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ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 27

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गगन शर्मा 


कुछ अलग सा

  कहें या कुछ ख़ास सा।  जीवन के असली घुमावदार रास्ते में कई चिंतन पड़े होते हैं, जिसे इन्होंने काफ़ी हद तक संजोया है।  चलिए आज 2018 से एक उठाते हैं  ... 


ताश, अच्छी है या बुरी यह बहस का विषय हो सकता है। पर सैंकड़ों वर्षों से यह आदमी का मनोरंजन करती आ रही है इसमें दो राय नहीं है। इसके  बावन पत्तों में बारह पत्ते, तीन पात्रों, बादशाह, बेगम और गुलाम को तो सभी जानते हैं पर अपने-अपने वर्ग के अनुसार उनकी खासियत और उनके अलग-अलग स्वभाव तथा चरित्र के बारे में कम ही जानकारी प्रचलित है। अच्छी ताशों की गड्डी बनाते समय इनके स्वरूप का पूरा ध्यान रखा जाता है...... ! 
  
#हिन्दी_ब्लागिंग 
ताश एक ऐसा खेल है जो दुनिया भर में प्रचलित है। इसका उल्लेख 9वीं सदी के चीन में भी पाया गया है। जिसके बाद इसने 14वीं सदी के योरोप में प्रवेश करने के बाद सारी दुनिया को अपना बना लिया। ऐसा मानना है कि ''गंजिफा'' के रूप में 16वीं सदी में इसने भारत में प्रवेश किया। ताश जैसे इस खेल का धार्मिक और नैतिक महत्व था। इसके पत्ते गोलाकार होते थे। ये हैसियत के अनुसार कागज़, कडक कपडे, हाथी दाँत, हड्डी या सीप के बने होते थे। जिनमें 12 कार्ड होते थे जिन पर पौराणिक चित्र बने होते थे। इसका एक अन्य रूप भी होता था जिसमें 108 कार्डों 9 गड्डियों में रखा जाता था, प्रत्येक गड्डी सौर मण्डल के नव ग्रहों को दर्शाती थी। इसे नवग्रह-गंजिफा कहा जाता था। 


ताश की लोकप्रियता इसी से आंकी जा सकती है कि इसे तक़रीबन हर छोटा-बड़ा, व्यक्ति, भले ही खेलता न हो पर इसके बारे में थोड़ा-बहुत जानता जरूर है। यहां तक कि दृष्टि-बाधित लोगों के लिए ब्रेल लिपि के कार्ड भी मिलने लगे हैं। जैसे-जैसे इसकी लोकप्रियता बढ़ी वैसे-वैसे इसकी गुणवत्ता में भी बढ़ोत्तरी होती चली गयी। इन्हें विशेष कार्ड, प्लास्टिक या बहुत विशिष्ट प्रकार की शीट पर छापा जाने लगा फिर इसके रंग और चमक बढ़ाने के लिए इन पर वार्निश, लिनन, कैलेंडरिंग जैसे उपचार किए गए, जिससे इनके टूट-फूट और रख-रखाव में भी बढ़ोत्तरी हुई। इसके कोनों को आकार दिया गया। खेलते समय पकड़ने की सुविधा के लिए इनका आकार करीब-करीब हथेली के बराबर रखा जाता है। आज बड़े-बड़े होटलों, रईसों, शौकीनों द्वारा काम में लाई जाने वाली ताश बेशकीमती होती है।
  
मोटे-भारी कागज, गत्ते, या पतले प्लास्टिक से विशेष रूप से बने इसके हिस्सों को कार्ड या पत्ता कहा जाता है। एक गड्डी में इनकी संख्या बावन की होती है, जिसे पैक या डेक कहा जाता है। हर डेक के पीछे की ओर हरेक पत्ता एक ही रंग और डिजाइन का होता है। दूसरी तरफ उन्हें चार भागों, हुकुम, पान, ईंट और चिड़ी (Spade, Heart, Diamond and Club) में बांटा गया होता है। उनका इस्तेमाल खेल में एक सेट के रूप में किया जाता है। हर सेट में तेरह-तेरह पत्ते होते हैं। जिन पर एक से दस तक अंक और उस हिस्से के निशान बने होते हैं और ग्यारह-बारह-तेरह नंबरों की जगह गुलाम-बेगम-बादशाह की तस्वीरें बनी होती हैं। इन पत्तों से दुनिया भर में अनगिनत तरह के खेलों के साथ अन्य तरह का यथा जादूगरों द्वारा हाथ की सफाई, भविष्यवाणी, बोर्ड गेम, ताश के घर बनाने जैसे मनोरंजन के साथ-साथ जुआ भी बुरी तरह शामिल है।

इस बावन पत्तों के खेल में, जैसा कि माना जाता है, आज के समय में सबसे ज्यादा लोकप्रिय खेल ब्रिज, रमी और फ्लैश के हैं।रही पत्तों की बात तो इसके इक्के से लेकर बादशाह तक को तो सभी जानते हैं पर यह कम ही लोगों को पता होगा कि दहले के बाद की तीन तस्वीरें अपने आप में कुछ अलग जानकारी भी रखती हैं। इन पर योरोपीय संस्कृति का प्रभाव अभी भी है। ध्यान से देखें तो ये चारों अपने-आप में बिल्कुल जुदा, अलग और विभिन्न विशेषताएं लिए नजर आएंगे।
    
"हुकुम
  
बादशाह :- यह क़ानून का पालक, सख्त मिजाज, काले रंग को पसंद करने वाला और तलवार से न्याय करने वाला राजा है, जो इसकी तनी हुई तलवार बताती है। इसकी मूंछें इसके स्वभाव को प्रगट करती हैं। इसे इज़राईल के राजा, किंग डेविड को ध्यान में रख बनाया जाता है। 

बेगम :- अपने राजा के कृत्यों से यह दुखी रहती है, जो इसके चेहरे और काले कपड़ों से साफ झलकता है। इसके साथ जलती हुई शमा होती है जो बताती है कि यह रानी भी उसी की तरह घुल-घुल कर मिट जाएगी। इसके साथ एक फूल जरूर है पर वह भी मुर्झाया हुआ और पीछे की तरफ जो इसके दुख को ही प्रगट करता है।

गुलाम :- हुकुम का गुलाम। जैसा मालिक वैसा गुलाम। अपने मालिक के हुक्म का ताबेदार काले कपड़े और हाथ में हंटर धारण करने वाला। सख्त चेहरे वाला, किसी के बहकावे में ना आने वाला और सारे काम अक्ल से नहीं हंटर से करने वाला होता है। इसे कोई फुसला नहीं सकता।  


"पान"
  
बादशाह :- पान यानि दिल यानि कोमल ह्रदय का स्वामी। इसीलिये यह मूंछे भी नहीं रखता। यह मानवता का पूजारी, अहिंसक, धार्मिक और शांतिप्रिय स्वभाव का होता है। ऐसा होने पर भी बहुत सतर्क और कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाला है। यह तलवार से नहीं बुद्धि से काम करता है। इसीलिये इसकी तलवार पीछे की ओर रहती है। इसे एलेक्जेंडर की खासियत दी जाने की कोशिश की जाती है। यह फ्रैंक्स के राजा शारलेमेन का प्रतिरूप माना जाता है। 

बेगम :- यह बहुत सुंदर, संतोषी स्वभाव, विद्वान पर कोमल ह्रदय तथा शांत स्वभाव वाली रानी है। इसके चेहरे से इसकी गंभीरता साफ झलकती है। हाथ का फूल भी इस बात की गवाही देता है। कोमल स्वभाव के बावजूद यह विदुषि है।

गुलाम :- पान का गुलाम भी अपने मालिकों की तरह शांत और नम्र स्वभाव वाला होता है। सादा जीवन बिताने वाला और प्रकृति प्रेमी है जो इसके हाथ में पकड़ी गयी पत्ती से स्पष्ट है। अनुशासन बनाए रखने के लिये छोटी-छोटी मूंछें रखता है।


"चिडी"
  
बादशाह :- यह तीन पत्तियों वाला, समझदार और अपने अधिकारों की रक्षा करने वाला राजा है। यह अपने को राजा नहीं सेवक मानता है। रौबदार मूंछों वाले इस राजा का भेद कोई नहीं जान पाता है। इसमें राजा अगस्तस या सीजर की खूबियों का ध्यान रखा जाता है। 

बेगम :- यह एक चतुर, चालाक तथा तीव्र बुद्धिवाली रानी है। तड़क-भड़क से दूर फूलों की शौकीन यह समस्याओं को साम, दाम, दंड़, भेद किसी भी तरह सुलझाने में विश्वास रखती है।

गुलाम :- चिड़ी का गुलाम यह सबसे चर्चित गुलाम है। गंवारों सा दिखने वाला, पगड़ी में पत्ती लटकाए सदा अपने बादशाह की चापलूसी करने में लगा रहता है। साधारण से कपड़े और गोलमटोल मूंछों को धारण करने वाला एक घटिया इंसान है।

"ईंट"
  
बादशाह :- यह राजा के साथ-साथ हीरों का व्यापारी भी है। हर समय धन कमाने की फिराक में रहता है। जिसके लिये कुछ भी कर सकता है। हाथ जोड़ कर ईमानदारी का दिखावा करता है, पर मन से साफ नहीं है। इसे हिंसा पसंद नहीं है पर एशो-आराम से रहना पसंद करता है।

बेगम :- यह भी अपने राजा की तरह धन-दौलत से प्रेम करने वाली, किसी के बहकावे में ना आनेवाली, कीमती कपड़े और गहनों से लगाव रखने वाली सदा पैसा कमाने की धुन में रहने वाली बेगम है।

गुलाम :- रोनी सूरतवाला तथा बिना मूछों वाला यह गुलाम सदा इसी गम में घुलता रहता है कि कहीं राजा से कोई और पुरस्कार या दान ना ले जाए। अमीर राजा का गुलाम है सो इसके कपड़े भी कीमती होते हैं। यह अपना काम बड़ी चतुराई से करता है।


भले ही ताश को मनोरंजन के लिए बनाया गया हो पर धीरे-धीरे इस पर जुआ हावी होता चला गया और इसकी बदनामी का मुख्य कारण तो बना ही इस खेल को इतना बदनाम कर गया कि समाज में इसे और इसको खेलने वालों को हिकारत की नजर से देखा जाने लगा। यह तो भला हो ब्रिज जैसे खेल का जिसे अंतराष्ट्रीय स्पर्द्धाओं में सम्मिलित होने के गौरव के साथ उसे खेलने वालों को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। 

2 टिप्पणियाँ:

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

रश्मि जी बहुत-बहुत आभार। हमारे ब्लॉग बुलेटिन परिवार के लिए आने वाला समय और भी शुभ हो ! आपसी स्नेह ऐसे ही बना रहे ! सभी को आने वाले नववर्ष की अशेष मंगलकामनाएं।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह।

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