे एक बार फोन कर के पूछ तो लेती । । ।” आक्रोश की अग्नि में जल रहे किशोर के शब्द अनायास ही रुदन की वर्षा में भीग कर कांपते प्रतीत होने लगे ।

“उन्होंने कहा कि ‘ये उनकी संस्था से गायब हुआ बच्चा है । हमें इसकी जवाबदेही सरकार को देनी होती है इस कारण आप इसे बिना प्रक्रिया पूरी किए ऐसे घर पर नहीं रख सकती । हमें इसे ले जाना होगा ।‘ मैं भला उन्हें कैसे रोकती, और वैसे भी अच्छा है ही है कि जहाँ से वो आया था वहीं चला गया ।” नीलिमा ने सारी बात ऐसे कह दी जैसे उसके लिए ये सामान्य सी बात हो ।

“नीलिमा नहीं हो तुम, मेरी नीलिमा इतना भी कठोर नहीं थी कि अपने क्रोद्ध और घृणा के आगे सही गलत की पहचान करना ही भूल जाए । जिस संस्था की वो बात कर रहे थे वो संस्था नहीं बल्कि उनका धंधा है जिसमे वो प्यारे जैसे हजारों बच्चों को अपाहिज बना कर उनसे भीख मंगवाते हैं । आज से सात महीने पहले उनके अड्डे पर स्थानीय पुलिस की रेड पड़ी थी, प्यारे किसी ना किसी तरह वहां से बच निकला था । बड़े लोगों के संरक्षण का फायदा उठा कर इन्होने फिर से अपना वो धंधा शुरू कर लिया है तथा उन सभी बच्चों को दोबारा खोज कर भीख मांगने के लिए बड़े शहरों में भेज रहे हैं । आज ही दरोगा जी ने मुझे ये सब बातें बताई हैं । मैं तो ये सोच कर आया था कि हम उसे गोद ले लेते हैं । मुझे लगा था शायद प्यारे के साथ जो कुछ हुआ उसे सुन कर तुम भी उसे गोद लेने की बात पर सहमत हो जाओ । लेकिन तुमने तो....” किशोर की पलकों में अब इतना सहस नहीं बचा था कि वो उसकी आँखों में उमड़ रहे सैलाब को रोक सके ।

“हाँ दुनिया में जितने अनाथ हैं सबको गोद ले लो । अपने तो बच्चे होंगे नहीं हमारे । ना जाने किसके बच्चे होते हैं कहाँ से आये होते हैं । पता लगे हम इसे गोद लें और कल को यही हमारा गला काट कर चलता बने । इन नाली के.....” नीलिमा की मन मस्तिष्क पर घृणा की इतनी मोटी परत पड़ी हुई थी कि वो अपने शब्दों की गरिमा तक को भूल गयी । लेकिन उसके शब्द अब किशोर के लिए असहनीय थे इसी लिए उसने उसे बीच में से ही रोका,

“अब एक शब्द नहीं बोलोगी तुम, चुप एक दम चुप वर्ना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा ।” वो किशोर जो हमेशा नीलिमा की हाँ में हाँ मिलाया करता था, उसके लाख गुस्सा होने के बाद भी मुस्कुरा कर उसकी हर बात टाल देता था, उससे आज नीलिमा के ये अपशब्द सहे नहीं गए । किशोर की फटकार ने नीलिमा को को एक दम अचंभित कर दिया । उसके लिए ये अप्रत्याशित था । वो चुप चाप पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी ।

“तुमको वो नाली का कीड़ा लगता है ना ? इधर आओ तुम्हें दिखता हूँ उस नाली के कीड़े के मन में कितने विध्वंशक विचार पल रहे थे हमारे लिए ।” किशोर नीलिमा का हाथ पकड़ कर उसे प्यारे के बिछावन की ओर ले गया । किशोर ने वहीँ किल्ली पर टेंगा प्यारे का बैग उतरा जिसमे उसने कुछ किशोर की दी हुई किताबें राखी थीं । किशोर ने सारा बैग वहीँ पलट दिया और सबसे पहले उसकी ड्राइंग बुक उठाई ।

“ये देखो उस भावी हत्यारे ने कितने हथियार इकट्ठे कर रखे थे । ये उसकी ड्राइंग बुक है । देखो इसमें किस तरह से उसने आतंकी हमने के लिए नक़्शे तैयार किए थे । मेरा मुंह मत देखो ये बुक देखो ।” नीलिमा ने चुपचाप से उस ड्राइंग बुक को के पन्ने पलटना शुरू कर दिया । प्यारे ने इसमें किशोर नीलिमा और अपनी तस्वीरें बनाने की कोशिश की थी । पन्ने पलटते पलटते नीलिमा एक इसे पन्ने पर पहुंची जिसे देख कर उसकी सांसें तक रुक गयीं । वो किसी प्रतिमा के सामान अपलक उसी चित्र को देखे जा रही थी जिसे प्यारे ने बनाने की कोशिश की थी ।

उस चित्र में उसने चार लोगों को अकृत किया था । एक वो खुद था, और बाक़ी थे किशोर नीलिमा और उनका बच्चा । प्यारे ने किशोर के साथ नीलिमा को खड़ा किया था और नीलिमा की गोद में उनका बच्चा था, और बात मन किसी पत्थर मन को भी पिघला देने की क्षमता रखती थी वह ये थी कि उसने खुद को इन तीनों से दूर एक कोने में खड़ा रखा था । नीलिमा के पास अब कुछ नहीं बचा था, वो कुछ देर के लिए अपने सोचने और बोलने की शक्ति खो चुकी थी । उसके दिमाग में बस प्यारे घूम रहा था । वो आठ साल का बच्चा किस तरह से उसके मन के भाव जान गया और किस तरह से उसने चित्र बनाते हुए नीलिमा की सबसे प्रिय इच्छा को पूरा किया । वो समझता था कि नीलिमा को बच्चे की चाह है और नीलिमा उसे पसंद नहीं करती ।

“अगर मन ग्लानि से ना भरा हो तो ये भी देखो ।” किशोर ने बैग की ऊपरी ज़िप खोल कर उसमे से शंकर जी की तस्वीर निकली और नीलिमा को दिखाते हुए कहा “एक दिन मैं पूजा कर रहा था, प्यारे मुझसे इशारों में पूछने लगा कि ये क्या कर रहे हो, मैंने उसे बताया कि मैं भगवन की पूजा कर रहा हूँ । इनकी पूजा करने से जो मांगो वो मिलता है । जानती हो फिर क्या हुआ, अगले दिन पूजा घर से महादेव की छोटी तस्वीर गायब थी, मैंने देखा वो तस्वीर प्यारे के पास है और प्यारे उसे सामने रख कर ऑंखें मुंड कर हाथ जोड़े कुछ बुदबुदा रहा है । जब उसने अपने पास मुझे खड़ा देखा तो खिलखिला दिया । मैंने पूछा कि क्या मांग रहा है तो अपने नन्हें से हाथों को जोड़ कर इस तरह से दिखाया कि जैसे उसकी गोद में बच्चा हो । वो उस समय तुम्हारी खुशिया मांग रहा था नीलिमा, ये जानते हुए कि तुम उसे पसंद नहीं करती । नीलिमा बच्चों में भगवन बसते हैं, बड़े होने के साथ साथ उन्हें इंसान या शैतान उनका परिवेश बनाता है । वो तुम्हारे जैसी ही किसी ना किसी माँ का बच्चा होगा, उसने भी उसे तुम्हारी तरह ही भगवन से गुहार लगा कर माँगा होगा । बस गलती यहाँ हो गयी कि नियती ने उससे माँ की गोद छीन कर उसे सड़क पर बिठा दिया ।” नीलिमा की आँखों में शर्मिंदगी इतनी बढ़ गयी ठी कि उसके भर से अपने आप ही उसकी ऑंखें झुक गयीं ।

“मैं जा रहा हूँ पुलिस स्टेशन, और उसे खुज कर ही मानूंगा । तुम बाक़ी जो कहो वो सब मंज़ूर मगर मैं प्यारे को इस तरह से नहीं छोड़ सकता ।” इतना कह कर किशोर वहां से चला गया और उसके जाते ही मनसा कुर्सी से सरकती हुई ज़मीन पर आ बैठी और अपने मन में पद चुकी घृणा की मोटी परत को अपने पश्चाताप की आग में पिघला कर आंसुओं के रस्ते उसे बहाने लगी ।

रात के सवा ग्यारह बज चुके थे, लेकिन किशोर अब तक घर नहीं लौटा था । नीलिमा ने कितनी बार उसका नंबर मिलाया मगर बार बार फोन बंद होने की सुचना मिल रही थी । नीलिमा ने सोचा अब उसे पुलिस स्टेशन जाना चाहिए । यही सोच कर वो घर से बहार निकल कर दरवाज़े पर टला लगाने वाली थी तब तक पीछे से आवाज़ आई “क्या हुआ, घर छोड़ कर जा रही हो क्या ?” आवाज़ किशोर की थी । नीलिमा ने चौंक कर पीछे देखा । उसकी नज़रें प्यारे को खोज रही थीं लेकिन किशोर के साथ प्यारे नहीं था ।

“प्यारे कहाँ है ? क्या हुआ, वो मिला नहीं क्या ?” नीलिमा के भाव एक दम से बदल चुके थे, प्यारे के लिए अब उसके आँखों में घृणा की जगह ममता वाली फ़िक्र झलक झलक रही थी ।

“इतनी जल्दी कहाँ से मिलेगा अब तक तो शायद उसे मुंबई भेज चुके हों । सुना है वहां भीख मांगने का धंधा ज़ोरों पर है ।” किशोर ने सामान्य मुद्रा में कहा

“बकवास बंद करो किशोर । उसे खोज कर लाओ । मुझे मेरा प्यारे चाहिए । सुना तुमने किशोर मुझे मेरा प्यारे ला दो । मैं उससे माफ़ी मांगूंगी, उसे गले से लगूंगी । वो मेरा बच्चा है किशोर । मुझे माफ़ कर दो । मेरी गलती की सज़ा उसे मत भगतने दो ।” नीलिमा अपनी बात कहते कहते बच्चों की तरह फूट फूट कर रोने लगी और देखते ही देखते घुटनों पर आगई ।

घुटनों पर बैठी हुई नीलिमा ने सर नीचे किए हुए दोनों हाथ जोड़ रखे थे, किशोर खामोश खड़ा था । नीलिमा रो ही रही थी कि तभी किसी की नन्हीं बाँहों ने अचानक से उसे घेर लिया । नीलिमा ने नज़रें उठा कर देखा तो वो प्यारे ही था । नीलिमा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । किशोर ने दोनों को इस तरह से लिप्त देख कर कहा “ मैंने मना किया था कि सामने मत आना जब तक मैं न कहूँ । मगर तुमको तो हर बार हड़बड़ी रहती है । मल्कि, सब करें हम और फिर भी माँ की ममता ही तुमको लुभाएगी । कभी बाप की बापता पर भी तरस खा लिया करो प्यारे ।” हालाँकि प्यारे ने कुछ भी नहीं सुना था लेकिन नीलिमा किशोर की बातें सुन कर रोते रोते हँस पड़ी ।

आज प्यारे किशोर से हमेशा के लिए बिछड़ जाता लेकिन शायद नियती ये नहीं चाहती थी इसीलिए किशोर के शिकायत दर्ज करते ही दरोगा जी ने उसे खोज निकलने की मुहीम तेज़ कर दी । छोटे से शहर में ज़्यादा देर तक उन बदमाशों का छुपे रह पाना मुमकिन नहीं था इसीलिए वो पुलिस की पकड़ में आ गए । किशोर को देखते ही प्यारे उससे लिपट गया था । प्यारे को वापिस पा कर नीलिमा ने खुद से ये वादा किया कि प्यारे अब उसकी संतान है और वो उसकी परवरिश में कोई कमी नहीं आने देगी । इधर प्यारे की प्रार्थनाएं भी ज़ोरों पर थीं । किशोर हर तरह से खुश था उसके लिए सबसे बड़ी और ख़ुशी की बात यही थी कि प्यारे उसे वापिस मिल गया था और नीलिमा ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था ।

इस घटना के बाद नीलिमा और किशोर के बीच बढ़े प्यार और प्यारे की प्रार्थना रंग लायीं और साल भर बाद नीलिमा की गोद में एक नन्हीं परी थी, लेकिन प्यारे नीलिमा से दूर नहीं था, वो नीलिमा से लिपट कर बैठा हुआ था । समय के साथ भी प्यारे के लिए नीलिमा का प्रेम और स्नेह कम ना हुआ । 

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 12

पूजा उपाध्याय कहती हैं, .. इक जरा सी जिन्दगी और करने को इत्ता सारा कुछ. उसी इत्ता सारा कुछ से जन्मा है यह ब्लॉग 
मेरा फोटो 


मैंने अपने जीवन में बहुत कम घर बदले हैं। देवघर के अपने घर में ग्यारह साल रही। पटना के घर में छह। और बैंगलोर के इस घर में दस साल हुए हैं। मुझे घर बदलने की आदत नहीं है। मुझे घर बदलना अच्छा नहीं लगता। मैं कुछ उन लोगों में से हूँ जिन्हें कुछ चीज़ें स्थायी चाहिए होती हैं। घर उनमें से एक है। देवघर में मेरा घर हमारा अपना था। पहले एक मंज़िल का, फिर दूसरी मंज़िल बनी। मेरे लिए बचपन अपने ख़ुद के घर में बीता। वहाँ की ख़ाली ज़मीन के पेड़ों से रिश्ता बनाते हुए। नीम का पेड़, शीशम के पेड़। मालती का पौधा, कामिनी का पौधा। रजनीगंधा की क्यारियाँ। कुएँ के पास की जगह में लगा हुआ पुदीना। वहीं साल में उग आता तरबूज़।

बैंगलोर में इस घर में जब आयी तो हमारे पास दो सूटकेस थे, एक में कपड़े और एक में किताबें। ये एक नोर्मल सा २bhk अपर्टमेंट है। पिछले कुछ सालों में इसके एक कमरे को मैंने स्टडी बना दिया है। यहाँ पर एक बड़ी सी टेबल है जिसपर वो किताबें हैं जो मैं इन दिनों पढ़ रही हूँ। इसके अलावा इस टेबल पर दुनिया भर से इकट्ठा की हुयी चीज़ें हैं। शिकागो से लाया हुआ जेली फ़िश वाला गुलाबी पेपरवेट। डैलस से ख़रीदी हुयी रेतघड़ी और एक दिल के आकार का चिकना, गुलाबी पत्थर। न्यू यॉर्क से लाया हुआ स्नोग्लोब। एक दोस्त का दिया हुआ छोटा सा विंडमिल। दिल्ली से लाए दो पोस्टर जिनमें लड़कियाँ पियानो और वाइयलिन बजा रही हैं। पुदुच्चेरी से लायी नटराज की एक छोटी सी धातु की मूर्ति। एक टेबल लैम्प, दो म्यूज़िक बॉक्स। कुछ इंक की बोतलें। स्टैम्प्स। पोस्ट्कार्ड्ज़। बोस का ब्लूटूथ स्पीकर। अक्सर सफ़ेद और पीले फूल...और बहुत सा...वग़ैरह वग़ैरह।

इस टेबल के बायें ओर खिड़की है जो पूरब में खुलती है। आसपास कोई ऊँची इमारतें नहीं हैं इसलिए सुबह की धूप हमारी अपनी होती है। सूरज की दिशा के अनुसार धूप कभी टेबल तो कभी नीचे बिछे गद्दे पर गिरती रहती है। खिड़की से बाहर गली और गली के अंत में मुख्य सड़क दिखती है। बग़ल में एक मंदिर है। मंदिर से लगा हुआ कुंड। खिड़की पर मनीप्लांट है और ऊपर एक पौंडीचेरी से लायी हुयी विंडचाइम।

मैं सुबह से दोपहर तक यही रहती हूँ अधिकतर। लिखने और पढ़ने के लिए। दीवारों पर नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव के पोस्टर्ज़ हैं। एक बिल्ली का पोस्टर जो चुम्बक से लायी हूँ। एक बुलेटिन बोर्ड में दुनिया भर की चीज़ें हैं। न्यूयॉर्क का मैप। 'तीन रोज़ इश्क़' के विमोचन में पहना हुआ झुमका, जिसका दूसरा कहीं गिर गया। एक ब्रेसलेट जो ऑफ़िस से रिज़ाइन करने के बाद मेरे टीममेट्स ने मुझे दिया था, कुछ पोस्ट्कार्ड्ज़। कॉलेज की कुछ ख़ूबसूरत तस्वीरें। ज़मीन पर बिछा सिंगल गद्दा है जिसपर रंगबिरंगे कुशन हैं। एक फूलों वाली चादर है। ओढ़ने के लिए एक सफ़ेद में हल्के लाल फूलों वाली हल्की गरम चादर है। बैंगलोर में मौसम अक्सर हल्की ठंढ का होता है, तो चादर पैरों पर हमेशा ही रहती है। हारमोनियम और कमरे के  कोने में एक लम्बा सा पीली रोशनी वाला लैम्प है।

ये घर अब छोटा पड़ रहा है तो अब दूसरी जगह जाना होगा। मैं इस कमरे में दुनिया में सबसे ज़्यादा comfortable होती हूँ। ये कमरा पनाह है मेरी। मेरी अपनी जगह। मैं आज दोपहर इस कमरे में बैठी हूँ कि जिसे मैं प्यार से 'क़िस्साघर' कहती हूँ। किसी घर में दोनों समय धूप आए। साल के बारहों महीने हवा आए। बैंगलोर जैसे मेट्रो में मिलना मुश्किल है। फिर ऐसा कमरा कि धूप बायीं ओर से आए कि लिखने में आसान हो। एकदम ही मुश्किल। और फिर सब मिल भी जाएगा तो ऐसा तो नहीं होगा ना।

मुझे इस शहर में सिर्फ़ अपना ये कमरा अच्छा लगता है। जो दोस्त कहते हैं कि बैंगलोर आएँगे, उनको भी कहती हूँ। मेरे शहर में मेरी स्टडी के सिवा देखने को कुछ नहीं है। मगर वे दोस्त बैंगलोर आए नहीं कभी। अब आएँगे भी तो मेरे पढ़ने के कमरे में नहीं आएँगे। मैं आख़िरी कुछ दिन में उदास हूँ थोड़ी। सोच रही हूँ, एक अच्छा सा विडीओ बना लूँ कमसे कम। कि याद रहे।

हज़ारों ख़्वाहिशों में एक ये भी है। कभी किसी के साथ यहीं बैठ कर कुछ किताबों पर बतियाते। चाय पीते। दिखाते उसे कि ये अजायबघर बना रखा है। तुम्हें कैसा लगा।

एक दोस्त को एक बार विडीओ पर दिखा रही थी। कि देखो ये मेरी स्टडी ये खिड़की...जो भी... उसने कहा, आपका कमरा मेरे कमरे से ज़्यादा सुंदर है, तो पहली बार ध्यान गया कि इस कमरे को बनते बनते दस साल लगे हैं। कि इस कमरे ने एक उलझी हुयी लड़की को एक उलझी हुयी लेखिका बनाया है।

साल की पहली पोस्ट, इसी कमरे के नाम। और इस कमरे के नाम, बहुत सा प्यार।

और अभी यहाँ सोच रही हूँ...तुम आते तो...

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 11





अभिव्यक्ति | Abhivyakti - WordPress.com

  मंजु मिश्रा जी का ब्लॉग है, जहाँ उनकी अभिव्यक्तियाँ अपने परचम लहराती है।  



आज हमारा समाज बुरी तरह से दरिंदगी के पंजों में जकड़ा हुआ है।  छोटी छोटी बच्चियों पर, औरतों पर होने वाले रोज रोज के इन पाशविक अत्याचारों से सब आहत हैं।  सोशल मीडिया, मीडिया सब जगह उफनता गुस्सा, बात-चीत, बहस लेकिन सब बेनतीजा 
सच तो यही है कि ज्यादातर लोग इन हालात में सुधार चाहते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसको धर्म और राजनीति का रंग देने की कोशिश करते हैं और असल समस्या को कहीं पीछे धकेल देते हैं।  ऐसा वो जानबूझ कर करते हैं या अनजाने में, ये तो वो ही जानें, उनका ज़मीर जाने लेकिन उनकी इस हरकत से अपराधी अधिकतर बच कर निकल जाते हैं।  इस सन्दर्भ में उन सब से निवेदन है कि समस्या से उसके मूल रूप में ही सीधे सीधे निपटने की नीति अपनाइये, उसमे और मुद्दे जोड़ कर उसको भटकाइए मत 
सरकार और न्याय व्यस्था को अपना काम करने दीजिये लेकिन यदि आप समाज में फैली इस विकृत मानसिकता के खिलाफ सचमुच कुछ करना चाहते हैं, बलात्कारियों को सजा देना चाहते हैं तो एक तरीका यह भी हो सकता है
पीड़िता की नहीं बल्कि अपराधी की तस्वीर और परिचय सार्वजनिक कीजिये 
अपराधी का पूर्ण रूप से सामाजिक बहिष्कार कीजिये
अपराधी को बेटा, भाई, पति दोस्त या रिश्तेदार नहीं सिर्फ अपराधी समझिये। अपनी जवाबदेही नैतिकता और इंसानियत के प्रति रखिये 
घर-परिवार, मित्र, नातेदार-रिश्तेदार, दुकानदार, वकील, डॉक्टर, अर्थात सम्पूर्ण समाज, सब  मिलकर  अपराधी का बहिष्कार कीजिये 
अपने आस पास अपनी नजर के दायरे में उनको खड़ा मत होने दीजिये उनसे बात मत कीजिये, किसी प्रकार का कोई संबंध मत रखिये 
उनको किसी भी कीमत पर, किसी भी प्रकार की सेवाएं मुहैय्या मत करवाइये 
उपरोक्त किसी भी बात को करने के लिए आपको किसी सरकारी सहयोग की आवश्यकता नहीं है, बस अपनी अंतरआत्मा को जगाइए इतना ही काफी है   
सामाजिक बहिष्कार सदियों पुरानी दंड व्यस्था है और पूर्णतया मानवीय होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है, शर्त यही है कि सम्पूर्ण समाज एक साथ मिल कर एक जुट हो कर करे। 
यदि आप उपरोक्त में से कुछ भी नहीं कर सकते तो अपनी निष्क्रियता के चलते स्वयं को भी अप्रत्यक्ष रूप से अपराध में शामिल समझिये।  

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 10

पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं,  ... दिखा होगा वंदना अवस्थी का पांव भी पालने में, कि मैं विशेष हूँ।  पर इनकी शालीनता कहती है,  "कुछ खास नहीं....वक्त के साथ चलने की कोशिश कर रही हूं........."
मेरा फोटो 



सुबह का समय. मॉर्निंग वॉक से लौटते हुए, रास्ते में ही नया बना जॉगिंग पार्क मिलता है. जब लौटती हूं, तब सामूहिक हंसी सुनायी देती हैं. हा हा हा....हा हा हा....!!! पिछले दिनों इलाहाबाद गयी थी. प्रात: भ्रमण की शौकीन मैं, कम्पनी बाग़ चली गयी. सुबह पांच बजे से यहां लगभग आधा इलाहाबाद, मॉर्निंग वॉक के इरादे से चला आता है. जिससे कई दिनों से मिलना न हुआ हो, वो भी कम्पनी बाग में मिल ही जायेगा. ढाई सौ एकड़ में फ़ैले इस कम्पनी बाग में तो कई जगह लाफ़िंग एक्सरसाइज़ चल रहे थे. अधिकांश बुज़ुर्ग ही थे जो नकली हंसी के बहाने हंस रहे थे.  और मेरा मन पुराने ठहाकों की ओर दौड़ रहा था.
एक समय था, जब लोगों का मिलना-जुलना, बैठना और बैठकों में हंसी-ठट्ठा होना बहुत आम बात थी.शहर की गलियों में, गर्मियों की हर शाम, देखने लायक़ होती थी. घरों के बाहर पानी का झिड़काव और फिर चार-छह कुर्सियों का घेरा. बीच में टेबल. धीरे-धीरे पापाजी के वे मित्र आने शुरु होते जो प्राय: रोज़ ही आते थे. देश-दुनिया की बातें, समाज की बातें, और उससे भी ज़्यादा यहां-वहां की अनर्गल बातें. ज़रा-ज़रा सी बात पर ज़ोरदार ठहाका लगता. ऐसे ठहाके हर पांच मिनट पर सुनाई देते, जिनकी गूंज अगले तीन मिनट तक बनी रहती. ये विशुद्ध हास्य के ठहाके थे. इनमें किसी का मज़ाक नहीं उड़ाया जा रहा था, किसी पर तंज नहीं कसा जा रहा था, इन ठहाकों से किसी तीसरे को दुखी नहीं किया जा रहा था. जी भर के हंसते थे लोग. इतना कि हंसते-हंसते पेट दुख जाये. इतना कि हंसते-हंसते आंसू बहने लगें......!! पूरा माहौल ही जैसे मुस्कुराने लगता था. धरती से आसमान तक, केवल हंसी का साम्राज्य हो जैसे...!
ऐसा नहीं था कि हंसी केवल बड़ों तक ही सीमित थी. बच्चों के पास भी हंसी के ख़ज़ाने थे. तेनालीराम के किस्से, अकबर-बीरबल, मोटू-पतलू, लम्बू-छोटू, ढब्बू जी, और भी पता नहीं कौन-कौन से पात्र केवल बच्चों को नहीं, बड़ों को भी घेरे रहते थे अपनी हंसी के व्यूह में. ’नन्दन’ में तेनालीराम का नियमित स्तम्भ होता था. चम्पक में चीकू का तो पराग में छोटू-लम्बू का. पत्रिकाओं के सबसे पहले खोले जाने वाले स्तम्भ होते थे ये. ये वो पात्र हैं, जिनका नाम भर लेने से आज भी चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है. ये पात्र कैसा ग़ज़ब का हास्य सृजित करते थे! थोड़ा सा और बाद में बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी जैसे पात्र कॉमिक्स के ज़रिये आये. अब तक तेनाली राम और अकबर-बीरबल भी कॉमिक्स के रूप में आ चुके थे. ये नन्हे-मुन्ने पात्र भी विशुद्ध हास्य ही पेश करते. साथ ही, इसमें तमाम शिक्षाप्रद बातें भी हंसी-हंसी में ही सिखा दी जातीं. तेनालीराम और बीरबल की बुद्धि का लोहा तो उनके राजा/बादशाह भी मानते थे. कमाल की बुद्धिमत्तापूर्ण बातें होती थीं, ज़बरदस्त हास्य के साथ.
पुरानी फ़िल्में यदि आप देखें, तो पायेंगे कि हर फ़िल्म में एक क~ऒमेडियन ज़रूर होता था. बिना हास्य कलाकार के फ़िल्म अधूरी सी लगती थी. इस हास्य कलाकार का काम था, अभिनेता के साथ मिल के किसी भी घटना पर हास्य का सृजन करना. दर्शक भी जी खोल के हंसते थे इन पात्रों के अभिनय पर. महमूद, मुकरी, राजेन्द्रनाथ, टुनटुन, मनोरमा जैसे कुछ बहुत अच्छे हास्य अभिनेता हैं, जिन्हें कोई भूल नहीं सकता. फ़िल्मों में इनकी उपस्थिति का उद्देश्य भी फ़िल्म को बोझिल होने से बचाना होता था. यानी, हास्य ज़िन्दगी का अहम हिस्सा था. लेकिन धीरे-धीरे हास्य का स्थान व्यंग्य ने ले लिया. अब पड़ोसी हो, रिश्तेदार हो, अपरिचित हो, परिचित हो, अधिकारी हो, मातहत हो, सरकार हो, मंत्री हो, नेता हो, सब केवल व्यंग्य के अधिकारी और व्यंग्य के पात्र हो गये हैं. आज हंसी में भी कड़वाहट सी घुल गयी है. ठीक वैसे ही जैसे हवा में कार्बन डाइऑक्साइड...... लोग हंसते कम हैं, हंसी ज़्यादा उड़ाते हैं. अब तो मुस्कुराहट भी कई अर्थ देने लगी है. पता नहीं व्यंग्य भरी मुस्कान है, या उपहास भरी!! हंसी का गुमना, यानी हमारे सबसे महत्वपूर्ण गुण का खत्म होना. हंसी का वरदान सभी जीवों में केवल इंसानों को ही प्रकृति ने दिया है. इसे बचा के रखें. न केवल बचायें, बल्कि बढ़ायें. न केवल बढ़ायें, बल्कि बढ़ाते रहने की चिन्ता भी करें, ठीक उसी तरह जैसे हम बैंक में रखे पैसे की चिन्ता करते हैं. खूब हंसे और दूसरों को हंसायें, बस हंसी न उड़ायें किसी की भी.

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 9


मेरा फोटो मस्त,बेबाक,ख़ुद में लीन, शून्य और कोलाहल के मध्य जीवन से साक्षात्कार करता हुआ व्यक्तित्व - नित्यानंद गायेन। 
इससे अधिक मैं कहूँ भी क्या, मेरी दृष्टि से जो लगा, वह मैंने कहा। 

मेरी संवेदना

 इनका ब्लॉग है, और वर्ष की चुनिंदा रचना है 


भीतर की बेचैनी
थके हुए तन को सोने नहीं देती
कमरे में
ठंड ने कुछ इस तरह से
किया है कब्ज़ा 
जैसे कि
उसने भी बहुमत पा लिया है
कम्बल किसी कमज़ोर विपक्ष की तरह
मुझे ताक रहा है !
मैं सोना चाहता हूँ
किन्तु मेरे दिमाग में
बार -बार उभर कर आ रहा है
किसान मजदूर का चेहरा
जिसे अल-सुबह नंगे पैर खेत पर जाना है
उस आदमी का चेहरा याद आ रहा है
जिसे सुबह पानी में उतरना है
अपने परिवार के लिए
इस कंपकंपी सर्दी में खुली सड़क किनारे
घुटनों को पेट पर बाँध कर सोने वाले
लाखों लोगों की अनकही पीड़ा को
किसी ने मुझे ओढ़ने के लिए दिया है
और मैं अपने कमरे में सिगरेट जला रहा हूँ !
अपने कमरे में बैठ कर
ये सब लिख कर
खुद को कवि मान रहा हूँ शायद
पर सच यही है कि
कविता उन याद आये लोगों के पास है
जिन्हें मैं शब्दों में पिरो रहा हूँ

रविवार, 9 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 8


त्यागी उवाच

   डॉ. एस. के. त्यागी जी का ऐसा ब्लॉग है, जो आपको बांधकर रखेगा। 

मेरा फोटो  


बड़ा शोर सुनते थे की इक्कीसवीं सदी में विज्ञान ने ये तरक्की कर ली, वो तरक्की कर ली। हम नहीं मानते! हमें तो लगता है कि जिस जगह हम पचास-साठ साल पहले थे, आज  भी वहीं खड़े हैं।  नज़ला जुकाम हो तो पहले भी हकीम वैद्य जी जड़ी-बूटियों का काढ़ा पीने की सलाह दिया करते थे। आज के पढे लिखे डाक्टर भी सर्दी खांसी में गोलियां लिखने के बाद भी नमक के पानी के गरारे दिन में पाँच वक़्त करने की ताकीद करते हैं।  भला कोई इनसे पूछे, भले मानुषों! अगर गरारे ही लिखने थे तो फिर ये तीन-चार गोलियां क्यों लिख रहे हो। और अगर गोलियां इतनी ही जरूरी थीं तो फिर गरारों के बदले एक और गोली क्यों नहीं लिख देते! सालों-साल डाक्टरी में एड़ियाँ घिसने पर भी क्या आपको किसी ऐसी गोली के बारे में नहीं पढ़ाया गया जो सर्दी खांसी में पहले ही से बेहाल मरीज को गरारों की जहमत  से बचा सके! अब बदकिस्मत मरीज के पास जान बचाने की बस एक ही सूरत बचती है- यही कि कोई ऐसी जुगत भिड़ाई जाए कि किसी को कानों-कान खबर लगे बगैर गरारे गोल कर दिये जाएँ! मगर आप भूल रहे हैं कि हर घर में डाक्टर की बैठाई गई एक खुफिया एजेंट होती है जिसे शास्त्रों में बीवी कहा गया है। वह आपको अपने  नेक इरादों में सफल नहीं होने देगी। रह-रह कर आपको गरियाएगी, “सुबह- सुबह खामखां का बखेड़ा कर रहे हैं, चुपचाप गरारे कर क्यूँ नहीं लेते। आखिर आप ही के भले के लिए तो हैं।“ अब उनसे कौन उलझे कि हे भागवान! अगर गरारे ही भले के लिए हैं तो फिर पर्ची में लिखी तीन चार गोलियां काहे के लिए हैं!

आप क्या जानें गरारा क्या चीज़ है! यह सिर्फ वही बता सकता है जिसे कभी पाँच वक्ती नमाज़ की तरह गरारे करने पड़े हों। इस तुच्छ प्राणी के अनुसार गरारा एक बेहूदा किस्म की वह क्रिया है जिसमें गरारा करने वाला अर्थात गरारक, बेहद खारे पानी का एक-एक घूंट भरता है किन्तु उसे न तो गटकता है और न ही कुल्ले की तरह बाहर ही फेंकता है। तो बजाहिर यह कड़वा घूंट उसे एक अरसा गले के अंदर संभाल कर रखना होता है। न केवल संभाल कर रखना होता है बल्कि अंदर की हवा बाहर निकालते हुए गले के अंदर ही अंदर उसे गेंद की तरह टप्पे भी खिलाना होता हैं। इस सब का नतीजा यह होता है कि गरारक एक  सियार की तरह आसमान की जानिब मुंह उठा कर हुआं- हुआं, हुआं- हुआं की तर्ज़ पर गर्र-गर्र,  गर्र-गर्र की अजीब सी आवाजें निकालता हुआ दीख पड़ता है। फर्क बस इतना भर है कि सियार को यह क्रिया समूह के साथ अंधेरे में करने की सुविधा है, जब उसे दूसरा कोई जानवर नहीं देख रहा होता। जबकि गरारक को यह काम दिन दहाड़े अकेली-जान सम्पन्न करना होता है। इस कारण उसे अपने आसपास मौजूद लोगों की नजरों में सरकस जैसे करतब दिखाने वाला जोकर  समझे जाने का पूरा-पूरा खतरा रहता है।

गये महीने की ही बात है। नित्य-कर्म से फारिग हुए ही थे कि पत्नी ने गरारों का पानी सामने रख दिया। हमें वो मनहूस घड़ी याद आ गई जब हम उस गरारा डाक्टर के पास गए थे। गले के अंदर बहुत गहरे झाँकने के बाद उन्होंने अपना फैसला सुना दिया था।  “गोलियां लिख रहा हूँ पर ये उतना आराम नहीं करेंगी जितना गरारे....नमक के गुनगुने पानी से दिन में पाँच मर्तबा गरारे करो।“ “पाँच! हम सकते में आ गए। डरते झिझकते  बोले- सर,  सीनियर सिटिज़न हूँ, सेवा निवृत्त हो चुका हूँ,....पाँच बार के गरारे नहीं झेल पाऊँगा। थोड़ी रियायत कर दीजिये!” वे डपट कर बोले, “रिटायर हो गए तो  कहीं काम पर भी नहीं जाना...फिर गरारों में क्या दिक्कत है!”  “तो आप हमें इलाज़ दे रहे हैं कि काम दे रहे हैं!” इतना कह कर हम भुनभुनाते हुए क्लीनिक से बाहर आ गए।

डाक्टर लोग गरारा तो लिख देते हैं, मगर यह नहीं लिखते कितना गरम पानी गुनगुना माना जाए...या कितने लीटर पानी में कितने ग्राम नमक मिलाया जाए कि गरारे का पानी बन जाए। उल्टी दस्त के मर्ज में दवाइयों की दुकान पर बना-बनाया ओ.आर.एस.  नाम का घोल मिल जाता है। लेकिन नजला नाज़िल होने वालों के लिए तैयार किया हुआ गरारों का पानी कहीं नहीं मिलता। सो गरारक को तरह-तरह की तकलीफ़ों से दो चार होना पड़ता है। बाज दफा पानी में गर नमक कुछ ज्यादा ही डल गया तो गरारक पर जो गुजरती है उसे आसानी से बयान नहीं किया जा सकता। गरारा-रूपी हलाहल को हलक में उछालते-उछालते अक्सर वह भगवान शिव की तरह नील-कंठ हो कर रह जाता है।

दुनिया का सबसे झकमार और उबाऊ काम अगर कोई है, तो वो गरारे करना है। बच्चों को रोज भारी भरकम गृह कार्य के तले दाबने वाले जालिम मास्टरों की तरह ही डाक्टरों की  प्रजाति भी मरीजों को गरारा जैसे फिजूल के जानलेवा कामों  में भिड़ा कर मजा लेती है। लेकिन हमारी बात अलग है। हम पर जुल्म करने वालों को शायद मालूम नहीं कि वे अगर दवाई डाक्टर हैं, तो हम  पढ़ाई डाक्टर (पीएच. डी.) है। वे इलाजपति हैं, तो हम किताबपति हैं। सो  उन्हें चकमा देना हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं। जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि उनसे कहीं बड़ी मुसीबत पत्नी है, जो घर में हमारी हरकतों पर लगातार नजर रखती है। वह कब औचक रसोई से वाश बेसिन की तरफ देखने आ जाये कि हम गरारे कर भी रहे हैं या नहीं, कोई नहीं बता सकता! मगर हम भी छकाने में कुछ कम नहीं। हम मुंह से गरारों जैसी इतनी ऊंची आवाज़ निकालते हैं कि रसोई में काम कर रही पत्नी आसानी से सुन सके। साथ ही घूंट के माप के बराबर पानी की छोटी-छोटी आहुतियां लगातार वाश बेसिन को देते चलते हैं ताकि पत्नी के अचानक इधर आन पड़ने पर उसे बिलकुल शक न हो। इस तरह अपनी होशियारी के दम पर हम डाक्टर और अपनी धर्म पत्नी दोनों को सदा चकमा देने में तो कामयाब रहे किन्तु सर्दी खांसी को चकमा नहीं दे सके। सो अगली बार फिर डाक्टर के पास जाना पड़ा और फिर गरारे गले पड़ गए!!

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 7


मेरा फोटो
 सार्थकता की तलाश में बढ़ती गिरिजा कुलश्रेष्ठ  किसी मंत्र जाप की तरह निरंतर अग्रशील हैं।  मोतियों के मनके उनके उद्देश्य हैं, और शंखनाद उनकी कलम  ...  
उनके ब्लॉग हैं, 



मुझे याद नहीं कि मैं नानी के पास कब आई . मैंने सुना था कि मेरे छोटे भाई ने बहुत जल्दी आकर मुझे माँ की गोद से खोह दे दी थी . तब मेरा ठिकाना नानी की गोद ही था .
छोटी सी नदी के किनारे बसे गाँव में नानी का छोटा सा कच्चा घर था .नानी उसे लीप पोतकर चमकाए रखतीं थीं . हमारे चार पाँच खेत थे जिनमें हर मौसम की फसल होती थी . बाजरा ,गेहूँ , चना ,मूँग ,मटर, गन्ना ,मूँगफली ,..सब्जियाँ ..आसपास ही आमों के कुंज थे और नदी किनारे एक बाग जिसमें बेशुमार फूलों व फलों वाले पेड़ थे . वसन्त ऋतु यानी फरवरी-मार्च में जब कचनार की डालियाँ सफेद गुलाबी और बैंगनी रंग के फूलों से लद जातीं ,अमराइयाँ बौर से सज जातीं और शिरीष मोगरा नीबू आदि के फूलों की महक चारों ओर फैल जाती तब अपना वह गाँव किसी परीलोक सा लगता था .नानी खूब मेहनत करती थीं .उनकी एक गाय थी जिसे वे गोमती कहकर पुकारती थीं . सुबह शाम वे गोमती के लिये खेत से चारा काट लातीं . दूध दुहतीं , घर के सारे काम करतीं साथ ही मेरा भी बहुत ध्यान रखतीं थीं . तब मेरे आससपास खुशियाँ ही खुशियाँ थीं .दबाब का तो कोई काम ही नही था . माँ से दूर होने का तब मुझे कोई मलाल नही था .
 अम्मा (मैं नानी को अम्मा कहती थी ) मुझसे कभी नाराज नहीं हो सकतीं ,चाहे कुछ भी हो जाए ---मैं यही कहा करती थी . ऐसा कहना निराधार नही था . जहाँ तक मुझे याद है , पहले नाराज होना तो दूर मैंने अम्मा  की आँखों में हल्की सी रुखाई तक न देखी थी . ऐसे कितने ही मौके आए जब वे नाराज हो सकतीं थीं बल्कि उन्हें नाराज होना ही चाहिये था , पर नहीं हुई . मिसाल के तौर पर एक घटना बताना काफी होगा क्योंकि वह मेरी सचमुच एक बड़ी गलती थी और बड़ा नुक्सान भी .
हुआ यह कि एक सुबह अम्मा दही मथ रही थीं और वहीं उनके पास बैठ कर मुझे यह देखना बहुत रोचक लग रहा था कि रई (मथानी) में लिपटी रस्सी के दोनों सिरों को बारी बारी खींचते हुए अम्मा बड़े मजेदार तरीके से हिल रही हैं . रई घरर मरर की आवाज के साथ पूरे वेग से दही में घूम रही थी और तूफानी गति से घूमता हुआ दही मठा बन रहा था और मक्खन मोटे मोटे बुलबुलों और कणों के रूप में ऊपर तैरने लगा था . अम्मा दही जमाने में और दही से मक्खने निकालने में बड़ी कुशल थीं . उन्हें मालूम रहता था कि दही जमाने के लिये दूध कितना गरम होना चाहिये . फिर दही से मक्खन निकालने के लिये कब , कितना और कैसा पानी  डालना है . अगर जरा भी इधर से उधर हुआ तो मठा से मक्खन निकालने के लिये टेढ़ी खीर , लोहे के चने चबाना जैसे मुहावरे खूब काम में लाए जा सकते हैं . अम्मा के सामने ऐसी स्थिति मैंने कभी नही आते देखी . खैर....अम्मा रई चलाने में तल्लीन थी कि तभी उन्हें बाहर से बसन्ती माईं ने पुकारा . वहाँ मेरा ननिहाल होने के नाते गाँव की हर महिला मेरी मामी या मौसी थी और हर बूढ़ी अम्मा नानी होती थी .और पुरुष लोग मामा .हम लोग गाँव में बड़ों को रिश्ता लगाकर ही पुकारते हैं .चाहे कोई भी हो . बसन्ती जमादारिन को मेरी माँ बसन्ती भौजी कहती थी इसलिये मैं बसन्ती माईं . बसन्ती एक लम्बी , दुबली पतली ,बड़ी बड़ी भावभरी आँखों वाली साँवली और बहुत ही विनम्र महिला थी (है) . उनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है सो कभी अलग से ..
 हाँ तो वे जब बसन्ती माईं ने पुकारा तो अम्मा दही की नाद की रखवाली मुझे सौंपकर बाहर चली गईं . 
“आखिर दही से इतना मक्खन कैसे निकल आता है ? और रई की रस्सी खींचते हुए अम्मा कमर हिलाते हुए इस तरह हिलती क्यों हैं ? “ 
ये सवाल मेरे मन में बहुत दिनों से दही की तरह ही उमड़ घुमड़ रहे थे . उस दिन मौका पाकर मैंने अपने सवाल का उत्तर खुद ही निकालना चाहा . मैंने जल्दी से मथानी की रस्सी के दोनों छोर पकड़े , जो नानी की कोहनियों के समानान्तर थे  जबकि मेरे सिर से ऊपर थे . छोरों को पकड़ने के लिये मुझे पंजे भी उकसाने पड़े पर मैंने हिम्मत नहीं हारी और पूरी ताकत से रस्सी के दोनों छोर खींचते हुए अम्मा की तरह हिलने की कोशिश की और तभी गजब हुआ कि झटके के साथ दही की नाद लुढ़क गई . चार-पाँच लीटर दूध का अधमथा दही आँगन में हिलोरें लेने लगा . मेरी जान ही सूख गई . आज मेरी जमकर पिटाई होने से कोई रोक नही सकता . काम ही ऐसा किया था मैंने . पर ताज्जुब कि अम्मा खास नाराज नही हुई .वे  दही फैलने हुए नुक्सान पर दुखी जरूर हुई और मुझे बस हल्के से झिड़कते हुए आइन्दा ऐसा न करने की सीख दी  .
इसी तरह कई बार जाने अनजाने मैंने गबरू को खूँटे से खोल दिया था . वह शैतान उछलकर कुलाँचे भरता हुआ अपनी माँ कजरी का पूरा दूध पी गया था इस तरह नानी कई बार चाय से भी वंचित रह गईँ थीं पर मुझे सिर्फ समझाया डाँटा तो कभी नहीं . वे जब नदीं में नहाकर पूजा अर्चना करके घर चलने को कहतीं , मैं सीप शंख बटोरती रहती थी तब वे किनारे बैठकर मेरे चलने का इन्तजार करतीं बिना किसी झल्लाहट के . अम्मा की वह उदारता और ममता का सम्बल पाकर मैंने खुद को उनके प्रति किसी आशंका या भय से मुक्त कर रखा था .
वही अम्मा एक दिन मुझसे नाराज होगईं . नाराज भी ऐसी वैसी नहीं बहुत ही जबरदस्त . यहाँ तक कि वो माँ या पिताजी के पास भेजने तैयार होगईं थीं . 
वास्तव में उनके बर्ताव में कुछ रूखेपन का अनुभव तो मुझे उसी दिन से होने लगा था जिस दिन से मेरा नाम स्कूल में लिखाया गया था .
एक दिन ,जब पहली बारिश के दूसरे दिन जब खेत जुताई के लिये हल बैलों से सज गए थे और बौछारों की थपकी से धूल-मिट्टी मेरी तरह ही सुबह देर तक मीठी नीद में सोगई लग रही थी , नानी ने स्कूल लेजाकर मेरा नाम लिखा दिया . और जैसा कि मैंने बताया ,उसी दिन से नानी के बर्ताव में थोड़ी कसावट आने लगी थी . जो नानी मुझे धूप फैलने तक नही जगाती थीं वे चिड़ियों की चहचहाहट के साथ ही झिंझोड़ने लगीं—
“उठ लाली , स्कूल नही जाना क्या . उठ जा .पहली घंटी बजने ही वाली है .
स्कूल की पहली घंटी बहुत लम्बी होती थी और बेहद खौफनाक .शिकारी की बन्दूक की आवाज जैसी . जिस तरह बन्दूक की आवाज से पक्षी उड़ जाते हैं उसी तरह घंटी से मीठे मीठे सपने उड़ जाते थे जो खासतौर पर उसी समय आते थे . मैं सोचती थी कि नानी ने स्कूल का झंझट बेकार ही पाल लिया है . वे खुद बतातीं थीं कि वे कभी स्कूल नही गई पर ऐसी कौनसा काम था जो उन्हें नहीं आता . रेशम के धागे से वे कपड़े पर सुन्दर बेल-बूटे बना सकती थीं . चिन्दियों से गुड्डे-गुड़िया और मिट्टी से हाथी ,बैल ,घरोंदे और कई तरह की मूर्त्तियाँ बनाना उन्हें खूब आता था . और अलग अलग चीजों से पंखे, दरी,टोकरी रस्सी आदि तमाम चीजें भी वे घर में ही बना लेतीं थीं . उन्हें ढेरों कहावतें, मुहावरे , चौपाइयाँ और दोहे कण्ठस्थ थे. हर त्यौहार , विवाह और जन्मोत्सव के गीत आते थे . गाँवभर में उनकी जो इज्जत थी वह किसी पढ़े-लिखे की क्या होगी तो फिर पढ़ना क्यों जरूरी है , नानी क्यों मुझे व्यर्थ ही स्कूल खदेड़ने लगी हैं ?
“तू अभी नही समझेगी बेटी .”---यह कहकर वे मेरे सारे तर्कों को हवा में रुई की तरह उड़ा देतीं थीं . खैर उनके कहने से मैं स्कूल जाने भी लगी थी .लेकिन जल्दी ही मुझे समझ में आने लगा कि स्कूल के नाम से जो ऊब होती है ,उसके कुछ ठोस आधार होते हैं . हालाँकि उनका मेरी कहानी से कोई निकट सम्बन्ध नही है क्योंकि मुझे स्कूल में ऊब तो कभी नही हुई फिर उस समय कक्षा में मेरी स्थिति बंजर में उग आई फसल जैसी थी . उसकी वजह थी मेरी पक्की वर्णमाला और सौ तक की गिनती जो माँ ने रात में सोने से पहले बिस्तर पर  लेटे-लेटे ही रटवा दी थी . वास्तव में मेरी कहानी में संघर्ष तो जब तब निरीक्षण के लिये आने वाले इंस्पेक्टर महोदय से शुरु हुआ पता नहीं क्यों ,कोई बुरा अनुभव न होने के बावजूद इन महोदय के नाम से ही पेट में गुड़गुड़ होने लगती थी . वे बच्चे दूसरे थे जो भूत ,चुड़ैल या डाकू के नाम से डरते थे , मुझे आतंकित करने के लिये इंस्पेक्टर का नाम ही काफी था पर इतना भी नही कि उससे भी बड़ा स्कूल से भागने का खतरा उठाते . पर एक दिन वह करना पड़ गया .
हुआ यह कि एक दिन कुन्दन ने बताया कि आज स्कूल में चीरा (टीका) लगाने वाले आ रहे हैं . यहाँ आपका यह जानना बहुत जरूरी है कि सुई लगवाना मेरे बचपन का सबसे डरावना प्रसंग रहा है . उतना ही जितना पटाखे और बन्दूक . तो जब मैंने सुना कि टीका लगाने वाले आ रहे हैं तो मुझे मजबूरन कुन्दन और लाली की शरण लेनी पड़ी . ये दोनों बहिन भाई बड़े खुरापाती थे .पढ़ने में जितने फिसड्डी थे शरारतों में उतने ही अव्वल . किसी की जेब में मेंढ़क का बच्चा रख देना , हाथ में करेछ की फली थमा देना ( जिससे भयंकर खुजली होती है ) बालों में चिरचिटा लगा देना जैसे कामों के लिये वे खूब पिटते थे . स्कूल से भागने में तो नम्बर वन थे .नानी ने उनसे दूर रहने की मुझे सख्त हिदायत दे रखी थी पर मैं क्या करती . टीका वाले डाक्टर से बचने का उपाय उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था .  
“ऐसा करें कि घर से बस्ता लेकर चलें तो स्कूल के लिये पर स्कूल न जाकर बाग में पहुँचे ...कहो कैसी लगी मेरी बात ? “
कुन्दन की यह सलाह मुझे अच्छी लगी . क्योंकि इसमें खतरे की संभावनाएं कम थीं .  अम्मा समझेंगी कि हम स्कूल में हैं .और स्कूल में पंडित जी को इतने सारे बच्चों के बीच क्या पता चलेगा कि कौन आया और कौन गया ..
इस तरकीब से हमारी मुश्किल आसान हो गई .हमारे दिन बड़े मजे में बीतने लगे . सोचो कि कहाँ स्कूल की चहारदीवारी में भेड़-बकरियों की तरह घिरे रहना और कहाँ खुली हवा में दौड़ना , बगीचे में पेड़-पौधों व कई तरह के फूलों की रौनक के बीच खेलना ,फूल इकट्ठे करना ,कचनार के बीज , जो हमारे खेल में सिक्कों का काम चलाते थे ,चुनना , चिड़ियों की पहचान करना और पेड़ों के नाम रखना ...बाग में हमें जो आनन्द मिल रहा था हमें स्कूल से भागने और झूठ बोलने में जरा अफसोस नहीं था .
अम्मा खुश तीं कि उनकी लाड़ली खुशी खुशी रोज स्कूल जा रही है . वे काकाजी ( मेरे पिताजी )को बताना चाहती थीं कि वे अनपढ़ हैं तो क्या हुआ ,पढ़ाई की समझ है उनमें ..खुश होकर वे मुझे दूध दही के अलावा ताजा मक्खन भी देने लगीं .
काकाजी सुदूर गाँव में शिक्षक थे और मुझे अपना साथ ले जाना चाहते थे और मुझे पढ़ाने के लिये अपने साथ ले जाना चाहते थे पर अम्मा ने उन्हें पूरा भरोसा देते हुए मुझे रोक लिया .
पर जैसा कि तुलसीदास जी ने कहा है कि –उघरे अन्त न होइ निबाहू ...एक दिन हमारी चतुराई का भंडाफोड़ होना था सो होगया . हुआ यूँ कि अम्मा को कुछ जरूरी सामान लेने ‘हाट’ ( साप्ताहिक ग्रामीण बाजार )जाना था . सोचा कि मुझे भी उनके साथ जाना अच्छा लगेगा सो मुझे लेने स्कूल पहुँच गईं .
"वह तो कई दिनों से स्कूल में नहीं दिखी . पता चला कि वह लाली और कुन्दन के साथ बाग में खेलती रहती है . मैं खुद आपको बताने वाला था .--पण्डित जी बोले-- पढ़ाई में ठीक ठाक है लेकिन इसी तरह चलता रहा तो ,कुछ कहा नही जा सकता ..अम्मा जी आप उसे मास्टर साहब के पास भेज दीजिये वरना....".
इस 'वरना' शब्द ने ही जरूर अम्मा के मन में आशंकाएं पैदा करदीं होंगी . तभी तो वे तमतमाई हुई सीधी बाग में जा पहुँचीं और बिना कुछ पूछे बताए मुझे लगभग खींचती हुई घर लाईं . कस कर दो तमाचे लगाए और एक कठोर फैसला भी सुना दिया –"अब तुझे लल्लू ( दामाद के लिये स्नेह व सम्मान सूचक सम्बोधन ) के पास भेजती हूँ . वे ही पढ़ाएंगे . मेरे वश की बात नहीं ...देखो तो लड़की की बात , स्कूल जाने की बजाय बगीचे में वह भी लाली और कुन्दू के साथ ..!"
"बाप रे ..!" अम्मा के अन्दर यह गुस्सा कहाँ छुपा पड़ा था .मैं दहशत में डूब गई . जिस तरह तेज धमाके से कान सुन्न हो जाते हैं ,मेरे दिमाग की वही हालत थी . मैं विमूढ़ सी अम्मा को देखे जा रही थी जिनका सुन्दर कोमल चेहरा बहुत कठोर और कुरूप सा होगया था और लगातार बड़बड़ा रही थीं –
"हे भगवान ..बित्ते भर की लड़की मेरी आँखों में धूल झोंक रही है ...लोग क्या कहेंगे कि माँ पढ़ी-लिखी बाप मास्टर पर बेटी नानी की तरह अनपढ़ ...ना मैं नहीं रखूँगी अपने पास ..".
अम्मा की बातों से यकीन होगया कि यहाँ रहना इतने ही दिनों का है .इसके साथ ही मुझे काकाजी का पहाड़ी स्कूल याद आया जहाँ कमरे में दो दिन में ही मैंने दस बिच्छू .और काटने दौड़ती बतखें देखी थीं . वहाँ न गोमती गाय थी न हरेभरे खेत थे न ऐसी गलियाँ थीं और न नदी थी .और लाड़-प्यार तो काकाजी के बगल से भी नी गुजरा था कभी . बस गिनती रटो ,पहाड़े याद करो . अम्मा जैसा लाड़-प्यार और कहाँ ..
"अम्मा !मेरी अम्मा! अब मैं स्कूल छोड़कर कभी कहीं नही जाऊँगी . और मन लगाकर पढ़ूँगी .तुम जैसा कहोगी वैसा ही करूँगी पर मुझे यही रहना है तुम्हारे पास ." –यह कहते हुए मैं रोने लगी तो अम्मा ने मुझे छाती से चिपका लिया और खुद रोने लगी .
"मन लगाकर पढ़े तो मैं क्यों तुझे डाँटू ?और क्यों कहीं भेजूँ? ..पढ़ना लिखना बहुत जरूरी है बेटा ."
यह कहते हुए उन्होंने मेरे आँसू पौंछे . मुझे दो सन्तरे और बहुत सारा प्यार किया मेरी हथेलियाँ चूमी .
आज मैं खुद दादी नानी बन चुकी हूँ पर बचपन की यह घटना आज भी ताजी है . और यह भी कि खुद अनपढ़ होकर भी अम्मा कितनी सजग थीं मेरी पढ़ाई के लिये .

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 6


mangopeople 

अंशुमाला जी का वह ब्लॉग है, जिसे हम बेबाक सत्य यज्ञ कुंड कह सकते हैं, इसमें डाली जानेवाली हर समिधा निर्भय है और कोई भी प्रयास जब निर्भीक होता है, तो उसका प्रभाव गहरा होता है।  करने को कोई बहस कर सकता है, लेकिन कुतर्कों की आयु अल्प होती है, और सत्य अपनी जगह डटा हुआ रहता है।  खैर, मुझे भी डटा हुआ जानिये। और निश्चिन्त रहिये।  असली मोती की खोज होती रहेगी...
आज की सीप से निकला मोती अंशु जी हैं 



भाग -१
धार्मिक न होने के कारण धार्मिक किताबो को देखने का नजरिया मेरा बाकियों से अलग है मेरे लिए वो नैतिक शिक्षा देने वाले साहित्य है | किसी और के लिए जो महाभारत कृष्ण की लीला है वह मेरे लिए कृष्ण नामक लेखक द्वारा लिखी गई रचना है  | जो समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने , लोगो को सही से आचरण अर्थात धर्म अनुसार आचरण करने की प्रेरणा देने के लिए लिखा गया है | महाभारत की रचना सिर्फ धर्म और धर्म के अनुसार कर्म की महत्ता स्थापित करने के लिए की गई है | एक एक पात्र और एक एक घटना सिर्फ धर्म की समाज को महत्व बताने अर्थात धर्म की स्थापना के लिए है | यहाँ  धर्म का अर्थ हिन्दू मुस्लिम वाले से नहीं है बल्कि सही अच्छे कर्मो से है | कौरवों का १०० भाई होना , क्या संभव है ऐसा होना , नहीं , किन्तु चमत्कारिक रूप से १०० पुत्रो का जन्म होता है | संदेश साफ़ है १०० पुत्रो वाले वंश का भी नाश हो जायेगा यदि वो धर्म पर नहीं चल रहे है | पांच पुत्र ही हो लेकिन वो धर्म पर चले तो वंश का नाम रौशन करते है और १०० पुत्रो वाले अधर्मी वंश का नाश |

                                    अधर्म के साथ जो भी खड़ा होगा वो नष्ट होगा चाहे वो कितना बड़ा धर्मनिष्ठ , वचनपालन करने वाला ,  शूरवीर या अच्छा व्यक्तित्व हो | भीष्म वचन से बंधे अपने कर्तव्यों के नाम पर अधर्म के साथ खड़े हुए , द्रोणाचार्य पुत्र मोह में , कर्ण अपने लिए सम्मान पाने के लिए  , मित्रता का फर्ज और  एहसान का कर्ज चुकाने के लिए अधर्म के साथ खड़े रहे और महारथी होने के बाद सब हारे | यहाँ तक स्वयं भगवान की सेना अधर्मियों के साथ होने के कारण हार गई | कर्ण , भीष्म , द्रोणाचार्य आदि पत्रों की रचना ही इस उद्देश्य से किया गया कि संदेश दूर तक जाए और गहरा जाए | ध्यान दीजिये कि  ये पात्र और कई अन्य अच्छे पात्र जो कौरवो के साथ खड़े है वो सभी समाज के अलग अलग तबके से आये हुए , अलग अलग पदों और भिन्न परिस्थियों से आये हुए दिखाये गए है लेकिन सभी का अंत समान है , क्योंकि वो गलत के साथ खड़े हुए |  कलयुग में भी हम बैठ कर इन पत्रों के साथ सहानभूति जताते कहे कि वाह ये पात्र और  व्यक्तित्व कितना अच्छा था लेकिन ओह ! फिर भी मारे गए | ये ओह ये टिस मनुष्य को याद दिलाती रहे की अधर्मी होना और अधर्म के साथ खड़े होने से आप के सभी गुण बेकार हो जाते है वो अधर्म को जीत नहीं दिला सकते | उनका बुरा अंत हमें याद दिलाये की हमें खड़ा किसके साथ होना है | गलत के साथ खड़े होने के लिए आप कोई बहाना/ कारण नहीं दे सकते है |
                                                     इन पत्रों की रचना ही इस उद्देश्य के लिए किये गए कि मनुष्य समझे की केवल अच्छे होने और शूरवीर होने से कृति यश नहीं मिलता उसका प्रयोग हमेशा सही कार्यो में सहयोग के लिए ही होना चाहिए | मनुष्य के सौ अच्छे कर्म और बुद्धिमत्ता एक गलत काम की छूट नहीं देता है | आप को निरंतर केवल धर्म की राह चलना है चाहे परिस्थिति कुछ भी हो और समाज का व्यवहार आप के प्रति कुछ भी हो या समाज में आप का स्थान कुछ भी हो | ये मान कर चलिए महाभारत के सभी पात्र सिर्फ वही कर सकते थे जो उन्होंने किया इससे इतर वो यदि कुछ कर सकते कहानी की दिशा मोड़ने की जरा भी क्षमता उनमे होती तो वो पात्र  कृष्ण की इस रचना/लीला में कहीं नहीं होते |

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 5

सत्य,शून्य, निष्कर्ष के निकट पाया है मैंने अनीता निहलानी जी को।  बिना आमने-सामने मिले, यूँ लगता है एक गहरी पहचान है।  मोह माया के चक्रव्यूह से निकलने,निकालने का एक सशक्त मार्ग है उनके अनुभवी कलम में - स्वयं परख लीजिये 


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काश !

आज फिर मीता मुँह फुलाए बैठी थी. भाभी ने उसे स्कूल न जाने पर डाँटा था. आजकल उसे स्कूल जाने से ज्यादा सुंदर वस्त्र पहन कर शीशे में स्वयं को निहारना अच्छा लगने लगा था. उसने भाभी को भाई से कहते सुना था, मीता अब बड़ी हो रही है उसे इधर-उधर यूँही नहीं घूमना चाहिए. तब से भाभी की हर बात उसे बुरी लगने लगी थी. पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता तो वह क्या करे. माँ की आँखों की रौशनी कम होने लगी थी, उनकी एक आँख तो पहले से ही खराब थी अब दूसरी से भी कम दिखाई देता था. पिता अधिकतर समय के बाहर ही बिताते थे, वह एक छोटे से व्यापारी थे. घर की सारी जिम्मेदारी भाभी की थी. उनकी गोद में एक नन्हा सा पुत्र भी था पर वह सास-ससुर, दोनों देवरों और ननद की देखभाल भी ठीक से कर रही थी. यह उन दिनों की बात है जब भारत देश नया-नया आजाद हुआ था.

छमाही परीक्षा में जब वह पास नहीं हुई तो भाई ने उसे बुलाकर पूछा. मीता ने स्पष्ट कह दिया, अब वह आगे नहीं पढ़ेगी. चाहें तो उसका ब्याह करवा दें. अभी वह पन्द्रह वर्ष की भी नहीं हुई थी, आठवीं में ही पढ़ रही थी. भाई ने दफ्तर के एक सहकर्मी से बात की तो उसने कहा, मेरा भाई अभी-अभी नौकरी से लगा है, हम भी उसके लिए लड़की देख रहे हैं. बात पक्की हो गयी और विवाह हो गया. मीता के पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे. पर पति का काम ऐसा था जिसमें उसे टूर पर जाना पड़ता था. एक महीना साथ रहकर वह बाहर चला गया, मीता की तबियत खराब रहने लगी. पहले-पहल उसे कुछ समझ में नहीं आया पर बाद में पता चला वह गर्भवती थी. वर्ष पूरा होने से पहले ही एक कमजोर और सांवली सी बालिका को उसने जन्म दिया. वह स्वयं गोरी-चिट्टी थी, पहले तो बच्चे की उसने चाहना ही नहीं की थी, उसे तो सज-धज कर घूमना था, अब इस सांवली बच्ची को देखकर उसे लगा, शायद अस्पताल में किसी अन्य के साथ यह बदल गयी है. अपनी उपेक्षा से दुखी होकर दिन भर रोती रहने  वाली उस बच्ची की देखभाल वह ठीक से नहीं कर पाती थी. समय बीतता रहा, एक पुत्र और हुआ, फिर पांच वर्षों के बाद दूसरा पुत्र, जो बचपन से ही किसी न किसी रोग का शिकार होता रहा. इसके बाद भाभी ने ही अस्पताल ले जाकर मीता का ऑपरेशन करवा दिया. अपना बचपन छिन जाने का दुःख था या कौन सा क्रोध था, वह अपना गुस्सा बच्चों पर निकालने लगी. उन्हें रगड़-रगड़ कर नहलाती जब तक कि उनका तन लाल न हो जाता. साबुन लगाने से कहीं त्वचा का रंग बदलता है पर इन्सान के मन को कौन समझ पाया है. बच्चे पढ़ाई में भी कमजोर ही रहे, माँ यदि स्वयं पढ़ी-लिखी या समझदार न हो तो बच्चों की सहायता नहीं कर सकती. हाईस्कूल में बेटी असफल रही तो उसे घर बैठा दिया, और प्राइवेट परीक्षा देने को कहा. डिग्री तक आगे की सभी पढ़ाई उसने घर से ही की.  उसी समय से उसके लिए लड़का भी देखा जाने लगा. पुत्र भी कालेज में आ गया था तभी एक जगह बात पक्की हो गयी और बिटिया को विदा कर दिया. ससुराल में बेटी बहुत खुश थी, उसके भी तीन बच्चे हुए पर पचास की होने से पहले ही वह स्वर्ग सिधार गयी. उसे अपने पिता और भाई के देहांत का दुःख सता रहा था जो दस वर्ष का बेटा और पत्नी को छोड़कर अचानक ही स्वर्ग सिधार गया था. मीता पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, पुत्र की मौत का गम न सह पाने के कारण ही शायद पतिदेव ने भी वही राह पकड़ ली थी. अभी उसके पति की मृत्यु हुए ज्यादा समय नहीं गुजरा था, कि पहले बेटी की असाध्य बीमारी और फिर मृत्यु का समाचार उसे मिला. उसे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि इतना दुःख पाने के बाद भी वह सही-सलामत है. बड़ी बहू, पोता, छोटा पुत्र और उसका परिवार साथ में था. वे सभी उसकी देखभाल करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे. उसका मन अब संसार से ऊबने लगा था और ज्यादा समय वह सत्संग में बिताने लगी थी. सुबह हो या शाम जब भी समय मिलता वह आस-पास होने वाले किसी न किसी कथा सम्मेलन में पहुंच जाती. इसी तरह एक दिन जीवन की शाम आ गयी थी. अस्वस्थता ने उसे अस्पताल पहुंचा दिया था. सफेद दीवारों वाले सूने कमरे में अकेले बिस्तर पर लेटे हुए उसे अपना बचपन याद आ रहा था. काश ! वह पढ़ाई के महत्व को समझती होती तो उसका जीवन कुछ और ही होता. उसके बच्चे भी शायद इसी कारण उच्च अध्ययन नहीं कर पाए. परिवारजनों को याद करते हुए और उन्हें मंगल कामनाएं देते हुए उसने आखें मूँद लीं.

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