Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 13

धीरज झा की कलम से 
author-avatar


उनके शब्दों में, 
सब कुछ छोड़ आया मैं वक़्त की उन बेज़ार गलियों से गुजरते हुए...साथ कुछ लाया हूँ तो ज़ख़्म दिल के जिनमे से रिसते हुए लहू के कतरों को शब्दों में ढाल कर नए नए क़िस्सों से अपने दिल के बेजान से हिस्से को सजाने की कोशिश करता हूँ ...."


आपको क्या लगता है, अंधे कौन होते हैं ? क्या जिनकी आँखें नहीं होतीं ? नहीं आप गलत हैं या यूँ कहूँ कि मेरी सोच आपसे अलग है । मैं मानता हूँ नेत्रहीन केवल संसारिक सौंदर्य को देखने में असक्षम होता है किंतु जिस मानस के मन मस्तिष्क पर क्रोध ईर्षा अथवा घृणा काले घने मेघ के समान छाई हो वो ना ही किसी के शारीरिक सौंदर्य को देख सकता है और ना ही आंतरिक सौंदर्य को । उसके लिए सामने वाले की हर बात, हर तरीका, हर लहज़ा, हर गुण बेकार है । ऐसे इंसान के जीवन में किसी भी नेत्रहीन से अधिक अंधेर होता है ।

"निलिमा, भई कहाँ हो तुम ? मल्कि (मतलब कि) हम घर से निकले नहीं कि ये भी निकल लेती हैं शोभा के आँगन में मोहल्ले भर की बिखरी बातें बटोरने ?" दो तीन आवाज़ें लगाने के बाद भी जब निलिमा का कोई जवाब ना आया तब किशोर समझ गया कि वो शोभा के यहाँ गयी होगी ।

"हाँ तुम्हें तो सबसे बड़ी नकारा और कामचोर मैं ही दिखती हूँ । एक बंदर पाल लिया है तुमने उसके साथ मदारी बने घूमते रहते हो । तुम्हें क्या मतलब कि घर में कौन है और उसकी ज़रूरतें क्या हैं ?" एकाएक निलिमा की चाबुक जैसी आवाज़ से कुछ क्षण के लिए ऐसा लगा जैसे घर में आराम से पसरी हुई शांति चाबुक की मार से तिलमिला उठी हो ।
"मल्कि, कोई चाय पानी नहीं पूछना बनता, आते ही सीधा हमला ही बोल दोगी । भई पति हैं तुम्हारे, सरहद पर घुसपैठ कर रहे आतंकी सा व्यवहार ना किया करो सूबेदार साहिबा ।" निलिमा के पिता जी फौज में सूबेदार के पद पर कार्यरत हुआ करते थे इसीलिए किशोर कभी कभी उसे सूबेदार साहिबा कह कर बुलाता था । कई बार तो किशोर का इस तरह प्यार से बुलाने का पैंतरा काम कर जाता लेकिन दुर्भाग्य से आज कई बार वाला दिन नहीं था ।

"मुझे बहलाने की कोशिश मत करो, आज पूरे सात महीने हो गये हैं और ये अभी तक यहीं पड़ा है । नहीं मिलता इसका कोई तो थाने में छोड़ आओ, शहर में इतने अनाथ आश्रम हैं वहाँ दे आओ । अरे हमारी भी कोई गृहस्थी है, उसके बारे में तो सोचो कुछ । कब तक यूं ही लोगों के बीमे करवा कर अपने भूख लायक रोटी कमाते रहोगे । शादी को पाँच साल हो चले हैं मगर अभी तक हमारा कोई बच्चा नहीं है । कितनी बार कहा है कि डाॅक्टर मनसा के पास चलते हैं वो जानी मानी डाॅक्टर हैं, इस विषय में हमारी मदद ज़रूर करेंगी । मगर तुमको तो सारे जहान में सिर्फ इसकी फिक्र है ।" निलिमा रसोई में खड़ी बर्तन धोते हुए हमेशा की तरह अपनी सारी शिकायतें किशोर को सुना रही थी । नीलिमा की ऊंची आवाज़ और बर्तनों के शोर ने घर के महौल को सरहद पर छिड़े जंग का मैदान बना दिया था । मगर यहाँ जंग के मैदान से एक बात अलग ज़रूर थी, विरोधी सेना की तरफ से कोई जवाबी हमला नहीं हो रहा था । किशोर एकदम शांत बैठा था । उसे अब नीलिमा के बोलने से फर्क नहीं पड़ता था । नीलिमा इधर अपना दुखड़ा गा रही थी और उधर किशोर के दिमाग में बस ये चल रहा था कि वो इस मासूम को ऐसी कौन सी जगह छोड़ आए जहाँ ये चैन से रह सके ।

ये जो किशोर के बगल में गेंहूए रंग का बच्चा बैठा था यही था नीलिमा के बौखलाहट की वजह । बेचारी बौखलाए भी कैसे ना नैतिकता अपनी जगह होती है और घर परिवार की ज़िम्मेदारी अपनी जगह । जिस रात किशोर अपने साथ इस बच्चे को लगभग अधमरे हाल में घर ले कर आया था उस रात नीलिमा ने ही इसके लिए बिस्तर लगाया, गर्म दूध में हल्दी डाल कर दिया, उसके सर पर अधसूखे घाव को गर्म पानी में रूई भिगो कर साफ़ किया फिर उसे खाना भी खिलाया । दस बारह दिन तक नीलिमा ने ही उसकी सारी देखभाल की । सब अच्छा चल रहा था, नीलिमा चाहती थी कि जब तक इस बेसहारा बच्चे को संभालने के लिए कोई दूसरा हाथ ना मिल जाए तब तक वो इसकी देखभाल करे मगर अब इस मासूम की बुरी किस्मत कहें या समय का चक्र जो इसी बीच किशोर की सास का उनके यहाँ आना हुआ । जब उन्हें इस बच्चे के बारे में पता लगा तब वो उस समय चुप रहीं मगर बाद में नीलिमा से एक ही बात कही जो उसके मन में उस बच्चे के प्रति नफ़रत भरने के लिए काफ़ी थी । नीलिमा को उस बच्चे की देखभाल करता देख उन्होंने अपनी बूढ़ी मुस्कान में कुटिलता मिश्रित करते हुए कहा था "देखना कहीं ऐसा ना हो कि जिसे अपना समझ कर दूध पिला रही हो वही कल को फन फैला कर तुम्हारी कोख डस ले । एक तो इतने साल हो गये ऐसे ही तुम्हारे आँगन में किलकारियाँ नहीं गूंजी ऊपर से कहीं ऐसा ना हो कि इसके लालन पालन के चक्कर में पहुना बच्चा पैदा करने की बची खुची इच्छा भी त्याग दें । हम तो बस बेटी को खुशहाल देखना चाहते हैं बाक़ी तुम्हारा घर गृहस्थी है, तुम्हारी अपनी सोच है ।" माँ के ये शब्द नीलिमा के मन मस्तिष्क में घूमने लगे थे ।

वही दिन था जब से नीलिमा के मन में उस बच्चे के प्रति खटास पड़ने लगी । मगर इस खटास का असर ना किशोर पर था और ना ही उस नन्हें से बच्चे पर । किशोर नीलिमा के तानों और शिकायतों का आदी हो गया था तो वहीं वो बच्चा चाह कर भी ना तो नीलिमा की बातें सुन सकता था और ना ही उसके जवाब में कुछ बोल सकता था । अभी भी जब नीलिमा की कर्कश आवाज़ और उसके द्वारा पटके जारे बर्तनों का शोर पूरे महल्ले को उनके घर का हाल सुना रहा था वहीं ये बच्चा किशोर को कुछ बताने के लिए अपने नन्हें हाथों से उसकी कमीज़ पकड़ कर खीच रहा था । उसके द्वारा किशोर की कमीज़ खींचे जाने पर वो अचानक अपने ख्यालों से बाहर आगया । अब नीलिमा भी बोल कर थक चुकी थी इसीलिए उजाड़ सी शांति का माहौल बना हुआ था । किशोर ने अपनी गर्दन उस बच्चे की तरफ घुमा कर अपनी दोनों पलकें उचका कर उससे इशारे में पूछा “क्या चाहिए ?”

बच्चे ने अपनी पांचों उँगलियों को जोड़ कर मुंह के ले जाते हुए कुछ इशारा किया । किशोर समझ गया कि उसे भूख लगी है । किशोर ने उससे धीमी सी आवाज़ में कहा “मल्कि, इधर जंग छिड़ी है और तुम हो कि रोटियां सेकने की बात कर रहे हो । पिछले जन्म में कहीं नेता वेता तो नहीं थे ?” हालाँकि बच्चे ने उसका कहा सुना नहीं मगर उसकी बात से ये भांप गया कि वो थोडा इंतज़ार करने के लिए कह रहा है । बच्चे ने भी मायूस सी सूरत बना कर अपनी गर्दन हिला दी ।

“अरे मियां, तुम तो उदास होगए । जब हम हैं तो फिर उदास काहे होना प्यारे (ना किशोर को उसका नाम पता था ना वो बच्चा अपना नाम बता सकता था इसीलिए किशोर ने उसका नाम ही प्यारे रख दिया था) । वैसे एक बात है ससुर बैहरे होने का एक फायदा तो ज़रूर है कि तुम दुनिया की बेफालतू बातें सुनने से बच जाते हो । कसम से कह रहे हैं प्यारे, अगर हमको पहले पता होता ना कि हमारे संजोग में ऐसी नॉनइस्टोप बीवी है तो भगवन जी से कह कर बिना पर्दे का कान फिट करवाते । खैर तुम रुको हम खाने का जुगाड़ लगते हैं ।” इतना कह कर किशोर रसोई घर की तरफ बढ़ चला ।

“सही कह रही हो प्राणप्रिय, अब बहुत हो गया है । हम बात किए हैं एक अनाथालय में । वो लोग इसे रखने के लिए तैयार हैं । अगले ही सप्ताह उनके यहाँ से एक बच्चा गोद लिया जा रहा है । जगह खाली होते ही वो फोन करेंगे । और हम कल परसों ही वो डॉक्टर मनसा के यहाँ चलेंगे ।” किशोर ने परिस्थिति की मांग के मुताबिक़ नीलिमा को भरपूर मात्रा में मक्खन लगाने की कोशिश की ।

“हूँ । । ।” मगर अफ़सोस नीलिमा पर उसके लगाये मक्खन का कोई असर ना हुआ और आगे से बस ‘हूँ’ ही सामने उछल कर आया ।

“अच्छा, अब थोडा खाना हो तो हमें दे दो, एक दो लोगों से मिलने जाना है । इस बार उमीद है कि 5 10 बीमे करा कर ही लौटेंगे । और फिर नट्टू चाट वाले के यहाँ जैम कर पार्टी किया जाएगा । और सुनो उस प्यारे को खाना मत देना । उसे भी तो पता लगना चाहिए कि हम कितने ज़ालिम हैं, पता लगेगा तभी यहाँ से भागेगा ।” किशोर बाबू जिस तरह से नीलिमा पर मक्खन उड़ेले जा रहे थे उसे अगर मोहल्ले का कोई कुंवारा लड़का देख लेता तो आज ही बोरिया बिस्तर बांध कर हिमालय की ओर निकल जाता ।

“सुनों, तुम ना अपने ये ड्रामे बंद करो । खूब जानती हूँ तुम्हें । अपने में से उसे खिला दोगे और फिर खुद आधा पेट खा कर उठ जाओगे । और वैसे भी इतनी भी ज़ालिम नहीं हूँ कि किसी बच्चे को भूखा मार दूँ ।”

“चलो तुम्हे आखिरकार पता तो लगा कि तुम ज़ालिम हो भले ही इतनी ना सही ।” किशोर मुंह में बुदबुदाया ।

“क्या कहा तुमने ?” नीलिमा ने अपनी ऑंखें तरेरते हुए कहा ।

“मैंने क्या कहा ? मैंने तो इतना ही कहा कि तुम सच में बहुत दयालु हो ।” किशोर जान बचा कर रसोई से बाहर आगया ।

खाना खाने के कुछ देर बाद किशोर किसी काम से बाहर चला गया । प्यारे बाहर बरामदे में ही खाट पर लेटा छत पर टंगे मकड़ी के जालों और उन में उलझी सभी मकड़ियों की गिनती करने में व्यस्त था । और नीलिमा कमरे में बैठी राशन कोटे से मिले चावल में से कंकर बिनते हुए अपनी किस्मत से समस्याओं की शिकायत कर रही थी । तभी बाहर से कुछ लोगों के क़दमों की आहट नीलिमा के कानों में पड़ी । नीलिमा ने चावल वाली थाली एक तरफ राखी और दरवाज़े की तरफ बढ़ी । उसने देखा सामने दो आदमी खड़े थे ।

शाम के समय

घर में कदम रखते ही किशोर का रोम रोम खिल गया । आज कई महीनों बाद उसकी पसंदीदा सब्जी की खुश्बू बिखरी थी पूरे घर में । वो समझ गया कि आज नीलिमा बहुत खुश है लेकिन उसे ये समझ ना आया कि आखिर वो खुश क्यों है । अपनी इसी कौतुहल को मिटने के लिए वो रसोई की तरफ बढ़ा । नीलिमा ने बिना पीछे मुड़े ही कहा “आगये आप, बैठिए मैं खाना लगाती हूँ, आज आपके पसंद की सब्जी बनाई है ।” किशोर आश्चर्य के का ठिकाना नहीं था । आज इतने दिनों बाद नीलिमा को ऐसे खुश देख कर उसके मुंह से एक भी शब्द नहीं फूटा । वो चुपचाप जा कर कुर्सी पर बैठ गया । किशोर इस चमत्कार को देख कर अकेला ही बैठा मुस्कुरा रहा था ।

लेकिन एकाएक ही उसके चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गयी जब उसे प्यारे कहीं नहीं दिखा । उसे पता था कि वो इसी हद में रहता है है यहाँ से बहार कभी नहीं जाता, और किशोर बाबू की आहट पा कर तो अब तक वो उनके बगल में आकर उनसे लिपट गया होता । लेकिन आज कहाँ है वो ? अपने मन की अशांति मिटने के लिए किशोर ने नीलिमा से पूछा “प्यारे कहाँ है नीलिमा ?” तब तक नीलिमा भी खाना ले कर आगयी थी । नीलिमा के चेहरे पर हल्की मुस्कान सजी हुई थी किन्तु गौर से देखने पर ये स्पष्ट लग रहा था वो अपने किसी डर को उस मुस्कराहट में छुपा रही है ।

“आज यहीं गली में ही कटहल मिल गया तो मैंने ले लिया । कितने दिनों से कटहल नहीं बनाया था ना । आपको कितना पसंद है ये ।” नीलिमा ने बात पलटनी चाही किन्तु किशोर बात बदलने की स्थिति में बिलकुल नहीं था ।

“कटहल की छोडो ये बताओ प्यारे कहाँ है ?” नीलिमा की मुस्कान धीरे धीरे अलोप हो गयी ।

“मैं कुछ पूछ रहा हूँ नीलिमा, प्यारे कहाँ है ?” सहसा ही किशोर की आवाज़ में आक्रोश झलकने लगा जो उसके स्वभाव से एकदम विपरीत था ।

“उस अनाथ के लिए मुझसे इस तरह बात ना करो । उसका ठेका तुमने लिया होगा मैंने नहीं । वैसे भी वो जिनका था वो उसे ले गए ।” किशोर द्वारा इस तरह आक्रोशित स्वर में बात किए जाने की विपरीत प्रक्रिया हुई तथा नीलिमा भी अपने चंडिका रूप में आगयी ।

“ले गए ? कौन ले गए ? अरे उसका तो हमारे सिवा इस दुनिया में कोई है भी नहीं, फिर कौन ले गए उसे ? तुमने ऐसे कैसे किसी को भी उसे ले जाने दिया । मुझे एक बार फोन कर के पूछ तो लेती । । ।” आक्रोश की अग्नि में जल रहे किशोर के शब्द अनायास ही रुदन की वर्षा में भीग कर कांपते प्रतीत होने लगे ।

“उन्होंने कहा कि ‘ये उनकी संस्था से गायब हुआ बच्चा है । हमें इसकी जवाबदेही सरकार को देनी होती है इस कारण आप इसे बिना प्रक्रिया पूरी किए ऐसे घर पर नहीं रख सकती । हमें इसे ले जाना होगा ।‘ मैं भला उन्हें कैसे रोकती, और वैसे भी अच्छा है ही है कि जहाँ से वो आया था वहीं चला गया ।” नीलिमा ने सारी बात ऐसे कह दी जैसे उसके लिए ये सामान्य सी बात हो ।

“नीलिमा नहीं हो तुम, मेरी नीलिमा इतना भी कठोर नहीं थी कि अपने क्रोद्ध और घृणा के आगे सही गलत की पहचान करना ही भूल जाए । जिस संस्था की वो बात कर रहे थे वो संस्था नहीं बल्कि उनका धंधा है जिसमे वो प्यारे जैसे हजारों बच्चों को अपाहिज बना कर उनसे भीख मंगवाते हैं । आज से सात महीने पहले उनके अड्डे पर स्थानीय पुलिस की रेड पड़ी थी, प्यारे किसी ना किसी तरह वहां से बच निकला था । बड़े लोगों के संरक्षण का फायदा उठा कर इन्होने फिर से अपना वो धंधा शुरू कर लिया है तथा उन सभी बच्चों को दोबारा खोज कर भीख मांगने के लिए बड़े शहरों में भेज रहे हैं । आज ही दरोगा जी ने मुझे ये सब बातें बताई हैं । मैं तो ये सोच कर आया था कि हम उसे गोद ले लेते हैं । मुझे लगा था शायद प्यारे के साथ जो कुछ हुआ उसे सुन कर तुम भी उसे गोद लेने की बात पर सहमत हो जाओ । लेकिन तुमने तो....” किशोर की पलकों में अब इतना सहस नहीं बचा था कि वो उसकी आँखों में उमड़ रहे सैलाब को रोक सके ।

“हाँ दुनिया में जितने अनाथ हैं सबको गोद ले लो । अपने तो बच्चे होंगे नहीं हमारे । ना जाने किसके बच्चे होते हैं कहाँ से आये होते हैं । पता लगे हम इसे गोद लें और कल को यही हमारा गला काट कर चलता बने । इन नाली के.....” नीलिमा की मन मस्तिष्क पर घृणा की इतनी मोटी परत पड़ी हुई थी कि वो अपने शब्दों की गरिमा तक को भूल गयी । लेकिन उसके शब्द अब किशोर के लिए असहनीय थे इसी लिए उसने उसे बीच में से ही रोका,

“अब एक शब्द नहीं बोलोगी तुम, चुप एक दम चुप वर्ना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा ।” वो किशोर जो हमेशा नीलिमा की हाँ में हाँ मिलाया करता था, उसके लाख गुस्सा होने के बाद भी मुस्कुरा कर उसकी हर बात टाल देता था, उससे आज नीलिमा के ये अपशब्द सहे नहीं गए । किशोर की फटकार ने नीलिमा को को एक दम अचंभित कर दिया । उसके लिए ये अप्रत्याशित था । वो चुप चाप पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी ।

“तुमको वो नाली का कीड़ा लगता है ना ? इधर आओ तुम्हें दिखता हूँ उस नाली के कीड़े के मन में कितने विध्वंशक विचार पल रहे थे हमारे लिए ।” किशोर नीलिमा का हाथ पकड़ कर उसे प्यारे के बिछावन की ओर ले गया । किशोर ने वहीँ किल्ली पर टेंगा प्यारे का बैग उतरा जिसमे उसने कुछ किशोर की दी हुई किताबें राखी थीं । किशोर ने सारा बैग वहीँ पलट दिया और सबसे पहले उसकी ड्राइंग बुक उठाई ।

“ये देखो उस भावी हत्यारे ने कितने हथियार इकट्ठे कर रखे थे । ये उसकी ड्राइंग बुक है । देखो इसमें किस तरह से उसने आतंकी हमने के लिए नक़्शे तैयार किए थे । मेरा मुंह मत देखो ये बुक देखो ।” नीलिमा ने चुपचाप से उस ड्राइंग बुक को के पन्ने पलटना शुरू कर दिया । प्यारे ने इसमें किशोर नीलिमा और अपनी तस्वीरें बनाने की कोशिश की थी । पन्ने पलटते पलटते नीलिमा एक इसे पन्ने पर पहुंची जिसे देख कर उसकी सांसें तक रुक गयीं । वो किसी प्रतिमा के सामान अपलक उसी चित्र को देखे जा रही थी जिसे प्यारे ने बनाने की कोशिश की थी ।

उस चित्र में उसने चार लोगों को अकृत किया था । एक वो खुद था, और बाक़ी थे किशोर नीलिमा और उनका बच्चा । प्यारे ने किशोर के साथ नीलिमा को खड़ा किया था और नीलिमा की गोद में उनका बच्चा था, और बात मन किसी पत्थर मन को भी पिघला देने की क्षमता रखती थी वह ये थी कि उसने खुद को इन तीनों से दूर एक कोने में खड़ा रखा था । नीलिमा के पास अब कुछ नहीं बचा था, वो कुछ देर के लिए अपने सोचने और बोलने की शक्ति खो चुकी थी । उसके दिमाग में बस प्यारे घूम रहा था । वो आठ साल का बच्चा किस तरह से उसके मन के भाव जान गया और किस तरह से उसने चित्र बनाते हुए नीलिमा की सबसे प्रिय इच्छा को पूरा किया । वो समझता था कि नीलिमा को बच्चे की चाह है और नीलिमा उसे पसंद नहीं करती ।

“अगर मन ग्लानि से ना भरा हो तो ये भी देखो ।” किशोर ने बैग की ऊपरी ज़िप खोल कर उसमे से शंकर जी की तस्वीर निकली और नीलिमा को दिखाते हुए कहा “एक दिन मैं पूजा कर रहा था, प्यारे मुझसे इशारों में पूछने लगा कि ये क्या कर रहे हो, मैंने उसे बताया कि मैं भगवन की पूजा कर रहा हूँ । इनकी पूजा करने से जो मांगो वो मिलता है । जानती हो फिर क्या हुआ, अगले दिन पूजा घर से महादेव की छोटी तस्वीर गायब थी, मैंने देखा वो तस्वीर प्यारे के पास है और प्यारे उसे सामने रख कर ऑंखें मुंड कर हाथ जोड़े कुछ बुदबुदा रहा है । जब उसने अपने पास मुझे खड़ा देखा तो खिलखिला दिया । मैंने पूछा कि क्या मांग रहा है तो अपने नन्हें से हाथों को जोड़ कर इस तरह से दिखाया कि जैसे उसकी गोद में बच्चा हो । वो उस समय तुम्हारी खुशिया मांग रहा था नीलिमा, ये जानते हुए कि तुम उसे पसंद नहीं करती । नीलिमा बच्चों में भगवन बसते हैं, बड़े होने के साथ साथ उन्हें इंसान या शैतान उनका परिवेश बनाता है । वो तुम्हारे जैसी ही किसी ना किसी माँ का बच्चा होगा, उसने भी उसे तुम्हारी तरह ही भगवन से गुहार लगा कर माँगा होगा । बस गलती यहाँ हो गयी कि नियती ने उससे माँ की गोद छीन कर उसे सड़क पर बिठा दिया ।” नीलिमा की आँखों में शर्मिंदगी इतनी बढ़ गयी ठी कि उसके भर से अपने आप ही उसकी ऑंखें झुक गयीं ।

“मैं जा रहा हूँ पुलिस स्टेशन, और उसे खुज कर ही मानूंगा । तुम बाक़ी जो कहो वो सब मंज़ूर मगर मैं प्यारे को इस तरह से नहीं छोड़ सकता ।” इतना कह कर किशोर वहां से चला गया और उसके जाते ही मनसा कुर्सी से सरकती हुई ज़मीन पर आ बैठी और अपने मन में पद चुकी घृणा की मोटी परत को अपने पश्चाताप की आग में पिघला कर आंसुओं के रस्ते उसे बहाने लगी ।

रात के सवा ग्यारह बज चुके थे, लेकिन किशोर अब तक घर नहीं लौटा था । नीलिमा ने कितनी बार उसका नंबर मिलाया मगर बार बार फोन बंद होने की सुचना मिल रही थी । नीलिमा ने सोचा अब उसे पुलिस स्टेशन जाना चाहिए । यही सोच कर वो घर से बहार निकल कर दरवाज़े पर टला लगाने वाली थी तब तक पीछे से आवाज़ आई “क्या हुआ, घर छोड़ कर जा रही हो क्या ?” आवाज़ किशोर की थी । नीलिमा ने चौंक कर पीछे देखा । उसकी नज़रें प्यारे को खोज रही थीं लेकिन किशोर के साथ प्यारे नहीं था ।

“प्यारे कहाँ है ? क्या हुआ, वो मिला नहीं क्या ?” नीलिमा के भाव एक दम से बदल चुके थे, प्यारे के लिए अब उसके आँखों में घृणा की जगह ममता वाली फ़िक्र झलक झलक रही थी ।

“इतनी जल्दी कहाँ से मिलेगा अब तक तो शायद उसे मुंबई भेज चुके हों । सुना है वहां भीख मांगने का धंधा ज़ोरों पर है ।” किशोर ने सामान्य मुद्रा में कहा

“बकवास बंद करो किशोर । उसे खोज कर लाओ । मुझे मेरा प्यारे चाहिए । सुना तुमने किशोर मुझे मेरा प्यारे ला दो । मैं उससे माफ़ी मांगूंगी, उसे गले से लगूंगी । वो मेरा बच्चा है किशोर । मुझे माफ़ कर दो । मेरी गलती की सज़ा उसे मत भगतने दो ।” नीलिमा अपनी बात कहते कहते बच्चों की तरह फूट फूट कर रोने लगी और देखते ही देखते घुटनों पर आगई ।

घुटनों पर बैठी हुई नीलिमा ने सर नीचे किए हुए दोनों हाथ जोड़ रखे थे, किशोर खामोश खड़ा था । नीलिमा रो ही रही थी कि तभी किसी की नन्हीं बाँहों ने अचानक से उसे घेर लिया । नीलिमा ने नज़रें उठा कर देखा तो वो प्यारे ही था । नीलिमा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । किशोर ने दोनों को इस तरह से लिप्त देख कर कहा “ मैंने मना किया था कि सामने मत आना जब तक मैं न कहूँ । मगर तुमको तो हर बार हड़बड़ी रहती है । मल्कि, सब करें हम और फिर भी माँ की ममता ही तुमको लुभाएगी । कभी बाप की बापता पर भी तरस खा लिया करो प्यारे ।” हालाँकि प्यारे ने कुछ भी नहीं सुना था लेकिन नीलिमा किशोर की बातें सुन कर रोते रोते हँस पड़ी ।

आज प्यारे किशोर से हमेशा के लिए बिछड़ जाता लेकिन शायद नियती ये नहीं चाहती थी इसीलिए किशोर के शिकायत दर्ज करते ही दरोगा जी ने उसे खोज निकलने की मुहीम तेज़ कर दी । छोटे से शहर में ज़्यादा देर तक उन बदमाशों का छुपे रह पाना मुमकिन नहीं था इसीलिए वो पुलिस की पकड़ में आ गए । किशोर को देखते ही प्यारे उससे लिपट गया था । प्यारे को वापिस पा कर नीलिमा ने खुद से ये वादा किया कि प्यारे अब उसकी संतान है और वो उसकी परवरिश में कोई कमी नहीं आने देगी । इधर प्यारे की प्रार्थनाएं भी ज़ोरों पर थीं । किशोर हर तरह से खुश था उसके लिए सबसे बड़ी और ख़ुशी की बात यही थी कि प्यारे उसे वापिस मिल गया था और नीलिमा ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था ।

इस घटना के बाद नीलिमा और किशोर के बीच बढ़े प्यार और प्यारे की प्रार्थना रंग लायीं और साल भर बाद नीलिमा की गोद में एक नन्हीं परी थी, लेकिन प्यारे नीलिमा से दूर नहीं था, वो नीलिमा से लिपट कर बैठा हुआ था । समय के साथ भी प्यारे के लिए नीलिमा का प्रेम और स्नेह कम ना हुआ । 

2 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह क्या नहीँ है चिट्ठों की दुनियाँ में ? बहुत सुन्दर |

Meena Sharma ने कहा…

धीरज जी का ब्लॉग पहली बार पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। पूरा पढ़ लेना है।

एक टिप्पणी भेजें

बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

लेखागार